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नाम का प्रताप और तुलसीदास की अपनी कथा

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 4

नाम ने किस-किस को तार दिया, इस युग में उसके सिवा बचता क्या है। और वह लड़का जो सूकरखेत में यही कथा सुन रहा था और उसे ठीक से समझ नहीं पाया था।

इस प्रसंग में कहानी एक क़दम आगे नहीं बढ़ती। न कोई जन्म होता है, न कोई धनुष टूटता है। दशरथ, अवध और लक्ष्मण के नाम यहाँ एक बार भी नहीं आते। फिर भी इस हिस्से को लाँघा नहीं जा सकता, क्योंकि यहाँ वह शर्त बाँधी जा रही है जिस पर आगे की सारी कथा पढ़ी जायगी।

यह प्रसंग तीन हिस्सों में खुलता है। पहले में नाम है, और उनकी गिनती जिन्हें नाम ने पार लगाया। दूसरे में कवि अपनी ओर मुड़ता है और अपने विषय में वह सब कहता है जो कोई अपने विषय में कहना नहीं चाहता। तीसरे में बताया जाता है कि यह कथा उस तक पहुँची कैसे, और फिर उस कथा की महिमा दो लम्बी मालाओं में गायी जाती है। इस प्रसंग में तुलसीदास कई जगह अपना नाम लेते हैं, और ज़्यादातर जगह वह वाक्य के छोटे पक्ष में खड़ा है।

एक बात शुरू होने से पहले की। इस प्रसंग का आरम्भ मासपारायण के पहले विश्राम से होता है। जो पाठक महीने भर में पूरा मानस पढ़ता है, उसका पहला दिन ठीक यहाँ पूरा होता है। वह दिन किसी घटना पर नहीं, नाम की महिमा पर टूटता है, क्योंकि अब तक कोई घटना हुई ही नहीं।

नाम, कवि और कथा की परम्परा

  • नाम इस प्रसंग का असली नायक, जिसके गुण, तुलसी यहाँ कहते हैं, राम भी नहीं गा सकते।
  • तुलसीदास कहनेवाले स्वयं, जो यहाँ कई बार अपना नाम लेते हैं, और ज़्यादातर अपने को घटाकर।
  • शिव इस चरित के पहले रचनेवाले, जिन्होंने इसे पार्वती को सुनाया और फिर एक पात्र देखकर आगे सौंपा।
  • काकभुशुण्डि जिन्हें शिव ने रामभक्त और अधिकारी पहचानकर यह कथा दी, और जिनसे यह आगे चली।
  • याज्ञवल्क्य और भरद्वाज एक कहनेवाला और एक सुननेवाला, जिनका संवाद तुलसी बखानकर कहेंगे, और जिनके बारे में कहा जाता है कि दोनों एक-से हैं।
  • तुलसीदास के गुरु जिनसे यह कथा सूकरखेत में सुनी गयी, और जिनका नाम तुलसी कहीं नहीं लिखते।
  • प्रह्लाद यहाँ दो बार आते हैं, पहले नाम के फल के रूप में और फिर जप करनेवाले के नमूने के रूप में।
  • हुलसी एक नाम जो महिमा की माला के बीच अचानक आ जाता है, और जिसे टीका तुलसीदास की माता बताती है।

नाम किस-किस के काम आया

पिछला प्रसंग इस बात पर बन्द हुआ था कि नाम निर्गुण ब्रह्म से भी बड़ा है और सगुण राम से भी। और यह भी कि शिव ने सौ करोड़ रामचरित में से इसी दो अक्षर को चुन लिया। अब दावे के बाद गवाहों की गिनती आती है।

नाम के ही प्रसाद से शिव अविनाशी हैं, और अमंगल का साज पहने होने पर भी मंगल की राशि हैं। जिस देवता का साज ही अमंगल कहा गया है, उसी को उसी साँस में मंगल की राशि कहा जा रहा है। नाम अमंगल को हटाता नहीं, उसे मंगल में बदल देता है। इसके बाद शुकदेव और सनकादि आते हैं, सिद्ध, मुनि, योगी। इनके विषय में भी वही कहा जाता है: नाम के प्रसाद से ही वे ब्रह्मसुख भोगते हैं।

