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नगर-दर्शन और जनकपुर का प्रेम

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 26

स्त्रियों की विवाह की कामना, बच्चों के संग धनुषयज्ञ की रंगभूमि का दर्शन। और कथा में, और गुरु और भाई की सेवा में बीती रात।

जनकपुर की स्त्रियाँ दोनों भाइयों को देख रही हैं। एक सखी पूछती है कि ऐसा कौन देहधारी होगा जो इस रूप पर मोहित न हो। किसी ने इनके बारे में कुछ सुना है, कोई सीता के लिये वर देख रही है, कोई राजा के प्रण की बात करती है। एक सखी की आतुरता इसलिये है कि इस नाते ये कभी यहाँ आयेंगे।

राम और लक्ष्मण जहाँ जहाँ जाते हैं, वहाँ परम आनन्द छा जाता है। स्त्रियाँ फूल बरसाती हैं, बच्चे धनुषयज्ञ की भूमि दिखाते हैं और अपनी अपनी रुचि से बुलाते हैं। फिर देर जानकर दोनों भाई गुरु के पास लौटते हैं। सन्ध्यावन्दन और रात की सेवा होती है, और कथा उस मुर्गे की आवाज़ तक पहुँचती है जिसे सुनकर लक्ष्मण उठते हैं।

गलियों में मिले लोग

  • राम कौसल्या और दशरथ के पुत्र, जिन्हें देखकर स्त्रियाँ हर्षित हैं, और जिन्हें बच्चे प्रेम के वश होकर रचना दिखाते और छूते हैं।
  • लक्ष्मण सुमित्रा के पुत्र और राम के छोटे भाई, नगर देखने में साथी और रात में उनके चरणों के सेवक।
  • विश्वामित्र मुनि, जिनके यज्ञ की रक्षा दोनों भाइयों ने की, जिनके पास दोनों भाई लौटते हैं, और जिनकी आज्ञा और सेवा में रहते हैं।
  • जनकपुर की स्त्रियाँ राम के परिचय, सीता के विवाह और राजा के प्रण पर प्रेम से चर्चा करनेवाली सखियाँ।
  • नगर के बच्चे प्रेम के वश होकर रचना दिखाते और अपनी अपनी रुचि से बुलाते बालक।
  • सीता और जनक सीता के लिये योग्य वर और राजा की प्रतिज्ञा, स्त्रियों की बातचीत का केन्द्र।

सखियों के बीच दोनों भाइयों का परिचय

एक सखी पूछती है: कहिये, ऐसा कौन शरीरधारी है जो इस रूप को देखकर मोहित न हो। कोई सखी प्रेम से, कोमल वाणी में बोलती है: सयानी, मैंने जो सुना है, वह सुनिये।

ये दोनों दशरथ के पुत्र हैं, बाल हंसों के सुन्दर जोड़े जैसे। ये मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा करनेवाले हैं, और इन्होंने युद्धभूमि में राक्षसों को मारा है।

जिनका शरीर साँवला है और नेत्र सुन्दर कमलों जैसे, जो मारीच और सुबाहु का मद चूर करनेवाले हैं, वे सुख की खान कौसल्या के पुत्र हैं। उनका नाम राम है, और हाथ में धनुष बाण है।

राम के पीछे सुन्दर वेष में, हाथ में धनुष बाण लिये, जो गोरे किशोर हैं, वे उनके छोटे भाई लक्ष्मण हैं, और उनकी माता सुमित्रा हैं।

अन्त में आने का प्रयोजन: दोनों भाई ब्राह्मण का काम करके (टीका: विश्वामित्र का काम), और रास्ते में मुनि की पत्नी का उद्धार करके, धनुषयज्ञ देखने आये हैं। पोद्दार की टीका उन्हें गौतम की पत्नी अहल्या बताती है। यह सुनकर सब स्त्रियाँ हर्षित हो उठती हैं।

विवाह की आशा और राजा का प्रण

राम की छबि देखकर एक सखी कहती है कि यह वर सीता के योग्य है। सखी, यदि राजा इन्हें देख लें, तो प्रण छोड़कर हठ करके विवाह कर दें।

कोई कहती है: राजा इन्हें पहचान चुके हैं, और मुनि के साथ इनका आदर से सम्मान कर चुके हैं।

वह कहती है: पर सखी, राजा अपना प्रण नहीं छोड़ते। वे होनहार के वश होकर हठ से अविवेक ही पकड़े हुए हैं।

कोई कहती है: यदि विधाता भले हैं, और सुना जाता है कि वे सबको उचित फल देते हैं, तो सीता को यही वर मिलेगा। सखी, इसमें सन्देह नहीं।

वह कहती है कि दैवयोग से ऐसा संयोग बन जाये, तो सब लोग कृतार्थ हो जायें। सखी, मेरी आतुरता इसीलिये इतनी है कि इस नाते ये कभी यहाँ आयेंगे।

नहीं तो, सखी, सुनिये, हमारे लिये इनका दर्शन दूर है। यह संयोग तभी होता है जब पहले किये बहुत पुण्य हों (टीका: पूर्वजन्मों के)।

कठोर धनुष और कोमल कुमार

एक और सखी कहती है: सखी, आपने अच्छा कहा, इस विवाह से सबका अत्यन्त हित है। कोई कहती है: शिव का धनुष कठोर है, और ये साँवले कुमार कोमल शरीर के किशोर हैं।

वह कहती है: सयानी, सब असमंजस ही है। यह सुनकर दूसरी सखी कोमल वाणी में कहती है: सखी, इनके बारे में कोई कोई ऐसा कहते हैं कि इनका प्रभाव बड़ा है, देखने में छोटे हैं।

