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मानस-सरोवर का रूपक

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 5

जिस दिन और जिस नगर में यह कथा आरम्भ हुई, जिस नाम पर यह पूरा ग्रन्थ खड़ा है। और वह सरोवर जिसके चार घाट, सात सीढ़ियाँ और एक निकलती हुई नदी तुलसीदास ने एक रूपक में बाँध दी।

इस प्रसंग में कोई युद्ध नहीं, कोई वर नहीं, कोई शाप नहीं। यहाँ एक ग्रन्थ अपना नाम रखता है, और नाम रखते ही वह नाम एक जगह बन जाता है: एक सरोवर। उसके चार घाट हैं और सात सीढ़ियाँ। उसमें कमल खिले हैं, हंस तैरते हैं, मछलियाँ चलती हैं। उसके चारों ओर आम की बगीचियाँ हैं, और उसमें से एक नदी निकलकर दूर तक चली जाती है। यह चित्र आगे पढ़े जानेवाले पूरे ग्रन्थ का नक्शा है। आगे की कथा के बहुत से पड़ाव, शिव-विवाह से रामराज्य तक, इसी में कहीं न कहीं रखे मिलते हैं।

शुरुआत बहुत ठोस जगह से होती है। कवि संवत्, वार, महीना और तिथि बताते हैं, और नगर का नाम लेते हैं। उसके बाद ही सरोवर खुलता है। उस दिन, वेद के कहे अनुसार, सारे तीर्थ चलकर अयोध्या आ जाते हैं। कथा वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ उस दिन सारा तीर्थजल पहले से इकट्ठा है। उसके तुरन्त बाद वह जल रूपक बन जाता है।

नाम पर ठहरिये। मानस एक ही शब्द में दो चीज़ें कह देता है: वह सरोवर जिसे संसार मानसरोवर कहता है, और वह भीतरी मन जिसे शास्त्र मानस कहता है। तुलसीदास पूरा रूपक इसी दुहरेपन पर खड़ा करते हैं। जल ऊपर से बरसता है, कान के रास्ते भीतर आता है, और हृदय में भरकर ठहर जाता है। सरोवर बाहर भी है और भीतर भी।

सरोवर के रचयिता, श्रोता और कवि

  • तुलसीदास इस कथा के कवि, जो यहाँ अपनी तिथि, अपना नगर और अपनी दीनता तीनों दर्ज कर देते हैं।
  • शिव जिन्होंने यह मानस रचकर पहले अपने ही मन में रख लिया था, और जिनका रखा हुआ नाम आज तक इस ग्रन्थ पर है।
  • पार्वती शिव की वे श्रोता जिन्हें सुअवसर पाकर यह कथा सुनायी गयी, और जिनका स्मरण करके कवि आगे बढ़ते हैं।
  • राम जिनका सुयश इस सरोवर का जल है, और जिनकी कृपा के बिना इस तट तक कोई नहीं पहुँचता।
  • सरयू अयोध्या की नदी, जिसमें इस प्रसंग के आरम्भ में सज्जन नहाते हैं। वह रूपक के भीतर कविता की नदी का नाम बनकर फिर आती है।
  • संत-समाज इस रूपक में पाँच जगह खड़े मिलते हैं: सुयश का जल बरसानेवाले मेघ बनकर, सरोवर के चारों ओर की बगीची बनकर, राह के साथी बनकर। भीतर आने की विधि बनकर, और नदी के किनारे बसा नगर बनकर।

तिथि, वार और नगर

सबसे पहले कवि एक पुराना हिसाब पूरा करते हैं। इस प्रकार सब संशय दूर करके, गुरु के चरणों की धूल सिर पर धरकर, वे फिर हाथ जोड़कर सबसे विनती करते हैं। विनती बस इतनी है कि कथा की रचना में कोई दोष न लग जाये।

इसके बाद वे शिव को माथा नवाते हैं, और सिर नवाते ही तिथि दर्ज कर देते हैं।

आदर से शिव को सिर नवाकर अब वे राम के गुणों की निर्मल गाथा कहते हैं। हरि के चरणों पर सिर रखकर वे संवत् सोलह सौ इकतीस में इस कथा का आरम्भ करते हैं। कवि अपने ग्रन्थ के भीतर उसके शुरू होने का वर्ष लिख देते हैं। यह पोथी एक दिन शुरू हुई थी, और वह दिन यह रहा।

