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जनकपुर की शोभा, जनक का स्वागत और नगर-दर्शन

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 25

पहले दोनों भाई जनकपुर की शोभा देखते हैं, फिर राजा और नगरवासी उन्हीं को देखते रह जाते हैं। बीच में लक्ष्मण की एक अनकही इच्छा है, जिसे राम जान लेते हैं।

जनकपुर के निकट पहुँचकर राम और लक्ष्मण बहुत प्रसन्न होते हैं। सामने जल से भरे सरोवर हैं, खिले हुए कमल, और फल फूलों से लदे बाग। जिस ओर मन जाता है, वहीं रम जाता है। कुछ देर बाद इसी नगर के लोग अपने घर और काम छोड़कर दोनों भाइयों को देखने दौड़ेंगे।

बीच में राजा जनक की भेंट है। वे विश्वामित्र का स्वागत करने आते हैं, और दो किशोरों को देखकर विशेष रूप से विदेह हो जाते हैं। वे पूछते हैं कि ये बालक कौन हैं। उधर लक्ष्मण के मन में नगर घूम आने की इच्छा उठती है। वे उसे प्रकट में नहीं कहते, और राम उसे जान लेते हैं।

मिथिला के अतिथि और मेज़बान

  • राम विश्वामित्र के साथ आये दशरथ के पुत्र, जो लक्ष्मण के मन की इच्छा जानकर गुरु से नगर देखने की आज्ञा माँगते हैं।
  • लक्ष्मण राम के छोटे भाई, जिनके मन में जनकपुर देखने की लालसा है, और बड़ों के सामने कहने का संकोच भी।
  • विश्वामित्र महामुनि, जिनका जनक स्वागत करते हैं और जो दोनों भाइयों का परिचय देते हैं।
  • जनक मिथिला के राजा, जिनका सहज विरक्त मन दोनों भाइयों को देखकर प्रेम में डूब जाता है।
  • जनकपुर के निवासी बालक, गृहस्थ और झरोखों से देखती स्त्रियाँ, जिनकी आँखें दोनों भाइयों के रूप पर लगी हैं।

गंगा के तट से जनकपुर की ओर

राम और लक्ष्मण मुनि के साथ चलते हुए जगत् को पवित्र करनेवाली गंगा के पास पहुँचते हैं। वहाँ गाधि के पुत्र विश्वामित्र वह सारी कथा सुनाते हैं कि गंगा पृथ्वी पर किस प्रकार आयीं। कथा का विस्तार यहाँ नहीं आता। इसके बाद स्नान और आगे की यात्रा है।

राम ऋषियों सहित वहाँ स्नान करते हैं, और ब्राह्मणों को भाँति भाँति के दान मिलते हैं। फिर सब मुनियों के साथ प्रसन्न होकर चलते हैं, और शीघ्र ही विदेह की नगरी के निकट पहुँच जाते हैं।

जल, कमल और चारों ओर के बाग

राम छोटे भाई के साथ नगर की शोभा देखकर विशेष हर्षित होते हैं। वहाँ अनेक बावलियाँ, कुएँ, नदियाँ और तालाब हैं, जिनका जल अमृत के समान है और सीढ़ियाँ मणियों की हैं।

मकरन्द के रस से मतवाले भौंरे गुंजार कर रहे हैं, रंग बिरंगे पक्षी मधुर स्वर में बोलते हैं, और अनेक रंगों के कमल खिले हैं। हवा तीनों गुणों वाली है, जिन्हें पोद्दार की टीका शीतल, मन्द और सुगन्धित बताती है, और वह सदा सुख देती है।

नगर के चारों ओर फुलवारियाँ, बाग और वन हैं, जिनमें बहुत से पक्षी रहते हैं। उनमें फूल खिल रहे हैं, फल लग रहे हैं, और सुन्दर पत्ते शोभा दे रहे हैं।

बाजार की सम्पन्नता और घरों का मंगल

नगर की सुन्दरता का वर्णन करते नहीं बनता। मन जहाँ जाता है, वहीं लुभा जाता है। सुन्दर बाजार हैं, और मणियों से बने विचित्र छज्जे, मानो ब्रह्मा ने उन्हें अपने हाथों से सँवारा हो।

