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कवि की विनय, और उन सबकी वंदना जिनसे यह कथा चलेगी

रामचरितमानस · बालकाण्ड · कवि की विनय, और उन सबकी वंदना जिनसे यह कथा चलेगी

कवि की विनय, और उन सबकी वंदना जिनसे यह कथा चलेगी

एक आदमी अपनी रचना के सारे दोष स्वयं गिना देता है, अपना नाम ठगों की सूची में सबसे ऊपर लिख देता है, और फिर एक-एक करके उन सबके चरण पकड़ता है जिनके बल पर वह इतनी बड़ी कथा कहने चला है।

मंगलाचरण हो चुका है और कथा अभी शुरू नहीं हुई है। बीच में यह पन्ना पड़ा है, आठ दोहों का, और इसमें एक भी घटना नहीं घटती। न कोई जन्म, न कोई वन, न कोई धनुष। इसमें बस एक आदमी बोलता है, और अपने ही बारे में बोलता है, और जो कुछ कहता है वह अपने विरुद्ध कहता है। बुद्धि छोटी है। रचना भद्दी है। छन्द और अलंकार का ज्ञान नहीं है। रस एक भी नहीं है। और कलियुग में जो लोग राम का भक्त कहलाकर ठगते फिरते हैं, उनकी गिनती में पहला नाम मेरा है।

पर इसे केवल विनय समझ लेना इस हिस्से को आधा पढ़ना है। इन आठ दोहों में एक पूरी दलील चल रही है, और वह दलील एक ही प्रश्न के आसपास घूमती है, कि जो कहा जा रहा है वह इतना बड़ा है और कहनेवाला इतना छोटा, तो कहा ही क्यों जाय। उत्तर एक बार में नहीं आता। वह पाँच-छह बार अलग-अलग रास्तों से आता है, कभी भौंरे के रास्ते, कभी चन्दन के, कभी सीप और स्वाति के, कभी नदी पर बँधे पुल के, और अन्त में ऐसे मन्त्रों के रास्ते जिनके अक्षर ही आपस में नहीं मिलते।

और यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। जिस मुनि ने रामायण रची, उनके चरणों में यहाँ सिर नवाया जाता है, पर पंक्ति में उनका नाम नहीं आता, केवल उनका काम आता है। नाम पोद्दार की टीका देती है। इस भेद को यहीं दर्ज कर लेना ठीक है, क्योंकि आगे जो कथा चलेगी वह इसी कवि की अपनी चाल से चलेगी, और उसे किसी और रामायण की चाल समझ लेना दोनों के साथ अन्याय होगा।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • तुलसीदास इस प्रसंग का अकेला बोलनेवाला, जो अपने सारे दोष स्वयं गिनाता है और फिर भी कथा कहने से पीछे नहीं हटता।
  • सज्जन वे सुननेवाले जो भौंरे की तरह गुण ही ग्रहण करते हैं, और जो समुद्र की तरह दूसरे की पूर्णता देखकर उमड़ पड़ते हैं।
  • खल वे सुननेवाले जो पराये दोष को गहने की तरह पहने रहते हैं, और जिन्हें इस पन्ने पर हँसने की अनुमति तक दे दी जाती है।
  • सारदा सरस्वती, जो कवि के स्मरण करते ही ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी आती हैं, और जिनकी थकान रामचरित के सरोवर में ही उतरती है।
  • रामायण रचनेवाले मुनि सोरठे में इनका नाम नहीं आता, केवल इनका काम आता है। पोद्दार की टीका इन्हें वाल्मीकि बताती है।
  • ब्यास आदि कवि वे जिन्होंने पहले हरि का सुयश गाया, और जिनके बनाये मार्ग पर चलना तुलसी अपने लिये सुगम बताते हैं।
  • शिव और पार्वती इस पन्ने पर गुरु भी, माता-पिता भी, और शाबर मन्त्रों के रचयिता भी, जिनका प्रसाद पाकर कथा आरम्भ होती है।

पहले प्रणाम, फिर विनती

पिछले प्रसंग में वंदना हो चुकी थी, गुरु की, संतों की, और उन सबकी जिनसे कथा का आरम्भ होता है। अब कवि एक बार फिर हाथ जोड़ता है, पर इस बार जिनके सामने जोड़ता है उनकी गिनती ही नहीं हो सकती। वह चौरासी लाख योनियों की ओर मुड़ता है, जल की, पृथ्वी की, आकाश की, और उन सबको एक साथ प्रणाम करता है। और प्रणाम करने का कारण जो देता है, वही इस पूरे पन्ने की नींव है।

आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल थल नभ बासी॥
सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥

चौपाई १

चौरासी लाख योनियों में चार प्रकार के जीव हैं, और वे जल में, पृथ्वी पर और आकाश में बसते हैं। इस सारे जगत् को सीता और राम से भरा हुआ जानकर मैं दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता हूँ। ध्यान देने की बात यह है कि प्रणाम किसी श्रेष्ठ को नहीं हो रहा। वह कीड़े को भी हो रहा है और पत्थर के नीचे बैठे जीव को भी। कारण एक ही है, और वह कारण उन जीवों में नहीं है, उनके भीतर बैठे हुए में है।

और जिस क्षण यह कह दिया गया कि सब कुछ सीयराममय है, उसी क्षण अगली पंक्ति में उन्हीं सबसे कुछ माँगा जा सकता है। कवि कहता है, मुझे अपना दास जानकर, हे कृपा की खान, आप सब मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिये, क्योंकि मुझे अपनी बुद्धि के बल का भरोसा नहीं है। विनती का पात्र चुनने में यहाँ कोई छँटाई नहीं है। जिससे भी माँगा जा सकता था, उससे माँग लिया गया है। फिर वह बताता है कि माँग किस बात के लिये है, और उसी साँस में अपनी कठिनाई का नाप भी दे देता है।

करन चहउँ रघुपति गुन गाहा । लघु मति मोरि चरित अवगाहा॥
सूझ न एकउ अंग उपाऊ । मन मति रंक मनोरथ राऊ॥

चौपाई २

मैं रघुनाथ के गुणों की कथा कहना चाहता हूँ, पर मेरी बुद्धि छोटी है और वह चरित्र अथाह है, और उपाय का एक भी अंग नहीं सूझता। और फिर वह आधी पंक्ति आती है जिसे सुनकर आदमी रुक जाता है, मन मति रंक मनोरथ राऊ। मन और बुद्धि कंगाल हैं, और मनोरथ राजा है। एक ही आदमी के भीतर दोनों बैठे हैं और एक दूसरे को देख रहे हैं। जिसे चाहिये वह राजा है, और जिसे कमाकर लाना है वह भिखारी।

