रामचरितमानस · बालकाण्ड · नाम का प्रताप और तुलसीदास की अपनी कथा
नाम का प्रताप और तुलसीदास की अपनी कथा
नाम ने किस-किस को तार दिया, इस युग में उसके सिवा बचता क्या है, और वह लड़का जो सूकरखेत में यही कथा सुन रहा था और एक शब्द नहीं समझ पाया था।
इस पूरे पन्ने पर कहानी एक क़दम आगे नहीं बढ़ती। न कोई जन्म होता है, न कोई वचन दिया जाता है, न कोई धनुष टूटता है। दशरथ का नाम यहाँ एक बार भी नहीं आता, अवध का नाम एक बार भी नहीं आता, लक्ष्मण का नाम एक बार भी नहीं आता। आठ दोहे बीत जाते हैं और कथा वहीं खड़ी है जहाँ खड़ी थी। फिर भी मानस के पाठ में यह हिस्सा सबसे अधिक बार दोहराया जानेवाला हिस्सा है, और इसका कारण साफ़ है। यहाँ कथा नहीं चल रही, यहाँ वह शर्त बाँधी जा रही है जिस पर आगे की सारी कथा पढ़ी जायगी।
पन्ना तीन हिस्सों में खुलता है। पहले हिस्से में नाम है, और वह नामावली गिनायी जाती है जिसे नाम ने पार लगाया। दूसरे हिस्से में कवि अपनी ओर मुड़ता है और अपने विषय में वह सब कहता है जो कोई अपने विषय में कहना नहीं चाहता। तीसरे हिस्से में यह बताया जाता है कि यह कथा उस तक पहुँची कैसे, और फिर उस कथा की महिमा दो लम्बी मालाओं में गायी जाती है। तीनों हिस्सों को जोड़नेवाली चीज़ एक ही है: जहाँ भी कोई बड़ा सिद्धान्त रखा जाता है, तुलसीदास अपना नाम उसी वाक्य के भीतर रख देते हैं। इन सैंतालीस टुकड़ों में पाँच जगह उनका अपना नाम छपा हुआ मिलता है, और हर बार वह वाक्य के छोटे पक्ष में खड़ा है।
और एक बात पहली पंक्ति से पहले की। इस प्रसंग का आरम्भ एक विश्राम-चिह्न से होता है, मासपारायण का पहला विश्राम। जो पाठक महीने भर में पूरा मानस पढ़ने बैठता है, उसका पहला दिन ठीक यहाँ आकर पूरा होता है। ध्यान देने की बात यह है कि वह दिन किसी घटना पर नहीं टूटता, क्योंकि अब तक घटना हुई ही नहीं। वह नाम की महिमा पर टूटता है। पहला दिन पढ़कर उठनेवाला आदमी अपने साथ कोई दृश्य लेकर नहीं उठता, केवल एक शब्द लेकर उठता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- नाम इस पन्ने का असली नायक, जिसे तुलसी बार-बार राम से भी आगे बिठा देते हैं और जिसके आगे इस प्रसंग में कोई घटना नहीं टिकती।
- तुलसीदास कहनेवाले स्वयं, जो यहाँ अपना नाम पाँच बार लिखते हैं और पाँचों बार अपने को घटाकर लिखते हैं।
- शिव इस चरित के पहले रचयिता, जिन्होंने इसे पार्वती को सुनाया और फिर एक पात्र देखकर आगे सौंपा।
- काकभुशुण्डि वह जिन्हें शिव ने रामभक्त और अधिकारी पहचानकर यह कथा दी, और जिनसे यह आगे चली।
- याज्ञवल्क्य और भरद्वाज इस पूरे ग्रन्थ का बाहरी ढाँचा, एक कहनेवाला और एक सुननेवाला, जिनके विषय में कहा जाता है कि दोनों एक-से हैं।
- तुलसीदास के गुरु वे जिनसे यह कथा सूकरखेत में सुनी गयी, और जिनका नाम इस पन्ने पर कहीं नहीं लिखा जाता।
- प्रह्लाद इस पन्ने पर दो बार आते हैं, पहले नाम के फल के रूप में और फिर जप करनेवाले के नमूने के रूप में।
- हुलसी एक नाम जो महिमा की माला के बीच अचानक आ जाता है, और जिसे टीका तुलसीदास की माता बताती है।
नाम किस-किस के काम आया
पिछला प्रसंग इस बात पर बन्द हुआ था कि नाम निर्गुण ब्रह्म से भी बड़ा है और सगुण राम से भी, और शिव ने सौ करोड़ रामचरित में से इसी दो अक्षर को चुनकर पकड़ लिया। यह बहुत बड़ी बात कहकर छोड़ देना आसान नहीं होता। इसलिये यह प्रसंग बात दोहराने से नहीं, गवाही से शुरू होता है। दावा हो चुका है, अब नामावली आती है।
नाम प्रसाद संभु अबिनासी । साजु अमंगल मंगल रासी॥
चौपाई १
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी । नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी॥
नाम के ही प्रसाद से शिव अविनाशी हैं, और अमंगल का साज पहने होने पर भी मंगल की राशि हैं। इस एक पंक्ति में जोड़ी बहुत सोच-समझकर बैठायी गयी है। जिस देवता का साज ही अमंगल कहा गया है, उसी को उसी साँस में मंगल की राशि कहा जा रहा है, और बीच में जो चीज़ खड़ी है वह नाम है। तर्क यह है कि नाम अमंगल को हटाता नहीं, उसे मंगल में बदल देता है। इसके बाद शुकदेव और सनकादि आते हैं, सिद्ध, मुनि, योगी। ये वे लोग हैं जिनके पास ब्रह्मसुख तक पहुँचने के अपने रास्ते थे, और इनके विषय में भी वही कहा जाता है: नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी।
फिर नारद आते हैं, जिन्होंने नाम का प्रताप जाना, और फिर प्रह्लाद, जो नाम जपते-जपते भक्तों के शिरोमणि हो गये। और फिर ध्रुव। यहाँ तुलसी एक ऐसी छूट दे देते हैं जिसे पढ़ते हुए लोग प्राय: छोड़ जाते हैं। ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। टीका इस सगलानि को खोलकर कहती है कि विमाता के वचनों से दुखी होकर, ग्लानि से, सकाम भाव से जपा। यानी जप शुद्ध नहीं था, चोट खाया हुआ था, और कुछ माँगने के लिये था। फल फिर भी मिला, और वह भी अचल अनुपम। उसके बाद हनुमान आते हैं, और उनके विषय में जो कहा जाता है वह इस पूरी सूची का सबसे चौंकानेवाला वाक्य है: सुमिरि पवनसुत पावन नामू, अपने बस करि राखे रामू। नाम का स्मरण करके सेवक ने स्वामी को अपने वश में कर रखा है। जिस राम के नाम की बात हो रही है, उसी राम को वह नाम पकड़कर बिठा देता है।
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
चौपाई २
कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥
नीच अजामिल, गज और गणिका, तीनों हरि के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गये। तीनों उदाहरण एक ही काम करते हैं: वे योग्यता की शर्त तोड़ते हैं। एक जिसे पंक्ति स्वयं नीच कहती है, एक हाथी, और एक गणिका। और इनके नाम गिनाकर तुलसी हाथ खड़े कर देते हैं। कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई, रामु न सकहिं नाम गुन गाई। नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुण नहीं गा सकते। पिछले प्रसंग का दावा यहाँ दुबारा, और पहले से अधिक ठोक-बजाकर रखा जा रहा है।
