तुलसीदासरामचरितमानसप्रथम सोपान
बालकाण्ड
मंगलाचरण, शिव और पार्वती की कथा, रामजन्म, जनकपुर के चार विवाह और अवध का स्वागत।
रामचरितमानस का पहला सोपान कथा कहने और सुनने की महिमा से आरम्भ होता है। शिव और सती, पार्वती का तप और विवाह, नारद का मोह, मनु और शतरूपा की प्रार्थना तथा प्रतापभानु की कथा से होते हुए हम रामजन्म तक पहुँचते हैं। अवतार के कारण अलग अलग कथाओं में खुलते हैं। उनके साथ भक्ति, विश्वास, विवेक तथा भूल के परिणाम भी सामने आते हैं।
राम का बालचरित, विश्वामित्र के साथ दोनों भाइयों का जाना, यज्ञ की रक्षा और अहल्या का उद्धार हमें जनकपुर तक ले जाते हैं। वहाँ नगर और पुष्पवाटिका, सीता का मन, शिवधनुष का टूटना और परशुराम का संवाद है। चारों भाइयों के विवाह के बाद भी कथा चलती है: जनकपुर की विदाई, अवध का स्वागत, माताओं की बातचीत और विश्वामित्र की विदाई तक। यहाँ बयालीस प्रसंगों में इस पूरे क्रम को पढ़ा जा सकता है। हिन्दी कथा गीता प्रेस के पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के सहारे लिखी गयी है।

प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए
- मंगलाचरण, गुरु-वंदना और संत-असंत का भेददोहा 1 से 7
वाणी और विनायक को इस ग्रन्थ का पहला प्रणाम। गुरु के चरणों की वह धूल जो आँख का अंजन बन जाती है। और वह वंदना जिसमें संत और दुष्ट, दोनों के चरण पकड़े जाते हैं। - कवि की विनय, और उन सबकी वंदना जिनसे यह कथा चलेगीदोहा 8 से 15
एक आदमी अपनी रचना के सारे दोष स्वयं गिना देता है। वह अपना नाम ठगों की सूची में सबसे ऊपर लिख देता है। फिर वह उन सबके आगे हाथ जोड़ता है जिनके बल पर वह इतनी बड़ी कथा कहने चला है। - वंदना का अन्तिम चरण, और राम-नाम की महिमासोरठा 16 से दोहा 25
अवधपुरी से लेकर सीताराम तक जिन-जिनकी वंदना बाक़ी थी। और उसके तुरन्त बाद एक ऐसी वंदना जो किसी व्यक्ति की नहीं, दो अक्षरों की है। उसके पक्ष में तुलसीदास पूरी दलील रखते हैं। - नाम का प्रताप और तुलसीदास की अपनी कथादोहा 26 से 33
नाम ने किस-किस को तार दिया, इस युग में उसके सिवा बचता क्या है। और वह लड़का जो सूकरखेत में यही कथा सुन रहा था और उसे ठीक से समझ नहीं पाया था। - मानस-सरोवर का रूपकदोहा 34 से 43
जिस दिन और जिस नगर में यह कथा आरम्भ हुई, जिस नाम पर यह पूरा ग्रन्थ खड़ा है। और वह सरोवर जिसके चार घाट, सात सीढ़ियाँ और एक निकलती हुई नदी तुलसीदास ने एक रूपक में बाँध दी। - भरद्वाज का प्रश्न और सती के मन का संदेहदोहा 44 से 55
प्रयाग में एक मुनि अपना संदेह कहने से डरते हैं। उत्तर में उन्हें किसी और का संदेह सुनाया जाता है, जो त्रेता की एक सड़क पर सीता का रूप धरकर चला था। - शिव का मन से त्याग, दक्ष का यज्ञ और सती का देह-त्यागदोहा 56 से 64
एक पति जो अपना निर्णय मन-ही-मन कर लेता है और कभी बताता नहीं। सत्तासी हजार वर्ष की एक समाधि, जिसके बीतने तक पत्नी कैलास पर दुख में दिन काटती है। और अन्त में वही देह जो छोड़ा जा चुका था, भरी सभा में स्वयं छोड़ दिया जाता है। - पार्वती का जन्म, नारद की भविष्यवाणी और कठिन तपदोहा 65 से 74
