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कामदेव का दहन और रति को वरदान

रामचरितमानस · बालकाण्ड · कामदेव का दहन और रति को वरदान

कामदेव का दहन और रति को वरदान

एक असुर को मारने के लिये एक विवाह चाहिये था, विवाह के लिये एक समाधि तोड़नी थी, और समाधि तोड़ने जो भेजा गया वह चलते समय जानता था कि लौटेगा नहीं।

इस पन्ने की पहली पंक्ति में सप्तर्षि एक शुभ समाचार लेकर शिव के पास पहुँचते हैं, और अन्तिम पंक्ति में वही सप्तर्षि पार्वती के सामने खड़े होकर उन्हें चिढ़ा रहे हैं। बीच में जो पड़ता है उसमें एक असुर है जिसे कोई जीत नहीं पाता, एक शर्त है जो ब्रह्मा के मुँह से निकलती है, एक देवता है जो अपने अन्त का हिसाब लगाकर काम पर निकलता है, और एक दृष्टि है जिसके पड़ते ही वह देवता राख हो जाता है। बालकाण्ड का यह हिस्सा दोहा बयासी से नवासी तक चलता है।

कथा का सिरा वहीं है जहाँ पिछला प्रसंग छूटा था। पार्वती का तप पूरा हो चुका है, मुनि हिमवान को समझा चुके हैं, और शिव के कानों तक उमा का प्रेम पहुँच चुका है। पर उसी घड़ी संसार के दूसरे कोने में तारक नाम का असुर खड़ा हो जाता है, और उसकी मृत्यु की शर्त ऐसी निकलती है कि सारा भार फिर उसी विवाह पर आ पड़ता है जिसकी बात अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुई थी। देवताओं को एक समाधि तोड़नी है, और उस काम के लिये वे उसे भेजते हैं जो समाधि तोड़ने में सबसे निपुण है।

पढ़ते समय एक बात ध्यान में रहे। इस पन्ने पर कोई धोखे में नहीं है। ब्रह्मा अपनी ही सम्मति को असमंजस कहकर सुनाते हैं। कामदेव दो बार कह चुका है कि इस काम में उसका मरना निश्चित है, और फिर भी चलता है। देवता शिव से कहते हैं कि आपसे कुछ कहना ही व्यर्थ है, और तब कहते हैं। सप्तर्षि अन्त में जो मीठी बात करते हैं उसे तुलसीदास स्वयं छल में सनी हुई बताते हैं। यह कथा उन लोगों की है जो जानते हुए वही करते हैं जिसका दाम उन्हें मालूम है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • शिव संभु, शंकर, महेस। जो इस प्रसंग के आरम्भ में रघुनाथ का ध्यान लगाकर बैठते हैं और अन्त में एक ही शब्द में विवाह के लिये हामी भर देते हैं।
  • पार्वती हिमाचल के घर जन्मी उमा, जिनका तप इस पूरी कथा की जड़ में है और जो पन्ने भर में एक शब्द नहीं बोलतीं।
  • ब्रह्मा बिरंचि, जो तारक की मृत्यु की शर्त बताते हैं और फिर वह उपाय सुझाते हैं जिसे वे स्वयं भारी असमंजस कहते हैं।
  • तारक वह असुर जिसने सब लोक और लोकपाल जीत लिये हैं, और जो इस पन्ने पर एक बार भी सामने नहीं आता।
  • कामदेव मार, मदन, मनसिज, झषकेतु, हृदयनिकेत। फूलों का धनुष और विषम बाण लिये वह देवता जो अपना अन्त जानकर काम पर निकलता है।
  • रति कामदेव की पत्नी, जो इस पन्ने पर पहले केवल पति के नाम के भीतर आती हैं और बाद में हाथ जोड़े शिव के सामने खड़ी होती हैं।
  • सप्तर्षि वे सात ऋषि जो इस प्रसंग को खोलते भी हैं और बन्द भी करते हैं, पहले सन्देश लेकर और अन्त में ठिठोली लेकर।
  • रघुनाथ जिनका नाम इस शिवकथा के नीचे लगातार बहता रहता है, और सोरठा पचासी में खुलकर सामने आ जाता है।

एक शर्त, जो सब कुछ तय कर देती है

पन्ना एक पूरे हुए काम से खुलता है। मुनि जाकर हिमवान को समझाते हैं, विनती करके गिरिजा को घर ले आते हैं, और उसके बाद सप्तर्षि शिव के पास पहुँचकर उमा की सारी कथा सुना देते हैं। यह वही काम है जिसके लिये वे पिछले प्रसंग में भेजे गये थे, और तुलसीदास उसे दो पंक्तियों में निपटा देते हैं। जो लम्बा था वह पीछे था; यहाँ केवल उसका परिणाम दर्ज होता है।

जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए । करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई । कथा उमा कै सकल सुनाई॥

चौपाई १

इन चार चरणों में क्रम देखने लायक है। पहले हिमवान, फिर गिरिजा, फिर सप्तर्षि, फिर कथा। और कथा किसकी सुनायी जाती है, इसका उत्तर अगली चौपाई देती है: प्रेम की। शिव उस प्रेम को सुनते ही आनन्द में डूब जाते हैं, सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने लोक को लौट जाते हैं, और तब सुजान शंकर मन को स्थिर करके ध्यान लगाने बैठ जाते हैं।

किसका ध्यान, यह वाक्य का सबसे बड़ा शब्द है। तुलसीदास लिखते हैं कि वे रघुनायक का ध्यान करने लगे। यानी जिस समाधि को तोड़ने के लिये आगे पूरा संसार उलट दिया जायेगा, वह समाधि किसी अमूर्त शून्य की नहीं है, वह एक नाम की है। इस एक पंक्ति को याद रखिये। पाँच दोहे आगे यही पंक्ति सोरठा पचासी का उत्तर बन जायेगी।

