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रंगभूमि की सभा और राजाओं का संवाद

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 28

दो राजकुमार सभा में आते हैं। कोई उनमें वीरता देखता है, कोई प्रत्यक्ष काल, कोई अपना इष्टदेव, और कोई उन्हें बच्चे जैसी प्रीति से देखता है। फिर राजाओं की बातचीत होती है, और जनक सीता को बुला भेजते हैं।

सीता के स्वयंवर को देखने चलने की बात उठती है: देखें, ईश्वर किसे बड़ाई देते हैं। लक्ष्मण उस बड़ाई को गुरु की कृपा से जोड़ते हैं। मुनि प्रसन्न होकर आशीर्वाद देते हैं, और दोनों भाई उनके साथ धनुषयज्ञ की रंगभूमि की ओर चलते हैं। नगर में उनके पहुँचने का समाचार फैलते ही घरों के काम छूट जाते हैं। जनक इस उमड़ती भीड़ में हर आनेवाले के बैठने का प्रबन्ध करते हैं।

सभा भर जाने पर हर देखनेवाला अपनी भावना के अनुसार राम को देखता है। बड़े रणधीर उनमें शरीर धरा वीररस देखते हैं, और कुटिल राजा उन्हें देखकर डर जाते हैं। विद्वानों को विराट् रूप दिखता है, योगियों को शान्त परम तत्त्व, और जनक और रानियाँ उन्हें बच्चे जैसी प्रीति से देखते हैं। फिर राजाओं की बातचीत आती है: घर लौट चलने की बात, युद्ध की डींग, और आज जन्म का फल पा लेने की बात। अन्त में जनक सीता को बुला भेजते हैं।

धनुषयज्ञ की सभा में बैठे लोग

  • राम और लक्ष्मण कोसल के साँवले और गोरे कुमार, जो मुनियों के साथ धनुषयज्ञ की सभा में आते हैं।
  • मुनि गुरु और उनके साथ के ऋषि। पोद्दार की टीका गुरु को विश्वामित्र बताती है।
  • जनक सभा के आतिथ्य का प्रबन्ध करनेवाले राजा, जो अन्त में सीता को बुला भेजते हैं।
  • सीता जिनका राम के प्रति स्नेह और सुख कहा नहीं जा सकता, और जिन्हें सखियाँ आदर से लिवा चलती हैं।
  • सभा में आये राजा राम को देखकर अपनी हार माननेवाले, अभिमान से युद्ध की बात करनेवाले, और धर्मशील, भगवान् के भक्त राजा।
  • नगरवासी और अन्य दर्शक अनेक अवस्थाओं और भावों के लोग, जिनमें हर एक को राम अपनी भावना के अनुसार दिखते हैं।

गुरु की कृपा से शुरू होती यात्रा

मुनि कहते हैं: चलकर सीता का स्वयंवर देखा जाये, और देखा जाये कि ईश्वर किसे बड़ाई देते हैं। लक्ष्मण उत्तर देते हैं: हे नाथ, जिस पर आपकी कृपा होगी, वही बड़ाई का पात्र होगा।

पोद्दार की टीका बताती है कि बड़ाई का आशय धनुष तोड़ने का श्रेय है। लक्ष्मण की यह बात सुनकर सब मुनि प्रसन्न होते हैं, और सुख मानकर आशीर्वाद देते हैं। फिर राम मुनियों के समूह के साथ धनुषयज्ञ की शाला देखने चलते हैं।

दोनों भाइयों के रंगभूमि में आने की खबर नगरवासियों तक पहुँचती है। बालक, जवान, बूढ़े, स्त्रियाँ और पुरुष, सब घर के काम भुलाकर चल देते हैं।

जनक देखते हैं कि भीड़ बहुत बढ़ गयी है। वे अपने सब शुद्ध हृदयवाले सेवकों को बुलवाते हैं, और आज्ञा देते हैं कि वे तुरन्त सब लोगों के पास जाकर हर किसी को उचित आसन दें।

