रामचरितमानस · बालकाण्ड · दहेज और जनकपुर से विदाई
दहेज और जनकपुर से विदाई
रास्ते के लिये अपार सामग्री तैयार है, पर जनकपुर की माताओं, सखियों और नागरिकों के लिये विदा का एक शब्द भी भारी हो रहा है।
जनकपुर में समाचार फैलता है कि बारात अब चलेगी। लोग एक दूसरे से पूछते हैं, फिर जाने की बात पक्की जानकर उदास हो जाते हैं। अभी जिन प्यारे अतिथियों को सामने देखकर आँखें भरती थीं, उन्हें देखने के लिये समय थोड़ा रह गया है। तुलसी इस बदलते हुए नगर को साँझ में सिमटते कमलों की तरह दिखाते हैं। विदाई की तैयारी राजघराने में हो रही है, और उसकी उदासी नगर भर में पहुँच गयी है।
इसी समय दूसरी ओर राह की व्यवस्था पूरी की जा रही है। भोजन, शय्याएँ, रथ, घोड़े, हाथी और अनेक उपहार रवाना होते हैं। सामान भेज देना सम्भव है; बेटियों को हृदय से लगाये हुए माताओं के हाथ बार बार रुक जाते हैं। चारों भाई विदा माँगने महल आते हैं तो वहाँ फिर हर्ष उठता है। राम के मुँह से चलने की बात सुनते ही वही रनिवास फिर बिलख उठता है। इस विदाई में हर्ष और विषाद एक दूसरे के बहुत पास हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम और उनके तीन भाई चारों राजकुमार जनक के महल में विदा माँगने आते हैं। राम माताओं से अपने बालक जानकर स्नेह बनाये रखने की प्रार्थना करते हैं।
- सीता और सब कुमारियाँ माताओं के बार बार के आलिंगन और परिवार के प्रेम के बीच विदा होती बेटियाँ।
- माताएँ और सखियाँ कुमारियों को आशीष और अपने गृहस्थ जीवन की सिखावन देती हैं, फिर उनसे अलग होने में व्याकुल हो उठती हैं।
- जनक विदाई का सब प्रबन्ध करनेवाले राजा, जो जानकी को देखकर अपना धीरज खो बैठते हैं और अन्त में पहुँचाने के लिये साथ चलते हैं।
- दशरथ ब्राह्मणों को दान और सम्मान देकर, उनके आशीर्वाद लेकर अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं।
- जनकपुरवासी चारों भाइयों का रूप आँखों में भरना चाहते हैं और सीता के चलते समय व्याकुल हो उठते हैं।
नगर का समाचार, राह की तैयारी
सबसे पहले नगरवासियों की बेचैनी सुनायी देती है। किसी एक घोषणा पर सब लोग चुपचाप विश्वास करके बैठ नहीं जाते। वे एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि क्या सचमुच बारात जानेवाली है। पूछने में उनकी विकलता है, और उत्तर मिल जाने पर उदासी। समाचार सत्य निकलता है। जिनके आने से नगर ने ऐसा सुख पाया, अब उनके जाने की बात निश्चित हो गयी है। तुलसी यहाँ किसी एक घर का दुःख लेकर नहीं चलते; नगर के लोग एक साथ इस समाचार से प्रभावित होते हैं।
पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता॥
चौपाई १
सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने॥
साँझ में कमल के सकुचाने की उपमा उस उदासी की गति बताती है। खिलाव धीरे धीरे सिमट रहा है। यह कथा में सूर्यास्त का समय बतानेवाली पंक्ति नहीं है; नगरवासियों की दशा कमलों जैसी कही गयी है। जो लोग अभी तक दर्शन का सुख लेते आये हैं, उनके सामने अब उस दर्शन का समाप्त होता अवसर है। उनके बार बार पूछने और फिर बिलखने के बीच बस इतना अन्तर है कि पहले बात सुनी गयी थी, अब उसका सत्य होना जान लिया गया है।
उधर जनक ने आने के रास्ते को लौटने की सुविधा से भर दिया है। जहाँ जहाँ बाराती आते समय ठहरे थे, उन्हीं ठिकानों के लिये रसोई का सामान भेजा जा रहा है। भोजन की व्यवस्था केवल अभी के महल तक सीमित नहीं रहती। मेवे और तरह तरह के पकवान हैं, भोजन बनाने की इतनी सामग्री है कि उसका पूरा वर्णन नहीं हो सकता। जिन स्थानों पर फिर ठहरना होगा, वहाँ पहले ही प्रबन्ध पहुँचता है। विदा देनेवाले घर का सत्कार यात्रा की राह तक साथ चल रहा है।
