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प्रतापभानु का आखेट और कपटी तपस्वी

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 17

सात द्वीपों का विजेता एक सूअर के पीछे वन में अकेला पड़ जाता है। जिस आश्रम में उसे जल और आसन मिलता है, वहाँ रहनेवाला व्यक्ति उसे पहचान चुका है।

वन के एक आश्रम में दो राजा मिलते हैं। एक प्यास से बेहाल होकर आया है, दूसरे ने तपस्वी का वेष पहन रखा है। तपस्वी आनेवाले को पहचान लेता है। आनेवाला उसे प्रणाम करता है। जिसे मुनि समझा गया है, वह पुराना शत्रु है। और जिसे अपना नाम छिपा लेने का भरोसा है, उसकी पहचान पहले ही खुल चुकी है। पर उस आश्रम तक पहुँचने से पहले कथा वह राज्य दिखाती है जिसका स्वामी आगे वन में भटकेगा।

बालकाण्ड की यह पुरानी और पवित्र कथा शिव ने पार्वती से कही थी। यह कैकय देश से शुरू होती है। वहाँ सत्यकेतु अपने बड़े पुत्र को राज्य देकर भगवान के लिये वन चले जाते हैं। उनके पुत्र प्रतापभानु को योग्य मन्त्री, वीर भाई और बड़ी सेना का साथ मिलता है। विजय के बाद सुखी प्रजा, दान, यज्ञ और बिना फल की इच्छा का धर्म है। फिर एक दिन शिकार के बीच एक दौड़ शुरू होती है। उसके अन्त में ऐसा आतिथ्य मिलता है जिसके भीतर पुराना वैर सुलग रहा है।

राजकुल और मुनिवेष में शत्रु

  • प्रतापभानु सत्यकेतु के बड़े पुत्र और कैकय के राजा। वे धर्म से राज्य करते हैं और शिकार में भटककर एक आश्रम पहुँचते हैं।
  • सत्यकेतु धर्म, नीति और बल से सम्पन्न राजा, जो बड़े पुत्र को राज्य सौंपकर भगवान के लिये वन जाते हैं।
  • अरिमर्दन प्रतापभानु के छोटे भाई, बहुत बलवान वीर, जिनका अपने भाई से छलरहित प्रेम है।
  • धर्मरुचि राजा का हित चाहनेवाले बुद्धिमान मन्त्री, जिनका भगवान के चरणों में प्रेम है।
  • कपटी तपस्वी प्रतापभानु से हारा हुआ एक राजा, जो वन में मुनि का वेष धारण किये है और अपना नाम भिखारी बताता है।

कैकय का राज्य और दो भाइयों का प्रेम

याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कहते हैं, यह पवित्र और पुरानी कथा सुनिये, जो शिव ने पार्वती से कही थी। संसार में प्रसिद्ध कैकय देश है। वहाँ सत्यकेतु राज्य करते हैं: धर्म की धुरी धारण करनेवाले, नीति की खान, तेजस्वी, प्रतापी, सुशील और बलवान।

सत्यकेतु के दो वीर पुत्र हैं, दोनों गुणों के भण्डार और बड़े रणधीर। बड़े पुत्र प्रतापभानु राज्य के उत्तराधिकारी हैं। छोटे पुत्र अरिमर्दन की भुजाओं में अपार बल है, और युद्ध में वे अटल रहते हैं। और दोनों भाइयों में बड़ा मेल है, ऐसा प्रेम जिसमें न कोई दोष है, न छल।

सत्यकेतु बड़े पुत्र को राज्य दे देते हैं और स्वयं भगवान के लिये वन चले जाते हैं।

राजा बनते ही देश में प्रतापभानु की दुहाई फिर जाती है। वे वेद की विधि से प्रजा का बहुत अच्छा पालन करते हैं, और राज्य में पाप का कहीं लेश नहीं रहता। जिसे हम आगे प्यासा देखेंगे, उसके गुण कथा पहले सामने रख देती है।

विजय की सेना और लौटता हुआ राजा

राजा के मन्त्री धर्मरुचि हैं, राजा का हित चाहनेवाले और बुद्धि में शुक्र के समान, जिन्हें टीका शुक्राचार्य कहती है। बुद्धिमान मन्त्री, बलवान और वीर भाई, और स्वयं प्रतापी और रणधीर राजा, ये तीनों साथ हैं।

साथ में अपार चतुरंगिणी सेना है, जिसमें असंख्य योद्धा हैं, सब रण में जूझ मरनेवाले। अपनी सेना देखकर राजा बहुत प्रसन्न होते हैं, और नगाड़े घमाघम बज उठते हैं। फिर दिग्विजय के लिये सेना सजाकर, शुभ दिन साधकर और डंका बजाकर प्रतापभानु निकलते हैं।