फिर नारद आते हैं, जिन्होंने नाम का प्रताप जाना, और फिर प्रह्लाद, जो नाम जपते-जपते भक्तों के शिरोमणि हो गये। फिर ध्रुव, और यहाँ तुलसी एक छूट दे देते हैं: ध्रुव ने ग्लानि के साथ हरि का नाम जपा। टीका इसे खोलकर कहती है कि विमाता के वचनों से दुखी होकर, सकाम भाव से जपा। जप शुद्ध नहीं था, चोट खाया हुआ था और कुछ माँगने के लिये था, फिर भी फल मिला, और वह भी अचल अनुपम स्थान। उसके बाद हनुमान आते हैं। उनके विषय में कहा जाता है कि उन्होंने पवित्र नाम का स्मरण करके राम को अपने वश में कर रखा है। जिस राम के नाम की बात हो रही है, उसी राम को वह नाम पकड़कर बिठा देता है।

नीच अजामिल, गज और गणिका, तीनों भगवान् के नाम के प्रभाव से मुक्त हो गये। तीनों उदाहरण योग्यता की शर्त तोड़ते हैं: एक जिसे स्वयं नीच कहा गया है, एक हाथी, और एक गणिका। और इनके नाम गिनाकर तुलसी हाथ खड़े कर देते हैं: नाम की बड़ाई कहाँ तक कहूँ, राम भी नाम के गुण नहीं गा सकते। पिछले प्रसंग का दावा यहाँ दुबारा, और पहले से अधिक ठोक-बजाकर रखा जा रहा है।

इस सूची में एक व्यवस्था है: शिव, फिर शुक और सनकादि, फिर नारद, प्रह्लाद, ध्रुव, हनुमान, और अन्त में अजामिल, गज और गणिका। ऊपर से नीचे की एक सीढ़ी, जिसके दोनों सिरों पर नाम अपना काम करता है। और जब सीढ़ी नीचे तक आ चुकी, तब वह नाम रखा जाता है जो अब तक नहीं आया था।

कलियुग में राम का नाम कल्पतरु है और कल्याण का निवास है, जिसे स्मरण करने से भाँग-सा तुलसीदास तुलसी हो गया। जो सूची शिव से शुरू हुई थी, वह कहनेवाले पर आकर बन्द हुई, और कवि ने अपने को अजामिल और गणिका के बाद खड़ा किया। बदलाव को कहने के लिये उन्होंने दो पत्ते चुने: भाँग भी पत्ता है, तुलसी भी पत्ता है। एक नशा देता है, और दूसरा, जैसा यही प्रसंग आगे कहता है, राम को प्रिय है।

चार युग, और एक युग जिसमें कुछ नहीं बनता

अब कलियुग का नाम आ गया है। आते ही एक आपत्ति खड़ी होती है: यदि नाम केवल कलियुग की दवा है तो वह सुविधा है, महिमा नहीं। इसलिये तुरन्त दायरा बढ़ा दिया जाता है: चारों युगों में, तीनों कालों में, तीनों लोकों में जीव नाम जपकर शोक से छूटे हैं। पहले दावा पूरा फैलाया जाता है, तब उसे कलियुग पर उतारा जाता है।

पहले युग में ध्यान से, दूसरे में यज्ञ से, द्वापर में पूजा से भगवान् प्रसन्न होते हैं। तीन युग, तीन साधन, और तीनों में क्रिया है। फिर चौथा युग आता है और उसके खाते में कोई साधन लिखा ही नहीं जाता: कलियुग केवल पाप की जड़ और मलिन है। और साथ में चित्र: मनुष्यों का मन पापरूपी समुद्र में मछली बना हुआ है।

मछली इसलिये कि मछली पानी में गिरी नहीं है, पानी में रहती है, और पानी से निकालने का अर्थ उसे मारना है। टीका इसी को खोलकर कहती है कि मन पाप से कभी अलग होना ही नहीं चाहता, इसलिये ध्यान, यज्ञ और पूजन नहीं बन सकते। तर्क यह नहीं कि नाम बाक़ी साधनों से आसान है। तर्क यह है कि बाक़ी साधन इस युग में बनते ही नहीं।

कलियुग में न कर्म है, न भक्ति, न विवेक। राम नाम ही एक आधार है। फिर एक साथ दो पात्र खड़े होते हैं। कपट की खान कलियुग कालनेमि है, और नाम वह बुद्धिमान् और समर्थ हनुमान है जो उससे पार पाता है।

