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रंगभूमि की सभा और राजाओं का संवाद

रामचरितमानस · बालकाण्ड · रंगभूमि की सभा और राजाओं का संवाद

रंगभूमि की सभा और राजाओं का संवाद

दो राजकुमार सभा में आते हैं। कोई उनमें वीरता देखता है, कोई अपना काल, कोई अपना बच्चा, और कोई अपने इष्ट। उन्हीं के सामने बैठे राजाओं की बातचीत उनके अपने मन खोल देती है।

सीता के स्वयंवर को देखने चलने की बात उठी है। किसे बड़ाई मिलेगी, इसका उत्तर अभी आनेवाला है। लक्ष्मण उस बड़ाई को गुरु की कृपा से जोड़ते हैं, मुनि प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं, और दोनों भाई उनके साथ धनुषयज्ञ की रंगभूमि की ओर चलते हैं। नगर में उनके पहुँचने का समाचार फैलते ही घरों के काम छूट जाते हैं। जो जहाँ है, उसकी उत्सुकता अब उसी सभा में जाकर बैठना चाहती है। जनक को इस उमड़ती भीड़ के बीच प्रत्येक आगन्तुक के बैठने का प्रबन्ध करना है।

तुलसीदास सभा भर जाने पर हमें उसके भीतर के अलग-अलग मन भी दिखाते हैं। एक ही राम को देखकर किसी का साहस हर्षित होता है और किसी का अभिमान डरता है। विद्वानों को विराट् स्वरूप दिखता है, योगियों को शान्त परम तत्त्व, और जनक तथा रानियों को अपना बच्चा। फिर राजाओं की बातचीत सामने आती है। वहाँ हार की आशंका है, युद्ध की डींग है और दर्शन पाकर जन्म सफल मान लेने का आनन्द भी। धनुष के विषय में जो कुछ कहा जा रहा है, वह अभी राजाओं का अनुमान और विश्वास है। सभा की इस प्रतीक्षा के अन्त में जनक सीता को बुला भेजेंगे।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम और लक्ष्मण कोसल के साँवले और गोरे कुमार, जो मुनियों के साथ धनुषयज्ञ की सभा में आते हैं।
  • मुनि गुरु और उनके साथ के ऋषि। पोद्दार की टीका गुरु को विश्वामित्र नाम से पहचानती है।
  • जनक सभा के आतिथ्य का प्रबन्ध करनेवाले राजा, जो अन्त में सीता को बुला भेजते हैं।
  • सीता जिनके रामविषयक स्नेह को कवि अकथनीय कहते हैं और जिन्हें सखियाँ आदर से लिवा चलती हैं।
  • सभागत राजा राम को देखकर अपनी हार माननेवाले, अभिमान से युद्ध की बात करनेवाले और धर्मशील हरिभक्त राजा।
  • नगरवासी और अन्य दर्शक अनेक अवस्थाओं और भावों के लोग, जिनमें प्रत्येक को प्रभु अपनी भावना के अनुसार दिखते हैं।

गुरु की कृपा से शुरू होती यात्रा

चलकर सीता का स्वयंवर देखा जाय, ईश्वर किसे बड़ाई देते हैं, यह भी देखा जाय। आरम्भ की इसी बात पर लक्ष्मण अपना उत्तर रखते हैं। वे गुरु को नाथ कहकर सम्बोधित करते हैं और कहते हैं कि जिस पर आपकी कृपा होगी, वही यश का पात्र होगा। सभा में अभी किसी का बल परखा नहीं गया है। लक्ष्मण की दृष्टि उस कृपा पर है जिसके बिना वे बड़ाई का दावा करना उचित नहीं समझते।

सीय स्वयंबरु देखिअ जाई । ईसु काहि धौं देइ बड़ाई॥
लखन कहा जस भाजनु सोई । नाथ कृपा तव जापर होई॥

चौपाई १

पोद्दार की टीका यहाँ बड़ाई का आशय धनुष तोड़ने का श्रेय बताती है। लक्ष्मण की बात सुनकर सभी मुनि हर्षित हो जाते हैं। उस वाणी को सुनने का सुख उन्हें आशीर्वाद देने की ओर ले जाता है। छोटी-सी बातचीत का क्रम बहुत साफ़ है: स्वयंवर देखने का प्रस्ताव, गुरु की कृपा में लक्ष्मण का भरोसा, और उस भरोसे को सुनकर मुनियों का आशीष। इसी के बाद कृपालु राम मुनियों के समूह के साथ यज्ञशाला देखने चलते हैं।

दोनों भाइयों के रंगभूमि में आने की खबर नगरवासियों तक पहुँचती है। बालक, जवान और बूढ़े, स्त्रियाँ और पुरुष, सब घर के काम भुलाकर चल देते हैं। तुलसी एक-एक अवस्था का नाम लेकर भीड़ को हमारे सामने रखते हैं। उसमें केवल राजकार्य से जुड़े लोग नहीं हैं। घर सँभालनेवाले भी हैं और घर के वे सदस्य भी जिनकी आयु आपस में बहुत भिन्न है। दर्शन की उत्सुकता सबको एक ही दिशा में ले चलती है।

