रामचरितमानस · बालकाण्ड · शिव का मन से त्याग, दक्ष का यज्ञ और सती का देह-त्याग
शिव का मन से त्याग, दक्ष का यज्ञ और सती का देह-त्याग
एक पति जो अपना निर्णय मन-ही-मन कर लेता है और कभी बताता नहीं, एक पत्नी जो सत्तासी हजार वर्ष उसी चुप्पी में बैठी रहती है, और अन्त में वही देह जो छोड़ी जा चुकी थी, भरी सभा में स्वयं छोड़ दी जाती है।
पिछला प्रसंग एक प्रश्न पर आकर रुका था। शिवजी ने हँसकर कुशल पूछी थी और कहा था कि परीक्षा किस प्रकार ली, सारी बात सच-सच कहिये। यह पन्ना उसी प्रश्न के उत्तर से खुलता है, और उत्तर झूठ है। सती कहती हैं कि मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, वहाँ जाकर बस आपकी ही तरह प्रणाम कर आयी। इसके आगे जो कुछ होता है वह सब इसी एक वाक्य में से निकलता है। और जो होता है उसमें कहीं कोई झगड़ा नहीं है, कोई उलाहना नहीं है, किसी ऊँची आवाज़ का एक भी शब्द नहीं है।
नौ दोहों की इस कथा में सबसे बड़ी घटना वह है जो किसी को दिखायी नहीं देती। शिव अपने मन के भीतर एक संकल्प करते हैं, और वह संकल्प न सती को बताया जाता है, न किसी गण को, न कैलास के किसी और निवासी को। बाहर से देखिये तो सब कुछ पहले जैसा चलता रहता है। रास्ते में सुन्दर कथाएँ कही जाती हैं, घर पहुँचकर बैठने को सामने आसन दिया जाता है, विदा के समय मुख्य गण साथ भेजे जाते हैं। भीतर से एक गृहस्थी उसी दिन समाप्त हो चुकी होती है।
और एक शब्द इस पूरे प्रसंग में तीन बार लौटता है, हर बार किसी बड़े मोड़ पर। पहली बार शिव अपने मन में कहते हैं कि इस देह से अब भेंट नहीं। दूसरी बार सती हाथ जोड़कर राम से माँगती हैं कि यह देह जल्दी छूट जाय। तीसरी बार वे भरी सभा में कहती हैं कि इसी देह को अभी त्याग देती हूँ। जो शरीर चुपचाप छोड़ा गया था, वही अन्त में सबके सामने छोड़ दिया जाता है, और बीच का सारा समय, सत्तासी हजार वर्ष समेत, उसी एक शब्द के इर्द-गिर्द बीत जाता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- शिव शंकर, महेश, त्रिपुरारि, जो इस प्रसंग में एक बार भी ऊँचे स्वर में नहीं बोलते और जिनका निर्णय पहले ही दोहे तक हो चुका होता है।
- सती दक्ष की पुत्री और शिव की पत्नी, जिनसे एक छिपाव हो गया और जो उसके बाद अपनी बात किसी से नहीं कह पातीं।
- रामजी की माया वह शक्ति जिसे शिव सिर नवाते हैं, क्योंकि उसी की प्रेरणा से सती के मुँह से झूठ निकला था।
- दक्ष प्रजापतियों के नायक, जिन्हें ब्रह्माजी ने सब प्रकार से योग्य देखकर यह पद दिया, और जिनके हृदय में पद के साथ ही मद उतर आया।
- सती की माता और बहनें दक्ष के घर में वह अकेली स्त्री जो आदर से मिलीं, और वे बहनें जो बहुत मुसकराती हुई मिलीं।
- भृगु वे मुनीश्वर जो अन्तिम दोहे में टूटते हुए यज्ञ की रक्षा करते हैं।
एक झूठ, और वह ध्यान जिसमें सब खुल जाता है
उत्तर देने से पहले तुलसी कारण बता देते हैं, और कारण दो अक्षर का है। भय। सती ने रघुवीर का प्रभाव समझ लिया था, और समझ लेने के बाद जो हुआ वह चतुराई नहीं थी, डर था। जिसने अभी-अभी देखा हो कि जिधर आँख उठाओ उधर वही एक मुख है, वह लौटकर अपने पति से आँख नहीं मिला पाता। इसलिये उन्होंने छिपाव किया, और छिपाव का ढंग देखने लायक है।
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ । भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥
चौपाई १
कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं । कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥
उन्होंने कोई कहानी नहीं गढ़ी। उन्होंने घटा दिया। मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, और प्रणाम भी उसी तरह किया जिस तरह आपने किया था। झूठ की सामग्री उन्होंने अपने पति के ही आचरण से उठायी है। जो वे सचमुच कर आयी थीं उसका नाम तक नहीं लिया गया, और जो नहीं किया था उसे इस तरह कहा गया कि वह पति के किये हुए की नकल जान पड़े। दुराऊ शब्द तुलसी ने ठीक इसी के लिये रखा है। यह गढ़ना नहीं, ढाँकना है।
अब शिव का उत्तर। और यहाँ जो क्रम है, वह इस पूरे पन्ने की कुंजी है। वे पहले विश्वास कहते हैं, जाँच बाद में करते हैं।
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥
चौपाई २
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना॥
आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यही पूरा विश्वास है। इतना कहकर वे चुप हो जाते हैं, और तब ध्यान धरकर देखते हैं। ध्यान में जो मिलता है उसे तुलसी एक ही शब्द से तौल देते हैं, सबु। सतीजी ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया। कुछ बचा नहीं, कुछ अधूरा नहीं मिला। और जानने के बाद भी उस वाक्य को वापस नहीं लिया जाता जो जानने से पहले कहा गया था। जिस घर में एक झूठ पकड़ा जा चुका है, उस घर में उस झूठ का नाम फिर कभी नहीं लिया जाता।
जानने के बाद उनका पहला काम भी किसी की ओर उँगली उठाना नहीं है। वे मुड़ते हैं और श्रीरामचन्द्रजी की माया को सिर नवाते हैं, उसी माया को, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से झूठ कहला दिया। यानी वचन उनके कान में पड़ा है, पर उसका कर्ता वे उस स्त्री को मानते ही नहीं जिसने वह वचन बोला। इसीलिये इस पूरे प्रसंग में सती पर एक भी आरोप कहीं नहीं लगता। आरोप लगाने की जगह पर प्रणाम खड़ा कर दिया गया है।
