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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 7
शिव का मन से त्याग, दक्ष का यज्ञ और सती का देह-त्याग
एक पति जो अपना निर्णय मन-ही-मन कर लेता है और कभी बताता नहीं। सत्तासी हजार वर्ष की एक समाधि, जिसके बीतने तक पत्नी कैलास पर दुख में दिन काटती है। और अन्त में वही देह जो छोड़ा जा चुका था, भरी सभा में स्वयं छोड़ दिया जाता है।
पिछला प्रसंग एक प्रश्न पर रुका था। शिव ने हँसकर कुशल पूछी थी और कहा था कि परीक्षा किस प्रकार ली, सारी बात सच-सच कहिये। कथा उसी प्रश्न के उत्तर से आगे बढ़ती है, और उत्तर झूठ है। सती कहती हैं कि मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, वहाँ जाकर बस आपकी ही तरह प्रणाम कर आयी। इसके बाद पति और पत्नी के बीच कहीं कोई झगड़ा, कोई उलाहना, कोई ऊँचा शब्द नहीं है।
इस कथा में सबसे बड़ी घटना वह है जो किसी को दिखायी नहीं देती। शिव अपने मन के भीतर एक संकल्प करते हैं, और वह संकल्प सती को नहीं बताया जाता। तुलसी साफ़ कहते हैं कि इस भेद को कोई कुछ नहीं जानता। बाहर अच्छा बर्ताव बना रहता है। रास्ते में सुन्दर कथाएँ कही जाती हैं, समाधि से जागकर सामने आसन दिया जाता है, विदा के समय मुख्य गण साथ भेजे जाते हैं। फिर भी शिव का रुख बदल जाता है, और सती उसी रुख को देखकर जान लेती हैं कि उनका त्याग हो चुका है।
और देह की बात इस प्रसंग में तीन बार आती है, हर बार किसी बड़े मोड़ पर। पहली बार शिव मन में कहते हैं कि इस देह से अब भेंट नहीं। दूसरी बार सती हाथ जोड़कर राम से माँगती हैं कि यह देह जल्दी छूट जाय। तीसरी बार वे भरी सभा में कहती हैं कि इसी देह को अभी त्याग दूँगी। जो देह चुपचाप छोड़ा गया था, वही अन्त में सबके सामने छोड़ दिया जाता है, और बीच में सत्तासी हजार वर्ष बीतते हैं।
कैलास और दक्ष के घर के लोग
- शिव जो प्रसंग के आरम्भ में ही मन में संकल्प कर लेते हैं। सती के बहुत पूछने पर भी वे उसके विषय में कुछ नहीं कहते।
- सती दक्ष की पुत्री और शिव की पत्नी, जिनसे एक छिपाव हो गया और जो उसके बाद अपनी बात किसी से नहीं कह पातीं।
- राम की माया वह शक्ति जिसे शिव सिर नवाते हैं, क्योंकि उसी की प्रेरणा से सती के मुँह से झूठ निकला था।
- दक्ष प्रजापतियों के नायक, जिन्हें ब्रह्मा ने सब प्रकार से योग्य देखकर यह पद दिया। उनके हृदय में पद के साथ ही मद उतर आया।
- सती की माता और बहनें दक्ष के घर में माता, जो अकेली आदर से मिलीं, और बहनें, जो बहुत मुसकराती हुई मिलीं।
- भृगु वे मुनीश्वर जो अन्त में टूटते हुए यज्ञ की रक्षा करते हैं।
एक झूठ, और वह ध्यान जिसमें सब खुल जाता है
उत्तर से पहले कारण बता दिया जाता है, और कारण दो अक्षर का है: भय। सती ने राम का प्रभाव समझ लिया था, और समझ लेने के बाद जो हुआ वह चतुराई नहीं, डर था। इसलिये उन्होंने छिपाव किया।
उन्होंने कोई कहानी नहीं गढ़ी, बात घटा दी: मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, और प्रणाम उसी तरह किया जिस तरह आपने किया था। झूठ की सामग्री उन्होंने पति के ही आचरण से उठायी है। जो वे सचमुच कर आयी थीं, उसका नाम तक नहीं लिया। यह छिपाव है। यह गढ़ना नहीं, ढाँकना है।
फिर सती, अब भी शिव से ही कहती हुई, एक बात और जोड़ती हैं, और उसके बाद शिव ध्यान धरते हैं।
आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यही पूरा विश्वास है। सती यह कह चुकती हैं, तब शिव ध्यान धरकर देखते हैं। ध्यान में जो मिलता है वह एक शब्द में कहा गया है: सती ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया।
जानने के बाद भी उनका पहला काम किसी की ओर उँगली उठाना नहीं है। वे राम की माया को सिर नवाते हैं, उसी माया को, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से झूठ कहला दिया। और वे मन में विचार करते हैं कि भगवान् की इच्छा रूपी भावी बलवान है। शिव की ओर से सती पर एक भी आरोप नहीं लगता। आरोप की जगह प्रणाम है।
परम पुनीत, और बड़ा पाप
ध्यान में उन्होंने क्या देखा, यह तुरन्त खुल जाता है: सती ने सीता का वेष धारण किया था। और इसी से शिव के हृदय में बड़ा विषाद हुआ।
और अब वह वाक्य, जिसके कारण यह प्रसंग पढ़ना कठिन हो जाता है। यदि मैं अब सती से प्रीति करूँ तो भक्ति का मार्ग मिट जाता है और अनीति होती है। इसमें अपने लिये कुछ नहीं है, न अपमान का हिसाब, न मन की चोट। जो दाँव पर है वह भक्ति का मार्ग है।
इसके तुरन्त बाद उनकी उलझन दो सिरों में बँध जाती है, और दोनों सिरे बन्द हैं।
सती परम पवित्र हैं, इसलिये उन्हें छोड़ते नहीं बनता, और प्रीति करने में बड़ा पाप है। पवित्रता त्यागने नहीं देती, पाप रखने नहीं देता, और जो रास्ता निकलता है वह चुप रह जाने का है।
आगे यही कहा गया है: शिव प्रकट करके कुछ नहीं कहते। जो बात कही नहीं जाती, उससे न कोई बहस कर सकता है, न क्षमा माँग सकता है। और उसी साँस में बता दिया जाता है कि भीतर क्या है: हृदय में अधिक सन्ताप। निर्णय ठंडा है, पर निर्णय लेनेवाला जल रहा है।
वह संकल्प जो मन के भीतर हुआ
निर्णय कहाँ लिया जाता है, यह भी बताया गया है: किसी सभा में या किसी सलाह के बाद नहीं, राम के चरणों में सिर नवाकर, राम का स्मरण करते हुए।
इस देह से सती की मुझसे भेंट नहीं। इस देह से, यह बात नपी-तुली है। वे इस शरीर के साथ का सम्बन्ध समाप्त कर रहे हैं। पूरे प्रसंग का काँटा यहीं टँग जाता है, क्योंकि यही देह आगे दो बार और लौटेगा, दोनों बार सती की अपनी ज़बान पर।
और संकल्प की जगह भी साथ ही लिखी है, मन में। न कोई प्रतिज्ञा-वचन बोला गया, न कोई साक्षी बनाया गया, न पत्नी को सूचना दी गयी। तुरन्त उन्हें स्थिरबुद्धि कहा गया है, यानी जिसकी बुद्धि डिगती नहीं। यह निर्णय नरम पड़नेवाला नहीं।
फिर वे राम का स्मरण करते हुए घर की ओर चलते हैं। रास्ते में आकाश से एक स्वर उतरता है, और वह इस प्रसंग की अकेली बाहरी गवाही है।
हे शिव, आपकी जय हो, आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की। आकाशवाणी न्याय या फल की बात नहीं करती। पहले वह कहती है कि भक्ति दृढ़ हुई। फिर वह जोड़ती है कि आपके बिना ऐसी प्रतिज्ञा और कौन कर सकता है, आप रामभक्त हैं, समर्थ हैं, भगवान् हैं। ऊपर से यह निर्णय उसी क्षण मान लिया गया।
वही स्वर सती के कानों में भी पड़ता है, और उन तक केवल इतना पहुँचता है कि कोई प्रतिज्ञा हुई है। उनके मन में चिन्ता उठती है और वे सकुचाते हुए पूछती हैं: कहिये, आपने कौन-सी प्रतिज्ञा की है, आप सत्य के धाम हैं, दीनदयालु हैं। वे उत्तर पाने के लिये उन्हीं गुणों का नाम लेती हैं जो उत्तर देने को बाध्य करें, सत्य के धाम और दीनदयालु।
उत्तर नहीं मिलता। सती ने बहुत प्रकार से पूछा, फिर भी शिव ने कुछ नहीं कहा। इस प्रसंग में सती को अन्त तक यह नहीं बताया जाता कि वह प्रतिज्ञा क्या थी। वे जो जानती हैं, अनुमान से जानती हैं।