बाजार में कुबेर जैसे धनी व्यापारी अनेक प्रकार की सब वस्तुएँ लेकर बैठे हैं। चौराहे सुन्दर हैं, गलियाँ सुहावनी हैं, और वे सदा सुगन्ध से सींची रहती हैं।

सबके घर मंगलमय हैं, और उन पर चित्र बने हैं, मानो कामदेव ने चित्रकार बनकर उन्हें चित्रित किया हो।

नगर के स्त्री पुरुष सुन्दर, पवित्र और साधु स्वभाव के हैं, धर्मशील, ज्ञानी और गुणवान्।

महलों की शोभा और मुनि की अमराई

जनक का निवास अत्यन्त अनुपम है। वहाँ का ऐश्वर्य देखकर देवता थकित हो जाते हैं। महल का परकोटा देखकर चित्त चकित होता है, मानो उसने सारे लोकों की शोभा अपने भीतर घेर रखी हो।

उज्ज्वल महलों में अनेक प्रकार की सुन्दर रचना है। पोद्दार की टीका मणियों से जड़े सोने की जरी के परदों का उल्लेख करती है। फिर सीता के निवास का सुन्दर भवन आता है, और उसकी शोभा कही ही कैसे जाये।

महल के सब द्वार सुन्दर हैं, और उनके किवाड़ वज्र के हैं। टीका इसके दो अर्थ देती है, मजबूत या हीरों से चमकते। द्वारों पर राजाओं, नटों, मागधों और भाटों की भीड़ रहती है। बड़ी बड़ी घुड़शालें और गजशालाएँ हैं, जो सदा घोड़ों, हाथियों और रथों से भरी रहती हैं। बहुत से शूरवीरों, मन्त्रियों और सेनापतियों के घर राजमहल जैसे हैं।

नगर के बाहर तालाब और नदी के निकट जहाँ तहाँ बहुत से राजाओं ने डेरे डाले हैं। विश्वामित्र आमों का एक अनुपम बाग देखते हैं। वहाँ सब सुभीते हैं और वह हर तरह सुहावना है। वे राम से कहते हैं कि मेरा मन कहता है, यहीं रहा जाये।

“बहुत अच्छा, स्वामी” कहकर राम मुनियों के समूह के साथ वहीं ठहर जाते हैं। स्थान विश्वामित्र चुनते हैं, और राम सम्मति देते हैं। जनक को समाचार मिलता है कि महामुनि विश्वामित्र आये हैं।

स्वागत में आये जनक, और लौटते हुए दोनों भाई

समाचार पाकर जनक प्रसन्न होते हैं, और विश्वामित्र से मिलने चलते हैं। साथ में पवित्र हृदय के मन्त्री, बहुत से योद्धा, श्रेष्ठ ब्राह्मण, गुरु और अपने कुल के श्रेष्ठ लोग हैं। पोद्दार की टीका गुरु का नाम शतानन्द बताती है।

जनक मुनि के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम करते हैं, और विश्वामित्र प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं। फिर राजा सारी ब्राह्मणमण्डली को आदर से प्रणाम करते हैं, और अपना बड़ा भाग्य जानकर आनन्दित होते हैं। मुनि बार बार कुशल पूछकर उन्हें बैठाते हैं।

उसी समय राम और लक्ष्मण आ पहुँचते हैं। वे फुलवारी देखने गये थे। सुकुमार किशोर अवस्था, एक श्याम, एक गौर, नेत्रों को सुख देनेवाले और विश्व का चित्त चुरानेवाले। राम के आते ही सब उठ खड़े होते हैं, और विश्वामित्र दोनों को अपने पास बैठा लेते हैं।

दोनों भाइयों को देखकर सब सुखी हो जाते हैं। सबकी आँखों में जल भर आता है और शरीर पुलकित हो उठते हैं। जनक पर इसका प्रभाव और गहरा है। मधुर मनोहर मूर्ति देखकर विदेह विशेष रूप से विदेह हो जाते हैं, यानी उन्हें देह की सुध बुध नहीं रहती। एक ही शब्द राजा का नाम भी है और उनकी दशा भी।

