रामचरितमानस · बालकाण्ड · मानस-सरोवर का रूपक
मानस-सरोवर का रूपक
जिस दिन और जिस नगर में यह कथा आरम्भ हुई, जिस नाम पर यह पूरा ग्रन्थ खड़ा है, और वह सरोवर जिसके चार घाट, सात सीढ़ियाँ और एक निकलती हुई नदी तुलसीदास ने दस दोहों में बाँध दी।
इस पन्ने पर कोई युद्ध नहीं है, कोई वर नहीं माँगा जाता, किसी को शाप नहीं मिलता। यहाँ एक ग्रन्थ अपना नाम रखता है, और नाम रखते ही वह नाम एक जगह बन जाता है। दस दोहों तक तुलसीदास एक ही चित्र पर टिके रहते हैं: एक सरोवर, जिसके चार घाट हैं और सात सीढ़ियाँ, जिसमें कमल खिले हैं, हंस तैरते हैं, मछलियाँ चलती हैं, जिसके चारों ओर आम की बगीचियाँ हैं, और जिसमें से एक नदी निकलकर बहुत दूर तक चली जाती है। यह चित्र सजावट नहीं है। यह उस पूरे ग्रन्थ का नक्शा है जिसे आप पढ़ने जा रहे हैं, और नक्शा इतना ठीक बनाया गया है कि आगे का हर काण्ड इसी में कहीं न कहीं रखा हुआ मिल जाता है।
बात की शुरुआत बहुत ठोस जगह से होती है। कवि संवत् बताते हैं, वार बताते हैं, महीना और तिथि बताते हैं, और नगर का नाम लेते हैं। उसके बाद ही सरोवर खुलता है, और तब समझ में आता है कि यह क्रम जानबूझकर रखा गया था। जिस दिन की बात है उस दिन, वेद के कहे अनुसार, सारे तीर्थ चलकर अयोध्या आ जाते हैं। यानी कथा वहाँ से आरम्भ होती है जहाँ उस दिन सारा तीर्थजल पहले से इकट्ठा है। जल की बात जल में खड़े होकर कही जा रही है, और अगले ही दोहे से वह जल रूपक बन जाता है।
और नाम पर ठहरिये। मानस एक ही शब्द में दो चीज़ें कह देता है: वह सरोवर जिसे संसार मानसरोवर कहता है, और वह भीतरी मन जिसे शास्त्र मानस कहता है। तुलसीदास इस दुहरेपन को छोड़ते नहीं, पूरा रूपक उसी पर खड़ा कर देते हैं। जल ऊपर से बरसता है, कान के रास्ते भीतर आता है, और हृदय में भरकर ठहर जाता है। इसलिये यह प्रसंग पढ़ते हुए यह याद रखना पड़ता है कि सरोवर बाहर भी है और भीतर भी, और दोनों एक ही साँस में कहे जा रहे हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- तुलसीदास इस कथा के कवि, जो यहाँ अपनी तिथि, अपना नगर और अपनी दीनता तीनों दर्ज कर देते हैं।
- शंभु जिन्होंने यह मानस रचकर पहले अपने ही मन में रख लिया था, और जिनका रखा हुआ नाम आज तक इस ग्रन्थ पर है।
- उमा शिव की वे श्रोता जिन्हें सुअवसर पाकर यह कथा सुनायी गयी, और जिनका स्मरण करके कवि आगे बढ़ते हैं।
- राम वे, जिनका सुयश इस सरोवर का जल है, और जिनकी कृपा के बिना इस तट तक कोई नहीं पहुँचता।
- सरजू अयोध्या की नदी, जो इस पन्ने पर दो बार आती है: एक बार जल बनकर और एक बार कविता बनकर।
- संत-समाज इस रूपक में चार जगह खड़े मिलते हैं: सरोवर के चारों ओर की बगीची बनकर, राह के साथी बनकर, भीतर आने की विधि बनकर, और नदी के किनारे बसा नगर बनकर।
तिथि, वार और नगर
पन्ना खुलते ही कवि एक पुराना हिसाब पूरा करते हैं। इस प्रकार सब संशय दूर करके, गुरु के चरणकमलों की धूल सिर पर धरकर, वे फिर से हाथ जोड़कर सबसे विनती करते हैं। और विनती का विषय देखिये। वे यह नहीं माँगते कि कथा सुन्दर बने, न यह कि वह दूर तक जाये। वे केवल इतना माँगते हैं कि कथा की रचना में कोई दोष न लग जाये। जो आदमी अपने काम के लिये इतना ही माँगे, वह उस काम को अपना नहीं मान रहा है। वह उसे किसी और की धरोहर मानकर छू रहा है।
इसके बाद वे शिव को माथा नवाते हैं, और सिर नवाते ही तिथि दर्ज कर देते हैं।
सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा॥
चौपाई १
संबत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरि सीसा॥
आदरपूर्वक शिव को सिर नवाकर अब वे राम के गुणों की निर्मल गाथा कहते हैं, और हरि के चरणों पर सिर रखकर संवत् सोलह सौ इकतीस में इस कथा का आरम्भ करते हैं। इस एक अर्धाली का भार कम मत आँकिये। जो कवि अपने ग्रन्थ के भीतर अपने ग्रन्थ के शुरू होने का वर्ष लिख दे, वह पाठक से एक बात साफ़ कह रहा है: यह कथा अनादि है, पर यह पोथी एक दिन शुरू हुई थी, और वह दिन यह रहा। कथा को काल से बाहर रखकर, पोथी को काल के भीतर बिठा दिया गया है।
अगली अर्धाली दिन और जगह देती है। चैत्र की नवमी, मंगलवार, और अयोध्यापुरी। फिर तुरन्त यह भी बता दिया जाता है कि यही दिन क्यों चुना गया। वेद गाते हैं कि जिस दिन राम का जन्म होता है, उस दिन सारे तीर्थ वहाँ चले आते हैं। और केवल तीर्थ नहीं आते। असुर, नाग, पक्षी, मनुष्य, मुनि और देवता, सब आकर रघुनाथ की सेवा करते हैं, बुद्धिमान लोग जन्म का महोत्सव रचते हैं और राम की सुन्दर कीर्ति का गान करते हैं। गिनती पर ध्यान दीजिये: वह असुर से खुलती है और देवता पर जाकर पूरी होती है। जिस उत्सव की सूची असुर से शुरू होती हो, उसमें किसी को बाहर रखने का इरादा नहीं है।
मज्जहिं सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर।
दोहा ३४
जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर॥ ३४॥
सज्जनों के बहुत से समूह उस दिन सरयू के पवित्र जल में स्नान करते हैं, और हृदय में सुन्दर श्यामशरीर का ध्यान धरकर राम का नाम जपते हैं। इस दोहे में दो काम एक साथ हो रहे हैं। एक बाहर का, जल में उतरना। एक भीतर का, मन में रूप रखना। यही जोड़ी आगे इस पूरे प्रसंग की रीढ़ बनेगी, क्योंकि सरोवर का सारा रूपक इसी पर चलता है कि जल बाहर है और उसे भीतर ले जाना है।
