रामचरितमानस · बालकाण्ड · भरद्वाज का प्रश्न और सती के मन का संदेह
भरद्वाज का प्रश्न और सती के मन का संदेह
प्रयाग में एक मुनि अपना संदेह कहने से डरते हैं, और उत्तर में उन्हें किसी और का संदेह सुनाया जाता है, जो त्रेता की एक सड़क पर सीता का रूप धरकर चला था।
इस पन्ने पर रामकथा एक बार भी नहीं कही जाती, और फिर भी पूरी पुस्तक यहीं से चलनी शुरू होती है। जो होता है वह इतना ही है कि एक आदमी पूछता है, और उत्तर देनेवाला उत्तर देने के बदले एक दूसरी कथा छेड़ देता है, जिसके भीतर फिर कोई पूछता है। रामचरितमानस की सारी इमारत इसी ढाँचे पर खड़ी है, और वह ढाँचा यहीं, दोहा चवालीस से पचपन के बीच, ईंट-ईंट रखा जाता है।
कहनेवाले और सुननेवाले इस प्रसंग में गिनती के हैं, और उन्हें अलग-अलग पहचान लेना आगे बहुत काम आयेगा। प्रयाग में भरद्वाज पूछते हैं और याज्ञवल्क्य कहते हैं। याज्ञवल्क्य जो कथा छेड़ते हैं वह उमा और शंभु का संवाद है, यानी उसमें कहनेवाले शिव हैं और सुननेवाली पार्वती। और उस संवाद के भीतर एक और आश्रम खुलता है, जहाँ कुंभज ऋषि ने शिव को रामकथा सुनायी थी और शिव ने उन्हें भक्ति का भेद बताया था। तीन जगह, तीन जोड़ियाँ, और हर जोड़ी एक प्रश्न से बनी है। जिस दिन यह क्रम गड्डमड्ड हो जाये उस दिन यह पुस्तक पढ़ी नहीं जा सकती।
और एक बात इस पन्ने की बनावट की है, जो पढ़ते हुए आसानी से छूट जाती है। भरद्वाज का संदेह और सती का संदेह एक ही दो तथ्यों पर खड़ा है। दोनों ने वही देखा है जो सबने देखा है, कि एक आदमी अपनी पत्नी के वियोग में रोया और क्रोध में युद्ध लड़ा, और दोनों उसी से यह नहीं मान पाते कि वह ब्रह्म है। भरद्वाज यह बात कह देते हैं। सती नहीं कहतीं। आगे जो कुछ होता है, वह इसी एक अन्तर से निकलता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- भरद्वाज प्रयाग में रहनेवाले मुनि, जिनका मन पहले से ही राम के चरणों में लगा है और जिन्हें यही नहीं मालूम कि वे राम कौन हैं।
- याज्ञवल्क्य परम विवेकी मुनि, जिन्हें भरद्वाज चरण पकड़कर रोक लेते हैं, और जो पूछनेवाले की चतुराई पहचान लेते हैं।
- शंभु शिव, जो अगस्त्य के आश्रम से लौटते हुए रास्ते में राम को देख लेते हैं और किसी से कुछ नहीं कहते।
- सती दक्ष की पुत्री, शिव के साथ चलती हुईं, जिनके मन में पति की दशा देखकर संदेह उठता है और जो उसे भीतर ही रख लेती हैं।
- राम जो इस पन्ने पर दो बार आते हैं, एक बार वन में पत्नी को खोजते हुए और एक बार हाथ जोड़े हुए, और दोनों बार वही हैं।
- लक्ष्मण जो सामने खड़े छल को देखकर चकित रह जाते हैं और चुप इसलिये रहते हैं कि प्रभु का प्रभाव जानते हैं।
- कुंभज ऋषि अगस्त्य, जिनके आश्रम में शिव कुछ दिन रहे, और जिनका नाम इस कथा में दो बार गवाह की तरह लिया जाता है।
प्रयाग, माघ, और वह सभा जिसका विषय ही यही था
कथा एक जगह के नाम से खुलती है, और वह जगह तीन नदियों का संगम है। वहाँ एक मुनि रहते हैं। तुलसीदास उनका परिचय देने बैठते हैं तो जो क्रम चुनते हैं वह ध्यान देने लायक है, क्योंकि उसमें वह चीज़ पहले आती है जो सबसे बाद में आनी चाहिये थी।
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा । तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
चौपाई १
तापस सम दम दया निधाना । परमारथ पथ परम सुजाना॥
भरद्वाज मुनि प्रयाग में बसते हैं, और उनका राम के चरणों में अत्यन्त अनुराग है। इसके बाद तप आता है, फिर सम और दम, फिर दया, और सबसे अन्त में यह कि परमार्थ के मार्ग में वे बड़े चतुर हैं। यानी जिस आदमी का पूरा प्रश्न ही यह होनेवाला है कि वे राम कौन हैं, उसके बारे में सबसे पहली बात यही कही गयी है कि उसका प्रेम उन्हीं के चरणों में है। प्रेम पहले से मौजूद है। जो नहीं है वह पहचान है। यह कोई नास्तिक का संदेह नहीं है जो अभी उठनेवाला है, यह उस आदमी का संदेह है जो बरसों से जिनका नाम लेता आया है, उन्हीं का ठिकाना पूछ रहा है।
फिर ऋतु आती है। माघ में जब सूर्य मकर राशि पर जाते हैं तो तीर्थराज में सब कोई आ जुटते हैं। देवता, दानव, किन्नर और मनुष्यों की श्रेणियाँ, सब आदर के साथ त्रिवेणी में डुबकी लगाते हैं। माधव के चरणकमलों की पूजा होती है, और अक्षयवट को छूते ही शरीर पुलक उठते हैं। और इन्हीं भीड़ों के बीच एक आश्रम है जिसे तुलसी अलग करके दिखाते हैं, अति पावन, परम रम्य, और श्रेष्ठ मुनियों के मन को भानेवाला। भरद्वाज का आश्रम।
उस आश्रम में जो होता है वह मेले से अलग किस्म की चीज़ है। जो ऋषि-मुनि तीर्थराज में स्नान करने आते हैं, उनका समाज वहीं जुटता है। सुबह उत्साह के साथ स्नान, और उसके बाद आपस में हरि के गुणों की कथा। वह कथा किस-किस विषय पर चलती है, इसकी सूची तुलसी एक ही दोहे में रख देते हैं, और वह सूची इस पूरे प्रसंग की जड़ है।
ब्रह्म निरूपन धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
दोहा ४४
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥ ४४॥
चार चीज़ें गिनायी गयी हैं। ब्रह्म का निरूपण, धर्म का विधान, तत्त्वों के विभाग का वर्णन, और भगवान् की भक्ति, वह भी ज्ञान और वैराग्य से जुड़ी हुई। पहली तीन बातें बँधी हुई बातें हैं, जिन पर हर वर्ष उसी क्रम से बात हो सकती है। चौथी में एक व्यक्ति आ जाता है, क्योंकि भक्ति किसी की होती है। और भरद्वाज का संदेह ठीक इसी सीवन पर बैठा हुआ है। पहली पंक्ति का ब्रह्म और चौथी पंक्ति के भगवान् एक हैं या दो, यही उनका प्रश्न है। बरसों वे यह सभा देखते रहे हैं और यह सीवन उन्हें दिखती रही है।
