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दहेज और जनकपुर से विदाई

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 40

जनक राह के पड़ावों पर अपार सामग्री और अयोध्या को अपरिमित दहेज भेजते हैं। विदा के समय रनिवास, सखियाँ और नगर के स्त्री पुरुष प्रेम के वश हो जाते हैं।

जनकपुर के लोग सुनते हैं कि बारात चलेगी। जाना सत्य जानकर सब उदास हो जाते हैं, मानो साँझ में कमल सकुचा गये हों।

जनक बरातियों के आते समय के पड़ावों पर रसोई का सामान भेजते हैं। वे शय्याएँ, घोड़े, रथ, हाथी, बहुत सी वस्तुएँ और अपरिमित दहेज अयोध्या भेज देते हैं। चारों भाई विदा माँगने महल आते हैं तो वहाँ हर्ष उठता है। राम के मुँह से चलने की बात सुनते ही रनिवास उदास हो उठता है।

विदा देनेवाले, विदा होनेवाली

  • राम और उनके तीन भाई चारों राजकुमार जनक के महल में विदा माँगने आते हैं। राम माता से अपने बालक जानकर स्नेह बनाये रखने की प्रार्थना करते हैं।
  • सीता और सब कुमारियाँ माताओं के बार बार के आलिंगन और परिवार के प्रेम के बीच विदा होती बेटियाँ।
  • माताएँ और सखियाँ रानियाँ सीता को आशीष और सिखावन देती हैं और सयानी सखियाँ स्त्रियों का धर्म सिखाती हैं। फिर माताएँ बेटियों को बार बार भेंटती हैं, पहुँचाकर लौटकर मिलती हैं, और सखियाँ उन्हें अलग करती हैं।
  • जनक विदाई का सब प्रबन्ध करनेवाले राजा। वे सीता को देखकर अपना धीरज खो बैठते हैं और अन्त में पहुँचाने के लिये साथ चलते हैं।
  • दशरथ ब्राह्मणों को दान और सम्मान देकर, उनके आशीर्वाद लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं।
  • जनकपुरवासी चारों भाइयों का रूप आँखों में भरना चाहते हैं और सीता के चलते समय व्याकुल हो उठते हैं।

नगर का समाचार, राह की तैयारी

नगरवासी व्याकुल होकर एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि क्या सचमुच बारात जानेवाली है। समाचार सत्य निकलता है।

यह सुनकर सब उदास हो जाते हैं, मानो साँझ में कमल सकुचा गये हों।

जहाँ जहाँ बराती आते समय ठहरे थे, उन ठिकानों के लिये बहुत प्रकार का रसोई का सामान भेजा जा रहा है। उसमें मेवे, तरह तरह के पकवान, और भोजन की सामग्री है, जिसका बखान नहीं हो सकता।

यह सामग्री अनगिनत बैलों और कहारों पर भर भरकर लादी गयी। जनक ने बहुत सी सुन्दर शय्याएँ भी भेजीं। पोद्दार की टीका शय्याओं का अर्थ पलँग बताती है।

फिर एक लाख घोड़े और पचीस हजार रथ हैं, सब नख से शिख तक सजाये हुए। और दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी हैं, जिन्हें देखकर दिशाओं के हाथी लजा जाते हैं।

गाड़ियों में भरकर सोना, वस्त्र और रत्न भेजे गये, भैंसें और गायें भी, और अन्य अनेक प्रकार की वस्तुएँ। जनक ने फिर अपरिमित दहेज दिया, जिसे देखकर लोकपालों के लोकों की सम्पदा थोड़ी जान पड़ती है। यह सारा सामान अयोध्यापुरी भेज दिया गया।

गोद में सीता, वाणी में आशीष

सब रानियों ने सुना कि बारात चलेगी, और वे ऐसी विकल हो गयीं मानो थोड़े पानी में मछलियाँ हों। वे सीता को बार बार गोद में लेती हैं, आशीर्वाद देती हैं, समझाती हैं।

उनकी पहली बात सीता के सुख की कामना है: वे सदा पति को प्रिय रहें और उनका सुहाग अचल बना रहे। फिर सिखावन: सास, ससुर और गुरु की सेवा करना, और पति की इच्छा समझकर उनकी आज्ञा का अनुसरण करना।

सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों का धर्म सिखाती हैं।

फिर रानियाँ सब कुमारियों को आदर से समझाती हैं, और सबको फिर फिर हृदय से लगाती हैं।

फिर माताएँ बार बार भेंटती हैं और कहती हैं: ब्रह्मा ने स्त्रियों को क्यों रचा?