अब तक की सूची में एक व्यवस्था थी। शिव, फिर शुक और सनकादि, फिर नारद, फिर प्रह्लाद, फिर ध्रुव, फिर हनुमान, फिर अजामिल, गज और गणिका। ऊपर से नीचे। हर सीढ़ी पर पात्र पहले से कम योग्य होता गया और फल वही रहा। और जब सीढ़ी नीचे तक आ चुकी, तब दोहा आता है, और उसमें वह नाम रखा जाता है जो अब तक नहीं आया था।
नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु।
दोहा २६
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥ २६॥
कलियुग में राम का नाम कल्पतरु है और कल्याण का निवास है, जिसे स्मरण करने से भाँग-सा तुलसीदास तुलसी हो गया। इस एक पंक्ति में जो हुआ है उस पर रुकना बनता है। पहला, सूची जो शिव से शुरू हुई थी वह कहनेवाले पर आकर बन्द हुई, यानी कवि ने अपने को अजामिल और गणिका के बाद खड़ा किया, उनसे पहले नहीं। दूसरा, बदलाव को कहने के लिये उन्होंने दो पत्ते चुने। भाँग भी पत्ता है, तुलसी भी पत्ता है। एक नशा देता है और किसी देवता पर नहीं चढ़ता, दूसरा हरि के सिर चढ़ता है। दोनों के बीच जाति का, जन्म का, आकार का फ़र्क़ नहीं है, केवल यह फ़र्क़ है कि कौन किसके काम आता है।
सार: नाम के प्रसाद से शिव अविनाशी हैं और शुक तथा सनकादि ब्रह्मसुख भोगते हैं। नारद ने उसका प्रताप जाना, प्रह्लाद भक्तशिरोमणि हुए, ध्रुव ने ग्लानि से जपा और फिर भी अचल पद पाया, हनुमान ने नाम लेकर राम को अपने वश में कर रखा है, और अजामिल, गज तथा गणिका भी तर गये। तुलसी कहते हैं कि नाम की बड़ाई राम भी नहीं गा सकते।
चार युग, और एक युग जिसमें कुछ नहीं बनता
दोहे में कलियुग का नाम आ गया है, और आते ही एक आपत्ति खड़ी हो जाती है। यदि नाम केवल कलियुग की दवा है तो वह सुविधा है, महिमा नहीं। तुलसी इस आपत्ति को पहचानते हैं और अगली ही पंक्ति में दायरा बढ़ा देते हैं: चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका, भए नाम जपि जीव बिसोका। चारों युगों में, तीनों कालों में, तीनों लोकों में। पहले दावा पूरा फैलाया जाता है, तब उसे कलियुग पर उतारा जाता है, और यह क्रम उलटा नहीं है।
ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें । द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
चौपाई ३
कलि केवल मल मूल मलीना । पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
पहले युग में ध्यान से, दूसरे में यज्ञ से, द्वापर में पूजा से भगवान् प्रसन्न होते हैं। तीन युग, तीन साधन, और तीनों में क्रिया है। ध्यान भीतर की क्रिया है, यज्ञ बाहर की, पूजा दोनों के बीच की। फिर चौथा युग आता है और उसके खाते में कोई साधन लिखा ही नहीं जाता। कलि केवल मल मूल मलीना। और उसके साथ जो चित्र दिया जाता है वह इस पन्ने के सबसे निर्मम चित्रों में है: पाप पयोनिधि जन मन मीना। मनुष्यों का मन पापरूपी समुद्र में मछली बना हुआ है।
मछली क्यों, यह पूछने लायक़ है। कीचड़ में फँसा हुआ पशु कहा जा सकता था, जाल में फँसा पक्षी कहा जा सकता था। दोनों में छूटने की चाह होती है। मछली में वह भी नहीं है। मछली पानी में गिरी नहीं है, मछली पानी में रहती है, और पानी से निकालने का अर्थ उसे मारना है। टीका इसी को खोलकर कहती है कि मन पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता। इसलिये यहाँ यह तर्क नहीं दिया जा रहा कि नाम बाक़ी साधनों से आसान है। तर्क यह है कि बाक़ी साधन इस युग में बनते ही नहीं, क्योंकि जिसे उन्हें करना है वह करना नहीं चाहता।
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू॥
चौपाई ४
कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
कलियुग में न कर्म है, न भक्ति, न विवेक; राम नाम ही एक आधार है। तीन चीज़ें गिनाकर तीनों से हाथ धो लिया गया, और जो बचा वह अकेला है। इसके बाद जो उपमा आती है वह एक ही पंक्ति में दो पात्र खड़े कर देती है: कालनेमि कलि कपट निधानू, नाम सुमति समरथ हनुमानू। कपट की खान कलियुग कालनेमि है, और नाम वह समर्थ हनुमान है जो उससे पार पाता है।
इस जोड़ी में जो चुना गया है वह ध्यान खींचता है। कलियुग का हथियार बल नहीं, कपट है। कालनेमि का हथियार भी वही है। और इसलिये उसके सामने जो खड़ा किया जाता है उसकी पहली विशेषता बल नहीं है। पंक्ति में सुमति पहले आता है और समरथ बाद में। छल के सामने पहली चीज़ जो चाहिये वह पहचान है, ताक़त उसके बाद की चीज़ है।
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
दोहा २७
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥ २७॥
राम नाम नृसिंह है, कलिकाल हिरण्यकशिपु है, और जप करनेवाला जन प्रह्लाद है। तीन भूमिकाएँ बाँट दी गयीं और सुननेवाले को जो भूमिका दी गयी वह न मारनेवाले की है, न मरनेवाले की। उसे बच जानेवाले की भूमिका मिली है, और वह भूमिका उसकी है जिसने और कुछ नहीं किया था, केवल नाम लिया था। यही प्रह्लाद कुछ पंक्तियों पहले नाम के फल के रूप में आ चुके हैं। वहाँ वे उदाहरण थे, यहाँ वे नमूना हैं।
सार: नाम का फल चारों युगों, तीनों कालों और तीनों लोकों में है। सत्य, त्रेता और द्वापर में ध्यान, यज्ञ और पूजा से काम चला; कलियुग में मन पाप के समुद्र की मछली है, इसलिये न कर्म बनता है, न भक्ति, न विवेक, और नाम ही एक आधार रह जाता है। कपट की खान कलियुग के सामने वही सुमति और समर्थ हनुमान है, और जप करनेवाले के लिये नृसिंह।
भाव से, कुभाव से, आलस से