फिर वे दिन और जगह बताते हैं: चैत्र की नवमी, मंगलवार, और अयोध्यापुरी। फिर यह भी बताया जाता है कि यही दिन क्यों: वेद गाते हैं कि जिस दिन राम का जन्म होता है, उस दिन सारे तीर्थ वहाँ चले आते हैं। असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता, सब आकर राम की सेवा करते हैं। बुद्धिमान लोग जन्म का महोत्सव रचते हैं और राम की कीर्ति गाते हैं। गिनती असुर से खुलती है और देवता पर पूरी होती है। इस उत्सव से किसी को बाहर नहीं रखा गया।

सज्जनों के बहुत से समूह उस दिन सरयू के पवित्र जल में स्नान करते हैं। वे हृदय में सुन्दर श्यामशरीर का ध्यान धरकर राम का नाम जपते हैं। दो काम एक साथ हो रहे हैं: बाहर जल में उतरना, और भीतर मन में रूप रखना। सरोवर का सारा रूपक इसी जोड़ी पर चलेगा, कि जल बाहर है और उसे भीतर ले जाना है।

फिर सरयू की महिमा: वेद और पुराण कहते हैं कि इस नदी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान, चारों पाप हरते हैं। नदी बहुत पवित्र है, महिमा अपार है, और निर्मल बुद्धिवाली शारदा भी उसे कह नहीं सकतीं।

नगर का हिसाब भी छोटा और पक्का है। यह पुरी राम के परमधाम की देनेवाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है, बहुत पावन है। संसार में चार खानियों के अनन्त जीव हैं, और उनमें से जो कोई भी अवध में शरीर छोड़ता है वह फिर संसार में नहीं आता। टीका इन चार खानियों को अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज कहकर गिनाती है।

इस पुरी को सब प्रकार से मनोहर, सब सिद्धियों की देनेवाली और मंगल की खान जानकर कवि ने इस निर्मल कथा का आरम्भ किया। कवि कहते हैं कि इसे सुनते ही काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं। कथा के फल में तीन ही नाम हैं, और उनमें दम्भ भी है, जो भीतर की नहीं, बाहर दिखाने की चीज़ है।

नाम, और नाम के भीतर रखा हुआ नक्शा

अब वह घड़ी आती है जिसमें ग्रन्थ को नाम मिलता है। नाम मिलते ही, बिना एक पल गँवाये, वह नाम एक जगह में बदल जाता है जिसमें कोई गिर सकता है।

इसका नाम रामचरितमानस है, जिसे कान से सुनते ही विश्राम मिल जाता है। मन रूपी हाथी विषय रूपी दावानल में जल रहा है, और यदि वह इस सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाये। सरोवर में सबसे पहले कोई स्नानार्थी या पुण्यात्मा नहीं उतरता। एक जलता हुआ हाथी गिरता है, जो नहाने नहीं, बुझने आया है। यह जल पहले शरण है, बाद में तीर्थ।

फिर बताया जाता है कि यह मानस किसे प्रिय है और किसका बनाया है। यह मुनियों को भाता है, इसे शिव ने रचा, यह सुहावना और पावन है। यह तीनों प्रकार के दोष, दुख और दरिद्रता के साथ कलियुग की कुचालों और सब पापों का नाश करता है। पाप और दोष की इस सूची में दरिद्रता भी रखी गयी है।

शिव ने इसे रचकर अपने मन में रख लिया था, और सुअवसर पाकर पार्वती से कहा। इसी से शिव ने इसे अपने हृदय में देखकर, हर्षित होकर, इसका नाम रामचरितमानस रखा।

और इसमें एक बात चुपचाप कह दी गयी है। नाम तुलसीदास का दिया हुआ नहीं है। वे नामकरण की सूचना दे रहे हैं, नामकरण कर नहीं रहे। ठीक पहले कहा जा चुका है कि इस मानस को रचा भी शिव ने। कवि ने अपने लिये इसकी कथा कहना और उसका आरम्भ करना रखा है। जिस ग्रन्थ को आगे सदियों तक इसी नाम से पुकारा जाना था, उसके कवि ने उस नाम पर अपना दावा पहली ही घड़ी में छोड़ दिया।

फिर श्रोता से सीधा सम्बोधन है: वही सुखद और सुहावनी कथा कहता हूँ, सज्जन आदर के साथ, मन लगाकर सुनिये। दोनों शर्तें सुननेवाले पर हैं, आदर और मन, और ये दो शब्द इस प्रसंग में बार-बार लौटते हैं।

