सौन्दर्य लहरी
भाग 2 · सौन्दर्य वर्णन · श्लोक 42-100
पहले भाग में देवी एक विचार थीं, शक्ति, श्री चक्र, चक्रों की चढ़ाई। अब वे एक चेहरा ले लेती हैं। कवि मुकुट से शुरू करता है और एक-एक अंग होते हुए चरणों तक उतरता है, और हर श्लोक पर एक पल ठहर जाता है। इसे पढ़ने से ज़्यादा इसमें डूबने के लिए लिखा गया है।
पहले एक बात
आनन्द लहरी एक नक्शा था, देवी कौन हैं, शक्ति क्या है, चक्र, श्री चक्र। अब वह सब पीछे रह गया। यहाँ कवि एक बहुत सीधा, बहुत मानवीय काम करता है: वह माँ को देखता है, और जो देखता है उसे शब्दों में पकड़ने की कोशिश करता है।
यह वर्णन एक ख़ास क्रम में चलता है, केशादि-पादान्त, यानी सिर के बालों से शुरू कर के चरणों तक। मुकुट, बाल, माथा, भौंहें, आँखें, नाक, होंठ, मुस्कान, वाणी, गला, बाँहें, और नीचे, नीचे, चरण-कमल तक। हर श्लोक एक अंग पर ठहरता है।
यह सौन्दर्य लहरी का सबसे काव्यात्मक हिस्सा है। हर श्लोक एक छोटी तस्वीर है, और तस्वीरें ठहर कर ही खुलती हैं।
यात्रा सबसे ऊपर से, सिर के ऊपर से शुरू होती है। पहली ही तस्वीर में पूरा आसमान उतर आता है: देवी के सोने के मुकुट में बारह सूरज माणिक्य बन कर जड़े हैं, ऊपर चाँद का एक टुकड़ा, और सुनहरी आभा पर वह चाँद इंद्रधनुष की तरह बिखर जाता है। फिर बाल, और एक प्यारी कल्पना, देवी के केशों में अपने आप एक सुगंध है, और स्वर्ग के फूल तक उसी लालच में इन्हीं बालों में आ बसते हैं। फूलों को सुगंधित करने वाले बाल, उल्टी बात, और इसीलिए मीठी। फिर माँग की लकीर: मुख की सुंदरता इतनी छलक रही है कि माँग उसी छलकाव का बहता नाला लगती है, और काले बालों के बीच लाल सिंदूर ऐसा, मानो अँधेरे ने सूरज की एक किरण क़ैद कर ली हो।
42-44 · मुकुट · केश · सीमन्त
गतैर्माणिक्यत्वं गगनमणिभिः सान्द्रघटितं
किरीटं ते हैमं हिमगिरिसुते कीर्तयति यः ।
स नीडेयच्छायाच्छुरणशबलं चन्द्रशकलं
धनुः शौनासीरं किमिति न निबध्नाति धिषणाम् ॥ 42॥
धुनोतु ध्वान्तं नस्तुलितदलितेन्दीवरवनं
घनस्निग्धश्लक्ष्णं चिकुरनिकुरुम्बं तव शिवे ।
यदीयं सौरभ्यं सहजमुपलब्धुं सुमनसो
वसन्त्यस्मिन् मन्ये वलमथनवाटीविटपिनाम् ॥ 43॥
तनोतु क्षेमं नस्तव वदनसौन्दर्यलहरी-
परीवाहस्रोतःसरणिरिव सीमन्तसरणिः ।
वहन्ती सिन्दूरं प्रबलकबरीभारतिमिर-
द्विषां वृन्दैर्बन्दीकृतमिव नवीनार्ककिरणम् ॥ 44॥
अब पूरा मुख। घुँघराली, भौंरों के बच्चों जैसी श्यामल लटों से घिरा यह मुख कमल को मात देता है, और एक बारीक बात: कमल पर भौंरे मँडराते हैं, और इस कमल पर शिव की अपनी आँखें भौंरे बन कर मतवाली हो रही हैं। माथा भी चाँद के टुकड़े जैसा घुमावदार, और कवि एक मीठी ज्यामिति करता है, अगर मुकुट का आधा चाँद और माथे का आधा चाँद उल्टा जोड़ दें, तो अमृत की परत से सिला एक पूरा पूर्णिमा-चाँद बन जाए। फिर भौंहें, और उनमें कामदेव का धनुष दिख जाता है, दो झुकी भौंहें उसका घुमाव, भौंरे जैसी काली आँखें उसकी डोरी, और बीच में नाक मानो वह जगह जहाँ धनुष पकड़ा गया है, और वह धनुष संसार का डर मिटाने वाला है।
45-47 · मुख · ललाट · भौंहें
अरालैः स्वाभाव्यादलिकलभसश्रीभिरलकैः
परीतं ते वक्त्रं परिहसति पङ्केरुहरुचिम् ।
दरस्मेरे यस्मिन् दशनरुचिकिञ्जल्करुचिरे
सुगन्धौ माद्यन्ति स्मरदहनचक्षुर्मधुलिहः ॥ 45॥
ललाटं लावण्यद्युतिविमलमाभाति तव य-
द्द्वितीयं तन्मन्ये मकुटघटितं चन्द्रशकलम् ।
विपर्यासन्यासादुभयमपि संभूय च मिथः
सुधालेपस्यूतिः परिणमति राकाहिमकरः ॥ 46॥
भ्रुवौ भुग्ने किंचिद्भुवनभयभङ्गव्यसनिनि
त्वदीये नेत्राभ्यां मधुकररुचिभ्यां धृतगुणम् ।
धनुर्मन्ये सव्येतरकरगृहीतं रतिपतेः
प्रकोष्ठे मुष्टौ च स्थगयति निगूढान्तरमुमे ॥ 47॥