फिर सरयू की महिमा दो पंक्तियों में कह दी जाती है। वेद और पुराण कहते हैं कि इस नदी का दर्शन, स्पर्श, स्नान और जलपान, चारों पाप हरते हैं। नदी अत्यन्त पवित्र है, महिमा अपार है, और निर्मल बुद्धिवाली शारदा भी उसे कह नहीं सकतीं। यह अन्तिम बात कवि के लिये बड़े काम की है। जिस विषय को सरस्वती नहीं कह पातीं, उसे कहने बैठा हुआ आदमी अपनी सीमा पहले ही मान चुका है, और वही मानना उसे आगे बहुत जगह बचाता है।
नगर का हिसाब भी इसी तरह छोटा और पक्का है। यह पुरी राम के परमधाम की देनेवाली है, सब लोकों में प्रसिद्ध है, अत्यन्त पावन है। संसार में चार खानियों के अनन्त जीव हैं, और उनमें से जो कोई भी अवध में शरीर छोड़ता है वह फिर संसार में नहीं आता। टीका इन चार खानियों को अण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज और जरायुज कहकर गिनाती है। चौपाई इतना विस्तार नहीं देती, वह केवल चारि खानि कहकर आगे बढ़ जाती है, और आगे बढ़ते ही वह बात कहती है जिसके लिये यह सारा नगर-वर्णन रखा गया था।
इस पुरी को सब प्रकार से मनोहर, सब सिद्धियों की देनेवाली और मंगल की खान जानकर उन्होंने इस निर्मल कथा का आरम्भ किया, और चौपाई कहती है कि इसे सुनते ही काम, मद और दम्भ नष्ट हो जाते हैं। यहाँ पहली बार कथा का फल गिनाया गया है, और गिनती में तीन ही नाम हैं। काम, मद, दम्भ। इनमें से दो भीतर की चीज़ें हैं और तीसरी बाहर दिखाने की। दम्भ को इस सूची में रखना खास है, क्योंकि जो आदमी धर्म-कथा सुनने बैठता है उसे सबसे पहले जिस रोग का ख़तरा है, वह यही है।
सार: कथा संवत् सोलह सौ इकतीस में, चैत्र की नवमी को, मंगलवार के दिन, अयोध्या में आरम्भ होती है। उसी दिन सब तीर्थ वहाँ आ जुटते हैं, असुर से लेकर देवता तक सब राम की सेवा में लगते हैं, और सज्जन सरयू में नहाकर मन में श्यामरूप धरकर नाम जपते हैं। नगर, तिथि और जल तीनों बता देने के बाद कवि कहते हैं कि इसी पुरी को मंगल की खान जानकर उन्होंने यह कथा आरम्भ की।
नाम, और नाम के भीतर रखा हुआ नक्शा
अब वह पंक्ति आती है जिसके बाद इस ग्रन्थ को पुकारने का ढंग बदल जाता है। नाम दिया जाता है, और नाम देने के तुरन्त बाद, बिना एक भी पंक्ति गँवाये, वह नाम एक जगह में बदल जाता है जिसमें कोई गिर सकता है।
रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा॥
चौपाई २
मन करि बिषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौं एहिं सर परई॥
इसका नाम रामचरितमानस है, जिसे कान से सुनते ही विश्राम मिल जाता है। मन रूपी हाथी विषय रूपी दावानल में जल रहा है, और यदि वह इस सरोवर में आ पड़े तो सुखी हो जाये। रूपक की पहली ईंट यही है, और देखिये कि उसमें कौन उतारा गया है। सरोवर में सबसे पहले कोई स्नानार्थी नहीं उतरता, कोई पुण्यात्मा नहीं उतरता। सबसे पहले एक जलता हुआ हाथी गिरता है, जो नहाने नहीं, बुझने आया है। यानी यह जल पहले शरण है, बाद में तीर्थ। और हाथी ही क्यों चुना गया, यह भी सोचने लायक़ है। जंगल का सबसे बड़ा प्राणी, जो आग से भाग तो सकता है पर छिप नहीं सकता, और जिसे बुझाने के लिये छोटा जल काफ़ी नहीं होता।
अगली दो अर्धालियाँ बताती हैं कि यह मानस किसका प्रिय है और किसका बनाया हुआ है। यह मुनियों को भाता है, इसे शम्भु ने रचा, यह सुहावना है और पावन है, और यह तीनों प्रकार के दोष, दुख और दरिद्रता के साथ-साथ कलियुग की कुचालों और सब पापों का नाश करनेवाला है। इस सूची में एक शब्द चौंकाता है: दरिद्रता। पाप और दोष के साथ दरिद्रता को रख देना उस आदमी का काम है जिसने दरिद्रता को पास से देखा हो और उसे केवल धन की कमी न समझा हो।
रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा॥
चौपाई ३
तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर॥
महादेव ने इसे रचकर अपने मन में रख लिया था, और सुअवसर पाकर शिवा से कहा। इसी से शिव ने इसे अपने हृदय में देखकर, हर्षित होकर, इसका सुन्दर नाम रामचरितमानस रखा। पंक्ति का अन्तिम भाग सुनने की चीज़ है: हियँ हेरि हरषि हर। चार शब्द, चारों ह से, और चारों मिलकर वह काम करते हैं जो अर्थ अकेला नहीं कर पाता। नाम रखने की घड़ी सुनने में भी प्रसन्न लगती है।
और इसमें एक बात चुपचाप कह दी गयी है जिसे पकड़ लेना चाहिये। नाम तुलसीदास का दिया हुआ नहीं है। वे नामकरण की सूचना दे रहे हैं, नामकरण कर नहीं रहे। इससे पहले उन्होंने रचना का श्रेय भी अपने पास नहीं रखा था, रचा शम्भु ने। जिस ग्रन्थ को आगे सदियों तक इसी नाम से पुकारा जाना था, उसके कवि ने उस नाम पर अपना दावा पहली ही घड़ी में छोड़ दिया।
फिर एक अकेली अर्धाली आती है, जिसमें श्रोता से सीधा सम्बोधन है। वही सुखद और सुहावनी कथा वे कहते हैं, और सज्जनों से कहते हैं कि आदर के साथ, मन लगाकर सुनिये। दो शर्तें हैं और दोनों सुननेवाले पर हैं: आदर, और मन। इस पूरे प्रसंग में श्रोता से कुल जितना माँगा जाता है, वह इन्हीं दो शब्दों से शुरू होकर आगे बहुत बार लौटता है।
जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु।
दोहा ३५
अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु॥ ३५॥