ठीक उसी काल में तारक नाम का असुर उठ खड़ा होता है। उसकी भुजाओं का बल, प्रताप और तेज बहुत बड़ा है। उसने सब लोक जीत लिये और सब लोकपाल जीत लिये। तुलसीदास देवताओं की दशा एक ही शब्द से बताते हैं: वे सुख और सम्पत्ति दोनों से रीते हो गये। खाली। जिनके पास लोक थे, उनके पास अब कुछ नहीं बचा।

और वह अजर है, अमर है, इसलिये जीता नहीं जाता। देवताओं ने तरह तरह की लड़ाइयाँ लड़ीं और हार गये। तब वे ब्रह्मा के पास जाकर पुकार मचाते हैं। यहाँ भी तुलसीदास एक छोटा सा ब्योरा देते हैं जो बहुत कुछ कह जाता है: ब्रह्मा ने सब देवताओं को दुखी देखा। पहले देखा, फिर बोले। उत्तर आँख से शुरू होता है।

सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥ ८२॥

दोहा ८२

यह दोहा इस पन्ने का ताला और चाबी दोनों है। असुर का नाश किसी अस्त्र से बँधा हुआ नहीं है, किसी मन्त्र से भी नहीं। वह एक जन्म से बँधा हुआ है। और जन्म एक विवाह से बँधा है, और विवाह उस व्यक्ति से बँधा है जो इसी समय आँखें मूँदकर बैठ चुका है। जो कुछ आगे होगा, वह इस एक वाक्य का सीधा परिणाम है।

ध्यान दीजिये कि ब्रह्मा ने क्या नहीं कहा। उन्होंने यह नहीं कहा कि शिव को मनाओ, न यह कि पार्वती से कहो, न यह कि तारक से सन्धि कर लो। उन्होंने केवल शर्त बतायी, जैसे कोई वैद्य रोग का नाम बता दे और नुस्खा बाद में लिखे। नुस्खा अगली चौपाइयों में आता है, और वही इस कथा का असली संकट है।

सार: सप्तर्षि पार्वती की कथा शिव तक पहुँचाते हैं और शिव रघुनाथ का ध्यान लगाकर बैठ जाते हैं। उसी समय तारक असुर सब लोक जीत लेता है, देवता हारकर ब्रह्मा के पास जाते हैं, और ब्रह्मा बताते हैं कि उस असुर को केवल शिव का पुत्र ही जीत सकेगा।

वह सम्मति, जिसे कहनेवाले ने ही असमंजस कहा

ब्रह्मा आगे कहते हैं कि मेरी बात सुनकर उपाय कीजिये, ईश्वर सहायता करेंगे। फिर वे वह सूचना देते हैं जो देवताओं के पास नहीं थी: सती ने दक्ष के यज्ञ में जो देह छोड़ी थी, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म ले लिया है। यानी शर्त का आधा हिस्सा पहले ही पूरा हो चुका है और किसी को पता नहीं।

आधा ही, क्योंकि दूसरा आधा उलटा खड़ा है। ब्रह्मा कहते हैं कि उन्होंने शिव को पति बनाने के लिये तप किया है, और इधर शिव सब छोड़छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। एक ओर वर्षों की तपस्या, दूसरी ओर पूरी निर्विकल्प चुप्पी। दोनों सच हैं और दोनों एक साथ नहीं चल सकते। इसी जगह ब्रह्मा वह पंक्ति कहते हैं जो उनके अपने प्रस्ताव पर उनका अपना निर्णय है।

जदपि अहइ असमंजस भारी । तदपि बात एक सुनहु हमारी॥

चौपाई २

असमंजस माने वह दशा जिसमें कोई भी रास्ता साफ़ नहीं होता, हर चाल में कुछ न कुछ टूटता है। ब्रह्मा उसे भारी कहते हैं, और भारी कहकर भी बात आगे बढ़ाते हैं। यह छोटी बात नहीं है। उपाय बताने से पहले उपाय सुझानेवाला उसका दोष स्वयं बोल देता है, और सुननेवालों को चेतावनी उसी मुँह से मिलती है जिससे आदेश मिलनेवाला है।

पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं । करै छोभु संकर मन माहीं॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई । करवाउब बिबाहु बरिआई॥

चौपाई ३

दो शब्द इस चौपाई का पूरा भार उठाये हुए हैं। पहला है छोभु। देवता यह नहीं कहते कि कामदेव जाकर शिव को मनाये, या समझाये, या उनके सामने पार्वती का पक्ष रखे। वे कहते हैं कि वह उनके मन में क्षोभ पैदा करे। काम माँगा ही यह गया है कि शान्ति में हलचल डाली जाये।

दूसरा शब्द है बरिआई। हम जाकर शिव के चरणों में सिर रख देंगे और जबरदस्ती विवाह करा देंगे। एक ही साँस में सिर झुकाना और ज़ोर लगाना, दोनों। देवताओं के पास बल नहीं है, इसलिये वे विनय से शुरू करेंगे; पर लक्ष्य के बारे में वे अपने भीतर साफ़ हैं, और तुलसीदास वह शब्द छिपाते नहीं।

और सभा का उत्तर क्या है। सब कहते हैं कि इस प्रकार से भले ही देवताओं का हित हो, और यह सम्मति बहुत अच्छी है। जिसे प्रस्ताव करनेवाले ने अभी अभी भारी असमंजस कहा था, उसे सुननेवाले अति नीक कह देते हैं। फिर देवता बड़े प्रेम से स्तुति करते हैं और कामदेव प्रकट होता है, विषम बाण लिये हुए और मछली की ध्वजावाला। पोद्दार की टीका विषम को खोलकर बताती है: पाँच।

