रामचरितमानस · बालकाण्ड · प्रतापभानु का आखेट और कपटी तपस्वी
प्रतापभानु का आखेट और कपटी तपस्वी
सात द्वीपों का विजेता एक सूअर के पीछे वन में अकेला पड़ जाता है। जिस आश्रम में उसे जल और आसन मिलता है, वहाँ बैठा व्यक्ति उसे पहचान चुका है।
वन में एक आश्रम है और उसके भीतर दो राजा मिलते हैं। एक प्यास से बेहाल होकर आया है, दूसरे ने तपस्वी का वेष पहन रखा है। आनेवाला प्रणाम करता है। सामनेवाला उसे पहचान लेता है। दोनों के बीच यही असमानता आगे की बातचीत में बनी रहती है: जिसे मुनि समझा गया है, वह पुराना शत्रु है; जिसे अपना नाम छिपाने का भरोसा है, उसका परिचय पहले ही खुल चुका है। अभी उस आश्रम तक पहुँचने में समय है। तुलसीदास पहले वह राज्य दिखाते हैं जिसका स्वामी थोड़ी देर में वन में भटक रहा होगा।
बालकाण्ड की यह पुरानी और पवित्र कथा शिव ने पार्वती से कही थी। इसकी शुरुआत कैकय देश से होती है, जहाँ सत्यकेतु अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर हरि के लिये वन चले जाते हैं। उनके पुत्र प्रतापभानु को योग्य मन्त्री, वीर भाई और विशाल सेना का साथ मिलता है। विजय के बाद सुखी प्रजा, दान, यज्ञ और निष्काम धर्म का विस्तार है। फिर एक दिन आखेट के बीच दौड़ शुरू होती है, और उस दौड़ के अन्त में ऐसा आतिथ्य मिलता है जिसके भीतर पुराना वैर अभी सुलग रहा है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- प्रतापभानु सत्यकेतु के ज्येष्ठ पुत्र और कैकय के राजा, जो धर्मपूर्वक राज्य करते हैं और आखेट में भटककर एक आश्रम पहुँचते हैं।
- सत्यकेतु धर्म, नीति और बल से सम्पन्न राजा, जो बड़े पुत्र को राज्य सौंपकर हरि के लिये वन जाते हैं।
- अरिमर्दन प्रतापभानु के छोटे भाई, अतुल भुजबलवाले वीर, जिनका अपने भाई से छलरहित प्रेम है।
- धर्मरुचि राजा का हित चाहनेवाले बुद्धिमान् मन्त्री, जिनका श्रीहरि के चरणों में प्रेम है।
- कपटी तपस्वी प्रतापभानु से हारा हुआ एक राजा, जो वन में मुनिवेष धारण किये है और अपना नाम भिखारी बताता है।
कैकय का राज्य और दो भाइयों का प्रेम
कथा सुनने के निमन्त्रण में पहले ही उसका सम्बन्ध बता दिया जाता है: शिव ने यह वृत्तान्त गिरिजा से कहा था। इसके बाद संसार में प्रसिद्ध कैकय देश का नाम आता है और वहाँ राज्य करनेवाले सत्यकेतु का। उनके परिचय में तुलसी धर्म और नीति को साथ रखते हैं, फिर तेज, प्रताप, शील और बल को। जिस घर में आगे प्रतापभानु का जन्मपरिचय मिलेगा, उसकी नींव इन गुणों पर रखी गयी है। राजा के पास बल है और उस बल के साथ आचरण की मर्यादा भी है।
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी । जो गिरिजा प्रति संभु बखानी॥
चौपाई १
बिस्व बिदित एक कैकय देसू । सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू॥
सत्यकेतु के दो पुत्र हैं। दोनों वीर, गुणों के धाम और बड़े रणधीर हैं। बड़े पुत्र का नाम प्रतापभानु है और वही राज्य का उत्तराधिकारी है। छोटे पुत्र अरिमर्दन का भुजबल अतुल है, युद्ध में वे अटल रहते हैं। दोनों के सामर्थ्य का उल्लेख करने के बाद कवि उनके आपसी सम्बन्ध पर रुकते हैं। भाई और भाई में बड़ा मेल है, और उस प्रेम में दोष तथा छल का प्रवेश नहीं है। इतना बल दो व्यक्तियों के पास है, फिर भी घर का परिचय उनके मेल से पूरा होता है।
भाइहि भाइहि परम समीती। सकल दोष छल बरजित प्रीती॥
चौपाई २
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा । हरि हित आपु गवन बन कीन्हा॥