जनक अपने मन को प्रेम में डूबा पाते हैं, तो विवेक का सहारा लेकर धीरज धरते हैं। वे मुनि के चरणों में सिर झुकाते हैं, और प्रेम से गद्गद, गम्भीर वाणी में बोलते हैं।

ये दोनों बालक कौन हैं

जनक का प्रश्न बहुत आदर से खुलता है: हे नाथ, कहिये, ये दोनों सुन्दर बालक मुनिकुल के आभूषण हैं, या राजकुल के पालक? या जिस ब्रह्म का वेदों ने “नेति” कहकर गान किया है, वही दो वेष धरकर आया है?

दो प्रश्नों के बाद जनक अपने मन की दशा बताते हैं। उनका मन स्वभाव से वैराग्यरूप है, और ऐसा थकित है जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर। इसीलिये वे सच्चे भाव से पूछते हैं, और प्रार्थना करते हैं कि मुनि कुछ न छिपायें।

वे आगे कहते हैं कि इन्हें देखकर अत्यन्त प्रेम के वश उनके मन ने बरबस ब्रह्मसुख छोड़ दिया है।

विश्वामित्र हँसकर कहते हैं: हे राजन्, आपने ठीक कहा, आपका वचन झूठा नहीं हो सकता। जहाँ तक प्राणी हैं, ये सबको प्रिय हैं।

मुनि की यह वाणी सुनकर राम मन ही मन मुसकराते हैं। पोद्दार की टीका इस मुसकान को मानो रहस्य न खोलने का संकेत बताती है। फिर विश्वामित्र परिचय देते हैं: ये रघुकुल के मणि महाराज दशरथ के पुत्र हैं, और राजा ने इन्हें मेरे हित के लिये भेजा है।

फिर मुनि दोनों के नाम कहते हैं: राम और लक्ष्मण, दोनों श्रेष्ठ भाई, रूप, शील और बल के धाम हैं। इन्होंने युद्ध में असुरों को जीतकर मेरे यज्ञ की रक्षा की है, और सारा जगत् इसका साक्षी है। अब जनक को कुमारों के नाम, कुल और काम, तीनों का पता चलता है।

भाइयों का स्नेह और राजा की सेवा

परिचय सुनकर जनक कहते हैं: हे मुनि, आपके चरणों का दर्शन करके मैं अपने पुण्य का प्रभाव कह नहीं सकता। ये सुन्दर श्याम और गौर दोनों भाई आनन्द को भी आनन्द देनेवाले हैं।

इनकी आपस की प्रीति पवित्र है, कही नहीं जा सकती, मन को भाती है और सुहावनी है। प्रसन्न होकर जनक कहते हैं: हे नाथ, सुनिये, इनमें ब्रह्म और जीव जैसा सहज स्नेह है।

राजा बार बार राम को देखते हैं। शरीर पुलकित है, और हृदय में बड़ा उत्साह। फिर वे मुनि की प्रशंसा करके, उनके चरणों में सिर झुकाकर, उन्हें नगर में लिवा चलते हैं।

जनक उन्हें एक सुन्दर भवन में ठहराते हैं, जो सदा सुख देनेवाला है। टीका कहती है, सभी ऋतुओं में। फिर सब प्रकार से पूजा और सेवा करके, विदा माँगकर, राजा अपने घर लौट जाते हैं।

राम ऋषियों के साथ भोजन और विश्राम करके भाई लक्ष्मण सहित बैठे हैं, और दिन एक पहर शेष है।

लक्ष्मण की अनकही इच्छा

लक्ष्मण के मन में विशेष लालसा है कि जाकर जनकपुर देख आयें। राम का डर है, और मुनि के सामने संकोच। वे प्रकट में कुछ नहीं कहते, मन ही मन मुसकराते हैं।

राम छोटे भाई के मन की दशा जान लेते हैं, और उनके हृदय में भक्तवत्सलता उमड़ आती है। गुरु की अनुमति पाकर राम बहुत विनय से, सकुचाते और मुसकराते हुए बोलते हैं।

हे नाथ, लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं। वे प्रभु के संकोच और डर से प्रकट नहीं कहते (टीका यहाँ प्रभु को मुनि ही बताती है)। यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो इन्हें नगर दिखाकर तुरन्त ले आऊँ।

