रामचरितमानस · बालकाण्ड · मनु और शतरूपा की तपस्या और वरदान
मनु और शतरूपा की तपस्या और वरदान
बरसों के तप के बाद पहले नेत्र भरकर दर्शन माँगा जाता है, फिर पुत्र का सम्बन्ध, और फिर वह भक्ति जिसमें इस निकटता के भीतर भी प्रभु की पहचान बनी रहे।
दो भयभीत गण मार्ग में नारद के चरण पकड़ते हैं। मुनि के मन से मोह जा चुका है और भीतर बहुत प्रसन्नता है। गण अपना अपराध स्वीकार करते हैं, और उसी शाप के भीतर उनके लिये मुक्ति का वचन खुल जाता है। यहाँ से शिव एक और कथा की ओर चलते हैं। इस बार सामने एक ऐसे राजा हैं जिन्होंने बहुत समय धर्मपूर्वक राज्य किया, पर वृद्धावस्था आने पर देखा कि विषयों का आकर्षण अभी गया नहीं है। उनके दुःख का कारण यह है कि जीवन बीत गया और हरिभक्ति हाथ नहीं आयी।
मनु और शतरूपा साथ वन को जाते हैं, साथ तप करते हैं और साथ भगवान् के सामने खड़े होते हैं। उनके तप की अभिलाषा पहले दर्शन है। उस दर्शन के बाद ही मनु अपने मन की बड़ी लालसा कहते हैं। भगवान् जैसा पुत्र मिले, इतना कहना भी उन्हें कठिन लगता है। फिर शतरूपा बोलती हैं, और पुत्र पाने की प्रसन्नता के साथ उस सम्बन्ध का गहरा प्रश्न रखती हैं: जो सबके जनक हैं, उन्हें पुत्र मानते हुए उनकी पहचान कैसे बनी रहे। तुलसी की इस कथा में दोनों की विनतियाँ अलग अलग सुनाई देती हैं, और दोनों को अपना उत्तर मिलता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- मनु स्वायम्भुव मनु, धर्मपूर्वक राज्य करनेवाले राजा, जो शतरूपा के साथ तप करके भगवान् के समान पुत्र माँगते हैं।
- शतरूपा मनु की पत्नी और तप की संगिनी, जो भगवान् से अपने भक्तों का सुख, गति, भक्ति, प्रेम, विवेक और आचरण माँगती हैं।
- श्रीराम और सीता मनु और शतरूपा को दर्शन देनेवाले प्रभु और उनके बायें भाग में स्थित आदिशक्ति, जिनके अवतरण का वचन मिलता है।
- शिव और पार्वती कथा के वक्ता और श्रोता, जिनके संवाद को याज्ञवल्क्य भरद्वाज के सामने रखते हैं।
- नारद और शिव के दो गण आरम्भ में मिलते हैं। गण शाप पर अनुग्रह माँगते हैं और नारद उनके उद्धार का समय बताते हैं।
शाप के भीतर मुक्ति का वचन
शिव के गण नारद को राह में जाते देखते हैं। मुनि मोह से रहित हैं, मन में विशेष हर्ष है, पर गणों का भय बना हुआ है। वे पास आते हैं, चरण पकड़ते हैं और अपनी पहचान बताते हैं: हम ब्राह्मण नहीं हैं, शिव के गण हैं। अपराध बड़ा हुआ और उसका फल मिल गया। अब कृपा हो कि शाप का दुःख दूर हो। उनके पहले वाक्य में ही अपराध की स्वीकृति और अनुग्रह की आशा साथ रखी हैं। नारद उनकी दीनता सुनते हैं और उत्तर देते समय दीनदयाल कहे जाते हैं।
उत्तर में राक्षस होने का विधान बना रहता है। नारद कहते हैं कि दोनों को विपुल वैभव, तेज और बल मिलेगा। जब अपनी भुजाओं के बल से विश्व को जीत लेंगे, तब विष्णु मनुष्य का शरीर धारण करेंगे। इतना सुनकर उस भावी विजय का अर्थ बदल जाता है। उसका अन्त भी इसी समय बता दिया गया है। जिस बल से वे सबको जीतेंगे, उसी बल के चरम पर भगवान् से उनका सामना होगा, और उस सामना करने का फल नारद अगली चौपाई में खोलते हैं।
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥
चौपाई १
चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥
युद्ध में श्रीहरि के हाथों मृत्यु होगी, मुक्ति मिलेगी और फिर संसार में जन्म नहीं होगा। गण मुनि के चरणों में सिर नवाकर चले जाते हैं और समय आने पर राक्षस होते हैं। दोनों के नाम यहाँ नहीं लिये गये हैं। कथा उनके अपराध से आगे बढ़कर उनके उद्धार तक पहुँचती है। दोहा कहता है कि एक कल्प में भगवान् ने इसी कारण मनुष्य का अवतार लिया, देवताओं को प्रसन्न करने, सज्जनों को सुख देने और पृथ्वी का भार उतारने के लिये। शाप के परिणाम और अवतार के प्रयोजन एक ही क्रम में जुड़ गये हैं।
हरि अनंत हरिकथा अनंता । कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
चौपाई २
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥
