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गीतासंकट के बीच संवाद

अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग

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अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग के लिए सांकेतिक चित्र
दृश्य-द्वार · अध्याय 9: राजविद्या-राजगुह्य योग

सार: नौवाँ अध्याय गीता का सबसे स्नेह-भरा अंश है। श्रीकृष्ण यहाँ सबसे ऊँचा और सबसे गुप्त ज्ञान खोलते हैं, कि वे सब में व्याप्त हैं फिर भी किसी से बँधे नहीं, कि प्रेम से दिया एक पत्ता तक उन्हें स्वीकार है, और कि उनके द्वार पर जात, कुल या लिंग का कोई भेद नहीं।

अब श्रीकृष्ण की वाणी और कोमल हो जाती है। वे अर्जुन से कहते हैं, हे अर्जुन, आप के मन में दोष ढूँढने का भाव नहीं है, इसलिए अब हम आपको वह ज्ञान देते हैं जो सबसे श्रेष्ठ है और सबसे गुप्त भी। इसे राजविद्या कहते हैं, विद्याओं का राजा, और राजगुह्य, रहस्यों का राजा। यह सबसे पवित्र है, अनुभव से सीधे जाना जाता है, और इसे पाने वाले को गहरी शान्ति मिलती है।

सब में, फिर भी परे

तो वह रहस्य क्या है? श्रीकृष्ण कहते हैं, यह सारा जगत हमारे अव्यक्त रूप से फैला हुआ है। सारे प्राणी हम में बसे हैं, पर हम उनमें बँधे नहीं। यह बात सुनने में उलटी लगती है, पर यही गीता का केंद्र है। जैसे आकाश हर जगह है और हर चीज़ को घेरे हुए है, फिर भी किसी वस्तु से लिपटता नहीं, वैसे ही श्रीकृष्ण सब में हैं और फिर भी सबसे परे हैं। वे सृष्टि को रचते हैं, धारते हैं, और समय आने पर अपने में समेट लेते हैं, पर इस सारे खेल में उदासीन साक्षी की तरह अछूते रहते हैं।

श्रीकृष्ण इस रहस्य को और खोलते हैं। वे कहते हैं, एक कल्प के अंत में सारे प्राणी हमारी प्रकृति में लौट आते हैं, और नए कल्प के आरंभ में हम उन्हें फिर रच देते हैं। यह रचना और यह लय बार-बार होती रहती है, पर इनमें से कोई कर्म हमें बाँधता नहीं, क्योंकि हम इस सारे काम के बीच एक उदासीन साक्षी की तरह बैठे रहते हैं, किसी में उलझे बिना।

पर लोग इस स्वरूप को पहचानते क्यों नहीं? श्रीकृष्ण एक कारण बताते हैं।

अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥

मूढ़ लोग हमारा तिरस्कार कर देते हैं, क्योंकि हम मनुष्य के रूप में सामने आए हैं। वे हमारे उस परम भाव को नहीं जानते कि हम सब भूतों के महान् ईश्वर हैं। (गीता 9.11)

हम अक्सर बाहरी रूप से धोखा खा जाते हैं। सामने खड़ा सारथी साधारण-सा दिखता है, तो मन मानने से हिचकता है कि यही सबका स्वामी है। यही हिचक सच्चाई को ढक लेती है। इसके विपरीत जो महात्मा हमारे इस स्वरूप को पहचान लेते हैं, वे दृढ़ मन से निरंतर हमारा गुणगान करते हैं, हमारे लिए यत्न करते हैं, और श्रद्धा से हमारी उपासना में लगे रहते हैं। ऐसे भक्तों से हम दूर नहीं रह पाते।

अनन्य भक्ति का आश्वासन

फिर श्रीकृष्ण भक्ति की पूरी तस्वीर खोलते हैं। वे कहते हैं, जो लोग बिना किसी और सहारे के, अनन्य भाव से केवल हमारा चिंतन करते हुए हमारी उपासना करते हैं, उनका सारा भार हम स्वयं उठाते हैं।

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥

जो अनन्य भाव से हमारा स्मरण करते हुए हमें भजते हैं, उन नित्य जुड़े रहने वाले भक्तों का योगक्षेम हम स्वयं वहन करते हैं। जो उनके पास नहीं है उसे जुटाना, और जो है उसकी रक्षा करना, यह भार हमारा है। (गीता 9.22)

यह गीता का सबसे भरोसा देने वाला वचन है। जो अपने-आप को पूरी तरह सौंप देता है, उसकी चिंता श्रीकृष्ण अपने ऊपर ले लेते हैं।

पत्ता, फूल, फल, जल

अब श्रीकृष्ण यह भी बता देते हैं कि उन तक पहुँचना कितना सरल है।

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥

जो भक्त प्रेम से हमें एक पत्ता, एक फूल, एक फल या थोड़ा-सा जल भी अर्पण करता है, शुद्ध मन से चढ़ाई हुई वह प्रेम-भरी भेंट हम सहर्ष ग्रहण कर लेते हैं। (गीता 9.26)

यहाँ महँगे उपहार की कोई माँग नहीं। श्रीकृष्ण को मात्रा नहीं चाहिए, भाव चाहिए। बगीचे में तोड़ा एक पत्ता भी, यदि प्रेम से दिया जाए, उन्हें उतना ही प्रिय है।

सबके लिए खुला द्वार

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम्॥

हम सब प्राणियों के प्रति समान हैं, न कोई हमें द्वेष्य है, न कोई प्रिय। पर जो प्रेम से हमें भजते हैं, वे हम में हैं और हम उनमें। (गीता 9.29)

श्रीकृष्ण किसी का पक्ष नहीं लेते। उनका सूरज सब पर बराबर बरसता है। पर जो अपनी ओर से उन्हें चुन लेता है, उसके साथ वे भी आ खड़े होते हैं। यह रिश्ता दोनों ओर से बनता है।

श्रीकृष्ण एक और आश्वासन देते हैं जो किसी को बाहर नहीं छोड़ता। वे कहते हैं, यदि कोई बड़े से बड़ा दुराचारी भी अनन्य भाव से हमें भजने लगे, तो उसे साधु ही मानना चाहिए, क्योंकि उसने अपने मन का ठीक निश्चय कर लिया है। वह जल्दी ही धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति पाता है। यह वचन याद रखने योग्य है कि हमारा भक्त कभी नष्ट नहीं होता।

और फिर वे वह बात कहते हैं जो इस अध्याय को सबके लिए खोल देती है। वे कहते हैं, हमारी शरण में जो भी आए, वह हमें पा लेता है, चाहे वह स्त्री हो या पुरुष, किसी भी कुल या स्थिति का हो। भक्ति की भाषा हर कोई बोल सकता है, इसमें ऊँच-नीच का कोई परदा नहीं। इसीलिए, हे अर्जुन, अपने मन को हम में लगाइए, हमारे भक्त बनिए, हमें प्रणाम कीजिए, और अपने-आप को हमें अर्पित कर दीजिए। जो ऐसा करता है, वह हमें ही पा जाता है।

यह सुनकर अर्जुन के चेहरे पर एक हल्की-सी राहत तैरती है। जिस परम तत्त्व को पाना अभी दुर्लभ लग रहा था, वह अचानक इतना पास आ गया है कि प्रेम से चढ़ाया एक पत्ता भी उस तक का पुल बन सकता है।

आधार: श्रीमद्भगवद्गीता

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