कलियुग का हथियार बल नहीं, कपट है, और कालनेमि का भी। इसलिये उसके सामने जो खड़ा किया जाता है, उसकी पहली विशेषता बल नहीं है। नाम पहले बुद्धिमान् कहा गया है और समर्थ बाद में। छल के सामने पहले पहचान चाहिये, ताक़त उसके बाद।

राम नाम नृसिंह है, कलिकाल हिरण्यकशिपु है, और जप करनेवाला जन प्रह्लाद है, जिसकी नाम रक्षा करेगा। सुननेवाले को बच जानेवाले की भूमिका मिली है, उसकी जिसने और कुछ नहीं किया था, केवल नाम लिया था। यही प्रह्लाद थोड़ा पहले नाम के फल के रूप में आ चुके हैं। वहाँ वे उदाहरण थे, यहाँ नमूना हैं।

भाव से, कुभाव से, आलस से

अब तक जपनेवाले के भाव की बात एक ही बार आयी थी: ध्रुव ने ग्लानि से जपा। तो जिसके मन में कोई भाव ही न हो, उसका क्या? अब भाव की हर शर्त हटा दी जाती है।

अच्छे भाव से, बुरे भाव से, क्रोध से, या आलस्य से भी, किसी तरह भी नाम जपने से दसों दिशाओं में मंगल होता है। चारों का क्रम ढलान का है। पहले प्रेम से। फिर वैर से, जिसमें भी सामनेवाला मन में बसा रहता है। फिर झुँझलाहट से। और आख़िर में आलस्य से भी, जिसमें कोई भाव होता ही नहीं। जो सबसे ख़ाली है उस पर दावा टिक गया, तो बाक़ी सब अपने आप टिक जाते हैं।

और इसके बाद कवि स्वयं वही करता है जो वह कहता आया है। उसी नाम का स्मरण करके, और राम को माथा नवाकर, मैं राम के गुणों का वर्णन करता हूँ। उपदेश और अभ्यास के बीच कोई फ़ासला नहीं।

अच्छे स्वामी की रीति, और एक बुरे सेवक की गिनती

अपनी ओर मुड़ते ही कवि कहता है कि जिनकी कृपा कृपा करते-करते अघाती नहीं, वे मेरी बिगड़ी सब तरह से सुधार लेंगे। फिर स्वामी और सेवक को आमने-सामने रखता है। राम अच्छे स्वामी हैं और सेवक मुझ-सा बुरा, फिर भी उन्होंने अपनी ओर देखकर मेरा पालन किया। सेवक की ओर देखते तो पालन बनता ही नहीं। जो देखा गया वह उनका अपना स्वभाव था।

फिर अच्छे स्वामी की पहचान दुनिया की भाषा में कही जाती है। लोक में भी और वेद में भी अच्छे स्वामी की यही रीति है कि वह विनय सुनते ही प्रेम पहचान लेता है। फिर प्रजा गिनायी जाती है, जोड़ियों में: अमीर और ग़रीब, गँवार और नगरवासी, पण्डित और मूर्ख, बदनाम और यशस्वी, सुकवि और कुकवि। हर जोड़ी दोनों सिरे छूती है, इसलिये बीच में कोई छूटता नहीं, और सब अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार राजा की सराहना करते हैं।

राजा रचना, भक्ति, नमन और चाल, चारों पहचानकर सुन्दर वाणी से सबका यथायोग्य सम्मान करता है। पर जैसे ही यह चित्र पूरा होता है, तुलसी उसे काट देते हैं: यह तो संसारी राजाओं का स्वभाव है। कोसल के राजा राम तो जाननेवालों के शिरोमणि हैं। उपमा पहले खड़ी की गयी, फिर छोटी बता दी गयी।

राम तो निरे प्रेम से रीझते हैं, और जगत् में मुझसे बढ़कर मन्द और मलिनबुद्धि कौन होगा। और अभी गिनायी गयी जोड़ियों में से कवि ने अपने लिये कौन-सा सिरा चुना, यह अब साफ़ है। टीका मन्द को मूर्ख कहती है, यानी पण्डित और मूर्ख की जोड़ी का नीचेवाला सिरा। फिर अपने पक्ष में जो दलील दी जाती है, वह भावना की नहीं, नज़ीर की है।