अब तक जो कहा गया, वह सब नाम के पक्ष में था, पर उसमें एक शर्त छिपी हुई थी। जितने उदाहरण आये, उनमें कोई न कोई भाव था। ध्रुव में ग्लानि थी, प्रह्लाद में निष्ठा थी, हनुमान में प्रेम था। तो जिसमें कुछ भी न हो, उसका क्या। यह प्रश्न पूछा नहीं जाता, पर अगली पंक्ति सीधे उसी पर आकर गिरती है, और गिरते ही सारी शर्त गिरा देती है।
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
चौपाई ५
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
अच्छे भाव से, बुरे भाव से, क्रोध से, या आलस्य से भी, किसी तरह भी नाम जपने से दसों दिशाओं में मंगल होता है। चार तरीक़े गिनाये गये हैं और उनका क्रम ढलान का क्रम है। भायँ यानी प्रेम से, यह तो ठीक। कुभायँ यानी वैर से, यह भी चल जायगा, क्योंकि वैर में भी सामनेवाला मन में बसा रहता है। अनख यानी झुँझलाहट से, यह और नीचे की चीज़ है। पर सूची यहाँ रुकती नहीं, और आख़िर में जो रखा जाता है वह सबसे कमज़ोर है: आलसहूँ। आलस्य में भाव होता ही नहीं। न प्रेम, न वैर, न झुँझलाहट। तुलसी ने सूची इसी पर जाकर ख़त्म की है, क्योंकि जो सबसे ख़ाली है उस पर दावा टिक गया तो बाक़ी सब अपने आप टिक जाते हैं।
और इसके बाद जो होता है, वह इस पूरे हिस्से की सबसे सुन्दर सन्धि है। बीस से अधिक पंक्तियाँ नाम की महिमा में कहकर कवि अब स्वयं वही करता है जो वह कहता आया है। सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा, करउँ नाइ रघुनाथहि माथा। उसी नाम का स्मरण करके, और रघुनाथ को माथा नवाकर, मैं राम के गुणों का वर्णन करता हूँ। उपदेश और अभ्यास के बीच यहाँ एक पंक्ति का भी फ़ासला नहीं रखा गया।
सार: प्रेम से, वैर से, झुँझलाहट से या आलस्य से भी नाम जपने पर दसों दिशाओं में कल्याण होता है। इतना कहकर तुलसीदास उसी नाम का स्मरण करते हैं, रघुनाथ को मस्तक नवाते हैं, और यहीं से राम के गुणों का वर्णन आरम्भ करते हैं।
अच्छे स्वामी की रीति, और एक बुरे सेवक की गिनती
अपनी ओर मुड़ते ही कवि जो पहला वाक्य कहता है वह सामनेवाले के स्वभाव पर है, अपने पर नहीं: राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो, निज दिसि देखि दयानिधि पोसो। इससे अच्छा स्वामी नहीं, इससे बुरा सेवक नहीं। और उसी पंक्ति में तीन शब्द ऐसे हैं जिन पर पूरा तर्क टिका है, निज दिसि देखि। दयानिधि ने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया। सेवक की ओर देखते तो पालन बनता ही नहीं, क्योंकि उधर देखने लायक़ कुछ है नहीं। तो जो देखा गया वह अपना ही स्वभाव था। इसके बाद ही यह बात आती है कि अच्छे स्वामी की पहचान क्या है, और वह बात दुनिया की भाषा में कही जाती है।
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती, बिनय सुनत पहिचानत प्रीती। लोक में भी और वेद में भी अच्छे स्वामी की यही रीति है कि वह विनय सुनते ही प्रेम पहचान लेता है। यहाँ जो पहचाना जा रहा है वह योग्यता नहीं है, माँगनेवाले का प्रेम है, और वह माँग के ढंग से पहचाना जा रहा है। फिर प्रजा गिनायी जाती है, और गिनती जोड़ियों में चलती है: अमीर और ग़रीब, गँवार और नगरवासी, पण्डित और मूर्ख, बदनाम और यशस्वी, सुकवि और कुकवि। हर जोड़ी दोनों सिरे छूती है, इसलिये बीच में कोई छूटता नहीं। सब अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं।
और राजा उन सबका क्या करता है, यह एक पंक्ति में बड़ी सफ़ाई से रखा गया है। भनिति भगति नति गति पहिचानी। रचना, भक्ति, नमन और चाल, चारों पहचानकर वह सुन्दर वाणी से सबका यथायोग्य सम्मान करता है। यह सूची किसी कवि के मन से ही निकल सकती है, क्योंकि दरबार में पहुँचा हुआ कवि यही चार चीज़ें साथ लेकर जाता है। पर जैसे ही यह चित्र पूरा होता है, तुलसी उसे काट देते हैं। यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ, जान सिरोमनि कोसलराऊ। यह तो संसारी राजाओं का स्वभाव है; कोसलनाथ तो जाननेवालों के शिरोमणि हैं। उपमा पहले खड़ी की गयी, फिर छोटी बता दी गयी।
और अब वह आधी बात, जिसके आगे इस हिस्से में कुछ बचता नहीं। यहाँ चौपाइयों की लड़ी चार पर नहीं टूटती, छह तक जाती है, और छठी अकेली खड़ी है, बिना जोड़ीदार के।
रीझत राम सनेह निसोतें । को जग मंद मलिनमति मोतें॥
चौपाई ६
राम तो निरे प्रेम से रीझते हैं, और जगत् में मुझसे बढ़कर मन्द और मलिनबुद्धि कौन होगा। निसोतें वह शब्द है जिस पर वाक्य खड़ा है, यानी जिसमें और कुछ मिला हुआ न हो। और जिन जोड़ियों की सूची अभी-अभी गिनायी गयी थी, उनमें से कवि ने अपने लिये कौन-सा सिरा चुना, यह अब साफ़ है। कुकबि, मूढ़, मलीन, मन्द। हर जोड़ी का दूसरा पल्ला। और इसी के तुरन्त बाद दोहा आता है, जिसमें अपने पक्ष में दी गयी दलील भावना की नहीं, नज़ीर की है।
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।
दोहा २८ (क, ख)
उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु॥ २८ (क)॥
हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास॥ २८ (ख)॥
कृपालु राम मुझ दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि रख लेंगे, क्योंकि जिन्होंने पत्थरों को जहाज़ बना दिया और बन्दर-भालुओं को बुद्धिमान् मन्त्री बना दिया, वे यह भी कर सकते हैं। दोनों नज़ीरें एक ही तरह की हैं और उनका चुनाव सोचा हुआ है। पत्थर का दोष यह नहीं कि वह बुरा है; पत्थर का दोष यह है कि वह डूबता है, और डूबना उसका स्वभाव है। बन्दर का दोष यह नहीं कि वह दुष्ट है; उससे मन्त्रणा की आशा नहीं की जाती। दोनों जगह जो बदला गया वह पदार्थ नहीं है, काम है। पत्थर पत्थर ही रहा और तैर गया।
