‘साक्षी’ अष्टावक्र-गीता का सबसे-केन्द्रीय-शब्द है, और इसी से ग्रन्थ का दार्शनिक-स्वर तय होता है। साक्षी एक ऐसा-तत्त्व है जो देखता है, मगर देखे जाने में लिप्त नहीं होता। यह विभेद अद्वैत-वेदान्त की रीढ़ है, और आदि शंकराचार्य ने इसे ‘दृग्-दृश्य-विवेक’ नामक स्वतन्त्र-प्रकरण-ग्रन्थ में विस्तार से समझाया। आधुनिक-दर्शन–शास्त्र में फ़्रेंच-दार्शनिक मॉरिस मर्ल्यू-पॉन्टी (Maurice Merleau-Ponty, 1908-1961) ने अपनी ‘फेनोमेनोलॉजी ऑफ़ पर्सेप्शन’ (1945) में जो ‘विटनेस-कॉन्शियसनेस’ की अवधारणा रखी, वह अष्टावक्र के ‘साक्षी’ से अद्भुत-तौर पर मेल खाती है, हालाँकि मर्ल्यू-पॉन्टी को अष्टावक्र का परिचय नहीं था।पाठ्य-संगति
साक्षी
Witness · 20 श्लोक
जनक के तीन प्रश्न: ज्ञान कैसे प्राप्त हो? मुक्ति कैसे हो? वैराग्य कैसे आए? अष्टावक्र का जवाब इसी प्रकरण में पूरा आ जाता है। बाक़ी 19 प्रकरण इसी एक उत्तर की व्याख्या हैं।
अष्टावक्र की कथा महाभारत के वन-पर्व के चार-सौ-नब्बेवें अध्याय में मिलती है। उद्दालक-आरुणि के शिष्य कहोड के पुत्र, गर्भ में आठ-बार पिता के मन्त्र-पाठ की त्रुटियाँ चिह्नित करते थे, और इसी से कहोड ने क्रोधित होकर शाप दिया कि बालक आठ-स्थानों पर वक्र (टेढ़ा) पैदा होगा। बारह-वर्ष की आयु में अष्टावक्र राजा जनक के दरबार में चीफ़-मिनिस्टर वंदी से शास्त्रार्थ जीते। इस ग्रंथ के बीस प्रकरण, जो आज भी संस्कृत-साहित्य की सबसे radical-अद्वैत-रचनाओं में हैं, उसी विद्वत्ता का परिणाम बताए जाते हैं।
शुरुआत
जनक के तीन प्रश्न: ज्ञान, मुक्ति, वैराग्य। अष्टावक्र इसी प्रकरण में पूरा जवाब दे देते हैं।
मिथिला का दरबार। जनक सिंहासन पर बैठे हैं, राजा भी हैं और अपने-आप में सिद्ध भी माने जाते हैं। फिर भी एक प्रश्न उनके भीतर बरसों से करवट ले रहा है। बालक-गुरु अष्टावक्र सामने हैं, और जनक हाथ जोड़ कर तीन बातें एक साथ पूछ बैठते हैं। ज्ञान कैसे मिलता है, मुक्ति कैसे होगी, और वैराग्य कैसे आएगा। इन तीनों प्रश्नों के नीचे एक चुपचाप बैठी मान्यता है, कि कुछ अभी बाक़ी है, कुछ अभी पाना शेष है। अगले ही श्लोक से अष्टावक्र इसी मान्यता पर हाथ रख देंगे।

श्लोक 1
कथं ज्ञानमवाप्नोति कथं मुक्तिर्भविष्यति।
वैराग्यं च कथं प्राप्तं एतद् ब्रूहि मम प्रभो॥
अष्टावक्र का उत्तर सीधा है, और प्रेम से भरा है। बेटा, अगर आप मुक्ति चाहते हैं, तो विषयों को ज़हर की तरह छोड़ दीजिए, और क्षमा, सरलता, दया, सन्तोष तथा सत्य को अमृत की तरह पीजिए। यही पूरे ग्रन्थ की नींव है। उन्होंने कोई विधि नहीं बताई, कोई तकनीक नहीं। उन्होंने एक रुख़ बता दिया, भोग से दूरी और सद्गुणों से निकटता, बस इतनी सी शुरुआत। फिर वे और गहरे उतरते हैं। आप पृथ्वी नहीं, जल नहीं, अग्नि नहीं, वायु नहीं, आकाश भी नहीं। मुक्ति चाहिए तो जानिए, आप इन सबके साक्षी हैं, चिद्रूप आत्मा हैं। शरीर इन्हीं पाँच तत्त्वों से बना है, और हम सबकी तरह जनक की पहचान भी शरीर के साथ बँधी थी। अष्टावक्र उस पहचान को धीरे से अलग कर देते हैं, आप तो देह को देखने वाले हैं।
