रामचरितमानस · बालकाण्ड · नगर-दर्शन और जनकपुर का प्रेम
नगर-दर्शन और जनकपुर का प्रेम
स्त्रियों की विवाह-कामना, बच्चों के संग धनुषयज्ञ की रंगभूमि का दर्शन, और गुरु तथा भाई की सेवा में बीती रात्रि।
जनकपुर की स्त्रियाँ दोनों भाइयों को देख रही हैं और आपस में पूछ रही हैं कि ऐसा कौन देहधारी होगा जो इस रूप पर मोहित न हो। इसी प्रश्न से हमारी कथा खुलती है। किसी ने इनके विषय में कुछ सुना है, कोई जानकी के लिये वर देख रही है, किसी को राजा की प्रतिज्ञा याद आ जाती है। सुन्दरता देखकर उठी बातचीत धीरे धीरे विवाह की ऐसी कामना बन जाती है जिसमें सारे नगर का अपना सुख भी जुड़ा है। यह सम्बन्ध हो जाय तो कभी फिर इनका दर्शन मिलेगा।
राम और लक्ष्मण आगे बढ़ते हैं तो जनकपुर का प्रेम उनके साथ चलता है। स्त्रियाँ फूल बरसाती हैं, बच्चे धनुषयज्ञ की भूमि दिखाते हैं और बार बार अपने पास बुलाते हैं। इस नगर-दर्शन में एक ओर यज्ञशाला की भव्य रचना है, दूसरी ओर छोटे बच्चों की सरल पुकार। फिर गुरु के पास लौटने का समय होता है। नगर का उल्लास सन्ध्या की उपासना और रात की सेवा में उतर आता है; कथा अन्ततः उस मुर्गे की आवाज़ तक पहुँचती है जिसे सुनकर लक्ष्मण उठते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम कौसल्या और दशरथ के पुत्र, जिनका दर्शन पाकर स्त्रियाँ हर्षित हैं और जिनके पास बच्चे निःसंकोच आते हैं।
- लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्र और राम के छोटे भाई, नगर-दर्शन के साथी तथा रात में उनके चरणों के सेवक।
- विश्वामित्र मुनि कौसिक, जिनके पास दोनों भाई लौटते हैं और जिनकी आज्ञा तथा सेवा में रहते हैं।
- जनकपुर की स्त्रियाँ राम के परिचय, जानकी के विवाह और राजा के प्रण पर प्रेमपूर्वक चर्चा करनेवाली सखियाँ।
- नगर के बच्चे रंगभूमि की रचना दिखाते हुए दोनों भाइयों को अपने प्रेम में बाँध लेनेवाले बालक।
- जानकी और जनक सीता के लिये योग्य वर और राजा की प्रतिज्ञा स्त्रियों की बातचीत का केन्द्र हैं।
सखियों के बीच दोनों भाइयों का परिचय
एक सखी पूछती है कि इस रूप को देखकर कौन अपने को बचा सकता है। प्रश्न में विस्मय है और अपनी सखियों से सहमति पाने की चाह भी। उसी के उत्तर में दूसरी स्त्री कोमल वाणी से बोलती है। उसके पास सुनायी हुई पहचान है, जिसे वह प्रेम से सबके सामने रखती है। वह आरम्भ ही इस तरह करती है कि मैंने जो सुना है, आप भी सुनिये। देखने का आनन्द अब जानने के आनन्द से मिलनेवाला है। सामने से जाते हुए ये दोनों कुमार कौन हैं, किसके पुत्र हैं और यहाँ किस काम से आये हैं, यह बात एक एक करके खुलती है।
ए दोऊ दसरथ के ढोटा । बाल मरालन्हि के कल जोटा॥
चौपाई १
मुनि कौसिक मख के रखवारे । जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥
दोनों महाराज दशरथ के पुत्र हैं। उनका जोड़ा बाल राजहंसों के सुन्दर जोड़े जैसा लगता है। परिचय देते हुए सखी के मन में भी वही रूप बसा हुआ है जिसे सब देख रही हैं, इसलिये कुल का नाम लेते ही उपमा आ जाती है। फिर वह इनकी वीरता बताती है। ये मुनि कौसिक के यज्ञ की रक्षा करनेवाले हैं; युद्धभूमि में इन्होंने राक्षसों को मारा है। टीका कौसिक को विश्वामित्र नाम से पहचानती है। उस सखी की वाणी में दोनों कुमारों की शोभा और मुनि के लिये किये हुए काम साथ साथ आते हैं।
इसके बाद वह बड़े भाई की पहचान अलग करती है। जिनका शरीर साँवला है, जिनके नेत्र सुन्दर कमलों के समान हैं और जिनके हाथों में धनुष तथा बाण हैं, वे कौसल्या के पुत्र राम हैं। वह उन्हें सुख की खान कहती है और मारीच तथा सुबाहु के अभिमान को चूर करनेवाला बताती है। सामने की कोमल शोभा देखते हुए इनका यह पराक्रम भी सुनिये। धनुष-बाण हाथ में दिखाई दे रहे हैं, और उनके काम का समाचार सखी की बात से मिल रहा है। देखनेवाली स्त्रियों के लिये अब उस रूप के साथ एक नाम, एक माता और एक यज्ञ की रक्षा जुड़ गयी है।