फिर दोहे का दूसरा हिस्सा, और यही इस पूरे हिस्से की सबसे तीखी चोट है। हौंहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास। साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास। लोग मुझे राम का सेवक कहते हैं और मैं भी कहलाता हूँ, इसका विरोध नहीं करता; और उपहास राम सहते हैं, कि सीतानाथ-जैसे स्वामी का सेवक तुलसीदास-सा है। ध्यान दीजिये कि लज्जा किसके खाते में डाली गयी। अपने को छोटा कहना एक बात है; यह कहना कि मेरे छोटेपन की हँसी मेरा स्वामी झेल रहा है, दूसरी बात है। और दूसरी बात कहीं अधिक भारी पड़ती है।
सार: तुलसीदास कहते हैं कि जिनकी कृपा कभी अघाती नहीं, वे ही उनकी बिगड़ी सुधारेंगे, और उन्होंने अपनी ओर देखकर पालन किया। अच्छे स्वामी की रीति विनय सुनते ही प्रेम पहचान लेना है; पर वह संसारी राजाओं का स्वभाव है, कोसलनाथ निरे प्रेम से रीझते हैं। जिन्होंने पत्थरों को जहाज़ बनाया, वे इस सेवक की प्रीति भी रख लेंगे।
जिस भूल को प्रभु याद नहीं रखते
आगे जो कहा जाता है, उसमें आत्म-निन्दा एक बार हँसी की हद तक चली जाती है। अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी, सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी। मेरा पाप सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली। नरक वह जगह है जो हर बुरी चीज़ को सँभालने के लिये ही बनी है, और यहाँ वही मुँह बना रहा है। टीका इसे खोलकर कहती है कि नरक में भी मेरे लिये ठौर नहीं।
पर अगली आधी पंक्ति में जो शब्द आता है वह सबसे बड़ा है। समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। अपना ही गढ़ा हुआ डर। कवि अपने भय को बाहर से आयी हुई चीज़ नहीं कहता, उसे अपनी ही बनावट बताता है। और उसके ठीक बाद: सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें। जिस बात से मैं काँप रहा हूँ, उसकी ख़बर राम ने सपने में भी नहीं ली। एक ओर वह आदमी है जो अपने को नरक से भी बाहर समझ रहा है, दूसरी ओर वह स्वामी है जिसने उस बात पर ध्यान ही नहीं दिया।
और फिर उलटा होता है। सुनि अवलोकि सुचित चख चाही, भगति मोरि मति स्वामि सराही। सुनकर, देखकर, और अपने निर्मल चित्त की आँख से जाँचकर स्वामी ने उलटे मेरी भक्ति और बुद्धि की सराहना की। साथ में वह नियम भी रख दिया जाता है जिस पर यह सराहना टिकी है: कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। कहने में चाहे बात बिगड़ जाय, हृदय में अच्छापन होना चाहिये। रीझत राम जानि जन जी की। राम दास के जी की हालत जानकर रीझते हैं, उसके कहे हुए पर नहीं।
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥
चौपाई ७
जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली । फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली॥
प्रभु के चित्त में की हुई चूक नहीं रहती, और हृदय की सुध वे सौ बार करते हैं। दो क्रियाएँ आमने-सामने रखी गयी हैं, रहति न और करत सुरति। भूल को याद रखना छोड़ना एक बात है; हृदय को बार-बार याद करना अलग बात है, और उसके साथ गिनती भी लगा दी गयी है, सय बार। भूलना निष्क्रिय काम है, याद करना मेहनत का काम है, और मेहनत इसी में लगायी जा रही है।
और अब दावे के नीचे सबूत आता है, और सबूत ऐसा है कि सुनकर चुप लग जाती है। जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली, फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली। जिस पाप के कारण बालि को व्याध की तरह मारा गया था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीव ने चली। और उसके बाद: सोइ करतूति बिभीषन केरी। वही करनी विभीषण की भी थी। पर सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी। राम ने सपने में भी उसे मन में नहीं देखा।
यहाँ जो सबसे बड़ी बात है वह वह है जो कही नहीं गयी। वह पाप क्या था, यह तुलसी बताते ही नहीं। जेहिं अघ, इतना ही। नाम लेकर गिनाया जाता तो पाठक उसे तौलने बैठ जाता, और तौल शुरू होते ही बात हार जाती। जिस बात को भुलाया गया, उसे कवि भी नहीं दोहराता।
और उसके बाद जो हुआ वह चुप्पी नहीं था। ते भरतहि भेंटत सनमाने, राजसभाँ रघुबीर बखाने। भरत से मिलने के समय उन दोनों का सम्मान हुआ और राजसभा में उनका बखान हुआ। यानी भूलना निजी सहनशीलता नहीं रह गया, वह सार्वजनिक प्रशंसा बन गया। एक ही अपराध पर तीन आदमी खड़े हैं। एक मारा गया, दो सभा में सराहे गये।
और एक शब्द इस पूरे हिस्से को उस हिस्से से बाँध देता है जो अभी-अभी बीता है। सपनेहुँ। कुछ पंक्तियाँ पहले यही शब्द तुलसी ने अपने लिये लिखा था, सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें। अब वही शब्द विभीषण के लिये आता है। जो छूट विभीषण को मिली, उसी छूट की आशा में यह पन्ना लिखा जा रहा है, और शब्द दोहराकर वह आशा दिखा दी गयी है, कही नहीं गयी।
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।
दोहा २९ (क, ख, ग)
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान॥ २९ (क)॥
राम निकाईं रावरी है सबही को नीक।
जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक॥ २९ (ख)॥
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ।
बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ॥ २९ (ग)॥
प्रभु पेड़ के नीचे और बन्दर डाल पर, और उन्हीं को उन्होंने अपने समान बना लिया। चित्र पहले बैठता है, बात बाद में आती है। पहली आधी पंक्ति में स्वामी नीचे है और सेवक ऊपर, और यह उलटाव किसी वाक्य से नहीं, बैठक से कहा गया है। तुलसी कहते हैं कि राम-जैसा शीलनिधान स्वामी कहीं नहीं है, और शील का प्रमाण यही बैठक है।
दूसरे हिस्से में जो होता है वह याचना नहीं, दलील है। राम निकाईं रावरी है सबही को नीक। जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक। आपकी अच्छाई से सबका भला है; यदि यह बात सच है, तो तुलसीदास का भी भला होगा। कवि अपने लिये छूट नहीं माँग रहा। वह कह रहा है कि जो नियम बताया गया है वह उस पर भी लागू होना चाहिये, वरना नियम नियम नहीं रहा। इस पन्ने पर अपने लिये की गयी सब प्रार्थनाओं में यह सबसे ठंडी है, और सबसे मज़बूत भी, क्योंकि इसमें दया की जगह तर्क रखा गया है।