यह सामग्री अनगिनत बैलों और कहारों पर भर भरकर लादी गयी। जनक ने बहुत सी सुन्दर शय्याएँ भी भेजीं। पोद्दार की टीका शय्याओं का अर्थ पलँग करके खोलती है। राह में भोजन और विश्राम, दोनों का ध्यान रखा गया है। भार उठानेवाले साधनों का उल्लेख इस विस्तार को आँखों के सामने रख देता है। मेवे और पकवान कहकर बात समाप्त नहीं होती; उन्हें पहुँचाने के लिये बैल और कहार भी दिखाई देते हैं। आयोजन की समृद्धि के साथ उसे निभाने की व्यवस्था भी चली है।
भरि भरि बसहँ अपार कहारा । पठईं जनक अनेक सुसारा॥
चौपाई २
तुरग लाख रथ सहस पचीसा । सकल सँवारे नख अरु सीसा॥
इसके बाद तुलसी गिनती रखते हैं। एक लाख घोड़े हैं और पचीस हजार रथ। सब ऊपर से नीचे तक सजाये हुए हैं। फिर दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी आते हैं। उनके सामने दिशाओं के हाथियों के भी लजा जाने की उपमा है। यहाँ घोड़ों, रथों और हाथियों के लिये अलग अलग संख्या है, और उनके साथ सजावट का ध्यान भी बार बार लौटता है। भेजे जा रहे साधनों की संख्या बहुत बड़ी है; उनकी शोभा को कवि उतनी ही उदार उपमाओं में कहते हैं।
गाड़ियों में भरकर सोना, वस्त्र और रत्न दिये गये। भैंसें और गायें भी हैं, और अन्य अनेक प्रकार की वस्तुएँ भी। जनक का देना लगातार फैलता जाता है। सामग्री के इस वर्णन के बाद दोहा फिर से दिये गये अपरिमित दहेज की बात करता है। जितना गिनाया गया, उसके आगे भी बहुत कुछ है। लोकपालों के लोकों की सम्पदा तक इसे देखकर थोड़ी जान पड़ती है। तुलसी राजवैभव की नाप के लिये लोकों तक पहुँचते हैं, और फिर इस सारे सामान को अयोध्यापुरी भेज दिये जाने का समाचार देते हैं।
दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि।
दोहा ३३३
जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि॥ ३३३॥
जनकपुरवासी बारात के जाने की बात सत्य जानकर उदास हैं। जनक राह के पड़ावों पर भोजन और विश्राम की सामग्री भिजवाते हैं, तथा एक लाख घोड़े, पचीस हजार रथ, दस हजार हाथी और अनेक उपहार सजाकर अयोध्या भेज देते हैं।
गोद में सीता, वाणी में आशीष
सामान की विदाई के बाद कथा रानियों के पास आती है। उन्होंने सुना कि बारात चलेगी, और वे थोड़े पानी में छटपटाती मछलियों जैसी विकल हो गयीं। नगरवासियों के लिये साँझ के कमल थे; रनिवास में यह दूसरी उपमा है। इसमें असहाय व्याकुलता और बढ़ जाती है। आगे बढ़ती तैयारी के बीच रानियाँ सीता को बार बार गोद में कर लेती हैं। उनके पास अभी आशीर्वाद देने का समय है, समझाने का समय है, और हर बात के साथ बेटी को फिर पास खींच लेने का समय है।
उनकी पहली बात सीता के वैवाहिक सुख की कामना है। वे चाहती हैं कि सीता सदा पति को प्रिय रहें और उनका सुहाग अचल बना रहे। इसी आशीष के साथ सिखावन आती है। रानियाँ सास, ससुर और गुरु की सेवा करने को कहती हैं; पति की इच्छा समझकर उनकी आज्ञा का अनुसरण करने की सीख देती हैं। यह उस घर की माताओं का विदाई पर कहा हुआ उपदेश है। अपनी बेटी के आगे के जीवन के लिये जो गृहस्थ मर्यादा वे मानती हैं, उसी को स्नेह के साथ उसके हाथ रख रही हैं।
सासु ससुर गुर सेवा करेहू । पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू॥
चौपाई ३
अति सनेह बस सखीं सयानी । नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी॥
पास में सयानी सखियाँ भी हैं। वे अत्यन्त प्रेम के कारण कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म की बातें समझाती हैं। तुलसी उनकी वाणी की मृदुता अलग से कहते हैं। यह दृश्य केवल सीख सुनाने का नहीं है; सुनानेवालियों का प्रेम भी हर बात के साथ उपस्थित है। माताओं और सखियों की ये बातें उनकी अपनी भूमिका में आती हैं। जिनसे बिछुड़ने का समय सामने है, वे अपने स्नेह और अनुभव के अनुसार विदा होती कुमारियों को समझा रही हैं।
सीता को बार बार गोद में लेने से आरम्भ हुआ चित्र अब सभी पुत्रियों तक फैलता है। रानियाँ सब कुमारियों को आदर से समझाती हैं, सबको फिर फिर हृदय से लगाती हैं। विदा की तैयारी में यह बार बार मिलना स्वयं एक कठिनाई बन जाता है। समझा लेने के बाद भी आलिंगन बाकी रह जाता है, और आलिंगन के बाद भी फिर भेंटने की इच्छा। बेटियों के लिये कहने को मर्यादा के इतने वचन हैं, पर उन्हें जाने देने के लिये मन को धीरज जुटाना पड़ रहा है।