श्लोक 2 · 3
मुक्तिमिच्छसि चेत्तात विषयान् विषवत्त्यज।
क्षमार्जवदयातोषसत्यं पीयूषवद् भज॥
न पृथ्वी न जलं नाग्निर्न वायुर्द्यौर्न वा भवान्।
एषां साक्षिणमात्मानं चिद्रूपं विद्धि मुक्तये॥
अब अष्टावक्र वह बात कहते हैं जो सब आचार्यों से अलग है। अगर आप देह को अलग करके चेतना में विश्राम कर के स्थित हो जाएँ, तो अभी इसी क्षण सुखी, शान्त और बन्धन-मुक्त हो जाएँगे। और कोई गुरु लम्बी प्रक्रिया बताता है; अष्टावक्र कहते हैं, प्रक्रिया नहीं, पहचान। एक ठहराव, एक पहचान का खिसकना, बस। फिर वे समाज और शरीर, दोनों की पहचान एक साथ काट देते हैं। आप न ब्राह्मण आदि किसी वर्ण के हैं, न किसी आश्रम के, न इन्द्रियों से दिखने वाले। आप असंग हैं, निराकार हैं, समूचे विश्व के साक्षी हैं; सो सुखी हो जाइए। यह आदेश है, अनुरोध नहीं, क्योंकि सुख तो पहले से ही वहीं रखा है।
श्लोक 4 · 5
यदि देहं पृथक् कृत्य चिति विश्राम्य तिष्ठसि।
अधुनैव सुखी शान्तो बन्धमुक्तो भविष्यसि॥
न त्वं विप्रादिको वर्णो नाश्रमी नाक्षगोचरः।
असङ्गोऽसि निराकारो विश्वसाक्षी सुखी भव॥
धर्म और अधर्म, सुख और दुःख, ये सब मन के विषय हैं, आपके नहीं। हे विभु, आप न कर्ता हैं, न भोक्ता; आप सदा से मुक्त ही हैं। यही अष्टावक्र का बार-बार लौटने वाला स्वर है, मुक्ति ‘होनी’ नहीं है, मुक्ति ‘है’, बस यह बात पहचानी नहीं गई। फिर वे एक और मोड़ लाते हैं। आप अकेले सबके द्रष्टा हैं, सदा से लगभग-मुक्त ही हैं। आपका बन्धन इतना भर है कि आप द्रष्टा को कोई और समझ बैठे हैं। पूरी तरह मुक्त क्यों नहीं? क्योंकि एक छोटी सी चूक बाक़ी रह गई है, देखने वाले को देखे जाने वाला मान लेना। जिस क्षण यह चूक सुधरती है, वही मुक्ति है।
श्लोक 6 · 7
धर्माधर्मौ सुखं दुःखं मानसानि न ते विभो।
न कर्तासि न भोक्तासि मुक्त एवासि सर्वदा॥
एको द्रष्टासि सर्वस्य मुक्तप्रायोऽसि सर्वदा।
अयमेव हि ते बन्धो द्रष्टारं पश्यसीतरम्॥
यहाँ अष्टावक्र एक तीखा चित्र रखते हैं। ‘मैं कर्ता हूँ’, इस अहंकार रूपी विशाल काले साँप ने आपको डँस लिया है। ‘मैं कर्ता नहीं’, इस विश्वास का अमृत पी कर सुखी हो जाइए। साँप एक ही बार डँसता है, और ज़हर पूरी देह में फैल जाता है; ठीक वैसे ही ‘मैं कर्ता हूँ’ का छोटा सा विचार पूरी ज़िन्दगी को तनाव से भर देता है। और इसका इलाज कोई रोज़ की साधना नहीं, एक दृढ़ विश्वास है। फिर वे आग का रूपक लाते हैं। ‘मैं एक, विशुद्ध बोध हूँ’, इस निश्चय की आग से अज्ञान के घने जंगल को जला दीजिए, और शोक-रहित हो कर सुखी हो जाइए। अज्ञान घना है, परत के नीचे परत; पर एक ही निश्चय की आग सब परतों को एक साथ राख कर देती है।
श्लोक 8 · 9
अहं कर्तेत्यहंमानमहाकृष्णाहिदंशितः।
नाहं कर्तेति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव॥
एको विशुद्धबोधोऽहमिति निश्चयवह्निना।
प्रज्वाल्याज्ञानगहनं वीतशोकः सुखी भव॥