सार: ब्रह्मा बताते हैं कि सती हिमाचल के घर जन्म ले चुकी हैं और शिव के लिये तप कर रही हैं, पर शिव समाधि में हैं। वे अपने ही उपाय को भारी असमंजस कहते हुए सुझाते हैं कि कामदेव को भेजकर शिव के मन में क्षोभ कराया जाये, और सब देवता इस सम्मति को बहुत अच्छी बताते हैं।

जो जानकर गया

देवता कामदेव से अपनी सारी विपत्ति कहते हैं। तारक, हारी हुई लड़ाइयाँ, छिनी हुई सम्पत्ति, ब्रह्मा की बतायी शर्त, सब। कामदेव सुनता है और मन में विचार करता है, और तब जो बोलता है उसमें कोई भ्रम नहीं है।

सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥ ८३॥

दोहा ८३

बिहसि, यानी हँसकर। यह शब्द सबसे अधिक ध्यान खींचता है। जिस आदमी को अपनी मृत्यु का समाचार मिल रहा हो वह आमतौर पर हँसता नहीं। कामदेव हँसता है, और हँसकर जो पहला वाक्य कहता है वह उसका अपना मृत्युलेख है: शिव से विरोध करने में मेरी कुशल नहीं। न कोई शिकायत, न कोई मोलभाव। केवल तथ्य, और वह भी मुस्कुराकर।

देवताओं के पास इसका कोई उत्तर नहीं है, और तुलसीदास उन्हें उत्तर देने भी नहीं देते। अगली चौपाई में बोलनेवाला वही है जो अभी बोल रहा था, और वह अपनी ही बात का दूसरा आधा हिस्सा जोड़ता है।

तदपि करब मैं काजु तुम्हारा । श्रुति कह परम धरम उपकारा॥
पर हित लागि तजइ जो देही । संतत संत प्रसंसहिं तेही॥

चौपाई ४

यहाँ काम का देवता वेद का हवाला देकर अपना निर्णय बाँधता है। श्रुति दूसरे के उपकार को परम धर्म कहती है, और जो दूसरे के हित के लिये अपनी देह त्याग देता है उसकी बड़ाई सन्त सदा करते हैं। यानी वह जा रहा है, और किस अधिकार से जा रहा है, इसका आधार वह शास्त्र में रखता है। अपने बचाव में नहीं, अपने प्रस्थान के औचित्य में।

इस एक चौपाई से कामदेव का चेहरा बदल जाता है। तुलसीदास चाहते तो उसे मूर्ख बना सकते थे, जो अपनी शक्ति के घमण्ड में महादेव से टकरा गया। या खलनायक, जिसने तपस्या में विघ्न डाला और दण्ड पाया। उन्होंने न वह किया न यह। उन्होंने उसे स्वयंसेवक बनाया, जो परहित के नाम पर जान देने निकला है, और जिसे भेजनेवाले भी जानते हैं कि वह क्या देने जा रहा है।

चलत मार अस हृदयँ बिचारा । सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा॥

चौपाई ५

ध्रुव, यानी अटल, तय। शायद नहीं, हो सकता है नहीं। चलते चलते वह यही सोच रहा है, और इसी सोच के साथ चल रहा है। इससे पहले वह सबको सिर नवा चुका है और फूलों का धनुष हाथ में ले चुका है, सहायकों को साथ ले चुका है। तैयारी पूरी है और परिणाम पहले से लिखा हुआ है। यह किसी युद्ध का प्रस्थान नहीं है, यह किसी बलि का प्रस्थान है।

सार: देवताओं की विपत्ति सुनकर कामदेव हँसकर कहता है कि शिव से विरोध में उसकी कुशल नहीं, फिर भी वह उनका काम करेगा, क्योंकि वेद परोपकार को परम धर्म कहते हैं। चलते समय वह मन में यही दुहराता है कि शिव से विरोध करने पर उसका मरना निश्चित है।

दो घड़ी का ब्रह्माण्ड

अब यहाँ एक बात पर ठहरना चाहिये जो कथा की चाल बदल देती है। कामदेव सीधे कैलास नहीं जाता। वह पहले अपना प्रभाव फैलाता है और सारे संसार को अपने वश में कर लेता है। जिस क्षण उस मछली की ध्वजावाले ने कोप किया, उसी क्षण में वेदों की सारी मर्यादा मिट गयी। लक्ष्य एक है और आक्रमण पूरी सृष्टि पर है।

फिर तुलसीदास एक सूची देते हैं: ब्रह्मचर्य, व्रत, नाना प्रकार के संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य। और इन्हें गुण नहीं कहते। इन्हें सेना कहते हैं, और उस सेना का नाम रखते हैं विवेक का कटक। विवेक सेनापति है, बाक़ी सब उसके सिपाही, और यह पूरी फ़ौज डरकर भाग खड़ी होती है। धर्म यहाँ नियमों की सूची नहीं है, वह मोर्चे पर खड़ी एक टुकड़ी है, और वह टूट गयी।

भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।
सदग्रंथ पर्बत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे॥
होनिहार का करतार को रखवार जग खरभरु परा।
दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपि कर धनु सरु धरा॥

छंद

भागकर वे गये कहाँ, यह छंद की दूसरी पंक्ति में है: सद्ग्रन्थ रूपी पर्वत की कन्दराओं में। पोद्दार इसे साफ़ खोल देते हैं कि ज्ञान, वैराग्य, संयम, नियम और सदाचार ग्रन्थों में लिखे रह गये, उनका आचरण छूट गया। यह इस पूरे प्रसंग की सबसे तीखी पंक्ति है। सद्गुण मरता नहीं, वह पुस्तक में जा बैठता है, और पुस्तक में बैठा हुआ सद्गुण किसी को नहीं बचाता।

