रामचरितमानस · बालकाण्ड · जनकपुर की शोभा, जनक का स्वागत और नगर-दर्शन
जनकपुर की शोभा, जनक का स्वागत और नगर-दर्शन
पहले दोनों भाई जनकपुर की शोभा देखते हैं, फिर राजा और नगरवासी उन्हीं को देखते रह जाते हैं। बीच में लक्ष्मण की एक अनकही इच्छा है, जिसे राम जान लेते हैं।
जनकपुर के निकट पहुँचकर राम और लक्ष्मण प्रसन्न होते हैं। सामने जल से भरे सरोवर हैं, खिले हुए कमल हैं, बागों में फल और फूल हैं। जिस ओर मन जाता है, उसी ओर ठहरने को जी चाहता है। कुछ देर बाद इसी नगर के लोग अपने घर और काम छोड़कर दोनों भाइयों को देखने दौड़ेंगे। जिन आँखों ने पहले नगर की शोभा देखी थी, उन्हीं को देखने के लिये नगर उमड़ पड़ेगा। तुलसीदास इस पूरे प्रसंग को देखने के आनन्द से भर देते हैं।
बीच में राजा जनक की भेंट है। वे महामुनि विश्वामित्र का स्वागत करने आते हैं और दो किशोरों को देखकर अपनी देह की सुध भूल जाते हैं। उनका मन स्वभाव से विरक्त है, पर सामने के रूप से दृष्टि हटती नहीं। वे पूछते हैं कि ये बालक कौन हैं। उधर लक्ष्मण के मन में भी एक बात उठती है, नगर घूम आने की इच्छा। वह इच्छा मुख तक नहीं आती, फिर भी राम उसे जान लेते हैं। यहाँ एक ही साथ राजा का विस्मय, भाई का संकोच और नगर भर के नेत्रों का सुख खुलता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम विश्वामित्र के साथ आये दशरथ के पुत्र, जो लक्ष्मण के मन की इच्छा जानकर गुरु से नगर-दर्शन की आज्ञा माँगते हैं।
- लक्ष्मण राम के छोटे भाई, जिनके मन में जनकपुर देखने की लालसा है और बड़ों के सामने कहने का संकोच भी।
- विश्वामित्र महामुनि, जिनका जनक स्वागत करते हैं और जो दोनों भाइयों का परिचय देते हैं।
- जनक मिथिला के राजा, जिनका सहज विरक्त मन दोनों भाइयों के दर्शन से प्रेम में डूब जाता है।
- जनकपुर के निवासी बालक, गृहस्थ और झरोखों से देखती स्त्रियाँ, जिनके नेत्र दोनों भाइयों के रूप पर लगे हैं।
गंगा के तट से जनकपुर की ओर
राम और लक्ष्मण मुनि के साथ चलते हुए जगत् को पवित्र करनेवाली गंगा के पास पहुँचते हैं। वहीं विश्वामित्र उन्हें बताते हैं कि देवनदी पृथ्वी पर किस प्रकार आयीं। गुरु के साथ यात्रा में यह सुनना भी सम्मिलित है। नदी सामने है और उसके आने की कथा मुनि सुना रहे हैं। तुलसी यहाँ उस कथा का विस्तार नहीं करते; विश्वामित्र ने सब कथा कही, इतना कहकर वे स्नान और आगे की यात्रा पर आ जाते हैं।
चले राम लछिमन मुनि संगा। गए जहाँ जग पावनि गंगा॥
चौपाई १
गाधिसूनु सब कथा सुनाई । जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥
दोनों भाइयों के साथ ऋषियों का समुदाय है। प्रभु ऋषियों सहित स्नान करते हैं और ब्राह्मणों को भाँति-भाँति के दान प्राप्त होते हैं। सुनने के बाद स्नान, फिर दान और फिर प्रसन्नतापूर्वक प्रस्थान, इतना क्रम इन पंक्तियों में सँभाला गया है। जिस नदी को पहले जगत् को पावन करनेवाली कहा गया, उसी के तट पर यात्रा का यह छोटा विराम पूरा होता है। अब सब मुनियों के साथ आगे बढ़ते हैं और शीघ्र ही विदेह की नगरी निकट आ जाती है।
नगर का नाम आने तक राम और लक्ष्मण यात्रियों की तरह मुनियों के साथ चल रहे हैं। अगली चौपाई में उनके देखने का हर्ष सामने आता है। जनकपुर के वर्णन की शुरुआत राजा की सम्पत्ति से नहीं होती; सबसे पहले यह बताया जाता है कि उसकी रमणीयता देखकर बड़े और छोटे भाई कितने प्रसन्न हुए। नगर का परिचय उसी प्रसन्नता से मिलता है। उसके बाद बावलियाँ, कुएँ, नदियाँ और तालाब एक-एक करके हमारे सामने आने लगते हैं।
गंगा के तट पर विश्वामित्र नदी के पृथ्वी पर आने की कथा सुनाते हैं। ऋषियों सहित स्नान और ब्राह्मणों को दान के बाद राम और लक्ष्मण प्रसन्न होकर आगे चलते हैं और जनकपुर के निकट पहुँचते हैं।
जल, कमल और चारों ओर के बाग
राम छोटे भाई के साथ नगर की शोभा देखते हैं और विशेष हर्ष से भर जाते हैं। वहाँ अनेक बावलियाँ और कुएँ हैं, नदियाँ और सरोवर हैं। उनका जल अमृत के समान है और सीढ़ियाँ मणियों की हैं। जल तक उतरने का मार्ग भी शोभा से भरा है। तुलसी की दृष्टि पानी की सतह पर ही नहीं ठहरती, वह उसके किनारों और सोपानों पर भी जाती है। नगर में जल की विविधता है, और उसके पास पहुँचने की सुन्दर व्यवस्था भी।