जहाँ तहाँ अनेक लड़ाइयाँ होती हैं, और प्रतापभानु सब राजाओं को अपने बल से जीत लेते हैं। सातों द्वीप उनकी भुजाओं के बल से वश में आ जाते हैं। टीका द्वीपों का अर्थ भूमिखण्ड बताती है। जीते हुए राजाओं से कर ले लेकर उन्हें छोड़ दिया जाता है। इतनी बड़ी विजय कथा बहुत थोड़े में कह देती है। आगे एक अकेले पशु का पीछा इससे अधिक देर चलेगा।

उस समय सारी पृथ्वी के एकमात्र राजा प्रतापभानु हैं। अपनी भुजाओं के बल से संसार को वश में करके वे अपने नगर में लौटते हैं। वे अर्थ, धर्म और काम के सुखों का समय के अनुसार सेवन करते हैं।

समृद्धि, सेवा और फल की कामना से रहित धर्म

प्रतापभानु का बल पाकर धरती सुन्दर कामधेनु हो गयी है। टीका कामधेनु का अर्थ मनचाही वस्तु देनेवाली बताती है। प्रजा सब दुखों से रहित और सुखी है, और सब स्त्री पुरुष सुन्दर और धर्मशील हैं।

धर्मरुचि के परिचय में एक नया गुण जुड़ता है। भगवान के चरणों में उनका प्रेम है। वे राजा के हित के लिये उन्हें सदा नीति सिखाते हैं।

राजा गुरु, देवता, सन्त, पितर और ब्राह्मणों की सदा सेवा करते हैं। वेदों में राजाओं के जो धर्म कहे गये हैं, उन्हें आदर से और सुख मानकर निभाते हैं। हर दिन तरह तरह के दान देते हैं, और उत्तम शास्त्र, वेद और पुराण सुनते हैं।

उन्होंने बहुत सी बावलियाँ, कुएँ और तालाब, फूलों की वाटिकाएँ और सुन्दर बगीचे बनवाये। सब तीर्थों में उन्होंने ब्राह्मणों के लिये घर और देवताओं के सुन्दर मन्दिर बनवाये।

वेद और पुराणों में जितने प्रकार के यज्ञ कहे गये हैं, प्रतापभानु ने एक एक को प्रेम सहित हज़ार हज़ार बार किया। और कथा तुरन्त राजा के हृदय की बात कहती है: वहाँ किसी फल की कामना नहीं है। यह बात शिकार के ठीक पहले कही जाती है।

प्रतापभानु विवेकी, बहुत समझदार और ज्ञानी कहे गये हैं। कर्म, मन और वाणी से जो भी धर्म करते हैं, सब वासुदेव को अर्पित करके करते हैं। आगे उन्हें कपट पहचानने में चूक होगी, पर उससे पहले उनके विवेक और निष्कामता का प्रमाण यहीं दे दिया गया है।

विन्ध्याचल में वह विशाल वराह

एक बार प्रतापभानु अच्छे घोड़े पर सवार होकर, शिकार का सब सामान सजाकर, विन्ध्याचल के घने वन में जाते हैं। वहाँ वे बहुत से उत्तम हिरन मारते हैं। वन में घूमते हुए उनकी दृष्टि एक सूअर पर पड़ती है, और यहाँ से शिकार का रूप बदलने लगता है।

उसके दाँत देखकर ऐसा लगता है मानो राहु चन्द्रमा को मुँह में पकड़कर वन में आ छिपा हो। चन्द्रमा इतना बड़ा है कि मुँह में समाता नहीं। और राहु मानो क्रोध के मारे उसे उगल भी नहीं रहा। कथा स्वयं बता देती है कि यह सूअर के भयानक दाँतों का वर्णन था।

उसका शरीर बहुत बड़ा और मोटा है। घोड़े की आहट पाते ही वह घुरघुराता है और कान उठाकर चौकन्ना देखता है। फिर कथा उसे नीले पर्वत के शिखर जैसा बताती है।

ऐसे विशाल सूअर को देखकर प्रतापभानु घोड़े को चाबुक लगाते हैं, तेज़ी से आगे बढ़ते हैं। वे ललकारते हैं कि अब इसका बचाव नहीं हो सकता।

बाण बचते गये, वन गहराता गया

बहुत शोर करता घोड़ा अपनी ओर आता देखकर सूअर हवा के वेग से भागता है। राजा तुरन्त धनुष पर बाण चढ़ाते हैं, और बाण देखते ही पशु धरती में दुबक जाता है। फिर राजा ताक ताककर तीर चलाते हैं, और सूअर हर बार छल करके अपना शरीर बचा लेता है।

