रामचरितमानस · बालकाण्ड · जनकपुर का मण्डप और दशरथ को विवाह का समाचार
जनकपुर का मण्डप और दशरथ को विवाह का समाचार
मणियों से सँवरता जनकपुर, अयोध्या पहुँची एक प्रिय पत्रिका और उसे बारम्बार सुनते हुए पिता, भाई और माताएँ।
जनकपुर में बाजों का स्वर ऊँचा उठ रहा है। स्त्रियाँ समूह बनाकर मंगल गा रही हैं, जनक का हृदय सुख से भर गया है और सीता का भय उतर चुका है। अब इस आनन्द को विवाह की तैयारी में लगना है। राजा गुरु के पास जाकर आगे का मार्ग पूछते हैं। उनकी आज्ञा से अयोध्या को दूत भेजे जाते हैं और जनकपुर में ऐसा मण्डप रचने का काम आरम्भ होता है जिसके खम्भों, पत्तियों और फूलों तक में कारीगरों की कुशलता दिखाई देती है।
तुलसीदास हमें उस मण्डप के बीच ठहराते हैं, फिर पूरे नगर की शोभा दिखाकर अयोध्या ले चलते हैं। वहाँ जनक की पत्रिका दशरथ के हाथ में आती है। उसमें दोनों प्रिय पुत्रों का समाचार है। पिता उसे पढ़ते हैं, भरत के पूछने पर फिर पढ़ते हैं, रानियों को सुनाते हैं। एक ही पत्रिका अनेक हृदयों को सुख देती जाती है। उसके साथ आये दूत अपनी आँखों देखा वृत्तान्त सुनाते हैं और गुरु वसिष्ठ बारात सजाने का आदेश देते हैं। जनकपुर की मंगलध्वनि का उत्तर अब अयोध्या के घर में मिलने लगता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- जनक सीता के पिता, जो विश्वामित्र से आगे का विधान पूछकर दूत भेजते और नगर सजवाते हैं।
- सीता और राम जिनके विवाह के लिए मण्डप रचा जा रहा है। सीता का भय मिटा है और राम के पराक्रम का समाचार अयोध्या पहुँचता है।
- लक्ष्मण राम के साथ उपस्थित तेजस्वी भाई, जिनकी प्रशंसा भी दूत दशरथ से करते हैं।
- विश्वामित्र जनक को कुल और वेद के आचार पूरे करने तथा दशरथ को बुलाने का निर्देश देनेवाले मुनि।
- दशरथ पत्रिका पाकर भावविह्वल पिता, जिन्हें दोनों पुत्रों की कुशल बारम्बार सुननी है।
- भरत और शत्रुघ्न खेलते समय समाचार पाकर आनेवाले भाई, जो पत्रिका सुनकर पुलकित होते हैं।
- वसिष्ठ दशरथ और कौसल्या के पुण्य तथा चारों पुत्रों के गुणों का बखान करके बारात की आज्ञा देनेवाले गुरु।
- रानियाँ और जनक के दूत माताएँ पत्रिका हृदय से लगाती हैं; दूत अपना देखा वृत्तान्त सुनाकर सबको आनन्द देते हैं।
जनक का सुख, और गुरु से अगली बात
बाजे खूब जोर से बज रहे हैं और सबने मनोहर मंगल के साज सजा लिये हैं। सुन्दर मुख, सुन्दर नेत्र और कोयल जैसी मधुर वाणीवाली स्त्रियाँ झुण्ड बनाकर गाती हैं। इस सामूहिक उल्लास के भीतर तुलसी दो व्यक्तियों पर अलग से दृष्टि रखते हैं। जनक को जो सुख मिला है, उसके लिए कवि जन्म से निर्धन रहे मनुष्य के हाथ खजाना लग जाने की उपमा देते हैं। इतने सम्पन्न राजा की प्रसन्नता को समझाने के लिए अभाव का यह चित्र आता है। जो मिला है, उसका मोल उसी मन से समझ में आता है जिसके लिए वह अब तक दुर्लभ था।
सुखु बिदेह कर बरनि न जाई । जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई॥
चौपाई १
बिगत त्रास भइ सीय सुखारी । जनु बिधु उदयँ चकोरकुमारी॥
सीता के सुख में भय के चले जाने की बात पहले है। उनके लिए चन्द्रमा के उदय पर आनन्दित हुई चकोरकुमारी का चित्र रखा गया है। जनक को निधि मिली है, सीता के सामने चन्द्रमा उदित हुआ है। दोनों उपमाओं में मन की अपनी प्रतीक्षा पूरी होती दिखाई देती है। आसपास सब गा रहे हैं; इन दोनों के भीतर उस गान के अलग कारण हैं। सीता का त्रास समाप्त हो गया है और जनक अपने को कृतार्थ अनुभव कर रहे हैं।
इसी सुख में जनक विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं। वे धनुष टूटने का श्रेय मुनि की कृपा को देते हुए कहते हैं कि राम ने प्रभु के प्रसाद से धनुष तोड़ा और दोनों भाइयों ने उन्हें कृतार्थ कर दिया। उनके धन्यवाद में राम के साथ लक्ष्मण भी हैं। फिर वे आगे का उचित काम पूछते हैं। जिस राजा ने अपनी प्रतिज्ञा के पूर्ण होने का आनन्द पाया है, वही अगला कदम गुरु के वचन से उठाना चाहता है। उनकी प्रसन्नता विनय के साथ बोलती है।