अब वेदान्त का वह प्रसिद्ध चित्र आता है, रस्सी और साँप। जिसमें यह सारा संसार रस्सी पर साँप की तरह कल्पित होता है, वही आनन्द-परमानन्द बोध आप हैं; सो सुखी हो जाइए। अँधेरे में रस्सी देख कर डर लग जाता है, साँप; रौशनी आते ही पता चलता है, रस्सी ही थी। संसार ‘नहीं है’ अष्टावक्र यह नहीं कहते; वे कहते हैं, संसार वैसा नहीं है जैसा दिखता है। और फिर एक कहावत-सी बात। जो अपने को मुक्त मानता है, वह मुक्त है; जो अपने को बद्ध मानता है, वह बद्ध। जैसी मति, वैसी गति। यह कोरी सकारात्मक सोच नहीं है। बात मान लेने की नहीं, सीधे देख लेने की है, कि आप मुक्त हैं ही।
श्लोक 10 · 11
यत्र विश्वमिदं भाति कल्पितं रज्जुसर्पवत्।
आनन्दपरमानन्दः स बोधस्त्वं सुखं भव॥
मुक्ताभिमानी मुक्तो हि बद्धो बद्धाभिमान्यपि।
किंवदन्तीह सत्येयं या मतिः सा गतिर्भवेत्॥
अब अष्टावक्र आत्मा का पूरा परिचय एक साँस में रख देते हैं। आत्मा साक्षी है, विभु है, पूर्ण है, एक है, मुक्त है, चित् है, अक्रिय है, असंग है, निःस्पृह है, शान्त है; बस भ्रम के कारण संसारी जैसी दिखती है, संसारी है नहीं। दस विशेषण, और एक ‘इव’, ‘जैसी’; यही पूरा भेद है। इन सबमें एक शब्द पकड़ लीजिए, साक्षी; बाक़ी सब इसी से निकल आते हैं। फिर वे उपाय बताते हैं। कूटस्थ, अद्वैत बोध रूपी आत्मा का अनुसन्धान कीजिए, और ‘मैं आभास हूँ’ इस भ्रम को छोड़ कर बाहर और भीतर के भाव त्याग दीजिए। कूटस्थ वह है जो बदलता ही नहीं, चक्की का अचल ऊपरी पाट; और आभास वह ‘मैं’ है जो स्थितियों के साथ बदलता रहता है, कभी ख़ुश, कभी उदास। वह बदलता ‘मैं’ असली नहीं।
श्लोक 12 · 13
आत्मा साक्षी विभुः पूर्ण एको मुक्तश्चिदक्रियः।
असङ्गो निःस्पृहः शान्तो भ्रमात्संसारवानिव॥
कूटस्थं बोधमद्वैतमात्मानं परिभावय।
आभासोऽहं भ्रमं मुक्त्वा भावं बाह्यमथान्तरम्॥
अष्टावक्र की आवाज़ यहाँ कोमल हो जाती है। बेटा, देह के अभिमान के पाश से आप बहुत समय से बँधे हैं; ‘मैं बोध हूँ’, इस ज्ञान की तलवार से उस पाश को काट कर सुखी हो जाइए। यह वही स्नेह है जो बच्चे को रस्सी से छुड़ाने वाले पिता के स्वर में होता है, और औज़ार तर्क नहीं, पहचान है। फिर एक चौंका देने वाली बात। आप निःसंग, निष्क्रिय, स्वयं-प्रकाश और निरंजन हैं; आपका बन्धन बस इतना है कि आप समाधि का अनुष्ठान कर रहे हैं। समाधि भी बन्धन? हाँ, क्योंकि समाधि करने वाला कोई बैठता है, और समाधि एक अवस्था है जो आती-जाती है। अष्टावक्र कहते हैं, आप अवस्था के परे हैं; जो ध्यान से मिलने को है, आप पहले से वही हैं।
श्लोक 14 · 15
देहाभिमानपाशेन चिरं बद्धोऽसि पुत्रक।
बोधोऽहं ज्ञानखङ्गेन तन्निकृत्य सुखी भव॥
निःसङ्गो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः।
अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि॥