फिर माताओं के मुँह से एक ऐसा प्रश्न निकलता है जिसमें सारा विषाद आ जाता है। वे कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्रियों को क्यों रचा। वही माताएँ अभी पुत्रियों को गृहस्थ जीवन की सीख दे रही थीं; अब बिछोह की पीड़ा में स्त्री के रचे जाने पर ही प्रश्न करती हैं। उनके इस विलाप को सुनकर विदाई का भार समझ में आता है। बेटियों को सँभालनेवाली वाणी स्वयं दुखी हो गयी है। सीख और आशीर्वाद पूरे होते हैं, पर उनसे माताओं का हृदय शान्त नहीं हो जाता।
माताएँ सीता के सुहाग और प्रिय बने रहने का आशीर्वाद देती हैं। वे और सयानी सखियाँ कुमारियों को अपने गृहस्थ जीवन की मर्यादाएँ समझाती हैं। सब बेटियों को बार बार हृदय से लगाते हुए माताएँ बिछोह के दुःख में ब्रह्मा से प्रश्न कर उठती हैं।
चारों भाइयों को आँख भर देख लेना
इसी समय राम अपने भाइयों सहित जनक के महल की ओर चले। वे प्रसन्न हैं, और आने का प्रयोजन विदा माँगना है। तुलसी उन्हें सूर्यवंश की पताका कहते हैं। महल के भीतर माताएँ बेटियों से बार बार मिल रही हैं, उधर चारों भाई उनसे आज्ञा लेने आ रहे हैं। दोनों ओर की गति इसी एक विदाई पर आकर मिलेगी। अभी भाइयों के महल तक पहुँचने के रास्ते में नगरवासियों को फिर एक बार दर्शन का अवसर मिल जाता है।
तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानु कुल केतु।
दोहा ३३४
चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु॥ ३३४॥
नगर के स्त्री और पुरुष चारों भाइयों को देखने दौड़ पड़ते हैं। उनकी स्वाभाविक सुन्दरता सबको खींचती है। लोगों की बातचीत में फिर वही समाचार है, आज ये जाना चाहते हैं, विदेह ने विदाई का सारा सामान तैयार कर दिया है। पहले लोग समाचार की सच्चाई पूछ रहे थे। अब सामने आते राजकुमारों को देखकर एक दूसरे को सचेत कर रहे हैं कि देखने का यह अवसर हाथ में है। चारों प्रिय अतिथि सामने हैं, और आज ही चलनेवाले हैं।
चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए । नगर नारि नर देखन धाए॥
चौपाई ४
कोउ कह चलन चहत हहिं आजू । कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू॥
एक दूसरे से कहा जाता है कि राजा के इन चारों पुत्रों का रूप नेत्र भरकर देख लिया जाय। कौन जानता है, किस पुण्य से विधाता इन्हें यहाँ ले आये और आँखों का अतिथि बना दिया। अतिथि कहने में मिलने का सुख भी है और उसके थोड़े समय का होना भी। नगरवासियों को इस दर्शन का सौभाग्य इतना बड़ा लगता है कि उसका कारण बताने के लिये वे अपने किसी अज्ञात पुण्य की ओर देखते हैं। जितना मिला है, उसे आँखों में भर लेने की जल्दी है।
वे अपने सुख के लिये तीन उपमाएँ रखते हैं। मरनेवाला अमृत पा जाय, जन्म भर का भूखा कल्पवृक्ष पा जाय, और नरक में पड़ा हुआ जीव भगवान् का परमपद पा जाय, तो जैसा उसका सुख होगा, वैसा ही इन भाइयों का दर्शन उन्हें मिला है। प्रत्येक उपमा में अभाव बहुत गहरा है और मिला हुआ सुख बहुत बड़ा। इसीलिये अब जाने की बात भी इतनी पीड़ादायक है। जिस दर्शन को अमृत पाने के बराबर कहा जा रहा है, उससे सहज ही तृप्त होकर कोई आँख फेर कैसे ले।
फिर देखने की बात हृदय में रखने की बात हो जाती है। वे कहते हैं कि राम की शोभा को निरखकर भीतर धारण कर लें। इसके लिये मन को साँप और राम की मूर्ति को मणि बनाने की उपमा आती है। मणि के प्रति साँप की सावधानी में उस रूप को सँजोये रहने की इच्छा दिखाई देती है। जो अभी आँखों के सामने है, वही हृदय की धरोहर बने। जाने की तैयारी सुन चुके नगरवासियों के लिये यह भीतर रख लेना बहुत प्रिय उपाय है।
निरखि राम सोभा उर धरहू । निज मन फनि मूरति मनि करहू॥
चौपाई ५