विश्वामित्र उत्तर में पहले धनुष की शर्त समझाते हैं। विवाह धनुष के अधीन था; उसके टूटते ही उस शर्त के अनुसार विवाह का निर्णय हो गया। देवता, मनुष्य और नाग सब इसे जानते हैं। इसके साथ ही मुनि कुल की प्रथा और वेद में कहे आचार की बात रखते हैं। जनक को ब्राह्मणों, कुल के वृद्धों और गुरुओं से पूछकर वे व्यवहार करने हैं। सम्बन्ध की प्रतिज्ञा पूरी हो चुकी है, आगे के संस्कार और कुलाचार अभी उनके निर्देश में सम्पन्न किये जाने हैं।
तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु।
दोहा २८६
बूझि बिप्र कुलबृद्ध गुर बेद बिदित आचारु॥ २८६॥
विश्वामित्र यह भी कहते हैं कि अयोध्या दूत भेजे जायँ, जो महाराज दशरथ को बुला लावें। जनक प्रसन्न होकर आज्ञा स्वीकार करते हैं और उसी समय दूत बुलाकर भेज देते हैं। उनकी तत्परता में गुरु का वचन मिलते ही काम आरम्भ हो जाता है। जिस सुख का आरम्भ अभी गीतों में सुना था, अब उसके लिए निमन्त्रण जा रहा है। दशरथ को बुलाना और यहाँ तैयारी करना, दोनों काम इसी आज्ञा से आगे बढ़ते हैं।
जनक और सीता सुखी हैं। विश्वामित्र बताते हैं कि धनुष की शर्त पूरी हो चुकी है और अब कुल तथा वेद के आचार बड़ों से पूछकर किये जायँ। उनकी आज्ञा से जनक दशरथ को बुलाने के लिए दूत भेजते हैं।
कारीगरों के हाथों उभरता मण्डप
दूतों को भेजने के बाद जनक सब महाजनों को बुलाते हैं। वे आदर से सिर नवाते हैं और राजा उन्हें सारे नगर की सजावट सौंपते हैं। बाजार, रास्ते, घर और देवालय, चारों ओर नगर सँवारा जाना है। इस सूची में उत्सव का फैलाव दिखाई देता है। मण्डप तक पहुँचनेवाला रास्ता भी उसी आनन्द का भाग होगा और रास्ते के घर भी। आज्ञा पाकर महाजन प्रसन्नता से अपने अपने घर लौटते हैं। फिर राजा परिचारकों को बुलाते हैं और विचित्र मण्डप तैयार करने का काम देते हैं।
परिचारक राजवचन सिर पर रखकर सुखपूर्वक चलते हैं। वे उन गुणी कारीगरों को बुलाते हैं जो मण्डप की रचना की विधि जानते हैं। तुलसी यहाँ काम करनेवाले हाथों का परिचय उनकी कुशलता से देते हैं। राजा की इच्छा परिचारकों तक पहुँची है और परिचारकों से उस कला के जानकारों तक। उन्हीं के हाथों अब मण्डप की आकृति बनेगी। काम आरम्भ करने से पहले वे ब्रह्मा की वन्दना करते हैं। रचना का यह पहला क्षण प्रणाम का है; उसके बाद सोने के केले के खम्भे बनते हैं।
पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना । जे बितान बिधि कुसल सुजाना॥
चौपाई २
बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा॥
सोने के इन केले के खम्भों पर हरी मणियों के पत्ते और फल हैं। पोद्दार जी हरी मणियों को पन्ना और पद्मराग को माणिक के रूप में खोलते हैं। उन्हीं माणिकों के फूल बनाये गये हैं। सोने की चमक, पत्तों और फलों का हरा रंग तथा फूलों की लालिमा मिलकर खम्भों में केले का रूप उपस्थित करते हैं। सामग्री और आकृति, दोनों पर कारीगर का ध्यान है। बहुमूल्य धातु और रत्न पत्ते, फल और फूल की पहचान लेकर सामने आते हैं।
हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल।
दोहा २८७
रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल॥ २८७॥
कारीगरों ने आरम्भ में ब्रह्मा को प्रणाम किया था। अब रचना देखकर उसी ब्रह्मा का मन भूल जाने की बात कही गयी है। यह दोहरा उल्लेख शिल्प की प्रशंसा को एक सुन्दर आकार देता है। पहले रचनेवाले का स्मरण करके हाथ काम में लगे थे, अब उन हाथों के कौशल पर रचयिता भी चकित हैं। कवि इस विस्मय के बाद भी आगे बढ़ने की जल्दी नहीं करते। केले के खम्भों के बाद वे बाँस और लता के पास हमें ले जाते हैं।
सभी बाँस हरी मणियों के बनाये गये हैं। वे सीधे हैं और उनकी गाँठें भी बनी हुई हैं। पहचानना कठिन है कि ये मणि के हैं या साधारण बाँस। उस बारीकी को देखिये, केवल बाँस का हरा रंग दे देने से काम पूरा नहीं हुआ। सीधेपन के साथ गाँठें रखी गयी हैं, जिनसे आँख को बाँस की पूरी पहचान मिलती है। इसी प्रकार सोने की नागबेलि बनाई गयी है। टीका इसे पान की लता बताती है। अपने पत्तों सहित वह ऐसी सुहावनी है कि उसकी बनावट सहज पहचानी नहीं जाती।
इस नागबेलि को रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन बनाये गये हैं। मण्डप में बाँधने का काम करनेवाली चीज भी उसी कला में शामिल है। बीच बीच में मोतियों की झालरें सुशोभित हैं। फिर माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे लेकर कमल रचे जाते हैं। रत्नों को चीरना, कोरना और पच्चीकारी में बैठाना, तुलसी इन क्रियाओं को अलग रखते हैं। कमल की आकृति में जुड़ने से पहले प्रत्येक रत्न पर हाथ का काम हुआ है। टीका उनके लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंगों को भी स्पष्ट करती है।