इसके पहले शिव बताते हैं कि प्रत्येक कल्प में भगवान् के अनेक सुन्दर, सुखद और अलौकिक जन्म तथा कर्म होते हैं। मुनीश्वर उनकी कथाएँ पवित्र काव्यों में गाते हैं और तरह तरह के प्रसंग कहते हैं। समझदार श्रोता इस विविधता पर अचरज नहीं करते। अब हरि और हरिकथा, दोनों का अनन्त होना कहा गया है। करोड़ कल्प भी रामचन्द्र के चरित्रों का पूरा गान नहीं कर सकते। इसलिये हम जिस कारण को अभी सुन चुके हैं, उसे सुनकर आनेवाले दूसरे कारण के लिये जगह बनी रहती है।
पार्वती से शिव इस प्रसंग का आशय भी कहते हैं। ज्ञानी मुनि तक हरिमाया से मोहित हो जाते हैं। प्रभु लीलामय हैं, शरणागत के हितकारी हैं और सेवा करने पर सुलभ हैं। सोरठे में देवता, मनुष्य और मुनि, तीनों को बलवती माया के अधीन रखकर उसके स्वामी का भजन करने को कहा जाता है। नारद के मार्ग पर लौटते हुए यह बात बहुत निकट से समझ आती है: मोह उतरने के बाद उनके सामने डरे हुए गण आये, और मुनि ने उनका आगे का कल्याण कहा।
सार: नारद दोनों गणों को राक्षस जन्म के बाद श्रीहरि के हाथों मृत्यु और मुक्ति का वचन देते हैं। शिव इसे एक कल्प के अवतार का कारण बताते हैं और हरिकथा की अनन्तता कहकर एक और कारण सुनाने की भूमिका बनाते हैं।
राज्य के बीच उठी हुई कमी
शिव गिरिराजकुमारी से कहते हैं कि अब वह विचित्र कथा विस्तार से सुनिये जिसके कारण अजन्मा, निर्गुण और अरूप ब्रह्म कोसलपुरी का राजा हुआ। वे पार्वती को उसी प्रभु की याद दिलाते हैं जिन्हें उन्होंने भाई सहित मुनिवेष में वन में देखा था। सती के शरीर में उनके चरित्र को देखकर जो भ्रम हुआ था, उसकी छाया का भी उल्लेख करते हैं। उन्हीं चरित्रों को अब भ्रमरूपी रोग हरनेवाला कहा गया है। जिस कथा की आवश्यकता पार्वती के प्रश्न से जुड़ी है, उसके आरम्भ में शिव फिर उसी श्रोता की ओर लौटते हैं।
उमा प्रेम से सकुचाकर मुसकराती हैं। इस जगह भरद्वाज का सम्बोधन सुनाई देता है और पोद्दार की टीका वक्ता को याज्ञवल्क्य बताती है। वे भरद्वाज से कहते हैं कि शिव ने जो कहा, वह सब मन लगाकर सुनिये। रामकथा कलियुग का मल हरनेवाली, मंगल करनेवाली और सुहावनी है। फिर कथा मनु और शतरूपा के घर में पहुँचती है। जिनसे अनुपम मानव सृष्टि हुई, उन पति पत्नी के धर्म और आचरण की मर्यादा वेद आज भी गाते हैं।
उनका परिवार भी परिचय में पूरा आता है। पुत्र उत्तानपाद हैं, जिनके पुत्र हरिभक्त ध्रुव हुए। छोटे पुत्र प्रियव्रत की प्रशंसा वेद और पुराण करते हैं। कन्या देवहूति कर्दम मुनि की पत्नी हैं और कृपालु भगवान् कपिल को गर्भ में धारण करती हैं। कपिल तत्त्वविचार में निपुण हैं और सांख्यशास्त्र को प्रकट करके कहते हैं। इस वंश के परिचय के बाद मनु के दीर्घ राज्य की बात आती है। उन्होंने सब प्रकार से भगवान् की आज्ञा का पालन किया। पोद्दार की टीका इसे शास्त्रों की मर्यादा के पालन के रूप में खोलती है।
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
सोरठा १४२
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥ १४२॥
इतने अच्छे आचरण और इतने बड़े परिवार के बीच यह दुःख उठता है। घर में रहते चौथापन आ गया, विषयों से विरक्ति फिर भी नहीं हुई। मनु को लगता है कि हरिभक्ति के बिना जन्म बीत गया। उनकी चिन्ता का अपना स्पष्ट विषय है। राज्य की सफल अवधि के बाद भी हृदय जिस ओर लगना चाहता था, उस ओर पूरा नहीं लगा। उम्र का बढ़ना और वैराग्य का आना दो अलग बातें निकलीं। सोरठे में पहले इसी अन्तर को रखा गया है, फिर उसके कारण उठे दुःख को।
मनु राज्य पुत्र को सौंप देते हैं और शतरूपा सहित वन के लिये चल पड़ते हैं। तुलसी इस सौंपने में दृढ़ आग्रह रखते हैं, टीका उसे जबर्दस्ती राज्य देने के रूप में कहती है। पुत्र का नाम इस अवसर पर नहीं बताया जाता। दोनों के लिये अब जाने की जगह नैमिष है, तीर्थों में श्रेष्ठ, अत्यन्त पवित्र और साधकों को सिद्धि देनेवाला स्थान। वहाँ मुनि और सिद्धों का समाज रहता है। अभी जिस मन में बीतते जीवन का दुःख था, वही मन इस दिशा में चलते समय हर्षित है।
