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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 10
कामदेव का दहन और रति को वरदान
एक असुर को मारने के लिये एक विवाह चाहिये था। विवाह के लिये एक समाधि तोड़नी थी। और समाधि तोड़ने जो भेजा गया, वह चलते समय जानता था कि लौटेगा नहीं।
इस प्रसंग के आरम्भ में सप्तर्षि शिव के पास एक शुभ समाचार लेकर पहुँचते हैं। अन्त में वही सप्तर्षि पार्वती को चिढ़ा रहे हैं। बीच में एक असुर है जिसे कोई जीत नहीं पाता। ब्रह्मा की बतायी एक शर्त है। एक देवता है जो अपना अन्त जानकर काम पर निकलता है। और एक दृष्टि है जिसके पड़ते ही वह देवता राख हो जाता है।
कथा वहीं से उठती है जहाँ पिछला प्रसंग छूटा था। पार्वती का तप पूरा हो चुका है, और उनके प्रेम की बात शिव तक पहुँच चुकी है। पर उसी समय तारक नाम का असुर खड़ा हो जाता है। उसकी मृत्यु की शर्त ऐसी है कि सारा भार फिर इसी विवाह पर आ पड़ता है। देवताओं को शिव की समाधि तोड़नी है, और इस काम के लिये वे कामदेव को भेजते हैं।
इस कथा में कोई धोखे में नहीं है। ब्रह्मा अपने ही सुझाव को भारी असमंजस कहते हैं। कामदेव देवताओं से कहता है कि शिव से विरोध में उसकी कुशल नहीं। रास्ते में वह मन ही मन मानता है कि उसका मरना निश्चित है, और फिर भी जाता है। ब्रह्मा शिव से कहते हैं कि आप तो सब जानते हैं, और फिर भी विनती करते हैं। और सप्तर्षि अन्त में जो मीठी बात करते हैं, उसे कथा स्वयं छल से भरी बताती है।
समाधि में शिव, और उसे तोड़ने वाले
- शिव जो इस प्रसंग के आरम्भ में राम का ध्यान लगाकर बैठते हैं। अन्त में वे एक ही बात में विवाह के लिये हामी भर देते हैं।
- पार्वती हिमाचल के घर जन्मी, जिनका तप इस पूरी कथा की जड़ में है और जो इस पूरे प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलतीं।
- ब्रह्मा जो तारक की मृत्यु की शर्त बताते हैं और फिर वह उपाय सुझाते हैं जिसे वे स्वयं भारी असमंजस कहते हैं।
- तारक वह असुर जिसने सब लोक और लोकपाल जीत लिये हैं, और जो यहाँ एक बार भी सामने नहीं आता।
- कामदेव फूलों का धनुष और बाण लिये वह देवता जो अपना अन्त जानकर भी काम पर निकलता है।
- रति कामदेव की पत्नी, जो पति के जलने के बाद हाथ जोड़कर शिव के सामने खड़ी होती हैं।
- सप्तर्षि वे सात ऋषि जो इस प्रसंग को खोलते भी हैं और बन्द भी करते हैं, पहले सन्देश लेकर और अन्त में ठिठोली लेकर।
- राम जिनका ध्यान शिव इस प्रसंग के आरम्भ में लगाते हैं। उस घड़ी केवल वही बचे जिनकी रक्षा राम ने की।
एक शर्त, जो सब कुछ तय कर देती है
कथा एक पूरे हुए काम से खुलती है। मुनि हिमाचल को पार्वती के पास भेजते हैं, और हिमाचल विनती करके बेटी को घर ले आते हैं। फिर सप्तर्षि शिव के पास जाकर पार्वती की सारी कथा सुना देते हैं। यही काम उन्हें पिछले प्रसंग में सौंपा गया था, और यहाँ उसका परिणाम थोड़े में दर्ज होता है।
पार्वती का प्रेम सुनते ही शिव आनन्द में डूब जाते हैं। सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने लोक लौट जाते हैं। तब शिव मन को स्थिर करके राम का ध्यान करने बैठ जाते हैं। जिस समाधि को तोड़ने के लिये आगे पूरा संसार उलट दिया जायेगा, वह राम के ध्यान की समाधि है।
ठीक उसी समय तारक नाम का असुर उठ खड़ा होता है। उसकी भुजाओं का बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा है। उसने सब लोक जीत लिये और सब लोकपाल जीत लिये। देवताओं के पास न सुख बचा, न सम्पत्ति।