नगर को सजाने की आज्ञा के साथ मण्डप का काम गुणी कारीगरों को मिलता है। ब्रह्मा की वन्दना करके वे सोने के केले, पन्ने के पत्ते, फल और बाँस, माणिक के फूल, सोने की पानलता, मोतियों की झालरें और अनेक रत्नों के कमल रचते हैं।
हवा में गूँजते भौंरे और मणियों के दीप
कमलों के पास भौंरे बनाये गये हैं और अनेक रंगों के पक्षी भी। हवा लगने पर भौंरे गूँजते हैं, पक्षी कूजते हैं। अभी तक मण्डप की रचना रंग और आकार में सामने थी; यहाँ उसमें ध्वनि भी आ जाती है। कवि हवा का प्रसंग कहकर उस ध्वनि को सुनाते हैं। पत्तों और फूलों की पहचान में जो सहजता थी, वही इन भौंरों और पक्षियों में उनके स्वर से आती है। देखनेवाली आँख के साथ अब सुननेवाला कान भी इस रचना का सुख पाता है।
किए भृंग बहुरंग बिहंगा । गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा॥
चौपाई ३
सुर प्रतिमा खंभन गढ़ि काढ़ीं । मंगल द्रब्य लिएँ सब ठाढ़ीं॥
खम्भों पर देवताओं की प्रतिमाएँ गढ़ी गयी हैं। सभी मंगल के द्रव्य हाथ में लिये खड़ी हैं। खम्भों पर इन देवप्रतिमाओं की उपस्थिति मण्डप की मंगलसज्जा को और पूरा करती है। प्रतिमाओं के हाथ खाली नहीं हैं। विवाह के स्वागत में जिन वस्तुओं की शोभा है, उन्हीं को लेकर वे खड़ी दिखाई देती हैं। कारीगर की छेनी खम्भों पर आकृति उभारती है और उस आकृति की मुद्रा पूरी तैयारी में सम्मिलित हो जाती है।
धरती पर अनेक प्रकार के चौक पुराये गये हैं। इनके लिए तुलसी जिस मणि का नाम रखते हैं, टीका उसे गजमुक्ता बताती है। उन मोतियों से बने चौक सहज ही सुहावने हैं। मण्डप की शोभा ऊपर के वितान और खम्भों से उतरकर नीचे तक पहुँचती है। कहीं गाँठों सहित मणियों के बाँस हैं, कहीं मोतियों की झालरें और यहाँ पाँवों के निकट ये अलग अलग चौक। एक ही स्थान को कई दिशाओं से सजाया जा रहा है और प्रत्येक दिशा का अपना ढंग है।
अब आम के पत्तों की रचना आती है। नीलमणि को कोरकर बहुत सुन्दर पत्ते बनाये गये हैं। सोने के बौर हैं और पन्ने के फलों के गुच्छे रेशम की डोरी से बँधे शोभा पा रहे हैं। केले के खम्भों में पन्ने के पत्ते और माणिक के फूल थे; यहाँ आम के पल्लवों के लिए नीलमणि ली गयी है। सामग्री का यह फेर अलग आकृतियों को उनका अपना रंग देता है। सोने के बौर और हरे गुच्छों के साथ रेशम की डोरी भी दिखाई देती है, जो उन्हें बाँधे हुए है।
सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि।
दोहा २८८
हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि॥ २८८॥
बंदनवार इतने रुचिर बनाये गये हैं कि कवि उन्हें कामदेव के सजाये फन्दों जैसे कहते हैं। देखने का मन उन्हीं में उलझता है। केले, पानलता, कमल और आम के बाद अब द्वार की यह सजावट भी पूरी होती है। अनेक मंगल कलश तैयार हैं। ध्वजाएँ, पताकाएँ, परदे और चँवर शोभा दे रहे हैं। इन सबके बीच मणियों के अनेक मनोहर दीपक हैं। रंगीन रत्नों की रचना के पास दीपों का यह प्रकाश जुड़ता है और पूरा वितान एक साथ सामने आ खड़ा होता है।
इतना विस्तार देने के बाद तुलसी कहते हैं कि इस विचित्र मण्डप का वर्णन नहीं किया जा सकता। उनके इस ठहराव तक आते आते हम उसकी कितनी छोटी बातें देख चुके हैं: बाँस की गाँठें, लता के पत्ते, बाँधने की रचना, रत्नों को कोरने का काम, हवा से उठता स्वर और रेशम की डोरी। अब कवि उस मण्डप की दुलहिन का नाम लेते हैं, वैदेही। जिस मण्डप में वे दुलहिन होंगी, उसका पूरा वर्णन करने की बुद्धि किस कवि में है। सारी शिल्पशोभा इस नाम के आसपास एकत्र हो जाती है।
मण्डप में हवा से गूँजनेवाले भौंरे और पक्षी, मंगलद्रव्य लिये देवप्रतिमाएँ, गजमुक्ता के चौक, नीलमणि के आमपल्लव, सोने के बौर और पन्ने के गुच्छे हैं। बंदनवारों, कलशों, ध्वजाओं, परदों, चँवरों और मणियों के दीपों से वितान सँवरता है।
जनक के भवन से नगर के प्रत्येक घर तक
