सौन्दर्य लहरी · भाग 2 · सौन्दर्य वर्णन

सौन्दर्य लहरी · Saundarya Lahari

भाग 2 · सौन्दर्य वर्णन · श्लोक 42-100

बाहर की लहरें। यहाँ देवी एक चेहरा, एक रूप ले लेती हैं — और कवि मुकुट से शुरू कर के, एक-एक अंग, चरणों तक उतरता है। यह पढ़ने की चीज़ नहीं, डूबने की चीज़ है।

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🟢 पूरा — श्लोक 42-100, और 3-श्लोक का अनुबंध, भाष्य सहित।

पहले एक बात

आनन्द लहरी एक नक्शा था — देवी कौन हैं, शक्ति क्या है, चक्र, श्री चक्र। अब वह सब पीछे रह गया। यहाँ कवि एक बहुत सीधा, बहुत मानवीय काम करता है: वह माँ को देखता है, और जो देखता है उसे शब्दों में पकड़ने की कोशिश करता है।

यह वर्णन एक ख़ास क्रम में चलता है — केशादि-पादान्त, यानी सिर के बालों से शुरू कर के चरणों तक। मुकुट, बाल, माथा, भौंहें, आँखें, नाक, होंठ, मुस्कान, वाणी, गला, बाँहें, और नीचे, नीचे, चरण-कमल तक। हर श्लोक एक अंग पर ठहरता है।

इसे जल्दी मत पढ़िए। यह साइट का सबसे काव्यात्मक हिस्सा है। हर श्लोक एक छोटी तस्वीर है, और तस्वीरें दौड़ कर नहीं देखी जातीं।

42 · मुकुट

गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥ ४२॥

gatair māṇikyatvaṁ gagana-maṇibhiḥ sāndra-ghaṭitaṁ · kirīṭaṁ te haimaṁ hima-giri-sute kīrtayati yaḥ · sa nīḍeya-cchāyā-cchuraṇa-śabalaṁ candra-śakalaṁ · dhanuḥ śaunāsīraṁ kim iti na nibadhnāti dhiṣaṇām

शब्दार्थ: गगन-मणि · सूरज (आकाश का रत्न) · सान्द्र-घटित · घनी जड़ाई वाला · हैम किरीट · सोने का मुकुट · चन्द्र-शकल · चाँद का टुकड़ा · शौनासीर धनुः · इंद्रधनुष।

अर्थ: हे हिमालय-पुत्री, तेरे सोने के मुकुट में बारह सूर्य माणिक्य बन कर घनी जड़ाई की तरह जड़े हैं। जो इस मुकुट का बखान करता है, उसके मन में मुकुट पर पड़ा चाँद का टुकड़ा क्या इंद्रधनुष की तरह नहीं बँध जाता?

भावार्थ: कवि सबसे ऊपर से शुरू करता है — मुकुट। और पहली ही तस्वीर में आकाश पूरा उतर आता है: बारह सूरज उसमें रत्न बने हैं, ऊपर चाँद का टुकड़ा, और सुनहरी आभा पर वह चाँद इंद्रधनुष जैसा बिखर जाता है। एक मुकुट में पूरा आसमान — सूरज, चाँद, इंद्रधनुष। यात्रा यहीं से, सिर के ऊपर से, शुरू होती है।

43 · केश

धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं
घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन् मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम् ॥ ४३॥

dhunotu dhvāntaṁ nas tulita-dalitendīvara-vanaṁ · ghana-snigdha-ślakṣṇaṁ cikura-nikurumbaṁ tava śive · yadīyaṁ saurabhyaṁ sahajam upalabdhuṁ sumanaso · vasanty asmin manye vala-mathana-vāṭī-viṭapinām

शब्दार्थ: ध्वान्तं धुनोतु · अँधेरा दूर करे · इन्दीवर-वन · नीले कमलों का वन · चिकुर-निकुरुम्ब · केशों का गुच्छा · सौरभ्य · सुगंध · सुमनस् · फूल (और सज्जन)।

अर्थ: हे शिवे, तेरे केशों का गुच्छा — घना, चिकना, मुलायम, खिले नीले कमलों के वन जैसा — हमारा अँधेरा दूर करे। मुझे लगता है, इंद्र के बाग़ के पेड़ों के फूल इसी में आ बसते हैं, बस इसकी सहज सुगंध पाने के लिए।

भावार्थ: मुकुट के बाद बाल। और कवि एक प्यारी कल्पना करता है: देवी के बालों में अपने आप एक सुगंध है, और स्वर्ग के फूल तक उस सुगंध के लालच में इन्हीं बालों में आ कर बस जाते हैं। फूलों को सुगंधित करने वाले बाल — उल्टी बात, और इसीलिए मीठी।

44 · सीमन्त

तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी-
परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः ।
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर-
द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ॥ ४४॥

tanotu kṣemaṁ nas tava vadana-saundarya-laharī-parīvāha-srotaḥ-saraṇir iva sīmanta-saraṇiḥ · vahantī sindūraṁ prabala-kabarī-bhāra-timira-dviṣāṁ vṛndair bandīkṛtam iva navīnārka-kiraṇam

शब्दार्थ: सीमन्त-सरणि · माँग की रेखा · परीवाह-स्रोतः · छलकती धारा का नाला · कबरी-भार · केश-राशि का बोझ · नवीन-अर्क-किरण · नए सूरज की किरण।

अर्थ: तेरे मुख की सौंदर्य-लहर इतनी छलक रही है कि माँग की रेखा उसी छलकाव का बहता हुआ नाला लगती है। और उसमें भरा सिंदूर ऐसा दिखता है मानो घनी काली केश-राशि रूपी शत्रुओं ने नए सूरज की एक किरण को बंदी बना रखा हो। यह माँग हमारा कल्याण करे।

भावार्थ: बालों के बाद माँग की लकीर। दो तस्वीरें एक साथ: एक, मुख की सुंदरता इतनी ज़्यादा है कि वह माँग की राह से बह कर निकल रही है। दो, काले बालों के बीच लाल सिंदूर — मानो अँधेरे ने सूरज की एक किरण क़ैद कर ली हो। काले के बीच एक लाल लकीर, और कवि उसमें एक पूरी कहानी देख लेता है।

45 · मुख और अलकें

अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ॥ ४५॥

arālaiḥ svābhāvyād ali-kalabha-sa-śrībhir alakaiḥ · parītaṁ te vaktraṁ parihasati paṅkeruha-rucim · dara-smere yasmin daśana-ruci-kiñjalka-rucire · sugandhau mādyanti smara-dahana-cakṣur-madhulihaḥ

शब्दार्थ: अराल अलक · घुँघराली लटें · अलि-कलभ · भौंरों के बच्चे · परिहसति · हँसी उड़ाता है · दर-स्मेर · हल्की मुस्कान वाला · दशन-रुचि-किञ्जल्क · दाँतों की चमक रूपी केसर।

अर्थ: सहज ही घुँघराली, भौंरों के बच्चों जैसी श्यामल लटों से घिरा तेरा मुख कमल की शोभा की हँसी उड़ाता है। उस हल्की मुस्कान वाले, दाँतों की चमक रूपी केसर से सुंदर, सुगंधित मुख पर शिव की आँखें भौंरे की तरह मतवाली हो जाती हैं।

भावार्थ: अब पूरा मुख। कवि कहता है यह मुख कमल को मात देता है — और फिर एक बारीक बात: कमल पर भौंरे मँडराते हैं, और इस “कमल” पर शिव की अपनी आँखें भौंरे बन कर मतवाली हो रही हैं। प्रेमी की नज़र को भौंरा बना देना — कवि की एक प्यारी, शरारती छवि।

46 · ललाट

ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य-
द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥ ४६॥

lalāṭaṁ lāvaṇya-dyuti-vimalam ābhāti tava yad · dvitīyaṁ tan manye makuṭa-ghaṭitaṁ candra-śakalam · viparyāsa-nyāsād ubhayam api saṁbhūya ca mithaḥ · sudhā-lepa-syūtiḥ pariṇamati rākā-hima-karaḥ

शब्दार्थ: लावण्य-द्युति-विमल · सौंदर्य की कांति से निर्मल · द्वितीय चन्द्र-शकल · दूसरा चाँद का टुकड़ा · विपर्यास-न्यास · उल्टा जोड़ना · राका-हिमकर · पूर्णिमा का चाँद।

अर्थ: सौंदर्य की कांति से निर्मल तेरा ललाट ऐसा दमकता है कि मुझे लगता है यह मुकुट पर सजे चाँद के टुकड़े का दूसरा आधा है। अगर इन दोनों आधों को उल्टा कर के आपस में जोड़ दिया जाए, तो अमृत की परत से सिला हुआ एक पूरा पूर्णिमा-चाँद बन जाएगा।

भावार्थ: मुकुट पर चाँद का टुकड़ा है (श्लोक 42)। और माथा भी चाँद के टुकड़े जैसा घुमावदार। कवि एक मीठी ज्यामिति करता है: अगर ये दो आधे चाँद उल्टे जोड़ दें, तो एक पूरा चाँद बन जाए। दो अधूरे, मिल कर एक पूरा — एक सुंदर कल्पना, माथे के घुमाव की।

47 · भौंहें

भ्रुवौ भुग्ने किंचिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥ ४७॥

bhruvau bhugne kiṁcid bhuvana-bhaya-bhaṅga-vyasanini · tvadīye netrābhyāṁ madhukara-rucibhyāṁ dhṛta-guṇam · dhanur manye savyetara-kara-gṛhītaṁ rati-pateḥ · prakoṣṭhe muṣṭau ca sthagayati nigūḍhāntaram ume

शब्दार्थ: भुग्ने भ्रुवौ · ज़रा झुकी दो भौंहें · भुवन-भय-भङ्ग · संसार का डर मिटाने में लगी · मधुकर-रुचि नेत्र · भौंरे जैसी काली आँखें · रतिपति · कामदेव · प्रकोष्ठ · कलाई और मुट्ठी।

अर्थ: हे उमे, संसार का डर मिटाने में लगी तेरी ज़रा सी झुकी दोनों भौंहें — मुझे कामदेव का धनुष लगती हैं, जिसकी डोरी तेरी भौंरे जैसी काली आँखें हैं। बीच का जोड़ बस तेरी नाक की कलाई-मुट्ठी से ढका हुआ है।

भावार्थ: भौंहें — और कवि उनमें कामदेव का धनुष देख लेता है। दो झुकी भौंहें धनुष का घुमाव, काली आँखें उसकी डोरी, और बीच में नाक मानो वह जगह जहाँ धनुष पकड़ा गया है। चेहरे के तीन हिस्सों को मिला कर एक तना हुआ धनुष — और वह धनुष “संसार का डर मिटाने” वाला है।

48 · तीन आँखें

अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम् ॥ ४८॥

ahaḥ sūte savyaṁ tava nayanam arkātmakatayā · tri-yāmāṁ vāmaṁ te sṛjati rajanī-nāyakatayā · tṛtīyā te dṛṣṭir dara-dalita-hemāmbuja-ruciḥ · samādhatte saṁdhyāṁ divasa-niśayor antara-carīm

शब्दार्थ: अहः सूते · दिन को जन्म देता है · अर्क-आत्मक · सूर्य-रूप · त्रियामा · रात · रजनी-नायक · चंद्र · दर-दलित-हेम-अम्बुज · अधखिले सुनहरे कमल जैसी।

अर्थ: तेरी दाहिनी आँख सूर्य-रूप है, इसलिए दिन को जन्म देती है। बायीं आँख चंद्र-रूप है, इसलिए रात रचती है। और तेरी तीसरी आँख, अधखिले सुनहरे कमल जैसी आभा वाली, दिन और रात के बीच की संध्या को रचती है।

भावार्थ: देवी की तीन आँखें — और कवि उन्हें समय का स्रोत बना देता है। एक आँख से दिन, दूसरी से रात, और तीसरी, सुनहरी, उन दोनों के बीच की गोधूलि। आँखें सिर्फ़ देखती नहीं; वे दिन-रात-संध्या रच रही हैं। देखना और रचना — यहाँ एक ही हैं।

49 · आँखें

विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥ ४९॥

viśālā kalyāṇī sphuṭa-rucir ayodhyā kuvalayaiḥ · kṛpā-dhārā-dhārā kim api madhurābhoga-vatikā · avantī dṛṣṭis te bahu-nagara-vistāra-vijayā · dhruvaṁ tat-tan-nāma-vyavaharaṇa-yogyā vijayate

शब्दार्थ: विशाला · विशाल / उज्जैन · कल्याणी · मंगलमयी / कल्याण नगर · अयोध्या · जो जीती न जा सके / अयोध्या नगर · अवन्ती · रक्षा करती / अवंती नगर। (हर शब्द एक गुण भी है और एक नगर का नाम भी।)

अर्थ: तेरी दृष्टि विशाल है, कल्याणी है, साफ़ कांति वाली है, कमलों से भी अजेय है, करुणा की धारा को थामे है, अनोखी मधुर है, और रक्षा करने वाली है। ये सब गुण ही उन-उन नगरों के नाम भी हैं — और इसीलिए तेरी दृष्टि उन कई नगरों के विस्तार पर विजयी है।

भावार्थ: यह श्लोक एक चतुर शब्द-खेल है। विशाला, कल्याणी, अयोध्या, अवंती — हर शब्द दो काम करता है: देवी की आँख का एक गुण बताता है, और साथ ही एक प्रसिद्ध नगर का नाम है। तो कवि कहता है, देवी की दृष्टि इन नगरों से भी बढ़ कर है — क्योंकि उनके नाम तो असल में उसी दृष्टि के गुण हैं। नगर बड़े हैं, पर वे जिस गुण से नाम पाते हैं, वह गुण देवी की एक नज़र में है।