सेवक कोमल और नम्र वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच और लघु, सब स्त्री पुरुषों को उनके अपने अपने स्थान के अनुसार बैठाते हैं।

एक रूप के सामने अनेक भाव

उसी समय दोनों राजकुमार आते हैं, मानो मनोहरता उनके शरीरों पर छा रही हो। साँवला और गोरा रंग है। वे गुणों के समुद्र, चतुर और श्रेष्ठ वीर हैं। राजाओं के समाज के बीच दोनों भाई ऐसे सुशोभित हैं, जैसे तारों के बीच दो पूर्ण चन्द्रमा।

फिर देखनेवालों के भाव सामने आते हैं: जिसकी जैसी भावना थी, उसने राम की मूर्ति वैसी ही देखी।

बड़े रणधीर राम के रूप को ऐसा देखते हैं, मानो वीररस ने शरीर धारण किया हो। कुटिल राजा उन्हें देखकर डर जाते हैं, मानो कोई बड़ी भयानक मूर्ति हो।

छल से राजाओं का वेष धरकर जो असुर वहाँ थे, वे राम को प्रत्यक्ष काल के समान देखते हैं। नगरवासी दोनों भाइयों को मनुष्यों के भूषण और नेत्रों को सुख देनेवाले देखते हैं।

स्त्रियाँ हृदय में हर्षित होकर अपनी अपनी रुचि के अनुसार उन्हें देखती हैं, मानो शृंगाररस परम अनुपम मूर्ति धरकर शोभित हो।

विद्वानों को राम विराट् रूप में दिखते हैं, जिसके बहुत से मुख, हाथ, पैर, नेत्र और सिर हैं। जनक के कुटुम्बियों को वे प्रिय सगे सम्बन्धियों जैसे लगते हैं।

जनक और रानियाँ उन्हें बच्चे के समान देखते हैं, और उस प्रेम का वर्णन नहीं हो सकता।

योगियों को वे शान्त, शुद्ध, सम और स्वयं प्रकाशमान परम तत्त्व के रूप में दिखते हैं। भगवान् के भक्त दोनों भाइयों को सब सुख देनेवाले अपने इष्टदेव के समान देखते हैं।

सीता राम को जिस भाव से देखती हैं, वह स्नेह और सुख कहा नहीं जा सकता। वे स्वयं उसे हृदय में अनुभव करती हैं, और कह नहीं सकतीं। तब कोई कवि उसे कैसे कहे।

इस प्रकार बात वहीं ठहरती है जहाँ से चली थी: जिसका जैसा भाव था, उसने राम को वैसा देखा। फिर राजसमाज के बीच कोसलराज के साँवले और गोरे कुमार शोभा पाते हैं, जो विश्व भर के नेत्र चुरानेवाले हैं।

सिर से चरण तक दोनों कुमार

दोनों मूर्तियाँ सहज मनोहर हैं। करोड़ों कामदेवों की उपमा उनके लिये छोटी है। मुख शरद के चन्द्रमा को नीचा दिखाते हैं, और कमल जैसे नेत्र मन को बहुत भाते हैं।

सुन्दर चितवन कामदेव के मन को हर लेती है। वह हृदय को प्यारी है, और कही नहीं जाती। सुन्दर गाल हैं, कानों में झूमते कुण्डल, सुन्दर ठोड़ी और ओठ, और कोमल वाणी।

हँसी चन्द्रमा की किरणों को तुच्छ कर देती है। भौंहें टेढ़ी हैं, नाक मनोहर है, और चौड़े ललाट पर तिलक झलक रहे हैं। बालों को देखकर भौंरों की पंक्तियाँ लजा जाती हैं। पोद्दार की टीका बताती है, काले और घुँघराले बाल।