अगली चौपाई इसी को दूसरी तरफ़ से कहती है। बुद्धि अत्यन्त नीची है और रुचि बहुत ऊँची। चाह अमृत की है, और जगत् में छाछ भी नहीं जुड़ती। यह विनय का सामान्य ढंग नहीं है। विनय प्रायः अपने को छोटा कहकर वहीं रुक जाती है। यहाँ छोटा कहने के बाद भी माँग वापस नहीं ली जाती। चाह ऊँची की ऊँची बनी रहती है, और उसे ऊँची रहने दिया जाता है।

सार: कवि चौरासी लाख योनियों के सारे जीवों को सीता और राम से भरा हुआ जानकर हाथ जोड़ता है, और फिर उन्हीं सबसे कृपा माँगता है। वह कहता है कि रघुनाथ के गुण गाने चला है पर बुद्धि छोटी है और चरित्र अथाह, मन और बुद्धि कंगाल हैं और मनोरथ राजा है, और चाह अमृत की है वहाँ छाछ भी नहीं जुड़ती।

जो अपने जल से बढ़ते हैं, और जो चाँद देखकर उमड़ता है

अब वह अपने सुननेवालों की ओर देखता है और उन्हें दो हिस्सों में बाँट देता है। यह बँटवारा इस पन्ने पर बार-बार लौटेगा, इसलिये इसे ठीक से देख लेना चाहिये। एक ओर सज्जन हैं, जो बालक के तोतले वचन को माता-पिता की तरह प्रसन्न मन से सुनेंगे। दूसरी ओर वे हैं जो पराये दोषों को गहने की तरह पहने रहते हैं, और हँसेंगे।

और फिर वह अपने ही व्यवसाय पर एक चोट करता है, जो कवि ही कर सकता है। रसीली हो या एकदम फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती। यह सबके बारे में कहा गया है, और कहनेवाला स्वयं उसी सब में खड़ा है। दूसरे की रचना सुनकर जो हर्षित हो जाय, ऐसे लोग जगत् में बहुत नहीं हैं। कितने नहीं हैं, यह अगली चौपाई एक चित्र से बताती है।

जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई॥
सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई॥

चौपाई ३

जगत् में तालाब और नदी जैसे लोग बहुत हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं। समुद्र जैसा कोई एक विरला होता है, जो चन्द्रमा को पूरा देखकर उमड़ पड़ता है। इस उपमा का जोड़ भीतर के हिसाब में है। नदी जब बढ़ती है तो उसमें कुछ आया होता है, वर्षा का जल, और बढ़ना उसी पाये हुए का परिणाम है। समुद्र जब उमड़ता है तो उसमें कुछ नहीं आया होता। जो बढ़ा है वह आकाश में है, दूर है, और उसका समुद्र के खाते से कोई लेना-देना नहीं। फिर भी समुद्र उठता है।

यही सज्जन की परिभाषा है, और यह किसी उपदेश से नहीं, एक ज्वार से बनायी गयी है। दूसरे का पूरा होना देखकर भीतर कुछ उठ आये, और अपने खाते में कुछ जुड़े नहीं, तब समझना चाहिये कि सज्जन मिला। और यह भी ध्यान रहे कि नदी को यहाँ बुरा नहीं कहा गया। नदी बढ़ती है, यह उसका स्वभाव है, बस वह सामान्य है। असामान्य होना समुद्र का काम है, और वह विरला है। इन्हीं दो पर कवि अपना दाँव लगा देता है, और आठवाँ दोहा वही दाँव है।

भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास।
पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करिहहिं उपहास॥ ८॥

दोहा ८

भाग्य छोटा है, अभिलाषा बड़ी है, और बीच में एक विश्वास है, कि सज्जन सुनकर सुख पावेंगे और दुष्ट हँसी उड़ावेंगे। इस दोहे की सबसे साफ़ बात यह है कि इसमें दुष्टों का हँसना हटाया नहीं गया। कवि यह नहीं कहता कि सुनकर सब सुधर जायेंगे। वह दोनों को अपने एक विश्वास के भीतर रख लेता है। जो होना है वह दोनों तरफ़ होगा, और वह दोनों के लिये तैयार है।

सार: सुननेवाले दो तरह के बताये गये हैं, एक वे जो बालक के तोतले बोल को माँ-बाप की तरह सुनते हैं, दूसरे वे जो पराये दोष को गहना बनाकर पहनते हैं। अपनी रचना सबको प्यारी लगती है, पर दूसरे की रचना पर हर्षित होनेवाले विरले हैं, जैसे नदियाँ अपने ही जल से बढ़ती हैं और समुद्र चन्द्रमा को पूरा देखकर उमड़ता है। दोहा आठ में छोटा भाग्य और बड़ी अभिलाषा रखकर कहा जाता है कि सज्जन सुख पावेंगे और दुष्ट हँसेंगे।

हँसी की अनुमति

अब जो होता है वह इस पन्ने का पहला बड़ा मोड़ है। दुष्ट हँसेंगे, यह कहकर तुलसी उनसे लड़ते नहीं। वे हँसी को अपने हित में गिन लेते हैं।

खल परिहास होइ हित मोरा। काक कहहिं कलकंठ कठोरा॥
हंसहि बक दादुर चातकही । हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही॥

चौपाई ४

दुष्टों के हँसने से मेरा हित ही होगा। कौए कोयल को कठोर ही कहा करते हैं। बगुले हंस को हँसते हैं, मेढक पपीहे को, और मलिन मनवाले निर्मल वाणी को। तीनों जोड़ियाँ एक ही ढंग से बनी हैं। हर जोड़ी में हँसनेवाला अधिक है, आम है और पास का है, और जिस पर हँसा जा रहा है वह कम है, दुर्लभ है, और किसी और ही चीज़ के लिये बना है। कौआ हर छत पर है, कोयल साल में कुछ दिन। बगुला हर तालाब पर है, हंस कहीं-कहीं। मेढक बरसते ही बोल पड़ता है, और पपीहा उसी वर्षा में प्यासा रह जाता है।

और फिर एक वाक्य ऐसा आता है जो विनय की सारी सीमा तोड़ देता है। जिनको न कविता का रस है और न राम के चरणों में प्रेम, उनके लिये यह रचना हास्य का काम देगी। पहले तो यह भाषा की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है, इसलिये यह हँसने योग्य ही है, और हँसने में उन्हें कोई दोष नहीं। हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी। हँसने की अनुमति दे दी गयी, और अनुमति मिलते ही हँसी का हथियार होना समाप्त हो गया।