सार: धर्मपूर्वक दीर्घ राज्य के बाद मनु को वृद्धावस्था में भी विषयों से विरक्ति न होने का दुःख होता है। वे पुत्र को राज्य देकर शतरूपा के साथ नैमिष की ओर चलते हैं, जहाँ मुनि और सिद्ध रहते हैं।
दो यात्री, एक अभिलाषा
मार्ग में धीर बुद्धिवाले राजा और रानी को तुलसी ऐसी उपमा देते हैं जैसे ज्ञान और भक्ति ने शरीर धारण किया हो। दोनों साथ चलते दिखाई देते हैं। आगे धेनुमती का तट आता है, जिसे टीका गोमती कहती है। वे निर्मल जल में हर्षपूर्वक स्नान करते हैं। धर्मधुरन्धर राजर्षि को पहचानकर सिद्ध और ज्ञानी मुनि मिलने आते हैं। जहाँ जहाँ सुन्दर तीर्थ हैं, वे आदर से सबका दर्शन कराते हैं। घर से निकलने के बाद उनकी यात्रा संतों के इसी आदर और साथ के भीतर आगे बढ़ती है।
अब उनके शरीर कृश हैं, वस्त्र मुनियों जैसे हैं और प्रतिदिन का समय संत समाज में पुराण सुनने में बीतता है। उसके साथ प्रेमपूर्वक बारह अक्षरों के मन्त्र का जप होता है। मन्त्र का पूरा रूप पोद्दार की टीका ॐ नमो भगवते वासुदेवाय बताती है। दोहे में सबसे अधिक ठहरने की बात उसके बाद आती है। दोनों का मन वासुदेव के चरणकमलों में बहुत लग गया। आरम्भ में मनु जिस भक्ति के बिना जीवन बीत जाने पर दुःखी थे, कथा अब उसी मन के लगने का समाचार देती है।
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
दोहा १४३
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥ १४३॥
वे साग, फल और कन्द का आहार करते हुए सच्चिदानन्द ब्रह्म का स्मरण करते हैं। फिर श्रीहरि के लिये तप आरम्भ करते हैं और मूल फल छोड़कर जल का आधार लेते हैं। भीतर की अभिलाषा लगातार एक ही है: उन परम प्रभु को अपनी आँखों से देखना। जिनका वे दर्शन चाहते हैं, उन्हें निर्गुण, अखण्ड, अनन्त और अनादि कहा गया है। परमार्थ के ज्ञाता उनका चिन्तन करते हैं। जिस स्वरूप का विचार मुनि करते हैं, राजा और रानी उसी को नेत्र भरकर देखने की इच्छा लिये तप में स्थिर हैं।
वेद उनका निरूपण करते हुए नेति नेति कहते हैं। वे निज आनन्दस्वरूप हैं, उपाधि से रहित और अनुपम हैं। उनके अंश से अनेक शिव, ब्रह्मा और विष्णु प्रकट होते हैं। इतने बड़े परिचय के बाद मनु और शतरूपा की आशा का आधार रखा जाता है। ऐसे प्रभु भी सेवक के वश में हैं और भक्त के लिये लीला का शरीर ग्रहण करते हैं। निर्गुण होने की बात सुनकर उनकी दर्शन की इच्छा क्षीण नहीं होती, क्योंकि श्रुति ने भक्त के लिये रूप धारण करने की बात भी कही है।
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई । भगत हेतु लीलातनु गहई॥
चौपाई ३
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा । तौ हमार पूजिहि अभिलाषा॥
उनके विश्वास का वाक्य बहुत सधा हुआ है। यदि वेद का कहा सत्य है, तो हमारी अभिलाषा भी पूरी होगी। यहाँ वे अपने तप का फल पहले से गिनाकर कुछ नहीं माँगते। जिस वचन को उन्होंने सत्य जाना है, उसी पर अपना मनोरथ रखते हैं। उनके सामने समय लम्बा होने वाला है, आहार के सहारे एक एक करके छूटने वाले हैं, और दूसरे वरों के प्रस्ताव भी आयेंगे। इस सबके बीच उन्हें स्थिर रखनेवाली बात अभी कह दी गयी है: भक्त के लिये प्रभु दर्शन का रूप धारण करते हैं।
सार: नैमिष में संतों के साथ रहकर दोनों पुराण सुनते हैं और प्रेम से द्वादशाक्षर मन्त्र जपते हैं। फिर जल के आधार पर तप करते हुए उस अनन्त प्रभु के दर्शन चाहते हैं जो भक्त के लिये लीलाविग्रह धारण करते हैं।
तप के वर्ष, और आकाश से आती वाणी
जल के आहार पर छह हजार वर्ष बीतते हैं। फिर सात हजार वर्ष वायु के आधार पर रहते हैं। दोहे की दो पंक्तियाँ इन दोनों अवधियों को अलग अलग रखती हैं। इसके आगे दस हजार वर्ष वायु का आधार भी छोड़ दिया जाता है। मनु और शतरूपा दोनों एक पैर पर खड़े रहते हैं। कथा में आहार घटता जाता है और प्रतीक्षा बढ़ती जाती है, पर जिस दर्शन के लिये तप किया जा रहा है वह अभिलाषा वही रहती है।
एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार।
दोहा १४४
संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार॥ १४४॥