सार: प्रयाग में माघ का मेला है, और भरद्वाज का आश्रम उसके बीच स्नान करनेवाले मुनियों का ठिकाना है। वहाँ हर सुबह स्नान के बाद ब्रह्म, धर्म, तत्त्व और भक्ति की चर्चा चलती है। जिस मुनि का यह आश्रम है उनका परिचय तुलसी सबसे पहले इस बात से देते हैं कि उनका प्रेम राम के चरणों में है।
एक संदेह, जिसे कहते हुए भय भी आता है और लाज भी
इसी तरह पूरा माघ स्नान होता है और फिर सब अपने-अपने आश्रम लौट जाते हैं। यह हर बरस होता है, और हर बरस बड़ा आनन्द होता है। मकर का स्नान पूरा हुआ, मुनियों के समूह चले। तुलसी यह सब एक ही चौपाई में निपटा देते हैं, जिससे अगली बात का धक्का साफ़ लगे। क्योंकि अगली बात यह है कि एक बरस भरद्वाज ने जानेवालों में से एक को जाने नहीं दिया।
एक बार भरि मकर नहाए । सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
चौपाई २
जागबलिक मुनि परम बिबेकी । भरद्वाज राखे पद टेकी॥
एक बार पूरे मकर भर स्नान करके सब मुनीश्वर अपने आश्रमों को सिधार गये। और याज्ञवल्क्य मुनि को, जिन्हें तुलसी परम बिबेकी कहते हैं, भरद्वाज ने चरण पकड़कर रोक लिया। रोकने का यह तरीका देखने लायक है। उन्होंने न्योता नहीं दिया, आग्रह नहीं किया, चरण पकड़ लिये। जो आदमी पूरे बरस की सभा का मेज़बान है, वह जाते हुए अतिथि के पाँव थाम लेता है, और अभी उसने अपनी बात कही भी नहीं है। और उस अतिथि के परिचय में जो एक शब्द रखा गया है, बिबेक, वह इस पूरे पन्ने पर चार बार लौटकर आयेगा।
फिर वही होता है जो एक आश्रम में होना चाहिये। आदर से चरणकमल धोये गये, बहुत पवित्र आसन पर बिठाया गया, पूजा हुई, और मुनि के सुयश का बखान हुआ। इतना सब निबटाने के बाद भरद्वाज बोलते हैं, और तुलसी उनकी वाणी को दो विशेषण देते हैं, अति पुनीत और मृदु। इतनी तैयारी के बाद जो पहला वाक्य निकलता है, वह यह है।
नाथ एक संसउ बड़ मोरें । करगत बेदतत्त्व सबु तोरें॥
चौपाई ३
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौं न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥
हे नाथ, मेरे मन में एक बड़ा संदेह है, और वेदों का सारा तत्त्व आपकी मुट्ठी में है। यही एक बात कहकर उन्होंने बता दिया कि उन्होंने इस आदमी को क्यों रोका। पर इसके बाद जो आधी पंक्ति आती है वह पूरे प्रसंग की सबसे मानवीय पंक्ति है। उसे कहते हुए मुझे भय भी लगता है और लाज भी आती है। पोद्दार की टीका इन दोनों को खोलकर बताती है, भय इस बात का कि कहीं वे यह न समझ लें कि परीक्षा ली जा रही है, और लाज इस बात की कि इतनी आयु बीत गयी और अब तक यह नहीं जाना।
और फिर तराजू का दूसरा पलड़ा। जो न कहूँ तो बड़ा अकाज होता है। यानी चुप रहने की कीमत बोलने की कीमत से बड़ी है, और यह हिसाब उन्होंने पहले ही लगा लिया है। अब वे उस नीति को सामने रखते हैं जिसके सहारे वे बोलने जा रहे हैं, और वह नीति संतों की भी है, श्रुति की भी, पुराण की भी और मुनियों की भी।
संत कहहिं असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
दोहा ४५
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥ ४५॥
गुरु से छिपाव करने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता। दुराव, यह शब्द याद रखने लायक है। इस पन्ने पर यह दूसरी बार आयेगा, और दूसरी बार जिसके साथ आयेगा वह इसी नियम की उलटी दिशा में चलकर देखेगी कि नियम सच है। यहाँ फ़िलहाल इतना ही कि भरद्वाज अपनी लाज को नीति के नीचे दबा देते हैं और अपना अज्ञान खोलकर रख देते हैं। कहते हैं, यही सोचकर मैं अपना मोह प्रकट करता हूँ, अब सेवक पर कृपा करके उसे हर लीजिये।
अब वे अपना प्रश्न बनाते हैं, और बनाने का ढंग किसी मुक़दमे जैसा है। पहले वे प्रमाण रखते हैं। राम नाम का असीम प्रभाव संतों ने गाया है, पुराणों ने गाया है, उपनिषदों ने गाया है। फिर एक और प्रमाण, और यह सबसे भारी है, कि अविनाशी शंभु, जो स्वयं ज्ञान और गुणों की राशि हैं, निरन्तर उसी नाम को जपते रहते हैं। फिर एक तीसरा प्रमाण, जो हर सुननेवाला जानता है, कि संसार में चार प्रकार के जीव हैं और काशी में मरने पर सब परमपद पा जाते हैं। और फिर इन तीनों को जोड़ देते हैं।
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥
चौपाई ४
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥
हे मुनिराज, वह भी राम की ही महिमा है, क्योंकि शिव दया करके वहाँ जो उपदेश देते हैं वह राम नाम का ही है। यानी काशी की सारी मुक्ति भी उसी एक नाम से लटकी हुई है। तीनों प्रमाण एक जगह आकर खड़े हो गये, और अब प्रश्न पूछा जा सकता है। हे प्रभो, मैं आपसे पूछता हूँ कि वे राम कौन हैं। हे कृपानिधान, मुझे समझाकर कहिये। ध्यान दीजिये कि उन्होंने यह नहीं पूछा कि राम कैसे हैं या क्या करते हैं। उन्होंने पता पूछा है।
और तुरन्त वे यह भी बता देते हैं कि उलझन कहाँ है। एक राम तो अवध के राजा के कुमार हैं, जिनका चरित्र सारा संसार जानता है। इसके बाद वे उस चरित्र में से केवल दो बातें उठाते हैं, और इन्हीं दो बातों पर इस पूरे प्रसंग का बोझ है। उन्होंने स्त्री के विरह में अपार दुःख उठाया, और क्रोध आने पर युद्ध में रावण को मार डाला। दुःख और रोष। आदमी होने की दो सबसे पक्की पहचानें। जो न रोया हो और न कभी क्रोध में आया हो, उसे आदमी मानना कठिन है।