यह मानस जैसा है, जिस विधि से बना है, और जिस कारण से जगत् में इसका प्रचार हुआ, वह सारा प्रसंग अब वे कहते हैं। वे पार्वती और शिव का स्मरण करके कहते हैं। यह बात विषय-सूची है, और इसमें तीन प्रश्न हैं: यह कैसा है, कैसे बना, और जगत् में क्यों फैला। इन्हीं के उत्तर यहाँ से आगे खुलते हैं।

जल कहाँ से आया

अब वही सवाल जो कोई भी उठाता: सरोवर तो ठीक है, पर इसमें पानी आया कहाँ से? उत्तर में कवि पूरा वर्षाचक्र खड़ा कर देते हैं, भूमि, समुद्र, बादल, वर्षा और वह गहरा स्थान, सब अपनी-अपनी जगह पर।

पहले अपनी बात: शिव की कृपा से हृदय में सुन्दर बुद्धि का विकास हुआ, और इसी से यह तुलसीदास रामचरितमानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है, फिर भी सज्जन सुन्दर चित्त से सुनकर इसे सुधार लें। रचना शुरू करने से पहले कवि सुधार की अनुमति माँग रहे हैं। जिस श्रोता को आदर और मन लगाकर सुनने को कहा गया था, वह अब सुधारने के अधिकार के साथ बैठा है।

सुन्दर बुद्धि भूमि है, हृदय उसमें गहरा स्थान है, वेद और पुराण समुद्र हैं, और साधु मेघ हैं। वे मेघ राम के सुयश रूपी जल की वर्षा करते हैं, जो मधुर है, मनोहर है और मंगल करनेवाला है। जल का स्रोत समुद्र है, यानी वेद और पुराण, पर जल सीधे समुद्र से नहीं आता। वह बादल में उठता है, और बादल साधु हैं। शास्त्र अपने आप किसी के हृदय तक नहीं पहुँचता, बीच में वे मनुष्य चाहिये जो उसे उठायें और बरसायें।

फिर इस जल के गुण बाँटे जाते हैं। सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन होता है, वही इस जल की स्वच्छता है जो मैल का नाश करती है। और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इसकी मधुरता और शीतलता है। जो कहा जा सकता है वह जल को साफ़ करता है, और जो कहा नहीं जा सकता वह उसे मीठा और ठंडा करता है।

वह जल सत्कर्म रूपी धान के लिये हितकर है और राम के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धि रूपी पृथ्वी पर गिरा, सिमटकर कान के सुहावने रास्ते से चला। वह श्रेष्ठ मानस में भरकर वहीं ठहर गया, और वहीं पुराना होकर सुखद, शीतल, रुचिकर और सुन्दर हो गया। दो बातें पूरे रूपक को सँभाले हुए हैं। पहली कान का रास्ता। जल भीतर कान की सड़क से आता है, इसलिये इस ग्रन्थ का द्वार सुनना है। दूसरी पुराना पड़ जाना। जल भरते ही अच्छा नहीं होता, ठहरकर होता है। जो सुना, उसे भीतर रखा रहने देना पड़ता है।

और धान याद रखिये, सत्कर्म की फ़सल। धान का खेत इसी रूपक में आगे एक बार फिर खुलेगा, तब उसमें देवकुल का धान होगा, और उसे सींचनेवाली ऋतु कोई और होगी।

चार घाट

सरोवर भर चुका। अब उसमें उतरने की व्यवस्था चाहिये, क्योंकि भरा हुआ जल अपने आप किसी के काम नहीं आता। किनारा फिसलता है, तल का पता नहीं होता। तुलसीदास ठीक इसी जगह घाट बनाते हैं, और देखने की बात यह है कि घाट किस चीज़ के बने हैं।

बुद्धि से विचारकर जो चार उत्तम संवाद रचे गये, वही इस पावन सरोवर के चार मनोहर घाट हैं। कवि इतना ही कहते हैं। टीका इन चारों को नाम देकर गिनाती है: भुशुण्डि और गरुड़, शिव और पार्वती, याज्ञवल्क्य और भरद्वाज, और तुलसीदास तथा संत। नाम टीका के दिये हुए हैं, गिनती और रूप कवि के।

इस जल में उतरने की जगह न कोई सिद्धान्त है, न कोई विधि, न कोई व्रत। घाट संवाद हैं, यानी बातचीत: एक कहनेवाला और एक सुननेवाला, और उनके बीच का रास्ता जिस पर बात आगे बढ़ती है। इस ग्रन्थ में प्रवेश अकेले नहीं होता।