अब अष्टावक्र विस्तार की ओर मुड़ते हैं। यह सारा संसार आप से ही व्याप्त है, यथार्थतः आप में ही पिरोया हुआ है; आप शुद्ध-बुद्ध स्वरूप हैं, क्षुद्र चित्त को मत प्राप्त होइए। यह चेतावनी है। चित्त छोटा हो जाता है जब वह ‘मैं शरीर हूँ’ मान लेता है, और बड़ा हो जाता है जब ‘मैं चेतना हूँ’ पहचान लेता है; जहाँ ‘मेरा’ बहुत बड़ा हो जाए, वहाँ ‘मैं’ बहुत छोटा रह जाता है। फिर वे विशेषणों की एक लड़ी रख देते हैं। निरपेक्ष, निर्विकार, निर्भर, शीतल-आशय, अगाध-बुद्धि, अक्षुब्ध हो कर बस चित्-मात्र में वास कीजिए। कुछ चाहिए नहीं, कुछ बदलता नहीं, चित्त ठंडा, बुद्धि अथाह, मन अविचलित। यह कहीं ‘बनना’ नहीं, यह आपका पहले से रखा स्वरूप है; बस उसी में रहिए।
श्लोक 16 · 17
त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः।
शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मा गमः क्षुद्रचित्तताम्॥
निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः।
अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः॥
अब प्रकरण अपने अन्तिम सूत्रों की ओर बढ़ता है। साकार को असत् जानिए और निराकार को निश्चल; इस तत्त्व के उपदेश से फिर जन्म की सम्भावना नहीं रहती। साकार वह है जिसका रूप है, जो बदलता है, समाप्त होता है, शरीर, मन, संसार; निराकार वह आत्मा है, वह चेतना है। अष्टावक्र अगले जन्म से अधिक इसी जीवन के बार-बार जन्म लेते ‘मैं’ की ओर इशारा कर रहे हैं, हर अहंकार-अवस्था एक नया जन्म है, और यह उपदेश उस श्रृंखला को तोड़ देता है। फिर आईने का चित्र। जैसे आईने में दिखते रूप के भीतर और बाहर, दोनों ओर वही एक आईना है, वैसे ही इस शरीर के भीतर और बाहर, हर ओर वही एक परमेश्वर है। हम सोचते हैं चेतना भीतर है, दिमाग़ में बंद; पर ‘भीतर’ का भाव तो ‘बाहर’ के सामने ही बनता है। चेतना के लिए भीतर-बाहर है ही नहीं; शरीर उसी में प्रकट होता है, उसमें बँधा नहीं।
श्लोक 18 · 19
साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम्।
एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः॥
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेऽन्तः परितस्तु सः।
तथैवाऽस्मिन् शरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः॥
और अन्त में घट-आकाश का वह चित्र, जिस पर पूरा प्रकरण ठहर जाता है। जैसे एक ही सर्वव्यापी आकाश घड़े के बाहर और भीतर, दोनों जगह वही एक है, वैसे ही नित्य, निरन्तर ब्रह्म सब प्राणियों में वही एक है। मिट्टी के घड़े के भीतर जो आकाश दिखता है, वह कोई अलग आकाश नहीं, वही बाहर का आकाश है; बस घड़े की दीवारें भेद का भ्रम रच देती हैं। हर शरीर एक ऐसा ही घड़ा है, और उसके भीतर का ‘मैं’ वही है जो दूसरे घड़े के भीतर का; और सब का सब, वही एक सर्वव्यापी ब्रह्म। यहीं प्रकरण पूरा हो जाता है। तीन प्रश्नों के तीन उत्तर मिल गए, ज्ञान साक्षी की पहचान में है, मुक्ति पहले से ही है, और वैराग्य विषयों को ज़हर समझ लेने में है। आगे जनक की प्रतिक्रिया प्रकरण दो में।
श्लोक 20
एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे।
नित्यं निरन्तरं ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा॥