सत्यकेतु जेठे पुत्र को राज्य दे देते हैं और स्वयं हरि के लिये वन चले जाते हैं। इस हस्तान्तरण में राज्य पाने को लेकर कोई संघर्ष नहीं दिखाया गया है। पिता अपना कर्तव्य पूरा करके जाते हैं, पुत्र उत्तराधिकार पाता है, छोटा भाई प्रेम से जुड़ा रहता है। आगे वन में एक दूसरे राजा का छोड़ा हुआ राज्य याद आयेगा। अभी यहाँ वनगमन का कारण हरि हैं, और राजघराने के भीतर सम्बन्ध अपनी जगह व्यवस्थित हैं। इसी शान्त क्रम से प्रतापभानु का शासन आरम्भ होता है।
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस।
दोहा १५३
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस॥ १५३॥
राजा बनते ही देश में प्रतापभानु की दुहाई फिर जाती है। शासन का स्वरूप दोहे की दूसरी पंक्ति में स्पष्ट है: वे वेद की विधि के अनुसार प्रजा का बहुत अच्छी तरह पालन करते हैं, और पाप का कहीं लेश नहीं रहता। यह उस व्यक्ति के जीवन की आरम्भिक स्थिति है जिसे हम आगे प्यासा और असहाय देखेंगे। तुलसी ने उसके गुण पहले सामने रख दिये हैं। बाद की विपत्ति पढ़ते समय यह धर्ममय परिचय हमारे साथ बना रहेगा, क्योंकि वन में पहुँचनेवाला वही प्रजापालक है जिसका राज्य अभी इतना सुचारु चल रहा है।
सत्यकेतु के पुत्र प्रतापभानु और अरिमर्दन बलवान् हैं और आपस में छलरहित प्रेम रखते हैं। पिता बड़े पुत्र को राज्य देकर हरि के लिये वन जाते हैं। प्रतापभानु वेदविधि से प्रजा का पालन करते हैं।
विजय की सेना और लौटता हुआ राजा
नये राजा के साथ धर्मरुचि नाम के मन्त्री हैं। वे राजा का हित चाहते हैं और बुद्धि में शुक्र के समान कहे गये हैं, जिन्हें टीका शुक्राचार्य कहती है। मन्त्री की समझ, भाई का बल और स्वयं प्रतापभानु का प्रताप, ये साथ रखे जाते हैं। राज्य का सामर्थ्य इस पूरे सहयोग में दिखाई देता है। राजा रणधीर हैं और उनके निकट ऐसा व्यक्ति है जो सलाह दे सकता है, ऐसा भाई है जो युद्ध में अटल है। अगले ही क्षण विशाल चतुरंगिणी सेना सामने आ जाती है।
सेना में असंख्य सुभट हैं, सब रण में जूझनेवाले। उसे देखकर राजा प्रसन्न होते हैं और नगाड़े घमाघम बज उठते हैं। इस बार चलना विजय के लिये है। सेना सजायी जाती है, शुभ दिन साधा जाता है, फिर डंका बजाकर प्रतापभानु निकलते हैं। यहाँ यात्रा के आरम्भ में तैयारी भी है और सबका साथ भी। जिस राजा का आगे अकेलापन इतना तीखा लगेगा, उसके प्रस्थान का यह पहला चित्र साथ रखने योग्य है: उसके पीछे अपार सेना है, और उसकी गति के साथ नगाड़ों की ध्वनि है।
जहाँ तहाँ अनेक लड़ाइयाँ होती हैं। प्रतापभानु राजाओं को अपने बल से जीत लेते हैं और सातों द्वीप उनके वश में आ जाते हैं। टीका द्वीपों का आशय भूमिखण्डों से खोलती है। जीते हुए राजाओं से दण्ड, अर्थात् कर लेकर उन्हें छोड़ दिया जाता है। विजयी राजा की प्रभुता स्वीकार कर ली जाती है और वे लौट सकते हैं। इतनी बड़ी विजय का विवरण तुलसी बहुत कम पंक्तियों में रख देते हैं। आगे एक अकेले पशु का पीछा इससे अधिक देर चलेगा।
सप्त दीप भुजबल बस कीन्हे । लै लै दंड छाड़ि नृप दीन्हे॥
चौपाई ३
सकल अवनि मंडल तेहि काला । एक प्रतापभानु महिपाला॥
उस समय सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल के एकमात्र राजा के रूप में प्रतापभानु का नाम आता है। अपनी भुजाओं के बल से संसार को वश में करके वे अपने नगर में प्रवेश करते हैं। विजय के बाद कथा नगर में लौटती है, जहाँ राजा अर्थ, धर्म और काम आदि के सुखों का समयानुसार सेवन करते हैं। समय का ध्यान इस सुखभोग के साथ जुड़ा है। शासन, धर्म और जीवन के सुख अपनी अपनी जगह आते हैं। युद्ध की सफलता से कथा सीधे वन की दुर्घटना पर नहीं पहुँचती। बीच में उस शासन के फल दिखाये जाने हैं।
स्वबस बिस्व करि बाहुबल निज पुर कीन्ह प्रबेसु।
दोहा १५४
अरथ धरम कामादि सुख सेवइ समयँ नरेसु॥ १५४॥
बुद्धिमान् धर्मरुचि, वीर अरिमर्दन और अपार सेना के साथ प्रतापभानु विजय के लिये निकलते हैं। सातों द्वीप वश में करके, राजाओं से कर लेकर, वे नगर लौटते हैं और समयानुसार अर्थ, धर्म तथा काम के सुखों का सेवन करते हैं।