चारों भाइयों को आँख भर देख लेना

इसी समय राम अपने भाइयों सहित प्रसन्न मन से जनक के महल की ओर चले, विदा माँगने के लिये।

नगर के स्त्री और पुरुष स्वभाव से सुन्दर चारों भाइयों को देखने दौड़ पड़ते हैं। कोई कहता है, आज ये जाना चाहते हैं। जनक ने विदाई का सारा सामान तैयार कर दिया है।

वह कहता है कि इन प्यारे पाहुनों, राजा के चारों पुत्रों, का रूप नेत्र भरकर देख लीजिये। हे सयानी, कौन जाने किस पुण्य से विधाता ने इन्हें लाकर आँखों का अतिथि बनाया है।

फिर वह कहता है कि हमें इनके दर्शन मिले हैं। यह वैसा ही है जैसे मरनेवाले को अमृत मिल जाय, जन्म भर के भूखे को कल्पवृक्ष मिल जाय, और नरक में पड़े जीव को भगवान् का परमपद मिल जाय।

और कहता है कि राम की शोभा को निरखकर हृदय में धारण कर लीजिये। अपने मन को साँप और राम की मूर्ति को मणि बना लीजिये।

इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए सब राजकुमार राजमहल जाते हैं।

महल में हर्ष, फिर विदा की बात

रूप के समुद्र सब भाइयों को देखकर रनिवास हर्षित हो उठता है, और सासुएँ अत्यन्त प्रसन्न मन से निछावर और आरती करती हैं।

राम की छवि देखकर वे अत्यन्त अनुराग से भर गयीं और प्रेम के विवश होकर बार बार उनके चरणों लगीं। लज्जा नहीं रही, हृदय में प्रीति छा गयी। यह स्वाभाविक स्नेह कैसे कहा जाये?

उन्होंने राम को भाइयों सहित उबटन लगाया, स्नान कराया, और बड़े प्रेम से छह रसोंवाला भोजन कराया।

उचित अवसर देखकर राम शील, स्नेह और संकोच से भरी वाणी में बोले।

महाराज अयोध्यापुरी चलना चाहते हैं, उन्होंने हमें यहाँ विदा लेने भेजा है। माता, प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिये, और अपने बालक जानकर सदा स्नेह रखिये। यह सुनते ही रनिवास उदास हो जाता है, और प्रेम के वश सासुओं से बोला नहीं जाता। वे सब कुमारियों को हृदय से लगाकर उनके पतियों को सौंपती हैं, और बहुत विनती करती हैं।

रानी की पूरी विनती

फिर रानी विनती करके सीता को राम को सौंपती हैं, और हाथ जोड़कर बार बार कहती हैं।

हम आप पर बलि जायँ, हे तात, हे सुजान। आप सबकी दशा जानते हैं। परिवार को, नगरवासियों को, हमें और राजा को सीता प्राणों जैसी प्रिय हैं, ऐसा जानियेगा।

फिर वे प्रार्थना करती हैं कि राम सीता के शील और स्नेह को देखकर उन्हें अपनी दासी मानकर स्वीकार करें।

वे कहती हैं कि राम पूर्णकाम हैं, सुजान लोगों के शिरोमणि हैं, और भावप्रिय हैं। पोद्दार की टीका भावप्रिय का अर्थ बताती है, उन्हें प्रेम प्यारा है।

वे आगे कहती हैं कि राम अपने जनों के गुण ग्रहण करते हैं, दोषों का नाश करते हैं, और दया के धाम हैं।

इतना कहकर रानी राम के चरण पकड़कर रह गयीं, मानो उनकी वाणी प्रेम के दलदल में समा गयी हो। राम उस स्नेह से सनी वाणी को सुनकर सास का बहुत प्रकार से सम्मान करते हैं।

आशीर्वाद के बाद भी मिलना बाकी है

राम हाथ जोड़कर विदा माँगते हैं, बार बार प्रणाम करते हैं, आशीर्वाद पाकर फिर सिर नवाते हैं, और भाइयों सहित चल देते हैं।

रानियाँ राम की सुन्दर, मधुर मूर्ति को हृदय में लाकर स्नेह से शिथिल हो जाती हैं। फिर वे धीरज रखती हैं, कुमारियों को बुलाती हैं, और बार बार बेटियों से भेंटती हैं।