राम के पीछे सुन्दर वेष में जो गौरवर्ण किशोर चल रहे हैं, उनके हाथों में भी धनुष-बाण हैं। वे छोटे भाई लक्ष्मण हैं और उनकी माता सुमित्रा हैं। सखी केवल दोनों नाम कहकर आगे नहीं बढ़ जाती। रंग, अवस्था, वेष, हाथों के आयुध और चलने का क्रम, सब बताकर परिचय पूरा करती है। इससे सुननेवालियों की दृष्टि दोनों भाइयों पर अलग अलग ठहरती है। पहले बाल राजहंसों का एक जोड़ा दिखा था; अब उसी जोड़े के भीतर राम और लक्ष्मण की अपनी अपनी पहचान उभर आयी है।
बिप्रकाजु करि बंधु दोउ मग मुनिबधू उधारि।
दोहा २२१
आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥ २२१॥
अन्त में यहाँ आने का प्रयोजन बताया जाता है। दोनों भाई विश्वामित्र का काम पूरा करके आये हैं; मार्ग में उन्होंने मुनि की पत्नी का उद्धार किया है। पोद्दार जी की टीका इस परिचय को गौतम की पत्नी अहल्या के नाम से खोलती है। अब वे धनुषयज्ञ देखने जनकपुर आये हैं। परिचय की यह अन्तिम बात सुनते ही सब स्त्रियाँ हर्षित हो उठती हैं। अभी कोई विवाह का निर्णय नहीं हुआ है। इतना ज्ञात हुआ है कि दोनों कुमार धनुषयज्ञ देखने आये हैं, और इस समाचार में ही सखियों की आशा के लिये जगह निकल आती है।
सखी दोनों कुमारों को दशरथ के पुत्र और विश्वामित्र के यज्ञ के रक्षक बताती है। साँवले राम कौसल्या के पुत्र हैं, गौर लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्र और राम के छोटे भाई। मारीच तथा सुबाहु पर उनके प्रभाव और मार्ग में अहल्या के उद्धार का परिचय देकर वह बताती है कि वे धनुषयज्ञ देखने आये हैं। सब स्त्रियाँ प्रसन्न होती हैं।
विवाह की आशा और राजा का प्रण
अब देखनेवाली आँखों में जानकी का ध्यान आ जाता है। राम की छबि देखकर एक सखी कहती है कि यही जानकी के योग्य वर हैं। इस बात के साथ उसकी इच्छा इतनी आगे बढ़ती है कि राजा की प्रतिज्ञा भी उसे हटती हुई दिखाई देने लगती है। वह अपनी सखी से कहती है कि यदि राजा कहीं इन्हें देख लें तो प्रण छोड़ दें और आग्रह करके इन्हीं से विवाह करा दें। उसका वाक्य यदि से खुलता है। राम का रूप उसके मन में ऐसी सम्भावना जगा रहा है कि राजा भी देखकर उसी निश्चय पर पहुँचेंगे जिस पर वह पहुँच चुकी है।
देखि राम छबि कोउ एक कहई। जोगु जानकिहि यह बरु अहई॥
चौपाई २
जौं सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥
बात सुनते ही दूसरी सखी जानकारी जोड़ती है। राजा इन्हें पहचान चुके हैं। मुनि के साथ इनका आदरपूर्वक सम्मान भी कर चुके हैं। इस उत्तर से पहली सखी की कल्पना की एक बात बदल जाती है: दर्शन होना अभी बाकी नहीं है। जो होने की आशा पर उसने भरोसा रखा था वह हो चुका है, और फिर भी राजा का प्रण बना हुआ है। बातचीत यहीं अपनी पहली कठिनाई पर पहुँचती है। सबको वर योग्य लग रहे हैं, पर योग्य जान लेना और प्रतिज्ञा छोड़ देना, राजा के व्यवहार में दोनों बातें एक साथ नहीं हुई हैं।
यह दूसरी स्त्री राजा के हठ पर क्षुब्ध है। वह कहती है कि राजा अपना प्रण नहीं छोड़ते, होनहार के वश होकर अविवेक का ही आश्रय लिये हुए हैं। उसकी दृष्टि में इतने सुन्दर और उचित वर सामने हों तो प्रतिज्ञा पर अड़े रहना समझदारी कैसे हुआ। यह उसी सखी की व्याकुल राय है। हम उसके शब्दों में जनकपुर की उस चाह को सुनते हैं जो जानकी के लिये यह वर पा लेना चाहती है। राजसम्मान का समाचार मिलने से उसका उत्साह पूरा नहीं होता; उसे उस सम्मान के आगे विवाह का सम्बन्ध भी चाहिये।