इसके बाद वह अपनी कमियों की सूची बनाता है, और सूची पूरी है। मैं कवि नहीं हूँ, वचन में प्रवीण नहीं हूँ, सब कलाओं और सब विद्याओं से हीन हूँ। फिर काव्य का पूरा सामान गिनाया जाता है, नाना प्रकार के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक विधान की छन्द-रचना, भावों के भेद, रसों के अपार भेद, और कविता के भाँति-भाँति के गुण और दोष। इनमें से हर एक अपने आप में एक शास्त्र है।

और सूची के ठीक बाद वह एक ही पंक्ति में सबका उत्तर दे देता है, कि काव्य का विवेक मुझमें एक भी नहीं है, और यह मैं कोरे कागज़ पर लिखकर सच कहता हूँ। कोरा कागज़ ही इस पंक्ति का जोड़ है। कोरे कागज़ पर लिखकर दे देना उस समय की सबसे भारी शपथ थी, क्योंकि उसमें देनेवाला अपना नाम नीचे लिख देता है और बाकी पन्ना खाली छोड़ देता है। पोद्दार की टीका इसे शपथपूर्वक कहना बताती है। जो आदमी अपने विरुद्ध कोरा कागज़ दे देता है, उसके पास छिपाने को कुछ बचता नहीं।

भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक।
सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिबेक॥ ९॥

दोहा ९

मेरी रचना सब गुणों से रहित है, और इसमें एक गुण है जो सारे संसार में प्रसिद्ध है। उसी को विचारकर वे सुनेंगे जिनके पास निर्मल विवेक है। अब तक जो कुछ गिनाया गया था वह सब दोष था, और दोष गिनाना आसान है। इस दोहे में पहली बार कुछ ऐसा रखा गया है जिसे कवि अपना नहीं कहता और फिर भी अपनी रचना में मौजूद बताता है। वह गुण क्या है, यह अगली चौपाई खोलती है, और उसके खुलते ही यह पन्ना विनय से निकलकर दलील में चला जाता है।

सार: तुलसी दुष्टों की हँसी को अपना हित मान लेते हैं, कौए और कोयल, बगुले और हंस, मेढक और पपीहे का दृष्टान्त देते हैं, और हँसनेवालों को हँसने की अनुमति तक दे देते हैं। फिर काव्य का सारा सामान गिनाकर कहते हैं कि इसका एक भी विवेक उनमें नहीं है, और यह वे कोरे कागज़ पर लिखकर कहते हैं। दोहा नौ में वे कहते हैं कि उनकी रचना सब गुणों से रहित है, पर उसमें एक जगत्प्रसिद्ध गुण है।

वह एक गुण, जो कवि का अपना नहीं है

वह गुण राम का नाम है। इसमें रघुपति का उदार नाम है, अत्यन्त पवित्र, वेद और पुराणों का सार, मंगल का भवन और अमंगल को हरनेवाला, जिसे पार्वती सहित पुरारि जपते हैं। नाम का बड़प्पन गिनाने के लिये जपनेवाला किसे चुना गया है, यह देखने लायक है। किसी भक्त को नहीं चुना गया। शिव को चुना गया है, और शिव के साथ पार्वती को भी बिठा दिया गया है।

और फिर वे दो चौपाइयाँ आती हैं जो एक ही बात के दो आधे हैं, और दोनों में क्रिया एक ही है, सोह। पहली कहती है कि अच्छे कवि की रची हुई कितनी भी अनूठी रचना हो, राम नाम के बिना वह शोभा नहीं पाती, जैसे चन्द्रमुखी सुन्दरी सब प्रकार से सँवरकर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं पाती। यह उपमा कठोर है और जान-बूझकर कठोर है। वस्त्र गहना नहीं है। वस्त्र वह है जिसके बिना बाकी सारे गहने देखे ही नहीं जाते।

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी। राम नाम जस अंकित जानी॥
सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही । मधुकर सरिस संत गुनग्राही॥

चौपाई ५

और दूसरी आधी यह है, कि कुकवि की रची हुई, सब गुणों से रहित वाणी को भी, राम के नाम और यश से अंकित जानकर बुद्धिमान् आदर से कहते और सुनते हैं, क्योंकि संत भौंरे की तरह गुण ही ग्रहण करनेवाले होते हैं। भौंरा यहाँ इसलिये है कि भौंरा फूल की समीक्षा नहीं करता। जिस फूल में रस है उसमें उतरता है, रस लेकर उड़ जाता है, और बाकी फूल कैसा था यह प्रश्न उसके काम का नहीं।

इसके बाद भरोसा साफ़ शब्दों में रख दिया जाता है। इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, फिर भी इसमें राम का प्रताप प्रकट है, और यही एक भरोसा मन में आया है। भले संग से किसने बड़प्पन नहीं पाया। और उदाहरण के लिये जो चीज़ उठायी जाती है वह सबसे नीची चीज़ है। धुआँ भी अगर के संग से अपनी स्वाभाविक कड़वाहट छोड़ देता है। उजली चीज़ चुनी जा सकती थी। धुआँ चुना गया।

मंगल करनि कलिमल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की।
गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की॥
प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी।
भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी॥

छंद

रघुनाथ की कथा मंगल करनेवाली और कलियुग के मल को हरनेवाली है। मेरी भद्दी कविता की चाल टेढ़ी है, जैसे पवित्र जलवाली नदी की चाल टेढ़ी होती है। यहाँ कवि अपना दोष छिपाता नहीं, वह उसे गंगा की आकृति दे देता है। गंगा सीधी नहीं बहती, और उसके टेढ़ेपन को कोई दोष नहीं गिनता। फिर दूसरा चित्र, कि श्मशान की राख भी महादेव के अंग पर सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करती है। भस्म से अपवित्र कुछ नहीं होता, और शिव के शरीर पर वही भस्म है।

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग।
दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग॥ १० (क)॥
स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान।
गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान॥ १० (ख)॥

दोहा १० (क, ख)

पहला आधा कहता है कि राम के यश के संग से मेरी रचना सबको अत्यन्त प्रिय लगेगी, जैसे मलय पर्वत के संग से काठ चन्दन हो जाता है, और फिर काठ का विचार कौन करता है। दूसरा आधा कहता है कि श्यामा गाय काली होती है और उसका दूध उज्ज्वल तथा बहुत गुणकारी होता है, यही समझकर सब उसे पीते हैं, और इसी तरह गँवारू भाषा में होने पर भी सीता और राम के यश को बुद्धिमान् चाव से गाते और सुनते हैं।