दूध में खटाई
जो बताया नहीं जाता, वह समझ में आ जाता है। सती हृदय में अनुमान कर लेती हैं कि सर्वज्ञ शिव सब जान गये। और फिर वे अपने विषय में कहती हैं: मैंने शिव से कपट किया, स्त्री स्वभाव से ही मूर्ख और नासमझ होती है। यह किसी दूसरे का लगाया आरोप नहीं, उनका अपना वाक्य है, अपने ही ऊपर। जहाँ कोई दोष गिनाने को तैयार नहीं, वहाँ दोषी अपना अभियोग स्वयं लिखता है।
और यहाँ कथा कहनेवाले याज्ञवल्क्य बीच में रुककर अपने सुननेवाले भरद्वाज से कहते हैं, देखिये। फिर प्रीति की रीति दिखायी जाती है, और उदाहरण रसोई से उठाया गया है।
जल दूध के साथ मिलकर दूध के ही भाव बिक जाता है। प्रीति में पड़कर पानी को दूध का मोल मिल जाता है। फिर दूसरी बात: कपट रूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है और स्वाद जाता रहता है।
खटाई कुछ नष्ट नहीं करती। वह इतना करती है कि जो मिला हुआ था उसे दिखा देती है कि वह दो चीज़ें थीं, और जो रस था वह चला जाता है। इसके बाद भी शिव सती के साथ कैलास लौटते हैं, रास्ते भर उनसे कथाएँ कहते हैं, और समाधि से जागकर उन्हें आसन देते हैं।
अब सती की दशा आती है। अपनी करनी याद करके उनके हृदय में इतनी चिन्ता है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। और वे शिव के मौन को यों पढ़ती हैं: शिव कृपा के परम अथाह सागर हैं, इसीलिये उन्होंने मेरा अपराध प्रकट में नहीं कहा। जिस चुप्पी में वे झुलस रही हैं, उसे भी वे दया मानती हैं। फिर शिव का रुख देखकर उन्हें वह बात मालूम हो जाती है जो कभी कही नहीं गयी: स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया। यह समाचार उन्हें किसी वाक्य से नहीं, एक रुख से मिलता है।
और तब वह उपमा आती है: अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता, और हृदय भीतर-ही-भीतर आँवे की तरह तपने लगता है। टीका बताती है कि यह कुम्हार का आँवा है।
कैलास का रास्ता, और अखंड समाधि
सती को चिन्ता में डूबा देखकर शिव उन्हें सुख देने के लिये सुन्दर कथाएँ कहने लगते हैं। रास्ते भर वे भाँति-भाँति के इतिहास कहते चलते हैं, और इस तरह कथा कहते-कहते कैलास जा पहुँचते हैं।
जिसने मन में सम्बन्ध समाप्त कर दिया है, वही रास्ते भर कहानियाँ सुनाकर उनका मन बहला रहा है। इसे पश्चात्ताप नहीं कहा जा सकता, क्योंकि निर्णय कहीं डिगा नहीं। जो शेष रह गया है, वह दया है, अच्छा बर्ताव है। जो चला गया है, उसका नाम कोई नहीं लेता।
कैलास पहुँचकर शिव फिर अपनी प्रतिज्ञा याद करते हैं, बड़ के पेड़ के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ जाते हैं। वे अपना स्वाभाविक रूप सँभाल लेते हैं। फिर उनकी अखंड और अपार समाधि लग जाती है।
अब सती कैलास पर रहती हैं, मन में बड़ा दुख लिये। पति वहीं हैं, बड़ के नीचे बैठे हुए। और साथ ही यह बात कही गयी है: इस भेद को कोई कुछ नहीं जानता। सती के पास शोक है, पर शोक का साथी कोई नहीं। जिनसे कहा जा सकता था वे समाधि में हैं।
और फिर समय का नाप आता है: दिन युग के समान बीतते हैं।
वह विनती जो राम से की गयी
सती के हृदय में नित नया सोच उठता है: इस दुख के समुद्र के पार कब जाऊँगी। फिर वे अपने ऊपर अभियोग गिनाती हैं, और गिनती दो की है: मैंने राम का अपमान किया, और फिर पति के वचनों को झूठ जाना।
दूसरा अभियोग ध्यान देने लायक है। पति ने जिस दिन कहा था कि ये वही मेरे इष्टदेव हैं, उस दिन बात मान ली जाती तो परीक्षा की नौबत ही न आती।