दुलहिन वैदेही के साथ अब दूल्हे का परिचय आता है। राम रूप और गुणों के समुद्र हैं। जिस वितान में वे दूल्हे होंगे, उसकी ख्याति तीनों लोकों में फैलनी ही है। मण्डप की शोभा को समझाने के लिए कवि उसके भीतर होनेवाले इस मिलन को सामने रखते हैं। अभी वहाँ तैयारी का वैभव है। सीता और राम के नाम उस वैभव का केन्द्र बताते हैं। उन्हीं के लिए ये मंगल कलश बने हैं, उन्हीं के लिए बंदनवार सजे हैं।
फिर दृष्टि मण्डप से बाहर जाती है। जनक के भवन की जैसी शोभा है, वैसी ही नगर के प्रत्येक घर में दिखाई देती है। महाजनों को बाजार, रास्ते, घर और देवालय सजाने की जो आज्ञा मिली थी, उसका विस्तार यहाँ दिखाई देता है। राजभवन की सुन्दरता सारे नगर में फैल गयी है। तुलसी घर घर का उल्लेख करके हमें उस आज्ञा का फल दिखाते हैं। जिस ओर दृष्टि जाती है, उसी उत्सव की सजावट मिलती है।
तिरहुत को उस समय जिसने देखा, उसके लिए चौदह भुवन छोटे लगने लगे। मामूली घर में भी जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र तक मोहित हो जाते थे। नगर का वर्णन राजमहल के ऐश्वर्य से आरम्भ होकर इन छोटे घरों तक आता है। इसी पहुँच से हम उस उत्सव का आकार समझते हैं। जहाँ घर की हैसियत छोटी है, वहाँ की शोभा भी देवताओं के राजा को चकित करनेवाली कही गयी है।
बसइ नगर जेहिं लच्छि करि कपट नारि बर बेषु।
दोहा २८९
तेहि पुर कै सोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु॥ २८९॥
इस दोहे में कवि नगर के सौभाग्य को एक और परिचय देते हैं। वहाँ साक्षात् लक्ष्मी सुन्दर स्त्री का रूप धरकर बसती हैं। जिस नगर में सीता का ऐसा निवास है, उसकी शोभा कहते हुए सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं। मण्डप बनानेवाले हाथों की कुशलता, नगर के घरों की सम्पन्नता और उनमें बसनेवाली लक्ष्मी, सब अब एक साथ दिखाई देते हैं। वर्णन के अन्त में आयी यह बात जनकपुर की उस अपार शोभा का कारण बनकर ठहरती है।
राम और सीता के विवाह का मण्डप तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। जनक के भवन जैसी शोभा नगर के घर घर में है। लक्ष्मी जहाँ सीता के रूप में बसती हैं, उस नगर का वर्णन करते हुए सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं।
हाथ में चिट्ठी, हृदय में दोनों पुत्र
जनक के भेजे दूत राम की पवित्र पुरी अयोध्या पहुँचते हैं। सुन्दर नगर को देखकर उन्हें हर्ष होता है। वे राजद्वार पर अपने आने की सूचना देते हैं और दशरथ सुनकर उन्हें भीतर बुला लेते हैं। दूत प्रणाम करके पत्रिका आगे बढ़ाते हैं। प्रसन्न राजा स्वयं उठकर उसे ग्रहण करते हैं। अभी समाचार शब्द बनकर सभा के सामने नहीं आया है; पत्रिका हाथ में लेने के लिए राजा का उठना ही बता देता है कि यह आगमन उनके लिए कितना प्रिय है।
करि प्रनामु तिन्ह पाती दीन्ही । मुदित महीप आपु उठि लीन्ही॥
चौपाई ४
बारि बिलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आई भरि छाती॥
दशरथ पत्रिका पढ़ते हैं तो आँखों में जल भर आता है। शरीर पुलकित होता है और छाती भर जाती है। तुलसी इन तीनों को एक ही क्षण के भीतर रख देते हैं। पढ़नेवाली आँखें आँसुओं से भर गयी हैं, समाचार पाकर देह में रोमांच है और बोलने के लिए हृदय इतना भरा है कि वाणी आगे नहीं बढ़ती। भीतर राम और लक्ष्मण हैं, हाथ में सुन्दर चिट्ठी है। राजा उसी प्रकार उसे लिये रह जाते हैं। उनसे कोई बात कही नहीं जाती।
यह छोटा ठहराव पत्रिका को हमें पिता के हाथ में देखने देता है। उसके अक्षरों से अपने दोनों पुत्रों की सुधि मिली है और उसी सुधि ने बोलना रोक दिया है। फिर दशरथ धीरज धरते हैं और पत्रिका पढ़कर सुनाते हैं। सभा सच्चा समाचार सुनकर हर्षित होती है। पिता के मन में जो सुख पहले आया था, वह अब उपस्थित लोगों तक पहुँचता है। पत्रिका की पहली यात्रा जनकपुर से अयोध्या की थी; यहाँ पहुँचकर उसका समाचार एक हृदय से पूरी सभा तक फैलता है।
उधर भरत अपने मित्रों और भाई शत्रुघ्न के साथ खेल रहे थे। वहीं समाचार मिला तो वे आ गये। उनके प्रश्न में बहुत प्रेम है और संकोच भी। वे पिता से पूछते हैं कि चिट्ठी कहाँ से आयी है। फिर अपने प्राणप्रिय दोनों भाइयों की कुशल पूछते हैं और यह भी जानना चाहते हैं कि वे किस देश में हैं। उनके लिए पत्रिका का पहला अर्थ भाइयों की सुधि है। खेलने की जगह तक पहुँची सूचना उन्हें पिता के पास ले आयी है और अब सारा मन उसी उत्तर में लगा है।