एहि बिधि सबहि नयन फलु देता । गए कुअँर सब राज निकेता॥
चारों राजकुमार इस तरह सबको नेत्रों का फल देते हुए राजमहल पहुँचते हैं। नगर की पुकारें किसी एक भाई तक सीमित नहीं हैं। चारों के दर्शन के लिये लोग दौड़े थे, चारों प्रिय पाहुने कहे गये, और सब कुमार महल में जाते हैं। राम की शोभा को हृदय में रखने का आग्रह उनके बीच विशेष रूप से आता है। इस पूरे मार्ग में नागरिकों का प्रेम साथ बना रहता है, फिर महल का प्रेम उस दर्शन को अपने भीतर ले लेता है।
राम तीनों भाइयों सहित विदा माँगने जनक के महल जाते हैं। नगरवासी चारों को देखने दौड़ते हैं, दर्शन को अमृत, कल्पवृक्ष और परमपद पाने जैसा सुख कहते हैं, और राम की मूर्ति को मन में मणि की तरह सँजो लेना चाहते हैं।
महल में फिर हर्ष, फिर विदा की बात
रूप के समुद्र जैसे सब भाइयों को देखकर पूरा रनिवास हर्षित हो उठा। सासुएँ प्रसन्न मन से निछावर और आरती करने लगीं। अभी इसी स्थान पर विदाई का दुःख छाया था। अब कुमार सामने आये तो देखने और स्वागत करने का सुख उमड़ पड़ा। दोहा तीन सौ पैंतीस इसी हर्ष को रखता है। विदा माँगने आये अतिथियों का सत्कार फिर आरम्भ होता है; उनके आने के प्रयोजन के बीच भी प्रेम को अपना उत्सव मिल गया है।
राम की छवि देखकर रानियाँ प्रेम में ऐसी मग्न हुईं कि बार बार उनके चरणों लगने लगीं। हृदय में प्रीति छा गयी, लज्जा का संकोच जाता रहा। तुलसी इस स्वाभाविक स्नेह का वर्णन कर पाने की कठिनाई कहते हैं। यहाँ रानियों का आदर किसी एक औपचारिक क्रिया में पूरा नहीं होता। आरती और निछावर के बाद भी प्रेम बढ़ता है, और वे बार बार चरणों तक झुक आती हैं। दर्शन ने उनके भीतर फिर वही अनुराग भर दिया है।
उन्होंने राम को भाइयों सहित उबटन लगाया, स्नान कराया और बड़े प्रेम से छह रसों वाला भोजन कराया। चारों भाइयों की उपस्थिति इस सत्कार में फिर साफ कही गयी है। माताओं के पास विदाई से पहले भी उन्हें स्नान और भोजन कराने का समय है। अतिथि को खिलाने का आग्रह उनके स्नेह का रूप बनता है। रसोई का सामान राह के लिये भेजा जा चुका है, और महल में सासुएँ स्वयं अपने सामने राजकुमारों को प्रेम से जिमा रही हैं।
उचित अवसर देखकर राम बोले। उनकी वाणी को तुलसी शील, स्नेह और संकोच से भरी हुई कहते हैं। उन्हें पिता की ओर से विदा माँगनी है, और सामने वे माताएँ हैं जिनका इतना प्रेम अभी मिला है। उनके वाक्य में पहले महाराज के चलने की इच्छा आती है, फिर यहाँ भेजे जाने का कारण, और अन्त में माताओं के लिये प्रार्थना। वे स्वयं को उनका बालक कहते हैं। जाने की आज्ञा लेते हुए भी इसी बालक पर उनका स्नेह बना रहे, यही माँग रखते हैं।
राउ अवधपुर चहत सिधाए । बिदा होन हम इहाँ पठाए॥
चौपाई ६
मातु मुदित मन आयसु देहू । बालक जानि करब नित नेहू॥
महाराज अयोध्यापुरी चलना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने हमें यहाँ विदा लेने भेजा है। हे माता, प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिये और अपने बालक जानकर सदा स्नेह बनाये रखिये। राम की यह प्रार्थना सुनते ही रनिवास फिर उदास हो जाता है। सासुओं से प्रेम के कारण बोला नहीं जाता। वे सभी कुमारियों को हृदय से लगा लेती हैं, फिर उनके पतियों को सौंपकर बहुत विनती करती हैं। स्वागत के हर्ष में जो बात कुछ देर ठहरी थी, अब वह सामने आ गयी है।
चारों भाइयों को देखकर रनिवास हर्षित होता है। माताएँ आरती, निछावर, स्नान और भोजन से उनका सत्कार करती हैं। राम अपने पिता की ओर से विदा माँगते हैं और बालक जानकर स्नेह रखने की प्रार्थना करते हैं; यह सुनते ही माताओं की व्याकुलता लौट आती है।
माता की पूरी विनती
सब कुमारियों को उनके पतियों के हाथ सौंपने के बाद कथा सीता की माता की विनती पर ठहरती है। वे सीता को राम के सुपुर्द करके हाथ जोड़ती हैं और बार बार कहती हैं। अभी राम ने माता से अपने बालक जानकर स्नेह रखने की प्रार्थना की थी। अब माता उन्हें तात कहकर सम्बोधित करती हैं। उनका हाथ जुड़ा है, बेटी सामने है, और कहने के लिये पूरे घर तथा पूरे नगर का प्रेम है। छन्द इसी विनती को विस्तार से सुनाता है।
