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कवि की विनय, और उन सबकी वंदना जिनसे यह कथा चलेगी

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 2

एक आदमी अपनी रचना के सारे दोष स्वयं गिना देता है। वह अपना नाम ठगों की सूची में सबसे ऊपर लिख देता है। फिर वह उन सबके आगे हाथ जोड़ता है जिनके बल पर वह इतनी बड़ी कथा कहने चला है।

मंगलाचरण हो चुका है और कथा अभी शुरू नहीं हुई है। बीच का फ़ासला लम्बा है, और यह प्रसंग उसी फ़ासले का एक हिस्सा है, जिसमें एक भी घटना नहीं घटती। इसमें बस एक आदमी अपने बारे में बोलता है। जो कहता है वह अपने विरुद्ध कहता है: बुद्धि छोटी है, रचना भद्दी है, छन्द और अलंकार का ज्ञान नहीं है, रस एक भी नहीं है। और कलियुग में जो लोग राम का भक्त कहलाकर ठगते फिरते हैं, उनकी गिनती में पहला नाम मेरा है।

पर इसमें एक पूरी दलील भी चल रही है। वह एक ही प्रश्न के आसपास घूमती है: जो कहा जा रहा है वह इतना बड़ा है और कहनेवाला इतना छोटा, तो कहा ही क्यों जाय। उत्तर एक बार में नहीं आता। वह बार-बार अलग-अलग रास्तों से आता है, कभी भौंरे के, कभी चन्दन के, कभी सीप और स्वाति के, कभी नदी पर बँधे पुल के। और अन्त में ऐसे मन्त्रों के, जिनके अक्षर ही आपस में नहीं मिलते।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। जिन मुनि ने रामायण रची, उन्हें यहाँ प्रणाम है, पर उनका नाम नहीं लिया जाता, केवल उनका काम कहा जाता है। नाम पोद्दार की टीका देती है। आगे की कथा इसी कवि की अपनी चाल से चलेगी।

विनय करता कवि और उसके सुननेवाले

  • तुलसीदास इस प्रसंग के अकेले बोलनेवाले, जो अपने सारे दोष स्वयं गिनाते हैं और फिर भी कथा कहने से पीछे नहीं हटते।
  • सज्जन वे सुननेवाले जो भौंरे की तरह गुण ही ग्रहण करते हैं, और समुद्र की तरह दूसरे की पूर्णता देखकर उमड़ पड़ते हैं।
  • खल वे सुननेवाले जो पराये दोष को गहने की तरह पहने रहते हैं, और जिन्हें यहाँ हँसने की अनुमति तक दे दी जाती है।
  • सरस्वती, जो कवि के स्मरण करते ही ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी आती हैं, और जिनकी थकान रामचरित के सरोवर में ही उतरती है।
  • रामायण रचनेवाले मुनि जिनका नाम नहीं लिया जाता, केवल काम कहा जाता है। पोद्दार की टीका इन्हें वाल्मीकि बताती है।
  • व्यास आदि कवि जिन्होंने पहले भगवान् का यश गाया, और जिनके बनाये मार्ग पर चलना तुलसी अपने लिये सुगम बताते हैं।
  • शिव और पार्वती यहाँ गुरु भी, माता-पिता भी, और शाबर मन्त्रों के रचनेवाले भी, जिनका प्रसाद पाकर कथा आरम्भ होती है।

पहले प्रणाम, फिर विनती

पिछले प्रसंग में गुरु की, संतों की, और उन सबकी वंदना हो चुकी थी जिनसे कथा का आरम्भ होता है। अब कवि एक बार फिर हाथ जोड़ता है, चौरासी लाख योनियों के आगे, जल के, पृथ्वी के और आकाश के जीवों के आगे। वह इसका जो कारण देता है, वही इस पूरे प्रसंग की नींव है।