और छंद की आख़िरी पंक्ति संसार की चीख़ है। हे विधाता, अब क्या होनेवाला है, हमारी रक्षा कौन करेगा। ऐसा दो सिरवाला कौन है जिसके लिये रति के पति ने कोप करके हाथ में धनुष और बाण उठा लिया। मुहावरा सीधा है: दो सिर उसी के पास हो सकते हैं जो एक सिर गँवाने का ख़र्च उठा सके। और इसी पंक्ति में इस पन्ने पर रति पहली बार आती हैं, अपने नाम से नहीं, अपने पति के नाम के भीतर से। जो आगे चलकर पूरा दृश्य बनेंगी, वे अभी केवल एक सम्बन्ध हैं।

जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम॥ ८४॥

दोहा ८४

दोहा जिस तराज़ू पर तौलता है वह तराज़ू मर्यादा है। सुख नहीं, पाप नहीं, भोग नहीं। हर प्राणी की अपनी एक सीमा है, और उस सीमा का छूट जाना ही यहाँ हार का माप है। इसीलिये आगे का ब्योरा उन चीज़ों से शुरू होता है जिनकी कोई इच्छा ही नहीं मानी जाती। लताओं को देखकर वृक्षों की डालियाँ झुकने लगीं, नदियाँ उमड़कर समुद्र की ओर दौड़ीं, और ताल तलैया आपस में मिलने लगे।

फिर तुलसीदास एक ही पंक्ति में तर्क पलट देते हैं: जहाँ जड़ों की यह दशा कही गयी, वहाँ चेतन की करनी कौन कह सके। वृक्ष और नदी का उदाहरण पहले रखा गया, ताकि जीवों पर बात कहने की ज़रूरत ही न पड़े। आकाश, जल और थल में विचरनेवाले पशु पक्षी अपना समय भुलाकर काम के वश हो गये। समय भूलना, यानी ऋतु का नियम भूलना, जो पशु के लिये सबसे भीतरी मर्यादा है।

फिर वह चित्र आता है जो इस वर्णन का शिखर है। सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये, और चकवा चकवी रात दिन नहीं देखते। जिस जोड़े की सारी पहचान ही यह है कि वह रात में अलग हो जाता है, उसने रात और दिन का भेद करना छोड़ दिया। इसके बाद देव, दैत्य, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत और बेताल की एक लम्बी क़तार आती है, और तुलसीदास उसे गिनाकर तुरन्त हाथ खींच लेते हैं।

वे कहते हैं कि इनकी दशा मैंने बखानकर कही ही नहीं, क्योंकि ये तो सदा ही काम के चेरे हैं। यह वर्णन से इनकार, इस पूरे प्रसंग का सबसे नुकीला वाक्य है। इनके बारे में कहने को कुछ नया है ही नहीं। जिनके बारे में कहने लायक़ कुछ है, वे अगली ही पंक्ति में आते हैं: सिद्ध, विरक्त, महामुनि और योगी, और वे भी काम के वश होकर वियोगी हो गये।

भए कामबस जोगीस तापस पावँरन्हि की को कहै।
देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥
अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं।
दुइ दंड भरि ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं॥

छंद

इस छंद की बीच की दो पंक्तियाँ किसी शास्त्रीय परिभाषा की तरह ठीक बैठती हैं। जो चराचर को ब्रह्ममय देखते रहे थे, वे अब उसे नारीमय देखने लगे। और वही उलटफेर दोनों ओर से: स्त्रियाँ जगत को पुरुषमय देखने लगीं, पुरुष स्त्रीमय। दृष्टि वही है, केवल उसका विषय बदल गया है। योगी की साधना जिस देखने पर टिकी थी, हार भी ठीक उसी देखने में हुई।

और फिर अन्तिम पंक्ति सब कुछ पर एक घड़ी रख देती है: दो दण्ड भर, यानी लगभग अड़तालीस मिनट, ब्रह्माण्ड के भीतर काम का रचा हुआ यह कौतुक रहा। तुलसीदास इसे प्रलय नहीं कहते, कौतुक कहते हैं, तमाशा। और उसे नापकर रख देते हैं। जिस उलटफेर में सारी सृष्टि डूब गयी, वह घड़ी भर का था। यह दया भी है और चुटकी भी।

धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे।
जे राखे रघुबीर ते उबरे तेहि काल महुँ॥ ८५॥

सोरठा ८५

अब उस पंक्ति को फिर याद कीजिये जो इस पन्ने की दूसरी चौपाई में आयी थी, कि शिव मन स्थिर करके रघुनायक का ध्यान करने लगे। सोरठा कहता है कि किसी ने धीरज नहीं रखा, मनसिज ने सबके मन हर लिये, और उस काल में केवल वे बचे जिनकी रक्षा रघुबीर ने की। शिवकथा के ठीक बीचोबीच बचानेवाला नाम रघुबीर का है, और जो अकेला आदमी काम की पकड़ से बाहर खड़ा है वह पहले ही उस नाम में बैठा हुआ है। मानस की पूरी रीढ़ इन दो पंक्तियों में दिख जाती है।

सार: कामदेव पहले सारे संसार को जीतता है। विवेक की सेना भागकर सद्ग्रन्थों में छिप जाती है, जड़ और चेतन दोनों अपनी मर्यादा छोड़ देते हैं, योगी तक वश में आ जाते हैं, और यह सब दो घड़ी तक चलता है। सोरठा बताता है कि उस काल में केवल वे बचे जिनकी रक्षा रघुबीर ने की।

