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जनकपुर का मण्डप और दशरथ को विवाह का समाचार

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 34

मणियों से सँवरता जनकपुर, अयोध्या पहुँची एक प्रिय पत्रिका। और उसे बारम्बार सुनते हुए पिता, भाई और माताएँ।

जनकपुर में बाजे बज रहे हैं, स्त्रियाँ समूह बनाकर मंगल गा रही हैं। जनक का हृदय सुख से भर गया है और सीता का भय उतर चुका है। राजा गुरु को प्रणाम करके आगे का मार्ग पूछते हैं। उनकी आज्ञा से अयोध्या को दूत भेजे जाते हैं। जनकपुर में ऐसा मण्डप रचा जाने लगता है जिसके खम्भों, पत्तियों और फूलों तक में कारीगरों की कुशलता दिखाई देती है।

अयोध्या में जनक की पत्रिका दशरथ के हाथ में आती है, जिसमें दोनों प्रिय पुत्रों का समाचार है। पिता उसे पढ़ते हैं और भरत के पूछने पर फिर पढ़ते हैं। साथ आये दूत जनकपुर का वृत्तान्त सुनाते हैं, गुरु वसिष्ठ बारात सजाने का आदेश देते हैं, और रानियाँ पत्रिका सुनती हैं।

जनकपुर और अयोध्या के लोग

  • जनक सीता के पिता, जो विश्वामित्र से आगे का विधान पूछकर दूत भेजते और नगर सजवाते हैं।
  • सीता और राम जिनके विवाह के लिए मण्डप रचा जा रहा है। सीता का भय मिटा है और राम के पराक्रम का समाचार अयोध्या पहुँचता है।
  • लक्ष्मण राम के साथ उपस्थित तेजस्वी भाई, जिनकी प्रशंसा भी दूत दशरथ से करते हैं।
  • विश्वामित्र जनक को कुल और वेद के आचार पूरे करने तथा दशरथ को बुलाने का निर्देश देनेवाले मुनि।
  • दशरथ पत्रिका पाकर भावविह्वल पिता, जिन्हें दोनों पुत्रों की कुशल बारम्बार सुननी है।
  • भरत और शत्रुघ्न खेलते समय समाचार पाकर आनेवाले भाई, जो पत्रिका सुनकर पुलकित होते हैं।
  • वसिष्ठ दशरथ के पुण्य, कौसल्या की पवित्रता तथा चारों पुत्रों के गुणों का बखान करके बारात की आज्ञा देनेवाले गुरु।
  • रानियाँ और जनक के दूत माताएँ पत्रिका हृदय से लगाती हैं। दूत जनकपुर का वृत्तान्त सुनाकर सबको आनन्द देते हैं।

जनक का सुख, और गुरु से अगली बात

बाजे खूब जोर से बज रहे हैं और सबने मंगल के साज सजा लिये हैं। सुन्दर मुख, सुन्दर नेत्र और कोयल जैसी मधुर वाणीवाली स्त्रियाँ झुण्ड बनाकर गाती हैं। जनक का सुख कहा नहीं जाता, मानो जन्म से निर्धन रहे मनुष्य के हाथ खजाना लग गया हो।

सीता का भय चला गया है, और वे ऐसी सुखी हैं जैसे चन्द्रमा के उदय पर चकोरकुमारी।

जनक विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं। वे कहते हैं कि राम ने प्रभु की कृपा से धनुष तोड़ा है, और दोनों भाइयों ने उन्हें कृतार्थ कर दिया। फिर वे पूछते हैं कि अब जो उचित हो, वह कहिये।

विश्वामित्र कहते हैं कि विवाह धनुष के अधीन था, और धनुष के टूटते ही विवाह हो गया। देवता, मनुष्य और नाग सब इसे जानते हैं। फिर भी जनक अपने कुल की प्रथा के अनुसार, ब्राह्मणों, कुल के वृद्धों और गुरुओं से पूछकर, वेद में कहे आचार के अनुसार व्यवहार करें।

विश्वामित्र यह भी कहते हैं कि अयोध्या दूत भेजे जायँ, जो दशरथ को बुला लावें। जनक प्रसन्न होकर आज्ञा स्वीकार करते हैं और उसी समय दूत बुलाकर भेज देते हैं।

कारीगरों के हाथों उभरता मण्डप

दूतों को भेजकर जनक सब महाजनों को बुलाते हैं। वे आदर से सिर नवाते हैं, और राजा उन्हें बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगर को चारों ओर से सजाने की आज्ञा देते हैं। महाजन प्रसन्न होकर अपने अपने घर लौटते हैं। फिर राजा सेवकों को बुलाकर विचित्र मण्डप तैयार करने का काम देते हैं।