यह मानस जैसा है, जिस विधि से बना है, और जिस कारण से जगत् में इसका प्रचार हुआ, अब वही सारा प्रसंग वे उमा और वृषकेतु का स्मरण करके कहते हैं। इस दोहे को ध्यान से पढ़िये, क्योंकि यह विषय-सूची है। तीन प्रश्न रखे गये हैं। यह कैसा है, यह कैसे बना, और यह फैला क्यों। और अब यह देखिये कि इनका उत्तर कहाँ मिलता है। पहले प्रश्न का उत्तर यही पन्ना है, यानी सरोवर का पूरा वर्णन। बाक़ी दो प्रश्नों के उत्तर में आगे का पूरा बालकाण्ड चला जाता है, क्योंकि यह कैसे बना और क्यों फैला, इन्हीं दो सवालों से वे संवाद निकलते हैं जो आगे आने हैं।
सार: ग्रन्थ का नाम रामचरितमानस पड़ता है, और नाम पड़ते ही वह सरोवर बन जाता है जिसमें विषय की आग से जलता हुआ मन रूपी हाथी आकर गिर सकता है। रचा शम्भु ने, नाम भी शिव ने रखा, कवि केवल सूचना दे रहे हैं। दोहा पैंतीस तीन प्रश्न रखता है: यह कैसा है, कैसे बना, और जगत् में क्यों फैला।
जल कहाँ से आया
अब कवि वही सवाल उठाते हैं जो कोई भी उठाता: सरोवर तो ठीक है, पर इसमें पानी आया कहाँ से। और उत्तर में वे पूरा वर्षाचक्र खड़ा कर देते हैं, जिसमें भूमि, समुद्र, बादल, वर्षा और अन्त में वह गड्ढा सब अपनी-अपनी जगह पर हैं।
पहले अपनी बात। शिव की कृपा से उस हृदय में सुन्दर बुद्धि का विकास हुआ, और इसी से यह तुलसीदास रामचरितमानस का कवि हुआ। अपनी बुद्धि के अनुसार तो वह इसे मनोहर ही बनाता है, फिर भी सज्जन सुन्दर चित्त से सुनकर इसे सुधार लें। यहाँ ठहरकर देखिये: कवि रचना शुरू करने से पहले सुधार की अनुमति माँग रहे हैं। यह विनय का शिष्टाचार भर नहीं है। जो आदमी पहले से सुधार माँग ले, उसने अपने पाठक को सहकर्मी मान लिया है, और वह श्रोता जिसे आदर और मन लगाकर सुनने को कहा गया था, अब सुधारने के अधिकार के साथ बैठा है।
सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू॥
चौपाई ४
बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी॥
सुन्दर बुद्धि भूमि है, हृदय ही उसमें गहरा स्थान है, वेद और पुराण समुद्र हैं, और साधु मेघ हैं। वे मेघ राम के सुयश रूपी सुन्दर जल की वर्षा करते हैं, जो मधुर है, मनोहर है और मंगल करनेवाला है। पूरी मशीन एक बार में खड़ी हो गयी। ध्यान रखिये कि जल का स्रोत समुद्र है, यानी वेद और पुराण, पर जल सीधे समुद्र से नहीं आता। वह पहले बादल में उठता है, और बादल साधु हैं। यानी शास्त्र जहाँ रखा है वहाँ से वह अपने आप किसी के हृदय तक नहीं पहुँचता। बीच में कोई चाहिये जो उसे उठाये और बरसाये, और वह कोई कोई संस्था नहीं है, वह मनुष्य हैं।
अगली चौपाई इस जल के गुण बाँटती है, और बँटवारा बड़ा साफ़ है। सगुण लीला का जो विस्तार से वर्णन करते हैं, वही इस जल की स्वच्छता है जो मैल का नाश करती है। और जिस प्रेमाभक्ति का वर्णन नहीं किया जा सकता, वही इस जल की मधुरता और सुन्दर शीतलता है। यानी जो कहा जा सकता है वह जल को साफ़ करता है, और जो कहा नहीं जा सकता वह उसे मीठा और ठंडा करता है। कथा का जो हिस्सा सुनाया जाता है, वह मैल हटाता है। जो हिस्सा सुनाया नहीं जा सकता, उसी से वह पीने लायक़ बनता है।
सो जल सुकृत सालि हित होई । राम भगत जन जीवन सोई॥
चौपाई ५
मेधा महि गत सो जल पावन । सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन॥
भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना॥
वह जल सत्कर्म रूपी धान के लिये हितकर है और राम के भक्तों का तो जीवन ही है। वह पवित्र जल बुद्धि रूपी पृथ्वी पर गिरा, सिमटकर कान के सुहावने रास्ते से चला, श्रेष्ठ मानस में भरकर वहीं ठहर गया, और वहीं पुराना होकर सुखद, शीतल, रुचिकर और सुन्दर हो गया। इस अर्धाली में दो शब्द पूरे रूपक को सँभाले हुए हैं। पहला है श्रवन मग। जल भीतर आँख से नहीं आता, तर्क से नहीं आता, कान की सड़क से आता है, इसलिये इस ग्रन्थ का असली द्वार सुनना है। दूसरा शब्द है चिराना, यानी पुराना पड़ जाना। जल भरते ही अच्छा नहीं होता, ठहरकर होता है। जो सुना, वह उसी घड़ी काम नहीं करता। उसे भीतर रखा रहने देना पड़ता है।
और धान का ज़िक्र याद रखिये। सुकृत सालि, सत्कर्म की फ़सल। यह खेत इस पन्ने पर बहुत आगे जाकर एक बार फिर खुलेगा, और तब उसे सींचनेवाली ऋतु कोई और होगी।
सार: जल का चक्र यों है: सुन्दर बुद्धि भूमि, हृदय उसका गहरा स्थान, वेद-पुराण समुद्र, साधु मेघ, और राम का सुयश वह जल जो बरसता है। सगुण लीला उसकी स्वच्छता है और अकथ प्रेमभक्ति उसकी मिठास और ठंडक। वह जल कान के रास्ते भीतर आता है, हृदय में भरकर ठहरता है, और ठहरकर पुराना होने पर ही मीठा होता है।
चार घाट
सरोवर भर चुका। अब उसमें उतरने की व्यवस्था बननी चाहिये, क्योंकि भरा हुआ जल अपने आप किसी के काम नहीं आता। किनारा फिसलता है, तल का पता नहीं होता, और गहरे में उतरने की हिम्मत तब आती है जब पैर के नीचे कुछ बना हुआ हो। तुलसीदास ठीक इसी जगह घाट बनाते हैं, और घाट किस चीज़ के बने हैं, यह इस पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी बात है।
सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि।
दोहा ३६
तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि॥ ३६॥
बुद्धि से विचारकर जो चार अत्यन्त सुन्दर और उत्तम संवाद रचे गये, वही इस पावन सरोवर के चार मनोहर घाट हैं। दोहा इतना ही कहता है। टीका इन चारों को नाम देकर गिनाती है: भुशुण्डि और गरुड़, शिव और पार्वती, याज्ञवल्क्य और भरद्वाज, और तुलसीदास तथा संत। नाम टीका के दिये हुए हैं, गिनती और रूप दोहे के।