सार: सती डर के मारे शिव से छिपाव करती हैं और कहती हैं कि मैंने कोई परीक्षा नहीं ली। शिव पहले कहते हैं कि आपकी बात झूठ हो ही नहीं सकती, फिर ध्यान लगाकर सब जान लेते हैं। जानने पर वे सती से कुछ नहीं कहते, रामजी की माया को सिर नवाते हैं और मन में मानते हैं कि हरि की इच्छा रूपी भावी प्रबल है।
परम पुनीत, और बड़ा पाप
ध्यान में उन्होंने क्या देखा, यह अगली ही चौपाई खोल देती है, और वहीं विषाद का कारण भी खुल जाता है। सती ने सीताजी का वेष धारण किया था। शिव के हृदय में जो पीड़ा उठती है, वह इस बात की नहीं है कि मुझसे झूठ बोला गया। वह इस बात की है कि जिस रूप की वे स्वयं वन्दना करते हैं, वह रूप उनकी पत्नी ने ओढ़ लिया।
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥
चौपाई ३
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥
और अब वह वाक्य, जिसके कारण इस प्रसंग को पढ़ना कठिन हो जाता है। यदि मैं अब सती से प्रीति करूँ तो भक्ति का मार्ग मिट जाता है और अनीति होती है। ध्यान दीजिये कि इसमें अपने लिये कुछ नहीं है। न अपमान का हिसाब है, न मन की चोट, न यह कि अब विश्वास कैसे लौटेगा। जो दाँव पर लगा है वह मार्ग है, और मार्ग किसी एक का नहीं होता। जिस देह पर जनकनन्दिनी का वेष चढ़ चुका है, उसे यदि कैलासपति पत्नी की तरह रखें, तो पीछे आनेवाले हर साधक के लिये उपासना और गृहस्थी की सीमा एक साथ धुँधली पड़ जाय।
इसके तुरन्त बाद का दोहा उनकी उलझन को दो सिरों में बाँधकर सामने रख देता है, और दोनों सिरे बन्द हैं।
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
दोहा ५६
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥ ५६॥
सती परम पवित्र हैं, इसलिये उन्हें छोड़ते नहीं बनता, और प्रीति करने में बड़ा पाप है। एक ओर पवित्रता है जो त्यागने नहीं देती, दूसरी ओर पाप है जो रखने नहीं देता। कोई तीसरा रास्ता दिखता नहीं, और इसीलिये जो रास्ता निकलता है वह न रखने का है, न छोड़ने का। वह चुप रह जाने का है।
दोहे का उत्तरार्ध वही कहता है, और उसका एक शब्द पूरे प्रसंग की चाल तय कर देता है। प्रगटि न कहत महेसु कछु। प्रकट करके कुछ नहीं कहते। जो बात कही नहीं जाती उससे कोई बहस नहीं कर सकता, उसका खण्डन नहीं कर सकता, उससे क्षमा नहीं माँग सकता। और तुलसी उसी साँस में यह भी बता देते हैं कि भीतर क्या है, हृदय में अधिक सन्ताप। यह जानना ज़रूरी है, वरना पढ़नेवाला इस चुप्पी को निष्ठुरता समझ बैठेगा। निर्णय ठंडा है, पर निर्णय लेनेवाला जल रहा है।
सार: ध्यान में शिव ने देखा कि सती ने सीताजी का वेष धरा था, और उनके हृदय में गहरा विषाद हुआ। उनका कारण निजी नहीं है: अब यदि वे सती से प्रीति करें तो भक्ति का मार्ग ही मिट जाय। सती परम पवित्र हैं, सो छोड़ते नहीं बनता; प्रीति करने में बड़ा पाप है। इसलिये वे कुछ प्रकट नहीं करते, और भीतर बड़ा सन्ताप लिये रहते हैं।
वह संकल्प जो मन के भीतर हुआ
निर्णय कहाँ लिया जाता है, यह भी तुलसी बताते हैं, और जगह अनोखी है। वह किसी सभा में नहीं लिया जाता, किसी सलाह के बाद नहीं लिया जाता। वह प्रभु के चरणों में सिर नवाकर लिया जाता है, और उसके साथ ही राम का स्मरण चलता रहता है।
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥
चौपाई ४
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥
इस देह से सती की मुझसे भेंट नहीं। शब्द एहिं तन है, और यह बहुत नपा-तुला है। वे सती को नहीं छोड़ रहे, वे इस शरीर को अलग कर रहे हैं। जो स्त्री सामने है, उसके विषय में भाव नहीं बदला; जो देह सामने है, उसके साथ का सम्बन्ध समाप्त कर दिया गया। पूरे प्रसंग का काँटा यहीं टँग जाता है, क्योंकि यही देह आगे दो बार और लौटेगी, दोनों बार सती की अपनी ज़बान पर।
और संकल्प की जगह भी उसी पंक्ति में लिखी है, मन माहीं। मन में कर लिया। न कोई प्रतिज्ञा-वचन बोला गया, न कोई साक्षी बनाया गया, न पत्नी को सूचना दी गयी। अगली ही चौपाई में तुलसी उन्हें मतिधीरा कहते हैं, यानी जिसकी बुद्धि डिगती नहीं। यह विशेषण ठीक उस मोड़ पर रखा गया है जहाँ पाठक के मन में यह आशा जग सकती थी कि शायद कुछ दिन में यह निर्णय नरम पड़ जायेगा। वह आशा वहीं काट दी जाती है।
फिर वे घर की ओर चलते हैं, और चलते-चलते राम का स्मरण करते जाते हैं। रास्ते में आकाश से एक स्वर उतरता है, और वह स्वर इस पूरे प्रसंग की अकेली बाहरी गवाही है।
अस बिचारि संकरु मतिधीरा । चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥
चौपाई ५
चलत गगन भै गिरा सुहाई । जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥
हे महेश, आपकी जय हो, आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की। आकाशवाणी जिस चीज़ की प्रशंसा कर रही है उसे ध्यान से देखिये। वह यह नहीं कहती कि आपने न्याय किया, या आपने ठीक निर्णय लिया, या आपको इसका फल मिलेगा। वह एक ही बात कहती है, भक्ति दृढ़ हुई। और आगे जोड़ती है कि आपके बिना ऐसी प्रतिज्ञा और कौन कर सकता है, आप रामभक्त हैं, समर्थ हैं, भगवान हैं। ऊपर से यह फ़ैसला उसी क्षण मान लिया गया, और सती को अभी यह भी नहीं मालूम कि कोई फ़ैसला हुआ है।