जनक देखते हैं कि भीड़ बहुत बढ़ गयी है। वे अपने विश्वासपात्र सेवकों को बुलवाते हैं और तुरन्त लोगों के पास पहुँचने को कहते हैं। आज्ञा का उद्देश्य प्रत्येक व्यक्ति को उचित आसन दिलाना है। इतना बड़ा आयोजन है, फिर भी राजा की नज़र इस बात पर जाती है कि आये हुए लोग कहाँ बैठेंगे। बुलाये गये सेवकों का काम भीड़ को देखकर पूरा नहीं होगा, उन्हें लोगों के पास जाना है और हर किसी के लिये स्थान निश्चित करना है।

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह बैठारे नर नारि।
उत्तम मध्यम नीच लघु निज निज थल अनुहारि॥ २४०॥

दोहा २४०

सेवक कोमल और नम्र वचन कहकर स्त्री-पुरुषों को बैठाते हैं। दोहा उस सभा की श्रेणियाँ उत्तम, मध्यम, नीच और लघु नामों से गिनाता है और उनके अनुसार स्थान देने की बात कहता है। यह जनक की सभा के बैठने का विवरण है। उसमें सब श्रेणियों का उल्लेख आता है और सेवकों की बोली के लिये एक ही अपेक्षा रहती है, वह मृदु और विनीत हो। आसन देने के साथ उनका बोलना भी आतिथ्य का अंग है।

इस व्यवस्था को पढ़ते समय सभा का फैलाव समझ में आता है। बालक से वृद्ध तक नगरवासियों का निकल पड़ना एक ओर है, और उनके लिये अलग-अलग स्थान निश्चित होना दूसरी ओर। जनक की आज्ञा उन दोनों को जोड़ती है। आनेवाला अपनी उत्सुकता के साथ आया है, उसका स्वागत किसी सेवक की नम्र वाणी से होता है। इसी व्यवस्थित भीड़ के बीच राजकुमारों का रूप प्रकट होगा। तुलसी पहले देखनेवालों को बैठाते हैं, फिर हमारी दृष्टि उन भाइयों की ओर ले जाते हैं जिन्हें देखने सब आये हैं।

लक्ष्मण यश का आधार गुरु की कृपा को कहते हैं और मुनि आशीर्वाद देते हैं। नगर के सभी आयु वर्गों के स्त्री-पुरुष रंगभूमि की ओर आते हैं। जनक की आज्ञा से सेवक हर श्रेणी के आगन्तुक को नम्र वचन कहकर उसके नियत स्थान पर बैठाते हैं।

एक रूप के सामने अनेक भाव

उसी अवसर पर दोनों राजकुमार आते हैं। उनके शरीरों पर मानो मनोहरता स्वयं छा रही है। साँवला और गोरा रंग, गुणों की प्रचुरता, चतुराई और श्रेष्ठ वीरता, इन सबको कवि साथ रखते हैं। जो रूप मन को खींच रहा है, उसके साथ उनका स्वभाव और सामर्थ्य भी बताया जाता है। सामने राजाओं का समाज है, और उसके बीच दोनों भाई ऐसे सुशोभित हैं जैसे तारों के बीच दो पूर्ण चन्द्रमा आ गये हों।

राजकुअँर तेहि अवसर आए । मनहुँ मनोहरता तन छाए॥
गुन सागर नागर बर बीरा । सुंदर स्यामल गौर सरीरा॥

चौपाई २

दो चन्द्रमाओं की उपमा दोनों भाइयों को साथ दिखाती है। सभा में उनकी शोभा अलग से पहचान में आती है, फिर भी देखनेवालों का अनुभव एक जैसा नहीं रहता। तुलसी अब दर्शक के भाव को सामने लाते हैं। जिस मन में जैसी भावना है, प्रभु का रूप उसी को वैसा दिखाई पड़ता है। इस बात के बाद जो सूची खुलती है, वह सभा के लोगों का परिचय भी है और उनकी दृष्टि का भी।

राज समाज बिराजत रूरे । उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे॥
जिन्ह कें रही भावना जैसी । प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥

चौपाई ३

महान् रणधीर राम के रूप में वीररस का शरीर धारण करना देखते हैं। वीरता उनके लिये परिचित गुण है, और वही यहाँ साक्षात् सामने दिख रही है। कुटिल राजाओं के भीतर भय उठता है। उन्हें प्रभु की मूर्ति अत्यन्त भयानक लगती है। दोनों समूह एक ही राजसमाज में हैं, लेकिन एक के देखने में वीरता की पहचान है, दूसरे के देखने में अपने मन की कुटिलता के साथ आया हुआ डर।

कुछ असुर छल से राजाओं का वेश धरकर वहाँ उपस्थित हैं। उनके लिये यह भय और भी स्पष्ट है: वे प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखते हैं। उनका बाहरी वेश राजाओं का है, उनका अनुभव मृत्यु का है। कवि यहाँ उनमें से किसी का नाम नहीं लेते। फिर नगरवासियों की दृष्टि आती है। उन्हें दोनों भाई मनुष्यों के भूषण और नेत्रों को सुख देनेवाले लगते हैं। जिस समाचार पर वे घर का काम छोड़कर आये थे, उसका सुख अब उनकी आँखों के सामने है।

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ निज निज रुचि अनुरूप।
जनु सोहत सिंगार धरि मूरति परम अनूप॥ २४१॥