अब आँखें, और कवि उन्हें समय का स्रोत बना देता है। एक आँख सूर्य-रूप, दिन को जन्म देती है; दूसरी चंद्र-रूप, रात रचती है; और तीसरी, अधखिले सुनहरे कमल जैसी, बीच की संध्या को। देखना और रचना यहाँ एक ही हैं। और श्लोक 49 एक चतुर शब्द-खेल है: विशाला, कल्याणी, अयोध्या, अवंती, हर शब्द देवी की दृष्टि का एक गुण भी है और एक प्रसिद्ध नगर का नाम भी, तो कवि कहता है, वे नगर जिस गुण से नाम पाते हैं वह गुण तो असल में देवी की दृष्टि का है। फिर वही तिरछी नज़रें, इतनी लंबी कि कानों तक पहुँचती हैं, भौंरे के दो बच्चे बन कर कवियों की रचनाओं का मधु पीते, और यह देख कर तीसरी आँख ज़रा सी ईर्ष्या से लाल पड़ जाती है।
48-50 · तीन आँखें · आँखों का खिंचाव
अहः सूते सव्यं तव नयनमर्कात्मकतया
त्रियामां वामं ते सृजति रजनीनायकतया ।
तृतीया ते दृष्टिर्दरदलितहेमाम्बुजरुचिः
समाधत्ते संध्यां दिवसनिशयोरन्तरचरीम् ॥ 48॥
विशाला कल्याणी स्फुटरुचिरयोध्या कुवलयैः
कृपाधाराधारा किमपि मधुराभोगवतिका ।
अवन्ती दृष्टिस्ते बहुनगरविस्तारविजया
ध्रुवं तत्तन्नामव्यवहरणयोग्या विजयते ॥ 49॥
कवीनां संदर्भस्तबकमकरन्दैकरसिकं
कटाक्षव्याक्षेपभ्रमरकलभौ कर्णयुगलम् ।
अमुञ्चन्तौ दृष्ट्वा तव नवरसास्वादतरला-
वसूयासंसर्गादलिकनयनं किंचिदरुणम् ॥ 50॥
यहाँ सौन्दर्य लहरी का सबसे प्यारा श्लोक आता है। एक ही आँख, और कितने अलग भाव, किस पर पड़ती है इस पर निर्भर: शिव पर प्रेम से भीगी, सौत गंगा पर ज़रा रोष भरी, शिव के साँपों से डरी, सखियों पर मुस्काती, और सबसे अंत में, सबसे कोमल, “मुझ पर करुणा।” पूरी सूची कवि इसी एक शब्द तक पहुँचने के लिए बनाता है, माँ की नज़र, भक्त पर, बस दया। और फिर श्लोक 47 का धनुष यहाँ पूरा तना हुआ लौटता है: आँखें इतनी लंबी कि कान तक खिंची हुई कामदेव के तीर जैसी लगें, और यह तीर उन शिव के शांत मन पर है जो वैराग्य की मूरत हैं। तीन रंग की आँखें फिर तीन गुण बन जाती हैं, रज-सत्व-तम, जिनसे ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र दुबारा रचे जाएँगे, और काजल को कवि “लीला-अंजन” कहता है, क्योंकि देवी के लिए सृष्टि रचना भी आँख में काजल लगाने जितना सहज खेल है।
51-53 · हर के लिए अलग नज़र · आँख का धनुष · तीन गुण
शिवे शृङ्गारार्द्रा तदितरजने कुत्सनपरा
सरोषा गङ्गायां गिरिशचरिते विस्मयवती ।
हराहिभ्यो भीता सरसिरुहसौभाग्यजननी
सखीषु स्मेरा ते मयि जननी दृष्टिः सकरुणा ॥ 51॥
गते कर्णाभ्यर्णं गरुत इव पक्ष्माणि दधती
पुरां भेत्तुश्चित्तप्रशमरसविद्रावणफले ।
इमे नेत्रे गोत्राधरपतिकुलोत्तंसकलिके
तवाकर्णाकृष्टस्मरशरविलासं कलयतः ॥ 52॥
विभक्तत्रैवर्ण्यं व्यतिकरितलीलाञ्जनतया
विभाति त्वन्नेत्रत्रितयमिदमीशानदयिते ।
पुनः स्रष्टुं देवान् द्रुहिणहरिरुद्रानुपरतान्
रजः सत्त्वं बिभ्रत्तम इति गुणानां त्रयमिव ॥ 53॥
आँखों के तीन रंग, लाल-सफ़ेद-काला, कवि को तीन पवित्र नदियों का संगम दिखा देते हैं, लाल शोण, सफ़ेद गंगा, श्याम यमुना, देवी के मुख पर ही एक त्रिवेणी, तीर्थ पर जाने की ज़रूरत नहीं। और फिर एक हैरान कर देने वाली कल्पना: अगर आँख खुलने से सृष्टि बनती है और बंद होने से मिटती है, तो माँ पलक झपकाती ही नहीं, संसार को बचाए रखने के लिए, एक टकटकी लगाए देखती माँ जो पल भर नज़र नहीं हटाती। आँखें मछली जैसी हैं, यह पुरानी उपमा कवि उलट देता है: मछलियाँ डर कर पानी में छिप जाती हैं, क्योंकि देवी की आँखें कानों तक जा कर उनकी चुग़ली कर देती हैं।
54-56 · तीन तीर्थ · पलक · मछलियाँ
पवित्रीकर्तुं नः पशुपतिपराधीनहृदये
दयामित्रैर्नेत्रैररुणधवलश्यामरुचिभिः ।
नदः शोणो गङ्गा तपनतनयेति ध्रुवममुं
त्रयाणां तीर्थानामुपनयसि संभेदमनघम् ॥ 54॥

निमेषोन्मेषाभ्यां प्रलयमुदयं याति जगती
तवेत्याहुः सन्तो धरणिधरराजन्यतनये ।
त्वदुन्मेषाज्जातं जगदिदमशेषं प्रलयतः
परित्रातुं शङ्के परिहृतनिमेषास्तव दृशः ॥ 55॥
तवापर्णे कर्णेजपनयनपैशुन्यचकिता
निलीयन्ते तोये नियतमनिमेषाः शफरिकाः ।
इयं च श्रीर्बद्धच्छदपुटकवाटं कुवलयम्
जहाति प्रत्यूषे निशि च विघटय्य प्रविशति ॥ 56॥
