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भरद्वाज का प्रश्न और सती के मन का संदेह

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 6

प्रयाग में एक मुनि अपना संदेह कहने से डरते हैं। उत्तर में उन्हें किसी और का संदेह सुनाया जाता है, जो त्रेता की एक सड़क पर सीता का रूप धरकर चला था।

इस प्रसंग में रामकथा के कुछ टुकड़े ही आते हैं। बाक़ी सब पूछना और सोचना है। जो होता है वह इतना ही है कि एक आदमी पूछता है, और उत्तर देनेवाला उत्तर देने के बदले एक दूसरी कथा छेड़ देता है। उसके भीतर फिर किसी के मन में प्रश्न उठता है। रामचरितमानस का यह ढाँचा इसी प्रसंग में खड़ा होता है।

कहनेवाले और सुननेवाले इस प्रसंग में गिनती के हैं। प्रयाग में भरद्वाज पूछते हैं और याज्ञवल्क्य कहते हैं। याज्ञवल्क्य जो कथा छेड़ते हैं वह पार्वती और शिव का संवाद है, यानी उसमें कहनेवाले शिव हैं और सुननेवाली पार्वती। और उस संवाद के समय और कारण की कथा में एक और आश्रम खुलता है। वहाँ अगस्त्य ऋषि ने शिव को रामकथा सुनायी थी और शिव ने उन्हें हरिभक्ति कही थी।

भरद्वाज और सती, दोनों के मन में राम को लेकर संदेह है, पर दोनों संदेहों की ज़मीन अपनी-अपनी है। भरद्वाज ने वह चरित सुना है जिसे सारा संसार जानता है, कि राम पत्नी के विरह में दुखी हुए और क्रोध में युद्ध करके रावण को मारा। सती का संदेह उस राजकुमार पर है जो वन में पत्नी को खोज रहा है, और जिसे शिव ने प्रणाम किया है। भरद्वाज अपना संदेह कह देते हैं। सती नहीं कहतीं। आगे जो कुछ होता है, वह इसी अन्तर से निकलता है।

प्रयाग के मुनि और त्रेता के राही

  • भरद्वाज प्रयाग में रहनेवाले मुनि, जिनका मन राम के चरणों में लगा है, और जिनके मन में संदेह है कि राम कौन हैं।
  • याज्ञवल्क्य परम विवेकी मुनि, जिन्हें भरद्वाज चरण पकड़कर रोक लेते हैं, और जो पूछनेवाले की चतुराई पहचान लेते हैं।
  • शिव जो अगस्त्य के आश्रम से लौटते हुए रास्ते में राम को देखते हैं, परिचय नहीं करते, केवल सच्चिदानन्द की जय कहकर आगे बढ़ जाते हैं। बाद में वे सती को समझाते हैं।
  • सती दक्ष की पुत्री, शिव के साथ चलती हुईं, जिनके मन में पति की दशा देखकर संदेह उठता है। वे उसे भीतर ही रख लेती हैं।
  • राम जो पहले वन में पत्नी को खोजते दिखते हैं, फिर सती के सामने हाथ जोड़े हुए। और फिर वे सती को आगे, पीछे और जहाँ-तहाँ अनेक रूपों में दिखते हैं, हर रूप में सीता और लक्ष्मण के साथ।
  • लक्ष्मण जो सीता के वेश में सती को देखकर चकित रह जाते हैं और कुछ कह नहीं पाते। वे राम का प्रभाव जानते हैं।
  • अगस्त्य मानस इन्हें कुंभज ऋषि कहता है और टीका अगस्त्य बताती है। उनके आश्रम में शिव कुछ दिन रहे, और उनका नाम इस कथा में दो बार आता है।

प्रयाग, माघ, और वह सभा जिसका विषय ही यही था

कथा एक जगह के नाम से खुलती है, और वह जगह तीन नदियों का संगम है। वहाँ एक मुनि रहते हैं, और तुलसीदास उनका परिचय एक ख़ास क्रम में देते हैं।

भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, और उनका राम के चरणों में बहुत अनुराग है। इसके बाद तप आता है, फिर सम और दम, फिर दया, और सबसे अन्त में यह कि परमार्थ के मार्ग में वे बड़े चतुर हैं। जिस आदमी का प्रश्न आगे यह होगा कि राम कौन हैं, उसके बारे में सबसे पहली बात यही कही गयी है कि उसका प्रेम उन्हीं के चरणों में है।