फिर एक और सखी भरोसा दिलाती है। सुना जाता है कि विधाता भले हैं और सबको उचित फल देते हैं। यदि ऐसा है तो जानकी को यही वर मिलेगा। वह अपनी सखी को आश्वस्त करती है कि इसमें सन्देह नहीं होना चाहिये। इस तरह एक ओर राजा के अटल प्रण को लेकर बेचैनी है और दूसरी ओर विधाता के उचित फल पर विश्वास। ये स्त्रियाँ अपना मन एक दूसरे के सामने खोल रही हैं। एक शंका कहती है, दूसरी उसे सुनकर आशा का कारण ढूँढ़ती है; दोनों की चाह जानकी और राम का मिलन है।
इसी बातचीत में नगर का अपना हित भी सामने आता है। एक सखी कहती है कि दैवयोग से ऐसा संयोग बन जाय तो हम सब कृतार्थ हो जायँ। उसके लिये आतुरता का कारण बहुत निकट का है। विवाह का नाता बन गया तो कभी इनका यहाँ फिर आना होगा। क्षणभर का दर्शन एक सम्बन्ध से जुड़ जायेगा, और वही सम्बन्ध फिर दर्शन का अवसर देगा। उसके मन में जो सुख है वह केवल आज का सुख नहीं रह गया। वह आनेवाले किसी दिन को सोच रही है जब इन दोनों भाइयों को फिर इसी नगर में देखा जा सकेगा।
नाहिं त हम कहुँ सुनहु सखि इन्ह कर दरसनु दूरि।
दोहा २२२
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥ २२२॥
यदि यह नाता न बना तो इनके दर्शन हमारे लिये दूर की बात होंगे, सखी कहती है। इतने दुर्लभ संयोग के लिये पूर्वजन्मों के बहुत पुण्य चाहिये। इस दोहे में उसकी उत्कण्ठा का पूरा कारण मिल जाता है। राम को एक बार देखकर वह फिर देखने का अवसर चाहती है, और विवाह उसी अवसर का सहारा दिखाई देता है। अपने नगर की बेटी के लिये उचित वर की चाह में अपने दर्शन की आकांक्षा भी मिली हुई है। सखियाँ इसे छिपाती नहीं हैं। वे जानकी के सौभाग्य में अपना सौभाग्य भी देखती हैं और उसी कारण इस प्रस्तावित सम्बन्ध के लिये इतनी आतुर हैं।
एक सखी आशा करती है कि राम को देखकर राजा प्रण छोड़ देंगे। दूसरी बताती है कि राजा सम्मान कर चुके हैं, फिर भी प्रण पर अडिग हैं। सखियाँ विधाता के उचित फल पर भरोसा करती हैं और चाहती हैं कि जानकी का विवाह राम से हो, जिससे इस नाते दोनों भाइयों का फिर जनकपुर आना हो सके।
कठोर धनुष और कोमल कुमार
एक दूसरी सखी इस इच्छा का अनुमोदन करती है। वह कहती है कि आपने अच्छी बात कही, इस विवाह से सबका बड़ा हित होगा। किन्तु इतने में किसी को धनुष की कठोरता याद आ जाती है। शंकर का धनुष कठोर है, और ये साँवले कुमार कोमल शरीर के किशोर हैं। एक ही दृष्टि जिस कोमलता पर मुग्ध हुई थी, उसी कोमलता को अब धनुष के सामने रखकर चिन्तित हो रही है। वर की सुन्दरता को लेकर सबका मन मिल गया है; धनुष की कठिनाई पर आकर मन फिर असमंजस में पड़ता है।
सखी इस कठिनाई को दबाती नहीं। वह अपनी सयानी सहेली से कहती है कि सब असमंजस ही असमंजस है। उसके सामने दो चीज़ें हैं जिनका मेल बैठाना कठिन लग रहा है, शिव का कठोर धनुष और राम का मृदुल किशोर शरीर। फिर दूसरी सखी उसी कोमल वाणी में उत्तर देती है जो इस पूरी बातचीत का स्वभाव है। वह सुनायी हुई बात याद दिलाती है: कुछ लोग कहते हैं कि ये देखने में छोटे अवश्य हैं, पर इनका प्रभाव बहुत बड़ा है। शरीर का छोटापन और प्रभाव का बड़प्पन एक साथ समझने के लिये वह आगे एक उदाहरण रखती है।
परसि जासु पद पंकज धूरी। तरी अहल्या कृत अघ भूरी॥
चौपाई ३
सो कि रहिहि बिनु सिव धनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥
वह अहल्या का स्मरण करती है। जिनके चरणकमलों की धूल के स्पर्श से अहल्या तर गयीं, वे शिव का धनुष बिना तोड़े कैसे रहेंगे। अपनी बात में यह सखी अहल्या के किये हुए पाप को बड़ा भारी कहती है। फिर उसी अहल्या के उद्धार से राम के प्रभाव का प्रमाण देती है। उसका आग्रह है कि इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़िये। पहले परिचय में अहल्या का उद्धार मार्ग की घटना के रूप में आया था। अब उसी घटना को एक स्त्री धनुष के विषय में अपनी आशा का आधार बना रही है।