वह अजर और अमर है, इसलिये किसी से जीता नहीं जाता। देवताओं ने तरह तरह की लड़ाइयाँ लड़ीं और हार गये। तब वे ब्रह्मा के पास जाकर पुकार मचाते हैं। ब्रह्मा सब देवताओं को दुखी देखते हैं और समझाकर कहते हैं।
इस असुर की मृत्यु तब होगी जब शिव का पुत्र जन्म लेगा। युद्ध में वही इसे जीतेगा। यह एक वाक्य पूरी कथा की चाबी है। असुर का नाश एक जन्म से बँधा है, जन्म एक विवाह से, और विवाह उस शिव से जो अभी आँखें मूँदकर बैठ चुके हैं।
वह सलाह, जिसे देनेवाले ने ही असमंजस कहा
ब्रह्मा आगे कहते हैं कि मेरी बात सुनकर उपाय कीजिये, ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जायेगा। फिर वे बताते हैं: सती ने दक्ष के यज्ञ में जो देह छोड़ा था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जन्म ले लिया है।
पर एक अड़चन है। उन्होंने शिव को पति बनाने के लिये तप किया है, और इधर शिव सब कुछ छोड़कर समाधि लगा बैठे हैं। फिर सलाह देने से पहले ब्रह्मा स्वयं मान लेते हैं कि बात बड़े असमंजस की है।
असमंजस, यानी ऐसी दशा जिसमें कोई रास्ता साफ़ नहीं दिखता। ब्रह्मा इसे भारी कहते हैं, और फिर भी अपनी बात कहते हैं।
उनकी सलाह यह है कि कामदेव को शिव के पास भेजा जाये, ताकि वह शिव के मन में क्षोभ पैदा करे और उनकी समाधि टूटे। फिर हम सब जाकर शिव के चरणों में सिर रख देंगे और उन्हें राज़ी करके, ज़ोर देकर, विवाह करा देंगे। सिर झुकाना और ज़ोर लगाना एक ही साँस में आते हैं।
सब देवता कहते हैं कि इसी तरह देवताओं का हित हो सकता है, और यह सलाह बहुत अच्छी है। फिर देवता बड़े प्रेम से स्तुति करते हैं, और कामदेव प्रकट होता है, हाथ में बाण और ध्वजा पर मछली का चिह्न। उसके बाण विषम हैं, और पोद्दार की टीका बताती है कि उनकी गिनती पाँच है।
जो जानकर गया
देवता कामदेव को अपनी सारी विपत्ति सुनाते हैं। कामदेव सुनकर मन में विचार करता है, और फिर हँसकर कहता है।
शिव से विरोध करने में मेरी कुशल नहीं। यह बात वह हँसते हुए कहता है, और फिर स्वयं अपनी बात का दूसरा आधा जोड़ता है।
फिर भी मैं आपका काम करूँगा, क्योंकि वेद दूसरे के उपकार को परम धर्म कहते हैं। और जो दूसरे के हित के लिये अपना शरीर त्याग देता है, सन्त सदा उसकी बड़ाई करते हैं। यानी वह जा रहा है, और जाने का कारण शास्त्र में रखता है।
देवताओं ने उसके मुँह से सुना था कि इसमें उसकी कुशल नहीं, और अब उसी के मुँह से सुनते हैं कि वह उनका काम करेगा।
यह कहकर वह सबको सिर नवाता है, फूलों का धनुष हाथ में लेता है, और अपने सहायकों के साथ चल पड़ता है। चलते चलते वह मन में सोचता है कि शिव से विरोध करने पर मेरा मरना निश्चित है।
दो घड़ी का ब्रह्माण्ड
कामदेव सीधे शिव के पास नहीं जाता। पहले वह अपना प्रभाव फैलाता है और सारे संसार को अपने वश में कर लेता है। जिस क्षण उसने कोप किया, उसी क्षण वेदों की सारी मर्यादा मिट गयी।
ब्रह्मचर्य, नियम, तरह तरह के संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग और वैराग्य, ये सब विवेक की सेना हैं। यह पूरी सेना डरकर भाग खड़ी होती है।
विवेक अपने सहायकों सहित भाग गया, और उसके योद्धा सद्ग्रन्थ रूपी पर्वत की कन्दराओं में जा छिपे। पोद्दार की टीका इसका अर्थ खोलती है: ज्ञान, वैराग्य, संयम, नियम और सदाचार ग्रन्थों में लिखे रह गये, उनका आचरण छूट गया।
सारे जगत में खलबली मच गयी। सब कहने लगे, हे विधाता, अब क्या होगा, हमारी रक्षा कौन करेगा? ऐसा दो सिरवाला कौन है जिस पर रति के पति ने कोप करके धनुष बाण उठाया है? यानी जिसके पास एक सिर गँवाने को फ़ालतू हो, वही इसके सामने टिके।