और तीसरे हिस्से में पन्ना अपना रुख़ बदल लेता है। एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ, बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ। इस प्रकार अपने गुण और दोष कहकर, और सबको फिर सिर नवाकर, मैं रघुनाथ का निर्मल यश कहता हूँ। एक शब्द यहाँ खटकता है, गुन। जो कुछ अभी-अभी कहा गया वह सब दोष था। गुण एक ही गिनाया गया था, और वह भी दूसरे के मुँह से: हियँ नीकी। इतना ही अपने खाते में डालकर कवि आगे बढ़ जाता है।
सार: तुलसी का पाप सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली, पर राम ने उस ओर सपने में भी ध्यान नहीं दिया, उलटे उनकी भक्ति और बुद्धि को सराहा। प्रभु चूक याद नहीं रखते और हृदय की सुध सौ बार करते हैं: जिस पाप पर बालि मारे गये, वही सुग्रीव ने और वही विभीषण ने किया, और दोनों का सम्मान हुआ। पेड़ के नीचे बैठे स्वामी ने डाल पर बैठनेवालों को अपने समान बना लिया।
यह कथा यहाँ तक पहुँची कैसे
जागबलिक जो कथा सुहाई । भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥
चौपाई ८
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी । सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी॥
याज्ञवल्क्य ने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज को सुनायी थी, उसी संवाद को मैं बखानकर कहूँगा। इसी एक पंक्ति में इस पूरे ग्रन्थ का बाहरी ढाँचा खड़ा हो जाता है, एक कहनेवाला और एक सुननेवाला, और आगे जो कुछ आयेगा वह इन्हीं दोनों के बीच होगा। और सुननेवालों से जो कहा जाता है उसमें एक शर्त छिपी है: सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी। सुख मानते हुए सुनिये। यह सुनने का ढंग बताया जा रहा है, और आगे इसी ढंग पर लौटा जायगा।
फिर परम्परा पीछे की ओर खोली जाती है। संभु कीन्ह यह चरित सुहावा, बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा। शिव ने यह सुहावना चरित रचा और फिर कृपा करके पार्वती को सुनाया। इसके बाद अगली कड़ी आती है, और उसी पर इस पूरे हिस्से का भार है: सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा, राम भगत अधिकारी चीन्हा। वही चरित शिव ने काकभुशुण्डि को दिया, उन्हें रामभक्त और अधिकारी पहचानकर।
इस श्रृंखला में एक ही जगह शर्त लगायी गयी है, और वह ठीक यही जगह है। पार्वती को देते समय कोई जाँच नहीं लिखी गयी, याज्ञवल्क्य के पाने में कोई जाँच नहीं लिखी गयी। जाँच वहाँ लिखी गयी जहाँ लेनेवाला एक कौआ है। और जिस बात पर वह जाँच हुई, वह जाति नहीं थी, रूप नहीं था, पद नहीं था। अधिकारी, यानी जो पाने के योग्य हो। योग्यता की यह परिभाषा इस पन्ने पर आगे एक और रूप में लौटेगी।
उनसे याज्ञवल्क्य ने पाया और उन्होंने भरद्वाज को गाकर सुनाया। और फिर दोनों के विषय में जो कहा जाता है वह ध्यान खींचता है: ते श्रोता बकता समसीला, सवँदरसी जानहिं हरिलीला। वक्ता और श्रोता समान शील के हैं, समदर्शी हैं, और हरि की लीला जानते हैं। यहाँ ऊँच-नीच नहीं बतायी जा रही, बराबरी बतायी जा रही है। कथा तभी पूरी उतरती है जब दोनों सिरे एक-से हों। और इसके बाद दायरा खोल दिया जाता है: और भी जो समझदार हरिभक्त हैं, वे इस चरित को नाना प्रकार से कहते, सुनते और समझते हैं। यह नाना शब्द यहाँ यों ही नहीं रखा गया; इसी पर इस प्रसंग का अन्त टिकेगा।
सार: जो कथा याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज को सुनायी थी, वही तुलसी कहेंगे। इसे शिव ने रचा और पार्वती को सुनाया, फिर वही काकभुशुण्डि को दिया, उन्हें रामभक्त और अधिकारी पहचानकर; उनसे याज्ञवल्क्य ने पाया। वक्ता और श्रोता समान शील के और समदर्शी हैं।
सूकरखेत का वह लड़का
अब तक जितनी कड़ियाँ गिनायी गयीं, सब पूरी थीं। देनेवाला ज्ञानी था, लेनेवाला योग्य था, और कथा जैसी की तैसी आगे बढ़ी। इसके ठीक बाद कवि अपने को इस श्रृंखला में जोड़ता है, और जो कड़ी वह जोड़ता है वह अकेली टूटी हुई कड़ी है।
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
दोहा ३० (क, ख)
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥ ३० (क)॥
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़॥ ३० (ख)॥
फिर वही कथा मैंने सूकरखेत में अपने गुरु से सुनी; पर लड़कपन के कारण उस समय बहुत बेसुध था, इसलिये उसे उस तरह समझा नहीं। इस पूरे प्रसंग में आत्मकथा का यही सबसे सीधा टुकड़ा है, और उसमें जो लिखा गया है वह गौरव की बात नहीं है। एक लड़का बैठा है, कथा चल रही है, और उसके सिर पर से गुज़र रही है।
जगह का नाम वे बता देते हैं, सूकरखेत। जिससे सुना उनका नाम नहीं बताते। पूरे पन्ने पर गुरु केवल गुरु रहते हैं। जो चीज़ रह गयी वह चूक है, और चूक अपनी है, इसलिये उसमें दूसरे का नाम नहीं घसीटा जाता।
दोहे का दूसरा हिस्सा कारण गिनाता है, और उसमें कवि अपने आप को उसी कसौटी पर तौलता है जो उसने अभी बनायी थी। श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़। किमि समुझौं मैं जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़। राम की कथा गूढ़ है और उसके वक्ता तथा श्रोता दोनों ज्ञान के खज़ाने होते हैं; मैं कलियुग के मल से ग्रसा जड़ जीव उसे कैसे समझता। कुछ पंक्तियाँ पहले लिखा था कि श्रोता और वक्ता समशील होते हैं। अब वही वाक्य उलटकर अपने ऊपर लौटता है: जोड़ी बराबर की नहीं थी, इसलिये बात नहीं उतरी।