दोनों आधों का अन्तर छोटा है और बड़े काम का है। चन्दन में काठ बदल जाता है, संग उसे बदल देता है। गाय में कुछ नहीं बदलता। गाय काली ही रहती है, दूध सफ़ेद ही रहता है, और दोनों एक साथ रहते हैं। पहले आधे में कवि यह आशा कर रहा है कि उसकी भाषा बदल जायेगी। दूसरे में वह यह कह रहा है कि भले न बदले, भीतर जो है वह उजला है, और लोग उसी के लिये आयेंगे।

सार: वह एक गुण राम का नाम है। सुकवि की अनूठी रचना भी उसके बिना शोभा नहीं पाती, और कुकवि की गुणहीन वाणी भी उसके अंकित होते ही आदर पाती है, क्योंकि संत भौंरे की तरह गुण ही लेते हैं। धुआँ अगर के संग सुगन्धित हो जाता है, कविता की टेढ़ी चाल गंगा की चाल जैसी है, श्मशान की भस्म शिव के अंग पर सुहावनी है, काठ मलय के संग चन्दन हो जाता है, और काली गाय से ही उजला दूध निकलता है।

मणि, सीप, और वह थकान जो सरस्वती की है

अब एक नयी बात उठती है, जो अब तक नहीं कही गयी थी। अब तक प्रश्न यह था कि रचना में गुण है या नहीं। अब प्रश्न यह हो जाता है कि रचना जहाँ बनती है और जहाँ शोभा पाती है, वे दो अलग जगहें हैं।

मणि, माणिक और मोती की जैसी छबि है, वह साँप के, पर्वत के और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाती। वही रत्न राजा के मुकुट में और नवयुवती के शरीर पर पाकर अधिक शोभा पाते हैं। रत्न वही है, दोनों जगह वही है, और उसका होना ही काफ़ी नहीं है। साँप के सिर पर मणि किसी को दिखती नहीं, क्योंकि वहाँ तक जाने का रास्ता नहीं है।

इसी तरह, बुद्धिमान् कहते हैं, सुकवि की कविता भी उपजती कहीं है और शोभा कहीं और पाती है। उपजती वह कवि में है, शोभा उसमें पाती है जो उसे लेता है। पोद्दार की टीका इसे और खोलकर कहती है कि कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार और प्रचार हो, और जहाँ उसमें कही हुई बात को ग्रहण करके उस पर चला जाय।

और तब सरस्वती का चित्र आता है, जो इस हिस्से का सबसे तीखा चित्र है। कवि के स्मरण करते ही भक्ति के कारण सरस्वती ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी आती हैं। दौड़ने से थकान होती है, और वह थकान रामचरित के सरोवर में नहलाये बिना करोड़ों उपायों से भी नहीं जाती। कवि और पण्डित यही हृदय में विचारकर कलि के मल को हरनेवाला हरि-यश ही गाते हैं।

यह दलील धर्म की नहीं, शिष्टाचार की है। बुलाने पर जो दौड़कर आया हो, उससे कुछ ऐसा कहलवाना जिससे उसकी थकान न उतरे, अभद्रता है। और अगली पंक्ति इसे और कड़ा कर देती है, कि संसारी मनुष्यों का गुणगान कराने पर सरस्वती सिर धुनकर पछताती हैं। देवी को बुलाकर किसी राजा की प्रशंसा करा देना, यही वह चीज़ है जिससे यह कवि बचना चाहता है।

फिर वह हृदय, बुद्धि और सरस्वती को एक ही चित्र में बाँध देता है। हृदय समुद्र है, बुद्धि सीप है, और सरस्वती स्वाति नक्षत्र हैं। स्वाति की बूँद सीप में पड़े तो मोती बनता है, और यहाँ कहा जाता है कि उसमें यदि श्रेष्ठ विचार का जल बरसे तो मुक्तामणि जैसी सुन्दर कविता होती है। और ग्यारहवाँ दोहा उन मोतियों को उनके अन्तिम ठिकाने तक पहुँचा देता है।

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग॥ ११॥

दोहा ११

उन मोतियों को युक्ति से बेधकर, रामचरित के सुन्दर तागे में पिरोकर, सज्जन अपने निर्मल हृदय में पहनते हैं, और उससे अत्यन्त अनुराग की शोभा होती है। इस पूरी शृंखला में सबसे पते की बात तागा है। मोती अलग-अलग पड़े रहें तो हार नहीं बनता। जो उन्हें एक साथ बाँधकर रखता है वह कविता नहीं है, वह कथा है। इसीलिये चरित कहना पड़ता है, और इसीलिये आगे जो आ रहा है वह सूक्तियों का संग्रह नहीं, एक कथा है।

सार: रत्न साँप, पर्वत और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाते जैसी राजा के मुकुट और युवती के शरीर पर, और वैसे ही कविता उपजती कहीं है और शोभा कहीं और पाती है। कवि के स्मरण करते ही सरस्वती ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी आती हैं, और उनकी थकान रामचरित के सरोवर में स्नान से ही उतरती है। हृदय समुद्र, बुद्धि सीप और सरस्वती स्वाति हैं, और उन मोतियों को रामचरित के तागे में पिरोकर सज्जन हृदय में धारण करते हैं।

सूची में सबसे पहला नाम

अब वह हिस्सा आता है जिसके लिये यह पन्ना सबसे अधिक याद किया जाता है, और जिसे पढ़ते हुए यह तय करना कठिन हो जाता है कि यह विनय है या कुछ और। तुलसी कलियुग में जन्मे हुए लोगों का एक वर्ग खड़ा करते हैं, और उसका वर्णन पाँच पंक्तियों तक तीसरे पुरुष में चलता है। जिनकी करनी कौए की है और वेष हंस का, जो वेद का मार्ग छोड़कर कुपथ पर चलते हैं, जो कपट के शरीर हैं और कलियुग के पापों के बर्तन हैं।

बंचक भगत कहाइ राम के । किंकर कंचन कोह काम के॥
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी । धींग धरमध्वज धंधक धोरी॥

चौपाई ६

जो राम का भक्त कहलाकर ठगते हैं, जो धन, क्रोध और काम के दास हैं, जो धींगाधींगी करनेवाले, धर्म की झूठी ध्वजा फहरानेवाले और कपट के धन्धों का बोझ ढोनेवाले हैं। और फिर वह पंक्ति, तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी। उन सबमें संसार में पहली गिनती मेरी है।