हिमवान् के घर एक कन्या जन्मी है। उसके लिये नारद जैसा वर बताते हैं वह सुनकर माता पिता का मुँह उतर जाता है। उसी घड़ी उस कन्या के भीतर हर्ष भर उठता है। - राम की विनती, सप्तर्षियों की परीक्षा और पार्वती का उत्तरदोहा 75 से 81
आकाश से कही हुई एक बात जिसमें सात ऋषियों का आना ही उसका प्रमाण ठहरा। एक विनती जो आज्ञा की तरह मान ली गयी। और एक कन्या जिसे जान-बूझकर चिढ़ाया गया, यह देखने के लिये कि वह डिगती है या नहीं। - कामदेव का दहन और रति को वरदानदोहा 82 से 89
एक असुर को मारने के लिये एक विवाह चाहिये था। विवाह के लिये एक समाधि तोड़नी थी। और समाधि तोड़ने जो भेजा गया, वह चलते समय जानता था कि लौटेगा नहीं। - शिव की बरात और मैना का विलापदोहा 90 से 98
आग के पास पाला ठहरता ही नहीं, यह कहकर पार्वती ने मुनियों को उत्तर दिया। फिर वही बरात चली जिसे देखकर नगर के बच्चे भागे, और एक माँ ने अपनी बेटी को गोद में बिठाकर विधाता को कोसा। - शिव-पार्वती का विवाह और पार्वती की जिज्ञासादोहा 99 से 109
एक मंडप जिसमें दूल्हा बैठने से पहले किसी और को याद करता है। एक विदाई जिसमें माता अपना दुःख टाल देती है। और कैलास के एक बरगद के नीचे पूछा गया वह प्रश्न जिससे यह पूरी पोथी खुलती है। - शिव का उत्तर और रामकथा की महिमादोहा 110 से 120
पार्वती अपने प्रश्न से पहले अपनी पात्रता पर शंका करती हैं। उसी प्रश्न पर शिव दो घड़ी ध्यान में डूब जाते हैं, फिर बाहर आकर रामकथा कहना आरम्भ करते हैं। - अवतार के कारण, नारद का अभिमान और विश्वमोहिनीदोहा 121 से 131
जिनकी समाधि कामदेव भी नहीं डिगा सके, वही नारद एक राजकुमारी का रूप देखकर वैराग्य भूल जाते हैं। बीच में शिव की सीख है और विष्णु का अपने सेवक के हित का प्रण। - स्वयंवर, और नारद के दो शापदोहा 132 से 138
नारद सुन्दरता माँगते हैं और उन्हें हित मिलता है। पूरी सभा में केवल एक जोड़ी आँखें सच देखती हैं। और जो हँसी दो गणों ने सभा में उठायी थी, वह जल में दिखे एक मुख पर आकर बुझ जाती है। - मनु और शतरूपा की तपस्या और वरदानदोहा 139 से 152
बरसों के तप के बाद पहले नेत्र भरकर दर्शन माँगा जाता है। फिर पुत्र का सम्बन्ध, और फिर वह जीवन जो भगवान के अपने भक्त जीते हैं। - प्रतापभानु का आखेट और कपटी तपस्वीदोहा 153 से 160
सात द्वीपों का विजेता एक सूअर के पीछे वन में अकेला पड़ जाता है। जिस आश्रम में उसे जल और आसन मिलता है, वहाँ रहनेवाला व्यक्ति उसे पहचान चुका है। - कपटी तपस्वी का वरदान और छल की योजनादोहा 161 से 170
राजा एक तपस्वी को अपना एकमात्र हितैषी कहते हैं। वही उनके विश्वास, भोजन के संकल्प और पुरोहित के रूप को उनके विनाश का उपाय बना रहा है। - ब्राह्मणों का शाप और प्रतापभानु का अंतदोहा 171 से 176