दोहा २४१

स्त्रियाँ हृदय में हर्षित होकर अपनी-अपनी रुचि के अनुसार देखती हैं। उनके अनुभव के लिये कवि शृंगाररस की उपमा रखते हैं, जैसे उसी ने अनुपम मूर्ति धारण कर ली हो। यहाँ भी रुचि का भेद बना रहता है। सभी के हर्ष को कहते हुए तुलसी प्रत्येक की अपनी भावना के लिये जगह रखते हैं। उस रूप की अनुपमता सामूहिक आनन्द में भी व्यक्तिगत अनुभव बनी हुई है। सब देख रही हैं, और हर एक अपनी रुचि से देख रही है।

विद्वानों को प्रभु विराट् रूप में दिखाई देते हैं। उस विराट् के बहुत-से मुख, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। कवि इस दर्शन को अंगों की बहुलता से खोलते हैं, जिससे उसका विस्तार समझ में आता है। इसके ठीक बाद जनक के कुटुम्बियों की दृष्टि आती है। उन्हें वे प्रिय सगे सम्बन्धियों के समान लगते हैं। विराट् के विस्तार के पास ही सम्बन्ध की आत्मीयता रखी गयी है। एक ही उपस्थिति ज्ञान की दृष्टि को भी भरती है और अपनेपन की दृष्टि को भी।

सहित बिदेह बिलोकहिं रानी । सिसु सम प्रीति न जाति बखानी॥
जोगिन्ह परम तत्त्वमय भासा । सांत सुद्ध सम सहज प्रकासा॥

चौपाई ४

जनक और रानियाँ उन्हें अपने बच्चों के समान देखते हैं। उस प्रेम का वर्णन नहीं हो सकता। राजाओं से भरी रंगभूमि में यह वात्सल्य अपना पूरा स्थान पाता है। जिन कुमारों के बल का अनुमान दूसरे लगा रहे हैं, उन्हीं पर राजा और रानियों का स्नेह बच्चे के लिये उमड़ता है। यहाँ जनक का राजपद उनके देखने की पहचान नहीं बनता। इस चौपाई में उनकी पहचान उस प्रीति से होती है जिसका कहना कठिन है।

योगियों को वे परम तत्त्व के रूप में दिखाई देते हैं। उस अनुभव के गुण स्पष्ट कहे गये हैं: शान्त, शुद्ध, सम और सहज प्रकाशमान। प्रकाश के लिये उन्हें किसी दूसरे सहारे की आवश्यकता नहीं है। हरिभक्त दोनों भाइयों को अपने इष्टदेव के समान देखते हैं, सभी सुख देनेवाले। योगियों की तत्त्वदृष्टि और भक्तों के इष्ट का सुख अपने-अपने शब्दों में व्यक्त होते हैं। तुलसी किसी एक दर्शक का अनुभव लेकर अन्य सबके देखने को उसके भीतर समेट नहीं देते।

फिर सीता के भाव का उल्लेख आता है। राम को जिस भाव से वे देखती हैं, उस स्नेह और सुख को कथन में नहीं लाया जा सकता। कवि इस अनुभव का नाम भर लेकर आगे नहीं बढ़ते। वे कहते हैं कि सीता स्वयं उसे हृदय में अनुभव करती हैं, पर कह नहीं सकतीं, तब कोई कवि उसे कैसे कहे। यहाँ उनकी दृष्टि के अनुभव की बात चल रही है। उन्हें सभा में बुलाने और सखियों के लिवा चलने का प्रसंग आगे आयेगा।

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ॥
एहि बिधि रहा जाहि जस भाऊ। तेहिं तस देखेउ कोसलराऊ॥

चौपाई ५

इस प्रकार भावों की पूरी परिक्रमा फिर उसी बात पर आकर ठहरती है जिससे वह शुरू हुई थी: जिसका जैसा भाव रहा, उसने कोसलराज को वैसा देखा। उसके बाद कवि राजसमाज के बीच साँवले और गोरे कुमारों की शोभा फिर कहते हैं। वे विश्व के नेत्र चुरानेवाले हैं। इतने भिन्न अनुभवों के बीच यह एक बात सबको जोड़ती है कि दृष्टि उन्हीं की ओर लगी हुई है। किसी को भय है, किसी को सुख, और किसी के लिये उस सुख का वर्णन भी सम्भव नहीं।

रणधीरों को वीररस, कुटिल राजाओं को भय और छद्मवेशी असुरों को काल दिखाई देते हैं। नगरवासी, स्त्रियाँ, विद्वान्, जनक के कुटुम्बी, राजा और रानियाँ, योगी तथा भक्त अपने-अपने भाव से देखते हैं। सीता का स्नेह और सुख उनके अपने कथन से भी परे है।

सिर से चरण तक दोनों कुमार

अब कवि उस रूप के पास ठहरते हैं जिसे इतने लोगों ने इतने भावों से देखा। दोनों मूर्तियाँ सहज मनोहर हैं। उनके लिये करोड़ों कामदेवों की उपमा भी छोटी पड़ती है। यह सहजता आगे के पूरे वर्णन में साथ रखनी चाहिये। वस्त्र और आभूषण एक-एक करके सामने आयेंगे, पर उनके आने से पहले ही मनोहरता कही जा चुकी है। मुख शरद् के चन्द्रमा को भी पीछे कर देनेवाले हैं और कमल के समान नेत्र हृदय को प्रिय लगते हैं।