और जो सुधार हुआ, वह किसी वरदान से नहीं हुआ। तदपि कही गुर बारहिं बारा, समुझि परी कछु मति अनुसारा। गुरु ने बार-बार कही, तब बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आयी। कोई दृष्टि नहीं खुली, कोई सिद्धि नहीं मिली। शिक्षक ने बात दोहरा दी, और इतने से काम चल गया। और जो समझ में आया उसका नाप भी छोटा ही रखा गया है, कछु।
अब वह पंक्ति, जिसमें इस पूरे ग्रन्थ का प्रयोजन लिखा है, और जो प्रयोजन लिखा है वह निजी है। भाषाबद्ध करबि मैं सोई, मोरें मन प्रबोध जेहिं होई। उसी को मैं भाषा में बाँधूँगा, जिससे मेरे मन को सन्तोष हो। कारण यह नहीं है कि संसार को कुछ चाहिये। कारण यह है कि कहनेवाले का अपना मन ठिकाने नहीं आया। और जो कहेंगे वह भी अपने बल पर नहीं: तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें। अपने सन्देह, मोह और भ्रम को हरनेवाली यह कथा उनके लिये भवनदी की नाव है, और नाव बनानेवाला ख़ुद उस पार जाना चाहता है।
सार: तुलसी लिखते हैं कि यही कथा उन्होंने सूकरखेत में अपने गुरु से सुनी थी और लड़कपन में बेसुध होने के कारण समझ नहीं पाये थे। गुरु ने बार-बार कही, तब बुद्धि के अनुसार कुछ समझ आयी, और उसी को वे भाषा में बाँधेंगे, इस कारण से कि उनके अपने मन को सन्तोष हो और उनका अपना सन्देह, मोह और भ्रम मिटे।
रामकथा किस-किस के समान है
अपने मन के लिये कही जा रही यह कथा अगली ही पंक्ति से सबके लिये खुल जाती है, और खुलते ही उपमाओं की एक लम्बी माला शुरू होती है। बुध बिश्राम सकल जन रंजनि, रामकथा कलि कलुष बिभंजनि। पण्डितों को विश्राम, सब लोगों को प्रसन्नता, और कलियुग के पाप का नाश। तीन काम, और तीनों अलग-अलग तरह के लोगों पर।
फिर उपमाएँ तेज़ हो जाती हैं। रामकथा कलि पंनग भरनी, यह कलियुगरूपी साँप के लिये मोरनी है। पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी, और विवेक की अग्नि के लिये अरणि है। इस दूसरी उपमा पर रुकना चाहिये। अरणि वह लकड़ी है जिसे रगड़ने पर आग निकलती है। कथा आग देती नहीं, कथा वह चीज़ है जिसे घिसना पड़ता है। श्रम सुननेवाले के हिस्से में छोड़ दिया गया है, और यह बात कहीं कही नहीं गयी, उपमा के भीतर रख दी गयी।
माला लम्बी है और उसमें एक के बाद एक चीज़ें आती जाती हैं। कलियुग में मनचाहा देनेवाली कामधेनु, सज्जनों के लिये संजीवनी बूटी, पृथ्वी पर अमृत की नदी, भ्रमरूपी मेंढकों के लिये सर्पिणी, नरकों का नाश करनेवाली, साधुरूपी देवताओं के कुल का हित करनेवाली पार्वती, संतसमाज के क्षीरसागर के लिये लक्ष्मी, सारे विश्व का भार उठानेवाली अचल पृथ्वी, यमदूतों के मुँह पर कालिख लगाने के लिये यमुना, और जीव को मुक्ति देने के लिये मानो काशी।
अब एक बात गिनिये जो गिनने पर ही दिखती है। इस पूरी माला में एक भी उपमा पुरुष की नहीं है। मोरनी, अरणि, गाय, बूटी, नदी, सर्पिणी, पार्वती, लक्ष्मी, पृथ्वी, यमुना, काशी। इसका कारण व्याकरण में है और वहीं से यह सारी शोभा निकली है। कथा शब्द स्त्रीलिंग है, इसलिये जो कुछ उसके बराबर रखा जायगा वह भी स्त्रीलिंग होगा, और तुलसी ने इस मजबूरी को कमी नहीं रहने दिया। उन्होंने पूरी एक स्त्री-सृष्टि खड़ी कर दी, जिसमें देवियाँ हैं, नदियाँ हैं, एक नगरी है और एक गाय है।
और उसी माला के बीच अचानक दो नाम आ जाते हैं जो इस सूची के किसी भी नाम से अलग हैं।
जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी । जीवन मुकुति हेतु जनु कासी॥
चौपाई ९
रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी॥
यह कथा राम को पवित्र तुलसी के समान प्रिय है, और तुलसीदास के लिये हृदय से हित करनेवाली हुलसी के समान है। टीका इस दूसरे नाम को खोलकर बताती है कि हुलसी तुलसीदास की माता का नाम है। यानी एक ही पंक्ति में दो जोड़ी बैठी हैं, आमने-सामने। राम को जो सबसे प्रिय है, वह तुलसी। और कवि का जिसने सबसे अधिक हित किया, वह उसकी माँ। और बीच में कवि अपना नाम रख देता है, तुलसिदास हित।
माला आगे बढ़ती है। शिव को नर्मदा के समान प्यारी, सब सिद्धियों और सुख-सम्पत्ति की राशि, सद्गुणरूपी देवताओं के लिये माता अदिति के समान, और रघुनाथ की भक्ति तथा प्रेम की परम सीमा-सी। और इसके बाद वह दोहा आता है जिसमें उपमा उपमा रहती ही नहीं।
रामकथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु।
दोहा ३१
तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु॥ ३१॥
रामकथा मन्दाकिनी है, सुन्दर चित्त चित्रकूट है, सुन्दर स्नेह वन है, और उसमें सीता और रघुवीर विहार करते हैं। चार चीज़ें रखी गयीं और पहली तीन की सामग्री कहाँ से आयी, यह देखिये। नदी वह कथा है जो सुनी जा रही है। पहाड़ सुननेवाले का अपना निर्मल चित्त है। वन उसका अपना स्नेह है। यानी जो जगह बन रही है, वह सुननेवाले के ही सामान से बन रही है।
और चौथी चीज़ पर पहुँचकर वाक्य अपना ढंग बदल देता है। पूरे दोहे में सी या समान जैसा कोई शब्द है ही नहीं; नदी, पहाड़ और वन सीधे रख दिये गये हैं। और अन्तिम चौथाई में जो आता है वह उपमा है ही नहीं: सिय रघुबीर बिहारु। वहाँ वे विहार करते हैं। तुलना यहाँ छूट जाती है और जगह असली हो जाती है। कथा सुनते हुए जो मन बनता है, वही वन है, और लीला वहीं चल रही है। और इस दोहे में भी कवि ने अपना नाम अन्दर रख दिया है, तुलसी सुभग सनेह बन। इस प्रसंग में उनका नाम यह पाँचवीं जगह है।
सार: रामकथा पण्डितों का विश्राम, सबका आनन्द और कलियुग के पाप का नाश है; वह कामधेनु, संजीवनी, अमृत की नदी, पार्वती, लक्ष्मी, यमुना, काशी, नर्मदा और अदिति के समान है। उसी माला में तुलसी उसे राम की प्रिय तुलसी और अपने लिये अपनी माता हुलसी के समान कहते हैं। दोहे में वह मन्दाकिनी हो जाती है, निर्मल चित्त चित्रकूट और स्नेह वन।
और राम के गुण किस-किस के समान हैं