उनका अपार तप देखकर ब्रह्मा, विष्णु और शिव बार बार समीप आते हैं। वर माँगने को कहते हैं और अनेक प्रकार से उन्हें लुभाते हैं। राजा और रानी परम धैर्यवान् हैं, किसी के डिगाने से डिगते नहीं। यहाँ देवताओं का आना भी तप का अन्त नहीं बनता। जिस प्रभु के दर्शन की इच्छा रखी गयी है, वे उसी पर स्थिर रहते हैं। देह हड्डियों का ढाँचा भर रह गया है, फिर भी मन में तनिक पीड़ा नहीं है। तुलसी शरीर की दशा और मन की दशा दोनों बताते हैं, ताकि इस स्थिरता का पूरा अर्थ सामने रहे।
इसके बाद सर्वज्ञ प्रभु इन तपस्वी राजा और रानी को अपने दास जानते हैं। उनके लिये अनन्य गति कहा गया है, उनका आश्रय एक ही है। इसी पहचान के बाद आकाशवाणी होती है। स्वर अत्यन्त गम्भीर है और कृपा के अमृत से सना हुआ है। उसमें फिर वर माँगने की बात है। पहले भी वर का प्रस्ताव आया था, अब जिस वाणी को वे सुनते हैं उसका प्रभाव उनके कान से हृदय तक पहुँचता है और उनके पूरे शरीर पर दिखाई देता है।
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥
चौपाई ४
मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥
यह वाणी मृतक को भी जिला देनेवाली कही गयी है। कानों के छिद्रों से भीतर जाते ही राजा और रानी के तन सुन्दर और हृष्ट पुष्ट हो जाते हैं। अभी वे हड्डियों का ढाँचा थे, अब ऐसे दिखाई देते हैं मानो घर से निकलकर अभी आये हों। इतने लम्बे तप के बाद यह घर से आने की उपमा बहुत कोमल पड़ती है। भगवान् की वाणी सुनने के लिये दुर्बल हुए शरीर को भी नया बल मिलता है। दर्शन की विनती करनेवाले अब उसी विनती को कह पाने की दशा में खड़े हैं।
कानों में पड़े अमृत जैसे वचन से रोमांच होता है, अंग प्रफुल्लित होते हैं और मनु दण्डवत् करके बोलने लगते हैं। प्रेम हृदय में समा नहीं रहा। आकाशवाणी ने वर माँगने को कहा था, इसलिये अब उनकी सारी प्रतीक्षा शब्द पा सकती है। फिर भी उनकी पहली प्रार्थना पुत्र के लिये नहीं है। तप में जिस देखने की अभिलाषा को वे लिये रहे, उसी का पूरा होना अभी माँगते हैं। इस क्रम से हम समझते हैं कि आगे का बड़ा वर किस दर्शन के बाद कहा जाने वाला है।
सार: छह हजार वर्ष जल, सात हजार वर्ष वायु और फिर दस हजार वर्ष वायु का भी आधार छोड़कर तप होता है। प्रभु की आकाशवाणी सुनते ही दोनों के दुर्बल शरीर पुष्ट हो जाते हैं और मनु प्रेम से दर्शन की विनती करते हैं।
जिस रूप को नेत्र भरकर देखना है
मनु प्रभु को सेवकों का कल्पवृक्ष और कामधेनु कहते हैं। उनकी चरणरज को ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी प्रणाम करते हैं। वे सेवा करने पर सुलभ, सब सुखों के दाता, शरणागत के रक्षक और चर अचर के स्वामी हैं। इस स्तुति के बाद मनु अपनी बात रखते हैं: यदि अनाथों का हित करनेवाले प्रभु को हम पर स्नेह है, तो प्रसन्न होकर वह वर दीजिये जिसके लिये हम आये हैं। विनती के भीतर अपने ऊपर कृपा की आशा है, और सामनेवाले के देने की सामर्थ्य का पूरा विश्वास है।
वे उस रूप को माँगते हैं जो शिव के मन में बसता है और जिसे पाने के लिये मुनि यत्न करते हैं। उसी को काकभुशुण्डि के मनरूपी मानसरोवर का हंस कहा गया है। वेद सगुण और निर्गुण कहकर जिसकी प्रशंसा करते हैं, उसी का दर्शन चाहिये। इस प्रार्थना में भीतर बसे हुए रूप से नेत्रों के सामने आनेवाले रूप तक की इच्छा है। मनु यह भी कहते हैं कि नेत्र भरकर देख सकें। बहुत समय तक स्मरण और चिन्तन के बाद अब देखने की तृप्ति माँगी जा रही है।
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥
चौपाई ५
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन । कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥
पति पत्नी के ये वचन प्रभु को परम प्रिय लगते हैं। तुलसी उनके तीन गुण साथ कहते हैं, कोमलता, विनय और प्रेमरस। भक्तवत्सल, कृपा के निधान, समस्त विश्व के निवासस्थान भगवान् प्रकट हो जाते हैं। जिनका वर्णन अभी अनन्त और उपाधिरहित कहकर हो रहा था, उनका अब रंग दिखाई देता है। नीला कमल, नीलमणि और जलभरा नीला मेघ, तीन उपमाएँ एक श्याम शरीर की शोभा के लिये आती हैं। पोद्दार की टीका इनसे क्रमशः कोमलता, प्रकाश और सरसता का भाव खोलती है।