मुख की शोभा के बाद चितवन आती है। वह कामदेव के मन को भी हर लेती है, हृदय को बहुत भाती है, और फिर भी पूरी कही नहीं जा सकती। तुलसी बार-बार देखने और कहने की दूरी तक पहुँचते हैं। जो आँख के लिये इतना निकट है, उसके लिये वाणी पर्याप्त नहीं पड़ती। इसी स्वीकार के साथ वे गालों को देखते हैं, कानों में झूमते कुण्डलों को, सुन्दर ठोड़ी और अधरों को, और फिर उस मुख से निकलनेवाली कोमल वाणी को सुनाते हैं।

कुण्डलों की चञ्चलता के पास वाणी की मृदुता रखी हुई है। फिर हँसी की उज्ज्वलता आती है, जो चन्द्रमा की किरणों को भी तुच्छ कर देती है। भौंहों की वक्रता है, मनोहर नासिका है और चौड़े ललाट पर झलकते तिलक हैं। बालों के सामने भौंरों की पंक्तियाँ लजा जाती हैं। पोद्दार की टीका इन बालों को काले और घुँघराले कहकर समझाती है। मुख के इस चित्र में दृष्टि, आभूषण, मुसकान और तिलक सब अपनी अलग छटा लिये उपस्थित हैं।

पीत चौतनीं सिरन्हि सुहाईं । कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं॥
रेखें रुचिर कंबु कल गीवाँ । जनु त्रिभुवन सुषमा की सीवाँ॥

चौपाई ६

सिरों पर पीली चौकोनी टोपियाँ सुशोभित हैं। उनके बीच-बीच में फूलों की कलियाँ बनी हैं, जिन्हें टीका काढ़ी हुई कलियाँ बताती है। कवि की दृष्टि इस छोटे अलंकरण तक जाती है। रंगभूमि की विशाल सभा, राजाओं का समूह और विराट् का दर्शन देखने के बाद हम अब टोपी के बीच की फूलकली देख रहे हैं। रूप का आकर्षण ऐसी छोटी बनावट में भी ठहरता है। पीला रंग आगे वस्त्रों और यज्ञोपवीतों में फिर दिखेगा।

गले शंख के समान सुन्दर हैं और उन पर मनोहर तीन रेखाएँ हैं। तुलसी को वे रेखाएँ मानो तीनों लोकों की सुन्दरता की सीमा जान पड़ती हैं। उपमा में संख्या का मेल कितना स्पष्ट है: गले की तीन रेखाएँ और तीनों लोकों की सुषमा। इसके आगे वक्षस्थल पर गजमुक्ताओं के सुन्दर कण्ठे तथा तुलसी की मालाएँ हैं। आभूषणों का उल्लेख करते हुए कवि दोनों का नाम रखते हैं, जिससे हम उन्हें एक ही अस्पष्ट हार समझकर आगे न बढ़ जायँ।

कुंजर मनि कंठा कलित उरन्हि तुलसिका माल।
बृषभ कंध केहरि ठवनि बल निधि बाहु बिसाल॥ २४३॥

दोहा २४३

इन मालाओं के नीचे शरीर की दृढ़ता दिखाई देती है। कंधे वृषभ के समान हैं। उनके खड़े होने की शान सिंह की-सी है, और विशाल भुजाएँ बल का भण्डार हैं। रूप के वर्णन में वीरता इसी तरह बनी रहती है। पहले चितवन, अधर और कोमल वाणी आयी थी; अब कंधों, खड़े होने की मुद्रा और भुजाओं से सामर्थ्य दिखता है। दोनों भाई सुन्दर भी हैं और श्रेष्ठ वीर भी, जैसा उनके आगमन पर ही कहा गया था।

कमर में तरकस और पीले वस्त्र बँधे हैं। हाथों में बाण हैं, बायें सुन्दर कंधों पर धनुष हैं, और पीले यज्ञोपवीत शोभा पा रहे हैं। बाण, तरकस और धनुष अपनी-अपनी जगह पर दिखाई देते हैं। इन्हें बस शस्त्रधारी कह देने से उस रूप की यह रचना छूट जाती। वस्त्र और जनेऊ का पीला रंग सिर की टोपियों से जुड़ जाता है। कंधों की दृढ़ता बताने के बाद उन्हीं पर रखे धनुष भी हमारे सामने आ जाते हैं।

नख से शिख तक समस्त अंगों पर महान् शोभा छायी है। यह कहकर तुलसी रूप का वर्णन पूरा करते हैं और देखनेवालों पर लौट आते हैं। लोग सुखी हैं, आँखें एकटक लगी हैं, पुतलियाँ तक नहीं हिलतीं। अभी जिन अंगों पर कवि की दृष्टि चलती रही, वे अब पूरी मूर्ति के रूप में सभा के सामने हैं। उस मूर्ति को देखने में लोगों का ध्यान ऐसा ठहरा है कि कवि उसका परिणाम नेत्रों की इस अचलता से बताते हैं।

मुख, नेत्र, चितवन और हँसी से लेकर पीली टोपियों की फूलकलियों तक रूप खुलता है। शंख जैसे गले, तीन रेखाएँ, गजमुक्ताओं के कण्ठे, तुलसी की मालाएँ, दृढ़ कंधे, सिंह जैसी मुद्रा, विशाल भुजाएँ और पीले वस्त्रों के साथ धनुष-बाण दिखाई देते हैं। लोगों की आँखें एकटक ठहर जाती हैं।