यह उत्तर सुनने में छोटा है, पर इससे बातचीत की दृष्टि बदलती है। अभी तक धनुष की कठोरता को कुमार के कोमल शरीर के सामने रखा गया था। अब चरणों की धूल का स्पर्श और उससे हुआ उद्धार सामने आता है। सखी अपने विश्वास को इसी परिचित समाचार पर टिकाती है। उसका कहना है कि जिनका इतना प्रभाव है उनके विषय में केवल दिखाई देनेवाली कोमलता के आधार पर शंका क्यों बनी रहे। धनुष टूटने की उसकी बात भरोसे का कथन है। वह अपने सामने सम्पन्न हुआ कोई धनुषभंग नहीं सुना रही, सखियों के मन से असमंजस दूर करना चाहती है।
इसके बाद वह जानकी की ओर लौटती है। जिस ब्रह्मा ने सीता को इतने सँवारकर रचा है, उसी ने विचार करके यह साँवला वर भी रचा है। सीता की रचना और राम के रूप को वह एक ही रचयिता की समझ से जोड़ती है। उसकी बात सुनकर सब सखियाँ प्रसन्न हो जाती हैं। कोमल वाणी में सबकी कामना निकलती है कि ऐसा ही हो। बातचीत अब किसी एक स्त्री की आशा तक सीमित नहीं रही। सब उसी मंगल की इच्छा कर रही हैं, और उस इच्छा का उत्तर उनके हर्ष में दिखाई देता है।
हियँ हरषहिं बरषहिं सुमन सुमुखि सुलोचनि बृंद।
दोहा २२३
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥ २२३॥
सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ समूह बनाकर हृदय में हर्षित होती हैं और फूल बरसाती हैं। उनके प्रेम को अब बोलते हुए ही नहीं, बरसते हुए भी देखिये। दोनों भाई जिस ओर जाते हैं, उस ओर परम आनन्द फैल जाता है। तुलसी इस आनन्द को किसी एक चौक या एक समूह पर रोकते नहीं। भाइयों की गति के साथ नगर का हर्ष जुड़ा हुआ है। जहाँ वे पहुँचते हैं वहाँ देखनेवाले अपना सुख पाते हैं, और सखियों की अभी कही हुई मंगलकामना फूलों की वर्षा के साथ उसी पथ पर बनी रहती है।
शिव के कठोर धनुष और राम के कोमल किशोर रूप को देखकर एक सखी शंकित होती है। दूसरी अहल्या के उद्धार से राम का प्रभाव बताकर विश्वास रखने को कहती है और सीता तथा राम को ब्रह्मा की सोची हुई रचना मानती है। सब ऐसा ही होने की कामना करती हैं, फूल बरसाती हैं और दोनों भाइयों के मार्ग में आनन्द छा जाता है।
नगर के पूरब की रंगभूमि
दोनों भाई नगर के पूरब की ओर जाते हैं। वहाँ धनुषयज्ञ के लिये भूमि तैयार की गयी है। अब हमारी दृष्टि मार्ग में मिले लोगों से हटकर उस रचना पर ठहरती है जिसे देखने राम और लक्ष्मण पहुँचे हैं। तुलसी पहले दिशा बताते हैं, फिर भूमि का विस्तार और उसकी सजावट। इससे पूरा स्थान क्रम से खुलता है। बहुत लम्बा और चौड़ा आँगन है, सुन्दर ढंग से ढाला हुआ पक्का फर्श है, और उसी पर निर्मल तथा मनोहर वेदी सँवारी गयी है।
पुर पूरब दिसि गे दोउ भाई । जहँ धनुमख हित भूमि बनाई॥
चौपाई ४
अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥
इस आँगन और वेदी के चारों ओर सोने के विशाल मंच बनाये गये हैं। उन पर राजा बैठेंगे। मंचों की भव्यता के साथ उनका प्रयोजन भी बताया गया है, जिससे रचना देखने में केवल अलंकरण न रह जाय। बीच में यज्ञ की वेदी है और चारों दिशाओं में राजाओं के बैठने का प्रबन्ध। हम अभी उस व्यवस्था को देख रहे हैं जो बैठनेवालों के लिये बनी है। कुमारों की इस यात्रा में राजा उन मंचों पर आकर बैठे हुए नहीं दिखाये जाते। यहाँ देखने का विषय तैयार की गयी रंगभूमि है।
उन राजमंचों के पीछे, समीप ही, चारों ओर दूसरे मचानों की मण्डली बनी है। उसका घेरा कुछ ऊँचा है और सब प्रकार से सुन्दर लगता है। यहाँ जाकर नगर के लोग बैठेंगे। पहले आँगन, फिर वेदी, फिर चारों ओर राजमंच, और उनके पीछे थोड़ा ऊँचा यह घेरा, वर्णन हमें जगह के भीतर एक एक परत दिखाता चलता है। नगरवासियों के लिये बनाया हुआ स्थान अलग से सामने आता है। उनकी उपस्थिति का ध्यान भी इस निर्माण में रखा गया है।
कछुक ऊँचि सब भाँति सुहाई। बैठहिं नगर लोग जहँ जाई॥
चौपाई ५
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥
इन्हीं के पास विशाल और सुन्दर धवल भवन हैं, अनेक रंगों से बने और सँवरे हुए। उनमें स्त्रियों के बैठकर देखने के स्थान हैं। अपने अपने कुल के अनुसार जिसे जहाँ बैठना उचित है, वह वहाँ बैठेगी। तुलसी इस व्यवस्था को भी रचना का अंग बनाकर रखते हैं। राजाओं के मंच, नगरवासियों की ऊँची मण्डली और स्त्रियों के लिये निकट के भवन, सबकी जगह बताने के बाद धनुषयज्ञ देखने के लिये तैयार किया गया यह परिसर हमारी आँखों में पूरा बैठने लगता है।
और इसे दिखानेवाले नगर के बालक हैं। वे कोमल वचन कह कहकर आदर के साथ प्रभु को रचना दिखा रहे हैं। इतने विशाल मंचों और भवनों के बीच यह छोटी, मधुर वाणी अलग से सुनाई देती है। बच्चे जिन स्थानों को जानते हैं उन्हें बड़े उत्साह से सामने रखते हैं। राम और लक्ष्मण उनके साथ रचना देखते हैं। आँगन के विस्तार और मंचों की ऊँचाई के बाद कथा अब बच्चों के इस निकट आने पर ठहरती है, जहाँ दिखाने का काम धीरे धीरे प्रेम प्रकट करने का अवसर बन रहा है।
नगर के पूरब धनुषयज्ञ की भूमि में चौड़ा पक्का आँगन, निर्मल वेदी, राजाओं के लिये बड़े स्वर्णमंच, उनके पीछे नगरवासियों का कुछ ऊँचा मण्डलाकार घेरा और पास में स्त्रियों के लिये सुन्दर भवन बने हैं। नगर के बच्चे मधुर वाणी से दोनों भाइयों को यह रचना दिखाते हैं।
बच्चों की पुकार पर दोनों भाई
रचना दिखाने के बहाने बच्चों को राम के समीप रहने का अवसर मिला है। प्रेम के वश होकर वे उनके मनोहर अंगों को छूते हैं और पुलकित हो उठते हैं। आँखें दोनों भाइयों को बार बार देखती हैं, हृदय में अत्यन्त हर्ष होता है। यह आनन्द केवल किसी सुन्दर वस्तु को दूर से देख लेने का आनन्द नहीं रह गया। देखने के साथ निकटता और स्पर्श जुड़ गये हैं। नगर के बच्चे उस प्रेम को किसी लम्बे परिचय में नहीं बाँधते, यज्ञभूमि दिखाते हुए उसे अपने व्यवहार में व्यक्त कर देते हैं।
सब सिसु एहि मिस प्रेमबस परसि मनोहर गात।
दोहा २२४
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात॥ २२४॥
राम जान लेते हैं कि ये सब बालक प्रेम के वश हैं। उनके दिखाये हुए स्थानों की वे प्रेमपूर्वक प्रशंसा करते हैं। टीका बताती है कि इससे बालकों का उत्साह, आनन्द और प्रेम और बढ़ जाता है। इस छोटे से आदान-प्रदान में दिखानेवाले की चाह समझी गयी है। बच्चे रचना सामने रखते हैं, राम उसकी सराहना करते हैं, और बच्चों को अपने काम में और सुख मिलता है। फिर हर बालक अपनी अपनी रुचि के अनुसार उन्हें बुलाने लगता है। किसी का बुलाना दूसरे के बुलाने में दबकर रह नहीं जाता।
सिसु सब राम प्रेमबस जाने । प्रीति समेत निकेत बखाने॥
चौपाई ६
निज निज रुचि सब लेहिं बोलाई । सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥
दोनों भाई स्नेह के साथ उनके पास जाते हैं। प्रत्येक के बुलाने पर उनके जाने की बात टीका स्पष्ट करती है। यहाँ उस भीड़ में अलग अलग बच्चों की इच्छा को जगह मिलती है। सब एक साथ प्रेम में भरे हैं, फिर भी हर किसी को अपनी रुचि का स्थान दिखाना है। राम उस रुचि को आदर देते हैं और लक्ष्मण साथ चलते हैं। बच्चे बार बार देखने के बहाने पास आये थे; अब उनके बुलाने पर दोनों भाई स्वयं पास पहुँचते हैं। कथा में प्रेम की यह गति दोनों ओर से दिखाई देती है।
बच्चों के लिये बना यह समय सहज है। रचना की प्रशंसा सुनकर उनका उत्साह बढ़ता है, और वे फिर कोई स्थान दिखाना चाहते हैं। भाइयों के जाने में भी स्नेह है। तुलसी बच्चों को केवल रास्ता बताकर हट जानेवाले पात्र नहीं बनाते। उनके पुलकित शरीर, हर्षित हृदय, अपनी अपनी रुचि और पुकार, सबको अलग पहचान देते हैं। जिस रंगभूमि में अलग अलग समूहों के बैठने की मर्यादा अभी गिनायी गयी थी, वहाँ कुमारों का यह भ्रमण बच्चों की छोटी छोटी इच्छाओं के साथ आगे बढ़ रहा है।