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।
दोहा १४६
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥ १४६॥
उनकी तन शोभा देखकर करोड़ों कामदेव लजा जाते हैं। फिर वर्णन मुख पर ठहरता है। शरद का चन्द्रमा है, सौन्दर्य की सीमा है। गाल और ठोड़ी सुन्दर हैं, गला शंख के समान है। लाल अधर, सुन्दर दाँत और नासिका हैं, और हँसी चन्द्रमा की किरणों को पीछे छोड़ देती है। नेत्र नये कमल जैसे हैं। चितवन इतनी मनोहर है कि जी को प्रिय लगती है। भौंहों के सामने कामदेव के धनुष की छवि फीकी होती है, और ललाट पर तिलक प्रकाश करता है।
कानों में मकर के आकार के कुण्डल हैं और सिर पर मुकुट है। घुँघराले केश भौंरों के झुंड जैसे दिखाई देते हैं। वक्ष पर श्रीवत्स, वनमाला, रत्नों का हार और मणियों के आभूषण हैं। सिंह के समान गर्दन, सुन्दर जनेऊ और भुजाओं पर भूषण हैं। हाथी की सूँड़ के समान भुजदण्डों के साथ कमर में तरकस और हाथ में धनुष बाण दिखाई देते हैं। यह दर्शन अपने पूरे रूप में आता है, आभूषणों और आयुधों सहित। मनु ने नेत्र भरकर देखने को कहा था, और कथा प्रत्येक अंग पर दृष्टि को ठहरने देती है।
पीला वस्त्र बिजली की आभा को लजाता है। उदर पर तीन सुन्दर रेखाएँ हैं और नाभि में यमुना के भँवर की छवि झलकती है। इतने उपमानों के बाद चरणों पर पहुँचकर कवि कहता है कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। मुनियों के मनरूपी भौंरे उन्हीं चरणकमलों में बसते हैं। ऊपर के अंगों को देखने के लिये चन्द्रमा, कमल, मेघ और मणि के चित्र मिले थे। चरणों का परिचय यह है कि मुनियों का मन वहाँ वास करता है। दर्शन धीरे धीरे उसी आश्रय तक पहुँच गया है।
सार: मनु शिव के हृदय में बसे और वेदों द्वारा प्रशंसित रूप को नेत्र भरकर देखने का वर माँगते हैं। प्रभु प्रकट होते हैं, और श्याम तन, मुख, आभूषण, धनुष बाण, पीताम्बर तथा चरणकमलों का विस्तृत दर्शन मिलता है।
बायें भाग में सीता, सामने दो भक्त
प्रभु के बायें भाग में आदिशक्ति सुशोभित हैं। वे सदा अनुकूल रहनेवाली, सौन्दर्य की राशि और जगत् की मूल हैं। उनके अंश से गुणों की खान अगणित लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी उत्पन्न होती हैं। भौंह के संकेत से जगत् की रचना होती है। इन्हीं को तुलसी राम की बायीं ओर स्थित सीता कहते हैं। दर्शन में प्रभु के साथ जगत् की आदिशक्ति भी उपस्थित हैं, और आगे अवतार के वचन में उनका फिर उल्लेख होगा। यहाँ उनके स्वरूप का परिचय अभी पूरा दिया जाता है।
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
चौपाई ६
भृकुटि बिलास जासु जग होई । राम बाम दिसि सीता सोई॥
मनु और शतरूपा छवि के इस समुद्र को देखकर पलकें रोके एकटक रह जाते हैं। आदर से अनुपम रूप देखते हैं और तृप्त नहीं होते। पहले उन्होंने नेत्र भरकर देखने की प्रार्थना की थी। प्रार्थना पूरी है, पर देखने की चाह पूरी होकर समाप्त नहीं हो रही। तुलसी दोनों की आँखों पर ध्यान रखते हैं, फिर उनके शरीर की सुधि छूटने की बात कहते हैं। हर्ष इतना है कि वे अपनी दशा भूल जाते हैं और दोनों हाथों से चरण पकड़कर दण्ड की तरह धरती पर गिर पड़ते हैं।
प्रभु अपने करकमलों से उनके सिर छूते हैं और तुरन्त उठा लेते हैं। इस स्पर्श के पहले बहुत लम्बा तप है, फिर आकाशवाणी है, फिर दर्शन है। अब दर्शन देनेवाले के हाथ उनके मस्तकों पर हैं। कथा इसी निकटता में अगला संवाद आरम्भ करती है। कृपानिधान कहते हैं कि मुझे अत्यन्त प्रसन्न जानिये, बड़ा दानी मानिये और मन को जो भाये वही वर माँगिये। इस बार वर का प्रस्ताव उस रूप के सामने है जिसे वे इतने वर्षों से देखना चाहते थे।
मनु दोनों हाथ जोड़ते हैं और धीरज धरकर कोमल वाणी बोलते हैं। वे कहते हैं कि आपके चरणकमल देखकर हमारी सारी कामनाएँ पूरी हो गयीं। अभी शरीर की सुधि चली गयी थी, इसलिये बोलने से पहले धीरज का आना भी कथा कहती है। दर्शन का सुख पूरा अनुभव कर लेने के बाद ही हृदय की दूसरी लालसा का उल्लेख होगा। प्रभु ने मन के अनुकूल माँगने को कहा है, और मनु को अब वह बात कहनी है जो देनेवाले के लिये सहज है, पर माँगनेवाले को बहुत बड़ी लगती है।