जनक का स्वागत और सबकी ओर मुख

जनक दोनों भाइयों को देखकर हर्षित होते हैं। वे मुनि के पास जाकर उनके चरणकमल पकड़ लेते हैं। आगन्तुकों को आसन दिलाने की व्यवस्था उन्होंने पहले की थी, अब गुरु के प्रति अपना आदर स्वयं प्रकट करते हैं। रूप को देखकर सभा सुखी है और राजा के हर्ष की पहली अभिव्यक्ति यह प्रणाम है। उसके बाद विनती होती है। जनक अपनी कथा सुनाते हैं और मुनि को पूरी रंगभूमि दिखाते हैं।

राजा ने अपनी कथा में क्या-क्या कहा, उसका विस्तार यहाँ नहीं खुलता। हमारे सामने उनके विनय करने और यज्ञशाला दिखाने का क्रम आता है। दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ-जहाँ जाते हैं, सब उन्हें आश्चर्य से देखते हैं। दर्शकों की दृष्टि स्थान के साथ चलती है। पहले सभा में उनके आगमन पर नेत्र उठे थे, अब रंगभूमि दिखाये जाने के समय वे जहाँ पहुँचते हैं, उसी ओर चकित होकर देखा जाता है।

निज निज रुख रामहि सबु देखा। कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ । राजाँ मुदित महासुख लहेऊ॥

चौपाई ७

इसी देखने में एक विशेष बात होती है। सब लोगों को राम अपनी-अपनी ओर मुख किये दिखाई देते हैं। तुलसी साथ ही कहते हैं कि इसका विशेष रहस्य कोई नहीं जान सका। अनुभव स्पष्ट है, उसका रहस्य अनखुला है। सभा में अनेक स्थानों पर लोग हैं और प्रत्येक अपने को सम्मुख पाता है। कवि इस बात को कहकर कोई उपाय या कारण नहीं जोड़ते। हम भी उसी विस्मय में ठहरते हैं जिसमें वे दर्शक राम को देख रहे हैं।

भावों के वर्णन में हर व्यक्ति ने अपने मन के अनुसार प्रभु को देखा था। यहाँ अपनी ओर मुख किये देखने की बात है। पहले अनुभवों की विविधता थी, अब सबके लिये सम्मुखता है। तुलसी दोनों बातों को अलग-अलग स्थान पर रखते हैं। इससे दृश्य की आत्मीयता बढ़ती है: इतनी बड़ी सभा में बैठे हुए भी किसी व्यक्ति का अनुभव यह नहीं बनता कि राम का मुख केवल कहीं और की ओर है।

मुनि जनक से कहते हैं कि रंगभूमि की रचना बहुत सुन्दर है। यह सुनकर राजा प्रसन्न होते हैं और बड़ा सुख पाते हैं। पोद्दार की टीका मुनि को विश्वामित्र बताकर उनकी निःस्पृहता, विरक्ति और ज्ञान का स्मरण कराती है। ऐसे मुनि के मुख से आयोजन की प्रशंसा सुनने का जनक को विशेष आनन्द है। राजा ने आदर से सब दिखाया था, अब उसे देखनेवाले गुरु की स्वीकृति मिलती है।

सब मंचन्ह तें मंचु एक सुंदर बिसद बिसाल।
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल॥ २४४॥

दोहा २४४

सब मञ्चों में एक मञ्च अधिक सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल है। राजा मुनि और दोनों भाइयों को वहीं बैठाते हैं। स्थान के ये तीनों गुण दोहे में साथ आते हैं। वह सुन्दर भी है, निर्मल उज्ज्वल भी और पर्याप्त विशाल भी। जनक के आतिथ्य का यह क्रम पूरा होता है: प्रणाम, विनती, रंगभूमि दिखाना, मुनि की प्रशंसा से सुख पाना और उन्हें दोनों कुमारों सहित श्रेष्ठ आसन पर बैठाना। अब राजाओं की आँखों के सामने प्रभु विराजमान हैं।

जनक मुनि के चरण पकड़कर अपनी बात कहते हैं और रंगभूमि दिखाते हैं। सबको राम अपनी ओर मुख किये दिखाई देते हैं, जिसका रहस्य कोई नहीं जानता। मुनि रचना की प्रशंसा करते हैं और राजा उन्हें दोनों भाइयों सहित सबसे सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल मञ्च पर बैठाते हैं।

मन की हार और अभिमान की हँसी

प्रभु को देखकर राजा हृदय में हार जाते हैं। इस बार चन्द्रमा और तारों की उपमा फिर आती है, पर उसका काम बदल गया है। आगमन के समय राजसमाज में दोनों भाई दो पूर्ण चन्द्रमाओं की तरह शोभित थे। अब पूर्ण चन्द्रमा के उदय पर तारों का प्रकाश फीका पड़ने से राजाओं की मनोदशा समझायी जाती है। सामने बैठे राम को देखकर उनका उत्साह उतर गया है। उनकी चर्चा का आरम्भ इसी भीतरी हार से होता है।

प्रभुहि देखि सब नृप हियँ हारे । जनु राकेस उदय भएँ तारे॥
असि प्रतीति सब के मन माहीं । राम चाप तोरब सक नाहीं॥