इस पंक्ति के आसपास एक बात है जो छूट जाती है और जिसे छोड़ना नहीं चाहिये। जिस पंक्ति में अपने को ठगों का सरदार कहा जा रहा है, वही पंक्ति कान से सुनने पर सबसे चमकीली है। धींग धरमध्वज धंधक धोरी, चार शब्द, और चारों एक ही अक्षर से। जो आदमी अभी-अभी कह चुका है कि उसे काव्य का एक भी विवेक नहीं है, वह अपने अवगुण गिनाते समय अनुप्रास की ऐसी पंक्ति बना देता है। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और तुलसी दोनों को एक साथ रहने देते हैं।

तीसरी पंक्ति सूची को बन्द कर देती है, और बन्द होते समय मुसकरा भी देती है। यदि मैं अपने सब अवगुण कहने लगूँ तो कथा बढ़ जायेगी और पार नहीं मिलेगा, इसलिये मैंने बहुत थोड़े ही कहे हैं, समझदार थोड़े में ही समझ लेंगे। अवगुणों की संख्या इतनी है कि उनके लिये अलग ग्रन्थ चाहिये, यह कहकर वह ग्रन्थ लिखने से मना कर दिया जाता है, और जो लिखा जाना है उसकी ओर लौटा जाता है।

और फिर एक वाक्य ऐसा आता है जो बताता है कि यह विनय कहाँ जाकर रुकती है। मेरी अनेक प्रकार की विनती समझकर कोई इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे मुझसे भी अधिक जड़ और बुद्धि के कंगाल हैं। जो आदमी अपने को सबसे नीचे रख चुका है, उसके पास एक ही चोट बची रहती है, और वह चोट यही है। नीचे से उतरे बिना उसने उत्तर दे दिया।

इसके बाद बात फिर बड़ी हो जाती है। मैं कवि नहीं हूँ, चतुर नहीं कहलाता, अपनी बुद्धि के अनुसार राम के गुण गाता हूँ। कहाँ रघुपति के अपार चरित्र, और कहाँ संसार में लगी हुई मेरी बुद्धि। और फिर वह उपमा आती है जिसमें छोटा होना कोई बचाव नहीं रह जाता। जिस हवा से सुमेरु जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, उसके सामने रूई किस गिनती में है। उपमा की चाल उलटी है और वहीं इसका जोड़ है। रूई हलकी है, इसलिये उड़ने में उसे सुविधा होनी चाहिये। पर जब हवा इतनी हो कि पर्वत उड़ रहे हों, तब रूई का हलका होना उसके किसी काम नहीं आता, उसका नाम तक नहीं लिया जाता।

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान।
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान॥ १२॥

दोहा १२

सरस्वती, शेष, महेश, ब्रह्मा, आगम, निगम और पुराण, ये सब नेति नेति कहकर निरन्तर जिनका गुणगान करते हैं। दोहे में दो बातें आमने-सामने रखी गयी हैं, और उन्हें साथ रखना ही इसका काम है। नेति नेति, यानी ऐसा नहीं, ऐसा नहीं, यानी हार। और निरंतर गान, यानी लगातार गाना। जो हार चुके हैं वे गा रहे हैं, और लगातार गा रहे हैं। जिस सूची में सरस्वती और वेद तक पार नहीं पाते, उस सूची में असफल होने पर किसी को लज्जा नहीं आनी चाहिये।

सार: तुलसी कलियुग के कपटी भक्तों का वर्णन करके अपना नाम उस सूची में सबसे पहले लिख देते हैं, कहते हैं कि सब अवगुण गिनाने बैठें तो कथा पार न पड़ेगी, और जो फिर भी शंका करें वे उनसे भी अधिक जड़ हैं। रघुपति का चरित अपार है और उनकी बुद्धि संसार में लगी है, और जिस हवा से सुमेरु उड़ते हैं उसके आगे रूई की कोई गिनती नहीं। दोहा बारह में सरस्वती, शेष, शिव, ब्रह्मा, आगम, निगम और पुराण नेति नेति कहकर निरन्तर गाते बताये गये हैं।

कहे बिना कोई नहीं रहा

अब वह प्रश्न सामने आ जाता है जिसे यह पन्ना अब तक टाल रहा था। यदि सरस्वती और वेद तक पार नहीं पाते, तो कहा ही क्यों जाय। उत्तर एक ही पंक्ति में है, और वही पंक्ति इस पूरे प्रसंग की धुरी है।

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई॥
तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा॥

चौपाई ७

सब जानते हैं कि प्रभु की प्रभुता ऐसी ही है, फिर भी कहे बिना कोई नहीं रहा। यह कोई तर्क नहीं है, यह एक गवाही है। जितने लोग हुए जिन्होंने यह जाना कि यह वर्णन के बाहर है, उनमें से एक भी चुप नहीं रहा। और उसके तुरन्त बाद वेद का दिया हुआ कारण रखा जाता है, कि भजन का प्रभाव बहुत प्रकार से कहा गया है। यानी वर्णन इसलिये नहीं किया जाता कि वह पूरा हो सके। वर्णन करना स्वयं भजन है, और उसका फल वर्णन के पूरा होने पर टिका नहीं है।

इसके बाद वह गिनती रखी जाती है जो सबसे दूर तक जाती है। एक, अनीह, अरूप, अनाम, अजन्मा, सच्चिदानन्द, परम धाम, व्यापक, विश्वरूप। इनमें कोई ऐसा नहीं जिसे पकड़कर कोई कथा कही जा सके। नाम नहीं है तो पुकारा किसे जाय, रूप नहीं है तो देखा क्या जाय, इच्छा नहीं है तो कोई घटना घटे ही क्यों। और ठीक उसके बाद वह आधी पंक्ति है जिससे यह सारा ग्रन्थ सम्भव होता है, कि उन्हीं ने देह धारण करके नाना चरित्र किये।

देह किसलिये धारण की गयी, यह अगली पंक्ति में है, और यह उत्तर पूरे रामचरितमानस को एक कारण दे देता है। वह लीला केवल भक्तों के हित के लिये है, क्योंकि वे परम कृपालु हैं और शरणागत के अनुरागी। जिन पर एक बार कृपा कर दी, उन पर फिर कभी क्रोध नहीं किया। इस वाक्य के बाद कथा कहना धृष्टता नहीं रह जाती। जो चीज़ भक्त के लिये ही बनी हो, उसे भक्त का बरतना अनुचित कैसे होगा।