चौरासी लाख योनियों में चार प्रकार के जीव हैं, जो जल में, पृथ्वी पर और आकाश में बसते हैं। इस सारे जगत् को सीता और राम से भरा हुआ जानकर कवि दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। प्रणाम किसी श्रेष्ठ को नहीं, कीड़े को भी है, क्योंकि कारण उन जीवों में नहीं, उनके भीतर बैठे हुए में है।

और जब सब कुछ सीता और राम से भरा है, तो उन्हीं सबसे माँगा भी जा सकता है। मुझे अपना दास जानकर, हे कृपा की खान, आप सब मिलकर छल छोड़कर कृपा कीजिये, क्योंकि मुझे अपनी बुद्धि के बल का भरोसा नहीं है।

मैं राम के गुणों की कथा कहना चाहता हूँ, पर मेरी बुद्धि छोटी है, वह चरित्र अथाह है, और उपाय का एक भी अंग नहीं सूझता। फिर वे कहते हैं कि मन और बुद्धि कंगाल हैं, और मनोरथ राजा। एक ही आदमी के भीतर दोनों बैठे हैं।

फिर यही बात दूसरी तरफ़ से आती है: बुद्धि बहुत नीची है और रुचि बहुत ऊँची। चाह अमृत की है, और जगत् में छाछ भी नहीं जुड़ती। अपने को छोटा कहकर भी माँग वापस नहीं ली जाती।

जो अपने जल से बढ़ते हैं, और जो चाँद देखकर उमड़ता है

अब वह अपने सुननेवालों को दो हिस्सों में बाँटता है। एक ओर सज्जन हैं, जो बालक के तोतले बोल माता-पिता की तरह प्रसन्न मन से सुनेंगे। दूसरी ओर वे हैं जो पराये दोषों को गहने की तरह पहने रहते हैं, और हँसेंगे।

फिर वह अपने ही व्यवसाय पर चोट करता है: रसीली हो या फीकी, अपनी कविता किसे अच्छी नहीं लगती। दूसरे की रचना सुनकर हर्षित होनेवाले जगत् में बहुत नहीं हैं।

तालाब और नदी जैसे लोग बहुत हैं, जो जल पाकर अपनी ही बाढ़ से बढ़ते हैं। समुद्र जैसा कोई एक विरला होता है, जो चन्द्रमा को पूरा देखकर उमड़ पड़ता है। नदी में वर्षा का जल आता है, तब वह बढ़ती है। समुद्र में कुछ नहीं आया होता। जो बढ़ा है वह आकाश में है, दूर है, फिर भी समुद्र उठता है।

यही सज्जन की परिभाषा है। दूसरे का पूरा होना देखकर भीतर कुछ उठ आये, और अपने खाते में कुछ न जुड़े। नदी को यहाँ बुरा नहीं कहा गया, बस वह सामान्य है। समुद्र विरला है।

भाग्य छोटा है, अभिलाषा बड़ी है, और बीच में एक विश्वास है, कि सज्जन सुनकर सुख पावेंगे और दुष्ट हँसी उड़ावेंगे। कवि यह नहीं कहता कि सुनकर सब सुधर जायेंगे। दोनों बातें होंगी, और वह दोनों के लिये तैयार है।

हँसी की अनुमति

दुष्ट हँसेंगे, यह कहकर तुलसी उनसे लड़ते नहीं। वे हँसी को अपने हित में गिन लेते हैं।

दुष्टों के हँसने से मेरा हित ही होगा। कौए कोयल को कठोर ही कहा करते हैं, बगुले हंस को हँसते हैं, मेढक पपीहे को, और मलिन मनवाले निर्मल वाणी को। पहली तीन जोड़ियाँ चौथी बात का दृष्टान्त हैं: जो मलिन है, वह निर्मल पर हँसता है।

फिर वे कहते हैं कि जिनको न कविता का रस है और न राम के चरणों में प्रेम, उनके लिये यह रचना हास्य का काम देगी। एक तो यह भाषा की रचना है, दूसरे मेरी बुद्धि भोली है, इसलिये यह हँसने योग्य ही है। और हँसने योग्य पर हँसने में उन्हें कोई दोष नहीं। अनुमति मिलते ही हँसी हथियार नहीं रह जाती।