करि बिनय सिय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै।
छन्द, सोरठा ३३६ से पहले
बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै॥
परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।
तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी॥
हे तात, हे सुजान, हम आप पर बलि जायँ। आप सबकी दशा जानते हैं। माता की बात इसी विश्वास से खुलती है कि सामने खड़े राम से किसी का हाल छिपा हुआ नहीं है। फिर भी सीता के लिये घर का स्नेह कहे बिना वे रह नहीं पातीं। परिवार को, नगरवासियों को, स्वयं माता को और राजा को, सीता प्राणों जैसी प्रिय हैं। इन सबका नाम उनकी वाणी में अलग अलग आता है। बेटी को सौंपते समय उसके पीछे जुड़े हुए प्रेम का पूरा विस्तार भी राम के सामने रख दिया जाता है।
परिवार और पुरजन कहने के बाद वे अपनी और राजा की प्रीति विशेष रूप से कहती हैं। सीता इस घर की राजकुमारी हैं, और जनकपुर की अपनी बेटी भी हैं। अभी राह में चारों भाइयों को देखने दौड़े नगरवासी मिले थे; माता के इस वाक्य में वही नगर सीता के प्रति अपने प्रेम के साथ उपस्थित है। जिनके लिये वह प्राणप्रिय हैं, उनमें महल और नगर दोनों आते हैं। माता राम से आग्रह करती हैं कि सीता को इसी तरह जानें, इतनी प्रिय समझकर रखें।
फिर वे तुलसी के स्वामी कहकर प्रार्थना करती हैं कि सीता के शील और स्नेह को देखकर उन्हें अपनी दासी मानकर स्वीकार करें। माता की इस विनय में दासी का सम्बोधन समर्पण की भाषा है। वे बेटी का शील कहती हैं, उसका स्नेह कहती हैं और उसे अपनाये रखने की प्रार्थना करती हैं। विनती करते हुए उनका भरोसा राम के गुणों पर है। उसी भरोसे को अगला सोरठा पूरा खोलता है। माता जिस हाथ में सीता को सौंप रही हैं, उसकी करुणा को एक एक नाम से पुकारती हैं।
तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय।
सोरठा ३३६
जन गुन गाहक राम दोष दलन करुनायतन॥ ३३६॥
वे कहती हैं कि राम पूर्णकाम हैं, उनकी कोई कामना अधूरी नहीं है। वे सुजान लोगों के शिरोमणि हैं और भावप्रिय हैं। पोद्दार की टीका भावप्रिय का अर्थ स्पष्ट करती है, उन्हें प्रेम प्यारा है। माता के लिये यह विशेषण अभी कही गयी बेटी के स्नेह की बात से जुड़ता है। सीता के शील और प्रेम को पहचानकर स्वीकार करने की प्रार्थना उन्हीं से की गयी है जो भाव को प्रिय मानते हैं। माता अपने अनुरोध के साथ उस पर विश्वास करने का आधार भी कह रही हैं।
विनती आगे कहती है कि राम अपने जनों के गुण ग्रहण करते हैं, दोषों का नाश करते हैं और दया के धाम हैं। माता की वाणी में गुण को पहचानना और दोष को हरना दोनों आते हैं। पूर्णकाम, सुजानशिरोमणि, भावप्रिय, भक्तों के गुणों के ग्राहक, दोषों के नाशक और करुणा के धाम, इस पूरी पुकार के बाद ही उनकी बात रुकती है। सीता के प्राणप्रिय होने का स्मरण कराते हुए वे राम की करुणा में अपना विश्वास रख चुकी हैं।
इतना कहकर रानी राम के चरण पकड़कर रह गयीं। तुलसी उनकी वाणी को प्रेम के दलदल में समा गयी हुई कहते हैं। बोलना चल नहीं पाता। अभी उसी वाणी ने परिवार, पुरजन और राजा का प्रेम गिनाया था; अब प्रेम का अपना भार उसे रोक लेता है। राम उस स्नेह से सनी श्रेष्ठ वाणी को सुनकर सास का बहुत प्रकार से सम्मान करते हैं। माता की विनती के उत्तर में उनके सम्मान और प्रणाम का आचरण सामने आता है।
माता सीता को परिवार, पुरजन, अपने और राजा के लिये प्राणप्रिय बताकर राम को सौंपती हैं। वे सीता का शील और स्नेह स्वीकार करने की विनती करती हैं तथा राम को पूर्णकाम, सुजान, भावप्रिय, गुणों के ग्राहक, दोषहर और करुणा का धाम कहती हैं। बोलना रुक जाता है और राम उनका बहुत आदर करते हैं।