और तब वह नाम आता है जो तुलसी के यहाँ बार-बार लौटता है, गई बहोर गरीब नेवाजू। गयी हुई वस्तु को फिर लौटा देनेवाला, और गरीब को निवाजनेवाला। सरल, सबल, और सबका स्वामी। यही समझकर बुद्धिमान् उनका यश वर्णन करके अपनी वाणी को पवित्र और सुफल बनाते हैं। वाणी का लाभ यहाँ सुननेवाले को नहीं, बोलनेवाले को गिना गया है। और इसी बल पर कवि अपनी घोषणा करता है, कि राम के चरणों में सिर नवाकर मैं रघुपति के गुणों की कथा कहूँगा, क्योंकि मुनियों ने पहले हरि की कीर्ति गायी है और उसी मार्ग पर चलना मुझे सुगम होगा। पोद्दार की टीका यहाँ कोष्ठक में वाल्मीकि और व्यास के नाम जोड़ देती है।

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं।
चढ़ि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं॥ १३॥

दोहा १३

जो अत्यन्त बड़ी नदियाँ हैं, यदि राजा उन पर पुल बँधा दे तो अत्यन्त छोटी चींटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना परिश्रम के पार चली जाती हैं। इस दोहे में तीन चीज़ें ठीक-ठीक रखी गयी हैं। पुल राजा बनवाता है, यानी बनवाने के लिये बल चाहिये और वह बल चींटी का नहीं है। चींटी परम लघु है, और उसका लघु होना मिटता नहीं। और चींटी को चढ़ना पड़ता है। पुल बना हुआ है, पर उस पर पैर उसी को रखना है।

सार: सब जानते हैं कि यह प्रभुता कही नहीं जा सकती, फिर भी कहे बिना कोई नहीं रहा, और वेद ने इसका कारण भजन का प्रभाव बताया है। जो एक, अनीह, अरूप और अनाम हैं उन्होंने भक्तों के हित के लिये ही देह धारण करके नाना लीला की, और वे गयी हुई वस्तु लौटानेवाले तथा गरीबनिवाज हैं। मुनियों ने पहले यह कीर्ति गायी है, और जैसे राजा के बनवाये पुल पर चींटी भी बिना श्रम के नदी पार कर जाती है, वैसे ही उस मार्ग पर चलना सुगम होगा।

जो हो चुके, जो हैं, और जो आगे होंगे

अब वंदना शुरू होती है, और वह कवियों से शुरू होती है। यह क्रम अपने आप में एक बात कह देता है। देवता आगे आयेंगे, वेद आगे आयेंगे, ब्रह्मा आगे आयेंगे। सबसे पहले वे आते हैं जिन्होंने यही काम पहले कर रखा है।

व्यास आदि अनेक श्रेष्ठ कवि जिन्होंने आदर से हरि का सुयश कहा, उनके चरणकमलों में प्रणाम, और वे मेरे सब मनोरथ पूरे करें। फिर कलियुग के उन कवियों को प्रणाम जिन्होंने रघुपति के गुणसमूह का वर्णन किया। ध्यान देने की बात यह है कि सूची नीचे की ओर भी उतरती है। व्यास के बाद कलि के कवि गिनाये जाते हैं, और उनके बाद भाषा के कवि।

और फिर वह पंक्ति आती है जो इस वंदना को असाधारण बना देती है। जो बड़े बुद्धिमान् प्राकृत कवि हैं, जिन्होंने भाषा में हरि के चरित्र कहे हैं, जो हो चुके हैं, जो इस समय हैं, और जो आगे होंगे, उन सबको मैं सारा कपट त्यागकर प्रणाम करता हूँ। जो आगे होंगे। जिनका जन्म अभी हुआ ही नहीं, उनके चरणों में सिर नवाया जा रहा है और उनसे आशीर्वाद माँगा जा रहा है।

और माँगा क्या जाता है, यह भी देखने लायक है। आप प्रसन्न होकर यह वरदान दीजिये कि साधुओं के समाज में मेरी रचना का सम्मान हो। वरदान में कवित्व नहीं माँगा गया, प्रतिभा नहीं माँगी गयी, यश नहीं माँगा गया। सभा में जगह माँगी गयी है। और कारण साफ़ है, कि जिस रचना का बुद्धिमान् आदर नहीं करते, उसका परिश्रम व्यर्थ है, और वैसा परिश्रम बाल कवि ही करते हैं।

फिर वह कसौटी रखी जाती है जिस पर कवि अपनी ही रचना को तौलता है। कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही अच्छी है जो गंगा की तरह सबका हित करे। तीनों को एक तराजू पर रखना ही इस पंक्ति का काम है। कविता को सुन्दरता से नहीं नापा जा रहा। उसे उसी तरह नापा जा रहा है जिस तरह धन को नापा जाता है, कि उससे किसका भला हुआ।

और उसी कसौटी पर वह अपनी कठिनाई रख देता है। राम की कीर्ति सुन्दर है और मेरी रचना भद्दी, यह असामंजस्य है, और इसी की चिन्ता है। फिर कवियों की ओर मुड़कर वह एक छोटी उपमा देता है, कि आपकी कृपा से यह भी सुलभ हो सकता है, रेशम की सिलाई टाट पर भी सुहावनी लगती है। इस उपमा में इस पन्ने की पिछली सारी उपमाओं से एक अन्तर है। काठ चन्दन हो जाता था, धुआँ सुगन्धित हो जाता था। यहाँ टाट टाट ही रहता है और रेशम रेशम, दोनों साथ-साथ दिखते रहते हैं, और फिर भी सिलाई सुहावनी लगती है।

सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान।
सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान॥ १४ (क)॥
सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर।
करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर॥ १४ (ख)॥
कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल।
बालबिनय सुनि सुरुचि लखि मो पर होहु कृपाल॥ १४ (ग)॥

दोहा १४ (क, ख, ग)

चतुर लोग उसी कविता का आदर करते हैं जो सरल हो, जिसमें निर्मल कीर्ति का वर्णन हो, और जिसे सुनकर शत्रु भी स्वाभाविक वैर भूलकर सराहना करने लगे। यह कसौटी कड़ी है, और इसका सबसे कड़ा शब्द सहज है। बैर को सहज कहा गया है, यानी स्वभाव से आया हुआ, सीखा हुआ नहीं। और कविता से यह अपेक्षा की जा रही है कि वह उस स्वभाव को कुछ देर के लिये हटा दे।

दूसरा हिस्सा कहता है कि ऐसी कविता निर्मल बुद्धि के बिना नहीं होती और मेरी बुद्धि का बल बहुत थोड़ा है, इसलिये बार-बार निहोरा करता हूँ कि कृपा कीजिये जिससे मैं हरि का यश कह सकूँ। और तीसरे हिस्से में वह कवियों को एक नाम दे देता है, रघुबर चरित मानस मंजु मराल, कि आप रघुनाथ के चरित्ररूपी मानसरोवर के सुन्दर हंस हैं, इस बालक की विनती सुनकर और इसकी रुचि देखकर कृपा कीजिये।