इसके बाद वे विधाता से कहती हैं: आपने जो फल दिया वह उचित ही दिया। पर अब यह उचित नहीं कि शिव से विमुख हो जाने पर भी मुझे जिलाये रखें। दण्ड पर उन्हें आपत्ति नहीं, उसके जारी रहने पर है। जो जीवन बचा है वह उनके लिये दण्ड का दूसरा नाम है।
हृदय की ग्लानि कही नहीं जाती, सो वह बुद्धिमती स्त्री मन-ही-मन राम का स्मरण करती हैं और विनती करती हैं। विनती एक शर्त पर टिकी है: यदि आप दीनदयालु कहलाते हैं, और यदि वेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुख हरनेवाले हैं, तो।
तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि मेरा यह देह जल्दी छूट जाय। यह उसी देह का दूसरा उल्लेख है। जिसे शिव ने मन में अलग कर दिया था, उसे अब सती छोड़ना चाहती हैं। इसके लिये वे उसी से प्रार्थना कर रही हैं जिनका अपमान करके यह सब हुआ था। माँगने का आधार अपना कोई पुण्य नहीं: यदि शिव के चरणों में मेरा प्रेम है और यह व्रत मन, वचन और कर्म से सच्चा है। जिस पति ने त्याग दिया, उसी के प्रति अपने प्रेम की सच्चाई पर वे अपनी मृत्यु माँगती हैं।
फिर माँग पूरी होती है: हे सर्वदर्शी, सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिये जिससे मरण हो जाय और बिना परिश्रम यह असह्य विपत्ति दूर हो। बिना परिश्रम पर ठहरिये। वे मरना माँग रही हैं, और उसका उपाय पूरी तरह उस पर छोड़ रही हैं जिससे माँगा है।
सत्तासी हजार वर्ष, और दक्ष का बड़ा अधिकार
और तब एक संख्या आती है। सती इस प्रकार दुखी रहीं, उनका दुख इतना दारुण था कि कहा नहीं जा सकता, और सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर शिव ने समाधि खोली। वाक्य का पहला आधा दुख का है और दूसरा आधा समय का।
इस संख्या के भीतर कुछ नहीं होता: न कोई भेंट, न बातचीत, न सुलह। जिस विनती में शीघ्र शब्द पड़ा था, उसके बाद इतना समय बीतता है।
समाधि टूटने का समाचार भी सती को किसी ने नहीं दिया। शिव राम-नाम का स्मरण करने लगते हैं, और उसी से सती जान जाती हैं कि वे जाग गये। वे जाकर चरणों में प्रणाम करती हैं, और शिव उन्हें सामने आसन देते हैं।
सामने शब्द काम करता है। आसन दिया गया, यानी आदर पूरा है, और सामने दिया गया, यानी जगह आमने-सामने की है। सत्तासी हजार वर्ष बाद पति और पत्नी एक-दूसरे के सामने बैठते हैं, और इस प्रसंग में उस मौन के विषय में आगे कुछ नहीं कहा जाता।
फिर शिव भगवान् की रसीली कथाएँ कहने लगते हैं, और एक दूसरी दुनिया खुल जाती है: उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्मा ने सब प्रकार से योग्य देखकर उन्हें प्रजापतियों का नायक बना दिया। एक व्यक्ति कथा कह रहा है, दूसरे को पद मिल रहा है। और आगे की विपत्ति में दक्ष के उस अभिमान का हाथ होगा जो इसी पद के साथ आया।
जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया, तब उनके हृदय में बहुत अभिमान आ गया। और फिर वह बात जो इस कथा से निकलकर हर सभा में काम आती है: जगत में ऐसा कोई पैदा ही नहीं हुआ जिसे प्रभुता पाकर मद न हो। इस बात में दक्ष राक्षस नहीं, साधारण दिखते हैं, और इस नियम में कोई अपवाद नहीं बचता। नियुक्ति योग्यता देखकर हुई थी। कमी उसके बाद आयी।
इसके बाद दक्ष सब मुनियों को बुला लेते हैं और बड़ा यज्ञ करने लगते हैं। जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, उन सबको आदर सहित न्योता गया। यह शब्द भाग आगे एक बार और आयेगा, जब सती यज्ञशाला में उसे ढूँढ़ेंगी और नहीं पायेंगी।