फिर ऋतु आती है। माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं तो तीर्थराज प्रयाग में सब कोई आ जुटते हैं। देवता, दानव, किन्नर और मनुष्यों की श्रेणियाँ, सब आदर के साथ त्रिवेणी में डुबकी लगाते हैं। माधव के चरणों की पूजा होती है, जिन्हें टीका वेणीमाधव कहती है, और अक्षयवट को छूते ही शरीर पुलक उठते हैं। और इसी भीड़ के बीच एक आश्रम है, बहुत पावन, बहुत रमणीय, श्रेष्ठ मुनियों के मन को भानेवाला: भरद्वाज का आश्रम।

जो ऋषि-मुनि तीर्थराज में स्नान करने आते हैं, उनका समाज वहीं जुटता है। सुबह उत्साह के साथ स्नान, और उसके बाद आपस में भगवान् के गुणों की कथा। वह कथा किन विषयों पर चलती है, यह तुलसी गिना देते हैं।

चार चीज़ें गिनायी गयी हैं: ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान, तत्त्वों के विभाग का वर्णन, और भगवान् की भक्ति, ज्ञान और वैराग्य से जुड़ी हुई। पहली तीन बातें विषय हैं। चौथी में एक व्यक्ति आ जाता है, क्योंकि भक्ति किसी की होती है।

एक संदेह, जिसे कहते हुए भय भी आता है और लाज भी

इसी तरह पूरे माघ स्नान होता है और फिर सब अपने-अपने आश्रम लौट जाते हैं। यह हर बरस होता है, और हर बरस बड़ा आनन्द होता है। मकर का स्नान करके मुनियों के समूह चले जाते हैं। तुलसी यह सब थोड़े में कह देते हैं। अगली बात यह है कि एक बरस भरद्वाज ने जानेवालों में से एक को जाने नहीं दिया।

एक बार पूरे मकर भर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने आश्रमों को लौट गये। और याज्ञवल्क्य मुनि को, जिन्हें तुलसी परम विवेकी कहते हैं, भरद्वाज ने चरण पकड़कर रोक लिया। सभा के मेज़बान ने जाते हुए अतिथि के पाँव थाम लिये, और अभी अपनी बात कही भी नहीं है। अतिथि के परिचय में जो शब्द रखा गया है, विवेक, वह इस प्रसंग में चार बार आता है। यह पहली बार है।

फिर वही होता है जो एक आश्रम में होना चाहिये। आदर से चरण धोये गये, बहुत पवित्र आसन पर बिठाया गया, पूजा हुई, और मुनि के सुयश का बखान हुआ। तब भरद्वाज बहुत पवित्र और कोमल वाणी से बोलते हैं।

हे नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संदेह है, और वेदों का सारा तत्त्व आपकी मुट्ठी में है। यह कहकर उन्होंने बता दिया कि उन्होंने याज्ञवल्क्य को क्यों रोका। फिर: उसे कहते हुए मुझे भय भी लगता है और लाज भी आती है। पोद्दार की टीका दोनों को खोलकर बताती है: भय इस बात का कि कहीं वे यह न समझ लें कि परीक्षा ली जा रही है। और लाज इस बात की कि इतनी आयु बीत गयी और अब तक यह नहीं जाना।

और फिर तराजू का दूसरा पलड़ा: जो न कहूँ तो बड़ा अकाज होता है। चुप रहने की कीमत बोलने की कीमत से बड़ी है। अब वे वह नीति सामने रखते हैं जिसके सहारे वे बोलने जा रहे हैं। वह नीति संतों की भी है, श्रुति की भी, पुराण की भी और मुनियों की भी।

गुरु से छिपाव करने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता। दुराव, यह शब्द याद रखने लायक है। आगे यह एक बार फिर आयेगा। भरद्वाज अपनी लाज को इस नीति के नीचे दबा देते हैं: यही सोचकर मैं अपना मोह प्रकट करता हूँ, अब सेवक पर कृपा करके उसे हर लीजिये।