पूरी आँख-वाली लड़ी का सबसे कोमल श्लोक अब आता है। कवि बस इतना माँगता है, एक नज़र, दूर खड़े उस पर भी पड़ जाए, और एक प्यारा तर्क देता है: इससे आपका कुछ कम नहीं होगा, चाँद की चाँदनी जंगल और महल में फ़र्क नहीं करती, कृपा बाँटने से घटती नहीं। फिर आँख और कान के बीच का वह घुमाव, जिसमें श्लोक 47 का कामदेव-धनुष एक नए कोने से फिर दिखता है। और फिर कुंडल: देवी जब सरस्वती के वचनों को कानों की अंजुली से पीती हैं और मगन हो कर “वाह” में सिर हिलाती हैं, तब उनके कुंडल अपनी झनकार से मानो उन वचनों का जवाब दे रहे हों, सुनने का इतना सजीव, इतना रसीला चित्र।
57-60 · एक नज़र · आँख-कान का घुमाव · मुख का रथ · कुंडल
दृशा द्राघीयस्या दरदलितनीलोत्पलरुचा
दवीयांसं दीनं स्नपय कृपया मामपि शिवे ।
अनेनायं धन्यो भवति न च ते हानिरियता
वने वा हर्म्ये वा समकरनिपातो हिमकरः ॥ 57॥
अरालं ते पालीयुगलमगराजन्यतनये
न केषामाधत्ते कुसुमशरकोदण्डकुतुकम् ।
तिरश्चीनो यत्र श्रवणपथमुल्लङ्घ्य विलस-
न्नपाङ्गव्यासङ्गो दिशति शरसंधानधिषणाम् ॥ 58॥
स्फुरद्गण्डाभोगप्रतिफलितताटङ्कयुगलं
चतुश्चक्रं मन्ये तव मुखमिदं मन्मथरथम् ।
यमारुह्य द्रुह्यत्यवनिरथमर्केन्दुचरणं
महावीरो मारः प्रमथपतये सज्जितवते ॥ 59॥
सरस्वत्याः सूक्तीरमृतलहरीकौशलहरीः
पिबन्त्याः शर्वाणि श्रवणचुलुकाभ्यामविरलम् ।
चमत्कारश्लाघाचलितशिरसः कुण्डलगणो
झणत्कारैस्तारैः प्रतिवचनमाचष्ट इव ते ॥ 60॥
अब नाक, और एक मीठी कल्पना: यह नासिका हिमालय-कुल की ध्वजा के डंडे जैसी सीधी है, और इसके भीतर इतने मोती हैं कि एक मोती देवी की ठंडी साँस के साथ बह कर बाहर आ जाता है और वही नथ का मोती बन कर सजता है, साँस से जन्मा गहना। फिर लाल अधर: उसकी उपमा किससे दें? बिंब फल तो ख़ुद देवी के होंठ का प्रतिबिंब पा कर लाल हुआ है, तो वह असली लाली की बराबरी कैसे करे, कवि उपमा देने में अपनी हार स्वीकार करता है, और वही उसकी सबसे सुंदर उपमा बन जाती है। और मुस्कान: चकोर देवी की मुस्कान-चाँदनी पीते-पीते इतने तृप्त हुए कि उनकी चोंच जड़ हो गई, और अब वे असली चाँद की चाँदनी को काँजी समझ कर पीते हैं, देवी की मुस्कान असली चाँद से भी मीठी।
61-63 · नासिका · अधर · मुस्कान
असौ नासावंशस्तुहिनगिरिवंशध्वजपटि
त्वदीयो नेदीयः फलतु फलमस्माकमुचितम् ।
वहन्नन्तर्मुक्ताः शिशिरतरनिश्वासगलितं
समृद्ध्या यत्तासां बहिरपि च मुक्तामणिधरः ॥ 61॥
प्रकृत्या रक्तायास्तव सुदति दन्तच्छदरुचेः
प्रवक्ष्ये सादृश्यं जनयतु फलं विद्रुमलता ।
न बिम्बं तद्बिम्बप्रतिफलनरागादरुणितं
तुलामध्यारोढुं कथमिव विलज्जेत कलया ॥ 62॥
स्मितज्योत्स्नाजालं तव वदनचन्द्रस्य पिबतां
चकोराणामासीदतिरसतया चञ्चुजडिमा ।
अतस्ते शीतांशोरमृतलहरीमम्लरुचयः
पिबन्ति स्वच्छन्दं निशि निशि भृशं काञ्जिकधिया ॥ 63॥
अब वाणी, और कवि एक नाज़ुक दृश्य रचता है। देवी की जीभ गुड़हल के फूल जैसी लाल है और बिना थके शिव के गुण जपती रहती है, और उसकी नोक पर बैठी सरस्वती, जो स्फटिक जैसी सफ़ेद हैं, उस लाली में रंग कर ख़ुद माणिक्य जैसी लाल हो जाती हैं, वाणी की देवी तक देवी के रंग में रंग जाती हैं। और तंबूल: युद्ध से लौटे कार्तिकेय, इंद्र और विष्णु, जो परम्परा में शिव का निर्माल्य लेने से बचते हैं, देवी के मुख से उतरी तंबूल की गुठली पाने को तरसते हैं, देवी का जूठा भी इतना पवित्र कि बड़े देवता उसे प्रसाद की तरह चाहें। फिर वही “वाह”: सरस्वती वीणा पर शिव की कीर्ति गा रही थीं, देवी ने सिर हिला कर बस “वाह” कहा, और उस वचन की मिठास ने वीणा को इतना फीका कर दिया कि सरस्वती ने चुपके से अपनी वीणा ग़िलाफ़ में ढक दी।
64-66 · जिह्वा · ताम्बूल · वाणी और वीणा
अविश्रान्तं पत्युर्गुणगणकथाम्रेडनजपा
जपापुष्पच्छाया तव जननि जिह्वा जयति सा ।
यदग्रासीनायाः स्फटिकदृषदच्छच्छविमयी
सरस्वत्या मूर्तिः परिणमति माणिक्यवपुषा ॥ 64॥