वही स्वर सती के कानों में भी पड़ता है, और उन तक केवल इतना पहुँचता है कि कोई प्रतिज्ञा हुई है। इसी से उनके मन में सोच उठता है और वे सकुचाते हुए पूछती हैं। हे कृपालु, कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है, आप सत्य के धाम हैं, दीनदयालु हैं। पूछने का ढंग भी कितना सँभला हुआ है: वे उत्तर पाने के लिये उन्हीं गुणों का नाम लेती हैं जो उत्तर देने को बाध्य करें, सत्यधाम और दीनदयाल।
उत्तर नहीं मिलता। तुलसी लिखते हैं कि यद्यपि सतीजी ने बहुत प्रकार से पूछा, तथापि त्रिपुरारि ने कुछ नहीं कहा। और यह बात यहीं समाप्त हो जाती है। इस पूरे प्रसंग में सती को अन्त तक यह नहीं बताया जाता कि वह प्रतिज्ञा क्या थी। वे जो जानती हैं, अनुमान से जानती हैं। जिस घर में वे रहती रहेंगी, उस घर का सबसे बड़ा तथ्य उनसे कभी शब्दों में नहीं कहा जायेगा।
सार: राम के चरणों में सिर नवाते हुए शिव मन में संकल्प करते हैं कि इस देह से सती से भेंट नहीं। घर लौटते समय आकाशवाणी होती है कि हे महेश, आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की, ऐसी प्रतिज्ञा आपके बिना और कौन कर सकता है। यह सुनकर सती सकुचाते हुए पूछती हैं कि प्रतिज्ञा क्या है, और बहुत प्रकार से पूछने पर भी शिव कुछ नहीं कहते।
दूध में खटाई
जो बताया नहीं जाता, वह समझ में आ जाता है। सती हृदय में अनुमान कर लेती हैं कि सर्वज्ञ शिव सब जान गये। और उसके बाद जो वे अपने विषय में कहती हैं, वह इस प्रसंग की सबसे कड़वी पंक्ति है: मैंने शिव से कपट किया, स्त्री स्वभाव से ही मूर्ख और नासमझ होती है। यह किसी दूसरे का लगाया हुआ आरोप नहीं है, यह उनका अपना वाक्य है, अपने ही ऊपर। जिस घर में कोई दोष गिनाने को तैयार नहीं, वहाँ दोषी अपना अभियोग स्वयं लिखता है, और आवश्यकता से कहीं अधिक लिख जाता है।
और ठीक यहाँ तुलसी एक काम करते हैं जो वे बहुत कम करते हैं। वे कथा रोककर पढ़नेवाले की ओर मुड़ जाते हैं और कहते हैं, देखिये। सोरठा में प्रीति की रीति दिखायी जाती है, और उदाहरण रसोई से उठाया गया है, किसी शास्त्र से नहीं।
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
सोरठा ५७ (ख)
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥ ५७ (ख)॥
जल दूध के साथ मिलकर दूध के ही भाव बिक जाता है। यह उपमा का पहला आधा है और इसे जल्दी में पढ़ जाना आसान है। इसमें पानी को नीचा नहीं दिखाया गया। कहा यह गया है कि प्रीति में पड़कर पानी को दूध का मोल मिल जाता है, यानी प्रेम उस चीज़ को ऊपर उठा देता है जो अपने बल पर उतनी नहीं थी। फिर दूसरा आधा आता है। कपट रूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है और स्वाद जाता रहता है।
खटाई कोई ज़हर नहीं है, और वह किसी को नष्ट नहीं करती। वह केवल इतना करती है कि जो मिला हुआ था उसे दिखा देती है कि वह दो चीज़ें थीं। यही इस प्रसंग में हुआ है। कपट ने शिव को सती से दूर नहीं किया, उसने दोनों को अलग-अलग करके दिखा दिया, और जो रसु था वह चला गया। इसके बाद भी शिव सती के साथ कैलास लौटते हैं, उनके साथ रहते हैं, उनसे सभ्यता से बोलते हैं। दूध और पानी एक ही बर्तन में रहते हैं। बस अब वे एक चीज़ नहीं हैं।
सती की दशा अगली दो चौपाइयों में है। अपनी करनी याद करके उनके हृदय में इतनी चिन्ता है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। और वे शिव के मौन को ठीक-ठीक पढ़ती हैं: शिवजी कृपा के परम अथाह सागर हैं, इसीलिये उन्होंने मेरा अपराध प्रकट में नहीं कहा। यानी जिस चुप्पी में वे झुलस रही हैं, उसे भी वे दया ही मानती हैं। फिर शंकर का रुख देखकर उन्हें वह बात मालूम पड़ जाती है जो कभी कही नहीं गयी, कि स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया। एक स्त्री को यह समाचार किसी वाक्य से नहीं, एक चेहरे से मिलता है।
और तब वह उपमा आती है जो इस पन्ने से चिपक जाती है। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, और हृदय भीतर-ही-भीतर अवाँ की तरह तपने लगता है। टीका इसे कुम्हार का आँवा बताती है। आँवा बाहर से बन्द रहता है, मिट्टी से लीपकर मूँद दिया जाता है, और भीतर आग जलती रहती है। ऊपर से देखने पर न लपट दिखती है न धुआँ। उसी आग से बर्तन पकते हैं, यानी वह आग जलाती नहीं, कड़ा बनाती है। सती के भीतर वही चल रहा है, और बाहर कैलास पर किसी को कुछ पता नहीं।
सार: सती अनुमान से जान लेती हैं कि सर्वज्ञ शिव सब जान चुके हैं, और अपने को स्वयं दोषी ठहराती हैं। तुलसी यहाँ पाठक की ओर मुड़कर सोरठा कहते हैं कि प्रीति में जल दूध के भाव बिक जाता है, पर कपट की खटाई पड़ते ही वह अलग हो जाता है और स्वाद जाता रहता है। शंकर का रुख देखकर सती जान जाती हैं कि उनका त्याग हो चुका है, और उनका हृदय कुम्हार के आँवे की तरह भीतर-ही-भीतर तपता है।
कैलास का रास्ता, और अखंड समाधि
यहाँ से कथा में वह चीज़ आती है जिसे पढ़कर पाठक ठिठक जाता है। वृषकेतु शिव सती को चिन्ता में डूबा देखकर क्या करते हैं, यह देखिये। वे उन्हें सुख देने के लिये सुन्दर कथाएँ कहने लगते हैं। रास्ते भर वे भाँति-भाँति के इतिहास कहते चलते हैं, और इस तरह कथा कहते-कहते विश्वनाथ कैलास जा पहुँचते हैं।