अब देखिये कि यहाँ क्या कह दिया गया है। इस जल में उतरने की जगह न कोई सिद्धान्त है, न कोई विधि, न कोई व्रत। घाट संवाद हैं, यानी बातचीत। दो लोग, एक पूछनेवाला और एक कहनेवाला, और उनके बीच का वह रास्ता जिस पर चलकर बात आगे बढ़ती है। चार बार यही ढाँचा दोहराया गया है, और चारों बार पूछनेवाला अलग है। इसका अर्थ यह हुआ कि इस ग्रन्थ में प्रवेश अकेले नहीं होता। जो अकेला खड़ा होकर पढ़ेगा उसे किनारा तो मिलेगा, घाट नहीं।
और घाट की एक बात और है, जो चौपाई में नहीं कही गयी पर घाट के होने से ही निकलती है। घाट बनाया जाता है। वह नदी या सरोवर का अपना अंग नहीं होता, आदमी उसे गढ़ता है, पत्थर जमाता है, सीढ़ियाँ बाँधता है। इसलिये ये चारों संवाद इस ग्रन्थ के भीतर बने हुए हिस्से हैं, जिन्हें किसी ने बैठकर बुद्धि बिचारि रचा है, और यह बात कवि खुद उसी पंक्ति में कह देते हैं।
सार: सरोवर के चार घाट वे चार संवाद हैं जो सोच-विचारकर रचे गये। टीका इन्हें भुशुण्डि-गरुड़, शिव-पार्वती, याज्ञवल्क्य-भरद्वाज और तुलसीदास-संत के संवाद बताती है। जल में उतरने की जगह इस ग्रन्थ में कोई विधि नहीं, बातचीत है।
सरोवर के भीतर क्या-क्या है
घाट के बाद सीढ़ियाँ। सात काण्ड ही इस सरोवर के सुन्दर सोपान हैं, और ज्ञान की आँख से उन्हें देखते ही मन भर जाता है। फिर एक बात कही जाती है जिस पर रुकना चाहिये। रघुनाथ की जो निर्गुण और निर्बाध महिमा वर्णन की जायेगी, वही इस जल की अथाह गहराई है। सरोवर में गहराई अकेली वही चीज़ है जो दिखती नहीं। ऊपर से जल दिखता है, कमल दिखते हैं, लहरें दिखती हैं, तल नहीं दिखता। और गहराई के खाते में तुलसीदास ने राम का ठीक वही रूप रखा है जो आँख से नहीं देखा जाता। जो अनदेखा है वह उस जगह रखा गया है जो अनदेखी रहती है।
राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम॥
चौपाई ६
पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई॥
राम और सीता का यश अमृत जैसा जल है। जो उपमाएँ इसमें दी गयी हैं वही लहरों का मनोहर विलास हैं। सुन्दर चौपाइयाँ इसमें घनी फैली हुई पुरइन हैं, और कविता की युक्तियाँ वे सुहावनी सीपियाँ हैं जिनमें मोती बनते हैं। यह वह जगह है जहाँ रूपक अपने ही ऊपर मुड़ जाता है। चौपाई कह रही है कि चौपाई क्या है, और वह अपने को पुरइनि कहती है, यानी कमलिनी का वह चौड़ा पत्ता जो जल के ऊपर बिछा रहता है। जो सबसे पहले दिखता है वही चौपाई है, और उसके नीचे वह गहराई है जो अभी-अभी अनदेखी बतायी गयी थी।
इसके बाद पूरी सूची चलती है, और सूची में एक भी चीज़ यों ही नहीं रखी गयी। छन्द, सोरठे और दोहे बहुरंगे कमलों के समूह हैं। अनुपम अर्थ, ऊँचा भाव और सुन्दर भाषा पराग, मकरन्द और सुगन्ध हैं। पुण्यों के पुंज भौंरों की पंक्तियाँ हैं। ज्ञान, वैराग्य और विचार हंस हैं। कविता की ध्वनि, वक्रोक्ति, गुण और जाति अनेक प्रकार की मनोहर मछलियाँ हैं। ध्यान दीजिये कि जो पाठक अर्थ के लिये आता है वह भौंरा है, क्योंकि भौंरा पराग पर आता है और पराग को अर्थ कहा गया है। और जो विचार लेकर आता है वह हंस है, वही पक्षी जिसके बारे में परम्परा कहती है कि वह छाँटना जानता है।
सूची आगे बढ़ती है और अब उसमें बड़े-बड़े नाम पड़ने लगते हैं। अर्थ, धर्म, काम और टीका के अनुसार चौथा मोक्ष, ज्ञान और विज्ञान का विचारपूर्वक कहा जाना, काव्य के नौ रस, जप, तप, योग और वैराग्य, ये सब इस तालाब के सुन्दर जलचर हैं। पुण्यात्माओं, साधुओं और राम के नाम के गुणों का गान विचित्र जलपक्षियों जैसा है। संतों की सभा चारों ओर की अवँराई है, यानी आम की बगीची, और श्रद्धा वसन्त ऋतु है। क्षमा, दया और दम लताओं के मंडप हैं, शम, यम और नियम उनके फूल हैं, ज्ञान फल है, और हरि के चरणों में प्रेम उसी फल का रस है। जो और अनेक प्रसंगों की कथाएँ हैं, वे तोते, कोयलें और रंग-बिरंगे पक्षी हैं।
इस पूरी गिनती में एक बात चुपचाप चल रही है। जो चीज़ें साधना की भाषा में कठोर लगती हैं, यम, नियम, दम, वैराग्य, उन्हें फूल, मंडप और जलचर बनाकर सरोवर के भीतर बिठा दिया गया है। कहीं कोई कठोरता नहीं दिखती। एक भी वस्तु ऐसी नहीं जो देखने में कड़ी हो। यह अनुवाद जानबूझकर किया गया है, क्योंकि जिस आदमी को यहाँ बुलाया जा रहा है वह अभी आग से जला हुआ हाथी है।
पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु।
दोहा ३७
माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु॥ ३७॥
कथा में जो रोमांच होता है वही वाटिका, बाग और वन है। जो सुख होता है वही सुन्दर पक्षियों का विहार है। और माली कौन है, यह देखिये: सुमन, यानी निर्मल मन, जो प्रेम रूपी जल से, सुन्दर नेत्रों के रास्ते, इन बग़ीचों को सींचता है। पूरे रूपक में यही एक जगह है जहाँ पढ़नेवाले का अपना शरीर भीतर आता है, और वह आता है आँख बनकर। जो चीज़ वह देता है वह जल है, और आँख से जो जल गिरता है उसका नाम इस पन्ने पर लिखने की ज़रूरत कवि ने नहीं समझी।
सार: सात काण्ड सीढ़ियाँ हैं और राम की निर्गुण महिमा वह गहराई जो दिखती नहीं। यश जल है, उपमाएँ लहरें, चौपाइयाँ पुरइन के पत्ते, युक्तियाँ मोतीवाली सीपियाँ। छन्द-दोहे कमल, अर्थ पराग, पुण्य भौंरे, ज्ञान और वैराग्य हंस, संतसभा चारों ओर की अमराई और श्रद्धा वसन्त। बग़ीचों को सींचनेवाला माली निर्मल मन है और उसका जल आँखों से आता है।