अब वे अपना प्रश्न बनाते हैं, और पहले प्रमाण रखते हैं। राम नाम का असीम प्रभाव संतों ने, पुराणों ने और उपनिषदों ने गाया है। फिर एक और प्रमाण, कि शिव, जो स्वयं ज्ञान और गुणों की राशि हैं, निरन्तर उसी नाम को जपते रहते हैं। फिर तीसरा, कि संसार में चार प्रकार के जीव हैं और काशी में मरने पर सब परमपद पा जाते हैं। और फिर इन तीनों को जोड़ देते हैं।

हे मुनिराज, वह भी राम की ही महिमा है, क्योंकि शिव दया करके वहाँ राम नाम का ही उपदेश देते हैं। काशी की मुक्ति भी उसी एक नाम से बँधी है। तीनों प्रमाण एक जगह आ गये, और अब प्रश्न: मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं, मुझे समझाकर कहिये।

और तुरन्त वे यह भी बता देते हैं कि उलझन कहाँ है। एक राम तो अवध के राजा के कुमार हैं, जिनका चरित्र सारा संसार जानता है। उस चरित्र में से वे केवल दो बातें उठाते हैं: उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया, और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला। दुःख और रोष, ये दो बातें गिनायी गयी हैं।

वही राम हैं या कोई और, जिन्हें शिव जपते हैं? आप सत्य के धाम हैं और सर्वज्ञ हैं, विवेक विचारकर कहिये। विवेक दूसरी बार आया। पहली बार वह याज्ञवल्क्य के परिचय में था, अब प्रश्न की शर्त है। भरद्वाज ने अपना संदेह घटाकर नहीं रखा। उन्होंने उसे पूरे आकार में, दो नामों के बीच खड़ा करके सामने रख दिया है।

उत्तर के बदले, किसी और का संदेह

प्रश्न के बाद भरद्वाज एक विनती और जोड़ते हैं: जिस प्रकार मेरा यह भारी भ्रम मिटे, वह कथा आप विस्तार से कहिये। और याज्ञवल्क्य का पहला उत्तर एक मुसकान है।

उस मुसकान का कारण वे ख़ुद खोल देते हैं: राम की प्रभुता को तो आप जानते ही हैं। आप मन, वचन और कर्म से राम के भक्त हैं, और आपकी चतुराई मैं समझ गया। आप राम के गूढ़ गुण सुनना चाहते हैं, इसीलिये ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हों। यह पहचान उसी बात से मेल खाती है जो तुलसी ने भरद्वाज के परिचय में सबसे पहले लिखी थी, कि उनका अनुराग राम के चरणों में है।

फिर वे कहना शुरू करते हैं, और पहली बात यह कि आदर से मन लगाकर सुनिये, मैं राम की सुहावनी कथा कहता हूँ। उस कथा का परिचय वे दो उपमाओं से देते हैं, जो एक के बाद एक आती हैं। पहली यह कि महामोह विशाल महिषासुर है और रामकथा भयंकर कालिका, जो उसका नाश करती है।

दूसरी यह कि रामकथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संतरूपी चकोर पान करते रहते हैं। वही कथा जो मोह के लिये कालिका है, संत के लिये चाँदनी है।

और उसके तुरन्त बाद वह बात आती है जिस पर यह प्रसंग टिका है: ऐसा ही संदेह पार्वती ने किया था। और तब शिव ने विस्तार से उसका उत्तर दिया था। जिसने अपना संदेह कहने में भय और लाज दोनों झेली, उससे पहले यह कहा गया कि यह संदेह पहले भी किसी को हुआ है।

अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही पार्वती और शिव का संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतु से हुआ, हे मुनि, वह सुनिये, आपका विषाद मिट जायेगा। दो शब्द काम के हैं, समय और हेतु। संवाद की घोषणा हो चुकी है, पर वह अभी शुरू नहीं होता। पहले यह आता है कि उस संवाद की नौबत क्यों आयी।

एक आदमी ने प्रश्न पूछा, और उसे उत्तर के बदले पहले यह कथा सुनायी जा रही है कि एक दूसरे के मन में वैसा ही प्रश्न कैसे उठा।