यही एक व्यक्ति है। जिसने मन में सम्बन्ध समाप्त कर दिया है, वही रास्ते भर कहानियाँ सुनाकर उनका मन बहला रहा है। इसमें कोई दिखावा नहीं है, और इसे पश्चात्ताप भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि निर्णय कहीं डिगा नहीं। तुलसी की यह जो ठंडक है, वह अशिष्टता से नहीं बनी। वह शिष्टाचार पूरा निभाते हुए भीतर से हट जाने की ठंडक है, और इसीलिये कहीं अधिक ठंडी है। जो शेष रह गया है, वह दया है, सेवा है, अच्छा बर्ताव है। जो चला गया है उसका नाम कोई नहीं लेता।
कैलास पहुँचकर शिव फिर अपनी प्रतिज्ञा याद करते हैं, बड़ के पेड़ के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ जाते हैं, और अपना स्वाभाविक रूप सँभाल लेते हैं। सहज सरूपु पर रुकिये। जो रूप अब सँभाला जा रहा है वह उनका अपना है, और इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि गृहस्थ का रूप ऊपर से धरा हुआ था। जो ओढ़ा गया था वह उतर गया, जो अपना था वह लौट आया। और फिर समाधि लगती है, जिसे तुलसी अखंड और अपार कहते हैं।
सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
दोहा ५८
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥ ५८॥
अब सती कैलास पर रहती हैं। पति वहीं हैं, बड़ के नीचे बैठे हुए। और इसी दोहे में वह आधी पंक्ति है जो इस पूरे प्रसंग का सबसे सुनसान कोना है: मरमु न कोऊ जान कछु। इस भेद को कोई कुछ नहीं जानता। अर्थात् सती के पास शोक तो है, पर शोक का साथी कोई नहीं। जिनसे कहा जा सकता था वे समाधि में हैं, और जिन्हें बताया जा सकता था उन्हें यह मालूम ही नहीं कि कुछ हुआ है।
और अन्तिम चरण में समय का नाप आता है, जुग सम दिवस सिराहिं। दिन युग के समान बीतते हैं। तुलसी ने यह वाक्य किसी बिछोह के लिये नहीं लिखा जिसमें लौटने की प्रतीक्षा हो। यहाँ कोई लौटना नहीं है, इसलिये दिन का लम्बा होना भी किसी अन्त की ओर नहीं ले जाता। यही वह जगह है जहाँ से आगे की गिनती शुरू होती है।
सार: सती को दुखी जानकर शिव रास्ते भर उन्हें सुख देनेवाली कथाएँ सुनाते हुए कैलास पहुँचते हैं। वहाँ अपनी प्रतिज्ञा याद करके वे बड़ के नीचे पद्मासन लगाते हैं, अपना सहज रूप सँभालते हैं और अखंड समाधि में चले जाते हैं। सती कैलास पर रहती हैं, मन में बड़ा दुख लिये, और इस भेद को कोई नहीं जानता। उनके दिन युग के समान बीतते हैं।
वह विनती जो राम से की गयी
सती के हृदय में नित नया सोच उठता है, और पहला प्रश्न वही है जो ऐसे हर दुख में उठता है: इस दुख के समुद्र के पार कब जाऊँगी। फिर वे अपने ऊपर अभियोग गिनाती हैं, और गिनती दो की है। पहला, मैंने रघुनाथजी का अपमान किया। दूसरा, फिर पति के वचनों को झूठ जाना।
यह दूसरा अभियोग ध्यान देने लायक है, क्योंकि असली चूक वहीं हुई थी। जिस दिन पति ने कहा था कि ये वही हैं, उस दिन यदि मान लिया जाता तो परीक्षा की आवश्यकता ही न पड़ती। परीक्षा तो अविश्वास का फल थी।
इसके बाद वे विधाता से एक अजीब शिकायत करती हैं। उन्होंने जो फल दिया वह उचित ही दिया, इसमें उनका कोई दोष नहीं; परन्तु अब यह उचित नहीं कि शंकर से विमुख हो जाने पर भी मुझे जिलाये रखा जाय। दण्ड पर उन्हें आपत्ति नहीं है। आपत्ति दण्ड के जारी रहने पर है। इस वाक्य में सती पहली बार यह मानती हैं कि जो जीवन बचा है वह उनके लिये दण्ड का दूसरा नाम है।
और तब वे विधाता को छोड़कर उधर मुड़ती हैं जिधर सारा झगड़ा शुरू हुआ था। हृदय की ग्लानि कही नहीं जाती, सो वह बुद्धिमती स्त्री मन-ही-मन राम का स्मरण करती हैं और विनती करती हैं। विनती की बनावट देखिये, वह एक शर्त पर टिकी है। यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं, और यदि वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुख हरनेवाले हैं, तो।
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी । छूटउ बेगि देह यह मोरी॥
चौपाई ६
जौं मोरें सिव चरन सनेहू । मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरी यह देह जल्दी छूट जाय। यह उसी देह का दूसरा उल्लेख है। जिसे शिव ने मन में अलग कर दिया था, अब वही उसकी मालकिन छोड़ना चाह रही है, और छोड़ने के लिये उसी से प्रार्थना कर रही है जिसका अपमान करके यह सब हुआ था। माँगने का आधार भी उन्होंने अपना कोई पुण्य नहीं बनाया। आधार यह रखा गया है: यदि शिव के चरणों में मेरा प्रेम है और यह व्रत मन, वचन और कर्म से सच्चा है। जिस पति ने त्याग दिया, उसी के प्रति अपने प्रेम की सच्चाई को वे अपनी मृत्यु का प्रमाण-पत्र बनाती हैं।
दोहे में माँग पूरी होती है। हे सर्वदर्शी प्रभु, सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मरण हो जाय और बिना परिश्रम यह असह्य विपत्ति दूर हो। बिनहिं श्रम पर ठहरिये। वे मरना माँग रही हैं, पर अपने हाथ से कुछ करने को तैयार नहीं। जो मार्ग सामने खुला था उसे वे छूती तक नहीं, और सब कुछ उस पर छोड़ देती हैं जिससे माँगा है। यही कारण है कि इसके बाद की लम्बी अवधि में कुछ नहीं होता। जो उपाय आना है, वह इतनी देर बाद आयेगा कि उसे उपाय कहना भी कठिन लगेगा।
सार: सती अपने दो अपराध गिनती हैं, राम का अपमान और पति के वचन को झूठ मानना, और विधाता से कहती हैं कि दण्ड उचित था पर उसका जारी रहना उचित नहीं। फिर वे मन में राम का स्मरण करके विनती करती हैं कि यदि आप दीनदयालु कहे जाते हैं तो यह देह शीघ्र छूट जाय, और ऐसा उपाय हो जिससे बिना परिश्रम यह असह्य विपत्ति दूर हो जाय।