जगत में स्त्री और पुरुष नाम के जितने चर और अचर प्राणी थे, सब अपनी अपनी मर्यादा छोड़कर काम के वश हो गये। लताओं को देखकर वृक्षों की डालियाँ झुकने लगीं, नदियाँ उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ीं, और ताल तलैया आपस में मिलने लगे।
जब जड़ वस्तुओं की यह दशा थी, तो चेतन जीवों की करनी कौन कहे। आकाश, जल और धरती के पशु पक्षी अपने मिलन का समय भूलकर काम के वश हो गये।
सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये। चकवा और चकवी, जो रात में बिछड़ जाते हैं, अब रात और दिन का भेद भूल गये। फिर देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत और बेताल गिनाये जाते हैं।
कथा कहनेवाले याज्ञवल्क्य कहते हैं कि इनकी दशा मैंने नहीं बतायी, क्योंकि ये तो सदा ही काम के गुलाम हैं। बताने लायक़ वे हैं जो इस बार गिरे: सिद्ध, विरक्त, महामुनि और बड़े योगी भी काम के वश होकर विरही हो गये।
जो सारे जगत को ब्रह्ममय देखते थे, वे अब उसे स्त्रीमय देखने लगे। स्त्रियाँ संसार को पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष स्त्रीमय। योगी की साधना जिस देखने पर टिकी थी, उसकी हार भी उसी देखने में हुई।
और यह सब कितनी देर चला? दो घड़ी, यानी लगभग अड़तालीस मिनट। यह कामदेव का रचा हुआ एक तमाशा था।
किसी ने धीरज नहीं रखा, कामदेव ने सबके मन हर लिये, और उस समय केवल वे बचे जिनकी रक्षा राम ने की। शिव इस प्रसंग के आरम्भ में राम का ध्यान लगाकर बैठे थे, और आगे कामदेव उनकी समाधि को अचल पायेगा।
शिव के सामने, और वसन्त का दाँव
दो घड़ी का यह तमाशा तब तक चला जब तक कामदेव शिव के पास नहीं पहुँच गया। वहाँ पहुँचते ही शिव को देखकर वह डर गया, और सारा संसार फिर जैसा था वैसा हो गया।
बाण चलने से पहले, और शिव के आँखें खोलने से पहले ही, कामदेव का उन्हें देख लेना काफ़ी था। जो कुछ सारी सृष्टि पर छाया था, वह उतर गया।
सब जीव तुरन्त वैसे ही सुखी हो गये जैसे नशा उतर जाने पर मतवाले सुखी होते हैं। यह उपमा पूरे दौर को एक नशा बता देती है, जो नशे की तरह उतरा।
उधर कामदेव शिव को देखकर भयभीत है। शिव को हराना बहुत कठिन है, और उनका पार पाना भी कठिन है। उनके सामने खड़ा कामदेव सोचता है कि लौट जाने में लज्जा है और किये कुछ बनता नहीं। आख़िर वह मन में मरने का निश्चय करके उपाय रचता है। यह दूसरी बार है जब वह अपनी मृत्यु मान लेता है: पहली बार रास्ते में, दूसरी बार शिव के सामने।
उसका उपाय एक ऋतु है। वह तुरन्त ऋतुओं के राजा वसन्त को प्रकट कर देता है। फूले हुए नये वृक्षों की क़तारें सज जाती हैं। वन, उपवन, बावलियाँ, तालाब और सारी दिशाएँ खिल उठती हैं। जहाँ तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, और उसे देखकर मरे हुए मनों में भी कामना जाग उठती है।
ठण्डी, धीमी और सुगन्धित हवा चलने लगी, जिसे कथा काम रूपी आग का सच्चा मित्र कहती है। सरोवरों में कमल खिल गये, भौंरे गुंजार करने लगे, राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे, और अप्सराएँ गा गाकर नाचने लगीं। सब कुछ एक आदमी के लिये जुटाया गया।
कामदेव अपनी सेना समेत करोड़ों तरह के सब उपाय करके हार गया, पर शिव की अचल समाधि नहीं डिगी। तब कामदेव को क्रोध आ गया।
कामदेव का घर तो हृदय में है। जो सबके हृदय में रहता है, उसे अब एक पेड़ पर चढ़कर वार करना पड़ेगा।
आम की डाल से