फिर अपनी कमियों की पूरी सूची: मैं कवि नहीं हूँ, वचन में प्रवीण नहीं हूँ, सब कलाओं और विद्याओं से हीन हूँ। फिर काव्य का सारा सामान गिनाया जाता है: तरह-तरह के अक्षर, अर्थ और अलंकार, अनेक प्रकार की छन्द-रचना, भावों के भेद। रसों के अपार भेद, और कविता के भाँति-भाँति के गुण और दोष।

और सूची के ठीक बाद एक ही बात में सबका उत्तर: काव्य का विवेक मुझमें एक भी नहीं है, यह मैं कोरे कागज़ पर लिखकर सच कहता हूँ। कोरा कागज़ ही इस बात का जोड़ है। पोद्दार की टीका इसे शपथपूर्वक कहना बताती है। जो आदमी अपने विरुद्ध यह बात लिखकर दे देता है, उसके पास छिपाने को कुछ नहीं बचता।

मेरी रचना सब गुणों से रहित है, पर इसमें एक गुण है जो सारे संसार में प्रसिद्ध है, और उसी को विचारकर निर्मल विवेकवाले इसे सुनेंगे। यह गुण कवि अपना नहीं कहता, फिर भी अपनी रचना में मौजूद बताता है। आगे कवि बताता है कि वह क्या है।

वह एक गुण, जो कवि का अपना नहीं है

वह गुण राम का नाम है: अत्यन्त पवित्र, वेद और पुराणों का सार, मंगल का भवन और अमंगल को हरनेवाला। उसे पार्वती के साथ शिव जपते हैं। नाम की बड़ाई दिखाने के लिये जपनेवाला किसी भक्त को नहीं, शिव को चुना गया है।

फिर एक ही बात के दो आधे आते हैं। पहला यह कि अच्छे कवि की कितनी भी अनूठी रचना हो, राम नाम के बिना वह शोभा नहीं पाती। जैसे चन्द्रमुखी सुन्दरी सब प्रकार से सँवरकर भी वस्त्र के बिना शोभा नहीं पाती। वस्त्र गहना नहीं है। वह है जिसके बिना बाकी गहने देखे ही नहीं जाते।

दूसरा यह कि कुकवि की रची, सब गुणों से रहित वाणी को भी, राम के नाम और यश से अंकित जानकर, बुद्धिमान् आदर से कहते और सुनते हैं। क्योंकि संत भौंरे की तरह गुण ही ग्रहण करते हैं। भौंरा फूल की समीक्षा नहीं करता। वह रस लेकर उड़ जाता है।

फिर भरोसा साफ़ शब्दों में: इस रचना में कविता का एक भी रस नहीं है, फिर भी इसमें राम का प्रताप प्रकट है। यही एक भरोसा मन में आया है। भले संग से किसने बड़प्पन नहीं पाया। और उदाहरण सबसे नीची चीज़ का: धुआँ भी अगर के संग से अपनी स्वाभाविक कड़वाहट छोड़ देता है।

राम की कथा मंगल करनेवाली और कलियुग के मल को हरनेवाली है। मेरी भद्दी कविता की चाल टेढ़ी है, जैसे पवित्र जलवाली नदी की चाल टेढ़ी होती है। कवि अपना दोष छिपाता नहीं, उसे गंगा की आकृति दे देता है। फिर दूसरा चित्र: श्मशान की राख भी शिव के अंग पर सुहावनी लगती है और स्मरण करते ही पवित्र करती है।

पहले वह कहता है कि राम के यश के संग से मेरी रचना सबको अत्यन्त प्रिय लगेगी। जैसे मलय पर्वत के संग से काठ चन्दन हो जाता है, और फिर काठ का विचार कौन करता है। फिर वह कहता है कि श्यामा गाय काली होती है पर उसका दूध उज्ज्वल और बहुत गुणकारी होता है, इसलिये सब उसे पीते हैं। इसी तरह गँवारू भाषा में होने पर भी सीता और राम के यश को बुद्धिमान् चाव से गाते और सुनते हैं।