50 · कान तक पहुँचती आँखें

कवीनां संदर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम् ॥ ५०॥

kavīnāṁ saṁdarbha-stabaka-makarandaika-rasikaṁ · kaṭākṣa-vyākṣepa-bhramara-kalabhau karṇa-yugalam · amuñcantau dṛṣṭvā tava nava-rasāsvāda-taralāv · asūyā-saṁsargād alika-nayanaṁ kiṁcid aruṇam

शब्दार्थ: संदर्भ-स्तबक · रचनाओं के गुच्छे · मकरन्द · मधु · कटाक्ष · कनखी · भ्रमर-कलभ · भौंरे के बच्चे · असूया · ईर्ष्या · अलिक-नयन · माथे की आँख (तीसरी आँख)।

अर्थ: तेरी कनखी की नज़रें भौंरे के दो बच्चे हैं, जो कवियों की रचनाओं के मधु के अकेले रसिया हैं। ये दोनों भौंरे तेरे दोनों कानों को छोड़ ही नहीं रहे, नौ रसों का स्वाद लेने में चंचल हो कर — और यह देख कर तेरी तीसरी आँख ईर्ष्या से ज़रा लाल हो गई है।

भावार्थ: देवी की तिरछी नज़रें इतनी लंबी हैं कि कानों तक पहुँचती हैं — और कवि उन्हें भौंरे बना देता है जो कानों के पास मँडरा रहे हैं। और फिर शरारत: तीसरी आँख इस पर “ईर्ष्या” से लाल हो गई, क्योंकि वह कानों तक नहीं पहुँच पाती। एक चेहरे के भीतर तीन आँखों के बीच की छोटी सी ईर्ष्या — कवि की कोमल हँसी।

51 · हर के लिए अलग नज़र

शिवे श‍ृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननी दृष्टिः सकरुणा ॥ ५१॥

śive śṛṅgārārdrā tad-itara-jane kutsana-parā · saroṣā gaṅgāyāṁ giriśa-carite vismayavatī · harāhibhyo bhītā sarasiruha-saubhāgya-jananī · sakhīṣu smerā te mayi jananī dṛṣṭiḥ sakaruṇā

शब्दार्थ: शृङ्गार-आर्द्रा · प्रेम से भीगी · कुत्सन-परा · तिरस्कार वाली · सरोषा · रोष भरी · विस्मयवती · अचरज भरी · भीता · डरी हुई · स्मेरा · मुस्कान वाली।

अर्थ: तेरी नज़र शिव पर प्रेम से भीगी रहती है, बाक़ी लोगों पर तटस्थ, गंगा पर ज़रा रोष भरी, शिव की लीला-कथाओं पर अचरज भरी, उनके साँपों से डरी हुई, कमलों को मात देने वाली, सखियों पर मुस्कान भरी — और मुझ पर, हे माँ, करुणा से भरी।

भावार्थ: सौन्दर्य लहरी का सबसे प्यारा और सबसे जाना-पहचाना श्लोक। एक ही आँख, और कितने अलग-अलग भाव — किस पर पड़ती है, इस पर निर्भर। शिव पर प्रेम, सौत गंगा पर हल्का रोष, साँपों पर डर, सखियों पर हँसी।

एक नज़र इतनी जीवित कि वह हर रिश्ते में अलग रंग ले लेती है। और सबसे अंत में, सबसे कोमल — “मुझ पर करुणा।” कवि सारी सूची इसी एक शब्द तक पहुँचने के लिए बनाता है। माँ की नज़र, भक्त पर, बस दया।

52 · आँखों का कान तक खिंचना

गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥ ५२॥

gate karṇābhyarṇaṁ garuta iva pakṣmāṇi dadhatī · purāṁ bhettuś citta-praśama-rasa-vidrāvaṇa-phale · ime netre gotrādhara-pati-kulottaṁsa-kalike · tavākarṇākṛṣṭa-smara-śara-vilāsaṁ kalayataḥ

शब्दार्थ: कर्ण-अभ्यर्ण · कान के पास · गरुत् · पंख · पक्ष्मन् · पलकें · पुरां भेत्तुः · त्रिपुर तोड़ने वाले शिव की · आकर्ण-आकृष्ट · कान तक खींचा हुआ · स्मर-शर · कामदेव का बाण।

अर्थ: कानों के पास तक पहुँचीं, पंखों जैसी पलकें लिए तेरी ये दोनों आँखें, हे पर्वतराज-कुल की कली — शिव के शांत मन में भी प्रेम का रस घोल देने वाली ये आँखें — कान तक खींचे हुए कामदेव के बाण की शोभा धारण करती हैं।

भावार्थ: आँखें इतनी लंबी कि कान तक पहुँच जाएँ — और कवि उन्हें कान तक खींचा हुआ तीर बना देता है, धनुष की डोरी पूरी तनी हुई। और यह तीर किस पर? शिव के “शांत मन” पर — वे शिव जो वैराग्य की मूरत हैं, उनके भीतर भी यह नज़र प्रेम जगा देती है। श्लोक 47 का धनुष यहाँ तना हुआ, छूटने को तैयार।

53 · तीन रंग की आँखें

विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ॥ ५३॥

vibhakta-trai-varṇyaṁ vyatikarita-līlāñjanatayā · vibhāti tvan-netra-tritayam idam īśāna-dayite · punaḥ sraṣṭuṁ devān druhiṇa-hari-rudrān uparatān · rajaḥ sattvaṁ bibhrat tama iti guṇānāṁ trayam iva

शब्दार्थ: त्रैवर्ण्य · तीन रंग · लीला-अञ्जन · खेल भर का काजल · ईशान-दयिते · शिव की प्रिया · उपरत · विश्राम में गए हुए · गुणों का त्रय · तीन गुण।

अर्थ: हे शिव-प्रिये, खेल भर के काजल से तेरी ये तीन आँखें तीन रंगों में बँटी दमकती हैं — मानो प्रलय में विश्राम कर गए ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र को फिर से रचने के लिए तू रज, सत्व और तम — तीनों गुण — धारण किए हो।

भावार्थ: देवी की तीन आँखें तीन रंगों में — और कवि उनमें तीनों गुण देख लेता है। आँखें सिर्फ़ सुंदर नहीं; वे वह कच्चा माल हैं जिससे ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र फिर रचे जाएँगे। काजल को “लीला-अंजन” कहा है — खेल भर का। देवी के लिए सृष्टि रचना भी बस एक खेल है, आँख में काजल लगाने जितना सहज।

54 · आँखें, तीन तीर्थ

पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये
दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।
नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमनघम् ॥ ५४॥

pavitrī-kartuṁ naḥ paśupati-parādhīna-hṛdaye · dayā-mitrair netrair aruṇa-dhavala-śyāma-rucibhiḥ · nadaḥ śoṇo gaṅgā tapana-tanayeti dhruvam amuṁ · trayāṇāṁ tīrthānām upanayasi saṁbhedam anagham

शब्दार्थ: पशुपति-पराधीन-हृदये · जिसका हृदय शिव के अधीन है · दया-मित्र · दया से भरे · अरुण-धवल-श्याम · लाल-सफ़ेद-काला · शोण नद · लाल नदी · तपन-तनया · सूर्य-पुत्री यमुना · संभेद · संगम।

अर्थ: हे शिव-अधीन हृदय वाली, हमें पवित्र करने के लिए तू अपनी दया-भरी तीन आँखों से — जिनकी आभा लाल, सफ़ेद और श्याम है — निश्चय ही तीन तीर्थों का निर्मल संगम हमारे सामने ले आती है: लाल शोण नद, सफ़ेद गंगा, और श्याम यमुना।

भावार्थ: देवी की तीन आँखों के तीन रंग — लाल, सफ़ेद, काला — और कवि उनमें तीन पवित्र नदियों का संगम देख लेता है: लाल शोण, सफ़ेद गंगा, काली यमुना। यानी देवी के मुख पर ही एक त्रिवेणी है। तीर्थ पर जाने की ज़रूरत नहीं; वह संगम उनकी एक नज़र में बह रहा है।

55 · पलक का झपकना

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥ ५५॥

nimeṣonmeṣābhyāṁ pralayam udayaṁ yāti jagatī · tavety āhuḥ santo dharaṇi-dhara-rājanya-tanaye · tvad-unmeṣāj jātaṁ jagad idam aśeṣaṁ pralayataḥ · paritrātuṁ śaṅke parihṛta-nimeṣās tava dṛśaḥ

शब्दार्थ: निमेष · पलक झपकना · उन्मेष · पलक खुलना · प्रलयम् उदयं याति · नष्ट और उत्पन्न होती है · परिहृत-निमेष · पलक झपकना छोड़ कर।

अर्थ: हे पर्वतराज-पुत्री, संत कहते हैं — तेरी पलक झपकने से यह सृष्टि प्रलय को जाती है, और पलक खुलने से उदय पाती है। शायद इसीलिए, तेरे उन्मेष से जन्मे इस पूरे जगत को प्रलय से बचाने के लिए, तेरी आँखें पलक झपकना ही छोड़ देती हैं।

भावार्थ: एक हैरान कर देने वाली कल्पना। अगर देवी की आँख खुलने से सृष्टि बनती है और बंद होने से मिटती है — तो जब तक आँख खुली है, संसार है। इसलिए, कवि कहता है, देवी पलक झपकाती ही नहीं — संसार को बचाए रखने के लिए। एक माँ का अपने बच्चे को टकटकी लगाए देखते रहना, बिना पल भर नज़र हटाए। पलक न झपकना — और उसमें पूरी सृष्टि की हिफ़ाज़त।

56 · आँखें और मछलियाँ

तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम्
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥ ५६॥

tavāparṇe karṇejapa-nayana-paiśunya-cakitā · nilīyante toye niyatam animeṣāḥ śapharikāḥ · iyaṁ ca śrīr baddha-cchada-puṭaka-kavāṭaṁ kuvalayam · jahāti pratyūṣe niśi ca vighaṭayya praviśati

शब्दार्थ: अपर्णे · हे अपर्णा (देवी) · कर्णेजप · कान तक पहुँच कर चुग़ली करने वाली · पैशुन्य · चुग़ली · चकिता · डरी हुई · शफरिका · छोटी मछली · श्री · लक्ष्मी · कुवलय · नीला कमल।

अर्थ: हे अपर्णा, तेरी आँखें कानों तक पहुँच कर मछलियों की चुग़ली करती हैं — इस डर से छोटी मछलियाँ पानी में छिप जाती हैं, और तेरी आँखों जैसी अनिमेष बन जाती हैं। और लक्ष्मी? वह नीले कमल में बंद पंखुड़ी-किवाड़ों को सुबह छोड़ देती है, रात में फिर खोल कर भीतर समा जाती है।

भावार्थ: देवी की आँखें मछली जैसी हैं — यह पुरानी उपमा है। पर कवि उसे उलट देता है: मछलियाँ देवी की आँखों से डर कर पानी में छिप जाती हैं, क्योंकि वे आँखें कानों तक जा कर उनकी चुग़ली कर देती हैं। और लक्ष्मी कमल में रहती हैं — कवि का इशारा है कि देवी की आँखों जैसी सुंदरता पा सके, इसके लिए सब कोई कुछ न कुछ जतन कर रहा है। पूरा प्रकृति-संसार देवी की आँखों की नक़ल में लगा है।

57 · करुणा की एक नज़र

दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥ ५७॥

dṛśā drāghīyasyā dara-dalita-nīlotpala-rucā · davīyāṁsaṁ dīnaṁ snapaya kṛpayā mām api śive · anenāyaṁ dhanyo bhavati na ca te hānir iyatā · vane vā harmye vā sama-kara-nipāto hima-karaḥ

शब्दार्थ: द्राघीयसी दृशा · लंबी नज़र से · दर-दलित-नीलोत्पल · अधखिले नीले कमल जैसी · दवीयांस · बहुत दूर खड़ा · दीन · दीन-हीन · स्नपय · नहला दे · हिमकर · चंद्रमा।

अर्थ: हे शिवे, अपनी उस लंबी नज़र से — जो अधखिले नीले कमल जैसी है — दूर खड़े मुझ दीन को भी कृपा से नहला दे। इससे यह दीन धन्य हो जाएगा, और तेरा इसमें कुछ नहीं घटेगा — आख़िर चाँद की चाँदनी जंगल पर भी उतनी ही पड़ती है जितनी महल पर।

भावार्थ: पूरी आँख-वाली लड़ी का सबसे कोमल श्लोक। कवि बस इतना माँगता है — एक नज़र, दूर खड़े उस पर भी पड़ जाए। और फिर एक प्यारा तर्क देता है: इससे तेरा कुछ कम नहीं होगा। चाँदनी महल और जंगल में फ़र्क नहीं करती; देवी की कृपा भी ऊँचे-नीचे में फ़र्क क्यों करे? कृपा बाँटने से घटती नहीं।

58 · आँख का कोना और कान

अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदण्डकुतुकम् ।
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस-
न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥ ५८॥

arālaṁ te pālī-yugalam aga-rājanya-tanaye · na keṣām ādhatte kusuma-śara-kodaṇḍa-kutukam · tiraścīno yatra śravaṇa-patham ullaṅghya vilasann · apāṅga-vyāsaṅgo diśati śara-saṁdhāna-dhiṣaṇām