आम के पेड़ की एक अच्छी डाल देखकर कामदेव उस पर चढ़ जाता है। मन भीतर से खीझा हुआ है। वह फूलों के धनुष पर अपने बाण चढ़ाता है और बहुत क्रोध से निशाना साधकर उन्हें कान तक खींच लेता है।
जो देवता अब तक हँसकर बोल रहा था और परोपकार के नाम पर निकला था, वह अन्त में क्रोध में है। उसने सब कुछ लगा दिया और कुछ नहीं हुआ। जिस काम में सारी सृष्टि दो घड़ी में झुक गयी थी, उसमें एक बैठा हुआ आदमी उसे हरा रहा है। यह उसकी आख़िरी चाल है, और वह इसे गुस्से में चलता है।
फिर वही होता है जिसके लिये देवताओं ने उसे भेजा था। उसने तीखे बाण छोड़े, वे शिव के हृदय में लगे, समाधि टूट गयी और शिव जाग गये। उनके मन में बहुत क्षोभ हुआ, ठीक वही शब्द जो ब्रह्मा की सलाह में था। जो माँगा गया था वही मिला, और उसकी क़ीमत तुरन्त चुकायी जाती है।
शिव आँखें खोलकर सब ओर देखते हैं। कोई उनके मन को क्षुब्ध कर गया है, और वे उसे ढूँढ़ रहे हैं। फिर वह मिल जाता है, आम के पत्तों में छिपा हुआ।
कामदेव को देखते ही शिव को बड़ा क्रोध हुआ, और तीनों लोक काँप उठे। तब शिव ने तीसरा नेत्र खोला, और उनके देखते ही कामदेव जलकर राख हो गया। कामदेव को इस लड़ाई के लिये एक ऋतु, एक सेना, धनुष बाण और पूरी सृष्टि चाहिये थी। शिव को एक दृष्टि चाहिये थी।
इस एक मृत्यु पर संसार चार तरह से बोलता है। जगत में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये, दैत्य सुखी हुए, भोगी लोग काम का सुख याद करके चिन्ता करने लगे, और साधक योगी निष्कंटक हो गये।
रति, और वह वरदान जो शरीर नहीं लौटाता
पति की दशा सुनते ही रति मूर्च्छित हो गयीं। फिर रोती, बिलखती और तरह तरह से करुणा करती हुई वे शिव के पास गयीं। बहुत प्रेम से अनेक प्रकार से विनती करके वे हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयीं। वे सीधे उन्हीं के सामने पहुँचीं जिनके नेत्र से यह हुआ था।
शिव, जो जल्दी प्रसन्न होनेवाले हैं, उस असहाय स्त्री को देखकर सान्त्वना के वचन बोले। कथा रति की विनती का एक भी शब्द नहीं देती।
शिव देह नहीं लौटाते। वे कहते हैं कि अब से रति के स्वामी का नाम अनंग होगा, यानी बिना अंग वाला, और वह बिना शरीर के ही सबमें व्यापेगा।
जिस देह को शिव ने आम के पत्तों में देखा था, वह अब नहीं रहा, और उसके बिना ही कामदेव सबमें व्यापेगा।
फिर शिव रति को बताते हैं कि वे अपने पति से फिर कैसे मिलेंगी। जब पृथ्वी का भारी भार उतारने के लिये यदुवंश में कृष्ण का अवतार होगा, तब उनका पति कृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा। शिव का यह वचन झूठा नहीं होगा। शिव उस पुत्र का नाम नहीं लेते। पोद्दार की टीका उसका नाम प्रद्युम्न बताती है।
सान्त्वना एक दूसरे युग की है, और फिर भी पूरी पहचान के साथ दी गयी है: कौन सा वंश, किसका पुत्र, किस काम के लिये अवतार।
शिव के वचन सुनकर रति चली गयीं। जो मूर्च्छित होकर आयी थीं, वे एक वचन के सहारे लौट गयीं। इसके बाद याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कहते हैं कि अब दूसरी कथा विस्तार से कहता हूँ।
देवताओं की विनती, और सप्तर्षियों की ठिठोली
ब्रह्मा आदि देवता यह समाचार सुनकर पहले वैकुण्ठ जाते हैं। फिर वहाँ से विष्णु और ब्रह्मा सहित सब देवता शिव के पास पहुँचते हैं। सबने अलग अलग शिव की स्तुति की, और शिव प्रसन्न हो गये।
शिव पूछते हैं, देवताओ, कहिये, किसलिये आये हैं? ब्रह्मा उत्तर देते हैं कि प्रभो, आप तो अन्तर्यामी हैं, फिर भी भक्ति के कारण मैं आपसे विनती करता हूँ। वे पहले मान लेते हैं कि कहने की ज़रूरत नहीं, और फिर भी कहते हैं।