अगस्त्य के आश्रम से लौटते हुए

कथा त्रेतायुग में जाती है। एक बार शिव अगस्त्य ऋषि के पास गये, और साथ में सती थीं। ऋषि ने उन्हें सम्पूर्ण जगत् का ईश्वर जानकर पूजा। उस आश्रम में दोनों ओर से लेन-देन हुआ।

मुनिवर ने रामकथा विस्तार से कही और शिव ने उसे परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिव से हरिभक्ति पूछी और शिव ने उन्हें अधिकारी पाकर वह कही। एक ही आश्रम में शिव सुननेवाले भी हुए और कहनेवाले भी। राम के गुणों की गाथाएँ कहते-सुनते कुछ दिन वे वहीं रहे, फिर मुनि से विदा माँगकर सती के साथ घर की ओर चले।

अब तुलसी एक वाक्य से समय जोड़ देते हैं। उन्हीं दिनों पृथ्वी का भार उतारने के लिये भगवान् ने रघुवंश में अवतार लिया था। वे उस समय पिता के वचन से राज्य छोड़कर, उदासीन वेश में, दण्डकवन में विचर रहे थे। जो कथा अभी-अभी आश्रम में सुनी गयी है, उसका नायक इसी समय वन में है।

शिव हृदय में विचारते जा रहे हैं कि दर्शन किस प्रकार हों। राम ने गुप्त रूप से अवतार लिया है, मेरे जाने से सब लोग जान जायेंगे। देखने की इच्छा है, और जाने से जो भेद खुल जायेगा, वही उन्हें रोक रहा है। इसी हालत को तुलसी थोड़े में बाँधते हैं, और उसमें अपना नाम भी रखते हैं।

शिव के हृदय में बड़ी खलबली है, और सती इस भेद को नहीं जानतीं। तुलसीदास कहते हैं कि दर्शन का लोभ ऐसा है कि मन में डर है और नेत्र ललचाये हुए हैं। एक ही शरीर में दो उलटी चीज़ें चल रही हैं, डरता हुआ मन और लालची आँखें। और साथ चलनेवाली को इसमें से कुछ नहीं मालूम।

आगे सती जो कुछ देखेंगी, वह इसी अधूरी जानकारी में देखेंगी। उन्हें पति का व्यवहार दिखेगा, उसका कारण नहीं।

जिससे सब डरते हैं, वह रोता हुआ मिला

शिव का विचार आगे बढ़ता है। रावण ने अपनी मृत्यु मनुष्य के हाथ से माँगी थी, और राम ब्रह्मा के उस वचन को सच करना चाहते हैं। और फिर वह बात, कि यदि मैं न जाऊँ तो पछतावा रह जायेगा। विचार करते हैं, और कोई युक्ति नहीं बैठती।

इसी तरह शिव सोच के वश हो गये। और ठीक यहीं तुलसी जोड़ते हैं: उसी समय रावण ने जाकर नीच मारीच को साथ लिया, और वह तुरन्त कपटमृग बन गया। जिस क्षण शिव सोच रहे हैं कि दर्शन कैसे हों, उसी क्षण रावण अपनी चाल चल रहा है।

फिर तुलसी थोड़े में कहते हैं कि मूर्ख रावण ने छल करके सीता को हर लिया, और उसे राम का असली प्रभाव मालूम नहीं था। मृग को मारकर भाई सहित राम आश्रम लौटे, और टीका के अनुसार उसे सूना देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया। थोड़े में ही हरण भी है, अज्ञान भी, लौटना भी और आँसू भी।

और फिर वह सीधी बात, जिस पर यह प्रसंग टिका है: राम मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं, और दोनों भाई वन में खोजते हुए फिर रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग और वियोग नहीं है, उनमें विरह का दुःख प्रत्यक्ष देखा गया। तुलसी इस विरोधाभास को छिपाते नहीं, अपनी ओर से साफ़ लिख देते हैं, और लिखते ही एक चेतावनी रख देते हैं।