शब्दार्थ: पाली-युगल · आँख और कान के बीच का दोहरा घुमाव · कुसुम-शर · फूल-बाण वाला कामदेव · कोदण्ड · धनुष · श्रवण-पथ · कान का रास्ता · अपाङ्ग-व्यासङ्ग · कनखी का खिंचाव।

अर्थ: हे पर्वतराज-पुत्री, आँख और कान के बीच का तेरा वह घुमावदार दोहरा हिस्सा किसमें कामदेव के फूल-धनुष की कल्पना नहीं जगाता? वहीं तो तिरछी हो कर, कान का रास्ता लाँघ कर खिलती तेरी कनखी की नज़र — तीर चढ़ाए जाने का भाव दे देती है।

भावार्थ: श्लोक 47 में भौंहें कामदेव का धनुष थीं। यहाँ वही धनुष फिर दिखता है — आँख और कान के बीच का घुमाव। और कनखी की नज़र वह तीर जो धनुष पर चढ़ रहा है। कवि बार-बार उसी छवि पर लौटता है, हर बार चेहरे के एक नए कोने से। एक धनुष, कई कोणों से देखा गया।

59 · मुख, कामदेव का रथ

स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥ ५९॥

sphurad-gaṇḍābhoga-pratiphalita-tāṭaṅka-yugalaṁ · catuś-cakraṁ manye tava mukham idaṁ manmatha-ratham · yam āruhya druhyaty avani-ratham arkendu-caraṇaṁ · mahā-vīro māraḥ pramatha-pataye sajjitavate

शब्दार्थ: गण्ड-आभोग · गालों का विस्तार · प्रतिफलित · प्रतिबिंबित · ताटङ्क-युगल · दो कुंडल · चतुश्चक्र · चार पहिये · मन्मथ-रथ · कामदेव का रथ · मार · कामदेव।

अर्थ: तेरे चमकते गालों पर दोनों कुंडल प्रतिबिंबित होते हैं — तो कुल चार। मुझे तेरा यह मुख कामदेव का चार-पहिया रथ लगता है। इसी पर सवार हो कर महावीर कामदेव उन शिव से भी टक्कर ले लेता है, जो ख़ुद धरती-रथ (सूरज-चाँद जिसके पहिये) पर सवार हैं।

भावार्थ: दो कुंडल, और गालों पर उनका प्रतिबिंब — कुल चार गोल आकार। कवि उन्हें चार पहिये बना कर पूरे मुख को कामदेव का रथ बना देता है। और यह रथ इतना ताक़तवर कि कामदेव इस पर बैठ कर शिव तक को चुनौती दे दे। मुख — एक रथ, जिस पर बैठ कर प्रेम सबसे बड़े वैरागी को भी जीत ले।

60 · कान के कुंडल

सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥ ६०॥

sarasvatyāḥ sūktīr amṛta-laharī-kauśala-harīḥ · pibantyāḥ śarvāṇi śravaṇa-culukābhyām aviralam · camatkāra-ślāghā-calita-śirasaḥ kuṇḍala-gaṇo · jhaṇat-kārais tāraiḥ prati-vacanam ācaṣṭa iva te

शब्दार्थ: सूक्ति · सुंदर वचन · श्रवण-चुलुक · कानों की अंजुली · शर्वाणि · हे शिवा · चमत्कार-श्लाघा · वाह-वाह में · कुण्डल-गण · कुंडल · झणत्कार · झनकार।

अर्थ: हे शर्वाणि, जब तू सरस्वती के अमृत-लहर जैसे सुंदर वचनों को अपने कानों की अंजुली से लगातार पीती है, और वाह-वाह में सिर हिलाती है, तब तेरे कुंडल अपनी ऊँची झनकार से मानो उन वचनों का जवाब दे रहे हों।

भावार्थ: एक प्यारा, जीवंत दृश्य। सरस्वती कुछ सुंदर बोल रही हैं, देवी मगन हो कर सुन रही हैं — कानों को अंजुली बना कर, मानो वचन कोई पानी हों जिन्हें पिया जा रहा है। और सुनते-सुनते सिर हिलता है, “वाह,” और कुंडल झनक उठते हैं — मानो वे ख़ुद जवाब दे रहे हों। सुनने का इतना सजीव, इतना रसीला चित्र।

61 · नासिका

असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥ ६१॥

asau nāsā-vaṁśas tuhina-giri-vaṁśa-dhvaja-paṭi · tvadīyo nedīyaḥ phalatu phalam asmākam ucitam · vahann antar-muktāḥ śiśiratara-niśvāsa-galitaṁ · samṛddhyā yat tāsāṁ bahir api ca muktā-maṇi-dharaḥ

शब्दार्थ: नासा-वंश · नाक का बाँस (सीधी, ऊँची नाक) · वंश-ध्वज-पट · कुल-ध्वजा का कपड़ा · नेदीयः · पास से · अन्तर्-मुक्ता · भीतर मोती · निश्वास · साँस · मुक्ता-मणि-धर · मोती धारण किए।

अर्थ: तेरी यह नासिका — हिमालय-कुल की ध्वजा के डंडे जैसी सीधी — हमें पास से उचित फल दे। इसके भीतर इतने मोती हैं कि कुछ तेरी ठंडी साँस के साथ बह कर बाहर भी आ जाते हैं, और वही नाक का मोती बन कर सजते हैं।

भावार्थ: “नासा-वंश” का शाब्दिक अर्थ “नाक का बाँस” है — सीधी, ऊँची नाक के लिए। कवि एक मीठी कल्पना करता है: नाक के भीतर मोतियों का ख़ज़ाना है, और देवी की साँस इतनी ठंडी और समृद्ध है कि वह एक मोती बाहर भी ले आती है — और वही नथ का मोती बन जाता है। साँस से जन्मा गहना — कवि का एक और कोमल आविष्कार।

62 · अधर

प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ॥ ६२॥

prakṛtyā raktāyās tava sudati danta-cchada-ruceḥ · pravakṣye sādṛśyaṁ janayatu phalaṁ vidruma-latā · na bimbaṁ tad-bimba-pratiphalana-rāgād aruṇitaṁ · tulām adhyāroḍhuṁ katham iva vilajjeta kalayā

शब्दार्थ: सुदति · हे सुंदर दाँतों वाली · दन्तच्छद · अधर, होंठ · विद्रुम-लता · मूँगे की लता · बिम्ब · बिंब फल (कुंदरू, लाल फल) · तुलाम् आरोढुं · तुलना में चढ़ने में।

अर्थ: हे सुंदर दाँतों वाली, सहज ही लाल तेरे अधर की उपमा मैं देने चलूँ? मूँगे की लता फल दे, तब बात बने। बिंब फल तो तेरे अधर के प्रतिबिंब की लाली पा कर ही लाल होता है — फिर वह तेरे होंठ की तुलना में, ज़रा से अंश में भी, चढ़ने से शरमाएगा क्यों नहीं?

भावार्थ: देवी के लाल होंठ की तुलना किससे करें? पुरानी कविता बिंब फल से करती आई है। पर कवि कहता है — वह तो ख़ुद देवी के होंठ का प्रतिबिंब पा कर लाल हुआ है। तो वह उपमा कैसे बने? एक चीज़ जो ख़ुद उधार की लाली से लाल है, वह असली लाली की बराबरी कैसे करे। कवि उपमा देने में अपनी हार स्वीकार करता है — और वही उसकी सबसे सुंदर उपमा बन जाती है।

63 · मुस्कान

स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः
पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ॥ ६३॥

smita-jyotsnā-jālaṁ tava vadana-candrasya pibatāṁ · cakorāṇām āsīd atirasatayā cañcu-jaḍimā · atas te śītāṁśor amṛta-laharīm amla-rucayaḥ · pibanti svacchandaṁ niśi niśi bhṛśaṁ kāñjika-dhiyā

शब्दार्थ: स्मित-ज्योत्स्ना · मुस्कान की चाँदनी · वदन-चन्द्र · मुख-चंद्र · चकोर · चाँदनी पीने वाला पक्षी · चञ्चु-जडिमा · चोंच की जड़ता · अम्ल-रुचि · खटाई के स्वाद वाले · काञ्जिक · काँजी (खट्टा पेय)।

अर्थ: तेरे मुख-चंद्र की मुस्कान-चाँदनी इतनी मीठी थी कि उसे पीते-पीते चकोर पक्षियों की चोंच रस से जड़ हो गई। तभी से, खटाई के स्वाद के भूखे वे चकोर, हर रात असली चाँद की अमृत-लहर को काँजी समझ कर मन भर पीते हैं।

भावार्थ: चकोर पक्षी किंवदंती में चाँदनी पीता है। कवि कहता है — देवी की मुस्कान की चाँदनी इतनी मीठी निकली कि चकोरों की चोंच मिठास से सुन्न हो गई। अब उन्हें कुछ खट्टा चाहिए — तो असली चाँद की चाँदनी को वे “काँजी” समझ कर पीते हैं। देवी की मुस्कान असली चाँद से भी मीठी — और कवि यह बात एक छोटे पक्षी के स्वाद-बदलने से कह जाता है।

64 · जिह्वा

अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥ ६४॥

aviśrāntaṁ patyur guṇa-gaṇa-kathāmreḍana-japā · japā-puṣpa-cchāyā tava janani jihvā jayati sā · yad-agrāsīnāyāḥ sphaṭika-dṛṣad-accha-cchavi-mayī · sarasvatyā mūrtiḥ pariṇamati māṇikya-vapuṣā

शब्दार्थ: अविश्रान्तं · बिना थके · आम्रेडन-जप · बार-बार दोहराना · जपा-पुष्प · गुड़हल का फूल (गहरा लाल) · स्फटिक-दृषद् · स्फटिक पत्थर · माणिक्य-वपुस् · माणिक्य का शरीर।

अर्थ: हे माँ, तेरी वह जिह्वा जयवंत हो, जो बिना थके अपने पति के गुणों की कथा बार-बार जपती रहती है, और गुड़हल के फूल जैसी गहरी लाल है। उसके अग्र-भाग पर बैठी सरस्वती की स्फटिक जैसी श्वेत-निर्मल मूर्ति भी उस लाली से माणिक्य के शरीर वाली हो जाती है।

भावार्थ: देवी की जीभ गुड़हल के फूल जैसी लाल — और वह लगातार शिव के गुण गाती रहती है। और जीभ की नोक पर सरस्वती का वास माना जाता है। तो कवि कहता है: सरस्वती तो सफ़ेद, स्फटिक जैसी हैं, पर देवी की जीभ की लाली में बैठ कर वे ख़ुद लाल माणिक्य जैसी हो जाती हैं। वाणी की देवी तक देवी के रंग में रंग जाती हैं।

65 · ताम्बूल

रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर्-
निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ॥ ६५॥

raṇe jitvā daityān apahṛta-śiras-trair kavacibhir · nivṛttaiś caṇḍāṁśa-tripura-hara-nirmālya-vimukhaiḥ · viśākhendropendraiḥ śaśi-viśada-karpūra-śakalā · vilīyante mātas tava vadana-tāmbūla-kabalāḥ

शब्दार्थ: अपहृत-शिरस्त्र · शिरस्त्राण उतारे हुए · कवचिन् · कवच पहने · चण्डांश · चण्ड का हिस्सा · निर्माल्य-विमुख · निर्माल्य लेने से बचते हुए · विशाख · कार्तिकेय · इन्द्र-उपेन्द्र · इंद्र और विष्णु।

अर्थ: हे माँ, युद्ध में दैत्यों को जीत कर लौटे, शिरस्त्राण उतारे, कवच पहने कार्तिकेय, इंद्र और विष्णु — जो शिव का निर्माल्य लेने से बचते हैं — वे चाँद-सी उजली कर्पूर-मिली तेरे मुख की ताम्बूल-गुठलियाँ पाने को लालायित रहते हैं।

भावार्थ: एक घरेलू दृश्य, और एक बारीक शास्त्र-बात। देवता शिव का “निर्माल्य” (पूजा में चढ़ा कर उतारा हुआ) नहीं लेते — परम्परा में वह वर्जित है। पर देवी के मुख से उतरी ताम्बूल की गुठली? उसके लिए कार्तिकेय, इंद्र, विष्णु तक तरसते हैं। देवी का जूठा भी इतना पवित्र कि बड़े-बड़े देवता उसे प्रसाद की तरह चाहें।

66 · वाणी और वीणा

विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः
त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥ ६६॥

vipañcyā gāyantī vividham apadānaṁ paśupateḥ · tvayārabdhe vaktuṁ calita-śirasā sādhu-vacane · tadīyair mādhuryair apalapita-tantrī-kala-ravāṁ · nijāṁ vīṇāṁ vāṇī niculayati colena nibhṛtam

शब्दार्थ: विपञ्ची · वीणा · अपदान · गाथा, कीर्ति · चलित-शिरसा · सिर हिला कर · साधु-वचन · “वाह, बहुत अच्छे” · अपलपित · दबा दिया, फीका कर दिया · निचुलयति · ढक देती है · चोल · ग़िलाफ़।

अर्थ: सरस्वती वीणा पर शिव की भाँति-भाँति की कीर्ति गा रही थीं। तभी तूने सिर हिला कर “वाह” कहा — और तेरे उस वचन की मिठास ने वीणा की तंत्री की झंकार को इतना फीका कर दिया कि सरस्वती ने चुपके से अपनी वीणा ग़िलाफ़ में ढक दी।

भावार्थ: एक नाज़ुक, मानवीय दृश्य। सरस्वती — संगीत की देवी — वीणा बजा रही हैं। देवी सुन कर बस “वाह” कहती हैं। और देवी की आवाज़ की वह “वाह” इतनी मीठी है कि सरस्वती की अपनी वीणा फीकी लगने लगती है — तो वे चुपचाप उसे ढक देती हैं। शर्म से नहीं, बल्कि एक सच्चे कलाकार की पहचान से: जब असली मिठास सामने हो, अपना साज़ चुप कर देना ही आदर है।

67 · चिबुक

कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥ ६७॥

karāgreṇa spṛṣṭaṁ tuhina-giriṇā vatsalatayā · girīśenodastaṁ muhur adhara-pānākulatayā · kara-grāhyaṁ śambhor mukha-mukura-vṛntaṁ giri-sute · kathaṅkāraṁ brūmas tava cibukam aupamya-rahitam

शब्दार्थ: कर-अग्र · उँगलियों के सिरे · वत्सलता · दुलार · उदस्तं · ऊपर उठाया · अधर-पान-आकुल · होंठ चूमने को आतुर · मुख-मुकुर-वृन्त · मुख-दर्पण का हत्था · औपम्य-रहित · उपमा से परे।

अर्थ: हिमालय ने जिसे दुलार से उँगलियों के सिरे से छुआ, शिव ने जिसे होंठ चूमने की आतुरता में बार-बार ऊपर उठाया, जो शिव के लिए मुख-दर्पण का हत्था है — हे गिरि-सुते, तेरी उस चिबुक (ठोड़ी) को हम कैसे कहें, जिसकी कोई उपमा ही नहीं?