आकाश में विमान, और एक बहाना
निमन्त्रण पाकर किन्नर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियों सहित चल पड़ते हैं। साथ ही छूट जानेवालों के नाम भी गिना दिये जाते हैं: विष्णु, ब्रह्मा और शिव को छोड़कर सभी देवता अपने-अपने विमान सजाकर चले। तीन नाम बाहर हैं, और उनमें वह घर भी है जिसमें दक्ष की बेटी ब्याही है।
फिर दृश्य ऊपर उठ जाता है। सती आकाश में अनेक प्रकार के सुन्दर विमान जाते देखती हैं। देव-सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, ऐसा गान कि सुनते ही मुनियों का ध्यान छूट जाता है।
वे पूछती हैं, और शिव बखानकर सब बता देते हैं। जो बात बतायी जा सकती है, वह पूरी बतायी जाती है। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न होती हैं। यह कुछ बहुत सच्चा शब्द है। उतनी ही प्रसन्नता, जितनी इस अवस्था में सम्भव थी।
और तुरन्त उनके मन की असली बात आती है: यदि शिव आज्ञा दें तो इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ। उत्सव बहाना है। मन कुछ दिन पिता के घर रहने का है।
पर वे यह कह नहीं पातीं। कारण भी बताया गया है: पति के त्याग का बड़ा भारी दुख हृदय में है, और अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती नहीं। इसलिये जो वाक्य निकलता है उसका स्वर तीन चीज़ों से बना है, भय, संकोच और प्रेम-रस।
माँग को तौलिये। वे यह नहीं कहतीं कि मुझे पिता के घर रहना है। वे कहती हैं कि पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है, यदि आपकी आज्ञा हो तो आदर सहित उसे देखने जाऊँ। और सम्बोधन कृपा का घर है। जो स्त्री जानती है कि उसका त्याग हो चुका है, वह त्यागनेवाले को कृपा का घर कहकर आज्ञा माँग रही है।
शिव का मना करना, और फिर विदा
उत्तर में शिव पहले सहमत होते हैं: बात अच्छी कही, मेरे मन को भी भायी। फिर वह तथ्य रखते हैं जो सब बदल देता है: न्योता नहीं भेजा गया, और यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब पुत्रियों को बुलाया है, और हमारे बैर के कारण आपको भी भुला दिया।
फिर पुराना प्रसंग खुलता है: ब्रह्मा की सभा में वे हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसी से अब तक अपमान करते हैं। और तब चेतावनी: बिना बुलाये जाने पर न शील-स्नेह रहेगा, न मान-मर्यादा।
इसके बाद जो आता है, उसमें नियम भी है और नियम का अपवाद भी।
मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये, इसमें सन्देह नहीं। यह पहला आधा सती के पक्ष में है, और शिव स्वयं उसे पहले रखते हैं। फिर दूसरा आधा: तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, वहाँ जाने से कल्याण नहीं होता। सती के सामने शिव यहीं अपनी दलील रखते हैं। अपने संकल्प के विषय में उन्होंने सती से कुछ नहीं कहा था।
और फिर वह शब्द लौट आता है: शिव ने बहुत प्रकार से समझाया, पर भावी के वश सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। प्रसंग के आरम्भ में शिव ने मन में माना था कि भगवान् की इच्छा रूपी भावी बलवान है। अब उसी भावी के वश ठीक बात भी भीतर नहीं उतरती।
तब शिव कहते हैं: यदि आप बिना बुलाये जायेंगी, तो हमारी समझ में यह अच्छी बात न होगी। फिर बताया जाता है कि उन्होंने बहुत यत्न करके कह देखा, पर सती किसी तरह रुकीं नहीं। तब शिव ने अपने मुख्य गण साथ देकर उन्हें विदा किया। जिसने मन में सम्बन्ध तोड़ दिया है, वह उन्हें अकेले नहीं जाने देता।