समृद्धि, सेवा और फल की कामना से रहित धर्म
प्रतापभानु का बल पाकर भूमि सुन्दर कामधेनु हो गयी है। टीका कामधेनु का अर्थ मनचाही वस्तु देनेवाली कहकर बताती है। विजय से मिले बल का असर अब प्रजा के जीवन में दिखाई पड़ता है। लोग दुःखों से रहित और सुखी हैं, स्त्री पुरुष सुन्दर और धर्मशील हैं। राजा की उपलब्धि का विस्तार नगर के भीतर बसनेवालों तक पहुँचता है। पहले भुजाओं के बल से सात द्वीप वश में हुए थे, अब उसी राजा के संरक्षण में धरती सम्पन्नता देती है।
भूप प्रतापभानु बल पाई । कामधेनु भै भूमि सुहाई॥
चौपाई ४
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी । धरमसील सुंदर नर नारी॥
धर्मरुचि का परिचय यहाँ फिर आता है और पहले परिचय में एक नया गुण जुड़ता है। उनकी श्रीहरि के चरणों में प्रीति है। वे प्रतापभानु के हित के लिये नित्य नीति सिखाते हैं। विजय कर चुके राजा के लिये भी सीखना बना हुआ है। मन्त्री का काम युद्ध से पहले की सलाह तक सीमित नहीं हुआ। वह रोज़ राजा का हित देखते हुए नीति कहता है, और उसका अपना हृदय हरि में लगा है। इस प्रकार राज्य का बाहरी बल और उसके भीतर चलती हुई शिक्षा एक साथ दिखाई देते हैं।
राजा गुरु, देवता, संत, पितर और ब्राह्मणों की सेवा करते रहते हैं। वेदों ने राजा के लिये जो धर्म कहे हैं, उन्हें आदर से निभाते हैं और निभाने में सुख मानते हैं। प्रतिदिन विविध प्रकार के दान होते हैं, उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुने जाते हैं। इस विवरण में बार बार किये जानेवाले काम हैं। नित्य की नीति, सदा की सेवा, प्रतिदिन का दान और शास्त्रश्रवण, इनसे शासन की नियमित गति बनती है। कोई एक अवसर का पुण्यकर्म देकर राजा का चरित्र पूरा नहीं किया गया।
सेवा का कुछ अंश धरती पर बने हुए स्थानों में भी दिखता है। अनेक बावलियाँ, कुएँ और तालाब बनवाये गये हैं। फूलों की वाटिकाएँ और सुन्दर बगीचे हैं। तीर्थों में ब्राह्मणों के लिये घर और देवताओं के सुहावने मन्दिर बनते हैं। जल के स्थान, रहने के घर और उपासना के भवन, सबका उल्लेख एक साथ आता है। जिस समृद्ध भूमि की बात अभी हुई थी, उसका यह ठोस रूप है। राजा की उदारता केवल दान देते हुए हाथ तक नहीं रुकती, उसके बनवाये स्थानों में भी बनी रहती है।
जहँ लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग।
दोहा १५५
बार सहस्र सहस्र नृप किए सहित अनुराग॥ १५५॥
वेद और पुराणों में जितने प्रकार के यज्ञ कहे गये हैं, प्रतापभानु ने एक एक को प्रेम सहित हजार हजार बार किया है। संख्या के साथ अनुराग का उल्लेख है। यज्ञों की बड़ी संख्या बताकर अगले ही क्षण कवि राजा के हृदय में देखते हैं। वहाँ फल की कोई कामना नहीं है। इतना कर्म करनेवाला राजा अपने लिये उसके बदले कुछ खोजता नहीं रहता। यह बात आखेट के ठीक पहले कही जाती है। जिस मन को आगे क्रोध पीछा छुड़ाने नहीं देगा, उसी मन की यह पूर्व दशा स्पष्ट कर दी गयी है।
हृदयँ न कछु फल अनुसंधाना । भूप बिबेकी परम सुजाना॥
चौपाई ५
करइ जे धरम करम मन बानी । बासुदेव अर्पित नृप ग्यानी॥
प्रतापभानु विवेकी, बुद्धिमान् और ज्ञानी कहे गये हैं। कर्म, मन और वाणी से जो भी धर्म करते हैं, सब वासुदेव को अर्पित करते हैं। अर्पण का विस्तार केवल बाहरी अनुष्ठान तक नहीं है, मन और वचन भी उसके भीतर आते हैं। आगे की कथा में उन्हें कपट पहचानने में चूक होगी, पर इस चूक के पहले उनके विवेक और निष्कामता का प्रमाण यहीं दिया हुआ है। उनकी निष्कामता और बाद की चूक, दोनों इसी राजा के चरित्र में साथ रखी गयी हैं। आरम्भ का विवेक याद रहे तो आश्रम में हुई पहचान की भूल का दुख अधिक गहरा होता है। अभी सामने धर्म में लगा हुआ एक सुजान राजा है।