चन्दन में काठ बदल जाता है। गाय में कुछ नहीं बदलता। गाय काली ही रहती है और दूध सफ़ेद ही। पहली उपमा में कवि आशा करता है कि उसकी भाषा बदल जायेगी। दूसरी में वह कहता है कि भले न बदले, भीतर जो है वह उजला है।

मणि, सीप, और वह थकान जो सरस्वती की है

अब एक नयी बात। रचना जहाँ बनती है और जहाँ शोभा पाती है, वे दो अलग जगहें हैं।

मणि, माणिक और मोती साँप के, पर्वत के और हाथी के मस्तक पर वैसी शोभा नहीं पाते, जैसी राजा के मुकुट में और नवयुवती के शरीर पर पाते हैं।

इसी तरह, बुद्धिमान् कहते हैं, सुकवि की कविता उपजती कहीं है और शोभा कहीं और पाती है। पोद्दार की टीका इसे खोलकर कहती है। उसके अनुसार कविता वहाँ शोभा पाती है जहाँ उसका विचार और प्रचार हो, और जहाँ उसकी कही बात को ग्रहण करके उस पर चला जाय।

फिर सरस्वती का चित्र आता है। कवि के स्मरण करते ही भक्ति के कारण सरस्वती ब्रह्मलोक छोड़कर दौड़ी आती हैं। दौड़ने की वह थकान रामचरित के सरोवर में नहलाये बिना करोड़ों उपायों से भी नहीं जाती। यही हृदय में विचारकर कवि और पण्डित कलियुग के मल को हरनेवाला भगवान् का यश ही गाते हैं।

बुलाने पर जो दौड़कर आया हो, उससे कुछ ऐसा कहलवाना जिससे उसकी थकान न उतरे, अभद्रता है। और कवि कहता है कि संसारी मनुष्यों का गुणगान कराने पर सरस्वती सिर धुनकर पछताती हैं। देवी को बुलाकर किसी संसारी मनुष्य की प्रशंसा करा देना, यही वह चीज़ है जिससे यह कवि बचना चाहता है।

फिर हृदय, बुद्धि और सरस्वती एक चित्र में: हृदय समुद्र है, बुद्धि सीप है, और सरस्वती स्वाति नक्षत्र। उसमें श्रेष्ठ विचार का जल बरसे तो मुक्तामणि जैसी सुन्दर कविता होती है।

उन मोतियों को युक्ति से बेधकर, रामचरित के सुन्दर तागे में पिरोकर, सज्जन अपने निर्मल हृदय में पहनते हैं, और उससे अत्यन्त अनुराग की शोभा होती है। मोतियों को एक साथ बाँधनेवाला तागा कथा है, इसीलिये आगे जो आ रहा है वह सूक्तियों का संग्रह नहीं, एक कथा है।

सूची में सबसे पहला नाम

अब वह हिस्सा आता है जिसमें कवि अपना नाम ठगों की सूची में लिखता है। तुलसी कलियुग के लोगों का एक वर्ग खड़ा करते हैं। उसका वर्णन कुछ देर तक तीसरे पुरुष में चलता है: जिनकी करनी कौए की है और वेष हंस का, जो वेद का मार्ग छोड़कर कुपथ पर चलते हैं। जो कपट के शरीर और कलियुग के पापों के बर्तन हैं।

जो राम का भक्त कहलाकर ठगते हैं, जो धन, क्रोध और काम के दास हैं। जो धींगाधींगी करनेवाले, धर्म की झूठी ध्वजा फहरानेवाले और कपट के धन्धों का बोझ ढोनेवाले हैं। और फिर वह कहता है, उन सबमें संसार में पहली गिनती मेरी है।