कभी वह प्रकट होता है, कभी छिपता है, और इसी तरह भागता जाता है। राजा क्रोध के वश उसके पीछे लगे रहते हैं।

सूअर बहुत दूर ऐसे घने वन में चला जाता है जहाँ हाथी घोड़े का भी निबाह नहीं। राजा बिलकुल अकेले हैं और वन में कष्ट भी बहुत है, फिर भी वे पशु का पीछा नहीं छोड़ते।

राजा का धीरज देखकर सूअर भागकर पहाड़ की एक गहरी गुफा में घुस जाता है। उसमें जाना कठिन देखकर राजा बहुत पछताकर लौटते हैं, और लौटते हुए उस घोर वन में रास्ता भूल जाते हैं। अब तक पशु का मार्ग ही उनका रास्ता था, और वह गुफा पर जाकर समाप्त हो गया।

बहुत परिश्रम से थके हुए, घोड़े सहित भूख और प्यास से व्याकुल, राजा नदी और तालाब खोजते फिरते हैं। पानी के बिना वे अचेत हो जाते हैं।

दिग्विजय के समय जो अपार सेना थी, उसका यहाँ कोई सहारा नहीं।

आश्रम में छिपा हुआ पराजित राजा

वन में भटकते हुए प्रतापभानु को एक आश्रम दिखाई देता है। वहाँ कपट से मुनि का वेष बनाये एक राजा रहता है। उसका देश प्रतापभानु ने छीन लिया था। वह युद्ध में अपनी सेना छोड़कर भाग गया था। प्रतापभानु की विजयों में से एक पराजय यहाँ रहती है। प्रतापभानु को यह पता नहीं, पर हम उसका पिछला जीवन सुन लेते हैं।

प्रतापभानु का समय जानकर, जिसे टीका उनके अच्छे दिन कहती है, और अपना समय बहुत बुरा अनुमान करके उसके मन में बड़ी ग्लानि हुई थी। वह न घर गया, न अपने अभिमान में प्रतापभानु से मेल करने पहुँचा। दरिद्र की तरह मन में क्रोध को मारकर वह तपस्वी के वेष में वन में रहने लगा।

प्रतापभानु उसी के पास जाते हैं, और वह तुरन्त पहचान लेता है कि यह प्रतापभानु हैं। प्यासे राजा उसे नहीं पहचान पाते, और सुन्दर वेष देखकर उसे महामुनि मान लेते हैं। कथा उसी साँस में उन्हें प्यासा कहती है, और टीका प्यास को भूल का कारण बताती है।

राजा घोड़े से उतरकर प्रणाम करते हैं। वे बड़े चतुर हैं, और अपना नाम नहीं बताते। तपस्वी को महामुनि मानना भूल है, अपना नाम रोकना सावधानी। पर जिस भेद को यह सावधानी बचाना चाहती है, वह पहले ही खुल चुका है। नाम छिपाये हुए भी वे शत्रु के सामने पूरे पहचाने खड़े हैं।

कपटी तपस्वी उन्हें प्यासा देखकर सरोवर दिखा देता है, और राजा हर्षित होकर घोड़े सहित उसमें नहाते और पानी पीते हैं। जिस पानी की खोज में वे बेहाल थे, वह मिल गया है।

सूर्यास्त का आसन और मृदु वाणी

सारी थकान मिट जाती है और राजा सुखी होते हैं। तपस्वी उन्हें अपने आश्रम में ले जाता है, सूर्यास्त का समय जानकर बैठने को आसन देता है। फिर वह कोमल वाणी में बोलता है।

वह पूछता है कि आप कौन हैं, और इतने सुन्दर युवक होकर, जान की परवाह किये बिना, वन में अकेले क्यों घूम रहे हैं। आपमें चक्रवर्ती राजा के लक्षण देखकर मुझे बड़ी दया आ रही है। पूछनेवाला उत्तर पहले से जानता है। चक्रवर्ती के लक्षणोंवाला यह आदमी अभी घोड़े से उतरकर उसे प्रणाम कर चुका है।

प्रतापभानु उत्तर में अपना पद छिपाते हैं: हे मुनीश्वर, प्रतापभानु नाम के एक राजा हैं, मैं उनका मन्त्री हूँ। शिकार में घूमते हुए राह भूल गया, और बड़े भाग्य से आकर आपके चरणों के दर्शन पाये। वे अपना ही नाम किसी दूसरे का बताते हैं और अपने को उसका मन्त्री बना लेते हैं।