रणे जित्वा दैत्यानपहृतशिरस्त्रैः कवचिभिर्-
निवृत्तैश्चण्डांशत्रिपुरहरनिर्माल्यविमुखैः ।
विशाखेन्द्रोपेन्द्रैः शशिविशदकर्पूरशकला
विलीयन्ते मातस्तव वदनताम्बूलकबलाः ॥ 65॥
विपञ्च्या गायन्ती विविधमपदानं पशुपतेः
त्वयारब्धे वक्तुं चलितशिरसा साधुवचने ।
तदीयैर्माधुर्यैरपलपिततन्त्रीकलरवां
निजां वीणां वाणी निचुलयति चोलेन निभृतम् ॥ 66॥
अब ठोड़ी, और कवि उसके लिए कोई उपमा ढूँढ ही नहीं पाता, पर हार में भी तीन कोमल छवियाँ दे जाता है: पिता हिमालय उसे दुलार से छूते हैं, पति शिव चूमने को बार-बार ऊपर उठाते हैं, और वह शिव के लिए उस दर्पण का हत्था है जिसमें वे देवी का मुख देखते हैं, तीन रिश्तों के तीन स्पर्श एक ठोड़ी पर। फिर गला, मुख-कमल की डंडी, जिस पर शिव के आलिंगन से रोमांच के काँटे उगे हैं, और काले चंदन-लेप से सनी सफ़ेद माला कीचड़ में खिली कमल-डंडी जैसी लगती है, सजावट का दाग़ भी यहाँ शोभा बन जाता है। और गले की तीन प्राकृतिक रेखाएँ दो चीज़ों की गवाह बन जाती हैं, सुहाग के मंगल-सूत्र के धागों की, और संगीत के तीन ग्रामों की सीमा-रेखाओं की, मानो गला ख़ुद एक साज़ हो।
67-69 · चिबुक · ग्रीवा · तीन रेखाएँ
कराग्रेण स्पृष्टं तुहिनगिरिणा वत्सलतया
गिरीशेनोदस्तं मुहुरधरपानाकुलतया ।
करग्राह्यं शम्भोर्मुखमुकुरवृन्तं गिरिसुते
कथङ्कारं ब्रूमस्तव चिबुकमौपम्यरहितम् ॥ 67॥
भुजाश्लेषान्नित्यं पुरदमयितुः कण्टकवती
तव ग्रीवा धत्ते मुखकमलनालश्रियमियम् ।
स्वतः श्वेता कालागुरुबहुलजम्बालमलिना
मृणालीलालित्यम् वहति यदधो हारलतिका ॥ 68॥
गले रेखास्तिस्रो गतिगमकगीतैकनिपुणे
विवाहव्यानद्धप्रगुणगुणसंख्याप्रतिभुवः ।
विराजन्ते नानाविधमधुररागाकरभुवां
त्रयाणां ग्रामाणां स्थितिनियमसीमान इव ते ॥ 69॥
अब बाँहें। देवी की चार कोमल बाँहों की स्तुति ब्रह्मा अपने चारों मुखों से करते हैं, और कवि एक शरारती वजह जोड़ देता है: ब्रह्मा का एक सिर शिव पहले काट चुके हैं, तो वे डरे हुए चारों बाक़ी सिरों के लिए एक साथ “अभय” का हाथ माँग रहे हैं। हाथ कमल से सुंदर हैं, और वही उपमा-संकट लौटता है: कमल बराबरी कर भी ले, तो सिर्फ़ तब जब उस पर लक्ष्मी के पैरों की लाल महावर चढ़ी हो, देवी की सुंदरता मूल है, बाक़ी सब उससे रंग माँगते हैं। फिर एक प्यारा बाल-दृश्य: कार्तिकेय और गणेश दोनों ने जिसे पिया वह स्तन-युगल माँ-रूप का है, और गणेश माँ का दूध पीते-पीते अपने हाथी-सिर के दो उभार याद कर के झट से उन्हें टटोल लेते हैं, “मेरे वाले ठीक तो हैं?”, सबकी हँसी।
70-72 · चार बाँहें · हाथ · स्तन-युगल
मृणालीमृद्वीनां तव भुजलतानां चतसृणां
चतुर्भिः सौन्दर्यं सरसिजभवः स्तौति वदनैः ।
नखेभ्यः सन्त्रस्यन् प्रथममथनादन्धकरिपो-
श्चतुर्णां शीर्षाणां सममभयहस्तार्पणधिया ॥ 70॥
नखानामुद्द्योतैर्नवनलिनरागं विहसतां
कराणां ते कान्तिं कथय कथयामः कथमुमे ।
कयाचिद्वा साम्यं भजतु कलया हन्त कमलं
यदि क्रीडल्लक्ष्मीचरणतललाक्षारुणदलम् ॥ 71॥
समं देवि स्कन्दद्विपवदनपीतं स्तनयुगं
तवेदं नः खेदं हरतु सततं प्रस्नुतमुखम् ।
यदालोक्याशङ्काकुलितहृदयो हासजनकः
स्वकुम्भौ हेरम्बः परिमृशति हस्तेन झडिति ॥ 72॥
कवि एक मज़ेदार तर्क गढ़ता है: गणेश और कार्तिकेय आजीवन कुमार क्यों रहे? क्योंकि उन्होंने माँ का अमृत-रस दूध पिया, और जिसने वह परम रस चख लिया उसे फिर किसी और रस की चाह ही नहीं रही, माँ के दूध में वह तृप्ति जो किसी और तृष्णा को उठने ही न दे। फिर हार: गजासुर के मस्तक के सफ़ेद मोतियों की माला देवी के लाल होंठों की झलक पा कर भीतर से गुलाबी पड़ जाती है, मानो शिव की वह कीर्ति हो जो उनके पराक्रम से लाल-मिश्रित है। और स्तन-दूध: यह असल में हृदय से बहता ज्ञान का दूध-समुद्र है, तभी तो दया से देवी ने जो दूध एक द्रविड-शिशु को पिलाया, उसे चख कर वह बालक मँजे हुए कवियों में भी सबसे मनोहर कवि बन गया, माँ का पहला आहार ही ज्ञान का पहला घूँट।