राम का चरित्र बहुत विचित्र है, उसे परम सुजान ही जानते हैं। जो मन्दबुद्धि हैं वे मोह के वश होकर हृदय में कुछ और ही धर बैठते हैं। यह चेतावनी विरह के वर्णन के ठीक बाद और उस दृश्य के ठीक पहले है जिसमें देखनेवाले आते हैं। दृश्य दिखाने से पहले तुलसी दो तरह के देखनेवाले गिना देते हैं, परम सुजान और मन्दबुद्धि। और वे बता देते हैं कि दूसरे वाले हृदय में कुछ और ही धर लेते हैं।

अब देखनेवाले आते हैं। शिव ने उसी अवसर पर राम को देखा, और उनके हृदय में बहुत भारी हर्ष उत्पन्न हुआ। शोभा के समुद्र राम को उन्होंने नेत्र भरकर देखा। जिन नेत्रों को पहले लालची कहा गया था, वे अब भर गये। पर कुसमय जानकर उन्होंने परिचय नहीं किया।

उन्होंने बस इतना कहा, जगत् को पवित्र करनेवाले सच्चिदानन्द की जय हो, और आगे चल दिये। इसके बाद वे सती के साथ चलते जाते हैं और बार-बार पुलकित होते हैं। और यही शरीर अब बगल में चलती सती के सामने गवाही देने लगता है।

सती के मन में जो उठ खड़ा हुआ

सती ने शिव की वह दशा देखी और उनके हृदय में बड़ा संदेह उत्पन्न हुआ। साफ़ कहा गया है कि संदेह शिव की दशा देखकर उठा। फिर उनके मन का तर्क चलता है, और वह आदर से भरा है: शिव की सारा जगत् वन्दना करता है, वे जगत् के ईश्वर हैं। देवता, मनुष्य और मुनि सब उनके आगे सिर नवाते हैं।

इसीलिये अगली बात चोट करती है: उन्होंने एक राजपुत्र को प्रणाम किया, और प्रणाम करते हुए उसे सच्चिदानन्द परधाम कहा। शब्द भी सती ने सुन लिये हैं। और फिर सबसे भीतरी गवाही: उसकी छबि देखकर वे मग्न हो गये, और अब तक उनके हृदय की प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती। अभी इस घड़ी भी। सती बगल में चलते पति के शरीर को पढ़ रही हैं।

और अब वे अपने मन में प्रश्न बनाती हैं, शास्त्र की भाषा में।

ब्रह्म व्यापक है, माया से रहित है, अजन्मा है, अगोचर है, इच्छारहित है और भेदरहित है। उसे वेद भी नहीं जानते। क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है? छह विशेषण गिनाये गये हैं, और गवाही में वेद भी हैं, कि वेद भी उसे नहीं जानते।

फिर वे अपना दायरा और कसती हैं। जो विष्णु देवताओं के हित के लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं, वे भी शिव की ही तरह सर्वज्ञ हैं। अवतार को वे अस्वीकार नहीं कर रहीं। उनका प्रश्न इससे छोटा और तीखा है: क्या ज्ञान के धाम, लक्ष्मीपति, असुरों के शत्रु विष्णु अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे? भरद्वाज ने सुने हुए चरित से दुःख और रोष गिनाये थे। सती स्त्री की खोज गिनाती हैं।

और वे दूसरी ओर से भी बँधी हैं। शिव की वाणी झूठी नहीं हो सकती, और यह सब कोई जानता है कि शिव सर्वज्ञ हैं। एक ओर शास्त्र है और दूसरी ओर पति का वचन, और दोनों को एक साथ सच मानना उन्हें सम्भव नहीं लगता। इसी से मन में अपार संदेह हो गया, और हृदय में किसी तरह समझ नहीं जागती।

फिर एक बात आती है जो प्रसंग को मोड़ देती है: यद्यपि सती ने प्रकट कुछ नहीं कहा, पर अन्तर्यामी शिव सब जान गये। भरद्वाज ने लाज सहते हुए कह दिया था। सती ने नहीं कहा, फिर भी कुछ छिपा नहीं, क्योंकि सुननेवाला अन्तर्यामी है।

शिव संदेह को नाम देते हैं: सुनिये सती, यह आपका स्त्रीस्वभाव है, ऐसा संदेह हृदय में कभी नहीं रखना चाहिये। और फिर प्रमाण के लिये उसी आश्रम में लौटते हैं जहाँ से दोनों अभी-अभी चले हैं। जिनकी कथा अगस्त्य ऋषि ने गायी और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनायी, वही मेरे इष्टदेव राम हैं। उनकी सेवा धीर मुनि सदा करते हैं। आश्रम के लेन-देन के दोनों आधे यहाँ गवाह बनकर खड़े हो जाते हैं।