राजा आगे कहते हैं कि आपके दर्शन हमें दुर्लभ थे। हम जानते हैं कि कुछ भला होनेवाला है। तपस्वी कहता है, हे तात, अँधेरा हो गया है, और आपका नगर सत्तर योजन दूर है।

फिर वह कहता है कि रात घोर अँधेरी है, वन घना है, रास्ता नहीं है। ऐसा जानकर आज ठहर जाइये, सवेरा होते ही चले जाइयेगा।

फिर तुलसी होनहार की बात कहते हैं: जैसी होनहार होती है, वैसी ही सहायता मिल जाती है। या तो वह स्वयं उसके पास आ जाती है, या उसे वहाँ ले जाती है।

पिता का सम्मान और भिखारी का नाम

हे नाथ, बहुत अच्छा, कहकर प्रतापभानु उसकी आज्ञा सिर पर धरते हैं, घोड़े को पेड़ से बाँधते हैं और बैठ जाते हैं। वे तपस्वी की बहुत प्रकार से प्रशंसा करते हैं, उसके चरणों की वन्दना करते हैं और अपने भाग्य को सराहते हैं।

फिर वे कोमल वाणी में कहते हैं: हे प्रभु, आपको पिता जानकर मैं ढिठाई करता हूँ। हे मुनीश्वर, मुझे पुत्र और सेवक जानकर अपना नाम विस्तार से बताइये। पूछने से पहले ही सम्बन्ध की भाषा बदल गयी है। राजा स्वयं को पुत्र और सेवक की जगह रख देते हैं।

यहाँ कथा दोनों की स्थिति फिर साफ़ करती है। राजा ने उसे नहीं पहचाना, उसने राजा को पहचान लिया है। प्रतापभानु शुद्ध हृदय के हैं, और तपस्वी कपट में चतुर है। एक ही आश्रम, एक ही बातचीत और मिलती जुलती कोमल वाणी के भीतर दो अलग अभिप्राय चल रहे हैं।

कथा उसका परिचय तीन बातों से और कस देती है: एक तो वैरी, फिर क्षत्रिय, फिर राजा। वह छल और बल से अपना काम बनाना चाहता है। राज्य के सुख को याद करके वह दुखी है। उसकी छाती आँवे की आग की तरह सुलग रही है। टीका के अनुसार कुम्हार के आँवे की तरह, भीतर ही भीतर।

राजा के सरल वचन सुनकर, अपने वैर को याद करके, वह मन में हर्षित होता है।

वह वाणी को कपट में डुबोकर, बड़ी युक्ति से, कोमल स्वर में कहता है कि अब हमारा नाम भिखारी है, हम निर्धन हैं और घर द्वार से रहित। जो नाम वह बताता है, वह उसकी बदली हुई दशा कहता है। छीना गया देश और रण में छोड़ी गयी सेना भिखारी शब्द के पीछे छिपे रहते हैं।

प्यास में चूकी पहचान

इस भेंट से पहले कथा ने प्रतापभानु के धर्म को पूरी जगह दी है। उन्होंने मन्त्री से नीति सीखी, प्रजा का पालन किया, दान और यज्ञ किये। फल की इच्छा छोड़कर उन्होंने धर्म वासुदेव को अर्पित किया। वे बातें पहले आती हैं, और वन की भूल उनके बाद। जिन राजा को कथा विवेकी कहती है, वे तपस्वी को नहीं पहचानते। और जहाँ यह भूल है, वहीं कथा उन्हें प्यासा कहती है।

शिकार में क्रोध के वश राजा पशु के पीछे लगे थे। आश्रम में जल पाकर और थकान मिटने पर वही राजा तपस्वी की प्रशंसा करते हैं। वे उसके चरणों की वन्दना करते हैं और उसे पिता मानकर नाम पूछते हैं। उधर तपस्वी ने दरिद्र की तरह मन में क्रोध को मार रखा था। राजा के सरल वचन सुनकर वह अपना वैर याद करता है और मन में हर्षित होता है।

हम राजा से अधिक जानते हैं: तपस्वी किससे हारा था, और अब किस भाव से बोल रहा है। प्रणाम, आज्ञा मानना, पिता मानकर नाम पूछना, हर सहज व्यवहार उसी की ओर जा रहा है जिसकी छाती आँवे की तरह सुलग रही है।

कथा भिखारी नाम के उत्तर पर ठहरती है। राजा आश्रम में बैठे हैं, घोड़ा पेड़ से बँधा है, और रात घिर चुकी है। उनके मन में दुर्लभ दर्शन का सौभाग्य है। तपस्वी के मन में राज्य के सुख की याद और पुराना वैर है। प्यास में हुई पहचान की भूल अब आदर के सम्बन्ध में जम गयी है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 153 से 160, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।