जिस बात में अपने को ठगों में गिना जा रहा है, वही कान से सुनने पर सबसे चमकीली है: धींग धरमध्वज धंधक धोरी। चार शब्द, और चारों एक ही अक्षर से। जो अभी-अभी कह चुका है कि उसे काव्य का एक भी विवेक नहीं, वह अपने अवगुण गिनाते समय ऐसा अनुप्रास बना देता है।

फिर कवि सूची को मुसकराते हुए बन्द कर देता है: यदि मैं अपने सब अवगुण कहने लगूँ तो कथा बहुत बढ़ जायेगी और पार नहीं मिलेगा। इसलिये मैंने बहुत थोड़े कहे हैं। समझदार थोड़े में ही समझ लेंगे।

फिर वे कहते हैं कि मेरी अनेक प्रकार की विनती समझकर कोई इस कथा को सुनकर दोष नहीं देगा। इतने पर भी जो शंका करेंगे, वे मुझसे भी अधिक जड़ और बुद्धि के कंगाल हैं। जो अपने को सबसे नीचे रख चुका है, उसके पास यही एक चोट बची थी।

मैं कवि नहीं हूँ, चतुर नहीं कहलाता, अपनी बुद्धि के अनुसार राम के गुण गाता हूँ। कहाँ राम के अपार चरित्र, और कहाँ संसार में लगी हुई मेरी बुद्धि। जिस हवा से सुमेरु जैसे पहाड़ उड़ जाते हैं, उसके सामने रूई किस गिनती में है। रूई हलकी है, पर जहाँ पर्वत उड़ रहे हों, वहाँ उसका नाम तक नहीं लिया जाता।

सरस्वती, शेष, शिव, ब्रह्मा, आगम, निगम और पुराण, सब नेति नेति कहकर, ऐसा नहीं, ऐसा नहीं कहकर, निरन्तर जिनका गुणगान करते हैं। जो हार मान चुके हैं, वे भी लगातार गा रहे हैं। जहाँ सरस्वती और वेद तक पार नहीं पाते, वहाँ पार न पाने में किसी को लज्जा नहीं होनी चाहिये।

कहे बिना कोई नहीं रहा

तो फिर कहा ही क्यों जाय? उत्तर एक ही बात में है, और वही इस प्रसंग की धुरी है।

सब जानते हैं कि राम की प्रभुता ऐसी ही है, फिर भी कहे बिना कोई नहीं रहा। यह तर्क नहीं, गवाही है। और वेद इसका कारण बताते हैं कि भजन का प्रभाव बहुत प्रकार से कहा गया है। वर्णन इसलिये नहीं किया जाता कि वह पूरा हो सके। वर्णन करना स्वयं भजन है।

फिर वह गिनती: एक, इच्छा से रहित, अरूप, अनाम, अजन्मा, सच्चिदानन्द, परम धाम, व्यापक, विश्वरूप। इनमें कोई ऐसा नहीं जिसे पकड़कर कथा कही जा सके। और ठीक उसके बाद वह बात जिससे यह सारा ग्रन्थ सम्भव होता है: उन्हीं ने देह धारण करके नाना चरित्र किये।

देह क्यों धारण किया, यह भी कहा गया है: वह लीला केवल भक्तों के हित के लिये है, क्योंकि वे बहुत कृपालु हैं और शरणागत से प्रेम करते हैं। जिन पर उन्होंने एक बार कृपा कर दी, उन पर फिर कभी क्रोध नहीं किया। जो भक्त के लिये ही बनी हो, उसे भक्त का बरतना अनुचित कैसे होगा।

फिर वह परिचय जो तुलसी के यहाँ बार-बार लौटता है, गयी हुई वस्तु लौटा देनेवाले और गरीब को निवाजनेवाले। सरल, सबल और सबके स्वामी। यही समझकर बुद्धिमान् उनका यश कहकर अपनी वाणी को पवित्र और सुफल बनाते हैं। और इसी बल पर कवि घोषणा करता है: राम के चरणों में सिर नवाकर मैं राम के गुणों की कथा कहूँगा। क्योंकि मुनियों ने पहले भगवान् की कीर्ति गायी है, और उसी मार्ग पर चलना मुझे सुगम होगा। पोद्दार की टीका यहाँ कोष्ठक में वाल्मीकि और व्यास के नाम जोड़ती है।