वे बेटियों को पहुँचाने जाती हैं, फिर लौटकर उनसे मिलती हैं, और परस्पर प्रेम बहुत बढ़ जाता है।

फिर सखियाँ बार बार मिलती हुई माताओं को अलग करती हैं, जैसे हाल में ब्यायी गाय को उसके छोटे बछड़े से अलग किया जाता है।

सब स्त्री और पुरुष, सखियाँ और रनिवास प्रेम के वश हैं, मानो करुणा और विरह ने जनकपुर में निवास बना लिया हो।

सीता कहाँ हैं

सीता ने जिन तोतों और मैनाओं को पाल पोसकर बड़ा किया था, और सोने के पिंजरों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल होकर पूछ रहे हैं: सीता कहाँ हैं?

यह सुनकर किसका धीरज नहीं छूटता?

पक्षी और पशु इस प्रकार विकल हो गये, तो मनुष्यों की दशा कैसे कही जाये? तब जनक अपने भाई सहित वहाँ आते हैं। प्रेम उमड़ता है, और उनकी आँखों में जल भर जाता है।

जो जनक परम विरागी कहलाते थे, सीता को देखते ही उनका धीरज भी भाग जाता है। राजा सीता को हृदय से लगा लेते हैं, और ज्ञान की महान् मर्यादा मिट जाती है। पोद्दार की टीका इसे प्रेम के प्रभाव से ज्ञान का बाँध टूट जाना कहती है।

विदाई के समय सोने के पिंजरों में सीता के पाले तोते और मैनाएँ व्याकुल होकर सीता को पुकारते हैं, और परम विरागी कहलाने वाले जनक बेटी को देखते ही धीरज खोकर उन्हें हृदय से लगा लेते हैं।

बुद्धिमान् मन्त्री उन्हें समझाते हैं। राजा यह अवसर नहीं है, ऐसा जानकर विचार करते हैं। वे पुत्रियों को बार बार हृदय से लगाते हुए सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवाते हैं।

सारा परिवार प्रेम में विवश है। जनक शुभ मुहूर्त जानकर कन्याओं को पालकियों में बैठाते हैं और सिद्धि और गणेश का स्मरण करते हैं। पोद्दार की टीका इन्हें सिद्धि सहित गणेश बताती है।

जनक साथ चले, दशरथ ने प्रस्थान किया

राजा पुत्रियों को अनेक प्रकार से समझाते हैं, और उन्हें स्त्रियों का धर्म और अपने कुल की रीति सिखाते हैं। साथ ही बहुत से दासी और दास दिये जाते हैं, जो सीता को प्रिय और विश्वासपात्र हैं। पोद्दार की टीका यही विश्वासपात्र होने का अर्थ बताती है।

सीता के चलते समय जनकपुर के निवासी व्याकुल हो उठते हैं, और मंगल की राशि शुभ शकुन हो रहे हैं। जनक ब्राह्मणों और मन्त्रियों के समाज सहित उन्हें पहुँचाने के लिये साथ चलते हैं।

समय देखकर बाजे बजने लगते हैं, और बराती अपने रथ, हाथी और घोड़े सजाते हैं।

दशरथ सब ब्राह्मणों को बुलाकर दान और सम्मान से उन्हें परिपूर्ण करते हैं। वे उनके चरणकमलों की धूल अपने सिर पर रखते हैं, और आशीर्वाद पाकर प्रसन्न होते हैं।

दशरथ गणेश का स्मरण करके प्रस्थान करते हैं, और अनेक मंगलमूलक शकुन होते हैं। देवता प्रसन्न होकर फूल बरसा रहे हैं, अप्सराएँ गा रही हैं, नगाड़े बज रहे हैं। दशरथ आनन्द से अयोध्यापुरी की ओर चल देते हैं।

लौट लौटकर आलिंगन

रानियाँ सीता को गोद में लेती हैं और कुमारियों को समझाकर हृदय से लगाती हैं। राम के चले जाने पर माताएँ बेटियों को बुलाकर भेंटती हैं, पहुँचाने जाती हैं और लौटकर फिर मिलती हैं। जनक सीता को हृदय से लगाते हैं, और मन्त्रियों के समझाने पर विचार करके पुत्रियों को बार बार हृदय से लगाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 333 से 339, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।