सिरों पर पीली चौकोनी टोपियाँ हैं, जिनके बीच बीच फूलों की कलियाँ बनी हैं। टीका बताती है, काढ़ी हुई।

शंख जैसे सुन्दर गलों पर मनोहर रेखाएँ हैं, जिन्हें पोद्दार की टीका तीन बताती है, मानो तीनों लोकों की सुन्दरता की सीमा। छातियों पर गजमणियों के सुन्दर कण्ठे हैं, जिन्हें टीका गजमुक्ता कहती है, और तुलसी की मालाएँ।

कंधे बैल के कंधों जैसे हैं, खड़े होने की शान सिंह जैसी है, और विशाल भुजाएँ बल का भण्डार हैं।

कमर में तरकस और पीताम्बर बँधे हैं, हाथों में बाण, बायें सुन्दर कंधों पर धनुष, और पीले जनेऊ शोभा दे रहे हैं।

नख से शिख तक सब अंग सुन्दर हैं, और उन पर बड़ी शोभा छायी है। उन्हें देखकर सब लोग सुखी हैं, आँखें एकटक लगी हैं, पुतलियाँ नहीं हिलतीं।

जनक का स्वागत और सबकी ओर मुख

जनक दोनों भाइयों को देखकर हर्षित होते हैं, और मुनि के पास जाकर उनके चरणकमल पकड़ लेते हैं। फिर विनती करके अपनी कथा सुनाते हैं, और मुनि को सारी रंगभूमि दिखाते हैं।

राजा ने अपनी कथा में क्या कहा, उसका विस्तार यहाँ नहीं आता। दोनों श्रेष्ठ राजकुमार जहाँ जहाँ जाते हैं, वहाँ वहाँ सब उन्हें चकित होकर देखते हैं।

सब लोगों को राम अपनी अपनी ओर मुख किये दिखते हैं, और इसका कुछ विशेष रहस्य कोई नहीं जान पाता।

मुनि जनक से कहते हैं कि रंगभूमि की रचना सुन्दर है, और यह सुनकर राजा प्रसन्न होते हैं और बड़ा सुख पाते हैं। पोद्दार की टीका जोड़ती है कि विश्वामित्र जैसे निःस्पृह, विरक्त और ज्ञानी मुनि से प्रशंसा सुनने का यह सुख है।

सब मंचों में एक मंच अधिक सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल है। राजा मुनि और दोनों भाइयों को उसी पर बैठाते हैं।

मन की हार और अभिमान की हँसी

राम को देखकर सब राजा मन में हार जाते हैं, जैसे पूर्ण चन्द्रमा के उगने पर तारे फीके पड़ जाते हैं।

सबके मन में यह विश्वास हो गया है कि धनुष राम तोड़ेंगे, इसमें सन्देह नहीं। पोद्दार की टीका इस विश्वास को उनके तेज से जोड़ती है।

पोद्दार की टीका उनके मन में यह निश्चय भी रखती है कि शिव का विशाल धनुष न भी टूटे, तब भी सीता राम के उर पर माला डालेंगी। टीका इसका आशय खोलती है: दोनों तरह से हमारी हार है, और राम की विजय।

यह सोचकर वे एक दूसरे से कहते हैं: भाई, ऐसा विचारकर, यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर, घर चलिये।

यह सुनकर दूसरे राजा हँसते हैं, जो अविवेक से अन्धे और अभिमानी हैं। वे कहते हैं: धनुष टूट जाये, तब भी विवाह होना कठिन है। और बिना तोड़े राजकुमारी को कौन ब्याह सकता है।

पोद्दार की टीका उनका आशय खोलती है कि वे सीता को सहज ही हाथ से जाने नहीं देंगे। फिर वे कहते हैं: काल ही क्यों न हो, सीता के लिये एक बार उसे भी हम युद्ध में जीत लेंगे।

यह सुनकर दूसरे राजा मुसकराते हैं, जो धर्मशील, भगवान् के भक्त और सयाने हैं।

मन के लड्डू और सामने अमृत का समुद्र

धर्मशील राजा कहते हैं कि राम राजाओं का गर्व दूर करके सीता से विवाह करेंगे। दशरथ के रणबाँकुरे पुत्रों को संग्राम में कौन जीत सकता है। काल को जीत लेने की डींग के सामने वे यही प्रश्न रखते हैं।

फिर वे कहते हैं: गाल बजाकर व्यर्थ मत मरिये। मन के लड्डुओं से कहीं भूख बुझती है?