फिर इस चित्र में ध्वनि आती है। मकरन्द के रस से मतवाले भौंरे मधुर गुंजार कर रहे हैं। अनेक रंगों के पक्षी सुरीले स्वर में बोलते हैं। कमलों के रंग भी अनेक हैं। पानी, फूल और पक्षी मिलकर ऐसी शोभा रचते हैं जिसमें आँख के साथ कान भी रमते हैं। हवा के लिये पोद्दार की टीका तीन गुण खोलती है: शीतल, मन्द और सुगन्धित। यह पवन सदा सुख देनेवाला है। वर्णन के बीच हवा बहने लगती है तो रंग और ध्वनियाँ एक सुखद अनुभव में जुड़ जाते हैं।
सुमन बाटिका बाग बन बिपुल बिहंग निवास।
दोहा २१२
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥ २१२॥
नगर के चारों ओर फुलवारियाँ, बाग और वन हैं। उनमें बहुत से पक्षियों का निवास है। फूल खिल रहे हैं, फल लग रहे हैं और सुन्दर पत्ते शोभा दे रहे हैं। यहाँ हरियाली को केवल दूर से देखी हुई छाया की तरह नहीं रखा गया। उसकी अलग-अलग अवस्थाएँ दिखाई गयी हैं: फूलना, फलना और पत्तों से भरना। जिन पक्षियों का कलरव अभी सुनाई दिया था, उनका घर भी इन बागों में मिल जाता है। प्रकृति की इस शोभा में रहनेवाले जीवों का अपना स्थान है।
दोहा नगर को चारों ओर से घेर लेता है। उसके भीतर के बाजार और महल अभी आगे खुलेंगे, लेकिन बाहर का यह विस्तार पहले देख लेना चाहिये। जल के अनेक रूप, हवा की कोमलता और फलों से भरे बाग जनकपुर को रमणीय बनाते हैं। दोनों भाइयों का हर्ष अब हमारे लिये भी अधिक स्पष्ट होता है। वे जिस सुन्दरता को देख रहे हैं, उसमें चमक के साथ शीतलता है, सुगन्ध के साथ कलरव है, और बागों के साथ उनमें बसे पक्षी भी हैं।
जनकपुर के जलाशय अमृत जैसे जल और मणियों की सीढ़ियों से शोभित हैं। भौंरों की गुंजार, पक्षियों का कलरव, रंग-बिरंगे कमल और सुखद पवन के बीच नगर के चारों ओर फलते-फूलते बाग फैले हैं।
बाजार की सम्पन्नता और घरों का मंगल
अब वर्णन नगर के भीतर की ओर मुड़ता है। तुलसी कहते हैं कि उसकी सुन्दरता का पूरा वर्णन बन नहीं पड़ता। मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता है। यह मन का बार-बार नयी वस्तु पर जाना और उसी में रम जाना है। सुन्दर बाजार हैं और मणियों से बने विचित्र छज्जे हैं। उन्हें देखकर लगता है कि ब्रह्मा ने अपने हाथों से सँवारा हो। नगर की बनावट को ऐसी सावधानी से रचा हुआ बताया गया है कि उसकी कारीगरी स्वयं देखने का विषय बन जाती है।
धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना॥
चौपाई २
चौहट सुंदर गलीं सुहाई । संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥
बाजार में धनी व्यापारी बैठे हैं। उनके धन की तुलना कुबेर से की गयी है, और उनके पास तरह-तरह की सभी वस्तुएँ हैं। अभी तक हमने बागों में फूल और फल देखे थे; यहाँ मनुष्यों के कारोबार की सम्पन्नता दिखाई देती है। व्यापारी अपनी वस्तुओं के साथ बैठे हैं, इसलिए यह कोई खाली सजा हुआ बाजार नहीं है। चौराहे सुन्दर हैं, गलियाँ सुहावनी हैं और वे लगातार सुगन्ध से सींची जाती हैं। बाजार से गलियों तक जाती दृष्टि के साथ सुगन्ध भी चली आती है।
फिर घरों की ओर देखिये। सबके घर मंगलमय हैं, उन पर चित्र बने हैं। तुलसी की उपमा में मानो कामदेव ने चित्रकार होकर इन्हें चित्रित किया है। बाजार के छज्जों के लिये ब्रह्मा के हाथ आये थे, घरों के चित्रों के लिये कामदेव का चित्रकार होना आता है। दोनों उपमाओं में मनुष्य की बनायी वस्तुओं की शोभा इतनी बढ़ जाती है कि उसके लिये देवताओं की कला याद आती है। दीवारों पर क्या-क्या चित्र हैं, कवि उसे गिनाते नहीं; उनका आकर्षण इस उपमा में समेट देते हैं।
इन घरों के निवासियों का वर्णन भी उतनी ही सावधानी से है। स्त्री और पुरुष सुन्दर हैं, पवित्र हैं, साधु स्वभाव के हैं। उनमें धर्मशीलता, ज्ञान और गुण हैं। इस प्रकार घर की शोभा कहकर वर्णन उसके भीतर रहनेवालों तक पहुँचता है। धन बाजार में दिखाई दिया, कला घरों पर, और अब मनुष्यों के स्वभाव का मंगल सामने है। जनकपुर का परिचय इन सबको एक साथ रखता है। निवासी केवल देखनेवाली भीड़ बनकर नहीं आये; उनकी पवित्रता और गुण भी इस नगर की सुन्दरता में गिने गये हैं।