73-75 · वक्षोज · हार · स्तन्य
अमू ते वक्षोजावमृतरसमाणिक्यकुतुपौ
न संदेहस्पन्दो नगपतिपताके मनसि नः ।
पिबन्तौ तौ यस्मादविदितवधूसङ्गरसिकौ
कुमारावद्यापि द्विरदवदनक्रौञ्चदलनौ ॥ 73॥
वहत्यम्ब स्तम्बेरमदनुजकुम्भप्रकृतिभिः
समारब्धां मुक्तामणिभिरमलां हारलतिकाम् ।
कुचाभोगो बिम्बाधररुचिभिरन्तः शबलितां
प्रतापव्यामिश्रां पुरदमयितुः कीर्तिमिव ते ॥ 74॥
तव स्तन्यं मन्ये धरणिधरकन्ये हृदयतः
पयःपारावारः परिवहति सारस्वतमिव ।
दयावत्या दत्तं द्रविडशिशुरास्वाद्य तव यत्
कवीनां प्रौढानामजनि कमनीयः कवयिता ॥ 75॥
अब कमर के आस-पास की रेखाएँ, और कवि उन्हें एक पूरी कथा बना देता है। शिव ने तीसरी आँख से कामदेव को जला दिया था; जला हुआ कामदेव देवी की गहरी नाभि-सरोवर में जा गिरा, और वहाँ से धुएँ की एक पतली लता उठी, और लोग उसी को रोमावली समझते हैं, एक शारीरिक रेखा में जले हुए प्रेम की पूरी कथा। वही पतली रेखा अगली कल्पना में यमुना की पतली लहर बन जाती है, मानो दोनों कलश-जैसे वक्षों की रगड़ से बीच का आकाश दब कर पतला हो गया और गुफ़ा-जैसी नाभि में समा रहा है। और नाभि अकेली पाँच चीज़ें बन जाती है, गंगा का भँवर, क्यारी, कामदेव के तेज का हवन-कुंड, रति का क्रीड़ा-भवन, और सबसे गहरी, वह गुफ़ा-द्वार जहाँ से ध्यानी की दृष्टि भीतर उतरती है।
76-78 · रोमावली · उदर · नाभि
हरक्रोधज्वालावलिभिरवलीढेन वपुषा
गभीरे ते नाभीसरसि कृतसङ्गो मनसिजः ।
समुत्तस्थौ तस्मादचलतनये धूमलतिका
जनस्तां जानीते तव जननि रोमावलिरिति ॥ 76॥
यदेतत् कालिन्दीतनुतरतरङ्गाकृति शिवे
कृशे मध्ये किंचिज्जननि तव यद्भाति सुधियाम् ।
विमर्दादन्योऽन्यं कुचकलशयोरन्तरगतं
तनूभूतं व्योम प्रविशदिव नाभिं कुहरिणीम् ॥ 77॥
स्थिरो गङ्गावर्तः स्तनमुकुलरोमावलिलता-
कलावालं कुण्डं कुसुमशरतेजोहुतभुजः ।
रतेर्लीलागारं किमपि तव नाभिर्गिरिसुते
बिलद्वारं सिद्धेर्गिरिशनयनानां विजयते ॥ 78॥
कमर देख कर कवि सच में चिंतित हो जाता है, और एक श्लोक एक प्रार्थना बन जाता है: स्वभाव से पतली, वक्षों के भार से झुकी, टूटते नदी-किनारे के पेड़ की तरह बस किसी तरह टिकी इस कमर का “कुशल हो”। पर अगला ही श्लोक उसी शरीर से मरहम ले आता है: पेट की तीन रेखाएँ (त्रिवली) असल में तीन डोरियाँ हैं, जिनसे कामदेव ने कमर को बाँध दिया है ताकि वह टूट न जाए, चिंता का जवाब उसी देह में मिल जाता है। और फिर नितम्ब, और एक मीठा शब्द-खेल: “नितम्ब” पर्वत की ढलान भी है, तो हिमालय ने अपनी ढलानों का भारीपन और चौड़ाई काट कर बेटी को दहेज में दे दी, एक पिता का बेटी को अपनी ही पहचान, अपना अपना भारीपन सौंप देना।
79-81 · मध्य · त्रिवली · नितम्ब
निसर्गक्षीणस्य स्तनतटभरेण क्लमजुषो
नमन्मूर्तेर्नारीतिलक शनकैस्त्रुट्यत इव ।
चिरं ते मध्यस्य त्रुटिततटिनीतीरतरुणा
समावस्थास्थेम्नो भवतु कुशलं शैलतनये ॥ 79॥
कुचौ सद्यःस्विद्यत्तटघटितकूर्पासभिदुरौ
कषन्तौ दोर्मूले कनककलशाभौ कलयता ।
तव त्रातुं भङ्गादलमिति वलग्नं तनुभुवा
त्रिधा नद्धं देवि त्रिवलि लवलीवल्लिभिरिव ॥ 80॥
गुरुत्वं विस्तारं क्षितिधरपतिः पार्वति निजा-
न्नितम्बादाच्छिद्य त्वयि हरणरूपेण निदधे ।
अतस्ते विस्तीर्णो गुरुरयमशेषां वसुमतीं
नितम्बप्राग्भारः स्थगयति लघुत्वं नयति च ॥ 81॥
अब घुटनों तक उतर कर कवि उनकी गोलाई सराहता है, पर एक कोमल बात साथ में: घुटने “प्रणाम करते-करते कठोर” हुए हैं, यानी देवी इतनी बार शिव को प्रणाम करती हैं कि घुटने सख़्त पड़ गए, तारीफ़ के बीच भी भक्ति-भाव छिपा हुआ। फिर पिंडलियाँ: कामदेव के पास सिर्फ़ पाँच बाण हैं पर शिव को जीतना बड़ा काम है, तो उसने देवी की दोनों पिंडलियों को बीस बाणों के दो तरकश बना लिया, और उन बाणों के नुकीले सिरे देवी के पैरों के दस नाखून हैं, जो देवताओं के झुकते मुकुटों की सान पर तेज़ हुए हैं। और फिर चरण, और यहाँ कवि का स्वर बदल जाता है, वर्णन अचानक प्रार्थना बन जाता है: वही चरण जिन्हें उपनिषद् सिर पर धारण करते हैं, जिनका धोवन शिव की जटाओं की गंगा है, वे मेरे सिर पर भी रख दे।