और घाट बनाया जाता है। वह सरोवर का अपना अंग नहीं होता। आदमी उसे गढ़ता है, पत्थर जमाता है, सीढ़ियाँ बाँधता है। ये चारों संवाद भी इस ग्रन्थ के भीतर बने हुए हिस्से हैं, जिन्हें बुद्धि से विचारकर रचा गया है। यह बात कवि साथ ही कह देते हैं।

सरोवर के भीतर क्या-क्या है

घाट के बाद सीढ़ियाँ: सात काण्ड इस सरोवर के सोपान हैं, और ज्ञान की आँख से उन्हें देखते ही मन भर जाता है। फिर कहा जाता है कि राम की जो निर्गुण और निर्बाध महिमा वर्णन की जायेगी, वही इस जल की अथाह गहराई है। सरोवर में गहराई अकेली वही चीज़ है जो दिखती नहीं। ऊपर से जल, कमल और लहरें दिखती हैं, तल नहीं दिखता। और गहराई के खाते में राम का वही रूप रखा गया है जो आँख से नहीं देखा जाता।

राम और सीता का यश अमृत जैसा जल है। जो उपमाएँ इसमें दी गयी हैं वही लहरों का मनोहर विलास हैं। चौपाइयाँ इसमें घनी फैली हुई कमलिनी हैं, और कविता की युक्तियाँ वे सुहावनी सीपियाँ हैं जिनमें मोती बनते हैं। यहाँ रूपक अपने ही ऊपर मुड़ जाता है। ग्रन्थ अपनी ही चौपाइयों को कमलिनी का वह चौड़ा पत्ता बताता है जो जल के ऊपर बिछा रहता है। जो सबसे पहले दिखता है वह चौपाई है, और उसके नीचे वह गहराई है जो अनदेखी बतायी गयी थी।

इसके बाद पूरी सूची चलती है। छन्द, सोरठे और दोहे बहुरंगे कमलों के समूह हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचा भाव और सुन्दर भाषा पराग, मकरन्द और सुगन्ध हैं। पुण्यों के पुंज भौंरों की पंक्तियाँ हैं। ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं, वह पक्षी जिसके बारे में परम्परा कहती है कि वह छाँटना जानता है। कविता की ध्वनि, वक्रोक्ति, गुण और जाति तरह-तरह की मनोहर मछलियाँ हैं।

फिर बड़े नाम आते हैं। अर्थ, धर्म, काम और टीका के अनुसार चौथा मोक्ष, ज्ञान और विज्ञान का विचारपूर्वक कहा जाना। काव्य के नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्य। ये सब इस तालाब के जलचर हैं। पुण्यात्माओं, साधुओं और राम के नाम के गुणों का गान विचित्र जलपक्षियों जैसा है। संतों की सभा चारों ओर की आम की बगीची है, और श्रद्धा वसन्त ऋतु है। तरह-तरह से भक्ति का निरूपण और क्षमा, दया और दम लताओं के मंडप हैं। शम, यम और नियम उनके फूल हैं, ज्ञान फल है, और हरि के चरणों में प्रेम उसी फल का रस है। और जो अनेक प्रसंगों की कथाएँ हैं, वे तोते, कोयलें और रंग-बिरंगे पक्षी हैं।

जो चीज़ें साधना की भाषा में कठोर लगती हैं, यम, नियम, दम, वैराग्य, उन्हें फूल, मंडप और जलचर बनाकर सरोवर के भीतर बिठा दिया गया है। यहाँ एक भी वस्तु देखने में कड़ी नहीं। जिसे बुलाया जा रहा है, वह आग से जला हुआ हाथी है।

कथा में जो रोमांच होता है वही वाटिका, बाग और वन है, और जो सुख होता है वही पक्षियों का विहार। माली है निर्मल मन, जो प्रेम रूपी जल से, नेत्रों के रास्ते, इन बग़ीचों को सींचता है। कान इस रूपक में पहले आ चुके हैं, जल के भीतर आने का रास्ता बनकर, और ज्ञान की आँख भी, जो सीढ़ियाँ देखकर प्रसन्न होती है। यहाँ आँख फिर आती है, और इस बार सींचती है। आँख से गिरनेवाले उस जल का नाम कवि ने नहीं लिखा।

जो इस तट तक नहीं आ पाते

अब तक सब कुछ बुलाने का था। यहाँ से कवि बताते हैं कि इस सरोवर तक पहुँचना कठिन क्यों है, और यह बात किसी को कोसकर नहीं, नक्शे में रास्ता खींचकर कहते हैं। पहले रखवाले और अधिकारी: जो लोग इस चरित्र को सँभालकर गाते हैं वे इस ताल के चतुर रखवाले हैं। और जो स्त्री-पुरुष सदा आदर के साथ इसे सुनते हैं वे इस मानस के अधिकारी उत्तम देवता हैं। इस रूपक में मनुष्य के देवता बनने का रास्ता सुनना है।