रसोई में रचा गया छल, आकाशवाणी से रुका भोजन, ब्राह्मणों का शाप। और निर्दोष कहे जाने पर भी प्रतापभानु के कुल का विनाश। इसी कथा के अन्त में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण के जन्म आते हैं। - रावण के वर, लंका और तीनों लोकों का त्रासदोहा 177 से 183
तीनों भाइयों को वर मिलते हैं। समुद्र से घिरी लंका रावण की राजधानी बनती है, और उसकी सभा का आदेश सारे संसार के आचरण पर उतर आता है। - पृथ्वी की पुकार और दशरथ का पुत्रकाम यज्ञदोहा 184 से 189
रावण के भय से बोल न सकनेवाली पृथ्वी, प्रेम से प्रकट होनेवाले भगवान्। और गुरु के पास अपना दुःख लेकर पहुँचे दशरथ। - राम का प्रागट्य और चारों भाइयों का नामकरणदोहा 190 से 197
कौसल्या के सामने चार भुजाओंवाला रूप प्रकट होता है। माता बाललीला माँगती हैं, और बच्चे के रोने के बाद प्रसन्नता अवध की गलियों तक भर जाती है। - बाल-लीला और कौसल्या को विराट दर्शनदोहा 198 से 204
गोद में बालक की हँसी, हर रोम में असंख्य ब्रह्माण्डों का दर्शन। और फिर उसी घर के आँगन में दही-भात सने मुख से निकलती किलकारी। - विश्वामित्र का आगमन, ताड़का-वध और अहल्यादोहा 205 से 211
दशरथ के हृदय से लगकर दो भाई वन की ओर चलते हैं। यज्ञ की रक्षा, और एक सूने आश्रम में चरण छूते ही प्रकट होती अहल्या की कथा। - जनकपुर की शोभा, जनक का स्वागत और नगर-दर्शनदोहा 212 से 220
पहले दोनों भाई जनकपुर की शोभा देखते हैं, फिर राजा और नगरवासी उन्हीं को देखते रह जाते हैं। बीच में लक्ष्मण की एक अनकही इच्छा है, जिसे राम जान लेते हैं। - नगर-दर्शन और जनकपुर का प्रेमदोहा 221 से 226
स्त्रियों की विवाह की कामना, बच्चों के संग धनुषयज्ञ की रंगभूमि का दर्शन। और कथा में, और गुरु और भाई की सेवा में बीती रात। - पुष्पवाटिका, पहली दृष्टि और सीता का गौरी-पूजनदोहा 227 से 239
फूल लेने निकले दो भाई, पार्वती से वर माँगने आयी सीता। और वह पहली दृष्टि जिसकी छबि सन्ध्या के चन्द्रमा में फिर लौटती है। - रंगभूमि की सभा और राजाओं का संवाददोहा 240 से 246
दो राजकुमार सभा में आते हैं। कोई उनमें वीरता देखता है, कोई प्रत्यक्ष काल, कोई अपना इष्टदेव, और कोई उन्हें बच्चे जैसी प्रीति से देखता है। फिर राजाओं की बातचीत होती है, और जनक सीता को बुला भेजते हैं। - सीता का आगमन, राजाओं की हार और लक्ष्मण का रोषदोहा 247 से 254
सीता की छबि पर ठहरी सभा, अचल धनुष के सामने हारते राजा। और जनक के सन्ताप के बीच गुरु की आज्ञा पाकर उठते राम। - सीता की विनती और शिवधनुष का भंगदोहा 255 से 261
कोमल कुमार को देखकर हृदय काँपते हैं, और राम सीता की व्याकुलता पहचानते हैं। धनुष लेते, चढ़ाते और खींचते हुए राम को कोई नहीं देख पाता, और वे उसे बीच से तोड़ देते हैं। - जयमाला और परशुराम का आगमनदोहा 262 से 270
सीता के हाथों की जयमाला राम के हृदय पर आ गयी है। नगर की बधाई के बीच कुछ राजाओं का रोष उठता है, और उसी सभा में परशुराम पहुँचते हैं। - लक्ष्मण और परशुराम का संवाददोहा 271 से 278