जो इस तट तक नहीं आ पाते
अब तक सब कुछ बुलाने का था। यहाँ से कवि यह बताने लगते हैं कि इस सरोवर तक पहुँचना कठिन क्यों है, और वे यह बात किसी को कोसकर नहीं कहते, नक्शे में रास्ता खींचकर कहते हैं। पहले रखवाले और अधिकारी। जो लोग इस चरित्र को सँभालकर गाते हैं वे इस ताल के चतुर रखवाले हैं, और जो स्त्री-पुरुष सदा आदर के साथ इसे सुनते हैं वे इस मानस के अधिकारी उत्तम देवता हैं। इस रूपक में मनुष्य के देवता बन जाने का एक ही रास्ता बताया गया है, और वह सुनना है।
अति खल जे बिषई बग कागा । एहि सर निकट न जाहिं अभागा॥
चौपाई ७
संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न बिषय कथा रस नाना॥
जो अत्यन्त दुष्ट और विषयी हैं वे अभागे बगुले और कौवे हैं, और वे इस सरोवर के पास नहीं आते, क्योंकि यहाँ घोंघे, मेढक और सेवार जैसी विषय-रस की नाना कथाएँ नहीं हैं। यह पंक्ति बहुत साफ़ है और बहुत उदार भी। वे दूर नहीं रखे गये हैं, वे आते ही नहीं। और न आने का कारण द्वेष नहीं है, भूख है। जिस तालाब में उनका आहार नहीं है वहाँ बगुला क्यों उतरे। दोष सरोवर पर नहीं डाला गया और पक्षी पर भी नहीं डाला गया, बस दोनों की बनावट अलग-अलग बता दी गयी है।
फिर वही बात एक और तरफ़ से कही जाती है। इसी कारण बेचारे कौवे और बगुले रूपी कामी लोग आते-आते हृदय में हार मान जाते हैं, क्योंकि इस सरोवर तक आने में कठिनाई बहुत है और राम की कृपा के बिना यहाँ आया नहीं जाता। ध्यान दीजिये कि उन्हें यहाँ बेचारे कहा गया है। जिनसे अभी-अभी अभागा कहकर बात हुई थी, उन्हीं के लिये अगली ही अर्धाली में दया का शब्द आ जाता है।
और अब रास्ते का नक्शा, जो इस प्रसंग का सबसे व्यावहारिक हिस्सा है। कठिन कुसंग ही भयानक बुरा रास्ता है। कुसंगियों के वचन बाघ, सिंह और साँप हैं। घर के काम-काज और गृहस्थी के नाना जंजाल अत्यन्त दुर्गम बड़े पहाड़ हैं। मोह, मद और मान बहुत से बीहड़ वन हैं। और नाना प्रकार के कुतर्क भयंकर नदियाँ हैं। यह सूची पढ़कर एक बात तुरन्त दिखती है: इनमें से एक भी बाधा सरोवर के भीतर नहीं है। सब की सब रास्ते में हैं। जल में कोई जाल नहीं बिछा, कोई पहरा नहीं बैठा। जो रोकता है वह पहुँचने से पहले रोकता है।
जे श्रद्धा संबल रहित नहिं संतन्ह कर साथ।
दोहा ३८
तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ॥ ३८॥
जिनके पास श्रद्धा रूपी राह-ख़र्च नहीं है, जिन्हें संतों का साथ नहीं मिला, और जिन्हें रघुनाथ प्रिय नहीं हैं, उनके लिये यह मानस अत्यन्त अगम है। शब्द संबल पर ठहरिये। संबल यात्रा का ख़र्च होता है, वह पूँजी जो रास्ते में खायी जाती है और मंज़िल पर बचती नहीं। श्रद्धा को इस पन्ने पर दो जगह रखा गया है और दोनों जगह अलग रूप में। रास्ते में वह ख़र्च है, और सरोवर के किनारे वही श्रद्धा वसन्त ऋतु है। जिस चीज़ से चलकर आइये, वही वहाँ पहुँचकर मौसम बन जाती है।
सार: गानेवाले इस ताल के रखवाले हैं और आदर से सुननेवाले इसके अधिकारी देवता। दुष्ट और विषयी बगुले-कौवे यहाँ आते ही नहीं, क्योंकि यहाँ उनके आहार जैसी विषय-कथाएँ नहीं हैं। रास्ते में कुसंग बुरा पथ है, कुसंगियों के वचन हिंसक जीव, गृहस्थी के जंजाल पहाड़, मोह-मद-मान बीहड़ वन और कुतर्क भयानक नदियाँ। श्रद्धा का राह-ख़र्च और संतों का साथ न हो तो यह मानस अगम है।
आकर भी लौट जानेवाला
अब वह चार पंक्तियाँ आती हैं जो इस प्रसंग में सबसे तीखी हैं, और जिनके लिये किसी शास्त्र की ज़रूरत नहीं, केवल आदमी को देखा होना काफ़ी है। मान लीजिये कोई कष्ट उठाकर वहाँ तक पहुँच भी गया। पहुँचते ही उसे नींद रूपी जूड़ी चढ़ जाती है। हृदय में जड़ता रूपी कड़ा जाड़ा लग जाता है, और वह अभागा वहाँ तक जाकर भी स्नान नहीं कर पाता। ठिठुरन और नींद, दोनों जाड़े की चीज़ें हैं, और दोनों आदमी को जल से दूर रखती हैं। जो ठंड में ठिठुर रहा हो उसे ठंडे जल में उतरना सबसे कठिन लगता है।
करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना॥
चौपाई ८
जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा॥
उससे उस सरोवर में न स्नान होता है न जलपान, और वह अभिमान समेत लौट आता है। फिर यदि कोई उससे वहाँ का हाल पूछने आये तो वह सरोवर की निन्दा करके उसे समझा देता है। इन दो अर्धालियों में जो हुआ है, उसे ध्यान से देखिये। आदमी हारकर लौटा, पर हार साथ नहीं लायी। लौटते समय अभिमान साथ आया। और जब कोई पूछता है, तो वह अपनी असमर्थता की बात नहीं करता, सरोवर का दोष गिनाता है। अपनी विफलता को दूसरे की समीक्षा में बदल देने की जो आदत आज बहुत आम है, उसका पूरा चित्र यहाँ दो अर्धालियों में बना हुआ रखा है, और चित्र बनानेवाले ने उसके लिये कोई नया शब्द नहीं गढ़ा। उसने बस इतना दिखाया कि आदमी नहाया नहीं और बताने लगा कि पानी कैसा था।
इसके तुरन्त बाद उलटी तस्वीर आती है, और वह एक ही शर्त पर टिकी है। ये सारे विघ्न उसको नहीं व्यापते जिसे राम कृपा की दृष्टि से देख लेते हैं। वही आदर के साथ इस सरोवर में स्नान करता है और महाघोर त्रिताप से नहीं जलता। सारी बाधाओं की लम्बी सूची के सामने कवि ने कुल एक चीज़ रखी है, और वह चीज़ पानेवाले के हाथ में नहीं है। यह बात इस पन्ने पर पहले भी कही जा चुकी थी, जब कहा गया था कि राम की कृपा बिना यहाँ आया नहीं जाता।
ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह कें राम चरन भल भाऊ॥
चौपाई ९
जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई॥
जिनके मन में राम के चरणों में सुन्दर प्रेम है, वे इस सरोवर को कभी नहीं छोड़ते। और फिर वह अकेला वाक्य आता है जो इस पूरे प्रसंग में सीधा आदेश है: हे भाई, जो इस सरोवर में नहाना चाहे वह मन लगाकर सत्संग करे। दस दोहों में यही एक काम बताया गया है जिसे कोई आज उठकर कर सकता है। और वह वही चीज़ है जो घाट के रूप में पहले आ चुकी थी। घाट संवाद थे, और अब उतरने की विधि सत्संग है। रूपक और आदेश एक ही बात कह रहे हैं, एक बार चित्र बनाकर और एक बार हाथ पकड़कर।
संतों के साथ पर ध्यान दीजिये तो इस पन्ने पर वे चार जगह खड़े मिलेंगे। सरोवर के चारों ओर की अमराई वही हैं। रास्ते में जिनका साथ न हो तो मानस अगम हो जाता है, वही हैं। भीतर उतरने की विधि जो बतायी गयी, वह उन्हीं का संग है। और आगे नदी के किनारे जो अनुपम नगर बसा मिलेगा, वह भी वही निकलेंगे। एक ही वस्तु को चार रूपों में रखना कवि की दोहराव नहीं है। यह उस चीज़ को चारों दिशा से घेर देना है जिसके बिना बाक़ी सब बेकार हो जाता।
सार: बहुत से लोग कष्ट उठाकर पहुँच तो जाते हैं, पर नींद और जड़ता उन्हें जल में नहीं उतरने देती, और वे अभिमान समेत लौटकर सरोवर की निन्दा करने लगते हैं। विघ्न उसी को नहीं छूते जिस पर राम की कृपादृष्टि पड़ती है। और जो नहाना चाहे उसके लिये एक ही काम बताया गया है: मन लगाकर सत्संग।
सरोवर से निकली हुई नदी
अब तक कवि किनारे पर खड़े होकर बता रहे थे। यहाँ वे उतर जाते हैं। ऐसे मानस को हृदय के नेत्रों से देखकर और उसमें डुबकी लगाकर कवि की बुद्धि निर्मल हो गयी, हृदय में आनन्द और उत्साह भर आया, और प्रेम तथा प्रमोद का प्रवाह उमड़ पड़ा। जिस पंक्ति में यह कहा गया है उसमें मानस शब्द दो बार आता है, एक बार सरोवर के अर्थ में और एक बार मन के अर्थ में, और दोनों को अलग करने के लिये कवि ने कुछ नहीं किया। उन्हें अलग करना था ही नहीं।
और डुबकी लगाते ही सरोवर स्थिर नहीं रहता। भरा हुआ जल जब सीमा से ऊपर उठता है तो बाहर निकलता है, और निकलते ही उसका नाम बदल जाता है।
चली सुभग कबिता सरिता सो। राम बिमल जस जल भरिता सो॥
चौपाई १०
सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला॥
उससे वह सुन्दर कविता रूपी नदी बह निकली, जिसमें राम का निर्मल यश रूपी जल भरा है। इस नदी का नाम सरयू है, जो सब सुन्दर मंगलों की जड़ है, और लोकमत तथा वेदमत इसके दो सुन्दर किनारे हैं। नदी को दो किनारे चाहिये, वरना वह नदी नहीं रहती, बाढ़ हो जाती है। तुलसीदास ने इस कविता को जिन दो किनारों के बीच बाँधा है वे हैं लोक का कहा हुआ और वेद का कहा हुआ। एक भी हटा दीजिये तो धारा फैल जायेगी और किसी के काम की न रहेगी। इसी बँधी हुई धारा को वे आगे मानस की कन्या कहते हैं, और कहते हैं कि यह कलियुग के पाप रूपी तिनकों और पेड़ों को जड़ से उखाड़ फेंकनेवाली है।
अब वह बात, जिसके लिये यह पूरा पन्ना अपने शुरू पर लौट आता है। सरोवर बना, उससे नदी निकली, नदी का नाम सरयू पड़ा, और नदी के किनारे जो नगर बसा वह अयोध्या है। यही वह अयोध्या है जिससे यह प्रसंग खुला था, जहाँ चैत्र की नवमी को कथा आरम्भ हुई थी और जहाँ सज्जन सरयू में नहाकर नाम जप रहे थे। जो नक्शा खींचा गया, वह घूमकर उसी घाट पर आ खड़ा हुआ जहाँ से चलना शुरू हुआ था।
दोहा उनतालीस इस नगर की गिनती इस तरह करता है। तीन प्रकार के श्रोताओं का समाज ही इस नदी के दोनों किनारों पर बसे पुरवे, गाँव और नगर हैं, और संतों की सभा ही वह अनुपम अयोध्या है जो सब मंगलों की जड़ है। यानी नदी के किनारे बस्ती है, और बस्ती सुननेवाले लोग हैं। कथा जहाँ-जहाँ से गुज़रती है वहाँ-वहाँ आबादी बस जाती है, ठीक जैसे असल में नदियों के किनारे बसती है।
सार: कवि उसी मानस में डुबकी लगाते हैं, उनकी बुद्धि निर्मल होती है, और उसी उमंग से कविता की नदी निकलती है। उसका नाम सरयू है, लोकमत और वेदमत उसके दो किनारे, तीन प्रकार के श्रोता किनारों की बस्तियाँ, और संतों की सभा वह अनुपम अयोध्या जो सब मंगलों की जड़ है।
उस नदी में क्या-क्या बहता है
नदी बह चली, और अब जो होता है वह भूगोल जैसा सच्चा है। कीर्ति रूपी सुहावनी सरयू जाकर रामभक्ति रूपी गंगा में मिलती है। लक्ष्मण सहित राम के युद्ध का पवित्र यश सोन नाम का महानद बनकर उसी में आ मिलता है। दोनों के बीच भक्ति की धारा ज्ञान और वैराग्य के साथ शोभा पाती है, और तीनों तापों को डरानेवाली यह तिमुहानी नदी राम के स्वरूप रूपी समुद्र की ओर मुँह किये बह रही है। संगम तीन धाराओं का है, पर जिस समुद्र में जाकर वे मिलती हैं वह कोई जगह नहीं है। वह राम का अपना रूप है। इस रूपक में सारी यात्रा का ठिकाना कोई तीर्थ नहीं, कोई लोक नहीं, एक व्यक्ति है।