जो बहुत दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं। वे इस सरोवर के पास नहीं आते, क्योंकि यहाँ घोंघे, मेढक और सेवार जैसी विषय-रस की नाना कथाएँ नहीं हैं। उन्हें दूर नहीं रखा गया, वे आते ही नहीं, और न आने का कारण भूख है। जिस तालाब में उनका आहार नहीं, वहाँ बगुला क्यों उतरे।

फिर वही बात एक और तरफ़ से: इसी कारण बेचारे कौवे और बगुले रूपी कामी लोग आते-आते हृदय में हार मान जाते हैं। क्योंकि इस सरोवर तक आने में कठिनाई बहुत है, और राम की कृपा के बिना यहाँ आया नहीं जाता। जिन्हें अभी अभागा कहा था, उन्हीं के लिये तुरन्त दया का शब्द आ जाता है, बेचारे।

और अब रास्ते का नक्शा। कठिन कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है। कुसंगियों के वचन बाघ, सिंह और साँप हैं। घर के काम-काज और गृहस्थी के नाना जंजाल बहुत दुर्गम बड़े पहाड़ हैं। मोह, मद और मान बहुत से बीहड़ वन हैं। और नाना प्रकार के कुतर्क भयंकर नदियाँ हैं। इनमें से एक भी बाधा सरोवर के भीतर नहीं, सब रास्ते में हैं। जो रोकता है वह पहुँचने से पहले रोकता है।

जिनके पास श्रद्धा रूपी राह-ख़र्च नहीं है, जिन्हें संतों का साथ नहीं मिला, और जिन्हें राम प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस बहुत अगम है। राह-ख़र्च यात्रा की वह पूँजी है जो रास्ते में खायी जाती है। श्रद्धा दो जगह आती है: रास्ते में वह ख़र्च है, और सरोवर के किनारे वही वसन्त ऋतु है।

आकर भी लौट जानेवाला

अब वह बात आती है जिसे समझने के लिये किसी शास्त्र की ज़रूरत नहीं, केवल आदमी को देखा होना काफ़ी है। मान लीजिये कोई कष्ट उठाकर वहाँ तक पहुँच भी गया। पहुँचते ही उसे नींद रूपी जूड़ी चढ़ जाती है, हृदय में जड़ता रूपी कड़ा जाड़ा लग जाता है। और वह अभागा वहाँ तक जाकर भी स्नान नहीं कर पाता। ठिठुरन और नींद, दोनों जाड़े की चीज़ें हैं, और दोनों आदमी को जल से दूर रखती हैं।

उससे उस सरोवर में न स्नान होता है न जलपान, और वह अभिमान समेत लौट आता है। फिर यदि कोई उससे वहाँ का हाल पूछने आये, तो वह सरोवर की निन्दा करके उसे समझा देता है। आदमी हारकर लौटा, पर साथ अभिमान लाया। और पूछने पर अपनी असमर्थता की नहीं, सरोवर के दोष की बात करता है। नहाया नहीं, और बताने लगा कि पानी कैसा था।

इसके तुरन्त बाद उलटी तस्वीर आती है। वह एक ही शर्त पर टिकी है: ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते जिसे राम कृपा की दृष्टि से देख लेते हैं। वही आदर के साथ इस सरोवर में स्नान करता है और महाघोर त्रिताप से नहीं जलता। बाधाओं की लम्बी सूची के सामने कवि ने एक चीज़ रखी है, और वह पानेवाले के हाथ में नहीं है। यही पहले भी कहा जा चुका था, कि राम की कृपा बिना यहाँ आया नहीं जाता।

जिनके मन में राम के चरणों में प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। और फिर सीधा आदेश: हे भाई, जो इस सरोवर में नहाना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे। आदर से सुनने और सुनकर सुधार लेने की बात सज्जनों से पहले कही जा चुकी थी। नहाने की चाह रखनेवाले के लिये यहाँ एक ही काम बताया गया है। घाट संवाद थे, और अब उतरने की विधि सत्संग है। एक बार चित्र बनाकर, एक बार हाथ पकड़कर, बात एक ही कही गयी है।