सेवक राजवचन सिर पर रखकर सुखपूर्वक चलते हैं, और उन गुणी कारीगरों को बुलाते हैं जो मण्डप की रचना की विधि जानते हैं। कारीगर ब्रह्मा की वन्दना करके काम आरम्भ करते हैं, और सोने के केले के खम्भे बनाते हैं।

हरी मणियों के पत्ते और फल हैं और पद्मराग के फूल। पोद्दार हरी मणियों को पन्ना और पद्मराग को माणिक बताते हैं।

मण्डप की अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्मा का मन भूल जाता है।

सभी बाँस हरी मणियों के बने हैं, सीधे और गाँठोंवाले, और पहचाने नहीं जाते। टीका के अनुसार यह पहचाना नहीं जाता कि ये मणि के हैं या साधारण बाँस। इसी प्रकार सोने की नागबेलि बनायी गयी है, जिसे टीका पान की लता बताती है। अपने पत्तों सहित वह ऐसी सुहावनी है कि पहचानी नहीं जाती।

इसी नागबेलि को रचकर और पच्चीकारी करके बाँधने के बन्धन बनाये गये हैं, और बीच बीच में मोतियों की झालरें सुशोभित हैं। फिर माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे को चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके कमल रचे जाते हैं। टीका उनके लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंग बताती है।

हवा में गूँजते भौंरे और मणियों के दीप

भौंरे बनाये गये हैं और अनेक रंगों के पक्षी भी, जो हवा लगने पर गूँजते और कूजते हैं।

खम्भों पर देवताओं की प्रतिमाएँ गढ़ी गयी हैं, जो सब मंगल के द्रव्य हाथ में लिये खड़ी हैं।

धरती पर अनेक प्रकार के चौक पुराये गये हैं। ये चौक गजमुक्ताओं के हैं। उन मोतियों से बने चौक सहज ही सुहावने हैं।

फिर आम के पत्ते: वे नीलमणि को कोरकर बहुत सुन्दर बनाये गये हैं। सोने के बौर हैं, और पन्ने के फलों के गुच्छे रेशम की डोरी से बँधे शोभा पा रहे हैं।

बंदनवार सुन्दर और उत्तम हैं, मानो कामदेव ने फन्दे सजाये हों। अनेक मंगल कलश हैं। ध्वजाएँ, पताकाएँ, परदे और चँवर शोभा दे रहे हैं, और मणियों के अनेक मनोहर दीपक हैं।

इस विचित्र मण्डप का वर्णन नहीं किया जा सकता। जिस मण्डप में सीता दुलहिन होंगी, उसका वर्णन कर सके, ऐसी बुद्धि किस कवि में है?

जनक के भवन से नगर के प्रत्येक घर तक

और जिस मण्डप में रूप और गुणों के समुद्र राम दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। मण्डप की सारी तैयारी सीता और राम के इसी मिलन के लिये है।

जनक के भवन की जैसी शोभा है, वैसी ही नगर के प्रत्येक घर में दिखाई देती है।

उस समय जिसने तिरहुत को देखा, उसे चौदह भुवन छोटे लगने लगे। वहाँ नीच घर में जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र मोहित हो जाते थे।

वहाँ लक्ष्मी कपट से स्त्री का सुन्दर वेष धरकर बसती हैं, और उस नगर की शोभा कहते हुए सरस्वती और शेष सकुचाते हैं।

हाथ में चिट्ठी, हृदय में दोनों पुत्र

जनक के भेजे दूत राम की पवित्र पुरी अयोध्या पहुँचते हैं, और सुन्दर नगर को देखकर हर्षित होते हैं। वे राजद्वार पर अपने आने की सूचना देते हैं और दशरथ सुनकर उन्हें भीतर बुला लेते हैं। दूत प्रणाम करके पत्रिका देते हैं, और प्रसन्न राजा स्वयं उठकर उसे लेते हैं।

दशरथ पत्रिका पढ़ते हैं तो आँखों में जल भर आता है, शरीर पुलकित होता है और छाती भर जाती है। हृदय में राम और लक्ष्मण हैं, हाथ में सुन्दर चिट्ठी है। राजा उसे हाथ में लिये रह जाते हैं, और उनसे कोई बात कही नहीं जाती।