सार: राम के बायें भाग में सीता आदिशक्ति के रूप में दर्शन देती हैं। मनु और शतरूपा निहारते अघाते नहीं, चरण पकड़कर गिर पड़ते हैं और प्रभु उन्हें उठाकर मनभावन वर माँगने को कहते हैं।
आपके समान पुत्र
मनु कहते हैं कि हृदय में एक बड़ी लालसा है, जिसे सहज या कठिन कहकर ठीक से बताया नहीं जाता। प्रभु के लिये उसे पूरा करना अत्यन्त सुगम है, अपने दीनपन से उन्हें वही अगम लगता है। देने की सामर्थ्य पर प्रश्न नहीं है, माँगने का संकोच रोक रहा है। सामने दर्शन हो चुका है, चरणों का स्पर्श मिल चुका है और प्रभु स्वयं मनभावन वर माँगने को कह चुके हैं। फिर भी राजा को अपना मनोरथ सीधा कहने में इतना समय लगता है।
इस झिझक के लिये मनु दरिद्र और कल्पवृक्ष की उपमा देते हैं। दरिद्र कल्पवृक्ष पा ले, फिर भी बड़ी सम्पत्ति माँगने में सकुचाये, क्योंकि वृक्ष का प्रभाव नहीं जानता। अपने हृदय का संशय उन्हें वैसा ही लगता है। कुछ देर पहले उन्होंने प्रभु को सेवकों का कल्पवृक्ष कहा था। अब उसी कल्पवृक्ष के सामने अपने को दरिद्र मान रहे हैं। स्तुति में जो सामर्थ्य कही गयी थी, अपनी माँग के समय उसी को पूरा मान पाने के लिये मन को धीरज चाहिये।
वे अन्तर्यामी से कहते हैं कि आप मन की बात जानते हैं, हमारा मनोरथ पूरा कीजिये। भगवान् फिर संकोच छोड़कर माँगने को कहते हैं। ऐसा कुछ नहीं है जो वे राजा को दे न सकें। इस उत्तर में अब कोई छोटा वर चुन लेने की आवश्यकता नहीं बचती। मनु अपने मन का सच्चा भाव कहते हैं और साथ यह भी जोड़ते हैं कि प्रभु से क्या छिपाना। इतनी प्रस्तावना के बाद जिस लालसा का नाम आता है, वह एक पुत्र है, ऐसा पुत्र जो स्वयं प्रभु के समान हो।
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।
दोहा १४९
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥ १४९॥
राजा की प्रीति देखकर और उनके अमूल्य वचन सुनकर करुणानिधान कहते हैं कि ऐसा ही हो। फिर उस समानता का उत्तर देते हैं जिसे मनु ने माँगा था। अपने जैसा दूसरा कहाँ खोजने जाएँ। वे स्वयं आकर राजा के पुत्र होंगे। वरदान में पुत्र का सम्बन्ध स्वीकार होता है और उसे निभाने के लिये भगवान् अपने आने का वचन देते हैं। जिस माँग को मनु अपनी दीनता के कारण कह नहीं पा रहे थे, वही प्रभु को इतनी प्रिय लगी कि उत्तर में अपना अवतरण निश्चित कर दिया।
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले । एवमस्तु करुनानिधि बोले॥
चौपाई ७
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई । नृप तव तनय होब मैं आई॥
इस संवाद को उसके आरम्भ से साथ रखिये। पहले नेत्रों से देखने की इच्छा थी, फिर सामने प्रकट हुए प्रभु को देखकर सब कामनाएँ पूरी होने की बात कही गयी, और अब उसी प्रभु को पुत्र के रूप में पाने की प्रार्थना है। दर्शन से उठी तृप्ति के भीतर सम्बन्ध की लालसा भी है। मनु उसे छिपाकर नहीं रखते। भगवान् के प्रसन्न होने और खुलकर माँगने को कहने के बाद वे अपनी चाह का पूरा आकार सामने रखते हैं, और उत्तर भी उतना ही स्पष्ट मिलता है।
सार: संकोच छोड़कर मनु भगवान् के समान पुत्र माँगते हैं। प्रभु उनकी प्रीति स्वीकार करके कहते हैं कि अपने समान दूसरा कहाँ खोजें, वे स्वयं आकर उनके पुत्र होंगे।
शतरूपा का विवेक और भक्ति का वर
शतरूपा हाथ जोड़े खड़ी हैं। प्रभु उनकी ओर देखकर उन्हें भी इच्छानुसार वर माँगने को कहते हैं। वे राजा की माँग से प्रसन्न हैं और कहती हैं कि चतुर राजा ने जो वर माँगा, वह हमें बहुत प्रिय लगा। फिर उस माँग में छिपी बड़ी बात अपने शब्दों में सामने रखती हैं। यह बहुत ढिठाई है, यद्यपि भक्तों का हित करनेवाले प्रभु को ऐसी ढिठाई भी सुहाती है। पति की प्रार्थना स्वीकार करते हुए वे अपने मन में उठनेवाला प्रश्न भी पूरा कहती हैं।