प्रतापभानु के राज्य में प्रजा सुखी है। धर्मरुचि नित्य नीति सिखाते हैं। राजा सेवा, दान, निर्माण और यज्ञ करते हैं, फल की कामना नहीं रखते और मन, वचन तथा कर्म से किया धर्म वासुदेव को अर्पित करते हैं।
विन्ध्याचल में वह विशाल बराह
एक बार प्रतापभानु अच्छे घोड़े पर सवार होकर आखेट के लिये निकलते हैं। शिकार का सब सामान और समाज सजाकर वे विन्ध्याचल के घने वन में पहुँचते हैं। वहाँ अनेक उत्तम हिरनों का शिकार होता है। अब तक यह यात्रा राजा की तैयारी के अनुरूप चल रही है। वन में घूमते हुए उनकी दृष्टि एक सूअर पर पड़ती है, और कवि उस पशु को देखकर ठहर जाते हैं। यहाँ से आखेट का स्वरूप बदलने लगेगा।
फिरत बिपिन नृप दीख बराहू । जनु बन दुरेउ ससिहि ग्रसि राहू॥
चौपाई ६
बड़ बिधु नहिं समात मुख माहीं । मनहुँ क्रोध बस उगिलत नाहीं॥
उसके दाँतों को देखकर ऐसा लगता है मानो राहु चन्द्रमा को मुँह में पकड़कर वन में छिप गया हो। चन्द्रमा इतना बड़ा है कि मुँह में समाता नहीं, और राहु मानो क्रोध के कारण उसे उगल भी नहीं रहा। उपमा में एक अटका हुआ चन्द्रमा है, जिसका प्रकाश दाँतों की चमक को सामने लाता है। अगली चौपाई स्वयं बता देती है कि यह सूअर के कराल दाँतों का वर्णन था। शरीर की विशालता अभी उसके बाद बतायी जाती है।
दाँत भयानक हैं, देह बहुत विशाल और मोटी है। घोड़े की आहट पड़ते ही सूअर घुरघुराता है, कान उठाकर चौकन्ना देखता है। इस छोटे दृश्य में दोनों एक दूसरे की उपस्थिति जान चुके हैं। राजा ने पशु को देख लिया है, पशु ने घोड़े की आहट सुन ली है। अभी राजा उसकी ओर बढ़े नहीं हैं। पहले उसकी चौकन्नी दृष्टि और भरे हुए शरीर का चित्र पूरा होता है, फिर दोहा उसे नील पर्वत के शिखर की उपमा देता है।
नील महीधर सिखर सम देखि बिसाल बराहु।
दोहा १५६
चपरि चलेउ हय सुटुकि नृप हाँकि न होइ निबाहु॥ १५६॥
ऐसे विशाल बराह को देखकर प्रतापभानु घोड़े को चाबुक लगाते हैं और तेजी से आगे बढ़ते हैं। उनके मुँह से ललकार निकलती है कि अब उस पशु का बचना सम्भव नहीं होगा। ललकार में राजा को अपने बल और शिकार की सफलता का विश्वास है। अभी सामने जो दिखाई देता है, वह साधा जा सकनेवाला लक्ष्य है। आगे वही लक्ष्य हर बार बाण से बच निकलेगा। राजा की आरम्भिक आश्वस्तता को याद रखने से पीछा करते हुए बढ़ता क्रोध और साफ़ समझ में आता है।
कवि ने इस पशु का नाम और रूप बराह के रूप में ही दिया है। उसके दाँत, आकार, घुरघुराहट और चौकन्नापन हमारे सामने हैं। राजा की दृष्टि भी इन्हीं पर है। इतना बड़ा शिकार सामने हो और राजा स्वयं उसे ललकार चुके हों, तो अगली हर असफलता उसी कही हुई बात को कसने लगती है। घोड़े को चाबुक लग चुका है, दौड़ आरम्भ हो गयी है। अब लक्ष्य कितना दूर जाता है और राजा कहाँ तक साथ लगे रहते हैं, कथा का ध्यान उस पर आ जाता है।
विन्ध्याचल में आखेट करते प्रतापभानु एक विशाल सूअर देखते हैं। उसके कराल दाँत और भारी देह का वर्णन होता है। राजा घोड़े को चाबुक लगाकर उसे ललकारते हैं और तेजी से उसकी ओर बढ़ते हैं।
बाण बचते गये, वन गहराता गया
अधिक शब्द करता हुआ घोड़ा अपनी ओर आता देखकर बराह वायु के वेग से भागता है। प्रतापभानु तुरन्त बाण साधते हैं। बाण दिखाई पड़ते ही पशु धरती में दुबक जाता है। यहाँ उसकी पहली बचत दिखाई गयी है। राजा लक्ष्य के सामने आने पर धनुष उठाते हैं, और लक्ष्य सामने से हट जाता है। इसके बाद वे बार बार ताककर तीर चलाते हैं। हर बार सूअर छल करके अपना शरीर बचा लेता है।
तकि तकि तीर महीस चलावा। करि छल सुअर सरीर बचावा॥
चौपाई ७
प्रगटत दुरत जाइ मृग भागा । रिस बस भूप चलेउ सँग लागा॥