इसके बाद शिव वह परिचय पूरा करते हैं। ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निर्मल मन से जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, और वेद, पुराण तथा आगम नेति कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, वही राम हैं। वे व्यापक ब्रह्म हैं, सब भुवनों के स्वामी, माया के धनी। वे अपने भक्तों के हित के लिये अपनी इच्छा से रघुकुल में अवतरित हुए हैं। सती ने वेद को अपने पक्ष का गवाह बनाया था, कि वेद भी उसे नहीं जानते। शिव उन्हीं वेदों को पेश करते हैं, कि वे नेति कहकर उन्हीं की कीर्ति गाते हैं।

पर बात नहीं बैठती। तुलसी इसे थोड़े में कहते हैं: यद्यपि शिव ने बहुत बार समझाया, उपदेश हृदय में नहीं लगा। तब शिव मन में भगवान् की माया का बल जानकर मुसकराते हुए बोले।

तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं

यदि मन में इतना ही संदेह है तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं? और फिर: तब तक मैं इसी बड़ की छाँह में बैठा हूँ, जब तक आप मेरे पास लौट आयें। वे सती को परीक्षा लेने भेजते हैं, और साथ में यह भी बता देते हैं कि लौटकर उन्हें कहाँ पाना है।

और आगे वे जो शर्त रखते हैं, उसमें प्रयाग की एक माँग गूँजती है: जिस तरह यह भारी मोह और भ्रम जाये, विवेक से विचारकर वही यत्न कीजियेगा। प्रयाग में भरद्वाज ने याज्ञवल्क्य से कहा था कि विवेक विचारकर कहिये। यहाँ शिव कहते हैं कि विवेक से विचारकर यत्न कीजियेगा। वहाँ विवेक से कहना था, यहाँ विवेक से करना है। सती शिव की आज्ञा पाकर चल देती हैं, और चलते-चलते सोचती हैं कि भाई, करूँ क्या। परीक्षा का निश्चय पहले हुआ है, ढंग बाद में सूझेगा।

इधर शिव अकेले रह जाते हैं और मन में अनुमान लगाते हैं, जो बहुत कड़वा है: दक्षकन्या सती का कल्याण नहीं है। जब मेरे समझाने से भी संदेह नहीं जाता, तो विधाता ही उलटे हैं, अब कुशल नहीं है। यह अनुमान उनके मन में है। सती के सामने उन्होंने केवल बड़ की छाँह की बात कही थी।

और फिर वे वही करते हैं जो बचा है: जो राम ने रच रखा है वही होगा, तर्क करके कौन शाखा बढ़ाये। ऐसा कहकर वे भगवान् का नाम जपने लगे। एक आदमी बड़ के नीचे बैठा नाम जप रहा है, और उसकी पत्नी परीक्षा लेने गयी है। सती वहाँ गयीं जहाँ सुख के धाम राम थे।

रास्ते में वे बार-बार हृदय में विचार करती हैं। फिर वे सीता का रूप धारण करके उसी मार्ग पर आगे होकर चलने लगती हैं जिससे राम आ रहे थे। परीक्षा इस बात की है कि पत्नी को खोजनेवाला यह राजकुमार ईश्वर है या नहीं, और परीक्षा के लिये वे पत्नी का ही रूप लेती हैं।

पर पहले लक्ष्मण देखते हैं। सती का बनाया हुआ वेश देखकर वे चकित रह गये, और हृदय में बड़ा भ्रम हुआ। वे कुछ कह नहीं सके, बहुत गम्भीर हो गये। धीरबुद्धि लक्ष्मण राम का प्रभाव जानते हैं।

फिर राम, जिनके लिये यह सब रचा गया है। सब देखनेवाले और सबके अन्तर की जाननेवाले राम सती का कपट जान गये। अन्तर्यामी, यह शब्द यहाँ दूसरी बार आया है। पहली बार वह शिव के लिये था, जब उन्होंने बिना कहे जान लिया था, अब राम के लिये है। सती ने एक अन्तर्यामी से छिपाया, और छिपाकर सीधे दूसरे के सामने जा खड़ी हुईं।