आशीर्वाद के बाद भी मिलना बाकी है
राम हाथ जोड़कर विदा माँगते हैं। वे बार बार प्रणाम करते हैं, आशीर्वाद पाते हैं और फिर सिर झुकाते हैं। इसके बाद भाइयों सहित चल देते हैं। विदा लेने की इन क्रियाओं में वह शील उपस्थित है जिसे उनकी बात शुरू होने से पहले कहा गया था। माता चरण पकड़कर रह गयी थीं; अब राम स्वयं बार बार प्रणाम करके उनके आशीर्वाद को ग्रहण कर रहे हैं। चारों भाइयों की विदाई इसी आदर के साथ होती है।
राम बिदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रनामु बहोरि बहोरी॥
चौपाई ७
पाइ असीस बहुरि सिरु नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई॥
रानियाँ राम की सुन्दर और मधुर मूर्ति को हृदय में लाकर स्नेह से शिथिल हो जाती हैं। नगरवासियों ने उनकी मूर्ति को भीतर सँजो लेने की बात कही थी; अब वही भीतर धारण करना रानियों की दशा में दिखाई देता है। फिर वे धीरज रखती हैं और कुमारियों को बुलाती हैं। माताएँ बार बार बेटियों से भेंटती हैं। भाइयों को आशीर्वाद देकर विदा कर दिया गया है, पर पुत्रियों से मिलना अभी फिर आरम्भ हो जाता है।
वे बेटियों को पहुँचाने जाती हैं, फिर लौटकर उनसे मिलती हैं। तुलसी कहते हैं कि परस्पर प्रेम बहुत बढ़ गया। इतने बार के मिलन में विदाई का काम धीरे धीरे आगे जाता है, और प्रत्येक भेंट उसे फिर रोक लेती है। जिस बेटी को अभी हृदय से लगाया था, उसे दुबारा गले लगाने की इच्छा उठती है। माताओं के लिये विदा एक बार की क्रिया नहीं रह पाती। वे पहुँचाती हैं, फिर मिलती हैं, और यह आना जाना उनके बढ़ते हुए प्रेम का रूप हो जाता है।
पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी । बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी॥
चौपाई ८
पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई॥
अन्त में सखियाँ बार बार मिलती हुई माताओं को अलग करती हैं। तुलसी इसके लिये हाल में ब्यायी हुई गाय को उसके छोटे बछड़े से अलग करने की उपमा देते हैं। यहाँ समझाने का कोई नया वचन नहीं आता। माँ और बेटी को अलग करना पड़ता है, और उपमा उसी खिंचाव की पीड़ा दिखाती है। जो सखियाँ पहले कोमल वाणी में सिखावन दे रही थीं, उन्हीं को अब इस कठिन काम में हाथ देना पड़ रहा है।
इसके बाद दोहा पूरे दृश्य को नगर भर में फैला देता है। सभी स्त्री और पुरुष, सखियाँ और रनिवास, सब प्रेम के वश हैं। ऐसा जान पड़ता है जैसे करुणा और विरह ने जनकपुर में निवास बना लिया हो। पहले समाचार पर लोगों की उदासी थी। फिर माताओं की व्याकुलता और बार बार का आलिंगन देखा गया। अब उन सबको एक साथ देखकर नगर ही करुणा का निवास लगने लगा है। सीता की विदा में इतने लोगों का अपना स्नेह बोल रहा है।
प्रेमबिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु।
दोहा ३३७
मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवासु॥ ३३७॥
राम बार बार प्रणाम करके आशीर्वाद लेते हैं और भाइयों सहित चल देते हैं। माताएँ बेटियों को पहुँचाकर फिर भेंटती हैं; सखियों को उन्हें अलग करना पड़ता है। स्त्री, पुरुष, सखियाँ और रनिवास, पूरा जनकपुर करुणा और विरह से भर जाता है।
वैदेही कहाँ हैं
मनुष्यों के इस बिछोह के बीच अब एक पुकार पक्षियों के पास से आती है। जानकी ने जिन तोतों और मैनाओं को पाल पोसकर बड़ा किया था, जिन्हें सोने के पिंजरों में रखकर पढ़ाया था, वे व्याकुल हो रहे हैं। उनका प्रश्न छोटा है, वैदेही कहाँ हैं। सीता ने जिन पक्षियों को बोलना सिखाया, उन्हीं के मुख से आज उन्हें खोजती हुई आवाज़ निकल रही है। सुननेवालों के लिये यह पुकार सहना कठिन पड़ता है।
सुक सारिका जानकी ज्याए । कनक पिंजरन्हि राखि पढ़ाए॥
चौपाई ९
ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही । सुनि धीरजु परिहरइ न केही॥