82-84 · जानु · जंघा · चरण की प्रार्थना
करीन्द्राणां शुण्डान् कनककदलीकाण्डपटली-
मुभाभ्यामूरुभ्यामुभयमपि निर्जित्य भवती ।
सुवृत्ताभ्यां पत्युः प्रणतिकठिनाभ्यां गिरिसुते
विजिग्ये जानुभ्यां विबुधकरिकुम्भद्वयमसि ॥ 82॥
पराजेतुं रुद्रं द्विगुणशरगर्भौ गिरिसुते
निषङ्गौ जङ्घे ते विषमविशिखो बाढमकृत ।
यदग्रे दृश्यन्ते दशशरफलाः पादयुगली-
नखाग्रच्छद्मानः सुरमकुटशाणैकनिशिताः ॥ 83॥
श्रुतीनां मूर्धानो दधति तव यौ शेखरतया
ममाप्येतौ मातः शिरसि दयया धेहि चरणौ ।
ययोः पाद्यं पाथः पशुपतिजटाजूटतटिनी
ययोर्लाक्षालक्ष्मीररुणहरिचूडामणिरुचिः ॥ 84॥
अब कवि चरणों को नमन करता है, और हर श्लोक में एक नई कोमलता: शिव तक इन चरणों से ईर्ष्या करते हैं, क्योंकि अशोक का पेड़ स्त्री के पैर की ठोकर से फूलता है और देवी के चरण उस अशोक को छूना चाहते हैं, शिव चाहते हैं वह स्पर्श उन्हें मिले, प्रेमी की वह नन्ही ईर्ष्या कवि देवता पर भी लगा देता है। फिर एक घरेलू रूठने-मनाने का दृश्य: देवी प्रेम के नख़रे में किसी और का नाम ले बैठती हैं, शिव झेंप कर सिर झुका लेते हैं, और देवी हँसी-हँसी में पैर से उनके माथे पर ठोकर लगा देती हैं, और जले हुए कामदेव की किलकारी देवी की पायल की झंकार बन कर सुनाई देती है। और फिर कमल से तुलना, जिसे कवि एक-एक बिंदु पर हरा देता है: कमल ठंड से मरता है, चरण हिमालय में पले; कमल रात में बंद, चरण रात-भर खिले; कमल में लक्ष्मी रहती हैं, पर चरण तो ख़ुद बाँटते हैं।
85-87 · चरण · शिव के माथे पर · चरण-कमल
नमोवाकं ब्रूमो नयनरमणीयाय पदयो-
स्तवास्मै द्वन्द्वाय स्फुटरुचिरसालक्तकवते ।
असूयत्यत्यन्तं यदभिहननाय स्पृहयते
पशूनामीशानः प्रमदवनकङ्केलितरवे ॥ 85॥
मृषा कृत्वा गोत्रस्खलनमथ वैलक्ष्यनमितं
ललाटे भर्तारं चरणकमले ताडयति ते ।
चिरादन्तःशल्यं दहनकृतमुन्मूलितवता
तुलाकोटिक्वाणैः किलिकिलितमीशानरिपुणा ॥ 86॥
हिमानीहन्तव्यं हिमगिरिनिवासैकचतुरौ
निशायां निद्राणं निशि चरमभागे च विशदौ ।
वरं लक्ष्मीपात्रं श्रियमतिसृजन्तौ समयिनां
सरोजं त्वत्पादौ जननि जयतश्चित्रमिह किम् ॥ 87॥
अब दो प्यारी शिकायतें, बहुत प्यार से। एक, कवि-परम्परा देवी के पैर के कोमल पंजे को कछुए के कठोर खोल जैसा कहती आई है, और दूसरी, विवाह में सप्तपदी के समय शिव ने इतना कोमल चरण कठोर सिल पर कैसे रख दिया, वह भी दया-भरे मन से, कोमल और कठोर का यह सामना कवि को बेचैन करता है। फिर कल्पवृक्ष से आगे: कल्पवृक्ष फल बस स्वर्गवासियों को देता है, पर देवी के चरण दरिद्रों तक को, और “अह्नाय”, तुरंत, इंतज़ार कराए बिना। और अंत में चरण-यात्रा का सबसे कोमल मोड़: कवि की आत्मा, जिसके पैर अब तक पाँच इन्द्रियों में भटक रहे थे, बस इतना चाहती है, देवी के चरण-फूल में डूब कर भौंरा बन जाए, मधु में रमा, बस वहीं का हो कर। केशादि से शुरू हुई यात्रा यहाँ एक नया घर पा लेती है।
88-90 · चरण की कोमलता · चरण-नख · चरण-कमल
पदं ते कीर्तीनां प्रपदमपदं देवि विपदां
कथं नीतं सद्भिः कठिनकमठीकर्परतुलाम् ।
कथं वा बाहुभ्यामुपयमनकाले पुरभिदा
यदादाय न्यस्तं दृषदि दयमानेन मनसा ॥ 88॥
नखैर्नाकस्त्रीणां करकमलसंकोचशशिभि-
स्तरूणां दिव्यानां हसत इव ते चण्डि चरणौ ।
फलानि स्वःस्थेभ्यः किसलयकराग्रेण ददतां
दरिद्रेभ्यो भद्रां श्रियमनिशमह्नाय ददतौ ॥ 89॥
ददाने दीनेभ्यः श्रियमनिशमाशानुसदृशी-
ममन्दं सौन्दर्यप्रकरमकरन्दम् विकिरति ।
तवास्मिन् मन्दारस्तबकसुभगे यातु चरणे
निमज्जन्मज्जीवः करणचरणः षट्चरणताम् ॥ 90॥