उस सभा में, जहाँ शिव का भाग नहीं था
पिता के घर पहुँचने पर जो होता है, वह बिना किसी ऊँचे स्वर के कह दिया जाता है: दक्ष के डर से किसी ने उनका आदर नहीं किया। कारण द्वेष नहीं, भय बताया गया है। केवल माता आदर से मिलीं, और बहनें बहुत मुसकराती हुई मिलीं।
दक्ष ने उनकी कुशल तक नहीं पूछी, और सती को देखकर उलटे उनके सारे अंग जल उठे। और फिर वह बात जिससे कथा मुड़ जाती है: सती जाकर यज्ञ देखती हैं, और वहाँ कहीं शिव का भाग दिखायी नहीं देता।
यह वही भाग है जिसका नाम पहले आया था। वहाँ कहा गया था कि यज्ञ का भाग पानेवाले सब देवताओं को आदर से न्योता गया। तब वह बात निर्दोष लगती है। अब वही पलटकर काटती है। सती को यह बात यज्ञशाला में अपनी आँखों से पता चलती है, किसी के बताने से नहीं।
तब शिव ने जो कहा था वह उनके चित्त पर चढ़ता है, और स्वामी का अपमान समझकर हृदय जल उठता है। और फिर एक तुलना आती है: पिछला दुख हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना बड़ा दुख इस समय हुआ। टीका बताती है कि पिछला दुख पति के त्याग का था, वही जिसमें मरने की प्रार्थना तक की जा चुकी थी। और वह दुख इससे छोटा पड़ा।
जगत में दारुण दुख अनेक हैं, पर सबसे कठिन है जाति का अपमान, यानी अपने जनों पर की गयी चोट। यह समझकर सती को बड़ा क्रोध आ गया। इससे पहले उनके भीतर जो कुछ था, वह भीतर जलता था और बाहर कुछ नहीं कहता था। माता उन्हें बहुत प्रकार से समझाती हैं, वही अकेली जो आदर से मिली थीं।
पर शिव का अपमान सहा नहीं जाता और हृदय में कोई प्रबोध नहीं होता। तब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर रोकती हैं और क्रोध भरे वचन बोलती हैं। डाँट अकेले पिता को नहीं, सारी सभा को पड़ती है।
सती के अन्तिम वचन, और योग की अग्नि
पहला वाक्य सारी सभा को एक में समेट लेता है: हे सभासदो और सब मुनीश्वरो, सुनिये। जिन लोगों ने यहाँ शिव की निन्दा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरन्त मिलेगा। कहनेवाले और सुननेवाले एक ही पलड़े में हैं। फिर वे अपने पिता को भी नहीं छोड़तीं: वे भी भलीभाँति पछतायेंगे।
जहाँ संत, शिव और विष्णु की निन्दा सुनी जाय, वहाँ की मर्यादा यह है कि यदि वश चले तो निन्दा करनेवाले की जीभ काट ले। और यदि वश न चले तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाय। दो सीढ़ियाँ हैं: एक उसके लिये जिसके हाथ में बल है, दूसरी उसके लिये जिसके हाथ में कुछ नहीं। तीसरी, कि बैठे रहिये और सुनते रहिये, कहीं नहीं है।
फिर वे शिव का परिचय देती हैं, और उसमें एक भी शब्द निजी नहीं: शिव सारे जगत की आत्मा हैं, जगत के पिता हैं, सबका हित करनेवाले हैं। वे यह नहीं कह रहीं कि मेरे पति का अपमान हुआ। वे कह रही हैं कि जिसका अपमान हुआ वह जगत की आत्मा और पिता है।
और तब वे अपनी ओर मुड़ती हैं: मेरा मन्दबुद्धि पिता उनकी निन्दा करता है, और मेरा यह देह दक्ष के ही वीर्य से उत्पन्न है। यह तीसरी बार है जब देह का नाम आता है, और कारण हर बार अलग है। शिव ने इससे सम्बन्ध इसलिये तोड़ा था कि इसने सीता का वेष धरा था। सती ने इसे छोड़ना इसलिये चाहा था कि दुख असह्य था। अब वे इसे इसलिये छोड़ रही हैं कि यह उस पिता से उत्पन्न है जो शिव की निन्दा करता है।