सत्तासी हजार वर्ष, और दक्ष का बड़ा अधिकार
इस प्रसंग में तुलसी एक ही बार कोई संख्या देते हैं, और वह संख्या यह है। दक्षसुता इस प्रकार दुखी रहीं, उनका दुख इतना दारुण था कि कहा नहीं जा सकता, और सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनाशी शिव ने समाधि खोली। इस वाक्य का पहला आधा दुख का है और दूसरा आधा समय का, और दोनों एक ही साँस में कह दिये गये हैं।
इस संख्या को धीरे पढ़िये। इसके भीतर कुछ नहीं होता। न कोई भेंट, न कोई बातचीत, न कोई सुलह, न कोई उपाय। जिस विनती में शीघ्र शब्द पड़ा था, उसका उत्तर इतनी देर से आता है।
समाधि टूटने का समाचार भी सती को किसी ने नहीं दिया। शिव राम-नाम का स्मरण करने लगते हैं, और उसी से सती जान जाती हैं कि जगत्पति जाग गये। इस घर में ख़बर इसी तरह चलती है, चेहरे से, स्वर से, नाम की आहट से। वे जाकर चरणों में प्रणाम करती हैं, और शिव उन्हें सामने आसन देते हैं।
सनमुख शब्द बहुत काम करता है। आसन दिया गया है, यानी आदर पूरा है। आसन सामने दिया गया है, यानी बैठने की जगह आमने-सामने की है। सत्तासी हजार वर्ष बाद पति और पत्नी मिलते हैं, और वे मिलकर एक-दूसरे के सामने बैठ जाते हैं। इसके आगे उस मौन के विषय में कुछ नहीं कहा जाता, न उस दिन, न कभी।
फिर शिव हरि की रसीली कथाएँ कहने लगते हैं, और उसी चौपाई के दूसरे आधे में तुलसी एक बिलकुल दूसरी दुनिया खोल देते हैं। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजी ने सब प्रकार से योग्य देखकर उन्हें प्रजापतियों का नायक बना दिया। एक ही पंक्ति में दो बातें रखी गयी हैं: एक व्यक्ति कथा कह रहा है, दूसरे को पद मिल रहा है। आगे की सारी विपत्ति इसी दूसरी बात से निकलेगी।
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥
चौपाई ७
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥
जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया, तब उनके हृदय में अत्यन्त अभिमान आ गया। और फिर वह पंक्ति, जो इस कथा से निकलकर हर सभा में काम आती है: जगत में ऐसा कोई पैदा ही नहीं हुआ जिसे प्रभुता पाकर मद न हो। तुलसी यहाँ दक्ष को राक्षस नहीं बनाते। वे उन्हें साधारण बनाते हैं, और साधारण होना कहीं अधिक डरावना है, क्योंकि उसमें कोई अपवाद नहीं बचता। यह भी याद रखिये कि नियुक्ति ब्रह्माजी ने सब प्रकार से योग्य देखकर की थी। योग्यता में कोई कमी नहीं थी, कमी उसके बाद आयी।
अभिमान का पहला काम एक यज्ञ है। दक्ष सब मुनियों को बुला लेते हैं और बड़ा यज्ञ करने लगते हैं, और दोहे का उत्तरार्ध कहता है कि जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, उन सबको आदर सहित न्योता गया। यह शब्द भाग यहाँ एक बार आता है और आगे जाकर एक बार और आयेगा, तब जब सती यज्ञशाला में उसे ढूँढ़ेंगी और नहीं पायेंगी। निमन्त्रण और हिस्सा एक ही चीज़ के दो नाम हैं, और दोनों में से एक ही घर छोड़ दिया गया है।
सार: सत्तासी हजार वर्ष तक सती इसी दुख में रहती हैं, फिर शिव समाधि खोलते हैं और राम-नाम का स्मरण करने लगते हैं। सती प्रणाम करती हैं, शिव सामने आसन देते हैं और हरि-कथा कहने लगते हैं। उसी समय ब्रह्माजी दक्ष को प्रजापतियों का नायक बनाते हैं, दक्ष के मन में अभिमान आ जाता है, और वे बड़ा यज्ञ रचकर यज्ञ का भाग पानेवाले सब देवताओं को आदर से निमन्त्रित करते हैं।
आकाश में विमान, और एक बहाना
निमन्त्रण पाकर किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चल पड़ते हैं। तुलसी एक ही पंक्ति में छूट जानेवालों के नाम भी गिना देते हैं: विष्णु, ब्रह्मा और महेश को छोड़कर सभी देवता अपने-अपने विमान सजाकर चले। तीन नाम बाहर हैं, और उनमें वह घर भी है जिसकी बेटी उस यज्ञ में जन्मी थी।
फिर दृश्य ऊपर उठ जाता है। सती आकाश में अनेक प्रकार के सुन्दर विमान जाते हुए देखती हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, ऐसा गान कि सुनते ही मुनियों का ध्यान छूट जाता है। यह ब्योरा यों ही नहीं आया। नीचे कैलास पर एक स्त्री खड़ी है जिसके पति का ध्यान किसी गान से नहीं छूटेगा, और ऊपर से वह संगीत जा रहा है जिससे मुनियों के ध्यान छूट जाते हैं।
वे पूछती हैं, और शिव बखानकर सब बता देते हैं। यहाँ कोई छिपाव नहीं है; जो बात बतायी जा सकती है, वह पूरी बतायी जाती है। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न होती हैं, और तुलसी का यह कछु बहुत सच्चा शब्द है। उतनी ही प्रसन्नता, जितनी इस अवस्था में सम्भव थी।
और तुरन्त उनके मन की असली बात आ जाती है, जिसे तुलसी छिपाते नहीं। यदि महादेवजी आज्ञा दें तो इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ। शब्द मिस है, यानी बहाना। जिस उत्सव को देखने की बात होगी, वह असल में कारण नहीं है। कारण यह है कि कैलास से कुछ दिन के लिये निकलना है। जिस घर में भेद कोई नहीं जानता और स्वामी समाधि से अभी-अभी लौटे हैं, उस घर से कुछ दिन दूर रहने की इच्छा को समझना कठिन नहीं।