इसके बाद नदी के किनारे-किनारे कथा का सामान सजने लगता है। बीच-बीच की विचित्र कथाएँ किनारे के वन और बाग़ हैं। उमा और महेश के विवाह के बराती असंख्य जलचर हैं। रघुनाथ के जन्म की आनन्द-बधाइयाँ भँवर और तरंगों की मनोहरता हैं। चारों भाइयों के बालचरित खिले हुए रंग-बिरंगे कमल हैं, और राजा, रानियों तथा कुटुम्बियों के सत्कर्म भौंरे और जलपक्षी हैं। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि चौपाई केवल नृप कहती है, नाम नहीं लेती। दशरथ का नाम टीका देती है, वर्णन नहीं।
फिर सीता के स्वयंवर की सुन्दर कथा आती है, जिसकी छबि नदी पर छायी हुई है। और अब वह जोड़ी देखिये जो केवल नदी जाननेवाला आदमी बना सकता है। अनेक विवेकपूर्ण प्रश्न इस नदी की नावें हैं, और उनके विवेकयुक्त उत्तर कुशल केवट हैं। प्रश्न नाव है, उत्तर नाविक है। नाव अपने आप कहीं नहीं जाती, और केवट बिना नाव के किसी को पार नहीं उतारता। जो पूछता है वह आधा काम करता है।
इसके बाद कथा सुनकर जो आपस में चर्चा होती है, वही किनारे-किनारे चलते यात्रियों का समाज है। और ठीक इसी जगह, जहाँ सब कुछ शान्त चल रहा था, नदी का सबसे ख़तरनाक हिस्सा आता है।
सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई॥
चौपाई ११
घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी॥
परशुराम का क्रोध इस नदी की भयानक धार है, और राम के श्रेष्ठ वचन उसके सुन्दर बँधे हुए घाट हैं। इन दोनों को एक ही पंक्ति के दो हिस्सों में रख देना कवि का बहुत बड़ा काम है। क्रोध धार है: वह बहती है, बहाती है, और किनारे को काटती चली जाती है। बात घाट है: वह बनायी जाती है, पत्थर से जमायी जाती है, और वही किनारे को कटने से बचाती है। जिस प्रसंग में एक ओर से क्रोध आ रहा हो, उसमें दूसरी ओर से जो आता है वह चुप्पी नहीं है, बँधा हुआ वचन है। और जहाँ धार सबसे तेज़ है, वहीं कवि ने घाट रखा है, क्योंकि घाट की ज़रूरत वहीं पड़ती है।
आगे राम और उनके भाइयों के विवाह का उत्साह इस नदी की वह मंगलकारी बाढ़ है जो सबको सुख देती है, और जो कहते-सुनते हुए हर्षित और पुलकित होते हैं वे ही पुण्यात्मा हैं जो प्रसन्न मन से इसमें नहाते हैं। फिर राजतिलक का मंगल-साज आता है, जो पर्व के दिन जुटे हुए यात्रियों के समूह जैसा है। और उसी के साथ वह चीज़ आती है जिसका नाम लेते ही कथा का रंग बदल जाता है: काई कुमति केकई केरी। कैकेयी की कुबुद्धि इस नदी की काई है, जिसका फल बड़ी भारी विपत्ति हुई।
काई पर ठहरिये, क्योंकि चुनाव बहुत सटीक है। काई जल को गन्दा नहीं करती, वह घाट की सीढ़ी पर जमती है और पैर फिसला देती है। पूरे प्रसंग में फिसलने का सामान एक ही जगह रखा गया है, और वह ठीक वहाँ रखा है जहाँ राजतिलक की तैयारी हो रही है। जिस दिन सब कुछ सज चुका हो, उसी दिन पैर फिसलता है।
दोहा इकतालीस इस हिस्से को बाँध देता है। अनगिनत उत्पातों को शान्त करनेवाला भरत का चरित्र नदी-तट पर किया जानेवाला जपयज्ञ है, और कलियुग के पापों तथा दुष्टों के अवगुणों के जो वर्णन हैं वे ही इस जल का कीचड़ और बगुले-कौए हैं। कीचड़ और काई दोनों को कवि ने कथा से बाहर नहीं फेंका। उन्होंने उन्हें नदी के भीतर ही रहने दिया, क्योंकि जो नदी सच में बहती है उसमें ये होते हैं।
सार: कीर्ति की सरयू रामभक्ति की गंगा से मिलती है, युद्ध का यश सोन बनकर आ मिलता है, और यह तिमुहानी धारा राम के स्वरूप रूपी समुद्र की ओर बहती है। प्रश्न नावें हैं और विवेकभरे उत्तर केवट, परशुराम का क्रोध भयानक धार और राम के वचन बँधे हुए घाट, कैकेयी की कुबुद्धि वह काई जिस पर पैर फिसलता है, और भरत का चरित्र तट पर होनेवाला जपयज्ञ।
छहों ऋतुएँ
अब कवि एक और तरीक़े से पूरा ग्रन्थ इसी नदी पर बिछा देते हैं, और इस बार पैमाना ऋतुओं का है। यह कीर्ति की नदी छहों ऋतुओं में सुन्दर है, हर समय सुहावनी और अत्यन्त पावन। शिव और पार्वती का विवाह इसमें हेमन्त है। राम के जन्म का उत्सव सुखद शिशिर है। राम के विवाह-समाज का वर्णन आनन्दमय ऋतुराज वसन्त है। राम का वनगमन दुःसह ग्रीष्म है, और मार्ग की कथा कड़ी धूप और लू। राक्षसों के साथ घोर युद्ध वर्षा है। और राम के राज्य का सुख, विनय तथा बड़ाई वह निर्मल और सुहावनी शरद है।
इस सूची में जो सबसे बड़ी बात कही गयी है वह ऋतुओं के नाम नहीं हैं, उनका क्रम है। ऋतुएँ अपने आप लौटती हैं और उनका चक्र पूरा होता है। कथा को इस चक्र पर बिठा देने का अर्थ है कि यह ग्रन्थ एक सीधी रेखा नहीं है जिसका अन्त हो जाये। यह एक वर्ष है, और वर्ष हर बार फिर से शुरू होता है।
और वर्षा पर ज़रा रुकिये। राक्षसों के साथ का घोर युद्ध वर्षा कहा गया है, और उसी साँस में उसे देवकुल रूपी धान के लिये सुमंगलकारी कहा गया है। इस पन्ने पर धान का खेत पहले भी आ चुका है, बहुत पीछे, जब कहा गया था कि राम के सुयश का जल सत्कर्म रूपी धान के लिये हितकर है। वही खेत अब फिर खुला है और इस बार उसे सींचनेवाली ऋतु युद्ध है। जो चीज़ सबसे भयानक है वही सबसे ज़्यादा फ़सल देती है, और दोनों बातें एक ही अर्धाली के दो हिस्सों में रखी हुई हैं।
ऋतुओं के बाद जल के गुण बाँटे जाते हैं, और वे भी सोच-समझकर बाँटे गये हैं। सतियों में शिरोमणि सीता के गुणों की कथा इस जल का निर्मल और अनुपम गुण है। भरत का स्वभाव इसकी सुन्दर शीतलता है, जो सदा एक-सी रहती है और जिसका वर्णन नहीं हो सकता। और दोहा बयालीस कहता है कि चारों भाइयों का आपस में देखना, बोलना, मिलना, एक-दूसरे से प्रेम करना, हँसना और उनका सुन्दर भाईपन ही इस जल की मधुरता और सुगन्ध है। सारे गुणों में से स्वाद और गन्ध, यानी जो चखकर और जो पास जाकर जाने जाते हैं, दोनों भाइयों के हिस्से में आये हैं।