फिर दशरथ धीरज धरते हैं और पत्रिका पढ़कर सुनाते हैं। सभा सच्चा समाचार सुनकर हर्षित होती है।

उधर भरत अपने मित्रों और भाई शत्रुघ्न के साथ खेल रहे थे। वहीं समाचार मिला तो वे आ गये। बहुत प्रेम और संकोच से वे पिता से पूछते हैं कि चिट्ठी कहाँ से आयी है, प्राणप्रिय दोनों भाई कुशल से तो हैं, और वे किस देश में हैं।

दशरथ इन स्नेह से सने वचनों को सुनकर चिट्ठी फिर पढ़ते हैं। भरत और शत्रुघ्न दोनों पुलकित हो जाते हैं। प्रेम इतना बढ़ा है कि देह में समाता नहीं। भरत की पवित्र प्रीति देखकर सभा विशेष सुख पाती है।

दूतों से पिता की बारम्बार पूछताछ

अब दशरथ दूतों को पास बैठाते हैं और मधुर वचनों में पूछते हैं: भैया, कहिये, दोनों बच्चे कुशल से तो हैं? क्या आपने अपनी आँखों से उन्हें अच्छी तरह देखा है?

दशरथ दोनों का रूप बताते हैं: एक साँवले हैं, दूसरे गोरे। धनुष और तरकस धारण करते हैं। किशोर अवस्था है, और विश्वामित्र के साथ हैं। आप उन्हें पहचानते हैं? उनका स्वभाव कहिये। प्रेम के वश होकर राजा बारम्बार ऐसी बातें कहते हैं।

राजा कहते हैं कि जिस दिन मुनि दोनों को लिवा ले गये थे, उसके बाद आज ही सच्ची सुधि मिली है। फिर पूछते हैं कि जनक ने उन्हें किस प्रकार पहचाना।

दूत राजा के प्रेमपूर्ण वचन सुनकर मुसकराते हैं। वे कहते हैं कि दशरथ के समान धन्य और कोई नहीं, जिनके पुत्र राम और लक्ष्मण हैं, जो दोनों विश्व के आभूषण हैं।

वे आगे कहते हैं कि आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषसिंह तीनों लोकों के प्रकाश हैं, जिनके यश के आगे चन्द्रमा मलिन और प्रताप के आगे सूर्य शीतल लगता है। फिर वे पूछते हैं: क्या सूर्य को हाथ में दीपक लेकर देखा जाता है?

दूतों के वचनों में पराक्रम और मर्यादा

दूत बताते हैं कि सीता के स्वयंवर में अनेक राजा और एक से बढ़कर एक योद्धा एकत्र थे। कोई शिव के धनुष को हटा नहीं सका, और सभी बलवान् वीर हार गये। तीनों लोकों में जो अपनी वीरता का अभिमान रखते थे, उस धनुष ने सबकी शक्ति तोड़ दी।

बाणासुर, जो सुमेरु उठा सकता था, वह भी हृदय में हारकर परिक्रमा करके चला गया। और जिसने खेल में शिव का पर्वत उठा लिया था, जिसे टीका रावण कहती है, उसे भी उस सभा में पराजय मिली।

वहाँ, दूत कहते हैं, राम ने बिना प्रयास धनुष ऐसे तोड़ दिया जैसे हाथी कमल की डंडी तोड़ दे।

दूत आगे कहते हैं कि धनुष टूटने की बात सुनकर परशुराम क्रोध सहित आये, और अनेक प्रकार से आँखें दिखायीं। राम का बल देखकर उन्होंने अपना धनुष उन्हें दे दिया, और बहुत विनय करके वन चले गये।

राम के अतुलनीय बल के साथ वे लक्ष्मण के तेज का वर्णन करते हैं। लक्ष्मण के देखने से राजा वैसे काँपते थे जैसे सिंह के बच्चे की दृष्टि से हाथी काँप उठते हैं। फिर दूत अपना अनुभव कहते हैं कि महाराज के दोनों बालकों को देखने के बाद उनकी दृष्टि पर कोई दूसरा चढ़ता ही नहीं। उनकी वाणी प्रेम, प्रताप और वीर रस में पगी है और सबको बहुत प्रिय लगती है।

दशरथ और पूरी सभा अनुराग में मग्न हो जाते हैं, और राजा दूतों को निछावर देने लगते हैं। दूत उसे नीति के विरुद्ध कहकर कान मूँदते हैं, और सब धर्म का विचार करके सुख मानते हैं।