इस पन्ने पर हंस दो बार आया है, और दोनों बार का अन्तर पूरे प्रसंग का अन्तर है। पहली बार वह कपट था, करनी कौए की और वेष हंस का। यहाँ वह असली है, और मानसरोवर का है। और जिस सरोवर का वह हंस है, उसका नाम मानस है, वही नाम जो इस पूरे ग्रन्थ पर लिखा है।

सार: वंदना कवियों से शुरू होती है, व्यास आदि से, फिर कलियुग के कवियों से, फिर भाषा के उन कवियों से जो हो चुके, जो हैं, और जो आगे होंगे। तुलसी उनसे कवित्व नहीं, साधु-समाज में सम्मान माँगते हैं, कहते हैं कि कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही भली है जो गंगा की तरह सबका हित करे, और रेशम की सिलाई टाट पर भी सुहावनी लगती है। दोहा चौदह के पहले तीन हिस्सों में वे कवियों को रामचरित के मानसरोवर का हंस कहकर कृपा माँगते हैं।

रामायण रचनेवाले मुनि के चरण

अब वंदना कवियों से आगे बढ़ती है, और सोरठे के तीन हिस्सों में तीन नमस्कार होते हैं, एक मुनि को, एक चारों वेदों को, और एक ब्रह्मा को।

बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥ १४ (घ)॥
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥ १४ (ङ)॥
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥ १४ (च)॥

सोरठा १४ (घ, ङ, च)

पहला नमस्कार उन मुनि के चरणकमलों को है जिन्होंने रामायण रची। पंक्ति में नाम नहीं है, केवल परिचय है, कि रामायण जिन्होंने बनायी। नाम पोद्दार की टीका देती है, और वह नाम वाल्मीकि है। और परिचय के साथ जो विशेषण लगे हैं, वे इस पूरे पन्ने का सबसे चतुर खेल हैं। वह रामायण सखर है और फिर भी सुकोमल, और दूषन सहित है और फिर भी दोष रहित

खर और दूषण उस रामायण के दो राक्षस हैं, और खर का अर्थ कठोर भी होता है तथा दूषण का अर्थ दोष भी। इसलिये एक ही पंक्ति दो बातें एक साथ कह देती है, कि वह ग्रन्थ खर नाम के राक्षस को समेटे हुए है और फिर भी कहीं कठोर नहीं है, और दूषण नाम के राक्षस को समेटे हुए है और फिर भी उसमें दोष नहीं है। जो आदमी कुछ ही पंक्तियाँ पहले कह चुका है कि उसे अलंकार का एक भी विवेक नहीं, वह यहाँ एक ही साँस में दो श्लेष रख देता है।

दूसरा नमस्कार चारों वेदों को है, जो भवसागर के पार होने के लिये जहाज़ के समान हैं, और जिन्हें रघुनाथ का निर्मल यश वर्णन करते हुए स्वप्न में भी खेद नहीं होता। यह वाक्य थोड़ी देर पहले की सरस्वती के ठीक सामने रखा हुआ है। सरस्वती दौड़कर आती हैं और थक जाती हैं। वेद वही काम करते हैं और थकते नहीं, सपने में भी नहीं।

तीसरा नमस्कार ब्रह्मा की चरणरज को है, और इसका जो कारण दिया गया है वह चौंकाता है। जिन्होंने भवसागर बनाया, जहाँ से एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्टरूपी विष और मदिरा। यह पन्ना शुरू से सज्जन और खल को अलग-अलग करता आया है, और यहाँ आकर दोनों को एक ही समुद्र से निकलता हुआ दिखा देता है, और उस समुद्र के बनानेवाले के चरणों की धूल को प्रणाम कर देता है। इसके बाद एक और दोहा वंदना को और चौड़ा कर देता है, देवता, ब्राह्मण, पण्डित और ग्रह, इन सबके चरणों की वंदना करके हाथ जोड़कर वह कहता है कि प्रसन्न होकर मेरे सब सुन्दर मनोरथ पूरे कीजिये। सूची में ग्रहों का होना छोटी बात नहीं है। जिनसे कवि का कोई सीधा सम्बन्ध नहीं दिखता, वे भी छोड़े नहीं गये।

सार: सोरठे में तीन नमस्कार हैं। पहला उन मुनि को जिन्होंने रामायण रची, जो खर सहित होकर भी सुकोमल है और दूषण सहित होकर भी दोषरहित; पंक्ति में उनका नाम नहीं है, पोद्दार की टीका उन्हें वाल्मीकि बताती है। दूसरा चारों वेदों को, जो भवसागर के जहाज़ हैं और जिन्हें रघुनाथ का यश कहते स्वप्न में भी खेद नहीं होता। तीसरा ब्रह्मा की चरणरज को, जिनके बनाये भवसागर से संत, अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु भी निकले और खल, विष तथा मदिरा भी। फिर देवता, ब्राह्मण, पण्डित और ग्रह वन्दित होते हैं।

अनमिल आखर, और प्रगट प्रभाउ

अन्तिम हिस्सा फिर दो नदियों से शुरू होता है, और दोनों को एक ही पंक्ति में जोड़कर रखा जाता है। सरस्वती और देवनदी गंगा, दोनों पवित्र और मनोहर चरित्रवाली। एक स्नान करने और जल पीने से पाप हरती है, दूसरी कहने और सुनने से अविवेक हरती है।

यह जोड़ी इस पूरे पन्ने की सबसे शान्त दलील है। गंगा का काम शरीर से होता है, उसमें उतरना पड़ता है। सरस्वती का काम मुँह और कान से होता है, उसमें बोलना और सुनना पड़ता है। दोनों में स्नान है, और दोनों में मैल जाता है। जो आदमी आठ दोहों से यह कहता आ रहा है कि उसकी भाषा भद्दी है, वह यहाँ चुपचाप यह भी कह जाता है कि कहना और सुनना अपने आप में एक तीर्थ है।

फिर वह गुरु और माता-पिता की ओर मुड़ता है, और वहाँ उसे अलग-अलग लोग नहीं मिलते। गुरु, पिता और माता, ये तीनों उसके लिये महेश और भवानी हैं, और वही दीनबन्धु हैं तथा नित्य दान करनेवाले। और उन्हीं को वह सीतापति का सेवक, स्वामी और सखा एक साथ कहता है, और तुलसीदास का सब प्रकार से निष्कपट हित करनेवाला। और तब वह चौपाई आती है जो इस पूरे प्रसंग की सबसे बड़ी युक्ति है, और जिसे प्रायः वंदना की एक और पंक्ति समझकर लोग आगे बढ़ जाते हैं।