पर वे यह कह नहीं पातीं। तुलसी कारण भी लिख देते हैं: पति के त्याग का बड़ा भारी दुख हृदय में है, और अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती नहीं। इसलिये जो वाक्य निकलता है वह छना हुआ निकलता है, और उसका स्वर तुलसी तीन चीज़ों से बनाते हैं, भय, संकोच और प्रेम-रस। ये तीनों एक साथ एक ही वाणी में हैं, और तीनों का एक ही कारण है।
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
दोहा ६१
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥ ६१॥
माँग को तौलिये। वे यह नहीं कहती कि मुझे पिता के घर जाना है। वे कहती हैं कि पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है, यदि आपकी आज्ञा हो तो आदर सहित उसे देखने जाऊँ। जाने की बात नहीं, देखने की बात है। और सम्बोधन कृपायतन है, कृपा का घर। जो स्त्री जानती है कि उसका त्याग हो चुका है, वह अपने त्यागनेवाले को कृपा का घर कहकर आज्ञा माँग रही है।
सार: दक्ष के निमन्त्रण पर सब देवता विमान सजाकर चलते हैं, केवल विष्णु, ब्रह्मा और महेश छूट जाते हैं। आकाश में विमान देखकर सती पूछती हैं, शिव सब बखान देते हैं, और पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती सोचती हैं कि इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर रह आऊँ। भय, संकोच और प्रेम में सनी वाणी से वे आज्ञा माँगती हैं कि उस उत्सव को देखने जाऊँ।
शिव का मना करना, और फिर विदा
उत्तर में शिव सबसे पहले सहमत होते हैं। बात अच्छी कही, मेरे मन को भी भायी। इस प्रसंग में यह अकेली जगह है जहाँ वे सती की किसी बात पर खुलकर हामी भरते हैं, और उसके तुरन्त बाद वह तथ्य रखते हैं जो सब बदल देता है: न्योता नहीं भेजा गया, और यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब पुत्रियों को बुलाया है, केवल हमारे बैर के कारण इस घर को भुला दिया गया।
यह वाक्य कितना सँभालकर कहा गया है, इस पर रुकिये। दोष वे सती के पिता पर डाल सकते थे और सीधा डाल सकते थे। पर वे कहते हैं कि भुलाया मुझसे बैर के कारण गया है, यानी जो चोट सती को लगी है उसका मूल कारण उनका अपना नाम है। फिर पुराना प्रसंग खुलता है: ब्रह्मा की सभा में वे हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसी से अब तक अपमान करते हैं। और तब चेतावनी, कि बिना बुलाये जाने पर न शील-स्नेह रहेगा, न मान-मर्यादा।
इसके बाद जो आता है वह इस पूरे पन्ने की सबसे सुव्यवस्थित बात है, क्योंकि उसमें नियम भी है और नियम का अपवाद भी।
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा । जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
चौपाई ८
तदपि बिरोध मान जहँ कोई । तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥
मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं। यह पहला आधा है और यह सती के पक्ष में है, और शिव स्वयं उसे पहले रखते हैं। फिर दूसरा आधा: तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, वहाँ जाने से कल्याण नहीं होता। छूट सम्बन्ध से मिलती है, पर जहाँ विरोध खड़ा हो वहाँ सम्बन्ध की छूट काम नहीं करती। यह इस प्रसंग का अकेला ऐसा स्थान है जहाँ शिव तर्क करते हैं। अपने विवाह के विषय में उन्होंने एक भी तर्क नहीं किया, वहाँ केवल मौन था।
और फिर वह शब्द लौट आता है। शिव ने बहुत प्रकार से समझाया, पर भावी के वश उनके हृदय में बोध नहीं हुआ। यह वही भावी है जिसे इस प्रसंग के आरम्भ में शिव ने बलवान कहा था। पहली बार उसने सती के मुँह से झूठ कहलवाया, और अब वह सती के कानों पर बैठ गयी है। समझानेवाला वही है, बात भी ठीक है, और फिर भी बात भीतर नहीं उतरती।
अन्त में शिव वही करते हैं जो एक ऐसा व्यक्ति कर सकता है जिसका कहना नहीं माना गया। वे कहते हैं कि यदि बिना बुलाये जाना ही है तो जाइये, हमारी समझ में यह अच्छी बात नहीं होगी। आज्ञा और असहमति एक ही साँस में। फिर दोहा बताता है कि बहुत यत्न करके कह देखा, पर दक्षकुमारी किसी तरह रुकीं नहीं, तब त्रिपुरारि ने अपने मुख्य गण साथ देकर उन्हें विदा किया। मना किया, और फिर पहरा भेजा। जो व्यक्ति मन में सम्बन्ध तोड़ चुका है, वह उस स्त्री को अकेले नहीं जाने देता जिससे उसने सम्बन्ध तोड़ा है।
सार: शिव पहले सहमति देते हैं, फिर बताते हैं कि निमन्त्रण नहीं आया और उसका कारण उनसे पुराना बैर है। वे नियम भी कहते हैं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये जाया जा सकता है, और अपवाद भी कि जहाँ विरोध हो वहाँ जाने में कल्याण नहीं। भावी के वश सती के हृदय में यह बात नहीं उतरती, तब शिव असहमति के साथ आज्ञा देते हैं और अपने मुख्य गण साथ भेजकर विदा करते हैं।
उस सभा में, जहाँ शिव का भाग नहीं था
पिता के घर पहुँचने पर जो होता है, उसे तुलसी बिना किसी ऊँचे स्वर के लिख देते हैं, और वही सबसे चुभता है। दक्ष के डर से किसी ने उनका आदर नहीं किया। यह वाक्य पूरे घर को एक साथ माफ़ भी करता है और दोषी भी ठहराता है, क्योंकि कारण द्वेष नहीं, भय बताया गया है। एक माता भले ही आदर से मिलीं, और बहनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं।