भावार्थ: ठोड़ी — और कवि उसके लिए कोई उपमा ढूँढ ही नहीं पाता। पर हार में भी वह तीन कोमल छवियाँ दे जाता है: पिता हिमालय उसे दुलार से छूते हैं, पति शिव चूमने को बार-बार ऊपर उठाते हैं, और वह शिव के लिए उस दर्पण का हत्था है जिसमें वे देवी का मुख देखते हैं। तीन रिश्तों के तीन कोमल स्पर्श, एक ठोड़ी पर।

68 · ग्रीवा

भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ॥ ६८॥

bhujāśleṣān nityaṁ pura-damayituḥ kaṇṭakavatī · tava grīvā dhatte mukha-kamala-nāla-śriyam iyam · svataḥ śvetā kālāguru-bahula-jambāla-malinā · mṛṇālī-lālityaṁ vahati yad-adho hāra-latikā

शब्दार्थ: भुज-आश्लेष · बाँहों के आलिंगन · कण्टकवती · रोमांच से (काँटों जैसे रोंगटे) · मुख-कमल-नाल · मुख-कमल की डंडी · कालागुरु · काला अगर (चंदन) · जम्बाल · कीचड़ · मृणाली · कमल की डंडी।

अर्थ: शिव के बाँहों के आलिंगन से तेरी ग्रीवा सदा रोमांच से भरी रहती है, और मुख-कमल की डंडी की शोभा धारण करती है। उसके नीचे की हार-लता — सहज श्वेत, पर काले अगर के लेप से मलिन — ठीक कीचड़ में सनी कमल-डंडी का लालित्य पा लेती है।

भावार्थ: गला — और कवि उसे मुख-कमल की डंडी बना देता है। डंडी पर रोंगटे (रोमांच के, शिव के आलिंगन से), जैसे कमल-नाल पर काँटे। और गले की सफ़ेद माला, काले चंदन-लेप से सनी, ठीक उस कमल-डंडी जैसी लगती है जो कीचड़ में हो — और कीचड़ कमल की सुंदरता घटाता नहीं, बढ़ाता है। सजावट का दाग़ भी यहाँ शोभा बन जाता है।

69 · गले की तीन रेखाएँ

गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥ ६९॥

gale rekhās tisro gati-gamaka-gītaika-nipuṇe · vivāha-vyānaddha-praguṇa-guṇa-saṁkhyā-pratibhuvaḥ · virājante nānā-vidha-madhura-rāgākara-bhuvāṁ · trayāṇāṁ grāmāṇāṁ sthiti-niyama-sīmāna iva te

शब्दार्थ: रेखास् तिस्रः · तीन रेखाएँ · गति-गमक-गीत · संगीत की गति, गमक, गान · विवाह-व्यानद्ध · विवाह में बँधा · प्रगुण-गुण · मंगल-सूत्र के धागे · ग्राम · संगीत के तीन ग्राम (स्वर-समूह) · सीमान् · सीमाएँ।

अर्थ: हे संगीत की गति-गमक-गान में अकेली निपुण देवी, तेरे गले की तीन रेखाएँ विवाह में बँधे मंगल-सूत्र के धागों की गिनती की गवाह हैं। और साथ ही वे ऐसी दमकती हैं मानो भाँति-भाँति के मधुर रागों को जन्म देने वाले तीन संगीत-ग्रामों की ठहराव-सीमाएँ हों।

भावार्थ: गले की तीन प्राकृतिक रेखाएँ — और कवि उनमें दो चीज़ें देख लेता है। एक, वे विवाह के मंगल-सूत्र के धागों की निशानी हैं (सुहाग का चिह्न)। दो, चूँकि देवी संगीत में निपुण हैं, वे रेखाएँ संगीत के तीन ग्रामों की सीमा-रेखाएँ हैं — मानो गला ख़ुद एक साज़ हो जिस पर सुर बँटे हैं। एक मामूली शारीरिक रेखा, और उसमें सुहाग और संगीत दोनों।

70 · चार बाँहें

मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥ ७०॥

mṛṇālī-mṛdvīnāṁ tava bhuja-latānāṁ catasṛṇāṁ · caturbhiḥ saundaryaṁ sarasija-bhavaḥ stauti vadanaiḥ · nakhebhyaḥ santrasyan prathama-mathanād andhaka-ripoḥ · caturṇāṁ śīrṣāṇāṁ samam abhaya-hastārpaṇa-dhiyā

शब्दार्थ: मृणाली-मृद्वी · कमल-डंडी जैसी कोमल · भुज-लता · बाँह-लताएँ · सरसिज-भव · कमल से जन्मा ब्रह्मा · नखेभ्यः सन्त्रस्यन् · नाखूनों से डरा हुआ · अन्धक-रिपु · शिव।

अर्थ: कमल-डंडी जैसी कोमल तेरी चार बाँह-लताओं के सौंदर्य की स्तुति ब्रह्मा अपने चारों मुखों से करते हैं — शायद इस डर से कि शिव के नाखून (जो पहले उनका एक सिर काट चुके हैं) कहीं बाक़ी चार सिर न काट दें, इसलिए चारों सिरों के लिए एक साथ “अभय” का हाथ पाने की चाह में।

भावार्थ: देवी की चार बाँहें — और ब्रह्मा अपने चारों मुखों से उनकी स्तुति करते हैं। पर कवि एक शरारती वजह जोड़ देता है: ब्रह्मा का एक सिर शिव पहले काट चुके हैं। तो ब्रह्मा डरे हुए हैं, और देवी की चार बाँहों की स्तुति कर रहे हैं — इस उम्मीद में कि चारों बाँहें चारों बचे सिरों को “अभय” दे दें। डर के नीचे एक हँसी, और बीच में देवी की बाँहें — शरण देने वाली।

71 · हाथ और नाखून

नखानामुद्द्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारुणदलम् ॥ ७१॥

nakhānām uddyotair nava-nalina-rāgaṁ vihasatāṁ · karāṇāṁ te kāntiṁ kathaya kathayāmaḥ katham ume · kayācid vā sāmyaṁ bhajatu kalayā hanta kamalaṁ · yadi krīḍal-lakṣmī-caraṇa-tala-lākṣāruṇa-dalam

शब्दार्थ: नख-उद्द्योत · नाखूनों की चमक · नव-नलिन-राग · नए कमल की लाली · विहसतां · हँसी उड़ाते हुए · साम्यं भजतु · बराबरी कर ले · लाक्षा-अरुण-दल · महावर से लाल हुई पंखुड़ी।

अर्थ: हे उमे, अपने नाखूनों की चमक से नए कमल की लाली की हँसी उड़ाते तेरे हाथों की कांति को हम कैसे कहें, बता। हाँ, कमल कुछ अंश में बराबरी कर सकता है — पर तभी, जब उस पर खेलती लक्ष्मी के पैरों की महावर की लाली चढ़ी हो।

भावार्थ: देवी के हाथ कमल से सुंदर — फिर वही उपमा-संकट (श्लोक 62 की तरह)। कवि कहता है: कमल बराबरी कर भी ले, तो सिर्फ़ तब जब उस पर लक्ष्मी के पैरों की लाल महावर लग जाए। यानी कमल अपने आप काफ़ी नहीं; उसे भी उधार की लाली चाहिए। देवी की सुंदरता मूल है; बाक़ी सब उससे रंग माँगते हैं।

72 · स्तन-युगल

समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् ।
यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झडिति ॥ ७२॥

samaṁ devi skanda-dvipa-vadana-pītaṁ stana-yugaṁ · tavedaṁ naḥ khedaṁ haratu satataṁ prasnuta-mukham · yad-ālokyāśaṅkākulita-hṛdayo hāsa-janakaḥ · sva-kumbhau herambaḥ parimṛśati hastena jhaḍiti

शब्दार्थ: स्कन्द · कार्तिकेय · द्विप-वदन · हाथी-मुख वाला गणेश · पीत · पिया गया · प्रस्नुत-मुख · दूध से भरा · हेरम्ब · गणेश · स्व-कुम्भौ · अपने (मस्तक के) कुंभ।

अर्थ: हे देवी, कार्तिकेय और हाथी-मुख गणेश दोनों ने जिसे समान रूप से पिया, सदा दूध से भरा रहने वाला तेरा वह स्तन-युगल हमारा खेद हरे। इसे देख कर गणेश का मन शंका से भर जाता है, और वे झट से अपने मस्तक के दोनों कुंभ हाथ से टटोल लेते हैं — और यह दृश्य हँसी ले आता है।

भावार्थ: एक प्यारा, घरेलू दृश्य, बाल-गणेश का। गणेश माँ का दूध पीते हैं — और माँ के स्तन देख कर उन्हें अपने हाथी-सिर के दो उभार (कुंभ-स्थल) याद आ जाते हैं। शंका में वे झट से अपना सिर टटोल लेते हैं — “मेरे वाले ठीक तो हैं?” एक बच्चे की मासूम उलझन, और सबकी हँसी। देवी का यह श्लोक माँ-रूप का है, और कवि उसे एक नटखट बाल-दृश्य से सजा देता है।

73 · वक्षोज

अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ
न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसङ्गरसिकौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥ ७३॥

amū te vakṣojāv amṛta-rasa-māṇikya-kutupau · na saṁdeha-spando naga-pati-patāke manasi naḥ · pibantau tau yasmād avidita-vadhū-saṅga-rasikau · kumārāv adyāpi dvirada-vadana-krauñca-dalanau

शब्दार्थ: वक्षोज · वक्ष · अमृत-रस-माणिक्य-कुतुप · अमृत-रस से भरी माणिक्य की कुप्पी · नग-पति-पताके · हे पर्वतराज की ध्वजा · द्विरद-वदन · हाथी-मुख गणेश · क्रौञ्च-दलन · क्रौंच पर्वत को चीरने वाले कार्तिकेय।

अर्थ: हे पर्वतराज की ध्वजा, तेरे ये दोनों वक्ष अमृत-रस से भरी माणिक्य की कुप्पियाँ हैं — इसमें हमारे मन को रत्ती भर संदेह नहीं। प्रमाण यह कि इन्हें पीने वाले हाथी-मुख गणेश और क्रौंच को चीरने वाले कार्तिकेय आज तक कुमार ही हैं, स्त्री-संग के रस से अनजान।

भावार्थ: कवि एक मज़ेदार “तर्क” गढ़ता है। गणेश और कार्तिकेय आजीवन कुमार रहे। क्यों? कवि कहता है — क्योंकि उन्होंने माँ का दूध पिया, और वह दूध अमृत-रस था। जिसने वह परम रस चख लिया, उसे फिर किसी और रस की चाह ही नहीं रही। माँ का दूध — और उसमें वह तृप्ति जो किसी और तृष्णा को उठने ही न दे।

74 · हार

वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥ ७४॥

vahaty amba stamberama-danuja-kumbha-prakṛtibhiḥ · samārabdhāṁ muktā-maṇibhir amalāṁ hāra-latikām · kucābhogo bimbādhara-rucibhir antaḥ śabalitāṁ · pratāpa-vyāmiśrāṁ pura-damayituḥ kīrtim iva te

शब्दार्थ: स्तम्बेरम-दनुज · गजासुर (हाथी-दैत्य) · कुम्भ · मस्तक के मोती · मुक्तामणि · मोती · शबलितां · रँगी हुई · बिम्ब-अधर · बिंब फल जैसे लाल होंठ · प्रताप-व्यामिश्र · तेज से मिली हुई।

अर्थ: हे माँ, तेरा वक्ष-स्थल गजासुर के मस्तक के मोतियों से बनी निर्मल हार-लता धारण करता है। तेरे बिंब-फल जैसे लाल होंठों की आभा से वह हार भीतर-भीतर लाल रँग जाती है — मानो शिव की वह कीर्ति हो, जो उनके प्रताप (पराक्रम) से रँगी हुई है।

भावार्थ: सफ़ेद मोतियों की माला, जो देवी के लाल होंठों की झलक पा कर भीतर से गुलाबी पड़ जाती है। और कवि उसे शिव की “कीर्ति” बना देता है — कीर्ति परम्परा में सफ़ेद होती है, पर पराक्रम (प्रताप) से वह लाल-मिश्रित हो जाती है। एक माला, और उसमें यश और पराक्रम दोनों के रंग।