कुसल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं कहहु केहिं देस।
दोहा २९०
सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस॥ २९०॥
दशरथ इन स्नेह से सने वचनों को सुनकर चिट्ठी फिर पढ़ते हैं। भरत और शत्रुघ्न दोनों पुलकित हो जाते हैं। प्रेम इतना बढ़ा है कि देह में समाता नहीं। थोड़ी देर पहले पिता की आँखें भर आयी थीं और देह पुलकित हुई थी; अब भाइयों का शरीर भी उसी समाचार का आनन्द प्रकट कर रहा है। तुलसी भरत की प्रीति को पवित्र कहते हैं। सभा उनके इस प्रेम को देखकर विशेष सुख पाती है। एक बार पत्रिका के समाचार ने सभा को प्रसन्न किया था, अब उसे सुननेवाले भाई का प्रेम प्रसन्न कर रहा है।
इस बार पत्रिका पढ़े जाने में एक नया श्रोता आ गया है, इसलिए उसी बात का रस भी नया है। दशरथ उसे पहले पढ़ चुके हैं, फिर भी भरत के पूछने पर पूरा सुनाते हैं। पिता और दोनों छोटे भाई अपने प्रियजनों की कुशल में एक साथ सुखी हैं। सभा उस सुख की साक्षी बनती है। समाचार में राम और लक्ष्मण के कर्म हैं, उसे सुनते हुए यहाँ परिवार की प्रीति दिखाई दे रही है। दोनों चित्र साथ बने रहते हैं।
दूतों की पत्रिका दशरथ स्वयं उठकर लेते हैं। पढ़ते हुए आँसू और प्रेम से वे बोल नहीं पाते, फिर धीरज धरकर सभा को सुनाते हैं। भरत और शत्रुघ्न आते हैं, चिट्ठी दोबारा पढ़ी जाती है और दोनों का प्रेम देखकर सभा और सुखी होती है।
दूतों से पिता की बारम्बार पूछताछ
अब दशरथ दूतों को पास बैठाते हैं। उनके वचन मधुर हैं और सामने बैठे लोगों को अपनेपन से भर देते हैं। वे भैया कहकर दोनों बच्चों की कुशल पूछते हैं। क्या उन्होंने अपनी आँखों से दोनों को अच्छी तरह देखा है? पत्रिका के बाद अब राजा उन आँखों से सुनना चाहते हैं जो राम और लक्ष्मण को देखकर आयी हैं। पास बैठाने की क्रिया भी इसी इच्छा के साथ है। दूत उनके निकट हैं और बात दोनों बच्चों की हो रही है।
दशरथ दोनों का रूप बताते हैं। एक साँवले हैं, दूसरे गोरे; धनुष और तरकस धारण करते हैं; किशोर अवस्था है और विश्वामित्र के साथ हैं। यदि दूत उन्हें पहचानते हैं तो उनका स्वभाव भी कहें। तुलसी इसी के साथ स्पष्ट करते हैं कि प्रेम के वश होकर राजा बारम्बार ऐसी बातें पूछ रहे हैं। उनकी स्मृति में दोनों पुत्रों का रूप पूरा है। वे उसी परिचित छवि को सामने बैठे प्रत्यक्षदर्शियों की बात में फिर पाना चाहते हैं।
स्यामल गौर धरें धनु भाथा । बय किसोर कौसिक मुनि साथा॥
चौपाई ५
पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ । प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ॥
राजा इस उत्सुकता का कारण भी बताते हैं। जिस दिन मुनि दोनों को लिवा ले गये थे, उसके बाद आज उन्हें सच्ची सुधि मिली है। यह वाक्य अब तक के उनके सारे प्रश्नों को जोड़ देता है। वे कुशल पूछते हैं, रूप बताते हैं, स्वभाव जानना चाहते हैं और फिर पूछते हैं कि जनक ने उन्हें किस प्रकार पहचाना। पत्रिका पढ़ लेने के बाद भी सुनने की चाह बनी हुई है। राम और लक्ष्मण की बात से पिता का मन हटता ही नहीं।
दूत राजा के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर मुसकराते हैं। उनके उत्तर में भी स्नेह और आदर है। वे दशरथ को राजाओं का मुकुटमणि कहते हैं और उनके सौभाग्य का बखान करते हैं। जिनके राम और लक्ष्मण जैसे पुत्र हैं, उनके समान धन्य और कौन है? दोनों विश्व के आभूषण हैं। प्रश्न दो बालकों की पहचान का था; उत्तर उनकी ऐसी शोभा से आरम्भ होता है जो सारे विश्व को सुन्दर बनाती है। पिता के सामने दूत अपनी देखी महिमा रखते हैं।
सुनहु महीपति मुकुट मनि तुम्ह सम धन्य न कोउ।
दोहा २९१
रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व बिभूषन दोउ॥ २९१॥
वे आगे दोनों को तीनों लोकों का प्रकाश और पुरुषसिंह कहते हैं। उनके यश के सामने चन्द्रमा मलिन लगता है और प्रताप के सामने सूर्य शीतल। फिर दशरथ के पहचानवाले प्रश्न पर लौटते हैं। ऐसे पुत्रों को कैसे पहचाना, यह पूछने पर दूत सूर्य और दीपक की उपमा देते हैं। सूर्य को देखने के लिए हाथ में दीपक लेने की क्या आवश्यकता है? उनका आशय है कि दोनों की पहचान उनके रूप, गुण और प्रताप में स्वयं प्रकाशित है। यह प्रशंसा सुनाने के बाद वे स्वयंवर का वृत्तान्त आरम्भ करते हैं।