उन मुसकानों पर ठहरिये। तुलसी ने यह नहीं लिखा कि बहनों ने ताना मारा या कोई कड़वी बात कही। उन्होंने केवल इतना लिखा कि वे बहुत मुसकराती हुई मिलीं, और यह बहुत सारा काम कर जाता है। जिस घर में किसी ने आदर नहीं किया, वहाँ ज़रूरत से ज़्यादा मुसकराहट का अर्थ लगाना कठिन नहीं है। पूरे प्रसंग की सबसे निर्दय पंक्ति में कोई कठोर शब्द एक भी नहीं है।
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥
चौपाई ९
सतीं जाइ देखेउ तब जागा । कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥
दक्ष ने उनकी कुशल तक नहीं पूछी, और सती को देखकर उलटे उनके सारे अंग जल उठे। पिता की ओर से अनदेखी होती तो एक बात थी; यहाँ तो देखना ही जलन का कारण बन रहा है। और इसके बाद वह आधी पंक्ति आती है जिससे कथा का रुख़ मुड़ जाता है। सती जाकर यज्ञ देखती हैं, और वहाँ कहीं शिव का भाग दिखायी नहीं देता।
यही वह भाग है जिसका नाम दोहा साठ में आया था, जहाँ कहा गया था कि यज्ञ का भाग पानेवाले सब देवताओं को आदर से न्योता गया। तब यह पंक्ति निर्दोष लगती है। अब वही पंक्ति पलटकर काटती है। निमन्त्रण न भेजना और हिस्सा न रखना दो अलग अपमान नहीं थे, एक ही निश्चय के दो हिस्से थे, और वह निश्चय निमन्त्रण लिखने से भी पहले हो चुका था। सती को यह बात यज्ञशाला में चलते-फिरते पता चलती है, किसी के बताने से नहीं।
तब जो शंकर ने कहा था वह उनके चित्त पर चढ़ता है। स्वामी का अपमान समझकर हृदय जल उठता है। और अब तुलसी वह तुलना करते हैं जिससे सती का नाप मिलता है: पिछला दुख हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना बड़ा दुख इस समय हुआ। पिछला दुख कौन-सा था, यह हम जानते हैं। सत्तासी हजार वर्ष का त्याग, जिसमें मरने की प्रार्थना तक की जा चुकी थी। वह दुख, तुलसी कहते हैं, इससे छोटा था।
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥
चौपाई १०
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥
जगत में दारुण दुख अनेक हैं, पर सबसे कठिन है जाति का अपमान, यानी अपने कुल और अपने जनों पर की गयी चोट। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध आ गया। यह क्रोध इस पूरे पन्ने पर पहली तेज़ चीज़ है। इससे पहले जो कुछ था, वह भीतर जलता था और बाहर कुछ नहीं कहता था। माता उन्हें बहुत प्रकार से समझाती-बुझाती हैं, और यह भी ध्यान रहे कि समझानेवाली वही अकेली स्त्री है जो आदर से मिली थी।
पर अगला दोहा कहता है कि शिव का अपमान सहा नहीं जाता और हृदय में कोई प्रबोध नहीं होता। और फिर वह करती हैं जो उनसे पहले किसी ने नहीं किया: सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर रोकती हैं और क्रोध भरे वचन बोलती हैं। डाँट पिता को नहीं पड़ती, सभा को पड़ती है। अपराध सामूहिक था, इसलिये सम्बोधन भी सामूहिक है।
सार: पिता के घर दक्ष के डर से किसी ने सती का आदर नहीं किया, केवल एक माता आदर से मिलीं और बहनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं। दक्ष ने कुशल तक नहीं पूछी। यज्ञ देखने पर सती को कहीं शिव का भाग नहीं दिखा, और तब शिव की कही बात उनके चित्त पर चढ़ी। पति के अपमान का दुख उन्हें त्याग के दुख से भी बड़ा लगा, और वे सारी सभा को रोककर क्रोध भरे वचन बोलीं।
सती के अन्तिम वचन, और योग की अग्नि
पहला वाक्य ही सभा को दो हिस्सों में नहीं बाँटता, एक में समेट लेता है। हे सभासदो और सब मुनीश्वरो, सुनिये। जिन लोगों ने यहाँ शंकर की निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरन्त मिलेगा। कहनेवाले और सुननेवाले को एक ही पलड़े में रख दिया गया, और इसी पंक्ति से आगे की सारी बात निकलती है। फिर वे अपने पिता को भी नहीं छोड़तीं: वे भी भलीभाँति पछतायेंगे।
संत संभु श्रीपति अपबादा । सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥
चौपाई ११
काटिअ तासु जीभ जो बसाई । श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥
जहाँ सन्त, शिव और लक्ष्मीपति की निन्दा सुनी जाय, वहाँ की मर्यादा यह है कि यदि वश चले तो निन्दा करनेवाले की जीभ काट ले, और यदि वश न चले तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाय। इस विधान में दो सीढ़ियाँ हैं और वे जान-बूझकर दो रखी गयी हैं। पहली उसके लिये है जिसके हाथ में बल है, दूसरी उसके लिये जिसके हाथ में कुछ नहीं है। पर जो सीढ़ी कहीं नहीं है, वह यह है कि बैठे रहिये और सुनते रहिये। असमर्थ को भी काम दिया गया है, भाग जाने का, और उस सभा में यही काम किसी ने नहीं किया।
फिर वे शिव का परिचय देती हैं, और परिचय में एक भी शब्द निजी नहीं है। त्रिपुर को मारनेवाले महेश सम्पूर्ण जगत के आत्मा हैं, जगत के पिता हैं, सबका हित करनेवाले हैं। यानी वे यह नहीं कह रहीं कि मेरे पति का अपमान हुआ। वे कह रही हैं कि जिसका अपमान हुआ वह इस सभा के हर बैठे हुए व्यक्ति का आत्मा और पिता है।
और तब वे अपनी ओर मुड़ती हैं। मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है, और मेरी यह देह दक्ष के ही वीर्य से उत्पन्न है। यह तीसरी बार है जब इस पन्ने पर देह का नाम आता है, और कारण हर बार बदला हुआ है। शिव ने इसे इसलिये छोड़ा था कि उस पर जनकनन्दिनी का वेष चढ़ चुका था। सती ने इसे छोड़ना इसलिये चाहा था कि दुख असह्य था। अब वे इसे इसलिये छोड़ रही हैं कि यह जहाँ से आयी है, वह घर निन्दा करता है। शोक अब कारण नहीं रहा, कुल कारण बन गया।