और अब वह शब्द लौटता है जिसे भरद्वाज की बात में टाँका गया था। सती ने वहाँ भी दुराव करना चाहा। भरद्वाज ने कहा था कि गुरु से दुराव करने पर निर्मल विवेक नहीं होता, और उसी नीति पर चलकर उन्होंने अपनी लाज छोड़ दी थी। यहाँ दुराव बना हुआ है। कथा कहनेवाले याज्ञवल्क्य बीच में एक टिप्पणी भी कर जाते हैं, कि स्त्री-स्वभाव का प्रभाव तो देखिये। फिर राम अपनी माया का बल हृदय में बखानकर हँसकर कोमल वाणी से बोलते हैं। थोड़ी देर पहले शिव भी मुसकराकर बोले थे।

राम ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और पिता सहित अपना नाम बताया। संदेह यह था कि क्या एक राजा का बेटा ब्रह्म हो सकता है, और वे अपने पिता का नाम लेकर अपना परिचय देते हैं।

और फिर वे पूछते हैं: शिव कहाँ हैं, और आप इस वन में अकेली किस कारण फिर रही हैं? सामने जो खड़ी हैं वे सीता के वेश में हैं, और राम उनसे उनके पति शिव का पता पूछ रहे हैं। उन्होंने वेश के नीचे की स्त्री, सती, से बात की। टीका के अनुसार प्रणाम भी सती को ही किया गया था।

इसका असर यह हुआ: राम के वचन कोमल थे और रहस्य से भरे भी, और उन्हें सुनकर सती को बड़ा संकोच हुआ। वे डरती हुई शिव के पास चलीं, और हृदय में बड़ी चिन्ता थी।

जिधर देखा, उधर वही

लौटते हुए सती अपने से जो कहती हैं, वह किसी उपदेशक ने नहीं, उन्होंने ख़ुद कहा है। मैंने शिव का कहना नहीं माना, और अपना अज्ञान राम पर आरोप कर दिया। जो कमी अपने भीतर थी, वह सामनेवाले के खाते में लिख दी गयी। पहले मन्दबुद्धि के लिये यही कहा गया था, कि वह हृदय में कुछ और धर लेता है।

और उनका डर यह है कि अब जाकर मैं शिव को क्या उत्तर दूँगी। हृदय में बहुत भयानक जलन उठ खड़ी हुई।

अब जो होता है, उसका कारण तुलसी साफ़ लिखते हैं: राम ने जान लिया कि सती को दुःख हुआ, तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके दिखाया। कारण सती का दुःख बताया गया है। और प्रभाव भी कुछ ही दिखाया गया। जो दिखाया गया वह पूरा नहीं है।

मार्ग में जाते हुए सती ने पहला कौतुक यह देखा कि आगे राम सीता और लक्ष्मण सहित जा रहे हैं। टीका यहाँ जोड़ती है कि सीता को साथ दिखाने का प्रयोजन यह था कि वियोग और दुःख की जो कल्पना सती के मन में बनी थी, वह दूर हो जाये। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो वहाँ भी लक्ष्मण और सीता सहित राम सुन्दर वेश में थे। जिधर देखती हैं उधर राम विराजमान हैं, और प्रवीण सिद्ध तथा मुनीश्वर उनकी सेवा में लगे हैं।

फिर संख्या बढ़ने लगती है। सती ने अनेक शिव देखे, अनेक ब्रह्मा, अनेक विष्णु, एक से एक बढ़कर असीम प्रभाववाले। जिन दो देवताओं को उनके संदेह ने आमने-सामने रखा था, शिव और विष्णु, वे दोनों अनेक होकर इस चित्र में हैं, साथ में ब्रह्मा भी। और सब तरह-तरह के वेशों में राम के चरणों की वन्दना और सेवा कर रहे हैं। और तुरन्त चित्र सती के अपने ऊपर आ जाता है: उन्होंने अनगिनत और अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं। और जिस-जिस वेश में ब्रह्मा आदि देवता थे, उसी के अनुरूप ये भी थीं।