शिव के सामने, और वसन्त का दाँव

दो घड़ी का यह तमाशा तब तक चला जब तक कामदेव शिव के पास पहुँच नहीं गया। और वहाँ पहुँचते ही दो बातें एक साथ होती हैं, जिन्हें तुलसीदास एक ही अर्धाली में रख देते हैं। शिव को देखकर मार ससंकित हो गया, और सारा संसार फिर जैसा था वैसा हो गया।

इस पर ठहरिये। अभी तक कोई बाण नहीं चला। कोई युद्ध नहीं हुआ। शिव ने कुछ किया ही नहीं, उन्होंने आँखें भी नहीं खोलीं। केवल कामदेव ने उन्हें देखा, और जो कुछ पूरी सृष्टि पर छा गया था वह उतर गया। इस पन्ने पर शिव का असली माप यह नहीं है कि उन्होंने पाँच बाण सह लिये। माप यह है कि दो घड़ी में डूबा हुआ ब्रह्माण्ड उतनी देर में लौट आया जितनी देर में कामदेव ने उनकी ओर नज़र उठायी।

और लौटने का ढंग भी तुलसीदास की अपनी उपमा से आता है। सब जीव तुरन्त वैसे ही सुखी हो गये जैसे नशा उतर जाने पर मतवाले सुखी होते हैं। यानी वह पूरा दौर एक नशा था, और नशे की तरह उतरा। जिसने उस घड़ी में जो किया, उसके लिये वह उसका अपना निर्णय भी नहीं था। इस एक उपमा से तुलसीदास पूरे प्रकरण का फ़ैसला सुना देते हैं, बिना किसी को दोषी ठहराये।

उधर कामदेव की दशा दूसरी है। रुद्र को देखकर वह भयभीत है, और तुलसीदास शिव के लिये यहाँ दो विशेषण रखते हैं, दुराधरष और दुर्गम। जिन्हें हराना कठिन है और जिनका पार पाना कठिन है। इन्हीं के सामने खड़ा होकर वह सोचता है कि लौटने में लज्जा है और किये कुछ बनता नहीं। फिर मन में मरने का निश्चय करके वह उपाय रचता है। यह दूसरी बार है। पहली बार रास्ते में, दूसरी बार दरवाज़े पर।

और उसका उपाय एक ऋतु है। तुरन्त सुन्दर ऋतुराज प्रकट हो गया, फूले हुए नये वृक्षों की क़तारें सज गयीं। वन, उपवन, बावली, तालाब और सारी दिशाएँ परम सुन्दर हो गयीं। जहाँ तहाँ मानो अनुराग उमड़ रहा है, और उसे देखकर मरे हुए मनों में भी मनसिज जाग उठा। कामदेव के पास सेना थी, धनुष था, बाण थे; पर जो अस्त्र वह यहाँ चलाता है वह मौसम है।

आगे का छंद उस मौसम को खोलकर रख देता है, और उसमें एक पंक्ति ऐसी है जिसे पढ़कर रुकना पड़ता है। शीतल, सुगन्धित और मन्द पवन को तुलसीदास काम रूपी अग्नि का सच्चा सखा कहते हैं। ठण्डी हवा आग की मित्र। सरोवरों में कमल खिल गये, भौंरों के समूह गुंजार करने लगे, राजहंस, कोयल और तोते रसीली बोली बोलने लगे, अप्सराएँ गा गाकर नाचने लगीं। सब कुछ जुटा दिया गया, एक आदमी के लिये।

सकल कला करि कोटि बिधि हारेउ सेन समेत।
चली न अचल समाधि सिव कोपेउ हृदयनिकेत॥ ८६॥

दोहा ८६

दोहे के तीन हिस्से तीन अलग बातें कहते हैं। पहला, उसने करोड़ों प्रकार की सब कलाएँ कर लीं और सेना समेत हार गया। दूसरा, शिव की अचल समाधि चली ही नहीं; जो अचल है वह अचल ही रहा। और तीसरा, तब हृदयनिकेत ने कोप किया।

यह तीसरा शब्द जानबूझकर वहीं रखा गया है। हृदयनिकेत का अर्थ है जिसका निवास हृदय में हो। तुलसीदास कामदेव को यह नाम ठीक उस जगह देते हैं जहाँ वह एक हृदय के भीतर नहीं घुस पाया। जो सब हृदयों में बसता है उसे यहाँ बाहर से आना पड़ रहा है, और आगे उसे एक पेड़ पर चढ़ना पड़ेगा। नाम और स्थिति के बीच का यह अन्तर ही उसकी हार का पूरा नाप है।

सार: शिव को देखते ही कामदेव सहम जाता है और संसार अपनी जगह लौट आता है। लौटने में लज्जा मानकर वह मरने का निश्चय करता है और वसन्त प्रकट कर देता है, पर करोड़ों कलाओं के बाद भी शिव की अचल समाधि नहीं डिगती, और तब हृदयनिकेत कोप करता है।

आम की डाल से

देखि रसाल बिटप बर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदनु मन माखा॥
सुमन चाप निज सर संधाने । अति रिस ताकि श्रवन लगि ताने॥

चौपाई ६

दो ब्योरे इस चौपाई को और किसी से अलग करते हैं। पहला, वह डाल पर चढ़ता है मन माखे हुए, यानी भीतर से खीझा हुआ, चिढ़ा हुआ। दूसरा, वह अति रिस से ताककर बाणों को कान तक तान लेता है। अत्यन्त क्रोध, और पूरी खिंचाई। फूलों का धनुष यहाँ किसी युद्ध के धनुष की तरह खींचा जा रहा है।

जो देवता अब तक हँसकर बोल रहा था, जो वेद का हवाला देकर परोपकार के लिये निकला था, वह अन्त में क्रोध में है। कारण साफ़ है। उसने सब कुछ लगा दिया और कुछ हुआ नहीं। जिस काम में सारी सृष्टि दो घड़ी में झुक गयी थी, उस काम में एक बैठा हुआ आदमी उसे हरा रहा है। यह कामदेव की आख़िरी चाल है, और वह इसे गुस्से में चलता है, हिसाब से नहीं।