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू । उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥
चौपाई १२
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा । भयउ सकल मख हाहाकारा॥
इसलिये चन्द्रमा को माथे पर धारण करनेवाले वृषकेतु को हृदय में धरकर मैं इस शरीर को तुरन्त त्याग दूँगी। जिस पति ने त्याग दिया था, उसी को हृदय में रखकर वे जाती हैं, और उन्हें उसी नाम से पुकारती हैं जिस नाम से तुलसी ने उस दिन उन्हें पुकारा था जब वे रास्ते भर कथाएँ सुनाते हुए कैलास ले गये थे। फिर वे योग की अग्नि से अपना शरीर जला देती हैं। आग बाहर से नहीं आयी, किसी चिता से नहीं आयी। वह उसी भीतर की आग का अन्तिम रूप है जो आँवे की तरह वर्षों से भीतर जल रही थी। और सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच जाता है।
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
दोहा ६४
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥ ६४॥
सती का मरण सुनकर शिव के गण यज्ञ को नष्ट करने लगते हैं, और यज्ञ का विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगुजी उसकी रक्षा करते हैं। ये वही गण हैं जिन्हें शिव ने मुख्य गण कहकर सती के साथ भेजा था। जो पहरे के लिये भेजे गये थे, वे उस पहरे के विफल हो जाने का बदला ले रहे हैं। और प्रसंग यहीं, बीच हलचल में रुक जाता है।
यह भी देख लीजिये कि यहाँ क्या नहीं है। इन पंक्तियों में यज्ञ तोड़नेवाले किसी योद्धा का नाम नहीं आता, केवल शंभु के गण कहे गये हैं। शिव स्वयं यज्ञशाला में नहीं आते, एक बार भी नहीं। सती की देह को उठाकर ले जाने की कोई कथा यहाँ नहीं है। और दक्ष का क्या हुआ, यह भी इस प्रसंग में नहीं कहा जाता। तुलसी यहाँ जो दिखाते हैं वह इतना ही है: एक स्त्री का जाना, और उसके पीछे उठा हुआ शोर।
सार: सती सारी सभा से कहती हैं कि जिन्होंने शिव की निन्दा की या सुनी, सबको तुरन्त फल मिलेगा, और पिता भी पछतायेंगे। निन्दा सुनने पर मर्यादा यह है कि या तो जीभ काटी जाय या कान मूँदकर भाग जाया जाय। महेश जगत के आत्मा और पिता हैं, और यह देह उसी दक्ष से उत्पन्न है जो उनकी निन्दा करता है, इसलिये वे शिव को हृदय में धरकर योग की अग्नि से शरीर जला देती हैं। शिव के गण यज्ञ नष्ट करने लगते हैं और भृगु उसकी रक्षा करते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पूरे प्रसंग को एक शब्द पर टाँगकर देखा जा सकता है, और वह शब्द देह है। पहली बार वह शिव के मन में आता है, जहाँ कहा जाता है कि इस तन से भेंट नहीं, और तब वह किसी को सुनायी नहीं देता। दूसरी बार वह सती के हाथ जोड़े हुए होंठों पर आता है, जहाँ माँगा जाता है कि यह देह जल्दी छूट जाय, और तब वह केवल राम को सुनायी देता है। तीसरी बार वह भरी सभा में बोला जाता है, और उसी क्षण पूरा हो जाता है। बीच में सत्तासी हजार वर्ष पड़े हैं।
दूसरी बात मौन की है, और यह इस पन्ने का असली विषय है। शिव एक बार भी नहीं कहते कि आपने झूठ बोला। एक बार भी नहीं कहते कि मैंने क्या संकल्प किया। सती एक बार पूछती हैं, बहुत प्रकार से पूछती हैं, और फिर कभी नहीं पूछतीं। इसके बाद जो कुछ उन्हें मालूम होता है, वह चेहरे से, रुख़ से और आकाश से आयी एक आवाज़ से मालूम होता है। एक गृहस्थी बिना एक भी कड़वे वाक्य के समाप्त हो जाती है। लड़ाई होती तो कहीं कोई दरवाज़ा खुला रहता।
और तीसरी बात, जिसे तुलसी कहीं नरम नहीं करते। इस निर्णय पर पछतावा एक जगह भी नहीं दिखाया जाता। ऊपर से आयी आवाज़ इसे उसी दिन ठीक बता देती है। घर लौटते समय शिव कथाएँ सुनाते हैं, पर निर्णय नहीं बदलते। जागने पर आसन देते हैं, पर सामने का आसन देते हैं। विदा करते समय गण साथ भेजते हैं, पर साथ नहीं जाते। जो चीज़ हट गयी है वह बर्ताव नहीं है, वह भीतर का सम्बन्ध है, और वह लौटकर नहीं आता। पढ़नेवाला जिस एक वाक्य की प्रतीक्षा करता रहता है, तुलसी वह वाक्य नहीं देते।
इस प्रसंग में दुख किसी दुष्ट के कारण नहीं आता। जो हुआ वह एक संदेह से शुरू हुआ, फिर एक परीक्षा से, फिर एक छिपाव से। उसके बाद हर व्यक्ति अपनी जगह ठीक-ठीक काम करता रहा। शिव ने भक्ति का मार्ग बचाया। सती ने अपने पति के अपमान पर सिर नहीं झुकाया। ब्रह्माजी ने योग्य को पद दिया। और इन सबका जोड़ यह निकला कि एक स्त्री यज्ञ की आग के पास खड़ी होकर अपना शरीर जला देती है। तुलसी कहीं यह नहीं कहते कि किसने गलती की। वे बस इतना दिखा देते हैं कि भावी बलवान है, और उस शब्द को उन्होंने इस कथा के दोनों सिरों पर रख दिया है।
और अन्त में वह चीज़ रह जाती है जो सबसे देर तक साथ चलती है। सती कैलास पर सत्तासी हजार वर्ष अकेली रहीं और किसी को उनका भेद मालूम नहीं हुआ। जिस घर में कुछ टूट चुका होता है, वहाँ अक्सर बाहर से कोई दरार नहीं दिखती। दिन वैसे ही निकलते हैं, बात वैसे ही होती है, आसन वैसे ही दिया जाता है। तुलसी इस चुप्पी को न बड़ा करते हैं न छोटा। वे उसे पूरा दिखा देते हैं, और फिर उस पर वह पंक्ति रख देते हैं जो इस पूरे पन्ने पर सबसे धीरे बोली गयी है, कि उस भेद को कोई कुछ नहीं जानता था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ५६ से ६४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।