जनकपुर में रत्नमय छज्जों वाले बाजार, कुबेर जैसे धनी व्यापारी, सुगन्ध से सींची गलियाँ और चित्रित घर हैं। नगर के स्त्री-पुरुष सुन्दर होने के साथ पवित्र, धर्मशील, ज्ञानी और गुणवान् हैं।
महलों की शोभा और मुनि की अमराई
जनक का निवास अत्यन्त अनुपम है। वहाँ का ऐश्वर्य देखकर देवता भी स्तम्भित हो जाते हैं। महल के परकोटे पर दृष्टि पड़ती है तो लगता है जैसे उसने समस्त लोकों की शोभा अपने भीतर घेर रखी हो। यह परकोटे की ऊँचाई या लम्बाई का हिसाब नहीं है; उसके प्रभाव का वर्णन है। जहाँ आँख जाती थी वहाँ मन रम जाता था, और यहाँ आकर मानो वही सारी शोभा एक सीमा के भीतर एकत्र दिखाई देने लगती है।
धवल धाम मनि पुरट पट सुघटित नाना भाँति।
दोहा २१३
सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति॥ २१३॥
उज्ज्वल महलों में अनेक प्रकार की सुन्दर रचना है। पोद्दार की टीका मणियों से जड़े सोने की जरी वाले परदों का उल्लेख करती है। दोहे का दूसरा भाग सीता के सुन्दर निवास पर आकर ठहरता है। उस भवन की शोभा कैसे कही जाय, यही प्रश्न रह जाता है। इस दृश्य में सीता का परिचय उनके निवास से मिलता है। राजमहल की उज्ज्वलता और रत्नों की चमक के भीतर उस सुन्दर सदन का नाम आता है, और कवि फिर वर्णन की असमर्थता कह देते हैं।
महल के द्वार सुन्दर हैं और उनके कपाट वज्र के कहे गये हैं। टीका इसमें मजबूती अथवा हीरों की चमक, दोनों अर्थ बताती है। द्वारों पर राजाओं, नटों, मागधों और भाटों की भीड़ है। विशाल घुड़शालाएँ और गजशालाएँ बनी हैं, जहाँ घोड़े, हाथी और रथों की भरमार रहती है। शूरवीरों, मन्त्रियों और सेनापतियों के घर भी राजमहल जैसे हैं। नगर की समृद्धि राजनिवास से आगे उसके अधिकारियों और योद्धाओं के घरों तक फैली दिखाई देती है।
नगर के बाहर भी लोग ठहरे हुए हैं। नदी और तालाबों के निकट जहाँ-तहाँ बहुत से राजाओं के डेरे हैं। इसी बाहरी विस्तार में विश्वामित्र को आमों का एक अनुपम बाग दिखाई देता है। वहाँ सब तरह के सुभीते हैं और वह हर प्रकार से सुहावना है। वे रघुवीर से कहते हैं कि उनका मन यहीं रहने को मान गया है। महलों, द्वारों और डेरे डाले राजाओं के वर्णन के बाद मुनि के ठहरने के लिये यह अमराई चुनी जाती है।
देखि अनूप एक अँवराई । सब सुपास सब भाँति सुहाई॥
चौपाई ३
कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥
राम मुनि की बात स्वीकार करते हैं। बहुत अच्छा, स्वामिन्, कहकर वे मुनियों के समूह सहित वहीं उतर पड़ते हैं। स्थान चुननेवाले विश्वामित्र हैं और राम उनकी इच्छा में प्रसन्नतापूर्वक सम्मति देते हैं। ठहरने की यह बात पूरी होते ही कथा राजा की ओर मुड़ती है। मिथिलापति को समाचार मिलता है कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं। जनकपुर की शोभा अभी तक यात्रियों की दृष्टि से खुल रही थी; अब नगर के स्वामी अपने अतिथि से मिलने चलनेवाले हैं।
जनक और सीता के महलों, राजद्वारों, विशाल शालाओं तथा राजपुरुषों के घरों की शोभा दिखाई जाती है। बाहर अनेक राजा ठहरे हैं। विश्वामित्र एक सुहावनी अमराई चुनते हैं, राम मुनियों सहित वहीं उतरते हैं और जनक को उनके आने का समाचार मिलता है।
स्वागत में आये जनक, और लौटते हुए दोनों भाई
विश्वामित्र के आने का समाचार पाकर राजा जनक प्रसन्न होते हैं। वे मिलने अकेले नहीं चलते। पवित्र हृदय के मन्त्री, बहुत से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु और अपने कुल के लोग उनके साथ हैं। पोद्दार की टीका यहाँ गुरु का नाम शतानन्द बताती है। इस साथ में राजकाज के अधिकारी भी हैं और राजा के अपने सम्बन्धी भी। नगर की ओर से मुनि का स्वागत करने के लिये स्वयं मिथिलापति चल पड़ते हैं।