इसके बाद दूसरी माला शुरू होती है, और उसका विषय बदल जाता है। अब तक बात रामकथा की थी; अब बात रामचरित की और राम के गुणसमूह की है। और विषय बदलते ही सारी उपमाएँ बदल जाती हैं। पहली माला में मोरनी, गाय, नदी और देवियाँ थीं। दूसरी माला में सद्गुरु, वैद्य, पिता, मन्त्री, अगस्त्य, सिंह का बच्चा, अतिथि, मेघ, सूर्य, कल्पवृक्ष और हंस आते हैं। तुलसी उपमा उस शब्द के व्याकरण से मिलाकर चुनते हैं जिसकी वे बात कर रहे हैं, और इसीलिये एक ही महिमा दो बार गायी जाने पर भी दोहराव नहीं लगती।
रामचरित सुन्दर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धिरूपी स्त्री का शृंगार है। राम के गुणसमूह ज्ञान, वैराग्य और योग के लिये सद्गुरु हैं, और संसाररूपी भयंकर रोग के लिये देवताओं के वैद्य हैं। फिर वह पंक्ति आती है जो इस माला की सबसे कोमल पंक्ति है: जननि जनक सिय राम प्रेम के। वे सीताराम के प्रेम के माता-पिता हैं। यानी वे प्रेम देते नहीं, प्रेम को जन्म देते हैं और पालते हैं। यह उपमा उस उपमा से मिलती है जो अभी अरणि की आयी थी। दोनों जगह चीज़ तैयार नहीं मिलती, पैदा होती है।
आगे वे पाप, सन्ताप और शोक का नाश करनेवाले कहे जाते हैं, और इस लोक तथा परलोक दोनों के प्रिय पालक। फिर दो उपमाएँ आती हैं, जिनमें से दूसरी सबसे चुनी हुई है। विचाररूपी राजा के वे शूरवीर मन्त्री हैं, और लोभरूपी अपार समुद्र के लिये कुम्भज हैं। टीका कुम्भज को अगस्त्य बताती है। ध्यान दीजिये कि इस माला में लोभ अकेला ऐसा दोष है जिसे शत्रु की तरह नहीं, समुद्र की तरह रखा गया है। समुद्र से लड़ा नहीं जाता, वह घटता भी नहीं; उसका एक ही उपाय है कि कोई उसे पी जाय। और लोभ की यही पहचान है, वह किसी सीमा पर जाकर भरता नहीं।
अगली पंक्ति में जो चित्र है वह एक शब्द के कारण याद रह जाता है। काम कोह कलिमल करिगन के, केहरि सावक जन मन बन के। काम, क्रोध और कलियुग के पाप हाथियों का झुंड हैं, और वह झुंड कहीं बाहर नहीं, भक्त के अपने मन के वन में रहता है। और उसके सामने जो खड़ा किया जाता है वह सिंह नहीं है, सावक है, सिंह का बच्चा। पूरा सिंह भी लिखा जा सकता था और छन्द नहीं टूटता। बच्चा लिखने से एक बात और कही गयी: हाथियों की गिनती के सामने जो खड़ा होता है उसे बड़ा होने की ज़रूरत नहीं।
फिर वे शिव के पूज्य और प्रियतम अतिथि कहे जाते हैं, और दरिद्रतारूपी दावानल के लिये कामना पूरी करनेवाला मेघ। दावानल इसलिये चुना गया है कि उसे हाथ से नहीं बुझाया जाता, उसके लिये आकाश से पानी उतरना पड़ता है। फिर विषयरूपी साँप के लिये मन्त्र और महामणि, और उसके बाद वह दावा जो इस पूरी सूची में सबसे बड़ा है: मेटत कठिन कुअंक भाल के। ललाट पर लिखे हुए वे बुरे लेख, जो कठिनाई से मिटते हैं, वे मिटा देते हैं। टीका इसे मन्द प्रारब्ध कहती है। बाक़ी सब उपमाएँ रोग, भय, दरिद्रता और दोष पर काम करती हैं; यह एक उपमा उस पर काम करती है जो लिखा जा चुका है। और माला के अन्त में वे सेवक के मनरूपी मानसरोवर के हंस कहे जाते हैं। इस उपमा में जो शब्द आया है वही शब्द इस ग्रन्थ के नाम में खड़ा है, और अगला प्रसंग उसी सरोवर पर ठहरेगा।
कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड।
दोहा ३२ (क, ख)
दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड॥ ३२ (क)॥
रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु।
सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु॥ ३२ (ख)॥
पहले हिस्से में छह चीज़ें गिनायी जाती हैं: कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल, और कलियुग के कपट, दम्भ तथा पाखण्ड। और इन सबके लिये राम के गुणसमूह वैसे ही हैं जैसे ईंधन के लिये प्रचण्ड अग्नि। ईंधन आग से लड़ता नहीं। ईंधन वही है जिसे आग ढूँढ़ रही होती है, और जलकर वह आग को और बढ़ा देता है। इस उपमा में विरोध का कोई भाव नहीं है, बस यह है कि इन दोनों का मिलना तय है और उसका नतीजा भी तय है।
दूसरे हिस्से में चन्द्रमा आता है। रामचरित पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों की तरह सबको सुख देते हैं, पर सज्जनरूपी कुमुदिनी और चकोर के चित्त के लिये उनमें विशेष हित और बड़ा लाभ है। चाँदनी सब पर बराबर पड़ती है। जो अन्तर है वह ऊपर से नहीं आता, वह लेनेवाले में है। कुमुदिनी उसी के आने पर खुलती है और चकोर का सारा कारोबार उसी से बँधा है।
और यही बात कुछ चौपाइयाँ पहले एक और रूप में आ चुकी है। शिव ने काकभुशुण्डि को यह चरित तब दिया था जब उन्हें रामभक्त और अधिकारी पहचान लिया। अधिकार की जो परिभाषा वहाँ एक शब्द में रखी थी, वह यहाँ एक चित्र बनकर लौटती है। देनेवाला किसी में भेद नहीं करता; जो ले सकता है, वह अधिक पाता है।
सार: दूसरी माला में रामचरित और राम के गुण सद्गुरु, देवताओं के वैद्य, सीताराम के प्रेम के माता-पिता, विचार के मन्त्री, लोभ के समुद्र के लिये कुम्भज, मन के वन में सिंहशावक, दरिद्रता के दावानल पर मेघ, और ललाट के बुरे लेख मिटानेवाले कहे जाते हैं। दोहे में वे ईंधन पर पड़ी प्रचण्ड अग्नि हैं, और चाँदनी की तरह सबको सुख देते हैं, पर कुमुदिनी और चकोर को विशेष लाभ।
सौ करोड़ रामायण
अब कथा शुरू होने ही वाली है, और शुरू करने से पहले कवि एक काम और करता है। कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी, जेहि बिधि संकर कहा बखानी। सो सब हेतु कहब मैं गाई, कथा प्रबंध बिचित्र बनाई। जिस तरह पार्वती ने प्रश्न किया और जिस तरह शंकर ने विस्तार से उत्तर दिया, वह सब कारण मैं गाकर कहूँगा, और कथा की रचना विचित्र बनाकर कहूँगा। यह चेतावनी है, और अपने ही ग्रन्थ के विषय में दी जा रही है। बनावट अनोखी होगी, यह पहले से बता दिया जा रहा है।