दशरथ प्रेम के वश होकर दूतों से दोनों पुत्रों की कुशल और स्वभाव बारम्बार पूछते हैं। दूत उनके सौभाग्य को प्रणाम करते हुए राम और लक्ष्मण को विश्व का आभूषण बताते हैं और अपनी देखी घटनाएँ सुनाने लगते हैं।
दूतों के वचनों में पराक्रम और मर्यादा
दूत बताते हैं कि सीता के स्वयंवर में अनेक राजा आये थे। एक से बढ़कर एक योद्धा वहाँ एकत्र थे, फिर भी कोई शिव के धनुष को हटा नहीं सका। सभी बलवान वीर हार गये। तीनों लोकों में जो अपनी वीरता का अभिमान रखते थे, उस धनुष ने सबकी शक्ति का मान तोड़ दिया। पिता ने पूछा था कि जनक ने दोनों को कैसे पहचाना; दूत अब उस सभा की दशा सुनाकर राम के पराक्रम का आकार बताते हैं।
इस वर्णन में वे उन दो बलवानों का भी उल्लेख करते हैं जिन्हें पोद्दार जी की टीका बाणासुर और रावण के नाम से पहचानती है। बाणासुर सुमेरु उठा सकनेवाला था, फिर भी हृदय में हार मानकर परिक्रमा करके चला गया। रावण ने खेल में कैलास उठा लिया था; उसे भी उस सभा में पराजय मिली। दूतों के इस कथन में दोनों के बल का परिचय और उनके हारने की बात साथ रखी है। वे उसी क्रम में आगे राम का कार्य सुनाते हैं।
तहाँ राम रघुबंसमनि सुनिअ महा महिपाल।
दोहा २९२
भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल॥ २९२॥
जहाँ इतने वीर हार चुके थे, वहाँ रघुवंशमणि राम ने बिना प्रयास धनुष तोड़ दिया। दूत उसके लिए हाथी और कमल की डंडी की उपमा देते हैं। एक ओर हाथी का सहज बल है, दूसरी ओर उसके सामने कमल की कोमल डंडी। शिव का धनुष राम के हाथ में टूटने का वेग इसी तुलना से बताया गया है। अभी जिन बलवानों के प्रयासों की निष्फलता सुनी थी, उसके बाद राम की सहजता का समाचार आता है। दशरथ अपने पुत्र का वह कर्म उन्हीं लोगों से सुन रहे हैं जिन्होंने उसे देखा था।
दूत आगे कहते हैं कि धनुष टूटने की बात सुनकर परशुराम क्रोध सहित आये। उन्होंने अनेक प्रकार से आँखें दिखायीं। अन्त में राम का बल देखकर उन्होंने अपना धनुष उन्हें दे दिया और बहुत विनय करके वन चले गये। इस कथन में उनका क्रोध, राम के बल की पहचान, धनुष देना, विनय और प्रस्थान, सब संक्षेप में आता है। दूत दशरथ को बताने के लिए पूरी बात का क्रम सँभालते हैं। उनके वचनों से सभा को ज्ञात हो रहा है कि धनुषभंग के बाद क्या हुआ।
राम के अतुलनीय बल के साथ वे लक्ष्मण के तेज का वर्णन करते हैं। लक्ष्मण के देखने भर से राजा वैसे काँपते थे जैसे सिंह के बच्चे की दृष्टि से हाथी काँप उठते हैं। यह उपमा भी किशोर अवस्था के साथ बल का प्रभाव दिखाती है। फिर दूत अपना अनुभव कहते हैं कि महाराज के दोनों बालकों को देखने के बाद उनकी दृष्टि पर कोई दूसरा चढ़ता ही नहीं। यह सुनाते हुए उनके भीतर दोनों की छवि अभी बनी हुई है। उनकी वाणी प्रेम, प्रताप और वीर रस में पगी है और सबको बहुत प्रिय लगती है।
दशरथ और पूरी सभा अनुराग में मग्न हो जाते हैं। राजा दूतों को निछावर देने लगते हैं। इस पर दूत उसे नीति के विरुद्ध कहकर कान मूँदते हैं। जिस आदर से उनका कथन सुना गया था, उसी आदर से उनके इस आचरण को भी देखा जाता है। सब धर्म का विचार करके सुख मानते हैं। राजा की ओर से प्रेम देने को बढ़ा था और दूतों की ओर से अपनी मर्यादा का निर्वाह सामने आया। सभा को दोनों की यह भेंट आनन्द देती है।
सभा समेत राउ अनुरागे । दूतन्ह देन निछावरि लागे॥
चौपाई ६
कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना॥
दूत स्वयंवर के वीरों की हार, राम के सहज धनुषभंग, परशुराम के धनुष देकर वन जाने और लक्ष्मण के तेज का वृत्तान्त सुनाते हैं। दशरथ निछावर देना चाहते हैं; दूत नीति का विचार कहकर अस्वीकार करते हैं और सब उनके आचरण से प्रसन्न होते हैं।
वसिष्ठ का आशीर्वचन, चारों बालकों का गुणगान
दूतों की बात सुनने के बाद दशरथ उठकर गुरु वसिष्ठ के पास जाते हैं और उन्हें जनक की पत्रिका देते हैं। दूतों को भी आदर से बुलाते हैं। इस प्रकार लिखित समाचार और उसे विस्तार से कहनेवाले लोग, दोनों गुरु के सामने पहुँचते हैं। सारी कथा वसिष्ठ को सुनायी जाती है। जनकपुर में विश्वामित्र की आज्ञा से निमन्त्रण भेजा गया था; अयोध्या में अब दशरथ अपने गुरु के पास आगे का मार्ग लेने पहुँचे हैं।