चौपाई ८

उनके मन में विश्वास हो गया है कि धनुष राम ही तोड़ेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं। यह अभी उनकी प्रतीति है। दो राजकुमारों को देखने के बाद वे सामने आनेवाली परीक्षा का परिणाम सोच रहे हैं। पोद्दार की टीका इस विश्वास को उनके तेज से जोड़ती है। बाहर सभा में बैठना बना हुआ है, भीतर अपने विजय पाने की आशा कम हो गयी है। इसी से आगे की बातचीत में लौट चलने का स्वर सुनाई पड़ता है।

वे एक और सम्भावना कहते हैं। शिव का विशाल धनुष न टूटे, तब भी सीता राम के ही गले में जयमाल डालेंगी। इस कथन में उनका अपना निराश निश्चय है। धनुष टूटने और न टूटने, दोनों सम्भावनाओं में वे राम के पक्ष में परिणाम देख रहे हैं। टीका इसी आशय को खोलती है कि दोनों तरह अपनी हार और श्रीराम की विजय जान पड़ती है। सभा में कोई जयमाल अभी डाली नहीं गयी है, राजा अपने मन की बात कह रहे हैं।

इस विचार के बाद वे एक-दूसरे को भाई कहकर घर लौटने को कहते हैं। यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने-अपने घर चलें। इन चार शब्दों में राजाओं का अपने विषय में अनुमान आ जाता है। वे केवल विवाह की आशा चूकने की बात नहीं कर रहे, अपनी प्रतिष्ठा और सामर्थ्य का भी हिसाब लगा रहे हैं। राम को देखने का प्रभाव इतना है कि वे उस हानि को अभी से अपने लौटने के साथ जोड़ देते हैं।

यह बात सुनकर दूसरे राजा हँसते हैं। तुलसी उन्हें अविवेक से अन्धे और अभिमानी कहते हैं। उनका उत्तर चुनौती भरा है: धनुष टूट भी जाय तो विवाह होना कठिन है, और बिना तोड़े कौन राजकुमारी को ब्याह सकता है। पहले समूह ने धनुष न टूटने पर भी राम के गले में माला पड़ने की सम्भावना कही थी। ये राजा धनुष टूट जाने पर भी विवाह सहज होने देने को तैयार नहीं हैं। उनकी बात में प्रतियोगिता से आगे युद्ध की धमकी उभरती है।

पोद्दार की टीका उनके आशय को स्पष्ट करती है कि वे जानकी को सहज ही हाथ से जाने नहीं देंगे। फिर वे अपना बल इतना बढ़ाकर कहते हैं कि सामने काल भी हो तो सीता के लिये एक बार उसे भी संग्राम में जीत लेंगे। यहाँ काल का नाम उनकी डींग में आता है। उस दावे से किसी युद्ध का होना सिद्ध नहीं होता। कवि उनकी वाणी सुनाते हैं और फिर उसके सुननेवालों की प्रतिक्रिया की ओर बढ़ जाते हैं।

एक बार कालउ किन होऊ । सिय हित समर जितब हम सोऊ॥
यह सुनि अवर महिप मुसुकाने । धरमसील हरिभगत सयाने॥

चौपाई ९

इसी चौपाई के दूसरे भाग में दूसरे राजाओं की मुसकान आ जाती है। वे धर्मशील हैं, हरिभक्त हैं और सयाने हैं। अभिमानी राजाओं की हँसी का उत्तर इस मुसकान से मिलता है। दोनों प्रतिक्रियाओं को तुलसी एक जैसा नहीं बताते। पहली के साथ अविवेक और अभिमान का परिचय था; इस मुसकान के साथ धर्म, भक्ति और समझ का परिचय है। अब इन्हीं राजाओं की बात सुनी जायेगी, और वे विवाह की चर्चा को दर्शन के सुख तक ले जायेंगे।

राम को देखकर कुछ राजा अपने को हारा मानते हैं और दोनों सम्भावनाओं में उन्हीं की विजय सोचते हैं। अभिमानी राजा विवाह रोकने तथा काल को भी युद्ध में जीत लेने की बात करते हैं। उनकी डींग सुनकर धर्मशील, हरिभक्त और सयाने राजा मुसकराते हैं।

मन के लड्डू और सामने अमृत का समुद्र

धर्मशील राजाओं का पहला उत्तर उसी विषय पर है जिस पर गर्व किया गया था। वे कहते हैं कि राम राजाओं का अभिमान दूर करके सीता से विवाह करेंगे। और यदि युद्ध की बात की जाय, तो दशरथ के रणबाँकुरे पुत्रों को संग्राम में जीत ही कौन सकता है। उनका विश्वास स्पष्ट है। सामने बैठनेवाले दोनों भाइयों का परिचय वे पिता के नाम और उनकी रणवीरता से देते हैं। काल को जीत लेने की डींग के सामने यह प्रश्न रखते हैं कि इन्हें हरायेगा कौन।

सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के।
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे॥ २४५॥

सोरठा २४५

इसके बाद वे कोरी बातों पर सीधी चोट करते हैं। व्यर्थ गाल बजाकर क्यों मरना, मन में सोचे हुए लड्डुओं से भूख कहाँ बुझती है। उदाहरण इतना परिचित है कि अभिमान का खोखलापन तुरन्त समझ में आता है। मन में किसी पदार्थ का विचार कर लेना उसका फल पा लेना नहीं होता। जिन राजाओं ने युद्ध जीते बिना ही अपनी विजय का दावा कर लिया है, उनके सामने यह उपमा उनकी कल्पना और वास्तविक सामर्थ्य के बीच की दूरी रख देती है।