संतों को देखिये तो इस चित्र में वे पाँच जगह खड़े मिलेंगे। राम के सुयश का जल बरसानेवाले मेघ वही हैं। सरोवर के चारों ओर की अमराई वही हैं। रास्ते में जिनका साथ न हो तो मानस अगम हो जाता है, वही हैं। भीतर उतरने की विधि उन्हीं का संग है। और आगे नदी के किनारे जो अनुपम नगर बसा मिलेगा, वह भी वही निकलेंगे। जिसके बिना बाक़ी सब बेकार हो जाता, उसे हर ओर से रख दिया गया है।

सरोवर से निकली हुई नदी

अब तक कवि किनारे पर खड़े होकर बता रहे थे। यहाँ वे उतर जाते हैं। ऐसे मानस को हृदय के नेत्रों से देखकर और उसमें डुबकी लगाकर कवि की बुद्धि निर्मल हो गयी। हृदय में आनन्द और उत्साह भर आया, और प्रेम तथा प्रमोद का प्रवाह उमड़ पड़ा। यहाँ मानस शब्द दो बार आता है, एक बार सरोवर के अर्थ में और एक बार मन के अर्थ में, और कवि उन्हें अलग नहीं करते।

और डुबकी लगते ही सरोवर स्थिर नहीं रहता। भरा हुआ जल सीमा से ऊपर उठता है तो बाहर निकलता है, और निकलते ही उसका नाम बदल जाता है।

उससे वह कविता रूपी नदी बह निकली, जिसमें राम का निर्मल यश रूपी जल भरा है। इस नदी का नाम सरयू है, जो सब मंगलों की जड़ है, और लोकमत तथा वेदमत इसके दो किनारे हैं। नदी को दो किनारे चाहिये, वरना वह बाढ़ हो जाती है। इस कविता के दो किनारे लोक का कहा हुआ और वेद का कहा हुआ हैं। इस धारा को वे आगे मानस की कन्या कहते हैं, जो कलियुग के पाप रूपी तिनकों और पेड़ों को जड़ से उखाड़ फेंकती है।

अब पूरा रूपक अपने शुरू पर लौट आता है। सरोवर बना, उससे नदी निकली, नदी का नाम सरयू पड़ा। और नदी के किनारे जो नगर बसा वह अयोध्या है, वही अयोध्या जिससे यह प्रसंग खुला था। वहीं चैत्र की नवमी को कथा आरम्भ हुई, और वहीं सज्जन सरयू में नहाकर नाम जप रहे थे।

फिर इस नगर की गिनती यों की जाती है: तीन प्रकार के श्रोताओं का समाज ही इस नदी के दोनों किनारों पर बसे पुरवे, गाँव और नगर हैं। और संतों की सभा ही वह अनुपम अयोध्या है जो सब मंगलों की जड़ है। नदी के किनारे बस्ती है, और बस्ती सुननेवाले लोग हैं।

उस नदी में क्या-क्या बहता है

नदी बह चली, और अब जो होता है वह भूगोल जैसा सच्चा है। कीर्ति रूपी सुहावनी सरयू जाकर रामभक्ति रूपी गंगा में मिलती है। लक्ष्मण सहित राम के युद्ध का पवित्र यश सोन नाम का महानद बनकर उसी में आ मिलता है। दोनों के बीच भक्ति की धारा ज्ञान और वैराग्य के साथ शोभा पाती है। तीनों तापों को डरानेवाली यह तिमुहानी नदी राम के स्वरूप रूपी समुद्र की ओर बह रही है। सारी यात्रा का ठिकाना कोई तीर्थ या लोक नहीं, राम का अपना रूप है।

इसके बाद नदी के किनारे-किनारे कथा का सामान सजने लगता है। बीच-बीच की विचित्र कथाएँ किनारे के वन और बाग़ हैं। पार्वती और शिव के विवाह के बराती असंख्य जलचर हैं। राम के जन्म की आनन्द-बधाइयाँ भँवर और तरंगों की मनोहरता हैं। चारों भाइयों के बालचरित खिले हुए रंग-बिरंगे कमल हैं, और राजा, रानियों तथा कुटुम्बियों के सत्कर्म भौंरे और जलपक्षी हैं। राजा का नाम नहीं लिया जाता। दशरथ का नाम टीका देती है।

फिर सीता के स्वयंवर की कथा आती है, जिसकी छबि नदी पर छायी हुई है। अनेक विवेकपूर्ण प्रश्न इस नदी की नावें हैं, और उनके विवेकयुक्त उत्तर कुशल केवट। नाव अपने आप कहीं नहीं जाती, और केवट बिना नाव के किसी को पार नहीं उतारता। जो पूछता है वह आधा काम करता है।