कभी वह प्रकट होता है, कभी छिपता है और इसी तरह आगे भागता जाता है। प्रतापभानु क्रोध के वश उसके पीछे लगे रहते हैं। दौड़ को अब यही क्रोध आगे बढ़ा रहा है। शिकार दिखाई देता है तो बाण का अवसर लगता है, छिप जाता है तो फिर आगे ढूँढ़ना पड़ता है। राजा के सामने उसका मिलना और खो जाना बारी बारी आता है। हर बार उसे देख लेना पीछा समाप्त करने के लिये पर्याप्त नहीं होता, और हर बार उसका छिप जाना राजा को लौटाता भी नहीं है।
बराह बहुत दूर घने और गहन वन में चला जाता है। वह ऐसा स्थान है जहाँ हाथी और घोड़े का भी निबाह नहीं है। प्रतापभानु अब बिलकुल अकेले हैं और वन के क्लेश बहुत हैं। फिर भी वे पशु का मार्ग नहीं छोड़ते। तुलसी अकेलेपन और कष्ट को बताकर उसके बाद पीछा न छोड़ने की बात कहते हैं। रास्ता कठिन हो चुका है, साथ का समाज पीछे छूट चुका है, पर राजा की गति का कारण अब भी वही भागता हुआ पशु है।
राजा का धैर्य देखकर बराह पहाड़ की गहरी गुफा में घुस जाता है। उसका प्रवेश पीछा करने की सीमा बना देता है। गुफा अगम है, उसके भीतर जाना कठिन है। प्रतापभानु बहुत पछताते हैं और लौट पड़ते हैं। लौटने का निर्णय हो गया है, मगर लौटने का रास्ता हाथ में नहीं है। उस बड़े और भयावह वन में वे राह भूल जाते हैं। थोड़ी देर पहले दिशा पशु की गति से मिल रही थी। उसके ओझल होने पर राजा को अपने नगर की ओर जाने का मार्ग नहीं सूझता।
खेद खिन्न छुद्धित तृषित राजा बाजि समेत।
दोहा १५७
खोजत ब्याकुल सरित सर जल बिनु भयउ अचेत॥ १५७॥
बहुत परिश्रम से राजा थक चुके हैं। भूख और प्यास ने घोड़े सहित उन्हें व्याकुल कर दिया है। वे नदी और तालाब खोजते फिरते हैं, जल के बिना बेहाल हो जाते हैं। अब धनुष चलाने या किसी लक्ष्य को जीतने का प्रश्न पीछे रह गया है। घोड़े और सवार को पानी चाहिये। दोहे में दोनों को साथ रखा गया है, क्योंकि जिस घोड़े पर भरोसा करके राजा इतनी दूर आये, वही अब उनके साथ प्यास का कष्ट सह रहा है।
विजययात्रा के पहले जो अपार सेना थी, उसका यहाँ कोई सहारा नहीं है। आखेट का सजाया हुआ समाज भी साथ नहीं दिखाई देता। कथा ने क्रम से राजा को सबके बीच से उठाकर इस दशा तक पहुँचा दिया है: विशाल पशु, बार बार बचता हुआ लक्ष्य, बढ़ता क्रोध, कठिन वन, अगम गुफा और अन्त में पानी की खोज। अगले आश्रम की ओर उनका जाना इसी आवश्यकता से जुड़ा है। वहाँ किसी तप की महिमा सुनकर वे नहीं पहुँचते, भटकते हुए प्यासे राजा को एक ठिकाना दिखाई देता है।
बराह बाणों से बचता हुआ राजा को बहुत दूर घने वन में ले जाता है और गहरी गुफा में घुस जाता है। लौटते समय प्रतापभानु मार्ग भूल जाते हैं। घोड़े सहित भूखे प्यासे होकर वे जल खोजने लगते हैं।
आश्रम में छिपा हुआ पराजित राजा
वन में भटकते हुए प्रतापभानु को एक आश्रम दिखाई देता है। वहाँ मुनि का वेष बनाये एक राजा रहता है। उसका देश प्रतापभानु ने छीन लिया था और वह युद्ध में अपनी सेना छोड़कर भाग गया था। इस परिचय में पहले की विजय का एक दूसरा पक्ष खुलता है। जिस विजेता ने राजाओं को वश में किया था, उन्हीं पराजयों में से एक का स्मरण यहाँ छिपा बैठा है। प्रतापभानु को अभी यह ज्ञात नहीं है, पर हम आश्रमवासी का पिछला जीवन सुन लेते हैं।
उसने प्रतापभानु के अच्छे दिन और अपने बुरे दिन समझ लिये थे। पराजय की ग्लानि उसके मन में बहुत थी। वह घर नहीं गया, और अभिमान के कारण प्रतापभानु से मेल करने भी नहीं पहुँचा। दोनों रास्तों से दूर होकर वह तपस्वी के साज में वन में रहने लगा। तुलसी उसके क्रोध को दबा हुआ बताते हैं। दरिद्र की तरह रहते हुए उसने रोष मन में मार रखा है। वेष में दीनता है और भीतर चोट खायी हुई राजसत्ता का स्मरण है।