सोने के पिंजरे इस दृश्य में अपनी जगह बने हैं, पर पक्षी वैदेही को पूछ रहे हैं। उनके पालन और सिखाये जाने का स्मरण तुलसी प्रश्न से पहले कराते हैं। इसलिये पुकार में केवल एक नाम सुनायी नहीं देता; सीता का उन छोटे जीवों के साथ रहा सम्बन्ध भी सामने आ जाता है। जो उन्हें पालती थीं और पढ़ाती थीं, उन्हीं की खोज में वे व्याकुल हैं। यह सुनकर सबका धीरज छूट जाता है। मनुष्यों का सँभाला हुआ मन पक्षियों की बोली के आगे फिर भर आता है।
पक्षी और पशु तक इतने विकल हैं तो मनुष्यों की दशा कैसे कही जा सकती है। इस बात के साथ कथा जनक को सामने लाती है। वे अपने भाई सहित वहाँ आते हैं, प्रेम उमड़ता है और उनकी आँखों में जल भर जाता है। अभी तक उनके हाथों से विदाई का विशाल प्रबन्ध होता दिखाई दिया था। अब राजा स्वयं उस बिछोह के बीच पहुँचते हैं जिसके लिये सारा सामान सजवाया गया था। सामने जानकी हैं।
सीता को देखते ही जनक की धीरता भाग जाती है। तुलसी उनके परम विरागी कहलाने की बात ठीक इसी क्षण रखते हैं। राजा जानकी को हृदय से लगा लेते हैं और ज्ञान की महान् मर्यादा मिट जाती है। पोद्दार की टीका इसको प्रेम के प्रभाव से ज्ञान का बाँध टूट जाना कहकर समझाती है। जनक के वैराग्य का परिचय और उनका बेटी को हृदय से लगा लेना, दोनों साथ पढ़े जाते हैं। बेटी सामने आते ही उनका धीरज भी शेष नहीं रह पाता।
सीय बिलोकि धीरता भागी । रहे कहावत परम बिरागी॥
चौपाई १०
लीन्हि रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की॥
बुद्धिमान मन्त्री अब उन्हें समझाते हैं। राजा विचार करते हैं और जानते हैं कि यह विषाद में डूबे रहने का अवसर नहीं है। प्रस्थान की घड़ी का ध्यान फिर लौटता है। वे पुत्रियों को बार बार हृदय से लगाते हुए सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवाते हैं। धीरज सँभालने के बाद भी आलिंगन बंद नहीं हो जाते। पिता की प्रीति और राजा की व्यवस्था एक साथ आगे चलती हैं। जिन बेटियों को हृदय से लगाया है, उन्हीं के लिये पालकियाँ तैयार करायी जाती हैं।
प्रेमबिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस।
दोहा ३३८
कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस॥ ३३८॥
सारा परिवार प्रेम में विवश है। जनक शुभ मुहूर्त पहचानते हैं, सिद्धि सहित गणेशजी का स्मरण करते हैं और कन्याओं को पालकियों में बैठाते हैं। दोहे में परिवार की विवशता पहले आती है और राजा का मुहूर्त पहचानना उसके साथ रखा जाता है। विदाई का दुःख बना हुआ है; उसी के बीच शुभ घड़ी में यात्रा का काम पूरा करना है। गणेश स्मरण के साथ कन्याओं का पालकियों पर चढ़ना, अब प्रस्थान को और समीप ले आता है।
सीता के पाले और पढ़ाये तोते तथा मैनाएँ वैदेही को पूछते हैं तो सबका धीरज छूट जाता है। जनक भी जानकी को देखकर संयम खो देते हैं। मन्त्री उन्हें सँभालते हैं; वे पुत्रियों को बार बार गले लगाकर पालकियाँ मँगवाते हैं और गणेश स्मरण करके कन्याओं को उनमें बैठाते हैं।
जनक साथ चले, दशरथ ने प्रस्थान किया
राजा पुत्रियों को अनेक प्रकार से समझाते हैं। वे उन्हें स्त्रियों का धर्म और अपने कुल की रीति सिखाते हैं। माताओं और सखियों के बाद अब पिता की विदाई की सीख आती है। साथ ही बहुत से दासी और दास दिये जाते हैं। इनके परिचय में दो बातें खास हैं, वे सीता को प्रिय हैं और विश्वासपात्र हैं। पोद्दार की टीका सेवकों के लिये यही विश्वासपात्र होने का अर्थ खोलती है। विदा होती बेटी के साथ ऐसे लोग रखे जा रहे हैं जिन पर उसका भरोसा है और जिनसे उसका अपना लगाव है।
सीता के चलने पर जनकपुर के निवासी व्याकुल हो उठते हैं। इसी समय मंगल से भरे शुभ शकुन भी हो रहे हैं। जनक उन्हें पहुँचाने के लिये साथ चलते हैं, और ब्राह्मण तथा मन्त्रियों का समाज उनके साथ है। राजा ने कन्याओं को पालकियों में बैठा दिया, परिचित सेवकों को साथ दिया, अब स्वयं भी विदा करने चल पड़े। नगर का दुःख और यात्रा के शुभ संकेत, दोनों इस चलने के साथ उपस्थित हैं।