धनुष की बात से उठी तकरार में फरसा दो बार सँभलता है। लक्ष्मण की हँसी लौटती है, और राम संकेत से छोटे भाई को रोकते हैं। - परशुराम की पहचान और उनका प्रस्थानदोहा 279 से 285
क्रोध में हाथ रुकता है, विनय पर सन्देह होता है। और पहचान खुलने पर वही परशुराम दोनों भाइयों से क्षमा माँगते हैं। - जनकपुर का मण्डप और दशरथ को विवाह का समाचारदोहा 286 से 295
मणियों से सँवरता जनकपुर, अयोध्या पहुँची एक प्रिय पत्रिका। और उसे बारम्बार सुनते हुए पिता, भाई और माताएँ। - बरात की तैयारी और जनकपुर की यात्रादोहा 296 से 304
अयोध्या में घर घर मंगल है, भरत यात्रा की तैयारी करवाते हैं। दशरथ की बरात के लिये जनक नदियों पर पुल तथा मार्ग में सुन्दर पड़ाव बनवाते हैं। - बरात का स्वागत और चारों भाइयों का मिलनदोहा 305 से 311
जनकपुर की अगवानी में उमड़ता आनन्द, जनवासे में सीता की अनजानी सेवा, पिता से मिलता पुत्रों का स्नेह। और चारों भाइयों को देखकर नगर की स्त्रियों के मन में उठती एक कामना। - राम का बरवेष, परछन और समधियों का मिलनदोहा 312 से 319
हिम ऋतु की गोधूलि में चली बारात, राम के रूप पर रीझे देवता। सुनयना का परछन और जनक के अपने हाथों रखा गया आसन। - मण्डप में चार विवाहदोहा 320 से 326
जनक का अतिथि सत्कार, मण्डप में सीता का आगमन, चारों भाइयों का विवाह। और उस सारे उत्सव के बीच बार बार राम की ओर उठती सीता की आँखें। - दूलह का रूप, कोहबर, भोज और विदाई की तैयारीदोहा 327 से 332
हाथ की मणि में ठहरी राम की छवि, हँसी से भरी विवाह की पंगत। चार लाख गायों का दान और वह जनकपुर जहाँ किसी का मन अतिथियों को जाने देने का नहीं होता। - दहेज और जनकपुर से विदाईदोहा 333 से 339
जनक राह के पड़ावों पर अपार सामग्री और अयोध्या को अपरिमित दहेज भेजते हैं। विदा के समय रनिवास, सखियाँ और नगर के स्त्री पुरुष प्रेम के वश हो जाते हैं। - जनक का स्नेह और अवध का स्वागतदोहा 340 से 348
विदा के समय जनक राम से विनती करते हैं कि उनका मन भूलकर भी राम के चरण न छोड़े। अवध में माताएँ मंगल से भरे स्वर्णथाल लेकर परछन करने चलती हैं। - अवध का उत्सव और विश्वामित्र की विदाईदोहा 349 से 361
चारों दम्पतियों के स्वागत से माताओं की रात्रि की बातचीत तक। और दिनों तक बढ़ते आनन्द से विश्वामित्र की विदाई तथा बालकाण्ड के मंगलमय समापन तक।
तुलसीदास की रामकथा
यहाँ कथा का आधार तुलसीदास का अवधी रामचरितमानस है। वाल्मीकि की संस्कृत रामायण इस स्थल पर अलग से पढ़ी जा सकती है। दोनों ग्रन्थों में कई प्रसंग मिलते हैं। उनके क्रम, संवाद तथा विवरण में भेद भी हैं। इस संग्रह में हर प्रसंग रामचरितमानस के अपने पाठ और उसकी पोद्दार टीका के सहारे लिखा गया है।
आधार: श्रीरामचरितमानस, प्रथम सोपान (बालकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण, हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।