ब्यर्थ मरहु जनि गाल बजाई । मन मोदकन्हि कि भूख बुताई॥
सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता॥

चौपाई १०

पर उनकी बात इस फटकार पर समाप्त नहीं होती। वे अपनी निष्कपट सीख सुनने को कहते हैं और हृदय में सीता को जगदम्बा जानने की ओर ले जाते हैं। विवाह की प्रतिद्वन्द्विता में जिस आकांक्षा से सीता की ओर देखा जा रहा था, उस दृष्टि को वे माता के सम्बन्ध में रख देते हैं। पोद्दार की टीका इसका आशय उन्हें पत्नी के रूप में पाने की आशा और लालसा छोड़ना बताती है। इसलिए जगदम्बा का नाम यहाँ संवाद की दिशा बदल देता है।

सीता जगत् की माता हैं तो रघुनाथ जगत् के पिता हैं। धर्मशील राजा यह विचार करके राम की छवि को नेत्र भरकर देखने को कहते हैं। माता और पिता के इन दोनों सम्बोधनों को साथ सुनना चाहिये। उनकी सीख केवल किसी इच्छा से विरत होने तक नहीं रुकती। वह सामने उपस्थित रूप को देखने का अवसर देती है। जिस सभा में अभी अधिकार और विजय की बात हो रही थी, उसी में वे आँखों के लिये एक दूसरा काम बताते हैं।

वे दोनों भाइयों का परिचय फिर देते हैं: सुन्दर हैं, सुख देनेवाले हैं, सारे गुणों की राशि हैं और शिव के हृदय में बसते हैं। दर्शन के लिये कहने का आधार भी यही है। जो शिव के हृदय के निवासी हैं, वे सभा में नेत्रों के सामने हैं। इस कथन में दोनों भाई साथ आते हैं। जगत् के पिता के रूप में राम को पहचानने के बाद लक्ष्मण के साथ उनकी सम्मिलित छवि पर दृष्टि टिकाने की बात बनी रहती है।

अब वे अमृत के समुद्र और मृगजल की उपमा रखते हैं। पास आया हुआ अमृत का समुद्र छोड़कर मृगजल देखकर दौड़ने और मरने का क्या कारण है। अमृत का समुद्र निकट है, यह बात विशेष अर्थ रखती है। जिस सुख की वे ओर संकेत कर रहे हैं, वह सामने उपस्थित दर्शन है। पोद्दार की टीका इसी को भगवद्दर्शनरूप अमृत का समुद्र कहती है, और सीता को पत्नी के रूप में पाने की मिथ्या दुराशा को मृगजल के रूप में समझाती है।

सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई॥
करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा॥

चौपाई ११

दोनों उपमाओं को साथ रखिये तो उनकी सीख और स्पष्ट होती है। मन के लड्डू भूख नहीं बुझाते, मृगजल की ओर दौड़ने से जल नहीं मिलता। पहली उपमा अपनी कल्पना से सन्तुष्ट हो लेने की भूल पर है, दूसरी उस कल्पना के पीछे भागते रहने पर। दोनों के बीच सीता और राम को जगत् के माता-पिता जानने तथा नेत्र भरकर देखने की बात है। इसलिये फटकार के भीतर जो मार्ग दिया गया है, उसका उद्देश्य सामने आये दर्शन का सुख ग्रहण करना है।

इतना कहकर वे दूसरे राजाओं को अपनी रुचि के अनुसार जाने और करने देते हैं। जिसको जो अच्छा लगे, वह करे। अपना अनुभव वे पूरे निश्चय से कहते हैं कि आज हमने जन्म लेने का फल पा लिया। उनके लिये इस सभा में आने की सफलता अभी मिल गयी है। किसी आगामी विजय की प्रतीक्षा में वह सुख टाला नहीं गया। जिन्हें देखने को कहा जा रहा था, उन्हीं का दर्शन पाकर वे स्वयं प्रेम में मग्न हो चुके हैं।

तुलसी उनकी बात के बाद उनका काम भी बताते हैं। वे अच्छे राजा अनुराग से भरकर राम के अनुपम रूप को देखने लगते हैं। उनका संवाद वहीं पहुँचता है जहाँ उन्होंने दूसरों को आने के लिये कहा था, नेत्र भरकर देखने में। अभिमान का उत्तर देने के बाद वे फिर उसी विवाद में उलझे नहीं रहते। उनकी आँखों के सामने वह रूप है जिसे शिव के हृदय का निवासी कह चुके हैं, और उनका अपना मन अब उसी में अनुरक्त है।

सयाने राजा राम की विजय का विश्वास कहते हैं और डींग की तुलना मन के लड्डुओं से करके रोकते हैं। सीता को जगदम्बा, राम को जगत् का पिता मानकर दर्शन करने की सीख देते हैं। पास के अमृतसमुद्र को छोड़ मृगजल के पीछे दौड़ना व्यर्थ है; वे स्वयं दर्शन पाकर जन्म सफल मानते हैं।