उनकी बात यह है कि सब देवताओं के मन में ऐसा उत्साह है कि वे अपनी आँखों से शिव का विवाह देखना चाहते हैं। जो विवाह एक संकट के उपाय की तरह शुरू हुआ था, वह अब एक उत्सव बन चुका है जिसे सब देखना चाहते हैं।
ब्रह्मा शिव को कामदेव का मद चूर करनेवाला कहकर पुकारते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा कुछ कीजिये जिससे सब लोग यह उत्सव आँख भरकर देखें। फिर वे रति के वरदान को सराहते हैं: कामदेव को भस्म करके आपने रति को जो वर दिया, वह बहुत ही अच्छा किया।
दण्ड देकर फिर कृपा करना, ब्रह्मा कहते हैं, श्रेष्ठ स्वामियों का सहज स्वभाव है। इस एक बात में कामदेव का जलना और रति का वरदान एक साथ आ जाते हैं। और फिर असली माँग सीधे शब्दों में: पार्वती ने अपार तप किया है, अब उन्हें अंगीकार कीजिये।
ब्रह्मा की प्रार्थना सुनकर, और प्रभु के वचन याद करके, शिव प्रसन्न होकर कहते हैं, ऐसा ही हो। पोद्दार की टीका बताती है कि यहाँ प्रभु के वचन श्रीरामचन्द्र के वचन हैं। यानी शिव का यह निर्णय भी उसी राम से जुड़ा है जिनका ध्यान वे प्रसंग के आरम्भ में लगाकर बैठे थे। तब देवताओं ने नगाड़े बजाये और फूल बरसाते हुए जयकार की।
उचित अवसर जानकर सप्तर्षि आते हैं, और ब्रह्मा उन्हें तुरन्त हिमाचल के घर भेज देते हैं। वे पहले वहाँ जाते हैं जहाँ पार्वती हैं, और उनसे मीठी बातें करते हैं। कथा उन बातों को छल से भरी बताती है, और पोद्दार की टीका उन्हें विनोद भरी कहती है।
सप्तर्षि पार्वती से कहते हैं कि नारद के उपदेश में आकर आपने उस समय हमारी बात नहीं सुनी, और अब आपका प्रण झूठा पड़ गया। क्योंकि शिव ने कामदेव को ही भस्म कर डाला। यह कहनेवाले सप्तर्षि शिव के “ऐसा ही हो” कहने के बाद आये हैं, और ब्रह्मा ने ही उन्हें भेजा है।
विवाह अभी नहीं होता। देवता नगाड़े बजा चुके हैं, पर उस उत्सव का दृश्य आगे के प्रसंगों के लिये बचा रहता है।
आग के दोनों ओर खड़े लोग
ब्रह्मा और कामदेव अपने काम के विरुद्ध की बात पहले कह देते हैं और फिर वह काम करते हैं। ब्रह्मा अपने उपाय को भारी असमंजस कहते हैं। कामदेव देवताओं के सामने हँसकर कहता है कि शिव से विरोध में उसकी कुशल नहीं। वह अपनी मृत्यु दो बार मन ही मन मानता है, एक बार रास्ते में और एक बार शिव के सामने। और सप्तर्षियों की अन्तिम बात को कथा स्वयं छल से भरी बताती है।
दण्ड और कृपा का जोड़ भी यहाँ साफ़ दिखता है। शिव ने देह जलाया। उसके बाद जो वर दिया, उसमें कामदेव को एक नया नाम मिला। बिना देह के सबमें व्यापने का वचन मिला, और कृष्ण के पुत्र के रूप में आगे का जन्म। ब्रह्मा इसी को बहुत अच्छा कहकर सराहते हैं।
कुछ बातें इस प्रसंग में होती ही नहीं। तारक यहाँ मरता नहीं। वह एक बार भी सामने नहीं आता। आरम्भ में जिस पुत्र की शर्त रखी गयी थी, वह यहाँ जन्म नहीं लेता। और जिस विवाह के लिये इतना कुछ हुआ, वह भी अभी नहीं होता।
जिस घटना के लिये यह प्रसंग जाना जाता है, उस पर कथा केवल एक वाक्य लगाती है: शिव के देखते ही कामदेव जलकर राख हो गया। बाक़ी सब उससे पहले की तैयारी है और उसके बाद का हिसाब। उस तैयारी और उस हिसाब में वे लोग हैं जो आग के दोनों ओर खड़े थे।
और इस शिवकथा के नीचे राम का नाम लगातार चलता है। शिव राम का ध्यान लगाकर समाधि में बैठे। दो घड़ी के उस उलटफेर में जो बचे, उन्हें राम ने बचाया। और अन्त में शिव विवाह की हामी भी राम के वचन याद करके भरते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 82 से 89, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।