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
दोहा ४६
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥ ४६॥
वही राम हैं या कोई और, जिन्हें त्रिपुरारि जपते हैं। आप सत्य के धाम हैं और सर्वज्ञ हैं, विवेक विचारकर कहिये। बिबेक दूसरी बार आया। पहली बार वह याज्ञवल्क्य के परिचय में था, दूसरी बार वह प्रश्न की शर्त है। और यह पूरा दोहा एक चीज़ और बता देता है, कि भरद्वाज ने अपना संदेह घटाकर नहीं रखा है। उन्होंने उसे उसके पूरे आकार में, दो नामों के बीच खड़ा करके, सामने रख दिया है।
सार: माघ बीतने पर सब मुनि लौट गये, पर भरद्वाज ने याज्ञवल्क्य को चरण पकड़कर रोक लिया। पूजा और स्तुति के बाद उन्होंने अपना संदेह कहा, यह मानते हुए कि कहने में भय और लाज दोनों हैं, पर गुरु से छिपाव करने पर निर्मल विवेक नहीं होता। प्रश्न यह है कि जिन राम को शिव जपते हैं, वे अवध के राजकुमार ही हैं या कोई दूसरे।
उत्तर के बदले, किसी और का संदेह
प्रश्न के बाद भरद्वाज एक विनती और जोड़ते हैं, कि जिस प्रकार मेरा यह भारी भ्रम मिटे, वह कथा आप विस्तार से कहिये। विस्तार से। वे जानते हैं कि इस भ्रम का इलाज संक्षेप नहीं है। और याज्ञवल्क्य जो सबसे पहला काम करते हैं वह बोलना नहीं है। वे मुसकराते हैं।
उस मुसकान का कारण वे ख़ुद खोल देते हैं। रघुपति की प्रभुता को तो आप जानते ही हैं। आप मन, वचन और कर्म से राम के भक्त हैं, और आपकी चतुराई मैं समझ गया। आप राम के गूढ़ गुण सुनना चाहते हैं, इसीलिये ऐसा प्रश्न किया है मानो बड़े ही मूढ़ हों। यह उलाहना नहीं है, यह पहचान है। और यह पहचान उसी बात से मिलती है जो पन्ने की पहली ही पंक्ति में लिखी थी, कि इस आदमी का अनुराग राम के चरणों में है। जिसका प्रेम पहले से है, उसका अज्ञान असली नहीं हो सकता। प्रश्न असली है, पूछनेवाले का मूढ़पन नहीं।
फिर वे कहना शुरू करते हैं, और पहली बात यह कि आदरपूर्वक मन लगाकर सुनिये। जो कथा वे कहने जा रहे हैं उसका परिचय वे दो उपमाओं से देते हैं, और दोनों एक ही चौपाई में हैं, एक के बाद एक, और वे एक-दूसरे से बिलकुल उलटी हैं। पहली यह कि महामोह विशाल महिषासुर है और रामकथा कराल कालिका है। यह हिंसा का चित्र है। इससे पता चलता है कि मोह को समझाया नहीं जाता, वह मारा जाता है, और मारनेवाली कथा है। और उसके तुरन्त बाद दूसरी उपमा आती है।
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥
चौपाई ५
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥
रामकथा चन्द्रमा की किरणों के समान है, जिसे संतरूपी चकोर पान करते रहते हैं। वही कथा जो अभी कालिका थी, अब चाँदनी है। किसके लिये क्या है, यह सुननेवाले पर निर्भर है। मोह के सामने वह तलवार है और संत के सामने वह पेय है। दोनों उपमाएँ एक ही साँस में रखकर तुलसी यह तय कर देते हैं कि आगे जो कहा जायेगा उसमें कोमलता भी होगी और संहार भी।
और फिर उसी चौपाई का दूसरा आधा वह काम करता है जिसके लिये यह पूरा पन्ना बना है। ऐसा ही संदेह भवानी ने किया था, और तब महादेव ने विस्तार से उसका उत्तर दिया था। यानी जिस आदमी ने अपना संदेह कहने में भय और लाज दोनों झेली, उससे पहला वाक्य यह कहा गया कि यह संदेह पहले भी किसी को हुआ है, और वह कोई जगज्जननी थीं। संदेह का उत्तर यहाँ तर्क नहीं है। उत्तर यह है कि दूसरा भी इसी जगह अटका था, और उसका क्या हुआ, यह सुनिये।
कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद।
दोहा ४७
भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद॥ ४७॥
अब मैं अपनी बुद्धि के अनुसार वही उमा और शंभु का संवाद कहता हूँ। वह जिस समय और जिस हेतु से हुआ, हे मुनि, वह सुनिये, आपका विषाद मिट जायेगा। इस दोहे में दो शब्द बहुत काम के हैं, समय और हेतु। क्योंकि जो अब आगे आता है वह संवाद नहीं है। संवाद की घोषणा हो चुकी है और वह इस पन्ने पर शुरू नहीं होता। जो आता है वह यह है कि उस संवाद की नौबत क्यों आयी। पूछनेवाली के मन में प्रश्न कैसे पैदा हुआ, यह कथा पहले कही जायेगी, और उसके बाद कहीं जाकर उत्तर आयेगा।
यह ठहरकर देखने लायक बनावट है। एक आदमी ने प्रश्न पूछा। उसे उत्तर के बदले एक दूसरे व्यक्ति के प्रश्न की जन्मकथा सुनायी जा रही है। और उस जन्मकथा में हम पायेंगे कि वह प्रश्न भी उन्हीं दो तथ्यों से बना था जिनसे भरद्वाज का बना है।
सार: याज्ञवल्क्य मुसकराकर कहते हैं कि भरद्वाज की चतुराई वे समझ गये, प्रश्न मूढ़ता से नहीं गूढ़ गुण सुनने की इच्छा से पूछा गया है। रामकथा को वे मोह के लिये कालिका और संत के लिये चाँदनी बताते हैं, और फिर बताते हैं कि ऐसा ही संदेह भवानी को हुआ था। दोहा सैंतालीस में वे उमा-शंभु संवाद कहने की घोषणा करते हैं, पर पहले उसका समय और हेतु सुनाते हैं।
कुंभज के आश्रम से लौटते हुए
कथा त्रेतायुग में जाती है। एक बार शिव कुंभज ऋषि के पास गये। साथ में जगज्जननी भवानी सती थीं। ऋषि ने उन्हें सम्पूर्ण जगत् का ईश्वर जानकर पूजा। और फिर उस आश्रम में जो हुआ वह एक तरफ़ा नहीं था, दोनों ओर से लेन-देन हुआ, और यह बात आगे गवाही की तरह काम आयेगी।
मुनिवर ने रामकथा विस्तार से कही और महेश ने उसे परम सुख मानकर सुना। फिर ऋषि ने शिव से सुन्दर हरिभक्ति पूछी और शिव ने उन्हें अधिकारी पाकर वह कही। यानी एक ही आश्रम में शिव सुननेवाले भी हुए और कहनेवाले भी। रघुनाथ के गुणों की गाथाएँ कहते-सुनते कुछ दिन वे वहीं रह गये। फिर मुनि से विदा माँगकर दक्षकुमारी के साथ घर की ओर चले।