राम अपने छोटे भाई को भी रचना समझाते हैं। उनकी वाणी कोमल, मधुर और मनोहर है। जो स्थान उन्हें दिखाये जा रहे हैं उन्हें वे लक्ष्मण को दिखाते चलते हैं। इस प्रकार बच्चे दिखाते हैं, राम देखते और सराहते हैं, फिर अनुज को दिखाते हैं। एक ही रचना को देखने का सुख कई लोगों के बीच बाँटा जा रहा है। बच्चों का आदर और छोटे भाई के साथ का अपनापन इस नगर-दर्शन में एक साथ हैं। इसी क्षण कवि उन राम की महिमा याद दिलाते हैं जो इतनी रुचि लेकर यह सब देख रहे हैं।
बालक दिखाने के बहाने राम को छूकर पुलकित होते हैं और दोनों भाइयों को देखकर हर्षित रहते हैं। राम उनके प्रेम को पहचानकर रचना की प्रशंसा करते हैं। प्रत्येक बालक अपनी रुचि से बुलाता है और दोनों भाई स्नेह से उसके पास जाते हैं। राम मधुर वाणी में लक्ष्मण को भी रचना दिखाते हैं।
विस्मय से देखकर, संकोच से लौटना
राम देखावहिं अनुजहि रचना । कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥
चौपाई ७
लव निमेष महुँ भुवन निकाया । रचइ जासु अनुसासन माया॥
लक्ष्मण को रचना दिखाते हुए राम के मधुर वचन के ठीक साथ तुलसी माया की सामर्थ्य रखते हैं। इन्हीं राम की आज्ञा से माया लव निमेष में ब्रह्माण्डों के समूह रच देती है। पोद्दार जी की टीका इस काल को पलक गिरने के चौथाई समय के रूप में समझाती है। इतनी शीघ्र रचना करनेवाली माया जिनके अनुशासन में है, वही राम धनुषयज्ञ की शाला को आश्चर्य से देख रहे हैं। बच्चों को उनके देखे हुए स्थानों की प्रशंसा मिली है, और कवि हमें देखनेवाले की यह पहचान भी दे रहे हैं।
इस विस्मय को तुलसी भक्ति के लिये दीनदयाल का व्यवहार कहते हैं। ब्रह्माण्डों की रचना का उल्लेख करके वे रंगभूमि को छोटा बताकर छोड़ नहीं देते। उसके ठीक बाद राम को चकित होकर देखते हुए रखते हैं। बच्चों ने प्रेम से रचना दिखायी है और राम उसे रुचि से देख रहे हैं। दोनों बातें साथ पढ़ने पर उस दृष्टि का मोल खुलता है। जिनकी आज्ञा में माया है, वे अपने प्रेमियों की दिखायी हुई यज्ञशाला के कौतुक में समय दे रहे हैं और उनके आनन्द में सम्मिलित हैं।
कौतुक देख लेने पर दोनों भाई गुरु के पास लौटते हैं। देर हो गयी है, यह जानकर उनके मन में डर है। तुलसी यहाँ फिर राम की महिमा और उनके व्यवहार को साथ रखते हैं: जिनसे भय को भी भय होता है, वे ही ऐसा करके भजन का प्रभाव दिखा रहे हैं। यह संकोच नगर-दर्शन के आनन्द को रोकनेवाली किसी डाँट से नहीं आता। दोनों भाई स्वयं देर जानकर लौट रहे हैं। गुरु के प्रति उनकी विनय उस समय भी बनी है जब नगर का प्रेम और बच्चों की पुकार उन्हें अपने पास रख लेना चाहती है।
बच्चों को विदा करना भी सहज नहीं होता। राम उनसे कोमल, मधुर और सुन्दर बातें कहते हैं, फिर भी उन्हें ज़ोर देकर विदा करना पड़ता है। वे प्रेम से साथ लगे हुए हैं, इसलिये विदा का प्रयत्न कुछ शब्द कहकर पूरा नहीं हो जाता। जिन्हें कुछ देर पहले अपनी अपनी रुचि से बुलाने की छूट मिली थी, उन्हें अब लौटाना है। वाणी की मिठास बनी रहती है और विदा का आग्रह भी करना पड़ता है। बालकों से छूटकर ही दोनों भाई गुरु की ओर बढ़ पाते हैं।
सभय सप्रेम बिनीत अति सकुच सहित दोउ भाइ।
दोहा २२५
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥ २२५॥
गुरु के पास पहुँचकर दोनों भाई चरणकमलों में सिर नवाते हैं। उनके साथ भय है, प्रेम है, बड़ी विनय है और संकोच है। तुलसी इन भावों को एक ही दोहे में साथ रखते हैं। फिर वे आज्ञा पाकर बैठते हैं। नगर में जिनके दर्शन के लिये फूल बरसे और बच्चे बार बार पास आये, वे यहाँ गुरु की अनुमति की प्रतीक्षा करते हैं। लौट आने के साथ शिष्टाचार पूरा नहीं मान लिया गया। प्रणाम के बाद बैठने की आज्ञा मिलती है, और तब दोनों भाई बैठते हैं।