आकाश से पुष्प और सीता को बुलावा

मनुष्यों की सभा के ऊपर देवता भी दर्शन कर रहे हैं। वे आकाश में विमानों पर चढ़े हुए हैं, फूल बरसा रहे हैं और सुन्दर गान कर रहे हैं। कवि प्रेममग्न राजाओं के देखने के बाद उसी दर्शन का विस्तार आकाश तक कर देते हैं। नीचे नेत्र राम के रूप पर टिके हैं, ऊपर से पुष्प आ रहे हैं और गान हो रहा है। इस समय का आनन्द धरती पर बैठे दर्शकों तक सीमित नहीं रहता।

इस पूरे दृश्य के बीच जनक उचित अवसर पहचानते हैं। अब सीता को बुलाने का समय है। उनका बुलावा भेजा जाता है और सीता की सब चतुर, सुन्दर सखियाँ आदर के साथ उन्हें लिवा चलती हैं। दोहे में राजा की समय की पहचान और सखियों का आदर साथ रखा गया है। निमन्त्रण का उत्तर चल पड़ने से मिलता है। सीता का रंगभूमि में प्रवेश अभी इस दोहे में नहीं दिखाया गया है।

जानि सुअवसरु सीय तब पठई जनक बोलाइ।
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाइ॥ २४६॥

दोहा २४६

यहाँ पहुँचकर सभा की प्रतीक्षा फिर सामने आ जाती है। राजाओं ने विवाह के विषय में अनेक बातें कहीं हैं, पर वे उनकी कही हुई बातें हैं। भक्त राजाओं ने अपने लिये दर्शन का फल पा लिया है। देवता गान और पुष्पवर्षा में लगे हैं। अब जनक के बुलावे पर सखियाँ सीता को लेकर चल रही हैं। इस प्रसंग की आख़िरी गति उन्हीं का यह सादर लिवा चलना है।

प्रेममग्न राजाओं के साथ आकाश के देवता भी दर्शन करते हैं, गाते हैं और फूल बरसाते हैं। सुअवसर जानकर जनक सीता को बुला भेजते हैं। चतुर और सुन्दर सखियाँ उन्हें आदरपूर्वक लिवा चलती हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस सभा में एक ही उपस्थिति कितने भिन्न अनुभव जगा रही है। हम उन्हें याद करें तो वीरता, भय, सुख, वात्सल्य, तत्त्व और भक्ति सभी के अपने स्पष्ट रूप मिलते हैं। तुलसी भावना का नाम लेकर बात अस्पष्ट नहीं छोड़ते। वे बताते हैं कि विद्वान् क्या देखते हैं, योगी क्या देखते हैं, जनक और रानियाँ किस प्रेम से देखते हैं। इससे अपना भाव पहचानने का अवसर भी मिलता है। आँख के सामने जो है, उसे ग्रहण करने में भीतर का मन भी साथ लगा रहता है।

राजाओं का संवाद इसी बात को बोलती हुई अवस्था में दिखाता है। किसी के मन में अपनी प्रतिष्ठा खोने का भय है, किसी के मुँह में काल तक को जीत लेने का गर्व, और किसी को सामने के दर्शन में जन्म का फल मिल गया है। सभा में बैठने का अवसर सबको है, उसका फल सबके लिये समान नहीं बनता। धर्मशील राजा जिस अमृतसमुद्र की ओर संकेत करते हैं, वह उनकी अपनी दृष्टि में निकट है। उसे ग्रहण करने की जगह उनकी आँखों और अनुराग में दिखाई देती है।

आरम्भ में लक्ष्मण बड़ाई को गुरु की कृपा से जोड़ते हैं। बाद में अभिमानी राजाओं की वाणी अपनी विजय का दावा करती है। इन दोनों स्वरों के बीच की दूरी सुनने योग्य है। मुनि लक्ष्मण की बात पर आशीर्वाद देते हैं और सयाने राजा डींग पर मुसकराते हैं। फिर वे आगे बढ़कर माता-पिता का सम्बन्ध तथा दर्शन का सुख बताते हैं। इस तरह विनय और विवेक केवल मन की बातें बने नहीं रहते, उनके फल वाणी और व्यवहार में भी खुलते हैं।

जनक का व्यवहार भी पूरे प्रसंग में याद रखने योग्य है। नगर की भीड़ के लिये सेवक और आसन, मुनि के लिये प्रणाम और विनती, दोनों भाइयों के लिये उनके साथ श्रेष्ठ मञ्च, फिर सीता के लिये उचित समय पर बुलावा। देखने के इस बड़े उत्सव में आतिथ्य के ये छोटे, स्पष्ट काम लगातार होते रहते हैं। जिस रूप पर लोगों की दृष्टि ठहरी है, उसके आसपास सभा को सँभालने का काम राजा उतनी ही सावधानी से पूरा कर रहे हैं।

आँखों के सामने राम और लक्ष्मण विराजमान हैं। जनक का सन्देश पहुँच चुका है और सखियाँ सीता को आदर से लिवा चली हैं। सभा में अभी-अभी सुने गये इतने स्वरों के बीच धर्मशील राजाओं का अपना अनुभव बचा रहता है: दर्शन मिल गया, आज जन्म लेने का फल मिला। इसी आनन्द और सीता के बुलावे पर यह प्रसंग विराम लेता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २४० से २४६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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