75 · स्तन्य

तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥ ७५॥

tava stanyaṁ manye dharaṇi-dhara-kanye hṛdayataḥ · payaḥ-pārāvāraḥ parivahati sārasvatam iva · dayāvatyā dattaṁ draviḍa-śiśur āsvādya tava yat · kavīnāṁ prauḍhānām ajani kamanīyaḥ kavayitā

शब्दार्थ: स्तन्य · स्तन-दूध · पयः-पारावार · दूध का समुद्र · सारस्वत · सरस्वती का (ज्ञान का) · द्रविड-शिशु · दक्षिण का एक बालक · प्रौढ-कवि · पके हुए कवि · कवयिता · कवि।

अर्थ: हे पर्वत-कन्या, मुझे लगता है तेरा स्तन-दूध तेरे हृदय से बहता ज्ञान का दूध-समुद्र है। तभी तो दया से तूने जो दूध एक द्रविड-शिशु को पिलाया, उसे चख कर वह बालक पके हुए, मँजे हुए कवियों में भी सबसे मनोहर कवि बन गया।

भावार्थ: यह श्लोक एक कथा की ओर इशारा करता है — एक दक्षिण भारतीय बालक, जिसे देवी ने अपने हाथ से दूध पिलाया, और वह बड़ा हो कर महाकवि बन गया। कवि कहता है — देवी का दूध सिर्फ़ दूध नहीं, “सारस्वत” है, यानी ख़ुद ज्ञान। माँ का पहला आहार ही ज्ञान का पहला घूँट। और गौर कीजिए — कविता पर इतना ज़ोर देने वाला यह कवि शायद अपने लिए भी वही एक घूँट माँग रहा है।

76 · रोमावली

हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥ ७६॥

hara-krodha-jvālāvalibhir avalīḍhena vapuṣā · gabhīre te nābhī-sarasi kṛta-saṅgo manasijaḥ · samuttasthau tasmād acala-tanaye dhūma-latikā · janas tāṁ jānīte tava janani romāvalir iti

शब्दार्थ: हर-क्रोध-ज्वाला · शिव के क्रोध की लपटें · अवलीढ · चाटा हुआ, झुलसा हुआ · नाभी-सरसि · नाभि रूपी सरोवर में · मनसिज · कामदेव · धूम-लतिका · धुएँ की लता।

अर्थ: शिव के क्रोध की लपटों से झुलसे शरीर वाला कामदेव, हे पर्वत-पुत्री, तेरी गहरी नाभि रूपी सरोवर में जा डूबा। और उसी से, हे माँ, धुएँ की एक लता उठी — लोग उसी को तेरी रोमावली समझते हैं।

भावार्थ: शिव ने अपनी तीसरी आँख से कामदेव को जला दिया था। कवि उस कथा को यहाँ बुनता है: जला हुआ कामदेव देवी की नाभि-सरोवर में जा गिरा, और वहाँ से धुएँ की एक पतली लता उठी — और वही नाभि से ऊपर जाती रोमावली है। एक शारीरिक रेखा, और उसमें जले हुए प्रेम की एक पूरी कथा। कवि का काम यही है — मामूली में असाधारण देख लेना।

77 · नाभि और उदर

यदेतत् कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योऽन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥ ७७॥

yad etat kālindī-tanutara-taraṅgākṛti śive · kṛśe madhye kiṁcij janani tava yad bhāti sudhiyām · vimardād anyo’nyaṁ kuca-kalaśayor antara-gataṁ · tanū-bhūtaṁ vyoma praviśad iva nābhiṁ kuhariṇīm

शब्दार्थ: कालिन्दी · यमुना · तनुतर-तरङ्ग · पतली लहर · कृश-मध्य · पतली कमर · सुधियाम् · बुद्धिमानों को · कुच-कलश · कलश-जैसे वक्ष · व्योम · आकाश · कुहरिणी · गुफ़ा वाली।

अर्थ: हे शिवे, तेरी पतली कमर पर जो यह यमुना की पतली लहर जैसी रेखा बुद्धिमानों को दिखती है — वह मानो यह हो: कलश-जैसे दोनों वक्षों की आपसी रगड़ से बीच का आकाश दब कर पतला हो गया, और गुफ़ा-जैसी नाभि में समाता हुआ दिखता है।

भावार्थ: रोमावली की पतली रेखा (श्लोक 76 की धुएँ की लता) यहाँ एक और रूप लेती है — यमुना की पतली, श्यामल लहर। और कवि एक अनोखी कल्पना करता है: यह रेखा असल में “दबा हुआ आकाश” है, जो वक्षों के बीच से निचुड़ कर नाभि की गुफ़ा में समा रहा है। आकाश को इतना पतला कर देना कि वह एक रेखा बन जाए — कवि की कल्पना की कोई सीमा नहीं।

78 · नाभि

स्थिरो गङ्गावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते ॥ ७८॥

sthiro gaṅgāvartaḥ stana-mukula-romāvali-latā-kalāvālaṁ · kuṇḍaṁ kusuma-śara-tejo-hutabhujaḥ · rater līlāgāraṁ kim api tava nābhir giri-sute · bila-dvāraṁ siddher giriśa-nayanānāṁ vijayate

शब्दार्थ: गङ्गावर्त · गंगा का भँवर · आलवाल · पौधे की क्यारी · कुण्ड · हवन-कुंड · कुसुम-शर · कामदेव · लीलागार · क्रीड़ा-भवन · बिल-द्वार · गुफ़ा का द्वार।

अर्थ: हे गिरि-सुते, तेरी नाभि — कोई अनोखी चीज़ — विजयी हो। यह गंगा का स्थिर भँवर है; वक्ष-कलियों और रोमावली-लता की क्यारी है; कामदेव के तेज रूपी अग्नि का हवन-कुंड है; रति का क्रीड़ा-भवन है; और शिव की दृष्टि की सिद्धि के लिए वह गुफ़ा-द्वार है।

भावार्थ: एक ही नाभि, और कवि उसमें पाँच चीज़ें देख लेता है — भँवर, क्यारी, हवन-कुंड, क्रीड़ा-भवन, गुफ़ा-द्वार। हर उपमा एक नया कोण। यह सौन्दर्य वर्णन का अंदाज़ है: कवि किसी एक उपमा से संतुष्ट नहीं होता, वह एक ही चीज़ को घुमा-घुमा कर देखता है, हर बार एक नई चमक के साथ। और आख़िरी उपमा सबसे गहरी — नाभि वह द्वार जहाँ से ध्यानी की दृष्टि भीतर उतरती है।

79 · मध्य (कमर)

निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव ।
चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥ ७९॥

nisarga-kṣīṇasya stana-taṭa-bhareṇa klama-juṣo · naman-mūrter nārī-tilaka śanakais truṭyata iva · ciraṁ te madhyasya truṭita-taṭinī-tīra-taruṇā · samāvasthā-sthemno bhavatu kuśalaṁ śaila-tanaye

शब्दार्थ: निसर्ग-क्षीण · स्वभाव से ही पतला · क्लम-जुष · थका हुआ · नमन्-मूर्ति · झुका हुआ रूप · त्रुट्यत इव · टूटता-सा · त्रुटित-तटिनी-तीर-तरु · टूटते नदी-किनारे के पेड़ · समावस्था-स्थेमन् · एक-सी हालत में टिकाव।

अर्थ: हे नारियों में तिलक-समान, हे शैल-पुत्री — स्वभाव से ही पतली, वक्षों के भार से थकी, झुकी, और मानो धीरे-धीरे टूटती-सी तेरी कमर — जो टूटते नदी-किनारे के पेड़ की तरह बस किसी तरह एक हालत में टिकी है — उसका सदा कुशल हो।

भावार्थ: कवि देवी की पतली कमर देख कर सच में चिंतित हो जाता है — और यह श्लोक एक प्रार्थना बन जाता है: “इसका कुशल हो।” तुलना नदी के टूटते किनारे पर खड़े पेड़ से है, जो बस किसी तरह टिका है। यह सौन्दर्य वर्णन का एक कोमल मोड़ है — कवि अब बस तारीफ़ नहीं कर रहा, वह माँ की फ़िक्र कर रहा है। सुंदरता देख कर मन में दुलार और चिंता, दोनों एक साथ।

80 · त्रिवली

कुचौ सद्यःस्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ॥ ८०॥

kucau sadyaḥ-svidyat-taṭa-ghaṭita-kūrpāsa-bhidurau · kaṣantau dor-mūle kanaka-kalaśābhau kalayatā · tava trātuṁ bhaṅgād alam iti valagnaṁ tanu-bhuvā · tridhā naddhaṁ devi tri-vali lavalī-vallibhir iva

शब्दार्थ: स्विद्यत् · पसीजते हुए · कूर्पास-भिदुर · चोली को फाड़ देने वाले · दोर्मूल · बाँह की जड़ · कनक-कलश · सोने का कलश · तनुभू · कामदेव · त्रिवली · पेट की तीन रेखाएँ · लवली-वल्ली · लवली लता।

अर्थ: हे देवी, पसीजते किनारों वाली चोली को फाड़ देने वाले, बाँहों की जड़ को छूते, सोने के कलश जैसे तेरे वक्ष — इनके भार से कहीं तेरी पतली कमर टूट न जाए, इसलिए मानो कामदेव ने उसे लवली-लता की डोरियों से तीन जगह बाँध दिया हो; वही तेरी त्रिवली है।

भावार्थ: श्लोक 79 में कवि कमर के लिए चिंतित था। श्लोक 80 में वह राहत पा लेता है: पेट की तीन प्राकृतिक रेखाएँ (त्रिवली) — वे असल में तीन डोरियाँ हैं, जिनसे कामदेव ने कमर को बाँध दिया है ताकि वह वक्षों के भार से टूट न जाए। चिंता का जवाब उसी शरीर में मिल जाता है। कवि की कल्पना एक समस्या उठाती है, और अगली ही कल्पना उसका मरहम बन जाती है।

81 · नितम्ब

गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा-
न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥ ८१॥

gurutvaṁ vistāraṁ kṣiti-dhara-patiḥ pārvati nijān · nitambād ācchidya tvayi haraṇa-rūpeṇa nidadhe · atas te vistīrṇo gurur ayam aśeṣāṁ vasumatīṁ · nitamba-prāg-bhāraḥ sthagayati laghutvaṁ nayati ca

शब्दार्थ: गुरुत्वं विस्तारं · भारीपन और विस्तार · क्षिति-धर-पति · पर्वतराज हिमालय · आच्छिद्य · काट कर · हरण-रूपेण · दहेज के रूप में · वसुमती · पृथ्वी · स्थगयति · ढक देता है · लघुत्वं नयति · छोटा कर देता है।

अर्थ: हे पार्वती, पर्वतराज हिमालय ने अपने ही नितम्ब (ढलानों) से भारीपन और विस्तार काट कर, दहेज के रूप में तुझ में रख दिया। इसीलिए तेरा यह विस्तीर्ण, भारी नितम्ब-भार पूरी पृथ्वी को ढक लेता है, और उसे छोटा कर देता है।

भावार्थ: कवि एक मीठा शब्द-खेल करता है। “नितम्ब” का अर्थ पर्वत की ढलान भी है, और शरीर का अंग भी। तो वह कहता है: हिमालय ने अपनी ढलानों का भारीपन और चौड़ाई काट कर बेटी को दहेज में दे दी। इसीलिए देवी का नितम्ब इतना विस्तीर्ण कि पूरी धरती उसके आगे छोटी लगे। एक पिता का बेटी को सबसे क़ीमती चीज़ देना — और वह चीज़ है उसकी अपनी पहचान, उसका अपना भारीपन।

82 · जानु (घुटने)

करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ॥ ८२॥

karīndrāṇāṁ śuṇḍān kanaka-kadalī-kāṇḍa-paṭalīm · ubhābhyām ūrubhyām ubhayam api nirjitya bhavatī · su-vṛttābhyāṁ patyuḥ praṇati-kaṭhinābhyāṁ giri-sute · vijigye jānubhyāṁ vibudha-kari-kumbha-dvayam asi

शब्दार्थ: करीन्द्र-शुण्ड · हाथियों की सूँड़ें · कनक-कदली-काण्ड · सोने के केले के तने · ऊरु · जाँघें · सुवृत्त · ख़ूब गोल · प्रणति-कठिन · प्रणाम करते-करते कठोर हुए · विबुध-करि · ऐरावत हाथी।

अर्थ: हे गिरि-सुते, अपनी दोनों जाँघों से तूने हाथियों की सूँड़ें और सोने के केले के तने — दोनों को जीत लिया। और अपने ख़ूब गोल, पति को प्रणाम करते-करते कठोर हुए दोनों घुटनों से तूने ऐरावत हाथी के मस्तक के दोनों कुंभ-स्थलों को जीत लिया।

भावार्थ: कवि अब घुटनों तक उतर आया है, और उनकी गोलाई की तारीफ़ करता है। पर एक बारीक, कोमल बात साथ में: घुटने “प्रणाम करते-करते कठोर” हुए हैं — यानी देवी इतनी बार शिव को प्रणाम करती हैं कि घुटने सख़्त पड़ गए। तारीफ़ के बीच भी कवि देवी का भक्ति-भाव छिपा देता है। वे ख़ुद, सबकी आराध्य, किसी के आगे झुकती हैं — और वही झुकना उनकी सुंदरता का एक अंग बन जाता है।

83 · जंघा (पिंडलियाँ)

पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ॥ ८३॥

parājetuṁ rudraṁ dvi-guṇa-śara-garbhau giri-sute · niṣaṅgau jaṅghe te viṣama-viśikho bāḍham akṛta · yad-agre dṛśyante daśa-śara-phalāḥ pāda-yugalī-nakhāgra-cchadmānaḥ · sura-makuṭa-śāṇaika-niśitāḥ

शब्दार्थ: परा-जेतुं · पूरी तरह जीतने के लिए · द्विगुण-शर-गर्भ · दुगने बाण भीतर समेटे · निषङ्ग · तरकश · जङ्घा · पिंडली · विषम-विशिख · पाँच (विषम) बाणों वाला कामदेव · दश-शर-फल · दस बाणों के फल · सुर-मकुट-शाण · देवों के मुकुट रूपी सान।

अर्थ: हे गिरि-सुते, रुद्र को पूरी तरह जीतने के लिए पाँच बाणों वाले कामदेव ने तेरी दोनों पिंडलियों को ज़रूर दुगने बाण भरे दो तरकश बना दिया। तभी तो उनके आगे दस बाणों के फल दिखते हैं — तेरे दोनों पैरों के नाखूनों के सिरों के बहाने, जो देवताओं के मुकुटों रूपी सान पर तेज़ किए हुए हैं।

भावार्थ: कामदेव के पास सिर्फ़ पाँच बाण हैं। पर शिव को जीतना बड़ा काम है। तो कवि कहता है: कामदेव ने देवी की दोनों पिंडलियों को तरकश बना लिया, और हर एक में दस-दस बाण — कुल बीस। और उन बाणों के नुकीले सिरे? देवी के पैरों के दस नाखून। और वे नाखून तेज़ कहाँ हुए? देवता जब चरणों में सिर झुकाते हैं, तो उनके मुकुट सान का काम कर देते हैं। तारीफ़, हथियार, और भक्ति — तीनों एक श्लोक में गुँथे हुए।

84 · चरण (कवि की प्रार्थना)

श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥ ८४॥

śrutīnāṁ mūrdhāno dadhati tava yau śekharatayā · mamāpy etau mātaḥ śirasi dayayā dhehi caraṇau · yayoḥ pādyaṁ pāthaḥ paśupati-jaṭā-jūṭa-taṭinī · yayor lākṣā-lakṣmīr aruṇa-hari-cūḍāmaṇi-ruciḥ

शब्दार्थ: श्रुतीनां मूर्धानः · वेदों के शिखर (उपनिषद्) · शेखरतया · मुकुट की तरह · पाद्यं पाथः · चरण धोने का जल · जटाजूट-तटिनी · जटाओं में बहती गंगा · लाक्षा-लक्ष्मी · महावर की शोभा · हरि-चूडामणि · विष्णु के मुकुट-मणि।

अर्थ: वेदों के शिखर (उपनिषद्) जिन्हें मुकुट की तरह सिर पर धारण करते हैं — हे माँ, वे तेरे दोनों चरण दया कर के मेरे सिर पर भी रख दे। जिनका चरण-धोवन शिव की जटाओं में बहती गंगा है, और जिनकी महावर की लाली विष्णु के मुकुट-मणि की आभा है।

भावार्थ: सौन्दर्य वर्णन की पूरी यात्रा अब चरणों तक पहुँच गई है — और यहाँ कवि का स्वर बदल जाता है। अब तक वह वर्णन कर रहा था; यहाँ वह सीधे प्रार्थना करता है: “ये चरण मेरे सिर पर भी रख दे।” वही चरण जिन्हें उपनिषद् सिर पर रखते हैं, जिनका धोवन ख़ुद गंगा है — कवि बस यही माँगता है। केशादि से शुरू हुई यात्रा पादान्त पर एक नम्र, सीधी प्रार्थना बन गई है।

85 · चरण

नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो-
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥ ८५॥

namo-vākaṁ brūmo nayana-ramaṇīyāya padayos · tavāsmai dvandvāya sphuṭa-rucira-sālaktakavate · asūyaty atyantaṁ yad abhihananāya spṛhayate · paśūnām īśānaḥ pramada-vana-kaṅkeli-tarave

शब्दार्थ: नमोवाकं ब्रूमः · हम नमस्कार कहते हैं · नयन-रमणीय · आँखों को भाने वाला · सालक्तक · महावर लगे · अभिहनन · ठोकर मारना · कङ्केलि-तरु · अशोक वृक्ष।

अर्थ: आँखों को भाने वाले, साफ़ सुंदर महावर लगे तेरे इस चरण-युगल को हम नमस्कार करते हैं। शिव तक इन चरणों से ईर्ष्या करते हैं — क्योंकि ये उपवन के अशोक वृक्ष को ठोकर मारना चाहते हैं (परम्परा में अशोक स्त्री के पैर की ठोकर से फूलता है)।

भावार्थ: कवि चरणों को नमन करता है, और एक मीठी, चंचल बात जोड़ देता है: शिव तक इन चरणों से “ईर्ष्या” करते हैं। क्यों? क्योंकि एक पुरानी मान्यता है कि अशोक का पेड़ स्त्री के पैर की कोमल ठोकर से फूल देता है — और देवी के चरण अशोक को छूना चाहते हैं। शिव चाहते हैं वह स्पर्श उन्हें मिले। प्रेमी की वह नन्ही ईर्ष्या — कि प्रिय का चरण किसी और को छुए — कवि उसे देवता पर भी लगा देता है।

86 · चरण (शिव के माथे पर)

मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥ ८६॥

mṛṣā kṛtvā gotra-skhalanam atha vailakṣya-namitaṁ · lalāṭe bhartāraṁ caraṇa-kamale tāḍayati te · cirād antaḥ-śalyaṁ dahana-kṛtam unmūlitavatā · tulā-koṭi-kvāṇaiḥ kilikilitam īśāna-ripuṇā

शब्दार्थ: गोत्र-स्खलन · नाम लेने में चूक (किसी और का नाम लेना) · वैलक्ष्य-नमित · झेंप कर झुका हुआ · ताडयति · ठोकर मारती है · अन्तःशल्य · भीतर की फाँस · तुलाकोटि · पायल · किलिकिलित · किलकारी · ईशान-रिपु · शिव के शत्रु (कामदेव)।

अर्थ: देवी जान-बूझ कर नाम लेने में चूक करती हैं (किसी और स्त्री का नाम ले बैठती हैं), फिर शिव झेंप कर सिर झुका लेते हैं — और तब देवी अपने चरण-कमल से उनके माथे पर ठोकर मार देती हैं। उस समय शिव के शत्रु कामदेव — जिसकी पुरानी, जलाए जाने की फाँस अब उखड़ गई — पायल की झंकार के बहाने मानो किलकारी मार उठता है।

भावार्थ: सौन्दर्य लहरी का सबसे शरारती, सबसे घरेलू श्लोक। एक रूठने-मनाने का दृश्य: देवी प्रेम के नख़रे में किसी और का नाम ले बैठती हैं, शिव झेंप जाते हैं, और देवी हँसी-हँसी में पैर से उनके माथे पर ठोकर लगा देती हैं। और कामदेव? शिव ने उसे जलाया था; अब शिव को चरण-ठोकर खाते देख वह बदला पूरा होने की किलकारी मारता है — वह किलकारी देवी की पायल की झंकार बन कर सुनाई देती है। देवी-शिव का रिश्ता यहाँ बिल्कुल एक आम जोड़े जैसा — रूठना, मनाना, हँसी।

87 · चरण-कमल

हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥ ८७॥

himānī-hantavyaṁ hima-giri-nivāsaika-caturau · niśāyāṁ nidrāṇaṁ niśi carama-bhāge ca viśadau · varaṁ lakṣmī-pātraṁ śriyam atisṛjantau samayināṁ · sarojaṁ tvat-pādau janani jayataś citram iha kim

शब्दार्थ: हिमानी-हन्तव्य · बर्फ़ से नष्ट हो जाने वाला · हिमगिरि-निवास-चतुर · हिमालय में रहने में निपुण · निद्राणं · सोया हुआ · विशद · खिला हुआ · समयिन् · साधक · श्रियम् अतिसृजन्तौ · समृद्धि बरसाते।

अर्थ: हे माँ, कमल बर्फ़ से मर जाता है — तेरे चरण हिमालय में रहने में निपुण हैं। कमल रात में मुरझा जाता है — तेरे चरण रात के पिछले पहर में भी खिले रहते हैं। कमल बस लक्ष्मी का घर है — तेरे चरण साधकों पर समृद्धि बरसाते हैं। तो तेरे चरण कमल को जीत लें, इसमें अचरज क्या?

भावार्थ: चरणों की तुलना कमल से होती आई है। यहाँ कवि एक-एक कर के दिखाता है कि चरण कमल से बढ़ कर क्यों हैं: कमल ठंड से मरता है, चरण हिमालय में पले हैं; कमल रात में बंद, चरण रात-भर खिले; कमल में लक्ष्मी रहती हैं, पर चरण तो ख़ुद बाँटते हैं। उपमा को लेना और फिर एक-एक बिंदु पर उससे आगे निकल जाना — कवि का यह अंदाज़ अब जाना-पहचाना है।

88 · चरण

पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम् ।
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥ ८८॥

padaṁ te kīrtīnāṁ prapadam apadaṁ devi vipadāṁ · kathaṁ nītaṁ sadbhiḥ kaṭhina-kamaṭhī-karpara-tulām · kathaṁ vā bāhubhyām upayamana-kāle purabhidā · yad ādāya nyastaṁ dṛṣadi dayamānena manasā

शब्दार्थ: कीर्तीनां पदं · कीर्ति का स्थान · प्रपद · पंजा, पैर का अगला भाग · अपदं विपदां · विपत्ति से परे · कमठी-कर्पर · कछुए की पीठ का खोल · उपयमन-काल · विवाह के समय · पुरभिद् · शिव · दृषद् · सिल-बट्टा (अश्म)।

अर्थ: हे देवी, तेरे चरण का अगला भाग कीर्ति का घर है और विपत्ति से परे है। फिर सज्जनों ने उसे कठोर कछुए के खोल जैसा कैसे कह दिया? और विवाह के समय शिव ने उसी कोमल चरण को अपने हाथों से उठा कर — दया-भरे मन से — कठोर सिल-बट्टे पर कैसे रख दिया?

भावार्थ: कवि यहाँ दो “शिकायतें” करता है, बहुत प्यार से। एक — कवि-परम्परा देवी के पैर के कोमल पंजे को “कछुए के खोल जैसा” (कठोर, गोल) कहती आई है; कवि कहता है, इतनी कोमल चीज़ को कठोर कैसे कह दिया? दो — विवाह में सप्तपदी के समय वर वधू का पैर सिल पर रखवाता है; कवि कहता है, शिव ने इतना कोमल चरण कठोर पत्थर पर कैसे रख दिया, वह भी दया-भरे मन से? कोमल और कठोर का यह सामना कवि को बेचैन करता है — और वह बेचैनी ही उसका सबसे कोमल भाव बन जाती है।

89 · चरण-नख

नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥ ८९॥

nakhair nāka-strīṇāṁ kara-kamala-saṁkoca-śaśibhis · tarūṇāṁ divyānāṁ hasata iva te caṇḍi caraṇau · phalāni svaḥ-sthebhyaḥ kisalaya-karāgreṇa dadatāṁ · daridrebhyo bhadrāṁ śriyam aniśam ahnāya dadatau

शब्दार्थ: नाक-स्त्री · स्वर्ग की स्त्रियाँ · कर-कमल-संकोच-शशि · कमल-हाथों को संकुचित करने वाले चाँद · दिव्य-तरु · कल्पवृक्ष · किसलय-कराग्र · कोमल पत्ते रूपी हाथ · स्वःस्थ · स्वर्गवासी।

अर्थ: हे चण्डि, तेरे दोनों चरण अपने नाखूनों से — जो स्वर्ग की स्त्रियों के कमल-हाथों को संकुचित करने वाले चाँद जैसे हैं — दिव्य कल्पवृक्षों की मानो हँसी उड़ाते हैं। क्योंकि वे कल्पवृक्ष तो फल बस स्वर्गवासियों को देते हैं, पर तेरे चरण दरिद्रों तक को लगातार, तुरंत, मंगलमयी समृद्धि दे देते हैं।

भावार्थ: कल्पवृक्ष हर इच्छा पूरी करता है — पर सिर्फ़ स्वर्गवासियों की। देवी के चरण उससे आगे हैं: वे दरिद्रों को भी देते हैं, और “अह्नाय” — तुरंत, इंतज़ार कराए बिना। श्लोक 57 की बात फिर लौटी — कृपा ऊँचे-नीचे में फ़र्क नहीं करती। और देखिए, कवि ने नाखूनों को “चाँद” कहा, क्योंकि कमल चाँद से संकुचित होता है — हर उपमा एक छोटी कहानी ले कर आती है।

90 · चरण-कमल

ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दम् विकिरति ।
तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥ ९०॥

dadāne dīnebhyaḥ śriyam aniśam āśānusadṛśīm · amandaṁ saundarya-prakara-makarandaṁ vikirati · tavāsmin mandāra-stabaka-subhage yātu caraṇe · nimajjan maj-jīvaḥ karaṇa-caraṇaḥ ṣaṭ-caraṇatām

शब्दार्थ: आशानुसदृशी श्रियम् · आशा के अनुरूप समृद्धि · मकरन्द · मधु · मन्दार-स्तबक · मंदार-फूलों का गुच्छा · करण-चरण · इन्द्रिय रूपी पैर वाला · षट्-चरणता · छह-पैरों वाला (भौंरा) होना।