जेहिं यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करै सुनि सोई॥
चौपाई १० और ११
कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी॥
रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं॥
नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा॥
जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस अलौकिक कथा को सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि जगत् में रामकथा की कोई सीमा नहीं है। राम के अवतार नाना प्रकार के हुए हैं और रामायण सौ करोड़ तथा अपार हैं। इस तर्क का ढंग देखिये, क्योंकि उसमें जो नहीं कहा गया वही बड़ी बात है। यह नहीं कहा गया कि दूसरी कथाएँ ग़लत हैं। यह भी नहीं कहा गया कि यही सही है। कहा यह गया है कि जगह बहुत है।
और जिस चीज़ को रोका जा रहा है उसका नाम भी ठीक-ठीक रखा गया है। आचरजु। अविश्वास नहीं, आपत्ति नहीं, आश्चर्य। यह शब्द इन चार टुकड़ों में तीन बार आता है। कवि जानता है कि जो पाठक किसी और रामकथा में पला है, वह यहाँ कुछ न कुछ ऐसा पायेगा जो उसने वैसा नहीं सुना था, और उस घड़ी सबसे पहले जो उठेगा वह चौंक होगी। उसी चौंक को पहले से सँभाल लिया जा रहा है। कारण भी गिनाया जाता है, और वह एक नहीं, तीन हैं: कल्पभेद के अनुसार मुनीश्वरों ने हरि के सुन्दर चरित्र अनेक प्रकार से गाये हैं, अवतार नाना प्रकार के हुए हैं, और रामायणों की गिनती सौ करोड़ है। समय अलग, अवतार अलग, कहनेवाले अलग। और उसके बाद निर्देश आता है: सन्देह छोड़कर, आदर और प्रेम के साथ यह कथा सुनिये।
राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार।
दोहा ३३
सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार॥ ३३॥
राम अनन्त हैं, उनके गुण अनन्त हैं, और उनकी कथा का विस्तार अपरिमित है; इसलिये जिनके विचार निर्मल हैं, वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे। इस दोहे में इलाज बता दिया गया है और वह सूचना नहीं है। बिमल बिचार। चौंक इसलिये नहीं मिटती कि आदमी को और जानकारी मिल गयी; वह इसलिये मिटती है कि सोचने का ढंग साफ़ हो गया। जिसने यह मान लिया कि विषय अनन्त है, वह किसी भी नये ब्योरे पर नहीं चौंकेगा।
और एक गिनती दोनों प्रसंगों को आपस में बाँध देती है। पिछला प्रसंग इस बात पर बन्द हुआ था कि शिव ने सौ करोड़ रामचरित में से यह एक नाम चुन लिया। यह प्रसंग इस बात पर बन्द होता है कि रामायण सौ करोड़ और अपार हैं। वही संख्या, दो उलटे काम करती हुई। एक जगह वह बताती है कि कितना छोड़ा गया, दूसरी जगह वह बताती है कि कितनी जगह है।
सार: तुलसी कहते हैं कि वे पार्वती के प्रश्न और शंकर के उत्तर का सारा कारण गाकर कहेंगे। जिसने यह कथा पहले न सुनी हो वह आश्चर्य न करे, क्योंकि राम के अवतार नाना हैं और रामायण सौ करोड़ तथा अपार हैं। सन्देह छोड़कर आदर और प्रेम से सुनिये; निर्मल विचारवाले इसे सुनकर चौंकते नहीं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर जो सबसे बड़ी बात हुई, वह यह है कि कुछ नहीं हुआ। आठ दोहे, सैंतालीस टुकड़े, और एक भी घटना नहीं। पाठक को कहानी नहीं दी गयी, पाठक को वे शर्तें दी गयीं जिन पर कहानी दी जायगी। नाम सबसे ऊपर है, इस युग में उसके सिवा कुछ बनता नहीं, कहनेवाला अपने को सबसे नीचे रखता है, कथा एक परम्परा से आयी है जिसमें एक कड़ी टूटी हुई थी, और जो आगे कहा जायगा वह दूसरी कथाओं को झुठलाने के लिये नहीं कहा जायगा।
और इन शर्तों के भीतर कवि अपने को लगातार बुनता चलता है। भाँग तें तुलसी तुलसीदासु। साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास। जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक। तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी। तुलसी सुभग सनेह बन। पाँच जगह अपना नाम, और पाँचों जगह वह वाक्य के छोटे पक्ष में है। जो कुछ उन्होंने अपने खाते में डाला वह केवल इतना था कि हृदय ठीक जगह पर है, और वह भी उन्होंने अपने मुँह से नहीं कहा, राम के मुँह से कहलवाया।
जिस पाठक को दूसरी रामकथाएँ याद हैं, उसके लिये इस पन्ने पर एक और चीज़ रखी हुई है। यहाँ जो वंशावली गिनायी गयी है, उसमें शिव हैं, पार्वती हैं, काकभुशुण्डि हैं, याज्ञवल्क्य हैं और भरद्वाज हैं। वाल्मीकि का नाम उसमें एक बार भी नहीं आता। और इसी के साथ यह भी लिख दिया गया है कि रामायण सौ करोड़ हैं। यह ग्रन्थ अपनी जगह बनाते समय किसी दूसरे की जगह नहीं छीनता, वह केवल यह कहता है कि जगह कम नहीं है।
एक बात और, जो इस प्रसंग को पढ़कर देर तक साथ रहती है। यह पूरा हिस्सा एक आदमी का अपने काम को शुरू करने से पहले हाथ धोना है, और उसमें जो सबसे अधिक दोहराया गया शब्द है वह राम नहीं है, नाम है। कवि ने अपनी सारी पूँजी उसी एक शब्द में रख दी, और फिर अपने विषय में जो कुछ कहा वह सब घटाकर कहा। जिस आदमी को अपने पर इतना भरोसा न हो, उसके पास लिखने का साहस कहाँ से आया, इसका उत्तर भी इसी पन्ने पर है: तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें। जो कहूँगा वह अपने बल पर नहीं कहूँगा।
और आख़िर में वह लड़का, जो सूकरखेत में बैठा था और कुछ नहीं समझ पाया था। उसके बाद जीवन बीता, गुरु ने बार-बार वही बात कही, और उतने से जितना हाथ आया उतने से यह ग्रन्थ खड़ा हुआ। जिस पाठक को लगता है कि उसने पहली बार में कुछ नहीं समझा, उसके लिये इस पन्ने पर एक नज़ीर पहले से रखी हुई है, और वह नज़ीर लिखनेवाले की अपनी है। अगला प्रसंग उसी मन को एक सरोवर बनाकर दिखायेगा, और बतायेगा कि उस सरोवर तक पानी आता कहाँ से है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २६ से ३३, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।