अब तुलसी एक वाक्य से समय जोड़ देते हैं। उन्हीं दिनों पृथ्वी का भार उतारने के लिये श्रीहरि ने रघुवंश में अवतार लिया था, और वे अविनाशी उस समय पिता के वचन से राज्य छोड़कर, उदासीन वेश में, दण्डकवन में विचर रहे थे। जो कथा अभी-अभी आश्रम में सुनी गयी है, उसका नायक उसी वन में चल रहा है जिसके पास से यह जोड़ा लौट रहा है। शिव के मन में जो चलने लगता है, वह इसी संयोग से चलता है।
और जो चलता है वह इच्छा नहीं, समस्या है। शिव हृदय में विचारते जा रहे हैं कि दर्शन किस प्रकार हों। प्रभु ने गुप्त रूप से अवतार लिया है, मेरे जाने से सब लोग जान जायेंगे। यह बड़ी बारीक बात है। अड़चन अपनी नहीं है, अड़चन उनकी है जिनका भेद खुल जायेगा। जिसे देखने की इच्छा है, वही देखने जाने से रुक रहा है, और रुकने का कारण उसी का हित है जिसे देखना है। और इसी हालत को तुलसी एक सोरठे में बाँधते हैं, जिसमें वे अपना नाम भी डाल देते हैं।
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।
सोरठा ४८ (ख)
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥ ४८ (ख)॥
शंकर के हृदय में बड़ी खलबली है, और सती इस भेद को नहीं जानतीं। तुलसीदास कहते हैं कि दर्शन का लोभ ऐसा है कि मन में डर है और नेत्र ललचाये हुए हैं। इस एक सोरठे में तीन बातें एक साथ रख दी गयी हैं। एक, कि एक ही शरीर में दो उलटी चीज़ें चल रही हैं, डरता हुआ मन और लालची आँखें। दो, कि यह हालत इतनी अनोखी है कि कवि को बीच में आकर अपने नाम से गवाही देनी पड़ी। और तीन, जो सबसे भारी है, कि साथ चलनेवाली को इसमें से कुछ नहीं मालूम।
वह तीसरी बात पूरे प्रसंग की कील है। आगे सती जो कुछ देखेंगी, वह इसी अधूरी जानकारी में देखेंगी। उन्हें पति का व्यवहार दिखेगा, पति का कारण नहीं। और जिस मौन ने उनका संदेह बनाया, वह मौन किसी दुर्भाव से नहीं आया था, वह किसी तीसरे की रक्षा के लिये था।
सार: त्रेता में शिव सती के साथ कुंभज ऋषि के आश्रम गये, वहाँ रामकथा सुनी और भक्ति सुनायी, कुछ दिन रहे और फिर लौटे। उन्हीं दिनों हरि ने रघुवंश में अवतार लिया था और दण्डकवन में विचर रहे थे। शिव दर्शन चाहते हैं पर अवतार के गुप्त रहने के कारण जाने से रुकते हैं, और सती इस भेद को नहीं जानतीं।
जिससे सब डरते हैं, वह रोता हुआ मिला
शिव का विचार आगे बढ़ता है और वह पूरा का पूरा किसी और के हिसाब पर चलता है। रावण ने अपनी मृत्यु मनुष्य के हाथ से माँगी थी, और प्रभु ब्रह्मा के उस वचन को सच करना चाहते हैं। इसलिये यह अवतार मनुष्य की तरह ही चलेगा। और इसके तुरन्त बाद वह पंक्ति आती है जो किसी भी प्रेमी की हो सकती थी, कि यदि मैं न जाऊँ तो पछतावा रह जायेगा। विचार करते हैं और कोई युक्ति नहीं बैठती। बनाने से बात बनती ही नहीं।
इसी तरह ईश सोच के वश हो गये। और ठीक यहीं तुलसी एक ऐसा जोड़ लगाते हैं जो पढ़ते हुए बिजली की तरह गिरता है। उसी समय रावण ने जाकर नीच मारीच को साथ लिया, और वह तुरन्त कपटमृग बन गया। तेही समय। जिस क्षण कैलास का स्वामी यह सोच रहा है कि दर्शन कैसे हों, उसी क्षण लंका का राजा वह चाल चल रहा है जिससे दर्शन का अवसर बनेगा। दोनों को एक-दूसरे की ख़बर नहीं है। दोनों एक ही घड़ी में काम कर रहे हैं।
फिर वह सब हो जाता है जो होना था, और तुलसी उसे बहुत थोड़े में कहते हैं। मूढ़ ने छल करके वैदेही को हर लिया, और उसे प्रभु का प्रभाव जैसा है वैसा मालूम नहीं था। मृग को मारकर भाई सहित हरि आश्रम लौटे, और उसे देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया। एक चौपाई में हरण भी है, अज्ञान भी है, लौटना भी है और आँसू भी हैं।
और इसके बाद वह पंक्ति आती है जिस पर सारा प्रसंग टिका हुआ है, और जो बहुत सीधी है। रघुनाथ मनुष्यों की भाँति विरह से व्याकुल हैं, और दोनों भाई वन में खोजते हुए फिर रहे हैं। जिनके कभी कोई संयोग और वियोग नहीं है, उनमें विरह का दुःख प्रत्यक्ष देखा गया। तुलसी इस विरोधाभास को छिपाते नहीं हैं। वे उसे किसी के पूछने से पहले ही, अपनी ओर से, साफ़ शब्दों में लिख देते हैं। और लिखते ही एक दोहा रख देते हैं, जो चेतावनी है।
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
दोहा ४९
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥ ४९॥
रघुपति का चरित्र अत्यन्त विचित्र है, उसे परम सुजान ही जानते हैं। जो मन्दबुद्धि हैं वे मोह के वश होकर हृदय में कुछ और ही धर बैठते हैं। इस दोहे की जगह पर ध्यान दीजिये। यह विरह के वर्णन के ठीक बाद है और उस दृश्य के ठीक पहले जिसमें एक देखनेवाला आता है। यानी दृश्य दिखाने से पहले तुलसी दो तरह के देखनेवालों की सूची टाँग देते हैं, परम सुजान और मतिमंद, और बता देते हैं कि दूसरे वाला हृदय में कछु आन धर लेता है। कुछ ही चौपाइयों बाद एक बहुत बड़ी हस्ती हृदय में कछु आन धरेंगी, और उनका नाम पहले से नहीं लिया गया है, पर उनका ख़ाना पहले से बना हुआ है।
अब देखनेवाला आता है। शंभु ने उसी अवसर पर राम को देखा, और उनके हृदय में बहुत भारी हर्ष उत्पन्न हुआ। छबि के समुद्र को उन्होंने नेत्र भरकर देखा। जिन नेत्रों को सोरठे में लालची कहा गया था, वे अब भर गये। पर आगे जो होता है वही उनका बड़प्पन है। कुसमय जानकर उन्होंने चिन्हारी नहीं की। समय ठीक नहीं है, इसलिये परिचय नहीं दिया। वह आदमी सामने खड़ा है जिसे देखने के लिये रास्ते भर मन डरता और आँखें ललचाती रही थीं, और अब मिलने पर भी वे आगे नहीं बढ़ते।