जिस राम की आज्ञा से माया क्षणभर में ब्रह्माण्ड रचती है, वही भक्ति के लिये रंगभूमि को चकित होकर देखते हैं। देर का भय जानकर दोनों भाई लौटते हैं, मधुर बातें कहकर बच्चों को आग्रहपूर्वक विदा करते हैं, फिर गुरु को प्रणाम करके उनकी आज्ञा से बैठते हैं।
दो पहर की कथा और गुरु के चरण
रात्रि का प्रवेश होता है। मुनि की आज्ञा मिलती है और सब सन्ध्यावन्दन करते हैं। नगर-दर्शन से लौटने के बाद कथा का क्रम इस उपासना पर ठहरता है। फिर प्राचीन कथाएँ और इतिहास कहते हुए सुन्दर रात्रि के दो पहर बीत जाते हैं। तुलसी इस बीतते समय की माप देते हैं। हम उन कथाओं के नाम नहीं सुनते, पर उनके बीच बीती रात का अंश जानते हैं। दिन में नगर की रचना देखी गयी थी; अब साथ बैठकर पुरानी कथाओं का समय मिला है।
निसि प्रबेस मुनि आयसु दीन्हा । सबहीं संध्याबंदनु कीन्हा॥
चौपाई ८
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥
दो पहर बीत जाने पर मुनि जाकर शयन करते हैं। राम और लक्ष्मण दोनों उनके चरण दबाने लगते हैं। गुरु के विश्राम के साथ शिष्यों की सेवा आरम्भ होती है। कुछ पहले दोनों भाई देर से लौटने का संकोच लेकर चरणों में सिर झुकाये थे। अब उन्हीं चरणों को प्रेम से दबा रहे हैं। इस सेवा में दोनों साथ हैं, जैसे नगर-दर्शन में साथ थे। दिन भर की कथा में बार बार साथ दिखे दोनों भाई रात की इस शान्त घड़ी में भी एक ही सेवा कर रहे हैं।
यहाँ कवि फिर सेवक बनकर बैठे इन कुमारों की महिमा बताते हैं। जिनके चरणकमलों के लिये वैराग्यवान् लोग अनेक प्रकार के जप और योग करते हैं, वे दोनों भाई गुरु के चरण दबा रहे हैं। टीका उस साधना का प्रयोजन उनके चरणों का दर्शन और स्पर्श बताकर खोलती है। बच्चों को भी इन्हीं राम के अंगों को छूने में पुलक और हर्ष मिला था। अब वही राम, लक्ष्मण के साथ, अपने गुरु को सुख पहुँचाने में लगे हैं। चरणों की सेवा का यह दृश्य उस महिमा को अपने भीतर लिये हुए है जिसे कवि बीच बीच में याद दिलाते चलते हैं।
तेइ दोउ बंधु प्रेम जनु जीते । गुर पद कमल पलोटत प्रीते॥
चौपाई ९
बार बार मुनि अग्या दीन्ही । रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥
दोनों भाई मानो प्रेम से जीत लिये गये हों, इस तरह प्रेमपूर्वक गुरु के चरणकमल दबाते हैं। तुलसी का यह कहना सेवा में उनका मन दिखाता है। मुनि बार बार आज्ञा देते हैं, तब रघुनाथ जाकर शयन करते हैं। एक बार आदेश सुनते ही सेवा समाप्त कर देने का वर्णन नहीं है। आज्ञा की पुनरावृत्ति बताती है कि उन्हें वहाँ से विश्राम के लिये भेजना पड़ता है। दिन में बच्चों को विदा करना कठिन था; रात में गुरु को इन प्रेमभरे सेवकों को विश्राम के लिये बार बार कहना पड़ रहा है।
इस क्रम में विश्राम भी आज्ञा से आता है। लौटकर बैठने की अनुमति मिली थी, सन्ध्यावन्दन मुनि की आज्ञा से हुआ था और अब बार बार कहने पर राम शयन के लिये गये हैं। गुरु के पास बितायी हुई सन्ध्या से रात तक अनुमति और सेवा का यह सूत्र बना रहता है। नगर की रचना तथा बच्चों की रुचि में जितना ध्यान था, गुरु के चरणों में उतनी ही पूरी लगन है। रात्रि बीत रही है, किन्तु सेवा करनेवालों का प्रेम अभी वहीं लगा हुआ है।
मुनि की आज्ञा से सब सन्ध्यावन्दन करते हैं। प्राचीन कथा और इतिहास कहते हुए रात के दो पहर बीतते हैं। मुनि के शयन करने पर दोनों भाई प्रेम से उनके चरण दबाते हैं। जिनके चरणों के लिये विरक्त जन जप और योग करते हैं, वे गुरुसेवा में लगे हैं; मुनि के बार बार कहने पर राम विश्राम करते हैं।
लक्ष्मण की सेवा और भोर की पहली ध्वनि
राम जाकर लेटते हैं तो लक्ष्मण उनके चरण दबाने लगते हैं। वे चरणों को हृदय से लगाये हुए हैं और भय तथा प्रेम के साथ परम सुख अनुभव कर रहे हैं। गुरु के चरणों में दोनों भाइयों की जो सेवा थी, उसके बाद छोटे भाई की यह सेवा आती है। लक्ष्मण के लिये रात का सुख इसी समीपता में है। तुलसी उनके भय के साथ प्रेम और सुख को भी रखते हैं, जिससे सेवा करते हुए उनका पूरा भाव सामने आ सके।