प्रभु ब्रह्मा आदि के जनक, जगत् के स्वामी और सबके हृदय की बात जाननेवाले ब्रह्म हैं। ऐसे सर्वजनक को पुत्र मानने की बात सोचकर संशय उठता है। शतरूपा साथ ही उसके सामने प्रमाण भी रख देती हैं: प्रभु ने जो कहा, वही सत्य है। उनका वचन मिल चुका है, अब रानी उस वचन के साथ रहने योग्य भक्ति माँगती हैं। वे प्रभु के निज भक्तों का स्मरण करती हैं, उन्हें जो सुख मिलता है और जिस गति को वे पाते हैं, उसी की इच्छा कहती हैं।
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।
दोहा १५०
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥ १५०॥
सुख, गति, भक्ति, चरणों में स्नेह, विवेक और रहनि, छह बातें एक ही विनती में साथ आती हैं। प्रत्येक के पहले वही कहा गया है। माप प्रभु के निज भक्तों का है। शतरूपा उनके समान पाने, प्रेम करने, समझने और रहने की कृपा चाहती हैं। रहनि का आना इस प्रार्थना को दैनिक आचरण तक पहुँचाता है। विवेक का अर्थ पोद्दार की टीका ज्ञान करती है, और उसके साथ जीवन बिताने की रीति भी माँगी गयी है। पुत्र का वर मिलने के बाद रानी अपने पूरे जीवन के लिये यह सहारा चाहती हैं।
प्रभु उनकी कोमल, गूढ़ और मनोहर वाणी सुनकर कोमल शब्दों में उत्तर देते हैं। मन में जो कुछ रुचि है, वह सब दे दिया, अब संशय न रहे। फिर उन्हें माता कहकर सम्बोधित करते हैं और आश्वासन देते हैं कि कृपा से उनका अलौकिक विवेक कभी नहीं मिटेगा। पुत्र बनकर आने का वचन पहले दिया गया था, माता का सम्बोधन इसी संवाद में आ गया। शतरूपा ने प्रभु की व्यापकता पहचानी थी, और अब उसी पहचान के स्थिर रहने का वर मिलता है। सम्बन्ध की निकटता और प्रभु का ज्ञान उनके लिये साथ रखे गये हैं।
सार: शतरूपा राजा के वर को प्रिय मानकर प्रभु के निज भक्तों का सुख, गति, भक्ति, चरणप्रेम, विवेक और रहनि माँगती हैं। भगवान् सब स्वीकार करते हैं और माता कहकर उनके अलौकिक विवेक के कभी न मिटने का वचन देते हैं।
पुत्र के बिना जीवन न रहे
अब मनु फिर चरणों की वन्दना करते हैं। एक विनती और रह गयी है। वे प्रभु के चरणों में पुत्र के प्रति पिता जैसी प्रीति चाहते हैं। कोई उन्हें बड़ा मूर्ख कहे तो भी यह प्रेम मिले। पुत्र पाने का वर पहले मिल गया था, अब उस सम्बन्ध में अपने हृदय की दशा माँग रहे हैं। शतरूपा की विनती के बाद मनु की यह बात अपनी अलग आकांक्षा के साथ सुनाई देती है। दोनों प्रभु को पुत्र के रूप में पाना चाहते हैं, और दोनों अपने प्रेम का आश्रय उन्हीं से माँगते हैं।
मनु अपने जीवन के लिये दो उपमाएँ रखते हैं, मणि के बिना सर्प और जल के बिना मछली। उनका जीवन ऐसा ही प्रभु के अधीन रहे, प्रभु के बिना रह न सके। पुत्र का सम्बन्ध कितना प्रगाढ़ हो, इसे कहने के लिये वे अपने जीवन तक की निर्भरता बता देते हैं। ऐसा वर माँगकर चरण पकड़े रहते हैं। करुणानिधान फिर कहते हैं कि ऐसा ही हो। इसके बाद आदेश मिलता है कि अब उनकी आज्ञा मानकर इन्द्र की राजधानी में जाकर निवास करें।
तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि।
सोरठा १५१
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥ १५१॥
सोरठे में आगे का क्रम स्पष्ट है। वहाँ बहुत से भोग भोगकर कुछ समय बीतने पर मनु अवध के राजा होंगे, तब भगवान् उनके पुत्र होंगे। अभी मिले वर और भावी जन्म के बीच यह निवास रखा गया है। इन्द्र की राजधानी से अवध का राज्य, और वहाँ पुत्ररूप में प्रभु का आना, सब उनके वचन में कहा जा चुका है। राजा के अगले नाम का यहाँ उल्लेख नहीं है। मनु अभी चरणों के निकट हैं और अपने भविष्य का यह विधान सुन रहे हैं।
सार: मनु ऐसा पुत्रप्रेम माँगते हैं जिसमें उनका जीवन प्रभु के बिना रह न सके। भगवान् इसे स्वीकार करके पहले इन्द्र की राजधानी और फिर अवध के राज्य का क्रम बताते हैं, जहाँ वे पुत्र बनकर आयेंगे।
सत्य वचन और अमरावती का निवास