समाचार सुनकर वसिष्ठ को अत्यन्त सुख होता है। वे कहते हैं कि पुण्यात्मा पुरुष के लिए पृथ्वी सुखों से छायी है। नदियाँ समुद्र में जाती हैं, यद्यपि समुद्र को उनकी कामना नहीं होती। वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना बुलाये स्वभाव से धर्मशील मनुष्य के पास पहुँचते हैं। गुरु इस उपमा से दशरथ के घर आये सुख को देखते हैं। अभी जनक की पत्रिका ने पिता को आनन्द दिया है; वसिष्ठ उसमें उनके धर्मपूर्ण जीवन के फल की पहचान करते हैं।
तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ । धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ॥
चौपाई ७
तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी॥
वसिष्ठ दशरथ की गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवता के प्रति सेवा का उल्लेख करते हैं। उनके साथ कौसल्या की पवित्रता को भी रखते हैं। जैसे राजा इन सबकी सेवा करनेवाले हैं, वैसी ही कौसल्या देवी भी हैं। इस प्रशंसा में पति और पत्नी दोनों के आचरण का स्मरण है। जिस परिवार में यह शुभ समाचार आया है, गुरु उसके पुण्य का बखान कर रहे हैं और उसमें माता का नाम भी पूरा आदर पाता है।
आगे वे दशरथ के सौभाग्य को और ऊँचे शब्दों में कहते हैं। उनके समान पुण्यात्मा जगत में कोई हुआ नहीं, है नहीं और होनेवाला भी नहीं। राम जैसे पुत्र जिनके हों, उनसे अधिक पुण्य किसका होगा? वसिष्ठ की वाणी में समाचार सुनने का हर्ष अब राजा के लिए आशीर्वचन बन रहा है। फिर गुणों का यह बखान चारों बालकों तक पहुँचता है। वे सब वीर हैं, विनम्र हैं, धर्म का व्रत धारण करनेवाले हैं और गुणों के सुन्दर समुद्र हैं।
बीर बिनीत धरम ब्रत धारी । गुन सागर बर बालक चारी॥
चौपाई ८
तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना । सजहु बरात बजाइ निसाना॥
चारों का यह साथ उल्लेख उस घर की प्रसन्नता को पूरा करता है। अभी दूतों से राम और लक्ष्मण का पराक्रम सुना गया था और सभा ने भरत तथा शत्रुघ्न का स्नेह देखा था। अब गुरु चारों के लिए वीरता, विनय और धर्म का एक ही बखान करते हैं। वे दशरथ से कहते हैं कि उनके लिए सदा कल्याण है; डंका बजवाकर बारात सजायें और शीघ्र चलें। आशीर्वाद के साथ आवश्यक काम की स्पष्ट आज्ञा मिल गयी है।
दशरथ गुरु के वचन सुनकर सिर नवाते हैं और आदर से स्वीकार करते हैं। वे दूतों को ठहरने का स्थान दिलवाते हैं, फिर महल में जाते हैं। आनेवाले अतिथियों का प्रबन्ध हो गया है और अब घर की माताओं को समाचार सुनाना है। राजा के हाथ में जो पत्रिका सभा और गुरु तक गयी थी, वह आगे रनिवास में अपना आनन्द पहुँचायेगी। विवाह की तैयारी का आदेश मिल चुका है; इस घड़ी राजा उस सुख को परिवार में बाँटने जा रहे हैं।
वसिष्ठ पत्रिका और दूतों का वृत्तान्त सुनकर दशरथ तथा कौसल्या के पुण्य की प्रशंसा करते हैं। चारों पुत्रों को वीर, विनीत और धर्मव्रती बताते हुए वे शीघ्र बारात सजाने का आदेश देते हैं। दूतों को डेरा दिलवाकर दशरथ महल जाते हैं।
माताओं के हृदय से लगती पत्रिका
महल में आकर दशरथ सारे रनिवास को बुलाते हैं और जनक की पत्रिका पढ़कर सुनाते हैं। सभी रानियाँ समाचार पाकर हर्षित होती हैं। राजा उसके बाद बाकी बातें भी बताते हैं जो दूतों के मुख से सुनी थीं। लिखे हुए समाचार के साथ अब वह पूरा वृत्तान्त माताओं के सामने है। वे दोनों पुत्रों की कुशल सुनती हैं और उनके कर्मों का यश भी। सभा में कही गयी बात घर में पहुँचकर माताओं के प्रेम से मिलती है।
प्रेम से प्रफुल्लित रानियों के लिए तुलसी बादलों की गरज सुनकर आनन्दित हुई मोरनियों की उपमा देते हैं। समाचार का स्वर यहाँ बादल की वाणी की तरह पहुँचा है और उसका सुख उनके पूरे रूप में दिखाई देता है। आदरयोग्य बड़ी स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं। माताएँ अत्यन्त आनन्द में मग्न हैं। जनकपुर के आरम्भिक मंगलगान के बाद अब अयोध्या के रनिवास में भी वाणी आशीर्वाद का रूप लेती है।
लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुड़ावहिं छाती॥
चौपाई ९
राम लखन कै कीरति करनी। बारहिं बार भूपबर बरनी॥