वे अपनी परम पवित्र सीख सुनने को कहते हैं: सीता को मन में साक्षात् जगत् की माता जानिये। पोद्दार की टीका इसका आशय बताती है: उन्हें पत्नी के रूप में पाने की आशा और लालसा छोड़ दीजिये।

और राम को जगत् का पिता विचारकर, नेत्र भरकर उनकी छबि देख लीजिये।

वे दोनों भाइयों का परिचय भी देते हैं: सुन्दर हैं, सुख देनेवाले हैं, सब गुणों की राशि हैं, और शिव के हृदय में बसते हैं। पोद्दार की टीका जोड़ती है कि जिन्हें स्वयं शिव भी सदा हृदय में छिपाये रखते हैं, वे सभा में नेत्रों के सामने आ गये हैं।

फिर वे अमृत के समुद्र और मृगजल की उपमा देते हैं: पास के अमृत के समुद्र को छोड़कर मृगजल देखकर दौड़ने और मरने का क्या कारण। पोद्दार की टीका इस अमृत के समुद्र को भगवान् का दर्शन बताती है, और सीता को पत्नी के रूप में पाने की झूठी आशा को मृगजल।

फिर वे कहते हैं: जिसको जो अच्छा लगे, वह जाकर वही करे। हमने तो आज जन्म लेने का फल पा लिया।

इतना कहकर वे अच्छे राजा प्रेम में मग्न होकर राम का अनुपम रूप देखने लगते हैं।

आकाश से पुष्प और सीता को बुलावा

देवता विमानों पर चढ़े आकाश से दर्शन कर रहे हैं, फूल बरसा रहे हैं और सुन्दर गान कर रहे हैं।

तब जनक उचित अवसर जानकर सीता को बुला भेजते हैं, और सब चतुर, सुन्दर सखियाँ आदर से उन्हें लिवा चलती हैं। सीता अभी रंगभूमि में पहुँची नहीं हैं।

भक्त राजाओं ने आज जन्म लेने का फल पा लिया है। देवता फूलों की वर्षा और गान में लगे हैं, और जनक के बुलावे पर सखियाँ सीता को लेकर चल रही हैं।

गर्व के स्वर, विनय के स्वर

इस सभा में एक ही उपस्थिति कितने अलग अनुभव जगा रही है: वीरता, भय, सुख, वात्सल्य, तत्त्व और भक्ति, सबके अपने स्पष्ट रूप। विद्वान् विराट् रूप देखते हैं, योगी परम तत्त्व, और जनक और रानियाँ उन्हें बच्चे जैसी प्रीति से देखते हैं।

राजाओं की बातचीत यही बात बोलती हुई दिखाती है। किसी का हृदय हार गया है, किसी के मुँह में काल तक को जीत लेने का गर्व है, और कोई आज जन्म का फल पा लेने की बात कहता है।

पूरे प्रसंग में जनक के काम ये हैं: नगर की भीड़ के लिये सेवक और आसन, मुनि के चरण पकड़ना और विनती। दोनों भाइयों के लिये उनके साथ श्रेष्ठ मंच, और फिर सीता के लिये ठीक समय पर बुलावा।

मंच पर मुनि के साथ राम और लक्ष्मण बैठे हैं। जनक का सन्देश पहुँच चुका है, और सखियाँ सीता को आदर से लिवा चली हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 240 से 246, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।