जनक मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम करते हैं। विश्वामित्र प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। राजा सारी ब्राह्मणमण्डली का भी आदरपूर्वक वन्दन करते हैं और अपना बड़ा भाग्य जानकर आनन्दित होते हैं। मुनि बार-बार कुशल पूछते हैं और उन्हें बैठाते हैं। स्वागत का यह क्रम चरणों में झुकने से शुरू होकर साथ बैठने तक पहुँचता है। दोनों ओर प्रसन्नता है, और राजा अपने पास आये मुनि के दर्शन को अपना सौभाग्य मानते हैं।
इसी समय राम और लक्ष्मण वहाँ आ जाते हैं। वे फुलवारी देखने गये थे। अब तक राजा की भेंट मुनि से हो रही थी; दोनों भाइयों के लौटते ही सबका ध्यान उनकी ओर जाता है। उनकी अवस्था सुकुमार किशोर की है, एक श्याम हैं और दूसरे गौर। वे नेत्रों को सुख देनेवाले तथा विश्व के चित्त को चुरानेवाले कहे गये हैं। रघुनाथ के आते ही सब उठ खड़े होते हैं, और विश्वामित्र दोनों को अपने निकट बैठा लेते हैं।
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता । बारि बिलोचन पुलकित गाता॥
चौपाई ४
मूरति मधुर मनोहर देखी । भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥
दोनों भाइयों को देखकर सभी सुखी हो जाते हैं। नेत्रों में जल भर आता है और शरीर पुलकित हो उठते हैं। इन दो लक्षणों से उस सभा का आनन्द दिखाई देता है। जनक पर उसका प्रभाव और भी गहरा है। मधुर मनोहर मूर्ति देखकर विदेह विशेष रूप से विदेह हो जाते हैं। एक ही शब्द पहले राजा का परिचय देता है, फिर उनकी दशा खोल देता है: उन्हें देह की सुध-बुध नहीं रहती। राजा का नाम और प्रेम में डूबी हुई उनकी अवस्था एक साथ सुनाई पड़ते हैं।
जनक अपने मन को प्रेम में मग्न पाते हैं। फिर विवेक का आश्रय लेते हैं, धीरज सँभालते हैं और मुनि के चरणों में सिर झुकाते हैं। उनका प्रश्न अभी बाकी है, उसे कहने के लिये यह सँभलना आवश्यक पड़ता है। वाणी गम्भीर है और प्रेम से गद्गद भी। राजा ने जिनका परिचय नहीं सुना, उन्हें देखकर ही मन इतना भर गया है कि बोलने से पहले धैर्य धारण करना पड़ रहा है। अब वे विश्वामित्र से दोनों बालकों के विषय में पूछते हैं।
जनक अपने मन्त्री, योद्धा, ब्राह्मण, गुरु और कुलजनों सहित विश्वामित्र का स्वागत करते हैं। फुलवारी से लौटे दोनों भाइयों को देखकर सब उठ खड़े होते हैं। उनके दर्शन से जनक देह की सुध भूलते हैं, फिर धीरज सँभालकर मुनि से प्रश्न करते हैं।
ये दोनों बालक कौन हैं
जनक का प्रश्न बहुत आदर से खुलता है। हे नाथ, ये दोनों सुन्दर बालक कौन हैं। क्या मुनिकुल के आभूषण हैं, या किसी राजवंश के पालन करनेवाले। सामने मुनि के निकट बैठे हैं, इसलिए ऋषिकुल का विचार आता है; उनके रूप और व्यक्तित्व में राजकुल की सम्भावना भी दिखाई देती है। फिर जनक अपने प्रश्न को उस अनुभव तक ले जाते हैं जो दर्शन करते ही उनके भीतर हुआ है। क्या वेदों ने जिस ब्रह्म का निषेध के द्वारा गान किया है, वही इन दो रूपों में आया है।
कहहु नाथ सुंदर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुलपालक॥
चौपाई ५
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥
पहले दो प्रश्न कुल के हैं। तीसरे में वही देखनेवाला अपने परिचित ब्रह्मानन्द की ओर लौटता है। जनक यह अनुमान बाहर की किसी चर्चा से नहीं लगाते; वे अपने मन की अवस्था बताते हैं। उनका मन सहज ही वैराग्यरूप है, फिर भी दोनों को देखकर चन्द्रमा के सामने चकोर की तरह मुग्ध हो रहा है। ऐसा मन, जिसे विषयों में फँसने की आदत नहीं, इस रूप के सामने ठहर गया है। इसीलिये वे निश्छल भाव से पूछ रहे हैं और मुनि से छिपाव न करने की प्रार्थना करते हैं।
जनक अपनी बात को और स्पष्ट करते हैं। इनको देखते ही अत्यन्त अनुराग के वश उनका मन ब्रह्मसुख छोड़ बैठा है। यह स्वीकार करते समय वे अपने वैराग्य का बखान नहीं कर रहे; उस प्रेम की प्रबलता बता रहे हैं जिसके सामने उनका सहज मन भी वश में नहीं रहा। ब्रह्मसुख का परिचय रखनेवाले राजा उसी सुख का नाम लेकर सामने के दर्शन का प्रभाव कह रहे हैं। प्रश्न की गम्भीरता इस स्वीकार से आती है।
इन्हहि बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्मसुखहि मन त्यागा॥
चौपाई ६
कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥
विश्वामित्र हँसकर कहते हैं कि राजा ने ठीक कहा है, उनका वचन मिथ्या नहीं हो सकता। फिर वे दोनों भाइयों के विषय में कहते हैं कि जहाँ तक प्राणी हैं, ये सबको प्रिय हैं। मुनि के उत्तर का यह पहला भाग राजा के अनुभव की पुष्टि करता है। जनक के मन में जो प्रेम उठा, उसे मुनि सभी प्राणियों की ओर फैला देते हैं। अभी उन्होंने पिता का नाम नहीं बताया है। पहले सामने अनुभव किये गये प्रेम को स्वीकार किया है।
मुनि की वाणी सुनकर राम मन ही मन मुसकराते हैं। पोद्दार की टीका इस मुसकान को मानो रहस्य न खोलने का संकेत बताती है। अब विश्वामित्र परिचय को राजकुल की ओर ले आते हैं: ये रघुकुलमणि महाराज दशरथ के पुत्र हैं; राजा ने मुनि के हित के लिये इन्हें साथ भेजा है। भीतर की मुसकान और बाहर दिया गया यह परिचय साथ-साथ चलते हैं। राजा के ब्रह्मविषयक प्रश्न की अवहेलना नहीं होती, और सभा को राम तथा लक्ष्मण का लौकिक परिचय भी मिल जाता है।
रामु लखनु दोउ बंधुबर रूप सील बल धाम।
दोहा २१६
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम॥ २१६॥
दोहे में मुनि दोनों भाइयों के नाम कहते हैं। राम और लक्ष्मण रूप, शील और बल के धाम हैं। सौन्दर्य सामने देखा जा चुका है; परिचय में शील और बल भी साथ रखे जाते हैं। विश्वामित्र बताते हैं कि इन्होंने संग्राम में असुरों को जीतकर उनके यज्ञ की रक्षा की है, और सारा जगत् इसका साक्षी है। मुनि अपने ही प्रयोजन की सिद्धि बताकर पहचान पूरी करते हैं। यह यज्ञरक्षा का संक्षिप्त उल्लेख है, जिसके साथ अब जनक को सामने बैठे कुमारों के नाम, कुल और कार्य का पता चलता है।
जनक अपने सहज विरक्त मन का प्रेम में डूबना बताकर दोनों बालकों का परिचय पूछते हैं। विश्वामित्र उनके अनुभव को सत्य कहते हैं, राम भीतर मुसकराते हैं, और मुनि दोनों को दशरथ के पुत्र, रूप-शील-बल के धाम तथा अपने यज्ञ के रक्षक बताते हैं।
भाइयों का स्नेह और राजा की सेवकाई
परिचय सुनकर जनक फिर मुनि के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हैं। उनके चरणों के दर्शन से जो पुण्य का प्रभाव मिला है, वह कहा नहीं जाता। फिर राजा की दृष्टि दोनों भाइयों पर लौटती है। वे श्याम और गौर कुमारों को आनन्द को भी आनन्द देनेवाले कहते हैं। मन अपने सुख से इतना भर गया है कि साधारण सुख का नाम छोटा पड़ता है। अब जनक केवल दोनों के रूप को नहीं देखते, उनके बीच के प्रेम को भी देखते हैं।
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥
चौपाई ७
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू । ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥
दोनों की आपस की प्रीति पवित्र है, सुहावनी है और मन को बहुत भाती है। राजा के लिये उसे वाणी में कहना कठिन है। फिर भी उसे कहने के लिये वे एक उपमा लाते हैं: ब्रह्म और जीव की तरह सहज स्नेह। अपने पहले प्रश्न में उन्होंने ब्रह्म के दो रूप धरने की सम्भावना पूछी थी। यहाँ ब्रह्म और जीव का नाम दोनों भाइयों के पारस्परिक प्रेम की उपमा में आता है। बात उनके बीच के सम्बन्ध की है, जिसे देखकर जनक का हृदय प्रसन्न हो रहा है।
राजा बार-बार प्रभु को देखते हैं। शरीर पुलकित है और हृदय में उत्साह बढ़ा हुआ है। देखने की यह पुनरावृत्ति उनके प्रेम को लगातार प्रकट करती रहती है। वे मुनि की प्रशंसा करते हैं, चरणों में सिर झुकाते हैं और उन्हें नगर में लिवा चलते हैं। अमराई में की गयी भेंट अब नगर के भीतर अतिथियों के निवास तक पहुँचती है। दर्शन से उठा हर्ष राजा की सेवकाई में उतर आता है।
जनक सबको एक सुन्दर भवन में ले जाकर ठहराते हैं। वह ऐसा स्थान है जो सदा सुखदायक है; टीका इसे सभी ऋतुओं में सुख देनेवाला कहती है। फिर राजा सब प्रकार से पूजा और सेवा करते हैं। अपना आदर पूरा करके वे विदा माँगते हैं और अपने घर लौट जाते हैं। इस क्रम में अतिथि का सुख ध्यान में रखा गया है: ठहरने का स्थान, पूजा, सेवा और फिर उनसे विदा। राजा का स्वागत आमन्त्रण पर समाप्त नहीं होता, निवास की व्यवस्था तक पूरा होता है।
रिषय संग रघुबंस मनि करि भोजनु बिश्रामु।
दोहा २१७
बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥ २१७॥