भरत को जो गुण मिला है वह ख़ास है। शीतलता जल का वह गुण है जिसका पता उतरने के बाद चलता है, देखने से नहीं चलता, और जो एकरस हो तो और भी कम दिखता है। कथा में भरत ठीक ऐसे ही हैं। वे कहीं चमकते नहीं, और जहाँ-जहाँ हैं वहाँ तापमान बदल देते हैं।
सार: छहों ऋतुएँ कथा के छह पड़ावों पर बिछा दी जाती हैं: शिव-विवाह हेमन्त, राम-जन्म शिशिर, विवाह-समाज वसन्त, वनगमन ग्रीष्म, राक्षसों से युद्ध वर्षा और रामराज्य शरद। सीता के गुणों की कथा जल का निर्मल गुण है, भरत का स्वभाव उसकी एकरस शीतलता, और चारों भाइयों का परस्पर प्रेम उसकी मिठास और सुगन्ध।
और अन्त में, अपनी ओर
पूरा सरोवर बन चुका, नदी बह चुकी, ऋतुएँ बीत चुकीं। अब कवि अपने को इस जल में कहाँ रखते हैं, यह देखिये। उनका आर्तभाव, उनकी विनय और उनकी दीनता इस सुन्दर जल का लघुता है, यानी हलकापन, और वह थोड़ा नहीं है। जल के जितने गुण गिनाये गये, उनमें से अपने लिये उन्होंने वह चुना जो सुनने में गुण भी नहीं लगता। पर हलकापन ही वह चीज़ है जिसके कारण जल उठाया जा सकता है, ऊपर चढ़ता है, बादल बनता है और फिर बरसता है। जो सबसे कम भारी है, वही सबसे दूर तक जाता है।
फिर इस जल का पूरा हिसाब एक बार में दे दिया जाता है। यह अनोखा जल सुनने मात्र से गुण करता है, आशा रूपी प्यास और मन का मैल दोनों हर लेता है। यह राम के सुन्दर प्रेम को पुष्ट करता है, कलियुग के सब पाप और उनसे उपजी ग्लानि हर लेता है, संसार का श्रम सोख लेता है, सन्तोष को भी सन्तुष्ट करता है, और पाप, दुख, दरिद्रता तथा दोष का नाश करता है। यह काम, क्रोध, मद और मोह को मिटाता है और निर्मल विवेक तथा वैराग्य बढ़ाता है। आदर के साथ इसमें स्नान करने और इसे पीने से हृदय के भीतर बैठे हुए पाप और ताप मिट जाते हैं।
और इसके ठीक बाद, जहाँ पन्ना समाप्त होने को है, कवि वह चित्र रखते हैं जिसके आगे पूरा प्रसंग एक बार को चुप हो जाता है।
जिन्ह एहिं बारि न मानस धोए । ते कायर कलिकाल बिगोए॥
चौपाई १२
तृषित निरखि रबि कर भव बारी । फिरिहहिं मृग जिमि जीव दुखारी॥
जिन्होंने इस जल से अपना मानस नहीं धोया, वे कायर कलिकाल के हाथों ठगे गये। जैसे प्यासा हिरन सूर्य की किरणों से बनी हुई रेत की चमक को जल समझकर दौड़ता है और दुखी होता है, वैसे ही वे जीव भटकते रहेंगे। पूरा पन्ना जल का था, और अन्तिम चित्र उस जल का है जो है ही नहीं। और एक शब्द और देखिये। जिन्होंने नहीं धोया उन्हें मूर्ख नहीं कहा गया, कायर कहा गया। यह वही आदमी है जो कुछ देर पहले सरोवर तक पहुँचकर लौट आया था और लौटकर सरोवर की निन्दा कर रहा था। दोष बुद्धि का नहीं बताया गया, हिम्मत का बताया गया, और यह आरोप कहीं ज़्यादा भारी है, क्योंकि बुद्धि सबकी अपनी-अपनी होती है और हिम्मत सबके पास होती है।
मति अनुहारि सुबारि गुन गन गनि मन अन्हवाइ।
दोहा ४३ (क, ख)
सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ॥ ४३ (क)॥
अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद।
कहउँ जुगल मुनिबर्य कर मिलन सुभग संबाद॥ ४३ (ख)॥
अपनी बुद्धि के अनुसार इस सुन्दर जल के गुण गिनकर, उसमें अपना मन नहलाकर, और भवानी तथा शंकर का स्मरण करके कवि सुन्दर कथा कहता है। और फिर दूसरा आधा दोहा दरवाज़ा खोल देता है: अब रघुनाथ के चरणकमल हृदय में धरकर और प्रसाद पाकर वे दो श्रेष्ठ मुनियों के मिलने का सुन्दर संवाद कहते हैं। ध्यान दीजिये कि दोहा उन दोनों का नाम नहीं लेता, केवल जुगल मुनिबर्य कहता है। पर घाट गिनाते समय टीका ने चार संवादों में एक याज्ञवल्क्य और भरद्वाज का भी गिनाया था। यानी सरोवर का नक्शा दिखा चुकने के बाद कवि पाठक का हाथ पकड़कर पहले घाट की पहली सीढ़ी पर रख रहे हैं।
इन दस दोहों को एक साथ पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है, वह यह है कि यहाँ कोई पहरेदार नहीं है। सरोवर के चारों ओर न दीवार है, न द्वारपाल, न कोई शर्त जो पूछी जाये। रखवाले हैं, पर वे गानेवाले हैं, रोकनेवाले नहीं। जो नहीं आते वे इसलिये नहीं आते कि यहाँ उनके मतलब की चीज़ नहीं है। जो आकर लौट जाते हैं वे किसी के भगाये हुए नहीं लौटते, वे ठिठुरकर लौटते हैं। और जो उतरते हैं उनसे केवल दो चीज़ें माँगी गयी हैं, आदर और लगा हुआ मन, जो इसी प्रसंग की शुरुआत में सज्जनों से माँगी गयी थीं। बीच के सारे कमल, हंस, सीपियाँ और बग़ीचे इन्हीं दो शब्दों के बीच सजे हुए हैं।
दूसरी बात उस दावे की है जो इस पूरे पन्ने पर एक बार भी नहीं किया गया। सरोवर किसी ने बनाया, वह शम्भु थे। नाम किसी ने रखा, वे भी शिव थे। जल कहीं से आया, वह वेद और पुराण का समुद्र था और उसे उठाकर बरसानेवाले साधु थे। इन सबके बीच तुलसीदास अपने लिये तीन ही चीज़ें रखते हैं: एक तिथि, एक नगर, और जल का हलकापन। जिस ग्रन्थ पर आगे चलकर यही नाम टिका रहा, उसके कवि ने उसमें अपने लिये इतनी ही जगह माँगी कि उन्होंने उसमें डुबकी लगायी और निर्मल बुद्धि लेकर बाहर आये। बाक़ी सब कुछ, उनके कहे अनुसार, पहले से वहीं था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३४ से ४३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।