फिर वह होता है जिसके लिये देवताओं ने उसे भेजा था। उसने विषम बाण छोड़े, वे हृदय में लगे, समाधि छूट गयी और शंभु जाग गये। और तुलसीदास अगली ही अर्धाली में वह शब्द रखते हैं जो देवताओं के आदेश में था: ईश के मन में बहुत क्षोभ हुआ। जो माँगा गया था वही मिला, अक्षरशः। आदेश की भाषा और परिणाम की भाषा एक ही है, और उसी एक शब्द की क़ीमत अगली चौपाई में चुकायी जाती है।

जागकर शिव आँखें खोलते हैं और सब दिशाओं में देखते हैं। यह देखना ख़ाली नहीं है। कोई मन को क्षुब्ध कर गया है और वे उसे ढूँढ़ रहे हैं। और फिर वह मिल जाता है, आम के पत्तों के बीच।

सौरभ पल्लव मदनु बिलोका। भयउ कोपु कंपेउ त्रैलोका॥
तब सिवँ तीसर नयन उघारा । चितवत कामु भयउ जरि छारा॥

चौपाई ७

इस चौपाई में सबसे बड़ा काम एक क्रिया करती है: चितवत। देखते ही। तीसरा नेत्र खुला और देखते ही देखते कामदेव जलकर छार हो गया। न कोई अस्त्र उठा, न कोई मन्त्र पढ़ा गया, न कोई युद्ध हुआ। कामदेव को इस लड़ाई के लिये एक ऋतु, एक सेना, एक धनुष, पाँच बाण और पूरी सृष्टि चाहिये थी। शिव को एक दृष्टि चाहिये थी।

और उससे पहले तीनों लोक काँप गये, यह भी लिखा है। क्रोध पहले काँपा, आग बाद में लगी। इससे पता चलता है कि यह दण्ड आवेश में दिया गया दण्ड नहीं है। जो हुआ वह उस क्रोध का स्वाभाविक परिणाम है जिसे रोकने के लिये पूरी सृष्टि काँप उठी थी, और फिर भी वह नहीं रुका।

अगली चौपाई में तुलसीदास एक मृत्यु पर चार अलग अलग प्रतिक्रियाएँ रख देते हैं। जगत में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये। दैत्य सुखी हुए। भोगी लोग काम का सुख याद करके चिन्ता करने लगे। और साधक योगी निष्कंटक हो गये। एक ही घटना, और चार तरह के लोग उसे चार तरह से पढ़ते हैं। तुलसीदास चारों को गिनाकर छोड़ देते हैं और किसी को सही नहीं ठहराते।

सार: कामदेव आम की डाल पर चढ़कर क्रोध में बाण कान तक तानता है और छोड़ देता है। शिव की समाधि टूटती है, मन में क्षोभ होता है, वे आँखें खोलकर देखते हैं, और तीसरा नेत्र खुलते ही कामदेव जलकर राख हो जाता है। देवता डरते हैं, दैत्य प्रसन्न होते हैं और योगी निष्कंटक हो जाते हैं।

रति, और वह वरदान जो शरीर नहीं लौटाता

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई।
रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥
अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही।
प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥

छंद

इस छंद में रति की चार गतियाँ एक के बाद एक आती हैं और चारों गिनने लायक़ हैं। पति की गति सुनते ही वे मूर्च्छित हुईं। फिर रोती, बिलखती और भाँति भाँति से करुणा करती हुईं। फिर शंकर के पास गयीं। और फिर हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयीं। मूर्च्छा में वे रुकी नहीं रहीं, और शिकायत लेकर किसी तीसरे के पास भी नहीं गयीं। वे सीधे उसी के सामने पहुँचीं जिसके नेत्र से यह हुआ था।

सन्मुख शब्द पर ध्यान दीजिये। पीछे नहीं, बग़ल में नहीं, सामने। और तुलसीदास शिव के लिये यहाँ जो नाम चुनते हैं वह भी ठीक इसी क्षण का है: आसुतोष, जो तुरन्त प्रसन्न हो जायें, और कृपाल। अबला को देखकर वे बोले। बोले, यानी पहल उन्होंने की। रति ने विनती की है पर अभी कोई माँग रखी नहीं, और वरदान माँग से पहले आ जाता है।

अब तें रति तव नाथ कर होइहि नामु अनंगु।
बिनु बपु ब्यापिहि सबहि पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु॥ ८७॥

दोहा ८७

अब इस वरदान की बनावट देखिये, क्योंकि यही इस पन्ने की सबसे गहरी बात है। शिव देह लौटाते नहीं। वे हानि को एक नाम में बदल देते हैं, अनंग, जिसका कोई अंग न हो। और फिर उस नाम को एक सामर्थ्य में बदल देते हैं: बिना शरीर के वह सबको व्यापेगा।

सोचिये कि इससे क्या हुआ। शरीर वाली वस्तु दिखती है, इसलिये उससे बचा जा सकता है; उस पर निशाना भी लगाया जा सकता है, जैसे अभी लगाया गया। जिसका शरीर ही नहीं, उससे बचने का कोई उपाय नहीं बचता, क्योंकि उसके आने का कोई रास्ता नहीं, वह पहले से हर जगह है। जो दण्ड दिया गया वह देह पर पड़ा, और उसी दण्ड ने काम की पहुँच से वह अकेली सीमा हटा दी जो उस पर थी।