सीय चलत ब्याकुल पुरबासी । होहिं सगुन सुभ मंगल रासी॥
चौपाई ११
भूसुर सचिव समेत समाजा । संग चले पहुँचावन राजा॥
समय देखकर बाजे बजने लगते हैं। बाराती अपने रथ, हाथी और घोड़े सजाते हैं। नगर में बारात के जाने का समाचार सुनने से आरम्भ हुई कथा अब सचमुच प्रस्थान की तैयारी तक पहुँच गयी है। सामान पहले भेजा गया था, महल में आज्ञा और आशीर्वाद लिये गये, कुमारियों को पालकियों में बैठाया गया, और अब बारात के वाहन सज रहे हैं। विदाई की अनेक छोटी क्रियाएँ पूरी होने पर यात्रा आगे बढ़ने की अवस्था में आती है।
दशरथ सब ब्राह्मणों को बुलाते हैं और दान तथा सम्मान से उन्हें परिपूर्ण करते हैं। वे उनके चरणकमलों की धूल अपने सिर पर रखते हैं और आशीर्वाद पाकर प्रसन्न होते हैं। राजा के प्रस्थान में इस आदर को तुलसी अलग से जगह देते हैं। महल से विदा लेते राम ने बार बार प्रणाम करके आशीर्वाद लिया था। यहाँ दशरथ भी चरणधूल और आशीष लेकर चलने को तैयार होते हैं। यात्रा के मंगल में बड़ों का आदर इस तरह शामिल है।
दशरथ गणेशजी का स्मरण करके प्रस्थान करते हैं। अनेक मंगलमूलक शकुन होते हैं। देवता प्रसन्न होकर फूल बरसा रहे हैं, अप्सराएँ गा रही हैं, और नगाड़े बज रहे हैं। अवधपति आनन्द से अयोध्यापुरी की ओर चल देते हैं। विदाई के इस अन्तिम दोहे में अब यात्रा की दिशा साफ है। पीछे जनकपुर के नागरिकों की व्याकुलता है, माता की विनती है और पक्षियों की पुकार है। उन्हीं के बीच आशीर्वाद लिये हुए बारात का चलना आरम्भ हो गया है।
सुर प्रसून बरषहिं हरषि करहिं अपछरा गान।
दोहा ३३९
चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान॥ ३३९॥
जनक पुत्रियों को कुल की रीति समझाते हैं, प्रिय और विश्वासपात्र सेवक देते हैं तथा ब्राह्मणों और मन्त्रियों सहित पहुँचाने के लिये साथ चलते हैं। दशरथ ब्राह्मणों का दान और सम्मान करते हैं, आशीष लेते हैं और गणेश स्मरण करके अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस विदाई को पढ़ते हुए बार बार हृदय से लगाने की क्रिया लौटती है। माताएँ समझाती हैं और फिर गले लगा लेती हैं। राम को आशीष देकर विदा करती हैं, फिर बेटियों को बुलाती हैं। पहुँचाने जाती हैं और लौटकर फिर मिलती हैं। जनक धीरज सँभालते हैं और पुत्रियों को फिर हृदय से लगाते हैं। प्रत्येक आलिंगन में जाने की घड़ी कुछ और कठिन हो जाती है। तुलसी इन मिलनों को एक ही वाक्य में समाप्त नहीं करते; उनके लौटते रहने से विदाई का समय महसूस होता है।
माता की विनती में परिवार, नगर, अपना हृदय और राजा, सबकी प्रीति एक साथ आती है। उसके कुछ ही आगे तोते और मैनाएँ सीता को पुकार उठते हैं। इस तरह सीता के प्राणप्रिय होने का कथन अनेक रूपों में दिखाई देने लगता है। माताओं के हाथ, नागरिकों की आँखें, पक्षियों की बोली और पिता का छूटता धीरज, सब उसी प्रियता को प्रकट करते हैं। उनके चलते समय नगर का व्याकुल होना उसी फैले हुए सम्बन्ध का दुःख है।
विदाई में शुभ शकुन और आँसू साथ हैं। कन्याओं को पालकियों पर बैठाते समय परिवार प्रेम में विवश है और जनक शुभ लग्न देख रहे हैं। सीता के चलते समय नागरिक व्याकुल हैं और मंगल के संकेत हो रहे हैं। यह साथ रहना इस प्रसंग की अपनी दशा है। यात्रा का शुभ होना घरवालों के बिछोह को हलका नहीं कर देता। वे अपने स्नेह सहित विदा देते हैं, और जानेवाले उसी स्नेह का आशीर्वाद लेकर चलते हैं।
जनक ब्राह्मणों और मन्त्रियों के साथ पहुँचाने चले हैं। दशरथ ने चरणधूल सिर पर रखी, आशीर्वाद लिये और गणेशजी का स्मरण किया। देवताओं के फूल, अप्सराओं का गान और नगाड़ों की ध्वनि के बीच अवधपति अयोध्या की ओर प्रस्थान करते हैं। विदा की घड़ी अब यात्रा बन गयी है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३३३ से ३३९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।