बोलते वे फिर भी हैं, पर किसी से नहीं। जय सच्चिदानंद जग पावन, इतना कहकर कामदेव का नाश करनेवाले चल दिये। यह प्रणाम भी है और घोषणा भी, और यह उस आदमी के सामने की गयी है जो अपनी पत्नी को खोज रहा है और रो चुका है। इसके बाद वे सती के साथ चलते जाते हैं और बार-बार पुलकित होते हैं। मुँह चुप हो गया, शरीर चुप नहीं हुआ। और वही शरीर अब किसी और के सामने गवाही देने लगता है, जिसे कुछ भी मालूम नहीं है।
सार: शिव सोच में हैं कि दर्शन कैसे हों, और उसी समय रावण मारीच को लेकर कपटमृग रचता है। सीता का हरण होता है, राम मनुष्य की तरह विरह में व्याकुल होकर वन में खोजते फिरते हैं। दोहा उनचास कह देता है कि यह चरित्र परम सुजान ही जानते हैं और मन्दबुद्धि हृदय में कुछ और धर लेते हैं। शिव उन्हें देखते हैं, नेत्र भरकर देखते हैं, पर समय ठीक न जानकर परिचय नहीं देते और जय सच्चिदानंद कहकर आगे बढ़ जाते हैं।
सती के मन में जो उठ खड़ा हुआ
सतीं सो दसा संभु कै देखी । उर उपजा संदेहु बिसेषी॥
चौपाई ६
संकरु जगतबंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥
सती ने शंभु की वह दशा देखी और उनके हृदय में बड़ा संदेह उत्पन्न हुआ। पहली आधी पंक्ति में कारण साफ़ लिखा है। जो देखा वह राम नहीं थे, जो देखा वह शिव की दशा थी। संदेह पति के व्यवहार से जन्मा है, उस व्यक्ति से नहीं जिसे प्रणाम किया गया। और उसके बाद जो तर्क चलता है वह किसी लापरवाह मन का तर्क नहीं है, वह आदर से भरा हुआ है। शंकर की सारा जगत् वन्दना करता है, वे जगत् के ईश्वर हैं, देवता, मनुष्य और मुनि सब उनके आगे सिर नवाते हैं।
इसीलिये अगली बात चोट करती है। उन्होंने एक राजपुत्र को प्रणाम किया, और प्रणाम करते हुए उसे सच्चिदानंद परधाम कहा। यानी शब्द भी सती ने सुन लिये हैं। और फिर वह जो सबसे भीतरी गवाही है, कि उसकी छबि देखकर वे मग्न हो गये और अब तक उनके हृदय की प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती। अजहुँ, यानी अभी इस घड़ी भी, चलते-चलते। सती का प्रमाण शिव का वचन नहीं है, शिव का शरीर है। वे उसे बगल में चलते हुए पढ़ रही हैं।
और अब वे अपना प्रश्न बनाती हैं, और वह प्रश्न शास्त्र की भाषा में बनता है, किसी चिढ़ में नहीं।
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
दोहा ५०
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥ ५०॥
जो ब्रह्म व्यापक है, माया से रहित है, अजन्मा है, अगोचर है, इच्छारहित है और भेदरहित है, और जिसे वेद भी नहीं जानते, क्या वह देह धारण करके मनुष्य हो सकता है। छह विशेषण गिनाये गये हैं और उनमें एक अपना काम चुपचाप करता है, अभेद। जिसमें भेद नहीं है वह देह कैसे लेगा, क्योंकि देह सबसे पहले एक सीमा है, एक किनारा है, यहाँ तक मैं और उसके आगे दूसरा। और इसके बाद जिन वेदों का नाम आता है, वे भी उन्हीं के पक्ष में गवाही देते हैं, कि वेद भी उसे नहीं जानते।
फिर वे अपना दायरा और कसती हैं, और यहीं उनकी बुद्धि दिखती है। जो विष्णु देवताओं के हित के लिये मनुष्यशरीर धारण करते हैं, वे भी त्रिपुरारि की ही तरह सर्वज्ञ हैं। यानी अवतार को वे अस्वीकार नहीं कर रहीं। उनका प्रश्न इससे कहीं छोटा और कहीं तीखा है। क्या वे ज्ञान के धाम, श्रीपति, असुरों के शत्रु, अज्ञानी की तरह स्त्री को खोजेंगे। यही प्रश्न प्रयाग में दूसरे शब्दों में पूछा जा चुका है। भरद्वाज ने दुःख और रोष गिनाये थे, सती खोज गिनाती हैं। तथ्य वही हैं और अटकन वही है।
और वे दूसरी ओर से भी बँधी हुई हैं। शंभु की वाणी झूठी नहीं हो सकती, और यह सब कोई जानता है कि शिव सर्वज्ञ हैं। यानी एक ओर शास्त्र है और दूसरी ओर पति का वचन, और दोनों को एक साथ सच नहीं माना जा सकता। इसी से मन में अपार संदेह हो गया और हृदय में किसी तरह प्रबोध नहीं होता। जो आदमी दो सच्चाइयों के बीच फँसा हो, उसे कोई तीसरी बात सुझाना कठिन है, और यह कठिनाई आगे शिव भी भुगतेंगे।
फिर एक पंक्ति आती है जो पूरे प्रसंग को मोड़ देती है। यद्यपि भवानी ने प्रकट कुछ नहीं कहा, पर अन्तर्यामी हर सब जान गये। कहा कुछ नहीं। यहीं प्रयाग वाला नियम अपना काम करने लगता है। भरद्वाज ने लाज सहते हुए कह दिया था, और उसी से उन्हें कथा मिली। यहाँ नहीं कहा गया, और नहीं कहने से कुछ छिपा भी नहीं, क्योंकि सुननेवाला अन्तर्यामी है। छिपाने से केवल इतना हुआ कि प्रश्न अनकहा रह गया और उत्तर बिन माँगे आया।
शिव जो कहते हैं वह तर्क नहीं है, गवाही है। वे संदेह को नाम देते हैं, इसे नारि सुभाऊ कहते हैं और कहते हैं कि ऐसा संदेह हृदय में कभी नहीं रखना चाहिये। और फिर वे प्रमाण देते हैं, और प्रमाण के लिये उसी आश्रम में लौटते हैं जहाँ से ये दोनों अभी-अभी चले हैं। जिनकी कथा कुंभज ऋषि ने गायी और जिनकी भक्ति मैंने मुनि को सुनायी, वही मेरे इष्टदेव रघुबीर हैं, जिनकी सेवा धीर मुनि सदा करते हैं। आश्रम में जो लेन-देन हुआ था, उसके दोनों आधे यहाँ गवाह बनकर खड़े हो जाते हैं।