राम ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करते हैं। उसके बाद भाई लक्ष्मण सहित बैठे हैं। दिन अब एक पहर शेष है। दोहा इस समय को साफ रखता है, इसलिए अगले प्रसंग की घड़ी भी हमारे सामने रहती है। यात्रा और स्वागत के बाद विश्राम हो चुका है, दिन का थोड़ा भाग अभी बचा है, और उसी समय छोटे भाई के मन में जनकपुर को देख आने की विशेष लालसा उठती है।
जनक दोनों भाइयों की प्रीति को ब्रह्म और जीव के सहज स्नेह की उपमा देते हैं। वे मुनियों और कुमारों को नगर के सुखद भवन में ठहराकर पूजा और सेवा करते हैं। भोजन तथा विश्राम के बाद दोनों भाई बैठे हैं और दिन एक पहर शेष है।
लक्ष्मण की अनकही इच्छा
लक्ष्मण का मन चाहता है कि जाकर जनकपुर देख आयें। लालसा विशेष है, पर वह मुख पर नहीं आती। एक ओर प्रभु राम का भय है, दूसरी ओर मुनि के सामने संकोच। वे स्पष्ट कुछ नहीं कहते, मन ही मन मुसकराते हैं। अभी जनक दोनों भाइयों की पारस्परिक प्रीति देखकर उसे कहने में असमर्थ हो रहे थे। अब उसी सम्बन्ध का एक छोटा व्यवहार सामने आता है। छोटा भाई बोल नहीं पाता, फिर भी उसकी इच्छा बड़े भाई तक पहुँच जाती है।
राम अनुज के मन की गति जान लेते हैं और उनके हृदय में भक्तवत्सलता उमड़ती है। तुलसी लक्ष्मण को यहाँ अनुज कहते हैं और राम की उठती करुणा को भक्त के प्रति वात्सल्य का नाम देते हैं। भाई का स्नेह और भक्त का हित इसी एक दृश्य में साथ हैं। राम विनयपूर्वक, संकोच और मुसकान के साथ गुरु की अनुमति पाकर बोलते हैं। छोटे भाई की इच्छा पूरी करने में गुरु का आदर भी पूरा रखा जाता है।
नाथ लखनु पुरु देखन चहहीं । प्रभु सकोच डर प्रगट न कहहीं॥
चौपाई ८
जौं राउर आयसु मैं पावौं । नगर देखाइ तुरत लै आवौं॥
राम कहते हैं कि लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, पर आपके डर और संकोच के कारण प्रकट नहीं कहते। यदि आज्ञा हो तो हम इन्हें नगर दिखाकर तुरन्त ले आयें। पहले लक्ष्मण के मन का वर्णन करते समय राम का भय और मुनि का संकोच दोनों आये थे। अब मुनि के सामने राम बात उनके प्रति संकोच के रूप में रखते हैं। विनती का केन्द्र छोटे भाई की इच्छा है। साथ ही राम उसके पूरा होने का उपाय भी बता देते हैं: वे स्वयं नगर दिखाकर लौटायेंगे।
विश्वामित्र प्रेम से उत्तर देते हैं। वे राम के नीति पालन की प्रशंसा करते हैं और उन्हें धर्म की मर्यादा का रक्षक कहते हैं। प्रेम के वश होकर सेवकों को सुख देना भी उनके उत्तर में आता है। अनुमति माँगने का यह छोटा प्रसंग मुनि की दृष्टि में राम के स्वभाव को प्रकट कर रहा है। उन्हें मालूम है कि सामने की विनती में अनुज का सुख और गुरु की आज्ञा, दोनों सँभाले गये हैं। वे प्रसन्न होकर दोनों भाइयों को जाने की अनुमति देते हैं।
जाइ देखि आवहु नगरु सुख निधान दोउ भाइ।
दोहा २१८
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ॥ २१८॥
मुनि की आज्ञा में एक और सुख सम्मिलित हो जाता है। वे दोनों सुख के निधान भाइयों से कहते हैं कि जाकर नगर देख आयें और अपने सुन्दर मुख दिखाकर सबके नेत्र सफल करें। लक्ष्मण की इच्छा अपने नेत्रों से जनकपुर देखने की थी। अनुमति में जनकपुर के लोगों को उन्हें देखने का फल भी मिला है। इसीलिये आगे की यात्रा में जितना ध्यान दोनों भाइयों के चलने पर है, उतना ही नगरवासियों की आँखों पर है। मुनि पहले ही उस दर्शन का प्रयोजन कह चुके हैं।
लक्ष्मण की अनकही लालसा जानकर राम विनय से गुरु की आज्ञा माँगते हैं। विश्वामित्र उनके धर्मपालन और सेवक को सुख देनेवाले स्वभाव की प्रशंसा करते हैं। वे दोनों को नगर देखने और नगरवासियों के नेत्र सफल करने की अनुमति देते हैं।
नगर में चलती श्याम और गौर जोड़ी
दोनों भाई मुनि के चरणकमलों की वन्दना करके चलते हैं। उनकी शोभा देखते ही बालकों के झुंड साथ लग जाते हैं। बच्चों के नेत्र और मन दोनों लुभा गये हैं। मुनि ने जिन नेत्रों को सफल करने की बात कही थी, उनमें सबसे पहले ये उत्सुक बालक दिखाई देते हैं। साथ चलने का उनका कारण उसी क्षण का आकर्षण है। राम और लक्ष्मण की शोभा उन्हें ऐसी भायी है कि वे उनके साथ हो लिये हैं।