जो बहुत बड़ी नदियाँ हैं, यदि राजा उन पर पुल बँधा दे तो बहुत छोटी चींटियाँ भी उन पर चढ़कर बिना परिश्रम पार चली जाती हैं। पुल राजा बनवाता है, चींटी नहीं। चींटी छोटी ही रहती है। और चढ़ना फिर भी उसी को पड़ता है।

जो हो चुके, जो हैं, और जो आगे होंगे

अब वंदना का एक नया दौर शुरू होता है, और वह कवियों से शुरू होता है। देवता, वेद और ब्रह्मा आगे आयेंगे। पहले वे आते हैं जिन्होंने यही काम पहले कर रखा है।

व्यास आदि अनेक श्रेष्ठ कवि, जिन्होंने आदर से भगवान् का यश कहा, उनके चरणों में प्रणाम, और विनती कि वे मेरे सब मनोरथ पूरे करें। फिर कलियुग के उन कवियों को प्रणाम जिन्होंने राम के गुणों का वर्णन किया।

फिर उन बुद्धिमान् प्राकृत कवियों की बारी है, जिन्होंने भाषा में भगवान् के चरित्र कहे हैं। जो हो चुके हैं, जो इस समय हैं, और जो आगे होंगे, उन सबको सारा कपट छोड़कर प्रणाम। जिनका जन्म अभी हुआ ही नहीं, उनके आगे भी सिर नवाया जा रहा है, और उनसे वरदान माँगा जा रहा है।

वरदान यह है कि साधुओं के समाज में मेरी रचना का सम्मान हो। कवित्व या यश नहीं, सभा में जगह माँगी गयी है, क्योंकि जिस रचना का बुद्धिमान् आदर नहीं करते, उसका परिश्रम व्यर्थ है। और वैसा परिश्रम बाल कवि ही करते हैं।

फिर कसौटी: कीर्ति, कविता और सम्पत्ति वही अच्छी है जो गंगा की तरह सबका हित करे। कविता को यहाँ सुन्दरता से नहीं, इससे नापा जा रहा है कि उससे किसका भला हुआ।

उसी कसौटी पर कवि अपनी कठिनाई रखता है: राम की कीर्ति सुन्दर है और मेरी रचना भद्दी, यही चिन्ता है। फिर कवियों से कहता है कि आपकी कृपा से यह भी सुलभ हो सकता है, रेशम की सिलाई टाट पर भी सुहावनी लगती है। इस उपमा में काठ और धुएँ की उपमाओं से एक अन्तर है। टाट टाट ही रहता है और रेशम रेशम, फिर भी सिलाई सुहावनी लगती है।

चतुर लोग उसी कविता का आदर करते हैं जो सरल हो, और जिसमें निर्मल कीर्ति का वर्णन हो। उसे सुनकर शत्रु भी अपना सहज, स्वभाव से आया, वैर भूलकर सराहना करने लगें।

फिर वह कहता है कि ऐसी कविता निर्मल बुद्धि के बिना नहीं होती, और मेरी बुद्धि का बल बहुत थोड़ा है। इसलिये बार-बार निहोरा करता हूँ कि कृपा कीजिये जिससे मैं भगवान् का यश कह सकूँ। और वह कवियों को एक नाम देता है: आप राम के चरित्ररूपी मानसरोवर के सुन्दर हंस हैं। इस बालक की विनती सुनकर और इसकी रुचि देखकर कृपा कीजिये।

इस प्रसंग में हंस तीन बार आया है। पहली बार वह है जिस पर बगुले हँसते हैं। दूसरी बार वह कपट का वेष था, करनी कौए की और वेष हंस का। यहाँ वह असली है, और जिस सरोवर का हंस है उसका नाम मानस है, वही नाम जो इस पूरे ग्रन्थ पर लिखा है।