इसके बाद एक छन्द आता है जिसमें शिव उस परिचय को पूरा करते हैं। ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निर्मल मन से जिनका निरन्तर ध्यान करते हैं, और वेद, पुराण तथा आगम नेति कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, वही राम हैं, व्यापक ब्रह्म, समस्त भुवनों के स्वामी, माया के धनी, जो अपने भक्तों के हित के लिये स्वतन्त्र रूप से रघुकुल में अवतरित हुए हैं। ध्यान दीजिये कि सती ने वेद को अपने पक्ष का गवाह बनाया था, कि वेद भी उसे नहीं जानते। शिव उन्हीं वेदों को दूसरी ओर से पेश करते हैं, कि वे नेति कहकर उन्हीं की कीर्ति गाते हैं। न जानना और गाते रहना, दोनों एक ही वेद में हैं।
पर यह सब बेकार जाता है। सोरठा इक्यावन इसे बहुत थोड़े में कहता है। यद्यपि शिव ने बहुत बार कहा, उपदेश हृदय में लगा नहीं। और तब महादेव मन में हरि की माया का बल जानकर हँसकर बोले। यही इस पूरे प्रसंग का सबसे शान्त क्षण है। जिस घड़ी उन्होंने कारण पहचाना, उसी घड़ी उन्होंने समझाना छोड़ दिया, क्योंकि माया का इलाज बात नहीं है। और हँसी इसलिये आयी कि अब वे किसी को दोष नहीं दे रहे।
सार: शिव की दशा देखकर सती के मन में संदेह उठता है, और वह संदेह शास्त्र की भाषा में बनता है, कि अभेद ब्रह्म देह धारण कर मनुष्य कैसे होगा और सर्वज्ञ विष्णु अज्ञानी की तरह स्त्री को क्यों खोजेंगे। पर शिव का वचन भी झूठा नहीं हो सकता, इसलिये दोनों ओर से बँधकर संदेह अपार हो जाता है। वे कहती कुछ नहीं, पर अन्तर्यामी शिव जान लेते हैं और अपने इष्टदेव का परिचय देते हैं। बहुत बार कहने पर भी बात हृदय में नहीं बैठती।
तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू । तौ किन जाइ परीछा लेहू॥
चौपाई ७
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं । जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥
यदि मन में इतना ही संदेह है तो जाकर परीक्षा क्यों नहीं ले लेतीं। और फिर वह आधी पंक्ति, जिसमें पूरा प्रेम रखा हुआ है। तब तक मैं इसी बड़ की छाँह में बैठा हूँ, जब तक आप मेरे पास लौट आयें। वे रोकते नहीं। वे भेजते भी नहीं। वे केवल अपना पता बता देते हैं। जिस आदमी ने अभी-अभी हार मानी है, वह जाते हुए साथी को यह बताना नहीं भूलता कि लौटकर उसे कहाँ पाना है।
और आगे वे जो शर्त रखते हैं, वह इस पन्ने की सबसे सुन्दर गूँज है। जिस तरह यह भारी मोह और भ्रम जाये, विवेक से विचारकर वही यत्न कीजियेगा। प्रयाग में भरद्वाज ने याज्ञवल्क्य से कहा था, कहहु बिबेकु बिचारि। यहाँ शिव कहते हैं, करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी। एक ही माँग, एक शब्द बदलकर। वहाँ विवेक बोलना था, यहाँ विवेक करना है। और जिनसे करने को कहा जा रहा है, वे आज्ञा पाकर चल तो देती हैं, पर चलते-चलते सोचती हैं कि भाई, करूँ क्या। योजना कोई नहीं है। परीक्षा का निश्चय पहले हुआ है, परीक्षा का ढंग बाद में सूझेगा।
इधर शिव अकेले रह जाते हैं और मन में अनुमान लगाते हैं, और वह अनुमान बहुत कड़वा है। दक्षकन्या का कल्याण नहीं है। जब मेरे कहने से भी संदेह नहीं जाता तो विधाता ही उलटे हैं, और भलाई नहीं है। यह उन्होंने उनके सामने नहीं कहा। उनके सामने उन्होंने बड़ की छाँह की बात कही थी। यह बात उन्होंने पीठ पीछे, अपने से कही है।
और फिर वे वही करते हैं जो बचा है। जो राम ने रच रखा है वही होगा, तर्क करके कौन शाखा बढ़ाये। ऐसा कहकर वे हरि का नाम जपने लगे। यह चित्र देर तक साथ रहता है। एक आदमी बड़ के नीचे बैठा उसी का नाम जप रहा है जिसकी परीक्षा लेने उसकी पत्नी गयी है। और सती वहाँ गयीं जहाँ सुख के धाम प्रभु थे।
रास्ते में वे बार-बार हृदय में विचार करती हैं और फिर एक रूप चुनती हैं। वे सीता का रूप धारण करके उसी मार्ग पर आगे होकर चलने लगती हैं जिससे नरभूप आ रहे थे। यह चुनाव सोचने लायक है। परीक्षा इस बात की लेनी है कि पत्नी के वियोग में रोनेवाला आदमी ईश्वर है या नहीं, और परीक्षा के लिये वे पत्नी का ही रूप लेती हैं। यदि वह साधारण शोकाकुल पति हुआ तो दौड़ पड़ेगा। पूरी परीक्षा एक ही क्षण में निपट जायेगी।
पर जो पहले देखता है वह राम नहीं हैं। लक्ष्मण ने उमा का बनाया हुआ वेष देखा और चकित रह गये, और हृदय में बड़ा भ्रम हुआ। यहाँ तुलसी वही शब्द लगाते हैं जो सती के संदेह के साथ लगाया था। सती के हृदय में संदेहु बिसेषी उपजा था, लक्ष्मण के हृदय में भ्रम बिसेषा हुआ। दोनों के सामने कुछ ऐसा है जिसका मतलब नहीं खुलता, और दोनों चुप हैं। पर आगे की आधी पंक्ति बता देती है कि यह एक ही चुप्पी नहीं है। वे कुछ कह नहीं सके, अत्यन्त गम्भीर हो गये, क्योंकि मतिधीर लक्ष्मण प्रभु का प्रभाव जानते हैं। एक चुप्पी भरोसे की है और एक चुप्पी छिपाव की।
फिर वे आते हैं जिनके लिये यह सब रचा गया है। सब देखनेवाले और सबके अन्तर की जाननेवाले सुरस्वामी सती का कपट जान गये। अन्तरजामी, यह शब्द इस पन्ने पर दूसरी बार आया है। पहली बार वह शिव के लिये था, जब उन्होंने बिना कहे जान लिया था। अब वही शब्द राम के लिये है। सती ने एक अन्तर्यामी से छिपाया, और छिपाकर सीधे दूसरे के सामने जा खड़ी हुईं।
और अब वह शब्द लौटता है जिसे दोहा पैंतालीस में टाँक दिया गया था। सती ने वहाँ भी दुराव करना चाहा। भरद्वाज ने कहा था कि गुरु से दुराव करने पर निर्मल विवेक नहीं होता, और उसी नियम पर चलकर उन्होंने अपनी लाज छोड़ दी थी। यहाँ उसी नियम की दूसरी दिशा है। दुराव बना रहता है, और विवेक नहीं आता। तुलसी बीच में आकर एक टिप्पणी भी कर जाते हैं, देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ, वही बात जो थोड़ी देर पहले शिव ने कही थी। फिर राम अपनी माया का बल हृदय में बखानकर हँसकर कोमल वाणी से बोलते हैं। हँसकर। थोड़ी देर पहले शिव भी हँसकर ही बोले थे। दोनों जगह हँसी वहीं आयी है जहाँ समझाना छोड़ा गया है।