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा। साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा॥
अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू॥

चौपाई ८

कलियुग को देखकर, जगत् के हित के लिये, शिव और गिरिजा ने शाबर मन्त्रों के समूह रचे। उन मन्त्रों के अक्षर बेमेल हैं, उनका कोई अर्थ नहीं बैठता, और उनका जप भी नहीं होता। और फिर भी, महेश के प्रताप से, उनका प्रभाव प्रत्यक्ष है।

अब इस पंक्ति को उस पूरे पन्ने के साथ रखकर देखिये जो अब तक पढ़ा जा चुका है। आठ दोहों से एक आदमी कह रहा है कि उसकी भाषा गँवारू है, उसके अक्षरों में शास्त्र का मेल नहीं है, और उसे छन्द तथा अलंकार का विवेक नहीं है। और अब वह उन मन्त्रों की ओर उँगली उठा देता है जो स्वयं शिव के बनाये हुए हैं और जिनमें ठीक यही तीनों कमियाँ हैं, बेमेल अक्षर, अर्थ का अभाव, और विधिपूर्वक जप तक नहीं। उनका काम फिर भी होता है, और प्रत्यक्ष होता है। इसीलिये शाबर मन्त्र इसी प्रसंग में हैं और किसी और में नहीं। वे इस पूरी विनय का उत्तर हैं, और उत्तर देनेवाला कवि नहीं, शिव हैं।

और इसीलिये अगली पंक्ति वही होती है जो होनी चाहिये, कि वही उमापति मुझ पर अनुकूल होकर इस कथा को आनन्द और मंगल की जड़ बना देंगे, और शिवा तथा शिव का स्मरण करके, उनका प्रसाद पाकर, मैं चाव भरे चित्त से रामचरित का वर्णन करता हूँ। यहाँ पहली बार इस पन्ने पर आगे का समय छोड़ दिया जाता है और अभी का समय आ जाता है। अब तक कहूँगा चल रहा था। अब वर्णन करता हूँ।

और फिर वह चित्र आता है जिसमें इस पन्ने का चाँद लौट आता है। मेरी रचना शिव की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी जैसे तारागणों के साथ चन्द्रमा से रात शोभित होती है। बहुत पहले इसी पन्ने पर चाँद पूरा हुआ था और समुद्र उमड़ा था। वह चाँद दूसरे का था। यह चाँद अपनी रात में है। और जो इस कथा को प्रेम से तथा सावधानी से समझ-बूझकर कहेंगे और सुनेंगे, वे कलियुग के मल से रहित होकर सुन्दर मंगल के भागी होंगे और राम के चरणों के अनुरागी बनेंगे। कहना और सुनना, दोनों बराबर गिने गये हैं, और फल दोनों को एक ही मिलता है।

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ।
तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ॥ १५॥

दोहा १५

यदि मुझ पर स्वप्न में भी सचमुच हर और गौरी की प्रसन्नता हो, तो भाषा की इस रचना का जो प्रभाव मैंने कहा है वह सब सच हो। इस दोहे में दो शब्द आमने-सामने रखे हैं, सपनेहुँ और साचेहुँ, सपने में भी और सचमुच भी। और जो माँगा गया है वह अपने लिये कुछ नहीं है। जो माँगा गया है वह यह है कि जो कहा जा चुका है वह सच निकले। पूरा प्रसंग भाषा की भनिति के प्रभाव पर लगाया गया था, और अन्त में वही दाँव पर रख दिया जाता है।

सार: सरस्वती और गंगा दोनों की वंदना होती है, एक स्नान और जलपान से पाप हरती है और दूसरी कहने-सुनने से अविवेक। शिव और भवानी गुरु तथा माता-पिता कहे जाते हैं। तुलसी उन्हीं शिव-पार्वती के रचे शाबर मन्त्रों की ओर संकेत करते हैं, जिनके अक्षर बेमेल हैं, अर्थ नहीं है और जप भी नहीं, फिर भी जिनका प्रभाव प्रत्यक्ष है। और दोहा पंद्रह में वे यह शर्त रखते हैं कि यदि हर और गौरी सचमुच प्रसन्न हों तो भाषा की भनिति के प्रभाव की उनकी कही सारी बात सच हो।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पन्ने पर एक भी घटना नहीं घटती, और फिर भी यह बालकाण्ड का सबसे अधिक दोहराया जानेवाला हिस्सा है। इसका कारण शायद यह है कि यहाँ जो आदमी बोल रहा है वह अभी कवि नहीं बना है। वह अभी दरवाज़े पर खड़ा है, हाथ जोड़े हुए, और भीतर जाने की अनुमति माँग रहा है। और जिस-जिससे अनुमति माँगी जा सकती थी, उससे माँग ली गयी है, चौरासी लाख योनियों के जीवों से, सज्जनों से, दुष्टों से, कवियों से, वेदों से, ब्रह्मा से, ग्रहों से, और अन्त में शिव और पार्वती से।

और इस पूरी विनय के बारे में एक बात साफ़ कह देनी चाहिये। यह बनावट भी है और सच भी, और दोनों को अलग करने की कोशिश इसे छोटा कर देती है। जो पंक्ति अपने को ठगों में पहला बताती है, वही पंक्ति चार शब्दों का ऐसा अनुप्रास है जो कोई अनाड़ी नहीं बना सकता। जो आदमी कहता है कि उसे अलंकार का विवेक नहीं, वही एक सोरठे में खर और दूषण का दोहरा श्लेष रख देता है। तुलसी इस विरोध को छिपाते नहीं। वे उसे पन्ने पर पड़ा रहने देते हैं, क्योंकि उनकी बात कभी यह थी ही नहीं कि वे अच्छा नहीं लिख सकते। उनकी बात यह है कि जो कहा जा रहा है वह इतना बड़ा है कि अच्छा लिखना भी उसके सामने कुछ नहीं है।

और इसीलिये इस पन्ने का सबसे भरोसेमन्द वाक्य वह नहीं है जिसमें कवि अपने को छोटा कहता है। वह वाक्य है जिसमें वह कहता है कि सब जानते हैं यह कहा नहीं जा सकता, और फिर भी कहे बिना कोई नहीं रहा। कहने का अधिकार वहाँ से नहीं आता कि कहनेवाला योग्य है। वह वहाँ से आता है कि जिसके बारे में कहा जा रहा है, उसने भक्तों के हित के लिये ही देह धारण की थी। पुल राजा ने बनवाया है। चींटी को बस उस पर चढ़ना है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ८ से १५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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