प्रतापभानु उसी के पास जाते हैं। आश्रमवासी तुरन्त पहचान लेता है कि यह प्रतापभानु हैं। प्यासे राजा उसे पहचान नहीं पाते। सुन्दर मुनिवेष देखकर उसे महामुनि मान लेते हैं। यह भूल होने का कारण भी चौपाई में दिया है: वे प्यास से व्याकुल हैं। शरीर की वही अवस्था, जो पिछले दोहे में दिखायी गयी थी, अब पहचान पर असर करती है। आश्रम में आने से पहले की थकान और प्यास कथा से गायब नहीं हुई, वे राजा की दृष्टि के साथ यहाँ तक आयी हैं।
राउ तृषित नहिं सो पहिचाना। देखि सुबेष महामुनि जाना॥
चौपाई ८
उतरि तुरग तें कीन्ह प्रनामा । परम चतुर न कहेउ निज नामा॥
राजा घोड़े से उतरकर प्रणाम करते हैं। वे इतने चतुर भी हैं कि अपना नाम नहीं बताते। इस एक चौपाई में उनका भ्रम और उनकी सावधानी साथ आते हैं। सामनेवाले को महामुनि मानना भूल है, अपना परिचय रोकना उनकी चतुराई है। पाठक देख सकता है कि यह सावधानी जिस भेद को सुरक्षित रखना चाहती है, वह पहले ही खुल चुका है। प्रतापभानु को इस बात की कोई खबर नहीं। इसलिए अपनी ओर से पहचान छिपाये हुए भी वे शत्रु के सामने पूरे पहचाने खड़े हैं।
कपटी तपस्वी उन्हें प्यासा देखता है और सरोवर दिखला देता है। यह सहायता तत्काल काम आती है। प्रतापभानु हर्षित होकर घोड़े समेत स्नान और जलपान करते हैं। जिस जल की तलाश में वे बेहाल थे, वह मिल गया है। कथा सहायता को उसके वास्तविक फल सहित दिखाती है। राजा और घोड़े को राहत मिलती है, चाहे सहायता करनेवाले के मन में पुराना वैर हो। इसी कारण आगे का अपनापन सहज बनता है। जिसने कठिन घड़ी में जल का स्थान बताया है, उसके लिये कृतज्ञ होना राजा के अनुभव से निकलता है।
आश्रम में प्रतापभानु से हारा हुआ राजा कपटी मुनिवेष में रहता है। वह प्रतापभानु को पहचान लेता है। प्यासे प्रतापभानु उसे महामुनि समझकर प्रणाम करते हैं और अपना नाम छिपाते हैं। उसके दिखाये सरोवर में घोड़े सहित स्नान और जलपान करते हैं।
सूर्यास्त का आसन और मृदु वाणी
सारा श्रम दूर हो जाता है और प्रतापभानु सुखी होते हैं। तपस्वी उन्हें अपने आश्रम ले जाता है। सूर्यास्त का समय जानकर वह आसन देता है और फिर कोमल वाणी में बोलता है। सहायता का क्रम बढ़ा है: पहले जल का पता मिला, फिर आश्रम तक पहुँचाया गया, अब बैठने का स्थान है। राजा की थकान उतरने के साथ बातचीत का अवसर बनता है। अभी तक सामनेवाले ने किसी हानि की बात नहीं की, और उसका स्वागत हर कदम पर राजा की आवश्यकता के अनुकूल है।
को तुम्ह कस बन फिरहु अकेलें । सुंदर जुबा जीव परहेलें॥
चौपाई ९
चक्रबर्ति के लच्छन तोरें । देखत दया लागि अति मोरें॥
वह पूछता है कि वे कौन हैं और इतना सुन्दर युवक होकर जीवन की परवाह किये बिना अकेले वन में क्यों घूम रहे हैं। फिर कहता है कि उनमें चक्रवर्ती राजा के लक्षण देखकर उसे बहुत दया आ रही है। पूछनेवाला पहचान पहले ही चुका है। इसलिए उसका प्रश्न अनजान व्यक्ति की साधारण जिज्ञासा के रूप में नहीं पढ़ा जा सकता। वह अपनी जानकारी छिपाकर संवाद खोलता है। चक्रवर्ती के लक्षण भी वह देख रहा है, मगर उनके उल्लेख को दया के भीतर रखता है।
प्रतापभानु उत्तर में अपना वास्तविक पद छिपाते हैं। वे कहते हैं कि प्रतापभानु नाम के राजा हैं और वे उनके मन्त्री हैं। शिकार करते हुए राह भूल गये और बड़े भाग्य से यहाँ आकर मुनि के चरणों के दर्शन मिले। नाम अब बातचीत में आ गया है, पर राजा उसे अपने स्वामी के नाम की तरह रख रहे हैं। आश्रमवासी उनकी पहचान जानता है, इसलिए इस बनाये हुए परिचय से उसके लिये कोई नया भेद नहीं खुलता। दोनों की जानकारी का अन्तर वैसे ही बना रहता है।
राजा आगे कहते हैं कि ऐसे दर्शन उनके लिये दुर्लभ थे, इसलिए कुछ भला होनेवाला जान पड़ता है। उनकी प्रसन्नता अभी मिली हुई राहत से जुड़ी है। प्यास बुझी, श्रम गया, आसन मिला, और सामने से कोमल वचन सुनने को मिले हैं। इसी अनुभव को वे शुभ भविष्य का संकेत मानते हैं। तपस्वी उसके उत्तर में तात कहकर सम्बोधित करता है और बताता है कि अँधेरा हो गया है, उनका नगर यहाँ से सत्तर योजन दूर है।