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू । पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
चौपाई ८
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू । बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥
प्रभु ने हाथ जोड़कर प्रणाम किया, और पिता सहित अपना नाम बताया। यही पूरा उत्तर है, और वह उत्तर देने से पहले दिया गया है। संदेह यह था कि क्या एक राजा का बेटा ब्रह्म हो सकता है, और वे बिना किसी हिचक के अपने पिता का नाम लेकर अपना परिचय देते हैं। वे मनुष्य होने से इनकार नहीं करते। वे उसे सामने रख देते हैं।
और फिर वे पूछते हैं, वृषकेतु कहाँ हैं, और आप इस वन में अकेली किस कारण फिर रही हैं। सामने जो खड़ी हैं वे सीता के वेश में हैं, और वे उनसे उनके पति का पता पूछ रहे हैं, यानी शिव का। उन्होंने न भेद खोला, न वेश पर उँगली रखी, न कोई नाम लिया। उन्होंने उस स्त्री से बात की जो वेश के नीचे है, जैसे वेश वहाँ है ही नहीं। परीक्षा लेनेवाली को कहीं पकड़ा नहीं गया, फिर भी कुछ बचा नहीं।
दोहा तिरपन इसका असर बताता है, और वह असर डाँट का नहीं है। राम के वचन मृदु थे और गूढ़ भी, और उन्हें सुनकर बड़ा संकोच उत्पन्न हुआ। संकोच, यानी वह चीज़ जो दण्ड से नहीं आती, शिष्टाचार से आती है। सती डरती हुई महेश के पास चलीं और हृदय में बड़ी चिन्ता थी।
सार: शिव कहते हैं कि संदेह है तो जाकर परीक्षा ले लीजिये, तब तक मैं बड़ की छाँह में बैठा हूँ, और विवेक से विचारकर वह यत्न कीजियेगा। सती बिना योजना के चलती हैं और रास्ते में सीता का रूप धरकर राम के सामने पड़ती हैं। लक्ष्मण चकित होकर चुप रह जाते हैं, और राम कपट जानकर भी कुछ नहीं खोलते, बल्कि हाथ जोड़कर पिता सहित अपना नाम बताते हैं और पूछते हैं कि वृषकेतु कहाँ हैं। उन कोमल और गूढ़ वचनों से सती को संकोच होता है और वे डरती हुई लौट चलती हैं।
जिधर देखा, उधर वही
लौटते हुए सती अपने से जो कहती हैं, वह इस पूरे प्रसंग का सबसे साफ़ वाक्य है, और वह किसी उपदेशक ने नहीं कहा, उन्होंने ख़ुद कहा है। मैंने शंकर का कहना नहीं माना, और अपना अज्ञान राम पर आरोप कर दिया। निज अग्यानु राम पर आना। जो कमी अपने भीतर थी, वह सामनेवाले के खाते में लिख दी गयी। यही उस मतिमंद का पूरा विवरण है जिसकी चेतावनी दोहा उनचास में पहले से दी जा चुकी थी।
और उसके बाद उनका डर किसी दण्ड का नहीं है। अब जाकर मैं क्या उत्तर दूँगी, यही उनका डर है। उन्हें उस बातचीत से डर लग रहा है जो बड़ की छाँह में उनका इन्तज़ार कर रही है। हृदय में अत्यन्त दारुण दाह उत्पन्न हो गया। यह जलन ग्लानि की है, भय की नहीं।
और अब जो होता है, उसका कारण तुलसी बिलकुल साफ़ लिखते हैं। राम ने जान लिया कि सती को दुःख हुआ, तब उन्होंने अपना कुछ प्रभाव प्रकट करके दिखाया। दुःख हुआ, इसलिये। झूठ बोला गया, इसलिये नहीं। जो अब दिखेगा वह दण्ड नहीं है, वह दिलासा है। और उसमें कछु शब्द भी पड़ा हुआ है, अपना कुछ प्रभाव। जो दिखाया गया वह पूरा नहीं है।
मार्ग में जाते हुए सती ने पहला कौतुक यह देखा कि आगे राम जा रहे हैं, श्री और भाई सहित। टीका यहाँ जोड़ती है कि सीता को साथ दिखाने में एक प्रयोजन है, कि वियोग और दुःख की जो कल्पना उनके मन में बनी थी वह टूट जाये। फिर उन्होंने पीछे मुड़कर देखा, तो वहाँ भी भाई और सीता सहित प्रभु सुन्दर वेश में थे। जिधर देखती हैं उधर प्रभु विराजमान हैं, और प्रवीण सिद्ध तथा मुनीश्वर उनकी सेवा में लगे हैं।
फिर संख्या बढ़ने लगती है, और वह उसी ओर बढ़ती है जिधर सती का तर्क खड़ा था। उन्होंने अनेक शिव देखे, अनेक ब्रह्मा, अनेक विष्णु, एक से एक बढ़कर असीम प्रभाववाले। जिन देवताओं के नाम लेकर उन्होंने अपना प्रश्न बनाया था, वे सब इस चित्र के भीतर हैं, और सब चरणों की वन्दना और सेवा कर रहे हैं। और अगले ही दोहे में वह चित्र उनके अपने ऊपर आ जाता है। उन्होंने अनगिनत और अनुपम सती, ब्रह्माणी और लक्ष्मी देखीं, और जिस-जिस वेश में देवता थे, उसी के अनुरूप ये भी थीं।
यानी जो परीक्षा लेने आयी थीं, वे अब उस दृश्य के भीतर हैं जिसकी परीक्षा लेने आयी थीं, और एक नहीं, अनगिनत। जहाँ-तहाँ जितने रघुपति देखे, उतने ही शक्तियों सहित सारे देवता दिखे, और संसार के चराचर जीव भी अनेक प्रकार से दिखे। पूरी सृष्टि उस मार्ग पर दोहरा दी गयी है। और अब तुलसी वह एक बात कहते हैं जिसके लिये यह सारा विस्तार किया गया था, और वे उसे नकार की भाषा में कहते हैं।
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥
चौपाई ९
अवलोके रघुपति बहुतेरे । सीता सहित न बेष घनेरे॥
अनेक वेश धारण करके देवता प्रभु की पूजा कर रहे हैं, पर राम का दूसरा रूप कहीं नहीं दिखा। रघुपति बहुत सारे दिखे, सीता सहित दिखे, पर उनके वेश अनेक नहीं थे। यही उस प्रश्न का उत्तर है जो दोहा पचास में पूछा गया था। पूछा गया था कि क्या भेदरहित ब्रह्म देह धारण करके मनुष्य हो सकता है। उत्तर यह मिला कि यहाँ एक देह है जो अनगिनत होकर भी नहीं बदलती। बाकी सब कुछ रूप बदलता है, यही एक नहीं बदलता। और हर बार उस रूप के साथ सीता हैं, यानी ठीक वही बात जिससे सारा संदेह शुरू हुआ था, अब हर चित्र में स्थायी रूप से रखी हुई है।