जो परीक्षा लेने आयी थीं, वे अब उसी दृश्य के भीतर हैं, और एक नहीं, अनगिनत। जहाँ-तहाँ जितने राम देखे, उतने ही शक्तियों सहित सारे देवता दिखे, और संसार के चराचर जीव भी अनेक प्रकार से दिखे। और फिर तुलसी वह बात कहते हैं जिसके लिये यह सारा विस्तार है, और उसे नकार की भाषा में कहते हैं।

अनेक वेश धारण करके देवता राम की पूजा कर रहे हैं, पर राम का दूसरा रूप कहीं नहीं दिखा। सीता सहित राम बहुत-से दिखे, पर उनके वेश अनेक नहीं थे। बाकी सब कुछ रूप बदलता है, राम का रूप नहीं बदलता। और हर बार उस रूप के साथ सीता हैं, यानी जिस खोज से सारा संदेह शुरू हुआ था, उसकी खोयी हुई पत्नी हर चित्र में साथ है।

वही राम, वही लक्ष्मण, वही सीता। यह देखकर सती बहुत डर गयीं। हृदय काँपने लगा, देह की सुध नहीं रही, और वे आँख मूँदकर मार्ग में ही बैठ गयीं।

जो देखने निकली थीं, उन्होंने आँखें बन्द कर लीं। और फिर जब आँख खोलकर देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं था। मार्ग फिर सूना था।

तब वे बार-बार राम के चरणों में सिर नवाकर वहाँ चलीं जहाँ शिव थे। परीक्षा का परिणाम इसी एक क्रिया में लिखा है, बार-बार सिर नवाना। और रास्ता उन्हें उस आदमी की ओर ले जा रहा है जो बड़ के नीचे बैठा नाम जप रहा है।

पास पहुँचीं तो शिव ने हँसकर कुशल पूछी, और फिर वह प्रश्न किया जिससे वे रास्ते भर डर रही थीं: आपने परीक्षा किस प्रकार ली, सारी बात सच-सच कहिये। पहले कुशल, फिर प्रश्न, और प्रश्न में वह शब्द है जिससे बचना अब सम्भव नहीं, सत्य। यह प्रसंग इसी प्रश्न पर रुकता है।

विवेक चार बार, दुराव दो बार

भरद्वाज के आश्रम से त्रेता की उस सड़क तक कोई संदेह बहस से नहीं टूटता। प्रयाग में भरद्वाज ने प्रश्न पूछा, और उत्तर में उन्हें पहले एक घटना सुनायी गयी। रास्ते में सती को शिव ने बहुत बार समझाया, बात हृदय में नहीं लगी, और अन्त में उन्होंने सती को परीक्षा लेने भेज दिया। राम ने प्रणाम किया, नाम बताया, और फिर अपना कुछ प्रभाव दिखा दिया।

दूसरी बात उस शब्द की है जो दो बार आया, दुराव। पहली बार वह एक नीति था, कि गुरु से छिपाने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता। उस नीति के सहारे भरद्वाज ने अपनी लाज छोड़कर बोलना चुना। दूसरी बार वह घटना बनकर आया। जिसके सामने सब खुला है, उसी से छिपाने की कोशिश की गयी।

तीसरी बात विवेक की है, जो इस थोड़े से हिस्से में चार बार आता है। पहली बार वह याज्ञवल्क्य का परिचय है, परम विवेकी। दूसरी बार भरद्वाज की माँग, कि विवेक विचारकर कहिये। तीसरी बार भरद्वाज की नीति, कि दुराव से निर्मल विवेक नहीं होता। और चौथी बार शिव की शर्त, कि विवेक से विचारकर यत्न कीजियेगा। एक ही शब्द परिचय, माँग, नीति और आज्ञा, चारों बनकर आता है। शिव ने सती से विवेक से यत्न करने को कहा था, और सती ने बीच में छिपाव रखा।

और जिस पार्वती-शिव संवाद की घोषणा याज्ञवल्क्य ने की थी, वह अभी शुरू भी नहीं हुआ। यहाँ उसका समय और हेतु कहा गया, यानी यह कहानी कि वैसा ही संदेह सती के मन में कैसे उठा। संवाद अभी आगे है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 44 से 55, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।