निसा घोर गंभीर बन पंथ न सुनहु सुजान।
दोहा १५९ (क, ख)
बसहु आजु अस जानि तुम्ह जाएहु होत बिहान॥ १५९ (क)॥
तुलसी जसि भवतब्यता तैसी मिलइ सहाइ।
आपुनु आवइ ताहि पहिं ताहि तहाँ लै जाइ॥ १५९ (ख)॥
पहले दोहे में रात की घोरता, वन की गहनता और मार्ग न होने की बात है। इन्हें देखकर आज यहीं ठहरने को कहा जाता है, सबेरा होते ही चले जाने का सुझाव साथ है। इतने दूर नगर, अँधेरी रात और दुर्गम वन के बीच यह सलाह व्यवहार की दृष्टि से उपयुक्त लगती है। राजा का रुकना केवल प्रशंसा सुनकर लिया हुआ निर्णय नहीं है। उस निर्णय के लिये जल की सहायता और यात्रा की कठिनाई पहले से भूमि बना चुकी हैं।
इसके बाद तुलसी भवितव्यता की बात कहते हैं। जैसी होनहार होती है, वैसी सहायता मिल जाती है। वह स्वयं किसी के पास आ जाती है या उसे वहाँ ले जाती है। राजा इसी भेंट में भलाई का संकेत पढ़ चुके हैं। कवि उसी समय होनहार की व्यापक बात सामने रखते हैं, जिससे इस सहायता का अर्थ खुला रहता है। पानी ने प्यास सचमुच बुझायी है, आश्रम रात काटने का स्थान सचमुच देता है, और आश्रम का स्वामी प्रतापभानु का शत्रु भी है। ये सभी बातें एक ही घटना में जुड़ी हैं।
तपस्वी सूर्यास्त पर आसन देकर दया भरे प्रश्न पूछता है। प्रतापभानु अपने को राजा का मन्त्री बताते हैं और भेंट को शुभ मानते हैं। सत्तर योजन दूर नगर तथा घोर रात का कारण देकर तपस्वी उन्हें ठहराता है। तुलसी होनहार के अनुसार सहायता मिलने की बात कहते हैं।
पिता का सम्मान और भिखारी का नाम
प्रतापभानु प्रसन्नतापूर्वक आज्ञा स्वीकार करते हैं। घोड़े को पेड़ से बाँधकर बैठ जाते हैं। अब रात आश्रम में बिताना तय है। वे तपस्वी की अनेक प्रकार से प्रशंसा करते हैं, उसके चरणों की वन्दना करते हैं और अपने भाग्य को सराहते हैं। यहाँ प्रशंसा राजा के मुँह से निकल रही है। सामनेवाले की कोमलता ने उनमें कृतज्ञता और आदर बढ़ाया है। थोड़ी देर में यह आदर इतना निकट हो जाता है कि वे उसे पिता की तरह मानकर सम्बोधित करते हैं।
राजा फिर सुन्दर, मृदु वाणी में बोलते हैं। वे कहते हैं कि पिता जानकर कुछ धृष्टता कर रहे हैं। मुनीश्वर उन्हें अपना पुत्र और सेवक समझकर अपना नाम विस्तार से बतायें। यह प्रश्न परिचय के लिये है, मगर पूछने के पहले ही सम्बन्ध की भाषा बदल गयी है। राजा स्वयं को पुत्र और सेवक की जगह रखते हैं। जिससे अभी भेंट हुई है, उसके चरणों के दर्शन को वे भाग्य मान चुके हैं, और अब अपना प्रश्न भी विनयपूर्वक उसी के सामने रखते हैं।
तेहि न जान नृप नृपहि सो जाना । भूप सुहृद सो कपट सयाना॥
चौपाई १०
बैरी पुनि छत्री पुनि राजा । छल बल कीन्ह चहइ निज काजा॥
इस बिन्दु पर तुलसी दोनों व्यक्तियों की स्थिति फिर से स्पष्ट करते हैं। राजा ने उसे नहीं पहचाना, उसने राजा को पहचान लिया है। प्रतापभानु शुद्धहृदय हैं और सामनेवाला कपट में चतुर है। इन दो बातों को अलग अलग समझना आवश्यक है। राजा के सरल वचनों का कारण उनके मन का सीधापन है। दूसरे की मधुरता के भीतर अपना काम साधने की युक्ति है। एक ही आश्रम, एक ही बातचीत और मिलती जुलती मृदु वाणी के भीतर दो भिन्न अभिप्राय चल रहे हैं।
कवि उस व्यक्ति का परिचय तीन बातों से और कस देते हैं: वह बैरी है, क्षत्रिय है और राजा है। अपना काम छल और बल से बना लेना चाहता है। वन में बैठने और तपस्वी का वेष धारण करने पर भी उसका पुराना स्वार्थ समाप्त नहीं हुआ है। अपने राज्य के सुख को स्मरण करके वह दुखी है। उसकी छाती आँवे की आग की तरह सुलगती है। टीका आँवे को कुम्हार का आँवा बताती है और इस सुलगने का आशय भीतर ही भीतर जलना खोलती है।