इसके बाद कथा सुनकर जो आपस में चर्चा होती है, वही किनारे-किनारे चलते यात्रियों का समाज है। और ठीक यहीं, जहाँ सब कुछ शान्त चल रहा था, नदी का सबसे ख़तरनाक हिस्सा आता है।

परशुराम का क्रोध इस नदी की भयानक धार है, और राम के श्रेष्ठ वचन उसके बँधे हुए घाट हैं। क्रोध धार है, जो बहाती है और किनारा काटती है। राम की बात घाट है, जो पत्थर से जमायी जाती है और किनारे को कटने से बचाती है। और जहाँ धार सबसे तेज़ है, वहीं कवि ने घाट रखा है।

आगे राम और उनके भाइयों के विवाह का उत्साह इस नदी की वह मंगलकारी बाढ़ है जो सबको सुख देती है। और जो कहते-सुनते हुए हर्षित और पुलकित होते हैं वे ही पुण्यात्मा हैं जो प्रसन्न मन से इसमें नहाते हैं। फिर राजतिलक का मंगल-साज आता है, जो पर्व के दिन जुटे यात्रियों के समूह जैसा है। और उसी के साथ: कैकेयी की कुबुद्धि इस नदी की काई है, जिसका फल बड़ी भारी विपत्ति हुई।

काई जल को गन्दा नहीं करती। वह घाट की सीढ़ी पर जमती है और पैर फिसला देती है। पूरे प्रसंग में फिसलने का सामान एक ही जगह रखा गया है, ठीक वहाँ जहाँ राजतिलक की तैयारी हो रही है।

फिर यह हिस्सा यों बँधता है: अनगिनत उत्पातों को शान्त करनेवाला भरत का चरित्र नदी-तट पर किया जानेवाला जपयज्ञ है। और कलियुग के पापों तथा दुष्टों के अवगुणों के जो वर्णन हैं वे ही इस जल का कीचड़ और बगुले-कौए हैं। कीचड़ और काई को कवि ने नदी से बाहर नहीं फेंका, क्योंकि जो नदी सच में बहती है उसमें ये होते हैं।

छहों ऋतुएँ

अब कवि कथा के बड़े पड़ाव एक और पैमाने पर इसी नदी पर बिछा देते हैं, ऋतुओं के। यह कीर्ति की नदी छहों ऋतुओं में सुन्दर है, हर समय सुहावनी और बहुत पावन। शिव और पार्वती का विवाह इसमें हेमन्त है। राम के जन्म का उत्सव सुखद शिशिर है। राम के विवाह-समाज का वर्णन आनन्दमय ऋतुराज वसन्त है। राम का वनगमन दुःसह ग्रीष्म है, और मार्ग की कथा कड़ी धूप और लू। राक्षसों के साथ घोर युद्ध वर्षा है। और राम के राज्य का सुख, विनय तथा बड़ाई निर्मल और सुहावनी शरद है।

ऋतुएँ अपने आप लौटती हैं और उनका चक्र पूरा होता है। कथा को इस चक्र पर बिठाकर कवि उसे एक वर्ष की तरह रख देते हैं, जो हर बार फिर से शुरू होता है।

और वर्षा पर रुकिये। राक्षसों के साथ का घोर युद्ध वर्षा कहा गया है, और वही देवकुल रूपी धान के लिये सुमंगलकारी। धान का खेत पहले भी आया था, जब कहा गया था कि राम के सुयश का जल सत्कर्म रूपी धान के लिये हितकर है। अब धान देवकुल है, और उसे सींचनेवाली ऋतु युद्ध है। भयानक वर्षा ही फ़सल देती है, और दोनों बातें एक ही साँस में कही गयी हैं।

ऋतुओं के बाद जल के गुण बाँटे जाते हैं। सीता के गुणों की कथा इस जल का निर्मल और अनुपम गुण है। भरत का स्वभाव इसकी शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं हो सकता। और फिर कहा जाता है कि चारों भाइयों का आपस में देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरे से प्रेम करना, हँसना और उनका भाईपन ही इस जल की मधुरता और सुगन्ध है। स्वाद और गन्ध, यानी जो चखकर और पास जाकर जाने जाते हैं, चारों भाइयों के हिस्से में आये हैं।

भरत को जो गुण मिला है वह ख़ास है। शीतलता जल का वह गुण है जिसका पता उतरने के बाद चलता है, देखने से नहीं, और एकरस हो तो और भी कम दिखता है।