वसिष्ठ का आशीर्वचन, चारों बालकों का गुणगान

दूतों की बात सुनकर दशरथ उठकर गुरु वसिष्ठ के पास जाते हैं। वे उन्हें जनक की पत्रिका देते हैं, और दूतों को भी आदर से बुलाते हैं। सारी कथा वसिष्ठ को सुनायी जाती है।

समाचार सुनकर वसिष्ठ को अत्यन्त सुख होता है। वे कहते हैं कि पुण्यात्मा पुरुष के लिये पृथ्वी सुखों से छायी है: नदियाँ समुद्र में जाती हैं, यद्यपि समुद्र को उनकी कामना नहीं होती। वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना बुलाये स्वभाव से धर्मशील मनुष्य के पास पहुँचते हैं।

वसिष्ठ कहते हैं कि दशरथ गुरु, ब्राह्मण, गाय और देवता की सेवा करनेवाले हैं, और वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं।

आगे वे कहते हैं कि दशरथ के समान पुण्यात्मा जगत् में न कोई हुआ, न है, न होनेवाला है। राम जैसे पुत्र जिनके हों, उनसे अधिक पुण्य किसका होगा? फिर वे कहते हैं कि चारों श्रेष्ठ बालक वीर हैं, विनम्र हैं, धर्म का व्रत धारण करनेवाले हैं और गुणों के समुद्र हैं।

वे दशरथ से कहते हैं कि उनके लिये सदा कल्याण है। वे डंका बजवाकर बारात सजायें और शीघ्र चलें।

दशरथ गुरु के वचन सुनकर सिर नवाते हैं और आदर से स्वीकार करते हैं। वे दूतों को ठहरने का स्थान दिलवाते हैं, फिर महल में जाते हैं।

माताओं के हृदय से लगती पत्रिका

महल में आकर दशरथ सारे रनिवास को बुलाते हैं और जनक की पत्रिका पढ़कर सुनाते हैं। सभी रानियाँ समाचार पाकर हर्षित होती हैं। राजा उसके बाद और सब बातें भी बताते हैं, जिन्हें टीका दूतों के मुख से सुनी बातें कहती है।

प्रेम से प्रफुल्लित रानियाँ ऐसी हैं जैसे बादलों की गरज सुनकर आनन्दित मोरनियाँ। बड़ी स्त्रियाँ, जिन्हें टीका बड़ी बूढ़ी या गुरुओं की स्त्रियाँ बताती है, प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं, और माताएँ अत्यन्त आनन्द में मग्न हैं।

वह पत्रिका उन्हें अत्यन्त प्रिय है। वे उसे एक दूसरे से लेती हैं और हृदय से लगाकर अपनी छाती शीतल करती हैं।

दशरथ राम और लक्ष्मण की कीर्ति और करनी का बारम्बार वर्णन करते हैं। अन्त में वे कहते हैं कि यह सब मुनि की कृपा है, और बाहर चले आते हैं।

राजा के बाहर जाने पर रानियाँ ब्राह्मणों को बुलाकर आनन्द से दान देती हैं, और श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले जाते हैं। फिर याचकों को बुलाकर उन्हें करोड़ों प्रकार की निछावरें दी जाती हैं।

याचक आशीर्वाद देते हैं कि चक्रवर्ती दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों।

आनन्द जो काम बन गया

इस प्रसंग में आनन्द बार बार किसी काम का रूप लेता है। जनक सुखी हैं, और गुरु से आगे का विधान पूछते हैं। महाजन घर लौटते हैं, कारीगर मण्डप रचते हैं। दशरथ पत्रिका लेकर गुरु के पास जाते हैं, और माताएँ समाचार पाकर दान करती हैं।

सुनने की चाह भी इस कथा में बार बार आती है। जनक उचित आचार सुनना चाहते हैं। दशरथ दोनों पुत्रों की कुशल दूतों से बारम्बार पूछते हैं। भरत के आने पर पत्रिका फिर पढ़ी जाती है, और माताओं के सामने वही समाचार फिर खुलता है। दशरथ की पूछताछ में पिता का मन है, भरत के प्रश्न में भाई की प्रीति, और पत्रिका को वक्ष से लगाती रानियों में माता का सुख।

जनकपुर में विवाह का मण्डप सँवर गया है। अयोध्या में गुरु ने शीघ्र बारात सजाने की आज्ञा दी है। रनिवास से दान पाकर याचक आशीर्वाद दे रहे हैं कि दशरथ के चारों पुत्र दीर्घजीवी हों।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 286 से सोरठा 295 तक का प्रसंग, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।