रामायण रचनेवाले मुनि के चरण

अब तीन नमस्कार होते हैं, एक मुनि को, एक चारों वेदों को, और एक ब्रह्मा को।

पहला नमस्कार उन मुनि के चरणों को है जिन्होंने रामायण रची। नाम पोद्दार की टीका देती है, वाल्मीकि। और परिचय में एक खेल है। वह रामायण खर सहित है और फिर भी कोमल, दूषण सहित है और फिर भी दोष रहित।

खर और दूषण उस रामायण के दो राक्षस हैं, और खर का अर्थ कठोर भी होता है तथा दूषण का अर्थ दोष भी। यानी वह ग्रन्थ खर को समेटे हुए भी कठोर नहीं है, और दूषण को समेटे हुए भी उसमें दोष नहीं है। जो कह चुका है कि उसे अलंकार का विवेक नहीं, वह यहाँ एक साँस में दो श्लेष रख देता है।

दूसरा नमस्कार चारों वेदों को है, जो संसार-सागर पार करने के लिये जहाज़ के समान हैं। उन्हें राम का निर्मल यश कहते हुए सपने में भी खेद नहीं होता। सरस्वती दौड़कर आती हैं और थक जाती हैं। वेद यही काम करते हैं और थकते नहीं।

तीसरा नमस्कार ब्रह्मा की चरणरज को है, जिन्होंने भवसागर बनाया। वहाँ से एक ओर संतरूपी अमृत, चन्द्रमा और कामधेनु निकले और दूसरी ओर दुष्टरूपी विष और मदिरा। कवि शुरू से सज्जन और खल को अलग करता आया है। यहाँ वह फिर से दोनों को एक ही समुद्र से निकलता दिखा देता है। और इस बार वह उस समुद्र के बनानेवाले के चरणों की धूल को प्रणाम करता है। इसके बाद देवता, ब्राह्मण, पण्डित और ग्रह, सबकी वंदना करके हाथ जोड़कर वह कहता है कि प्रसन्न होकर मेरे सब सुन्दर मनोरथ पूरे कीजिये। ग्रह भी छोड़े नहीं गये।

बेमेल अक्षर, और प्रत्यक्ष प्रभाव

अन्तिम हिस्सा दो नदियों से शुरू होता है, जो एक साथ जोड़कर रखी गयी हैं: सरस्वती और देवनदी गंगा, दोनों पवित्र और मनोहर चरित्रवाली। एक स्नान करने और जल पीने से पाप हरती है, दूसरी कहने और सुनने से अविवेक।

गंगा में उतरना पड़ता है। सरस्वती में बोलना और सुनना पड़ता है, और दोनों में मैल जाता है। यह आदमी देर से यह कहता आ रहा है कि उसकी भाषा भद्दी है। वह यहाँ चुपचाप यह भी कह जाता है कि कहना और सुनना अपने आप में एक तीर्थ है।

फिर वह गुरु और माता-पिता की ओर मुड़ता है। गुरु, पिता और माता, तीनों उसके लिये शिव और पार्वती हैं, जो दीनों के बन्धु और नित्य दान करनेवाले हैं। उन्हीं को वह राम का सेवक, स्वामी और सखा एक साथ कहता है, और तुलसीदास का सब प्रकार से निष्कपट हित करनेवाला। और तब वह बात आती है जो इस प्रसंग की सबसे बड़ी युक्ति है।

कलियुग को देखकर, जगत् के हित के लिये, शिव और पार्वती ने शाबर मन्त्रों के समूह रचे। उन मन्त्रों के अक्षर बेमेल हैं, उनका कोई अर्थ नहीं बैठता, और उनका जप भी नहीं होता। फिर भी, शिव के प्रताप से, उनका प्रभाव प्रत्यक्ष है।