अर्थ: दीनों को सदा उनकी आशा के अनुरूप समृद्धि देता, सौंदर्य का खुला मधु बिखेरता — मंदार-फूलों के गुच्छे जैसा सुंदर तेरा यह चरण। मेरी आत्मा, जिसके पैर इन्द्रियाँ हैं, इसी चरण में डूब कर भौंरा बन जाए (छह पैरों वाला)।

भावार्थ: सौन्दर्य वर्णन का यह चरण-यात्रा का अंतिम कोमल मोड़ है। कवि की आत्मा अब तक पाँच इन्द्रियों रूपी पैरों पर भटक रही थी। वह बस एक चीज़ चाहती है: देवी के चरण रूपी फूल में डूब जाए, और भौंरा बन जाए — मधु में रमा हुआ, बस वहीं का हो कर। केशादि से शुरू हुई यह लंबी यात्रा यहाँ पूरी होती है: कवि की आत्मा माँ के चरण-फूल में बैठा भौंरा बन जाना चाहती है। यात्रा का अंत, और एक नया घर।

91 · चरण और हंस

पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति ।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥ ९१॥

pada-nyāsa-krīḍā-paricayam ivārabdhu-manasaḥ · skhalantas te khelaṁ bhavana-kalahaṁsā na jahati · atas teṣāṁ śikṣāṁ subhaga-maṇi-mañjīra-raṇita-cchalād · ācakṣāṇaṁ caraṇa-kamalaṁ cāru-carite

शब्दार्थ: पद-न्यास · पैर रखने का ढंग, चाल · कलहंस · राजहंस · स्खलन्तः · लड़खड़ाते हुए · मणि-मञ्जीर · रत्न-जड़ी पायल · रणित-छल · झंकार के बहाने · आचक्षाणं · सिखाता हुआ।

अर्थ: हे सुंदर चरित वाली, तेरे महल के राजहंस तेरी चाल का अभ्यास करना चाहते हैं — और लड़खड़ाते हुए भी वह खेल छोड़ते नहीं, तेरे पीछे-पीछे चलते रहते हैं। इसीलिए तेरा चरण-कमल, अपनी रत्न-जड़ी पायल की झंकार के बहाने, मानो उन्हें वह चाल सिखा रहा हो।

भावार्थ: एक प्यारा, हल्का-फुल्का दृश्य। राजहंस की चाल सुंदर मानी जाती है — पर यहाँ उल्टा: महल के हंस ख़ुद देवी की चाल सीखना चाहते हैं, और लड़खड़ाते हुए उनके पीछे चलते हैं। और देवी की पायल की झंकार? वह मानो हंसों को चाल का सबक़ दे रही है। सबसे सुंदर चाल वाला पक्षी भी देवी से सीख रहा है — और सिखाने का काम कोई शब्द नहीं, बस पायल की झंकार कर रही है।

92 · सदाशिव की शय्या

गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी श‍ृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥ ९२॥

gatās te mañcatvaṁ druhiṇa-hari-rudreśvara-bhṛtaḥ · śivaḥ svaccha-cchāyā-ghaṭita-kapaṭa-pracchada-paṭaḥ · tvadīyānāṁ bhāsāṁ pratiphalana-rāgāruṇatayā · śarīrī śṛṅgāro rasa iva dṛśāṁ dogdhi kutukam

शब्दार्थ: मञ्चत्वं गताः · मंच (पलंग) बन गए · द्रुहिण-हरि-रुद्र-ईश्वर · ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर (चार पाये) · स्वच्छ-छाया · निर्मल आभा · कपट-प्रच्छद-पट · छद्म चादर · शरीरी श‍ृङ्गार · देहधारी शृंगार-रस।

अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र और ईश्वर तेरे पलंग के चार पाये बन गए हैं। और सदाशिव, अपनी निर्मल उजली आभा से, मानो एक छद्म चादर — वे ही तेरी शय्या की चादर हैं। तेरी देह की आभा के प्रतिबिंब से वे लाल रँग जाते हैं, और तब वे देहधारी शृंगार-रस की तरह आँखों को अचरज से भर देते हैं।

भावार्थ: यह श्री विद्या की प्रसिद्ध छवि है — देवी का पलंग, जिसके चार पाये ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-ईश्वर हैं, और चादर सदाशिव। यानी पाँचों बड़े देवता मिल कर देवी की एक शय्या भर हैं। श्लोक 1 की बात अपने चरम पर: सबसे ऊँचे माने जाने वाले देवता भी देवी के नीचे, उनके आधार भर हैं। और सफ़ेद सदाशिव देवी की लाल आभा पा कर ख़ुद गुलाबी पड़ जाते हैं — चेतना (शिव) पर शक्ति का रंग। यह सौन्दर्य वर्णन का लगभग-समापन है, और यह देवी को फिर सबसे ऊपर बिठा देता है।

93 · देवी की करुणा

अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे ।
भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥ ९३॥

arālā keśeṣu prakṛti-saralā manda-hasite · śirīṣābhā citte dṛṣad-upala-śobhā kuca-taṭe · bhṛśaṁ tanvī madhye pṛthur urasijāroha-viṣaye · jagat-trātuṁ śambhor jayati karuṇā kācid aruṇā

शब्दार्थ: अराला · घुँघराली · प्रकृति-सरला · स्वभाव से सरल · शिरीष-आभा · सिरस के फूल जैसी कोमल · दृषद्-उपल-शोभा · पत्थर जैसी दृढ़ · तन्वी · पतली · पृथु · चौड़ी · अरुणा · लाल आभा वाली।

अर्थ: केशों में घुँघराली, मुस्कान में स्वभाव से ही सरल, मन में सिरस-फूल जैसी कोमल, वक्ष पर पत्थर जैसी दृढ़, कमर में बेहद पतली, और वक्ष-उभार में चौड़ी — संसार को बचाने के लिए शिव की वह कोई अनिर्वचनीय, अरुण-आभा वाली करुणा जयवंत हो।

भावार्थ: सौन्दर्य वर्णन का सार-श्लोक। कवि अब तक एक-एक अंग देख रहा था; यहाँ वह सबको एक साथ समेट लेता है — बाल, मुस्कान, मन, वक्ष, कमर। और फिर एक चौंकाने वाली बात कहता है: यह सारा रूप असल में क्या है? यह “शिव की करुणा” है, जिसने संसार को बचाने के लिए एक देह धर ली। यानी देवी का पूरा सुंदर शरीर एक रूपक है — वह करुणा का देहधारी रूप है। सुंदरता और करुणा यहाँ एक हो जाती हैं: माँ इसलिए सुंदर है क्योंकि वह करुणा है।

94 · चंद्रमा

कलङ्कः कस्तूरी रजनिकरबिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥ ९४॥

kalaṅkaḥ kastūrī rajani-kara-bimbaṁ jala-mayaṁ · kalābhiḥ karpūrair marakata-karaṇḍaṁ nibiḍitam · atas tvad-bhogena pratidinam idaṁ rikta-kuharaṁ · vidhir bhūyo bhūyo nibiḍayati nūnaṁ tava kṛte

शब्दार्थ: कलङ्क · चाँद का दाग़ · कस्तूरी · कस्तूरी (सुगंध) · रजनिकर-बिम्ब · चंद्र-मंडल · मरकत-करण्ड · पन्ने का डिब्बा · रिक्त-कुहर · ख़ाली हुआ खोखला · निबिडयति · फिर भर देता है · विधि · ब्रह्मा।

अर्थ: चाँद का दाग़ असल में कस्तूरी है, और चंद्र-मंडल जल से भरा एक पन्ने का डिब्बा है, जो कलाओं रूपी कर्पूर से ठसाठस भरा है। तेरे रोज़ के उपयोग से यह डिब्बा हर दिन ख़ाली होता जाता है — और इसीलिए ब्रह्मा उसे, बार-बार, सिर्फ़ तेरे लिए, फिर से भर देते हैं।

भावार्थ: चाँद घटता-बढ़ता है — यह सब जानते हैं। पर कवि इसकी एक नई वजह गढ़ता है: चाँद असल में देवी का श्रृंगार-डिब्बा है, कर्पूर और कस्तूरी से भरा। देवी रोज़ उसमें से श्रृंगार-सामग्री लेती हैं, तो वह घटता है (कृष्ण पक्ष)। और ब्रह्मा उसे फिर भर देते हैं (शुक्ल पक्ष)। चाँद का घटना-बढ़ना एक खगोलीय घटना नहीं रही — वह माँ के रोज़ के श्रृंगार की कहानी बन गई। पूरा आसमान देवी की सेवा में लगा है।

95 · चरणों पर अणिमा आदि

पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥ ९५॥

purārāter antaḥ-puram asi tatas tvac-caraṇayoḥ · saparyā-maryādā tarala-karaṇānām asulabhā · tathā hy ete nītāḥ śata-makha-mukhāḥ siddhim atulāṁ · tava dvāropānta-sthitibhir aṇimādyābhir amarāḥ

शब्दार्थ: पुरारि-अन्तःपुर · शिव का अंतःपुर (रनिवास) · सपर्या-मर्यादा · पूजा का अधिकार · तरल-करण · चंचल इन्द्रियों वाले · शतमख-मुख · इंद्र आदि · अणिमादि · अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ।

अर्थ: तू शिव का अंतःपुर है, इसलिए तेरे चरणों की पूजा का अधिकार चंचल इन्द्रियों वालों को सहज नहीं मिलता। फिर भी इंद्र आदि देवता अतुल सिद्धि पा गए — कैसे? तेरे द्वार के पास खड़ी अणिमा आदि आठ सिद्धि-देवियों के रूप में बस ठहर कर।

भावार्थ: देवी शिव का “अंतःपुर” हैं — यानी सबसे भीतरी, सबसे रक्षित जगह। वहाँ चंचल मन वालों का सीधा प्रवेश नहीं। फिर इंद्र जैसे देवता बड़ी सिद्धियाँ कैसे पा गए? कवि का जवाब सुंदर है: वे भीतर नहीं गए — वे बस देवी के द्वार के पास खड़े रहे, और वहीं अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ बन गए। यानी देवी के दरवाज़े तक पहुँच जाना ही इतना बड़ा वरदान है कि वहाँ की प्रतीक्षा भी सिद्धि बन जाती है। भीतर जाना तो दूर की बात; देहरी पर खड़ा होना ही फल दे देता है।

96 · एकमात्र सती

कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः ।
महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे
कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥ ९६॥

kalatraṁ vaidhātraṁ kati-kati bhajante na kavayaḥ · śriyo devyāḥ ko vā na bhavati patiḥ kair api dhanaiḥ · mahādevaṁ hitvā tava sati satīnām acarame · kucābhyām āsaṅgaḥ kuravaka-taror apy asulabhaḥ

शब्दार्थ: कलत्रं वैधात्रं · ब्रह्मा की पत्नी (सरस्वती) · श्रियो देव्याः पतिः · लक्ष्मी का पति · सतीनाम् अचरमे · सतियों में अग्रणी · कुरवक-तरु · कुरवक वृक्ष।

अर्थ: सरस्वती को कितने ही कवि भजते हैं। लक्ष्मी का पति तो थोड़े-से धन से कोई भी बन जाता है। पर हे सती, सतियों में सबसे अग्रणी — महादेव को छोड़ कर तेरे वक्ष का स्पर्श तो कुरवक वृक्ष तक के लिए दुर्लभ है।

भावार्थ: कवि एक तुलना करता है। सरस्वती की कृपा? बहुत कवि पा लेते हैं। लक्ष्मी? थोड़े धन से कोई भी उनका “पति” कहला जाता है — यानी वे चंचल हैं, कहीं भी टिक जाती हैं। पर देवी? वे “सतियों में अग्रणी” हैं — उनकी निष्ठा अटूट है, सिर्फ़ महादेव के लिए। यहाँ कुरवक वृक्ष का ज़िक्र है (परम्परा में वह स्त्री के आलिंगन से फूलता है) — कवि कहता है, देवी का वह स्पर्श उस पेड़ तक को नहीं मिलता। यह श्लोक देवी की एकनिष्ठता की स्तुति है — सुंदरता के बीच एक गहरी निष्ठा।

97 · तुरीया, सबसे परे

गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥ ९७॥

girām āhur devīṁ druhiṇa-gṛhiṇīm āgama-vido · hareḥ patnīṁ padmāṁ hara-sahacarīm adri-tanayām · turīyā kāpi tvaṁ duradhigama-niḥsīma-mahimā · mahā-māyā viśvaṁ bhramayasi para-brahma-mahiṣi

शब्दार्थ: गिरां देवी · वाणी की देवी, सरस्वती · द्रुहिण-गृहिणी · ब्रह्मा की गृहिणी · तुरीया · चौथी (तीनों से परे) · दुरधिगम-निःसीम-महिमा · पाने में कठिन, असीम महिमा वाली · पर-ब्रह्म-महिषी · परब्रह्म की रानी।

अर्थ: शास्त्र के जानकार कहते हैं — सरस्वती ब्रह्मा की गृहिणी हैं, लक्ष्मी विष्णु की पत्नी हैं, और पार्वती शिव की सहचरी। पर तू, हे परब्रह्म की रानी, इन तीनों से परे एक “चौथी” है — पाने में कठिन, असीम महिमा वाली, महामाया, जो पूरे विश्व को घुमाती है।

भावार्थ: यह श्लोक एक बड़ी बात कहता है। तीन देवियाँ हैं — सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती — तीन देवताओं की संगिनियाँ। पर सौन्दर्य लहरी की देवी इन तीनों में से कोई एक नहीं। वे “तुरीया” हैं — चौथी, जो तीनों के परे है, तीनों का स्रोत है। जैसे जागना-सपना-गहरी नींद तीन अवस्थाएँ हैं और तुरीया चौथी, सबकी आधार-चेतना — वैसे ही देवी तीन रूपों के पीछे की वह एक शक्ति हैं। पूरी सौन्दर्य लहरी जिस देवी की बात कर रही थी, वह कोई एक नाम-रूप वाली देवी नहीं; वह सबके मूल वाली परम शक्ति है।

98 · चरण-जल की प्यास

कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया
कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥ ९८॥

kadā kāle mātaḥ kathaya kalitālaktaka-rasaṁ · pibeyaṁ vidyārthī tava caraṇa-nirṇejana-jalam · prakṛtyā mūkānām api ca kavitā-kāraṇatayā · kadā dhatte vāṇī-mukha-kamala-tāmbūla-rasatām

शब्दार्थ: कलित-अलक्तक-रस · महावर के रस से मिला · विद्यार्थी · ज्ञान का अभिलाषी · चरण-निर्णेजन-जल · चरण धोने का जल · प्रकृत्या मूक · स्वभाव से गूँगे · वाणी-मुख-कमल-ताम्बूल-रस · सरस्वती के मुख-कमल के ताम्बूल का रस।

अर्थ: हे माँ, बता — वह समय कब आएगा जब मैं, ज्ञान का अभिलाषी, तेरे चरण धोने का वह जल पी सकूँगा, जो तेरी महावर के रस से लाल हो? वह जल, जो स्वभाव से गूँगों तक को कवि बना देता है, कब सरस्वती के मुख-कमल के ताम्बूल-रस का रूप ले लेगा?