पीत बसन परिकर कटि भाथा । चारु चाप सर सोहत हाथा॥
चौपाई ९
तन अनुहरत सुचंदन खोरी । स्यामल गौर मनोहर जोरी॥
दोनों भाइयों के पीले वस्त्र हैं। कमर में दुपट्टे और तरकस बँधे हैं, हाथों में सुन्दर धनुष और बाण हैं। शरीरों पर चन्दन की खौर लगी है। पोद्दार की टीका बताती है कि श्याम और गौर शरीरों पर जिस रंग का चन्दन अधिक फबता है, वैसा ही चन्दन लगाया गया है। इस छोटी बात में रूप-वर्णन की सावधानी देखिये। दोनों को एक जैसे सुन्दर कह देने पर वर्णन नहीं रुकता, उनके अलग-अलग वर्णों के अनुकूल सज्जा भी दिखाई जाती है।
उनकी गर्दन सिंह के समान पुष्ट है और भुजाएँ विशाल हैं। छाती पर अत्यन्त सुन्दर माला शोभा देती है, जिसे पोद्दार की टीका गजमुक्ता की माला कहती है। नेत्र लाल कमलों के समान हैं और मुख चन्द्रमा के समान, तीनों तापों से छुड़ानेवाला है। पुष्ट कन्धर और विशाल भुजाओं के साथ कमल जैसे नेत्र तथा चन्द्रमा सा मुख आते हैं। बल की शोभा और दर्शन का सुख दोनों उसी देह में हैं, जिसे नगर के बच्चे देख रहे हैं।
कानों में सोने के कर्णफूल हैं। उनकी छवि देखते ही मानो देखनेवाले का चित्त खिंच जाता है। दृष्टि सुन्दर है, भौंहें बाँकी हैं और माथे पर तिलक की रेखाएँ ऐसी जान पड़ती हैं जैसे शोभा पर मुहर लगा दी गयी हो। यह मुहर की उपमा सुन्दरता को किसी पूरे हुए काम की तरह दिखाती है। अंग, आभूषण और चितवन एक साथ सँवरकर सामने आते हैं, फिर तिलक की रेखा उस शोभा को और स्पष्ट कर देती है।
रुचिर चौतनीं सुभग सिर मेचक कुंचित केस।
दोहा २१९
नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥ २१९॥
सिर पर सुन्दर टोपियाँ हैं, जिन्हें टीका चौकोनी बताती है। बाल काले और घुँघराले हैं। दोनों भाई नख से शिख तक सुन्दर हैं, और जहाँ जिस शोभा का स्थान है, वहीं वह पूरी तरह फब रही है। इस दोहे तक पहुँचते-पहुँचते वस्त्र, आयुध, चन्दन, माला, नेत्र, मुख, कर्णफूल, भौंह, तिलक, टोपी और केश सब दिखाई दे चुके हैं। अब कवि उन सबको एक साथ देखते हैं। अलग-अलग अंगों का वर्णन उस मनोहर जोड़ी की सम्पूर्ण छवि में जुड़ जाता है।
यह रूप केवल एक स्थिर चित्र की तरह नहीं रखा गया है। दोनों भाई नगर में चल रहे हैं, बच्चे साथ हो लिये हैं और आगे खबर फैलनेवाली है। उनके हाथों में वही धनुष और बाण दिखाई देते हैं जिनके धारकों को मुनि ने रूप, शील और बल का धाम कहा था। नगरवासियों के लिये परिचय का यह क्षण आँखों से खुल रहा है। वे सामने आते कुमारों को देखेंगे, और देखने का सुख अपना काम स्वयं करेगा।
मुनि को प्रणाम कर निकले दोनों भाइयों के साथ बालक लग जाते हैं। पीले वस्त्र, धनुष-बाण, चन्दन, सुन्दर आभूषण, कमल जैसे नेत्र और घुँघराले केश उनकी श्याम-गौर जोड़ी को नख से शिख तक शोभित करते हैं।
झरोखों की दृष्टि और उपमा की खोज
नगरवासियों को समाचार मिलता है कि राजकुमार नगर देखने आये हैं। सुनते ही वे घर और काम छोड़कर दौड़ पड़ते हैं। तुलसी उनकी आतुरता को दरिद्रों के खजाना लूटने दौड़ने की उपमा देते हैं। जिन बाजारों में थोड़ी देर पहले कुबेर जैसे व्यापारी बैठे दिखाई दिये थे, उसी सम्पन्न नगर के लोगों का दर्शन के लिये दौड़ना अब इस उपमा से कहा गया है। सामने मिलनेवाले सुख की तीव्र चाह में बाकी काम छूट गये हैं।
लोग दोनों सहज सुन्दर भाइयों को देखते हैं और नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं। मुनि की आज्ञा में कहा गया नेत्रों का सफल होना अब घट रहा है। नगर के बालक पहले साथ हुए थे, अब दूसरे निवासी भी अपने काम छोड़कर आये हैं। लक्ष्मण की इच्छा से हुआ यह नगर-दर्शन इस तरह सबके दर्शन का अवसर बनता है। इस सुख का वर्णन करने के लिये कवि ने मिलने, बोलने या कुछ पाने की कोई और शर्त नहीं रखी; लोग देखकर ही आनन्दित हैं।
युवती स्त्रियाँ घरों के झरोखों से लगी हैं। वे प्रेमपूर्वक राम का रूप देखती हैं और आपस में बातें करती हैं। उनकी वाणी में सखियों का स्नेह है। वे कहती हैं कि इन दोनों ने करोड़ों कामदेवों की छवि जीत ली है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियों में ऐसी शोभा कहीं सुनाई भी नहीं देती। सामने देखी हुई छवि की बराबरी के लिये वे अपने सुने हुए संसार में खोजती हैं, पर कोई उपमा मन को पूरी तरह नहीं जँचती।