और वरदान यहीं ख़त्म नहीं होता। दोहे का दूसरा भाग रति को उनके मिलन का प्रसंग सुनने को कहता है। शिव बताते हैं कि जब पृथ्वी का भार उतारने के लिये यदुवंश में कृष्ण का अवतार होगा, तब उनका पति कृष्ण के पुत्र के रूप में जन्म लेगा, और मेरा यह वचन अन्यथा नहीं होगा। पद में केवल कृष्ण तनय लिखा है; पोद्दार की टीका कोष्ठक में उस पुत्र का नाम प्रद्युम्न बताती है।

इस उत्तर में जो असाधारण है वह उसका पैमाना है। बालकाण्ड में खड़ी एक विधवा को सान्त्वना किसी आगामी सप्ताह की नहीं दी जाती, किसी दूसरे युग की दी जाती है। और उसे टालमटोल की तरह नहीं रखा जाता, तारीख़ के साथ रखा जाता है: कौन सा वंश, किसका पुत्र, किस काम के लिये अवतार। वचन के साथ उसकी शर्तें गिना दी जाती हैं, ताकि उसे परखा जा सके।

और रति का जाना एक पंक्ति में है। शंकर की वाणी सुनकर रति चली गयीं। जो मूर्च्छित होकर आयी थीं, वे एक वचन के सहारे लौट जाती हैं। इसके तुरन्त बाद तुलसीदास स्वयं पन्ना पलट देते हैं और कहते हैं कि अब दूसरी कथा बखानकर कहता हूँ। जितनी सफ़ाई से यह प्रसंग खुला था, उतनी ही सफ़ाई से बन्द होता है।

सार: पति की दशा सुनकर रति मूर्च्छित होती हैं, फिर रोती हुई शिव के सामने जाकर हाथ जोड़े खड़ी हो जाती हैं। शिव बिना माँगे वरदान देते हैं कि अब उनके स्वामी का नाम अनंग होगा और वे बिना शरीर के सबको व्यापेंगे, और यदुवंश में कृष्ण के अवतार के समय वे उनके पुत्र रूप में जन्म लेंगे।

देवताओं की विनती, और सप्तर्षियों की ठिठोली

समाचार देवताओं तक पहुँचता है और वे चल पड़ते हैं। पहले ब्रह्मा आदि वैकुण्ठ जाते हैं, फिर विष्णु और ब्रह्मा सहित सब देवता वहाँ पहुँचते हैं जहाँ कृपा के धाम शिव हैं। सबने अलग अलग स्तुति की, और चन्द्रमा को शिरोभूषण की तरह धारण करनेवाले प्रसन्न हो गये। अलग अलग, यानी सामूहिक पाठ नहीं; हर एक ने अपने ढंग से।

फिर शिव पूछते हैं कि कहिये देवताओ, किस कारण आये हैं। और ब्रह्मा जो उत्तर देते हैं वह सुनने लायक़ है। वे कहते हैं कि हे प्रभो, आप अन्तर्यामी हैं, तथापि हे स्वामी, भक्ति के वश मैं विनती करता हूँ। यानी वे पहले मान लेते हैं कि यह कहना अनावश्यक है, और तब कहते हैं। और कारण भी बता देते हैं: आवश्यकता नहीं, भक्ति। माँगनेवाला जानता है कि माँगने से पहले ही सब जाना जा चुका है, और फिर भी माँगना छोड़ता नहीं, क्योंकि माँगना उसका सम्बन्ध है।

फिर वह बात आती है जिसके लिये देवता आये हैं, और वह इस कथा की सबसे मीठी माँग है। सब देवताओं के हृदय में ऐसा परम उत्साह है कि वे अपनी आँखों से महादेव का विवाह देखना चाहते हैं। निज नयनन्हि देखा चहहिं, अपनी आँखों से। सुनने से काम नहीं चलेगा। जिस विवाह की योजना बचाव के उपाय की तरह शुरू हुई थी, अब वह उत्सव बन चुका है जिसे देखने की इच्छा है।

और वे इसी प्रार्थना में उस घटना का भी हिसाब चुकता कर देते हैं जो अभी अभी हुई है। वे शिव को मदन का मद तोड़नेवाला कहकर पुकारते हैं, यानी ठीक उस काम के नाम से जिसने विवाह को कठिन बना दिया है। और तुरन्त बाद वे रति वाले वरदान पर मुहर लगाते हैं: काम को जलाकर आपने रति को जो वर दिया, हे कृपासिंधु, यह आपने बहुत ही भला किया। दण्ड और कृपा, दोनों की एक साथ प्रशंसा।

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ । नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ॥
पारबतीं तपु कीन्ह अपारा । करहु तासु अब अंगीकारा॥

चौपाई ८

यहाँ यह कथा अपने बारे में अपनी टीका स्वयं लिख देती है। दण्ड देकर फिर कृपा करना, यह बड़े स्वामियों का सहज स्वभाव है। सहज, यानी अपवाद नहीं, नियम। इस एक वाक्य से पीछे का सारा प्रकरण एक ही रेखा पर आ जाता है: कामदेव का जलना और रति का वरदान दो अलग घटनाएँ नहीं हैं, वे एक ही स्वभाव के दो सिरे हैं। और इसी चौपाई के दूसरे आधे में वह माँग आख़िरकार सीधी सादी होकर सामने आती है, कि पार्वती ने अपार तप किया है, अब उन्हें अंगीकार कीजिये।

शिव ब्रह्मा की विनय सुनते हैं और समुझि प्रभु बानी, प्रभु की वाणी को याद करके प्रसन्नता से कहते हैं, ऐसा ही हो। पोद्दार की टीका इस प्रभु को श्रीरामचन्द्र बताती है। यानी इस पूरे पन्ने का अन्तिम निर्णय भी उसी नाम से होकर निकलता है जिसका ध्यान दूसरी चौपाई में लगा था और जिसका बचाव सोरठा पचासी में गिना गया था। तब देवताओं ने नगाड़े बजाये और फूल बरसाते हुए जयकार की।