जल का हलकापन

पूरा सरोवर बन चुका, नदी बह चुकी, ऋतुएँ बीत चुकीं। अब कवि अपने को इस जल में कहाँ रखते हैं, यह देखिये। उनका आर्तभाव, उनकी विनय और उनकी दीनता इस जल का हलकापन है। और वह थोड़ा नहीं है। जल के सारे गुणों में से अपने लिये उन्होंने वह चुना जो सुनने में गुण भी नहीं लगता। पर हलकेपन से ही जल ऊपर उठता है, बादल बनता है और फिर बरसता है।

फिर इस जल का पूरा हिसाब एक बार में: यह अनोखा जल सुनने मात्र से गुण करता है। वह आशा रूपी प्यास और मन का मैल दोनों हर लेता है। यह राम के प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के सब पाप और उनसे उपजी ग्लानि हर लेता है। यह संसार का श्रम सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है, और पाप, दुख, दरिद्रता तथा दोष का नाश करता है। यह काम, क्रोध, मद और मोह को मिटाता है और निर्मल विवेक तथा वैराग्य बढ़ाता है। आदर के साथ इसमें स्नान करने और इसे पीने से हृदय के भीतर बैठे पाप और ताप मिट जाते हैं।

और इसके ठीक बाद, जहाँ सरोवर का वर्णन समाप्त होने को है, कवि एक ऐसा चित्र रखते हैं जिस पर रुकना पड़ता है।

जिन्होंने इस जल से अपना मानस नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के हाथों ठगे गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्य की किरणों से बनी रेत की चमक को जल समझकर दौड़ता है और दुखी होता है, वैसे ही वे जीव भटकते रहेंगे। बहुत देर से जल की ही बात चल रही थी, और उसका अन्तिम चित्र उस जल का है जो है ही नहीं। और जिन्होंने नहीं धोया, उन्हें मूर्ख नहीं, कायर कहा गया। उनका दोष बुद्धि का नहीं, हिम्मत का बताया गया।

अपनी बुद्धि के अनुसार इस जल के गुण गिनकर, उसमें अपना मन नहलाकर, और पार्वती तथा शिव का स्मरण करके कवि कथा कहता है। और फिर दरवाज़ा खुल जाता है: अब राम के चरणकमल हृदय में धरकर और उनका प्रसाद पाकर मैं दो श्रेष्ठ मुनियों के मिलने का संवाद कहता हूँ। उन दोनों का नाम नहीं लिया जाता। टीका ने चार घाटों में एक याज्ञवल्क्य और भरद्वाज का संवाद भी गिनाया था, और अगला प्रसंग इन्हीं दो मुनियों से खुलता है। सरोवर का नक्शा दिखा चुकने के बाद कवि पाठक का हाथ पकड़कर एक घाट की सीढ़ी पर रख रहे हैं।

इस पूरे प्रसंग को एक साथ पढ़ने पर एक बात ऊपर रह जाती है। यहाँ कोई पहरेदार नहीं है। सरोवर के चारों ओर न दीवार है, न द्वारपाल। रखवाले हैं, पर वे गानेवाले हैं, रोकनेवाले नहीं। जो नहीं आते, वे इसलिये नहीं आते कि यहाँ उनके मतलब की चीज़ नहीं है। जो आकर लौट जाते हैं, वे ठिठुरकर लौटते हैं। और जो उतरते हैं उनके हिस्से में वही दो शब्द फिर आते हैं जो शुरुआत में सज्जनों से माँगे गये थे, आदर और लगा हुआ मन। कृपा पानेवाला आदर से स्नान करता है, और जो नहाना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे।

दूसरी बात उस दावे की है जिसे कवि यहाँ बहुत छोटा करके रखते हैं। सरोवर शिव ने बनाया, नाम भी शिव ने रखा, जल वेद और पुराण के समुद्र से आया और उसे उठाकर बरसानेवाले साधु थे। इन सबके बीच तुलसीदास अपने लिये एक तिथि और एक नगर दर्ज करते हैं। वे अपनी दीनता को जल का हलकापन कहते हैं। और वे अपने को रामचरितमानस का कवि कहते भी हैं तो शिव की कृपा से उपजी सुन्दर बुद्धि के सहारे। और यह कहकर कि वे इसे अपनी बुद्धि के अनुसार ही मनोहर बनाते हैं। उनकी कविता भी उसी मानस से निकली। उन्होंने उसमें डुबकी लगायी, उनकी बुद्धि निर्मल हुई, और तब कविता की नदी बह निकली।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 34 से 43, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।