देर से एक आदमी कह रहा है कि उसकी वाणी गँवारू है, और उसे अक्षर, अर्थ, अलंकार और छन्द का एक भी विवेक नहीं है। और अब वह उन मन्त्रों की ओर उँगली उठा देता है जो स्वयं शिव के बनाये हुए हैं। उनकी कमियाँ भी गिनायी गयी हैं: बेमेल अक्षर, अर्थ का अभाव, और जप तक नहीं। उनका काम फिर भी होता है, और प्रत्यक्ष होता है। वे इस पूरी विनय का उत्तर हैं, और उत्तर देनेवाले कवि नहीं, शिव हैं।

इसीलिये कवि कहता है कि वही शिव मुझ पर अनुकूल होकर इस कथा को आनन्द और मंगल की जड़ बना देंगे। पार्वती और शिव का स्मरण करके, उनका प्रसाद पाकर, मैं चाव भरे चित्त से रामचरित का वर्णन करता हूँ। पहले कवि ने कहा था कि वह राम के चरणों में सिर नवाकर कथा कहेगा, और मन को बल दिखाकर कथा रचेगा। यहाँ वही बात अभी के समय में आ जाती है। अब वर्णन करता हूँ।

फिर वह चित्र आता है जिसमें आरम्भ का चाँद लौट आता है। मेरी रचना शिव की कृपा से ऐसी सुशोभित होगी जैसे तारों के साथ चन्द्रमा से रात शोभित होती है। पहले सज्जनों की उपमा में चाँद दूसरे का था। यह चाँद अपनी रात में है। और जो इस कथा को प्रेम से और सावधानी से समझ-बूझकर कहेंगे और सुनेंगे, वे कलियुग के मल से रहित होकर सुन्दर मंगल के भागी होंगे। और वे राम के चरणों के अनुरागी बनेंगे। कहना और सुनना बराबर गिने गये हैं।

यदि मुझ पर सपने में भी सचमुच शिव और पार्वती की प्रसन्नता हो, तो भाषा की इस रचना का जो प्रभाव मैंने कहा है वह सब सच हो। सपने में भी और सचमुच भी, ये दोनों बातें आमने-सामने रखी गयी हैं। माँगा अपने लिये कुछ नहीं गया। माँगा यह गया है कि जो कहा जा चुका है वह सच निकले।

दरवाज़े पर खड़ा कवि

इस प्रसंग में एक भी घटना नहीं घटती, और यहाँ बोलनेवाला अभी कवि नहीं बना है। वह अभी दरवाज़े पर खड़ा है, हाथ जोड़े हुए। और जिस-जिसके आगे हाथ जोड़े जा सकते थे, उन सबके आगे जोड़ लिये गये हैं। चौरासी लाख योनियों के जीवों के आगे, कवियों के, वेदों के, ब्रह्मा के, ग्रहों के, सरस्वती और गंगा के, और अन्त में शिव और पार्वती के।

यह विनय बनावट भी है और सच भी। जो बात अपने को ठगों में पहला बताती है, उसी में चार शब्दों का ऐसा अनुप्रास है जो कोई अनाड़ी नहीं बना सकता। जो कहता है कि उसे अलंकार का विवेक नहीं, वही खर और दूषण का दोहरा श्लेष रख देता है। तुलसी की बात यह कभी नहीं थी कि वे अच्छा नहीं लिख सकते। उनकी बात यह है कि जो कहा जा रहा है उसके सामने अच्छा लिखना भी कुछ नहीं है।

इसीलिये इस प्रसंग की सबसे भरोसेमन्द बात वह है जिसमें कवि कहता है कि सब जानते हैं यह कहा नहीं जा सकता, और फिर भी कहे बिना कोई नहीं रहा। कहने का अधिकार कहनेवाले की योग्यता से नहीं आता। वह इससे आता है कि जिसके बारे में कहा जा रहा है, उसने भक्तों के हित के लिये ही देह धारण किया था। पुल राजा ने बनवाया है। चींटी को बस उस पर चढ़ना है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 8 से 15, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।