विश्वामित्र प्रेम से उत्तर देते हैं: हे राम, आप नीति की रक्षा कैसे न करेंगे। हे तात, आप धर्म के सेतु के पालक हैं, और प्रेम के वश होकर सेवकों को सुख देनेवाले। टीका धर्म के सेतु को धर्म की मर्यादा बताती है।

फिर वे आज्ञा देते हैं: सुख के निधान दोनों भाई जाकर नगर देख आइये, और सुन्दर मुख दिखाकर सबके नेत्र सफल कीजिये।

नगर में चलती श्याम और गौर जोड़ी

दोनों भाई मुनि के चरणकमलों की वन्दना करके चलते हैं। उनकी शोभा देखते ही बालकों के झुण्ड साथ लग जाते हैं, उनके नेत्र और मन लुभा गये हैं।

दोनों के पीले वस्त्र हैं, कमर के दुपट्टों में तरकस बँधे हैं, और हाथों में सुन्दर धनुष बाण। शरीरों पर चन्दन की खौर लगी है। पोद्दार की टीका बताती है कि श्याम और गौर शरीरों पर जिस रंग का चन्दन अधिक फबता है, वैसा ही लगाया गया है।

गर्दन सिंह जैसी है, भुजाएँ विशाल हैं, और छाती पर अत्यन्त सुन्दर माला है, जिसे पोद्दार की टीका गजमुक्ता की माला बताती है। नेत्र लाल कमल जैसे हैं, और मुख चन्द्रमा जैसा, तीनों तापों से छुड़ानेवाला।

कानों में सोने के कर्णफूल हैं, जो देखते ही मानो चित्त चुरा लेते हैं। चितवन सुन्दर है, भौंहें तिरछी और सुन्दर हैं, और माथे पर तिलक की रेखाएँ ऐसी हैं मानो शोभा पर मुहर लगा दी गयी हो।

सिर पर सुन्दर टोपियाँ हैं (टीका उन्हें चौकोनी बताती है), और बाल काले और घुँघराले हैं। दोनों भाई नख से शिख तक सुन्दर हैं, और जहाँ जो शोभा चाहिये, वहाँ वही है।

झरोखों की दृष्टि और उपमा की खोज

नगरवासियों को समाचार मिलता है कि राजकुमार नगर देखने आये हैं। वे घर और सब काम छोड़कर ऐसे दौड़ते हैं, मानो दरिद्र खजाना लूटने दौड़े हों।

लोग सहज सुन्दर दोनों भाइयों को देखते हैं, और नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं।

युवती स्त्रियाँ घरों के झरोखों से लगी प्रेम से राम का रूप देखती हैं। वे आपस में बातें करती हैं: सखी, इन्होंने करोड़ों कामदेवों की छवि जीत ली है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियों में ऐसी शोभा कहीं सुनी नहीं जाती।

फिर वे देवताओं के रूप सामने रखती हैं: विष्णु की चार भुजाएँ हैं, ब्रह्मा के चार मुख, और शिव का विकट वेष और पाँच मुख। सखी, दूसरा कोई देवता ऐसा नहीं जिससे इस छवि की तुलना की जाये।

अन्त में वे कहती हैं: ये किशोर अवस्था के, सुन्दरता के घर, श्याम और गौर, और सुख के धाम हैं। इनके अंग अंग पर करोड़ों अरबों कामदेव (टीका के शब्दों में) न्योछावर कर देने चाहिये।

देखता नगर, देखे जाते कुमार

इस प्रसंग में जनकपुर की सुन्दरता और वहाँ आयी सुन्दरता एक दूसरे को देखती हैं। पहले राम छोटे भाई के साथ जलाशय, बाग और नगर देखकर प्रसन्न हुए। फिर जनक उनके दर्शन में डूबे। और अन्त में नगरवासियों की आँखें उन्हीं पर ठहर गयीं।

प्रसंग वहीं ठहरता है जहाँ सखियों की दृष्टि दोनों भाइयों के अंग अंग की शोभा पर ठहरी है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 212 से 220, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।