बिष्नु चारि भुज बिधि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥
चौपाई १०
अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखी पटतरिअ जाही॥
अब वे देवताओं के रूप सामने रखती हैं। विष्णु की चार भुजाएँ हैं, ब्रह्मा के चार मुख हैं, शिव का विकट वेष है और पाँच मुख हैं। इन रूपों की अपनी विशिष्टता उनके मन में है, और सामने दोनों कुमारों का किशोर सौन्दर्य है। वे सखी से कहती हैं कि दूसरा कोई देवता भी ऐसा नहीं जिससे इस छवि की तुलना की जाय। उनकी बातचीत उसी उपमा की खोज में चलती है। जो नाम आता है, उसके रूप को याद करके वे फिर सामने दिखाई देती जोड़ी की ओर लौटती हैं।
इन स्त्रियों की बातें जनक के प्रश्न से भिन्न ढंग की हैं, पर दोनों जगह दर्शन ही वाणी को चलाता है। राजा ने अपने विरक्त मन की दशा देखकर पूछा था कि सामने कौन आया है। सखियाँ सामने के रूप के लिये कैसी उपमा दी जाय, इस पर प्रेम से बोल रही हैं। एक ओर मुनि के चरणों में झुककर गद्गद वाणी में पूछा गया प्रश्न था, यहाँ घरों के झरोखों पर आपस में कही गयी बातें हैं। दोनों दृश्यों में देखनेवाले अपने अनुभव को कहने के लिये शब्द खोजते हैं।
बय किसोर सुषमा सदन स्याम गौर सुख धाम।
दोहा २२०
अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम॥ २२०॥
अन्तिम दोहे में वही किशोर अवस्था, वही श्याम और गौर रंग, और सुख का वही अनुभव एक साथ आते हैं। दोनों सुन्दरता के घर और सुख के धाम हैं। उनके अंग-अंग पर असंख्य कामदेव न्योछावर करने की बात कही जाती है। पहले करोड़ों कामदेवों की छवि जीत लेने की बात थी; अब उन्हें एक-एक अंग पर वार देने का भाव है। तुलना खोजती वाणी अन्त में इसी न्योछावर पर पहुँचती है। झरोखों से लगी आँखों के सामने किशोर जोड़ी की शोभा बनी हुई है।
नगरवासी घर और काम छोड़कर दोनों भाइयों को देखने दौड़ते हैं। झरोखों की स्त्रियाँ कामदेव और देवताओं से उनकी तुलना खोजती हैं, फिर किसी को समकक्ष न पाकर अंग-अंग पर असंख्य कामदेव न्योछावर करने का भाव कहती हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में जनकपुर का सौन्दर्य और वहाँ आया सौन्दर्य एक-दूसरे को देखते हैं। पहले राम छोटे भाई के साथ जलाशयों, बागों और नगर को देखकर प्रसन्न हुए थे। फिर जनक उनके दर्शन में डूबे, और अन्त में नगरवासियों की आँखें उन्हीं पर ठहर गयीं। देखने का यह क्रम याद रखने से नगर की लम्बी सज्जा भी अपना स्थान पा जाती है। जिन गलियों और घरों का परिचय हमें मिला था, उन्हीं से लोग निकलते हैं और उन्हीं घरों के झरोखों पर स्त्रियाँ आती हैं।
इसके बीच लक्ष्मण का संकोच बहुत कोमलता से सँभाला गया है। उनकी इच्छा बिना कहे जान ली जाती है, उसे गुरु के सामने विनय से रखा जाता है और आज्ञा में पूरे नगर के सुख की बात जुड़ जाती है। जनक ने जिस पारस्परिक प्रीति को देखकर आनन्द पाया था, उसका व्यवहार हम इसी विनती में देखते हैं। छोटे भाई के मन में उठी लालसा अब बहुत से लोगों की आँखों का उत्सव बन गयी है।
जनक का धैर्य सँभालना, विश्वामित्र की हँसी, राम का मन में मुसकराना और लक्ष्मण की अनकही इच्छा, इन सबके बीच आदर बना रहता है। प्रेम किसी का स्थान भुलाता नहीं; राजा चरणों में सिर रखते हैं और कुमार गुरु से आज्ञा लेकर चलते हैं। इसी आदर के भीतर हृदय खुलते हैं, प्रश्न किये जाते हैं और देखने की इच्छा पूरी होती है।
दोहा २२० पर सखियों की दृष्टि दोनों भाइयों के अंग-अंग की शोभा पर ठहरी है। नगर को देखना अभी उन्हीं आँखों में लौट आया है जो नगर से उन्हें देख रही हैं। जनकपुर के जल, पवन, चित्रित घर और सुगन्धित गलियाँ हमारे सामने हैं, और उनके बीच वह श्याम-गौर जोड़ी है जिसके लिये उपमाएँ खोजती वाणी भी अन्त में न्योछावर का भाव कहती है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २१२ से २२०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।