इसलिये चन्द्रमा को माथे पर धारण करनेवाले वृषकेतु शिव को हृदय में धरकर मैं इस शरीर को तुरन्त त्याग दूँगी। जिस पति ने त्याग दिया था, उसी को हृदय में रखकर वे जाती हैं। वे उसी नाम से, वृषकेतु, बैल की ध्वजावाले, पुकारती हैं जिस नाम से कथा ने शिव को उस दिन पुकारा था। उस दिन वे रास्ते भर कथाएँ सुनाते हुए उन्हें कैलास ले गये थे। फिर वे योग की अग्नि से अपना शरीर भस्म कर देती हैं। आग किसी चिता से नहीं आयी, भीतर से उठी, जैसे पहले उनका हृदय आँवे की तरह भीतर-ही-भीतर तपता था। सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच जाता है।
सती का मरण सुनकर शिव के गण यज्ञ को नष्ट करने लगते हैं, और यज्ञ का विध्वंस होते देखकर मुनीश्वर भृगु उसकी रक्षा करते हैं। शिव ने अपने मुख्य गण सती के साथ भेजे थे। प्रसंग यहीं, बीच हलचल में रुक जाता है।
यह भी देख लीजिये कि यहाँ क्या नहीं है। यज्ञ तोड़नेवाले किसी योद्धा का नाम नहीं आता, केवल शिव के गण कहे गये हैं। शिव स्वयं यज्ञशाला में एक बार भी नहीं आते। सती के देह को उठाकर ले जाने की कोई कथा यहाँ नहीं है, और दक्ष का क्या हुआ, यह भी इस प्रसंग में नहीं कहा जाता। यह प्रसंग इतना ही दिखाता है: एक स्त्री का जाना, और उसके पीछे उठा हुआ शोर।
बिना कड़वे वाक्य के टूटी गृहस्थी
इस पूरे प्रसंग को देह की बात पर टाँगकर देखा जा सकता है। पहली बार वह बात शिव के मन में आती है, इस तन से भेंट नहीं, और तब किसी को सुनायी नहीं देती। दूसरी बार वह सती की विनती में आती है, कि यह देह जल्दी छूट जाय, और तब वह केवल राम से कही गयी है। तीसरी बार वह भरी सभा में कही जाती है, और उसी क्षण पूरी हो जाती है। बीच में सत्तासी हजार वर्ष पड़े हैं।
दूसरी बात मौन की है, और यही इस कथा का असली विषय है। शिव एक बार भी नहीं कहते कि आपने झूठ बोला, और एक बार भी नहीं बताते कि क्या संकल्प किया। प्रतिज्ञा के विषय में सती एक बार, बहुत प्रकार से, पूछती हैं, और फिर नहीं पूछतीं। अपने त्याग के विषय में जो कुछ उन्हें मालूम होता है, वह आकाश से आयी एक आवाज़ से, अपने अनुमान से और शिव के रुख़ से मालूम होता है। एक गृहस्थी बिना एक भी कड़वे वाक्य के समाप्त हो जाती है।
और तीसरी बात, जो कहीं नरम नहीं पड़ती। इस निर्णय पर पछतावा एक जगह भी नहीं दिखाया जाता। आकाशवाणी इसे उसी दिन सराह देती है। लौटते समय शिव कथाएँ सुनाते हैं, पर निर्णय नहीं बदलते। जागने पर आसन देते हैं, सामने का आसन। विदा करते समय गण साथ भेजते हैं, पर स्वयं साथ नहीं जाते।
जो हुआ वह एक संदेह से शुरू हुआ, फिर एक परीक्षा, फिर एक छिपाव। शिव ने भक्ति का मार्ग बचाया। सती ने पति के अपमान पर सिर नहीं झुकाया। ब्रह्मा ने योग्य देखकर पद दिया, और पद पाकर दक्ष को मद हुआ। और इन सबका जोड़ यह निकला कि एक स्त्री यज्ञशाला में अपना शरीर जला देती है। भावी शब्द इस कथा के आरम्भ में भी है, और सती की विदा से पहले भी।
और अन्त में वह चीज़ रह जाती है जो सबसे देर तक साथ चलती है। शिव सत्तासी हजार वर्ष समाधि में रहे, और उतने समय सती कैलास पर दुख सहती रहीं। किसी को उनका भेद मालूम नहीं हुआ। दिन वैसे ही निकलते रहे, और फिर आसन वैसे ही दिया गया। कथा इस चुप्पी को न बड़ा करती है न छोटा। वह उसे पूरा दिखा देती है। उसका सार वह बात है, कि उस भेद को कोई कुछ नहीं जानता था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 56 से 64, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।