प्रतापभानु के सरल वचन कान में पड़ते हैं तो वह अपना वैर सँभालकर हृदय में हर्षित होता है। यह हर्ष राजा की भलाई से नहीं उपजा है। पुराने शत्रु का इतना सहज भरोसा उसके काम की सम्भावना बढ़ाता है। अभी उसने कोई योजना विस्तार से नहीं कही। उसकी प्रसन्नता का कारण कवि हमारे सामने रख देते हैं, फिर उसके मुख से अगला वचन सुनाते हैं। इसलिये उस वचन की कोमलता सुनते हुए हम उसके भीतर सुलगती हुई छाती को भूल नहीं सकते।
कपट बोरि बानी मृदुल बोलेउ जुगुति समेत।
दोहा १६०
नाम हमार भिखारि अब निर्धन रहित निकेत॥ १६०॥
वह बड़ी युक्ति से, वाणी को कपट में डुबोकर कहता है कि अब उसका नाम भिखारी है, क्योंकि वह निर्धन और घर द्वार से रहित है। नाम पूछने पर ऐसा परिचय दिया गया है जो मुनिवेष से सहज मेल खाता है। उसके राजत्व और प्रतापभानु से वैर का कोई परिचय राजा को नहीं मिलता। अब शब्द उसकी बदली हुई दशा का संकेत देता है, मगर उस दशा का कारण छिपा रहता है। अपनी दीनता बताकर वह उसी आदर को स्वीकार करने योग्य रूप में सामने रखता है जो राजा दे रहे हैं।
प्रतापभानु ठहरकर तपस्वी की प्रशंसा करते हैं और पिता की तरह मानकर उसका नाम पूछते हैं। पुराने राज्यसुख को याद करके दुखी शत्रु राजा के सरल वचनों से भीतर प्रसन्न होता है। कपट भरी मधुर वाणी में वह अपना नाम भिखारी बताता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस भेंट तक पहुँचने से पहले तुलसी ने प्रतापभानु की धर्मशीलता को पूरा स्थान दिया है। उन्होंने मन्त्री से नीति सीखी, प्रजा का पालन किया, दान और यज्ञ किये, फल की इच्छा छोड़कर धर्म वासुदेव को अर्पित किया। इसलिए वन में हुई भूल को समझते समय उन गुणों को मिटाया नहीं जा सकता। एक विवेकी व्यक्ति भी प्यास की व्याकुलता में पहचान से चूकता है, और फिर मिली हुई सहायता के कारण अपने निर्णय पर अधिक भरोसा करने लगता है। यहाँ भूल की गति इतनी ही क्रमबद्ध है।
राजा के भीतर की दो दशाएँ भी पास रखकर देखिये। आखेट के बीच क्रोध उन्हें पीछा छोड़ने नहीं देता। आश्रम में वही व्यक्ति राहत पाकर कृतज्ञ और विनीत हो जाता है। उधर तपस्वी के भीतर पहले से दबा क्रोध है, जो राजा की विनय सुनकर वैर की प्रसन्नता में बदलता है। एक ओर श्रम मिटने का सुख है, दूसरी ओर अवसर मिलने का सुख। कवि दोनों के हर्ष को उसका कारण देते हैं। इसी कारण हर मृदु वचन का अर्थ बोलनेवाले के मन से समझ में आता है।
हमें राजा से अधिक जानकारी दी गयी है। हम जानते हैं कि सामने बैठा आदमी पहले किससे हारा था और अब किस भाव से बोल रहा है। प्रतापभानु के पास जल, आसन, दया और रात्रि के लिये आश्रय का अनुभव है। वे इन्हें साथ जोड़कर भाग्य की सराहना करते हैं। इस दूरी से संवाद में बेचैनी आती है। प्रणाम करना, आज्ञा स्वीकारना और पिता की तरह नाम पूछना, प्रत्येक सहज व्यवहार उस व्यक्ति की ओर जा रहा है जो अपना वैर भीतर सँभाले हुए है।
राजा की धर्मशीलता, प्यास में हुई पहचान की भूल और सहायता से बढ़ा विश्वास एक क्रम में जुड़े हैं। आश्रम की मधुर बातचीत के भीतर शत्रु का पुराना वैर बना हुआ है।
यहाँ कथा भिखारी नाम के उत्तर पर ठहरती है। राजा अभी आश्रम में बैठे हैं, घोड़ा वृक्ष से बँधा है और रात घिर चुकी है। उनके मन में दुर्लभ दर्शन का सौभाग्य है। सामनेवाले के मन में अपना खोया राज्य और पुराना वैर है। अभी इस भेंट का विनाशकारी फल नहीं आया, पर परिचय की जो भूल प्यास में हुई थी, वह अब आदर के सम्बन्ध में जम गयी है। महामुनि समझे गये व्यक्ति का दिया हुआ पहला नाम राजा के सामने है, और उसके पीछे छिपी कथा हमारे सामने।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १५३ से १६०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।