प्रभु आगे बताते हैं कि अपनी इच्छा से मनुष्य का वेश धारण करके राजा के घर प्रकट होंगे। अपने अंशों सहित देह लेकर भक्तों को सुख देनेवाले चरित्र करेंगे। इस वचन में जन्म के साथ उन चरित्रों का प्रयोजन भी जुड़ा है। बड़े भाग्यवाले मनुष्य आदर से उन्हें सुनेंगे, ममता और मद त्यागेंगे और भवसागर पार करेंगे। मनु और शतरूपा की अपनी अभिलाषा से निकला संवाद इस जगह उन श्रोताओं तक पहुँचता है जो आगे इस कथा को सुनने वाले हैं।
आदिशक्ति का अवतरण भी इसी वचन में है। प्रभु कहते हैं कि जगत् उत्पन्न करनेवाली यह मेरी माया भी अवतार लेगी। दर्शन में बायें भाग में सीता को जगत् की मूल आदिशक्ति के रूप में दिखाया गया था। अब उनके अवतरण का आश्वासन मिलता है। भगवान् कहते हैं कि राजा की अभिलाषा पूरी करेंगे और अपने प्रण की सत्यता तीन बार कहते हैं। इसके बाद भी बार बार वही आश्वासन देकर अन्तर्धान होते हैं। विदा के समय भक्तों के पास वही वचन रह जाता है जिसे स्वयं प्रभु ने इतना दृढ़ करके कहा।
पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा । सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥
चौपाई ८
पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥
मनु और शतरूपा भक्तों पर कृपा करनेवाले प्रभु को हृदय में धारण करके कुछ समय उसी आश्रम में रहते हैं। दर्शन के समय वे नेत्रों के सामने थे, अब हृदय में हैं। उचित समय आने पर दोनों सहज ही शरीर छोड़ देते हैं और अमरावती में जाकर निवास करते हैं। पहले आदेश में इन्द्र की राजधानी कही गयी थी, यहाँ उसका नाम भी आ जाता है। वचन का पहला पड़ाव पूरा होता है। कथा अभी अवध में उनके नये जन्म तक नहीं पहुँचती, अमरावती के निवास पर इस इतिहास का अन्त करती है।
यह इतिहास पुनीत अति उमहि कही बृषकेतु।
दोहा १५२
भरद्वाज सुनु अपर पुनि राम जनम कर हेतु॥ १५२॥
अन्तिम दोहा हमें फिर कथा सुनने के स्थान पर लौटा देता है। याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कहते हैं कि शिव ने यह अत्यन्त पवित्र इतिहास उमा को सुनाया था। अब रामजन्म का एक और कारण सुनिये। आरम्भ में नारद और गणों की कथा के बाद भी दूसरे कारण का आमन्त्रण था। अन्त में वही खुलापन बना है। मनु और शतरूपा का वरदान अपना पूरा अर्थ पाकर समाप्त हुआ, और हरि के अनन्त चरित्रों की कथा आगे सुनाने की तैयारी हो गयी।
सार: भगवान् अपने अंशों और आदिशक्ति सहित अवतरण का सत्य वचन देकर अन्तर्धान होते हैं। दोनों कुछ समय आश्रम में रहकर सहज शरीर त्यागते हैं और अमरावती जाते हैं। फिर याज्ञवल्क्य भरद्वाज को रामजन्म का एक और कारण सुनाने को कहते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
मनु के लिये जिस कमी से यह यात्रा आरम्भ हुई थी, वह वृद्धावस्था का आना था और भक्ति का पूरा न लगना। उसके बाद का रास्ता साथ चलने, संत समाज में सुनने, जपने, तप करने और दर्शन पाने से बनता है। अन्त में वही मनु पुत्र के प्रति पिता जैसा प्रेम माँगते हैं, जिसमें जीवन प्रभु के बिना रह न सके। हृदय का न लगना उन्हें घर से ले गया था। अब हृदय ऐसी प्रीति चाहता है जिसके अधीन उनका पूरा जीवन हो। इन दोनों विनतियों को साथ सुनें तो इतने लम्बे तप का फल बहुत स्पष्ट दिखाई देता है।
शतरूपा के शब्द भी अपने पूरे आकार में याद रखने योग्य हैं। वे पुत्र का वर प्रिय मानती हैं, प्रभु को जगत् का जनक भी जानती हैं और उनके वचन को प्रमाण मानकर निज भक्तों की रहनि तक माँगती हैं। इस प्रसंग में प्रेम को समझ की आवश्यकता महसूस होती है और समझ के साथ स्नेह की इच्छा बनी रहती है। उत्तर में प्रभु उन्हें माता कहते हैं और अलौकिक विवेक के बने रहने का आश्वासन देते हैं। जिस सम्बन्ध में वे आने वाले हैं, उसकी आत्मीयता इसी सम्बोधन में अभी से सुनाई देती है।
प्रभु का अन्तिम आश्वासन सत्य प्रण का है। उसके सहारे मनु और शतरूपा आश्रम में कुछ समय रहते हैं और फिर अमरावती पहुँचते हैं। उनके सामने आगे अवध है और पुत्ररूप में वही दर्शन है जिसे वे नेत्र भरकर देख चुके हैं। अभी उस आगमन का वचन मिला है, और दोनों उसे हृदय में धारण करके अपना अगला पड़ाव पार करते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १३९ से १५२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।