अवसर जानकर सप्तर्षि आते हैं और ब्रह्मा उन्हें तुरन्त हिमाचल के घर भेज देते हैं। वे पहले वहाँ जाते हैं जहाँ भवानी हैं, और मीठे वचन बोलते हैं। पर तुलसीदास उन वचनों को मीठा कहकर छोड़ते नहीं, वे उन्हें छल में सनी हुई बताते हैं। यानी जो अब कहा जाने वाला है वह सच नहीं है, और कहनेवाले भी यह जानते हैं, और पाठक को भी पहले ही बता दिया जाता है।

कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस।
अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ कामु महेस॥ ८९॥

दोहा ८९

पन्ना एक ठिठोली पर ख़त्म होता है। वही सात ऋषि, जो इसी पन्ने के आरम्भ में पार्वती की कथा शिव तक पहुँचाने गये थे, अब लौटकर पार्वती से कहते हैं कि नारद के उपदेश के चक्कर में हमारी बात नहीं मानी, और अब प्रण झूठा पड़ गया, क्योंकि महादेव ने काम को ही जला डाला। तर्क बाहर से पक्का है और भीतर से खोखला, क्योंकि जो अभी अभी वैकुण्ठ और कैलास में तय हुआ है उसकी ख़बर वे लेकर ही आये हैं।

और यही इस प्रसंग की अन्तिम चतुराई है। विवाह इस पन्ने पर नहीं होता। जिस उत्साह में देवता नगाड़े बजा चुके हैं, उसका दृश्य अगले प्रसंग के लिये बचा रहता है। जो पन्ना एक सन्देश से खुला था वह एक ठिठोली पर बन्द होता है, और दोनों बार सन्देश ले जानेवाले वही सात लोग हैं।

सार: देवता विष्णु और ब्रह्मा सहित शिव के पास जाकर स्तुति करते हैं और अपनी आँखों से उनका विवाह देखने की इच्छा रखते हैं। ब्रह्मा कहते हैं कि दण्ड देकर कृपा करना बड़े स्वामियों का सहज स्वभाव है और पार्वती को अंगीकार कीजिये। शिव प्रभु की वाणी याद करके हामी भर देते हैं, और सप्तर्षि जाकर पार्वती को छल भरे मीठे वचनों से चिढ़ाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग को एक साथ रखकर पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है, वह यह है कि यहाँ कोई अनजान नहीं है। ब्रह्मा अपने ही उपाय को भारी असमंजस कहकर सुनाते हैं। कामदेव दो बार अपनी मृत्यु का ऐलान करता है, एक बार देवताओं के सामने हँसकर और एक बार रास्ते में चुपचाप। देवता शिव से पहले यह कहते हैं कि आपसे कहना व्यर्थ है। और सप्तर्षि जो अन्तिम बात करते हैं, उसे कथा स्वयं छल में सनी हुई बताती है। हर आदमी अपने काम का दोष पहले बोलता है और फिर वह काम करता है।

दूसरी बात दण्ड और कृपा के जोड़ की है, और इसे इस कथा ने स्वयं शब्द दिये हैं। सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। पर पन्ने पर जो हुआ वह इससे भी एक क़दम आगे जाता है। शिव ने जो जलाया वह देह थी, और उसके बाद उन्होंने जो किया उससे उस जली हुई देहवाले की पहुँच पहले से बड़ी हो गयी। बिना शरीर के सबको व्यापना कोई घटी हुई अवस्था नहीं है। और देवता इसी को अति भल कहकर सराहते हैं। कथा इस पर बहस नहीं करती, वह केवल दोनों वाक्य पास पास रख देती है और आगे चली जाती है।

तीसरी बात उस चीज़ की है जो इस पन्ने पर नहीं है। तारक यहाँ मरता नहीं; वह इस पूरे प्रसंग में एक बार भी सामने नहीं आता। दोहा बयासी में जिस पुत्र की शर्त रखी गयी थी, वह पुत्र यहाँ जन्मता नहीं। और जिस विवाह के लिये इतना कुछ किया गया, वह भी यहाँ नहीं होता। जो पन्ना इतनी बड़ी शर्त से शुरू होता है, वह उसे चुकाये बिना बन्द हो जाता है, और यही उसे आगे पढ़ते रहने का कारण देता है।

अन्त में एक छोटी सी बात, जो शायद इस प्रसंग की सबसे बड़ी बात है। इस पन्ने का नाम काम के दहन पर है, पर दहन में तुलसीदास की केवल आधी पंक्ति लगती है: चितवत कामु भयउ जरि छारा। बाक़ी सब उससे पहले की तैयारी है और उसके बाद का हिसाब। जिस घटना के लिये पन्ना जाना जाता है उस पर सबसे कम शब्द ख़र्च होते हैं, और सबसे अधिक शब्द उन निर्णयों पर, जो लोगों ने घटना के आसपास लिये। कथा का ध्यान आग पर नहीं है, उन लोगों पर है जो आग के दोनों ओर खड़े थे।

और उसी क्रम में वह नाम भी रह जाता है जो इस शिवकथा के नीचे लगातार बहता रहा। शिव समाधि में बैठे तो रघुनायक का ध्यान लेकर बैठे। दो घड़ी के उस उलटफेर में जो बचे, सोरठा उन्हें रघुबीर के रखे हुए बताता है। और अन्त में जब शिव विवाह के लिये हामी भरते हैं, तो प्रभु की वाणी याद करके भरते हैं। यह प्रसंग ऊपर से काम और महादेव का है। नीचे से यह उस नाम का है जिसका ध्यान इसके पहले ही वाक्यों में लग चुका था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ८२ से ८९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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