चापत चरन लखनु उर लाएँ । सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥
चौपाई १०
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥
राम बार बार कहते हैं कि हे तात, अब सो जाइये। सम्बोधन में स्नेह है और कहने में आग्रह। गुरु ने राम को विश्राम के लिये कई बार आज्ञा दी थी; अब राम को लक्ष्मण से विश्राम के लिये कई बार कहना पड़ता है। सेवा की दोनों घड़ियाँ अपने क्रम में पूरी होती हैं। पहले दोनों भाई गुरु के पास थे, फिर छोटे भाई राम के पास हैं। हर जगह प्रेम से लगी हुई सेवा को विराम देने के लिये सेवा पानेवाले को ही बार बार कहना पड़ रहा है।
तब लक्ष्मण चरणकमलों को हृदय में धरकर लेटते हैं। हाथों से चरण दबाने का काम रुकता है, हृदय में उन्हीं चरणों का ध्यान रहता है। इस छोटी सी गति को देखिये: पहले चरण हृदय से लगाये हुए सेवा थी, अब हृदय में चरणों को धरकर विश्राम है। राम के कहने पर शरीर को विश्राम मिलता है और प्रेम का आश्रय बना रहता है। दिन के अन्त में तुलसी लक्ष्मण को इसी भाव के साथ शयन करते हुए दिखाते हैं।
उठे लखनु निसि बिगत सुनि अरुनसिखा धुनि कान।
दोहा २२६
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥ २२६॥
रात बीतती है। मुर्गे की आवाज़ कानों में पड़ती है और लक्ष्मण उठ जाते हैं। तुलसी इस जागने को एक सुनायी देनेवाली ध्वनि से जोड़ते हैं। श्रीराम भी गुरु से पहले ही जाग चुके हैं। दोहे में उन्हें सुजान और जगत् का स्वामी कहा गया है, और साथ ही उनके जागने की मर्यादा यह है कि गुरु अभी नहीं जागे हैं। रात की सेवा से सुबह का यह जागरण जुड़ता है। हमारी कथा इसी बिन्दु पर पहुँचती है: मुर्गे का स्वर सुनकर उठे लक्ष्मण और गुरु से पहले जागे राम।
लक्ष्मण राम के चरण हृदय से लगाकर भय, प्रेम और परम सुख के साथ दबाते हैं। राम के बार बार कहने पर वे उन्हीं चरणों को हृदय में धरकर विश्राम करते हैं। रात बीतने पर मुर्गे की ध्वनि सुनकर लक्ष्मण उठते हैं और राम भी गुरु से पहले जाग जाते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में प्रेम हर मिलनेवाले के अपने ढंग से बोलता है। सखियाँ जानकी के विवाह की बात करती हैं और चाहती हैं कि इस सम्बन्ध से राम का फिर दर्शन मिले। बालक रचना दिखाते हैं, पास आते हैं और अपनी अपनी रुचि से बुलाते हैं। गुरु के चरण दबाते दोनों भाई सेवा छोड़ने में देर करते हैं। फिर लक्ष्मण को विश्राम के लिये राम से वही आग्रह सुनना पड़ता है। इन अलग अलग दृश्यों में साथ रहने की चाह बार बार पहचानी जा सकती है।
इसके साथ राम का ध्यान भी देखिये। वे बालकों की रुचि को आदर देकर रचना सराहते हैं, हर पुकार पर स्नेह से जाते हैं और लक्ष्मण को मधुर वाणी में समझाते हैं। लौटने का समय होने पर गुरु का स्मरण बना रहता है, और बैठने तथा विश्राम करने में उनकी आज्ञा की प्रतीक्षा है। बच्चों का स्नेह स्वीकार करना और गुरु की सेवा में विनीत होना, दोनों इसी दिन के व्यवहार हैं। तुलसी हमें महिमा के साथ इन छोटे आचरणों पर भी ठहराते हैं, ताकि प्रेम केवल वर्णन का शब्द होकर न रह जाये।
नगर के फूल, बच्चों का पुलक, गुरु के चरणों पर लगे दोनों भाइयों के हाथ और राम के चरणों में लक्ष्मण का हृदय, इस प्रसंग का सुख इन दृश्यों में बसता है। अन्तिम दोहा हमें रात्रि से भोर तक पहुँचा देता है। मुर्गे का स्वर सुनकर लक्ष्मण उठ चुके हैं; जगत् के स्वामी राम भी गुरु से पहले जागे हुए हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २२१ से २२६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।