वह कहती है: जिनके चरणकमलों की धूल छूकर बड़ा भारी पाप करनेवाली अहल्या तर गयीं, वे क्या शिव का धनुष बिना तोड़े रहेंगे। इस विश्वास को भूलकर भी न छोड़िये।

जिस ब्रह्मा ने सीता को सँवारकर रचा है, उसी ने विचार करके साँवला वर रचा है। उसकी बात सुनकर सब सखियाँ प्रसन्न हो जाती हैं, और कोमल वाणी में कहती हैं: ऐसा ही हो।

सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली स्त्रियाँ झुण्ड के झुण्ड हृदय में हर्षित होकर फूल बरसाती हैं। दोनों भाई जहाँ जहाँ जाते हैं, वहाँ वहाँ परम आनन्द छा जाता है।

नगर के पूरब की रंगभूमि

दोनों भाई नगर के पूरब की ओर जाते हैं, जहाँ धनुषयज्ञ के लिये भूमि तैयार की गयी है। बहुत लम्बा चौड़ा, सुन्दर ढंग से ढाला हुआ पक्का आँगन है, और निर्मल, सुन्दर वेदी सजायी गयी है।

चारों ओर सोने के बड़े बड़े मंच बने हैं, जिन पर राजा बैठेंगे।

राजमंचों के पीछे, पास ही, चारों ओर दूसरे मचानों का गोल घेरा है, कुछ ऊँचा और सब प्रकार से सुन्दर। वहाँ जाकर नगर के लोग बैठेंगे।

इन्हीं के पास अनेक रंगों से बने विशाल, सुन्दर सफ़ेद भवन हैं, जहाँ सब स्त्रियाँ यथायोग्य, अपने अपने कुल के अनुसार, बैठकर देखेंगी।

नगर के बालक कोमल वचन कह कहकर आदर से राम को रचना दिखा रहे हैं।

बच्चों की पुकार पर दोनों भाई

रचना दिखाने के बहाने बच्चे प्रेम के वश होकर राम के मनोहर अंगों को छूते हैं और पुलकित हो उठते हैं। दोनों भाइयों को बार बार देखकर उनके हृदय में अत्यन्त हर्ष होता है।

राम जान लेते हैं कि ये सब बालक प्रेम के वश हैं, और स्थानों की प्रेम से प्रशंसा करते हैं। टीका बताती है कि इससे बालकों का उत्साह, आनन्द और प्रेम और बढ़ जाता है। फिर हर बालक अपनी अपनी रुचि से उन्हें बुलाने लगता है।

और दोनों भाई स्नेह से उनके पास चले जाते हैं। टीका स्पष्ट करती है कि हर एक के बुलाने पर।

विस्मय से देखकर, संकोच से लौटना

राम कोमल, मधुर और मनोहर वचन कहकर छोटे भाई लक्ष्मण को रचना दिखाते हैं। उनकी आज्ञा से माया लव निमेष में ब्रह्माण्डों के समूह रच देती है (पोद्दार की टीका इस समय को पलक गिरने का चौथाई बताती है)। वही राम भक्ति के कारण धनुषयज्ञ की शाला को चकित होकर देख रहे हैं।

कौतुक देख लेने पर दोनों भाई गुरु के पास चलते हैं। देर हो गयी है, यह जानकर उनके मन में डर है। जिनके भय से डर को भी डर लगता है, वही राम भजन का प्रभाव दिखा रहे हैं।

राम कोमल, मधुर और सुन्दर बातें कहकर बालकों को ज़बरदस्ती विदा करते हैं।

गुरु के पास पहुँचकर दोनों भाई भय, प्रेम, विनय और बड़े संकोच के साथ उनके चरणकमलों में सिर नवाते हैं, और आज्ञा पाकर बैठते हैं।

दो पहर की कथा और गुरु के चरण

रात आती है। मुनि की आज्ञा से सब सन्ध्यावन्दन करते हैं, और फिर प्राचीन कथाएँ और इतिहास कहते सुन्दर रात के दो पहर बीत जाते हैं।

तब मुनि जाकर सोते हैं, और राम और लक्ष्मण उनके चरण दबाने लगते हैं।

जिनके चरणकमलों के लिये वैराग्यवान् लोग अनेक प्रकार के जप और योग करते हैं, वे दोनों भाई गुरु के चरण दबा रहे हैं। टीका कहती है कि उन चरणों के दर्शन और स्पर्श के लिये।

दोनों भाई मानो प्रेम से जीत लिये गये हों, इस तरह प्रेम से गुरु के चरणकमल दबाते हैं। मुनि बार बार आज्ञा देते हैं, तब राम जाकर सोते हैं।

लक्ष्मण की सेवा और भोर की पहली ध्वनि

राम जाकर लेटते हैं, तो लक्ष्मण उनके चरण दबाने लगते हैं। वे चरणों को हृदय से लगाये हुए हैं, और भय और प्रेम के साथ परम सुख पा रहे हैं।

राम बार बार कहते हैं: हे तात, सो जाइये।

तब लक्ष्मण उन चरणकमलों को हृदय में धरकर लेट जाते हैं।

रात बीतती है। मुर्गे की आवाज़ कानों में पड़ती है, और लक्ष्मण उठ जाते हैं। राम गुरु से पहले ही जाग चुके हैं।

साथ रहने की चाह

सखियाँ सीता के विवाह की बात करती हैं, और एक सखी चाहती है कि इस नाते ये कभी यहाँ आयें और इनका दर्शन हो। बालक रचना दिखाते हैं, पास आते हैं और अपनी अपनी रुचि से बुलाते हैं।

अन्त में कथा रात से भोर तक पहुँचती है: मुर्गे की आवाज़ सुनकर लक्ष्मण उठते हैं, और राम गुरु से पहले जाग जाते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 221 से 226, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।