भावार्थ: अब, सौन्दर्य लहरी के लगभग अंत में, कवि अपनी सबसे निजी, सबसे विनम्र प्रार्थना करता है। वह कोई बड़ी सिद्धि नहीं माँगता। वह बस इतना चाहता है — देवी के चरण धोने का जल पी सके। और वह जल, परम्परा कहती है, गूँगे को भी कवि बना देता है। याद कीजिए श्लोक 75 का वह द्रविड-शिशु, जिसे माँ के दूध ने कवि बनाया। कवि अपने लिए भी वही माँग रहा है — सबसे विनम्र रूप में, चरण-जल का एक घूँट। पूरी किताब लिख कर भी, वह ख़ुद को एक “विद्यार्थी” ही कहता है।

99 · भक्त का फल

सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥ ९९॥

sarasvatyā lakṣmyā vidhi-hari-sapatno viharate · rateḥ pātivratyaṁ śithilayati ramyeṇa vapuṣā · ciraṁ jīvann eva kṣapita-paśu-pāśa-vyatikaraḥ · parānandābhikhyaṁ rasayati rasaṁ tvad-bhajanavān

शब्दार्थ: विधि-हरि-सपत्न · ब्रह्मा और विष्णु का प्रतिद्वंद्वी · रतेः पातिव्रत्यं · रति की पति-निष्ठा · शिथिलयति · ढीली कर देता है · पशु-पाश · बंधन की डोरियाँ · व्यतिकर · उलझाव · परानन्द · परम आनंद।

अर्थ: तेरा भक्त सरस्वती और लक्ष्मी के साथ विहार करता है — मानो ब्रह्मा और विष्णु का प्रतिद्वंद्वी हो। अपने रमणीय रूप से वह रति की पति-निष्ठा तक डिगा देता है (कामदेव-सा सुंदर हो जाता है)। और बंधन की सारी डोरियों के उलझाव से मुक्त, वह इसी जीवन में, लंबे समय तक, “परम आनंद” नाम के रस को चखता रहता है।

भावार्थ: लगभग-अंत में कवि बताता है कि देवी का भक्त क्या पाता है। विद्या (सरस्वती), समृद्धि (लक्ष्मी), सुंदरता (कामदेव-सा रूप) — ये सब तो हैं ही। पर असली बात आख़िरी पंक्ति में है: “चिरं जीवन्नेव” — इसी जीवन में, जीते-जी। वह बंधनों से मुक्त हो जाता है, और “परम आनंद” का रस चखता है — मरने के बाद नहीं, अभी, यहीं। यह जीवन्मुक्ति है, सौन्दर्य लहरी की भाषा में। आनन्द लहरी “आनंद” से शुरू हुई थी; यहाँ वह आनंद भक्त के हाथ में आ जाता है।

100 · समापन

प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥ १००॥

pradīpa-jvālābhir divasa-kara-nīrājana-vidhiḥ · sudhā-sūteś candropala-jala-lavair arghya-racanā · svakīyair ambhobhiḥ salila-nidhi-sauhitya-karaṇaṁ · tvadīyābhir vāgbhis tava janani vācāṁ stutir iyam

शब्दार्थ: प्रदीप-ज्वाला · दीये की लौ · दिवसकर-नीराजन · सूरज की आरती · चन्द्रोपल-जल-लव · चंद्रकांत मणि से झरी जल-बूँदें · अर्घ्य · चढ़ावा · सलिल-निधि-सौहित्य · समुद्र को तृप्त करना · त्वदीयाभिः वाग्भिः · तेरी ही वाणी से।

अर्थ: दीये की लौ से सूरज की आरती उतारना; चंद्रकांत मणि से झरी बूँदों से, उस चाँद को अर्घ्य चढ़ाना जिससे अमृत झरता है; समुद्र के अपने ही पानी से समुद्र को तृप्त करना — हे माँ, वाणी की देवी, तेरी ही वाणी से तेरी यह स्तुति बस ऐसी ही है।

भावार्थ: सौन्दर्य लहरी का समापन-श्लोक, और कितनी विनम्र, कितनी सुंदर बात पर। कवि कहता है — मैंने जो यह पूरी स्तुति लिखी, वह असल में क्या है? दीये से सूरज की आरती (सूरज ख़ुद रोशनी का स्रोत है)। चाँद को उसी की झरी बूँदों से अर्घ्य। समुद्र को उसी के पानी से तृप्त करना। यानी — माँ, तू ही वाणी की देवी है; जिन शब्दों से मैंने तुझे सराहा, वे शब्द भी तेरे ही दिए हुए हैं। मैंने तुझे कुछ दिया नहीं; तेरा ही तुझे लौटाया है। सौ श्लोकों की पूरी यात्रा एक ही भाव पर बंद होती है: जो कुछ हमारे पास है, सब उसी का दिया है — और भक्ति बस उसे आभार के साथ वापस सौंप देना है।

अनुबंध · 3 अतिरिक्त श्लोक

नीचे के तीन श्लोक मूल सौ में नहीं हैं — ये एक अनुबंध (addendum) हैं, जो कई संस्करणों में जुड़े मिलते हैं। इन्हें इसी भाव से पढ़िए: देवी के मुख की एक और झलक, और एक आख़िरी समर्पण।

101

समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधाति त्वद्वक्त्रंप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ॥ १०१॥

samānītaḥ padbhyāṁ maṇi-mukuratām ambara-maṇir · bhayād āsyād antaḥ-stimita-kiraṇa-śreṇi-masṛṇaḥ · dadhāti tvad-vaktraṁ-pratiphalanam aśrānta-vikacaṁ · nirātaṅkaṁ candrān nija-hṛdaya-paṅkeruham iva

शब्दार्थ: अम्बर-मणि · सूरज · मणि-मुकुरता · रत्न-दर्पण होना · स्तिमित-किरण · ठहरी हुई किरणें · अश्रान्त-विकच · बिना थके खिला हुआ · निरातङ्क · बेख़ौफ़।

अर्थ: तेरे चरणों ने सूरज को रत्न-दर्पण बना दिया — और तेरे मुख के डर से उसकी किरणें भीतर ही ठहर कर मुलायम पड़ गईं। वह सूरज-दर्पण तेरे मुख का प्रतिबिंब धारण करता है — सदा खिला हुआ, और चाँद से बेख़ौफ़, मानो वह उसका अपना हृदय-कमल हो।

भावार्थ: एक आख़िरी, चमकती कल्पना। देवी के चरण इतने तेजस्वी कि सूरज ख़ुद एक दर्पण बन गया, और उसकी चुभने वाली किरणें देवी के मुख के आगे नरम पड़ गईं। और उस सूरज-दर्पण में देवी का मुख ऐसे झलकता है जैसे कमल — पर एक ऐसा कमल जो चाँद से नहीं डरता (आम कमल चाँद की रोशनी में बंद हो जाता है)। देवी का मुख-कमल बेख़ौफ़ खिला रहता है — किसी की रोशनी का मोहताज नहीं।

102

समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं
कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयन्ति स्म विमलाः
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥ १०२॥

samudbhūta-sthūla-stana-bharam uraś cāru hasitaṁ · kaṭākṣe kandarpaḥ katicana kadamba-dyuti vapuḥ · harasya tvad-bhrāntiṁ manasi janayanti sma vimalāḥ · bhavatyā ye bhaktāḥ pariṇatir amīṣām iyam ume

शब्दार्थ: समुद्भूत-स्थूल-स्तन-भर · उभरे हुए वक्ष का भार · कटाक्षे कन्दर्पः · कनखी में कामदेव · कदम्ब-द्युति · कदंब फूल जैसी आभा · त्वद्-भ्रान्तिं · “यह तू ही है” का भ्रम · परिणति · परिणाम।

अर्थ: उभरे वक्ष का भार, सुंदर मुस्कान वाला वक्ष, कनखी में कामदेव, कदंब-फूल जैसी आभा वाला शरीर — हे उमे, तेरे जो निर्मल भक्त हैं, वे शिव के मन में भी “यह तो उमा ही है” का भ्रम जगा देते हैं। यह उनकी भक्ति का ही परिणाम है।

भावार्थ: एक गहरी बात, बहुत कोमलता से कही गई। देवी के सच्चे भक्त धीरे-धीरे ख़ुद देवी जैसे हो जाते हैं — इतने कि शिव तक उन्हें देख कर एक पल को सोच बैठें, “यह तो उमा है।” यह श्लोक 30 की बात (“त्वम् अहम्”, तू ही मैं हूँ) का सबसे मीठा रूप है: जिसे हम सच्चे मन से भजते हैं, हम धीरे-धीरे वही बन जाते हैं। भक्ति आख़िर में भक्त और भगवान का फ़र्क ही मिटा देती है।

103 · अंतिम समर्पण

निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे
निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥ १०३॥

nidhe nitya-smere niravadhi-guṇe nīti-nipuṇe · nirāghāta-jñāne niyama-para-cittaika-nilaye · niyatyā nirmukte nikhila-nigamānta-stuti-pade · nirātaṅke nitye nigamaya mamāpi stutim imām

शब्दार्थ: निधि · ख़ज़ाना · नित्य-स्मेरा · सदा मुस्कुराती · निरवधि-गुणा · असीम गुणों वाली · निराघात-ज्ञाना · अबाधित ज्ञान वाली · निगमान्त · वेदांत, उपनिषद् · निगमय · स्वीकार कर।

अर्थ: हे ख़ज़ाने, हे सदा मुस्कुराती, असीम गुणों वाली, नीति में निपुण, अबाधित ज्ञान वाली, संयमी चित्त वालों की एकमात्र निवास, नियति से मुक्त, समस्त उपनिषदों की स्तुति का विषय, बेख़ौफ़, नित्य देवी — मेरी इस स्तुति को भी स्वीकार कर ले।

भावार्थ: सौन्दर्य लहरी का बिल्कुल आख़िरी श्लोक, और देखिए कैसा। हर पंक्ति का हर विशेषण “नि” से शुरू होता है — एक सुंदर ध्वनि-लड़ी, मानो एक ही नाम बार-बार पुकारा जा रहा हो। और सौ श्लोक देवी की महिमा गा कर, कवि आख़िर में बस एक चीज़ माँगता है — वही जो श्लोक 100 में था: “मेरी यह स्तुति स्वीकार कर ले।” कोई वरदान नहीं, कोई सिद्धि नहीं। बस इतना कि माँ इस भेंट को अपना ले। पूरी सौन्दर्य लहरी एक प्रार्थना थी, और वह एक आख़िरी, नम्र प्रार्थना पर आ कर ठहर जाती है। इति।

पढ़ कर आगे क्या

सौन्दर्य लहरी पूरी हुई — दो भाग, सौ श्लोक, और एक अनुबंध। एक बार फिर, धीरे, श्लोक 1 पर लौटिए: “शिव शक्ति के बिना हिल भी नहीं सकते।” अब, सौ श्लोक बाद, वह बात अलग सुनाई देगी।

इसी site पर: देवी माहात्म्य उसी देवी का दूसरा चेहरा है — वहाँ वह राक्षसों का संहार करती हैं। यहाँ वह सुंदरता की लहर थीं; वहाँ वह रणभूमि की गर्जना हैं। दोनों एक ही शक्ति हैं।

और एक सवाल जेब में रखिए: श्लोक 100 कहता है — हमारी सबसे अच्छी स्तुति भी उसी की दी हुई वाणी से बनी है। आज जो भी अच्छा आपके हाथों हुआ, एक पल रुक कर देखिए — उसमें कितना “आपका” था, और कितना उधार का, दिया हुआ।

मूल पाठ: सौन्दर्य लहरी, परम्परा से आदि शंकराचार्य को मान्य। देवनागरी पाठ sanskritdocuments.org के मानक संस्करण से, verbatim। श्लोक 101-103 अनुबंध हैं, जो कई संस्करणों में जुड़े मिलते हैं।

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आख़िरी बार देखा गया: 2026-05-21