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गीतासंकट के बीच संवाद

रथहीन रघुवीर और विभीषण का संशय

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रथहीन रघुवीर और विभीषण का संशय के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · रथहीन रघुवीर और विभीषण का संशय

लंका की रणभूमि। सामने रावण अपने सजे-सजाए रथ पर सवार, सिर पर छत्र, चारों ओर अस्त्र-शस्त्र की चमक। और इस ओर रघुवीर राम पैदल खड़े हैं। न कोई रथ, न देह पर कवच, न पाँवों में कुछ। विभीषण यह दृश्य देखते हैं और उनका मन काँप उठता है। यही तो वे विभीषण हैं जिन्होंने अपना भाई छोड़ा, अपना राजपाट छोड़ा, अपनी सारी जाति के विरुद्ध जाकर राम को अपना लिया। अब, ठीक युद्ध के मुहाने पर, उन्हें राम की सुध सताती है।

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा।
देखि बिभीषन भयउ अधीरा॥
अधिक प्रीति मन भा संदेहा।
बंदि चरन कह सहित सनेहा॥
नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना।
केहि बिधि जितब बीर बलवाना॥

रावण रथ पर, और रघुवीर बिना रथ के। यह देखकर विभीषण अधीर हो गए। तुलसीदास एक बारीक बात यहीं रख देते हैं। यह संशय प्रेम की कमी से नहीं उठा, प्रेम की अधिकता से उठा है। जिससे जितना गहरा लगाव होता है, उसकी चिन्ता उतनी ही सताती है। विभीषण चरणों में सिर नवाते हैं और बड़े स्नेह से पूछते हैं, नाथ, न आपके पास रथ है, न देह पर कवच, न पाँवों में जूते। ऐसे में इस बलवान वीर रावण को आप किस भाँति जीतेंगे?

राम मुसकाते हैं। उत्तर में कोई घबराहट नहीं। वे विभीषण को सखा कहकर बुलाते हैं, और यहीं से पूरी गीता का द्वार खुलता है।

सुनहु सखा कह कृपानिधाना।
जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥

सुनिए मित्र, कृपा के भण्डार राम कहते हैं, जिस रथ से सच्ची विजय मिलती है, वह रथ और ही है। इस एक पंक्ति में सारा रहस्य छिपा है। राम यह नहीं कहते कि उन्हें रथ की आवश्यकता नहीं। वे कहते हैं कि विजय दिलाने वाला रथ आँखों से दिखने वाला नहीं। राक्षस-कुल में जन्मे विभीषण को मित्र कहकर पुकारना, यह भी राम का अपना ढंग है, जिसमें कोई ऊँच-नीच नहीं। अगले खण्डों में वही अनोखा रथ एक-एक अंग करके खुलता जाएगा।

आधार: तुलसीदास, रामचरितमानस, लंकाकाण्ड