वह पत्रिका उन्हें अत्यन्त प्रिय है। वे उसे एक दूसरे से लेती हैं और हृदय से लगाकर अपनी छाती शीतल करती हैं। दशरथ के हाथ में आते ही इसी पत्रिका ने उनकी छाती भर दी थी; अब माताओं के वक्ष से लगकर वह ठण्डक देती है। एक ही कागज में दोनों प्रिय पुत्रों की सुधि है। उसकी बात सुन ली गयी है, फिर भी उसे अपने हाथ में लेने और हृदय से लगाने का सुख अलग है। तुलसी इस छोटे से आदान प्रदान में माताओं का अनुराग दिखाते हैं।
दशरथ राम और लक्ष्मण की कीर्ति तथा करनी का बारम्बार वर्णन करते हैं। पिता स्वयं दूतों से फिर फिर पूछ रहे थे; अब उन्हीं बातों को माताओं के सामने फिर फिर कह रहे हैं। प्रिय पुत्रों का समाचार जितना सुनने में सुहाता है, उतना ही सुनाने में भी। अन्त में वे कहते हैं कि यह सब मुनि की कृपा है और बाहर चले आते हैं। जनक ने विश्वामित्र के सामने इसी कृपा का स्मरण करके आगे का काम पूछा था। दशरथ अपने घर में पुत्रों का बखान करके उसी कृतज्ञता को वाणी देते हैं।
राजा के बाहर जाने पर रानियाँ ब्राह्मणों को बुलाती हैं। आनन्द के साथ उन्हें दान दिया जाता है और श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले जाते हैं। इसके बाद याचकों को बुलाया जाता है। उन्हें करोड़ों प्रकार की निछावरें दी जाती हैं। घर का हर्ष इस प्रकार देने की क्रिया में आगे बढ़ता है। जो समाचार माताओं ने हृदय से लगाया था, उसी के आनन्द में बुलाये हुए लोगों को सम्मान और दान मिल रहा है।
जाचक लिए हँकारि दीन्हि निछावरि कोटि बिधि।
सोरठा २९५
चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दसरत्थ के॥ २९५॥
याचक चक्रवर्ती दशरथ के चारों पुत्रों के लिए दीर्घ जीवन का आशीर्वाद देते हैं। वसिष्ठ के वचन में चारों बालकों का गुणगान आया था, अब इसी घर के दान को पाकर चारों के लिए शुभकामना उठती है। पत्रिका राम और लक्ष्मण की सुधि लायी थी। उससे भरत और शत्रुघ्न पुलकित हुए, माताएँ आनन्द में डूबीं और अन्त में आशीर्वाद चारों भाइयों को एक साथ मिला। प्रसन्न घर की यही पूरी छवि इस सोरठे में ठहरती है।
रानियाँ जनक की पत्रिका और दूतों का वृत्तान्त सुनकर हर्षित होती हैं। वे पत्रिका हृदय से लगाती हैं, ब्राह्मणों को दान देती हैं और फिर याचकों को निछावरें देती हैं। याचक दशरथ के चारों पुत्रों के दीर्घ जीवन की कामना करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में आनन्द को बारम्बार किसी काम का रूप मिलता है। जनक सुखी होते हैं तो गुरु से आगे का विधान पूछते हैं। महाजन घर लौटकर नगर सँवारने में लगते हैं, कारीगर मण्डप रचते हैं। दशरथ पत्रिका सुनकर गुरु के पास जाते हैं और माताएँ समाचार पाकर दान करती हैं। हर्ष प्रत्येक जगह अपने अनुसार कुछ करता है। सोने की लता में पत्ते बनानेवाला हाथ और पुत्रों की पत्रिका हृदय से लगानेवाला हाथ, दोनों की छोटी क्रियाओं को तुलसी धैर्य से दिखाते हैं।
सुनने की चाह भी इस कथा में कितनी जगह आती है। जनक उचित आचार सुनना चाहते हैं। दशरथ दोनों पुत्रों की कुशल दूतों से बारम्बार पूछते हैं। भरत के आने पर पत्रिका फिर पढ़ी जाती है और माताओं के सामने वही समाचार फिर खुलता है। हर नये सुननेवाले के साथ बात में अपना एक स्नेह जुड़ जाता है। हम दशरथ की पूछताछ में पिता का मन देखते हैं, भरत के प्रश्न में भाई की प्रीति और पत्रिका को वक्ष से लगाती रानियों में माता का सुख।
मण्डप की रचना में तुलसी ने बाँस की गाँठ तक दिखाई थी। परिवार के इस आनन्द में भी वे उतनी ही छोटी बात दिखाते हैं: राजा स्वयं उठकर पत्रिका लेते हैं, दूत पास बैठाये जाते हैं, माताएँ चिट्ठी एक दूसरे से लेती हैं। इन्हीं क्रियाओं से विशाल उत्सव हमारे निकट आता है। जनकपुर का वैभव मणियों के दीपों में चमकता है और अयोध्या का प्रेम हाथ में रखी उस प्रिय पत्रिका में दिखाई देता है।
जनकपुर में विवाह का मण्डप सँवर गया है। अयोध्या में गुरु ने शीघ्र बारात सजाने की आज्ञा दी है और माताओं के घर से दान तथा आशीर्वाद की ध्वनि उठ रही है। हम इसी शुभकामना के साथ ठहरते हैं कि दशरथ के चारों पुत्र दीर्घजीवी हों। दोनों नगरों को जोड़ने आयी पत्रिका ने पिता, भाइयों और माताओं को एक ही आनन्द में भर दिया है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २८६ से सोरठा २९५ तक का प्रसंग, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।