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भईं सभीता॥
चौपाई १०
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं । नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥
वही रघुबर, वही लक्ष्मण, वही सीता। और यह देखकर सती अत्यन्त भयभीत हो गयीं। ध्यान दीजिये कि डर संख्या से नहीं लगा। डर एकरूपता से लगा। अनेक शिव और अनेक ब्रह्मा देखकर वे डरी नहीं थीं, वहाँ केवल विस्मय था। डर उस घड़ी आया जब सोइ और सोइ लगातार लौटने लगा। हृदय काँपने लगा, देह की सुध नहीं रही, और वे आँख मूँदकर मार्ग में ही बैठ गयीं।
यह छोटी सी बात बहुत बड़ी है। जो देखने निकली थीं, वे आँख बन्द कर लेती हैं। परीक्षा आँख से शुरू हुई थी, आँख पर ही ख़त्म होती है। और फिर जब उन्होंने आँख खोलकर देखा तो वहाँ कुछ भी नहीं था। दृश्य जितनी चुपचाप आया था, उतनी ही चुपचाप हटा लिया गया। न कोई घोषणा, न कोई उपदेश। बस वही सूना मार्ग।
और तब वे वह करती हैं जो पूरे प्रसंग में उन्होंने अब तक नहीं किया था। बार-बार राम के चरणों में सिर नवाकर वहाँ चलीं जहाँ गिरीश थे। परीक्षा का परिणाम इसी एक क्रिया में लिखा हुआ है। कोई वचन नहीं है, कोई स्वीकार नहीं है, केवल पुनि पुनि नाइ। और फिर वह रास्ता, जो पूरे रास्ते उन्हें उस आदमी की ओर ले जा रहा है जो बड़ के नीचे बैठा उसी का नाम जप रहा है जिसके चरणों में अभी-अभी सिर झुका है।
गईं समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
दोहा ५५
लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥ ५५॥
पास पहुँचीं तो महेश ने हँसकर कुशल पूछी, और फिर वह प्रश्न किया जो वे रास्ते भर से डर रही थीं। परीक्षा किस प्रकार ली, सारी बात सच-सच कहिये। पहले कुशल, फिर प्रश्न। और प्रश्न में वह शब्द है जिससे बचना अब असम्भव है, सत्य। जो आदमी सब जानता है, वह पूछ रहा है। और जिसने अभी-अभी देखा है कि छिपाना कहीं भी काम नहीं आता, उसे उत्तर देना है। यह प्रसंग वहीं रुक जाता है, ठीक उसी जगह जहाँ से आगे की सारी कथा चलती है।
सार: लौटते हुए सती स्वयं कह देती हैं कि उन्होंने शंकर का कहना नहीं माना और अपना अज्ञान राम पर आरोप कर दिया। उनका दुःख जानकर राम अपना कुछ प्रभाव दिखाते हैं, और मार्ग में जिधर वे देखती हैं उधर राम, लक्ष्मण और सीता दिखते हैं, अनगिनत शिव, ब्रह्मा, विष्णु और अनगिनत सती भी। सब कुछ अनेक वेशों में है, केवल राम का दूसरा रूप कहीं नहीं। यही एकरूपता उन्हें डरा देती है, वे आँख मूँदकर बैठ जाती हैं, और आँख खोलने पर कुछ नहीं दिखता। लौटकर शिव के पास पहुँचती हैं तो शिव हँसकर पूछते हैं कि परीक्षा किस प्रकार ली, सच-सच कहिये।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग को एक साथ पढ़ने पर सबसे ऊपर जो चीज़ रह जाती है, वह यह है कि यहाँ किसी को कुछ समझाया नहीं जाता। प्रयाग में भरद्वाज ने प्रश्न पूछा, और उत्तर में उन्हें एक घटना सुनायी गयी। रास्ते में सती को शिव ने बार-बार समझाया, और वह हृदय में लगा नहीं, और अन्त में उन्होंने भी समझाना छोड़कर भेज दिया। राम ने भी एक शब्द नहीं समझाया, उन्होंने प्रणाम किया, नाम बताया और फिर दिखा दिया। इस पूरे पन्ने पर एक भी संदेह तर्क से नहीं टूटता।
दूसरी बात उस एक शब्द की है जो दो बार आया, दुराव और दुराऊ। पहली बार वह एक नियम था, कि गुरु से छिपाने पर हृदय में निर्मल विवेक नहीं होता, और उस नियम के सहारे एक आदमी ने अपनी लाज ताक पर रखकर बोलना चुना। दूसरी बार वह घटना बनकर आया, कि जिसके सामने सब खुला है उसी से छिपाने की कोशिश की गयी। जो नियम पहले एक वाक्य में कहा गया था, वह पूरे पन्ने पर चलकर सच होता हुआ दिखाया गया है। यही तुलसी का ढंग है। वे नियम पहले रख देते हैं और फिर उसे घटित करके दिखाते हैं, और बीच में कहीं याद नहीं दिलाते।
तीसरी बात विवेक की है, जो इस थोड़े से हिस्से में चार बार आता है। पहली बार वह याज्ञवल्क्य का परिचय है, परम बिबेकी। दूसरी बार वह भरद्वाज की माँग है, कहहु बिबेकु बिचारि। तीसरी बार वह दोहा पैंतालीस का वचन है, कि दुराव से बिमल बिबेक नहीं होता। और चौथी बार वह शिव की शर्त है, करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी। एक ही शब्द परिचय, माँग, नियम और आज्ञा, चारों बनकर आता है। और जिसने उसे केवल सुना, उसे वह मिला। जिसने उसे करने की ठानी और बीच में छिपाव रख लिया, उसे बाद में मार्ग पर आँख मूँदकर बैठना पड़ा।
और एक बात इस पन्ने की बनावट की है, जो अन्त तक पहुँचकर ही दिखती है। जिस उमा-शंभु संवाद की घोषणा दोहा सैंतालीस में हुई थी, वह अभी शुरू भी नहीं हुआ। यहाँ जो कुछ कहा गया वह उसका समय और हेतु था, यानी वह कहानी कि पूछनेवाली के मन में प्रश्न कहाँ से आया। रामचरितमानस अपनी सबसे बड़ी बातचीत शुरू करने से पहले इतना लम्बा रास्ता तय करता है, और यह देर जान-बूझकर है। पहले प्रश्न कैसे बनता है, यह दिखाया जाता है, और उसके बाद कहीं जाकर उत्तर आता है। इसीलिये इस पन्ने पर राम की कथा एक बार भी नहीं कही जाती, और फिर भी इसे छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ४४ से ५५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।