चरण-यात्रा का यह पड़ाव कुछ हल्की, कुछ गहरी झलकों में बीतता है। महल के राजहंस देवी की चाल सीखना चाहते हैं और लड़खड़ाते उनके पीछे चलते हैं, और देवी की पायल की झंकार मानो उन्हें वह चाल बिना शब्दों के सिखा रही हो, सबसे सुंदर चाल वाला पक्षी भी माँ से सीख रहा है। फिर श्री विद्या की प्रसिद्ध छवि: देवी का पलंग, जिसके चार पाये ब्रह्मा-विष्णु-रुद्र-ईश्वर हैं और चादर सदाशिव, यानी पाँचों बड़े देवता मिल कर देवी की एक शय्या भर हैं, और सफ़ेद सदाशिव देवी की लाल आभा पा कर ख़ुद गुलाबी पड़ जाते हैं, चेतना पर शक्ति का रंग। और फिर सार-श्लोक: कवि एक-एक अंग को छोड़ कर सबको एक साथ समेट लेता है, बाल, मुस्कान, मन, वक्ष, कमर, और कहता है यह सारा रूप असल में शिव की करुणा है जिसने संसार को बचाने के लिए देह धर ली, माँ इसलिए सुंदर है क्योंकि वह करुणा है।

91-93 · चरण और हंस · सदाशिव की शय्या · देवी की करुणा
पदन्यासक्रीडापरिचयमिवारब्धुमनसः
स्खलन्तस्ते खेलं भवनकलहंसा न जहति ।
अतस्तेषां शिक्षां सुभगमणिमञ्जीररणित-
च्छलादाचक्षाणं चरणकमलं चारुचरिते ॥ 91॥
गतास्ते मञ्चत्वं द्रुहिणहरिरुद्रेश्वरभृतः
शिवः स्वच्छच्छायाघटितकपटप्रच्छदपटः ।
त्वदीयानां भासां प्रतिफलनरागारुणतया
शरीरी शृङ्गारो रस इव दृशां दोग्धि कुतुकम् ॥ 92॥
अराला केशेषु प्रकृतिसरला मन्दहसिते
शिरीषाभा चित्ते दृषदुपलशोभा कुचतटे ।
भृशं तन्वी मध्ये पृथुरुरसिजारोहविषये
जगत्त्रातुं शम्भोर्जयति करुणा काचिदरुणा ॥ 93॥
अब वर्णन शरीर से उठ कर ब्रह्मांड और परम तत्व की ओर जाता है। चाँद का घटना-बढ़ना कवि के लिए कोई खगोलीय घटना नहीं रहती: चाँद असल में देवी का श्रृंगार-डिब्बा है, कस्तूरी और कर्पूर से भरा, देवी रोज़ उसमें से श्रृंगार लेती हैं तो वह घटता है, और ब्रह्मा उसे फिर भर देते हैं, पूरा आसमान देवी की सेवा में लगा है। फिर सिद्धियाँ: देवी शिव का सबसे भीतरी अंतःपुर हैं, वहाँ चंचल मन वालों का सीधा प्रवेश नहीं, फिर भी इंद्र जैसे देवता बस देवी के द्वार के पास खड़े रह कर अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ बन गए, देहरी पर खड़ा होना ही फल दे देता है। और एकनिष्ठता: सरस्वती की कृपा बहुत कवि पा लेते हैं, लक्ष्मी का “पति” थोड़े धन से कोई भी बन जाता है, पर देवी सतियों में अग्रणी हैं, महादेव को छोड़ कर उनका स्पर्श कुरवक वृक्ष तक के लिए दुर्लभ है।
94-96 · चंद्रमा · चरणों पर सिद्धियाँ · एकमात्र सती
कलङ्कः कस्तूरी रजनिकरबिम्बं जलमयं
कलाभिः कर्पूरैर्मरकतकरण्डं निबिडितम् ।
अतस्त्वद्भोगेन प्रतिदिनमिदं रिक्तकुहरं
विधिर्भूयो भूयो निबिडयति नूनं तव कृते ॥ 94॥
पुरारातेरन्तःपुरमसि ततस्त्वच्चरणयोः
सपर्यामर्यादा तरलकरणानामसुलभा ।
तथा ह्येते नीताः शतमखमुखाः सिद्धिमतुलां
तव द्वारोपान्तस्थितिभिरणिमाद्याभिरमराः ॥ 95॥
कलत्रं वैधात्रं कतिकति भजन्ते न कवयः
श्रियो देव्याः को वा न भवति पतिः कैरपि धनैः ।
महादेवं हित्वा तव सति सतीनामचरमे
कुचाभ्यामासङ्गः कुरवकतरोरप्यसुलभः ॥ 96॥
अब कविता अपने सबसे बड़े बयान पर पहुँचती है। तीन देवियाँ हैं, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती, तीन देवताओं की संगिनियाँ, पर सौन्दर्य लहरी की देवी इन तीनों में से कोई एक नहीं, वे तुरीया हैं, चौथी, जो तीनों के परे है, तीनों का स्रोत है, जैसे जागना-सपना-गहरी नींद तीन अवस्थाएँ हैं और तुरीया चौथी आधार-चेतना। फिर कवि अपनी सबसे निजी प्रार्थना करता है, कोई बड़ी सिद्धि नहीं, बस इतना कि देवी के चरण धोने का वह जल पी सके जो गूँगे को भी कवि बना देता है, याद कीजिए वह द्रविड-शिशु, और पूरी किताब लिख कर भी कवि ख़ुद को बस एक “विद्यार्थी” कहता है। और देवी का भक्त क्या पाता है? विद्या, समृद्धि, सुंदरता, ये तो हैं ही, पर असली बात अंत में है, “चिरं जीवन्नेव”, इसी जीवन में, जीते-जी वह बंधनों से मुक्त हो कर परम आनंद का रस चखता है, यही जीवन्मुक्ति है।
97-99 · तुरीया · चरण-जल · भक्त का फल
गिरामाहुर्देवीं द्रुहिणगृहिणीमागमविदो
हरेः पत्नीं पद्मां हरसहचरीमद्रितनयाम् ।
तुरीया कापि त्वं दुरधिगमनिःसीममहिमा
महामाया विश्वं भ्रमयसि परब्रह्ममहिषि ॥ 97॥
कदा काले मातः कथय कलितालक्तकरसं
पिबेयं विद्यार्थी तव चरणनिर्णेजनजलम् ।
प्रकृत्या मूकानामपि च कविताकारणतया
कदा धत्ते वाणीमुखकमलताम्बूलरसताम् ॥ 98॥
सरस्वत्या लक्ष्म्या विधिहरिसपत्नो विहरते
रतेः पातिव्रत्यं शिथिलयति रम्येण वपुषा ।
चिरं जीवन्नेव क्षपितपशुपाशव्यतिकरः
परानन्दाभिख्यम् रसयति रसं त्वद्भजनवान् ॥ 99॥
और फिर समापन, कितनी विनम्र बात पर। कवि कहता है, मैंने जो यह पूरी स्तुति लिखी, वह असल में क्या है? दीये की लौ से सूरज की आरती उतारना, जब सूरज ख़ुद रोशनी का स्रोत है। चाँद को उसी से झरी बूँदों से अर्घ्य चढ़ाना। समुद्र को उसी के पानी से तृप्त करना। माँ, आप ही वाणी की देवी हैं, जिन शब्दों से मैंने आपको सराहा वे भी आपके ही दिए हुए हैं, मैंने आपको कुछ दिया नहीं, आपका ही आपको लौटाया है। सौ श्लोकों की पूरी यात्रा एक ही भाव पर ठहर जाती है: जो कुछ हमारे पास है, सब उसी का दिया है, और भक्ति बस उसे आभार के साथ वापस सौंप देना है।
100 · समापन
प्रदीपज्वालाभिर्दिवसकरनीराजनविधिः
सुधासूतेश्चन्द्रोपलजललवैरर्घ्यरचना ।
स्वकीयैरम्भोभिः सलिलनिधिसौहित्यकरणं
त्वदीयाभिर्वाग्भिस्तव जननि वाचां स्तुतिरियम् ॥ 100॥
अनुबंध · 3 अतिरिक्त श्लोक
नीचे के तीन श्लोक मूल सौ में नहीं हैं, ये बाद में जोड़े गए अनुबंध हैं, जो कई संस्करणों में जुड़े मिलते हैं। इन्हें इसी भाव से पढ़िए: देवी के मुख की एक और झलक, और एक आख़िरी समर्पण।
पहली झलक फिर मुख पर लौटती है: देवी के चरण इतने तेजस्वी कि सूरज ख़ुद एक रत्न-दर्पण बन गया और उसकी चुभने वाली किरणें मुख के आगे नरम पड़ गईं, और उस सूरज-दर्पण में देवी का मुख ऐसे झलकता है जैसे एक कमल जो चाँद से नहीं डरता, बेख़ौफ़ खिला, किसी की रोशनी का मोहताज नहीं। फिर एक गहरी बात, बहुत कोमलता से: देवी के सच्चे, निर्मल भक्त धीरे-धीरे ख़ुद देवी जैसे हो जाते हैं, इतने कि शिव तक उन्हें देख कर एक पल को सोच बैठें, “यह तो उमा ही है”, भक्ति आख़िर में भक्त और भगवान का फ़र्क ही मिटा देती है। और बिल्कुल आख़िरी श्लोक, जिसका हर विशेषण “नि” से शुरू होता है, एक ध्वनि-लड़ी मानो एक ही नाम बार-बार पुकारा जा रहा हो, और सौ श्लोक देवी की महिमा गा कर कवि आख़िर में बस वही एक नम्र इच्छा रख देता है: माँ, मेरी यह स्तुति भी स्वीकार कर ले। पूरी सौन्दर्य लहरी एक प्रार्थना थी, और वह एक आख़िरी, नम्र प्रार्थना पर आ कर ठहर जाती है। इति।
101-103 · चरण और सूरज · भक्त की परिणति · अंतिम समर्पण
समानीतः पद्भ्यां मणिमुकुरतामम्बरमणि-
र्भयादास्यादन्तःस्तिमितकिरणश्रेणिमसृणः ।
दधाति त्वद्वक्त्रंप्रतिफलनमश्रान्तविकचं
निरातङ्कं चन्द्रान्निजहृदयपङ्केरुहमिव ॥ 101॥
समुद्भूतस्थूलस्तनभरमुरश्चारु हसितं
कटाक्षे कन्दर्पः कतिचन कदम्बद्युति वपुः ।
हरस्य त्वद्भ्रान्तिं मनसि जनयन्ति स्म विमलाः
भवत्या ये भक्ताः परिणतिरमीषामियमुमे ॥ 102॥
निधे नित्यस्मेरे निरवधिगुणे नीतिनिपुणे
निराघातज्ञाने नियमपरचित्तैकनिलये ।
नियत्या निर्मुक्ते निखिलनिगमान्तस्तुतिपदे
निरातङ्के नित्ये निगमय ममापि स्तुतिमिमाम् ॥ 103॥
आगे की राह
सौन्दर्य लहरी पूरी हुई, दो भाग, सौ श्लोक, और एक अनुबंध। श्लोक 1 की वह पहली पंक्ति, “शिव शक्ति के बिना हिल भी नहीं सकते,” सौ श्लोक बाद कुछ और गहराई से सुनाई देती है।
इसी संग्रह में देवी माहात्म्य उसी देवी का दूसरा रूप दिखाता है, वहाँ वही शक्ति राक्षसों का संहार करती हैं। सुंदरता की यह लहर और रणभूमि की वह गर्जना, दोनों एक ही शक्ति के रूप हैं।
श्लोक 100 की बात देर तक ठहरती है: हमारी सबसे अच्छी स्तुति भी उसी की दी हुई वाणी से बनी है। जो कुछ हमारे हाथों अच्छा होता है, उसमें कितना अपना है और कितना उधार का, दिया हुआ, यही प्रश्न पूरी स्तुति के पीछे बहता रहता है।