राम मुझ दुष्ट सेवक की प्रीति और रुचि रख लेंगे, क्योंकि जिन्होंने पत्थरों को जहाज़ बना दिया और बन्दर-भालुओं को बुद्धिमान् मन्त्री बना दिया, वे यह भी कर सकते हैं। पत्थर का दोष यह है कि वह डूबता है, और बन्दर से मन्त्रणा की आशा नहीं की जाती। दोनों जगह पदार्थ नहीं बदला, काम बदला। पत्थर पत्थर ही रहा और तैर गया।

फिर कवि कहता है कि लोग मुझे राम का सेवक कहते हैं और मैं भी कहलाता हूँ। और उपहास राम सहते हैं, कि राम-जैसे स्वामी का सेवक तुलसीदास-सा है। लज्जा किसके खाते में डाली गयी, यह देखिये। कवि कहता है कि मेरे छोटेपन की हँसी मेरा स्वामी झेल रहा है।

जिस भूल को राम याद नहीं रखते

आगे आत्म-निन्दा एक बार हँसी की हद तक चली जाती है: मेरी ढिठाई और दोष बहुत बड़े हैं, मेरा पाप सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली। नरक हर बुरी चीज़ को सँभालने के लिये ही बना है, और यहाँ वही मुँह बना रहा है। टीका इसे खोलकर कहती है कि नरक में भी मेरे लिये ठौर नहीं।

फिर कवि कहता है कि यह समझकर मैं अपने ही गढ़े हुए डर से सहमा हुआ हूँ। और ठीक बाद, जिस बात से मैं काँप रहा हूँ, उसकी ख़बर राम ने सपने में भी नहीं ली।

और फिर उलटा होता है: सुनकर, देखकर, और अपने निर्मल चित्त की आँख से जाँचकर स्वामी ने मेरी भक्ति और बुद्धि की सराहना की। साथ में वह नियम भी रख दिया जाता है जिस पर यह सराहना टिकी है: कहने में चाहे बात बिगड़ जाय, हृदय में अच्छापन होना चाहिये। क्योंकि राम दास के जी की हालत जानकर रीझते हैं।

राम के चित्त में की हुई चूक नहीं रहती, और हृदय की अच्छाई को वे सौ बार याद करते हैं। भूल को भुला देना एक बात है। हृदय को बार-बार याद करना अलग बात है, और उसके साथ गिनती भी लगा दी गयी है, सौ बार।

और अब दावे के नीचे सबूत आता है। जिस पाप के कारण राम ने बालि को व्याध की तरह मारा था, वैसी ही कुचाल फिर सुग्रीव ने चली। वही करनी विभीषण की भी थी, पर राम ने सपने में भी उसे मन में नहीं देखा।

वह पाप क्या था, यह तुलसी बताते ही नहीं। जिस बात को भुलाया गया, उसे कवि भी नहीं दोहराता।

और उसके बाद जो हुआ वह चुप्पी नहीं था। भरत से मिलने के समय राम ने उन दोनों का सम्मान किया और राजसभा में उनका बखान किया। भूलना सार्वजनिक प्रशंसा बन गया। एक ही अपराध पर तीन आदमी खड़े हैं: एक मारा गया, दो सभा में सराहे गये।

और एक बात इस हिस्से को अभी-अभी बीते हिस्से से बाँध देती है, सपने में भी। थोड़ा पहले तुलसी ने अपने लिये कहा था कि उस बात की ख़बर राम ने सपने में भी नहीं ली। अब वही बात विभीषण के लिये आती है। जो छूट विभीषण को मिली, उसी की आशा में यह विनय लिखी जा रही है। बात दोहराकर वह आशा दिखा दी गयी है, कही नहीं गयी।

राम पेड़ के नीचे और बन्दर डाल पर, और उन्हीं को उन्होंने अपने समान बना लिया। यहाँ स्वामी नीचे है और सेवक ऊपर, और यह उलटाव बैठक से कहा गया है। तुलसी कहते हैं कि राम-जैसा शीलवान् स्वामी कहीं नहीं है, और शील का प्रमाण यही बैठक है।

फिर याचना नहीं, दलील आती है: हे राम, आपकी अच्छाई से सबका भला है। यदि यह बात सच है, तो तुलसीदास का भी भला होगा। कवि अपने लिये छूट नहीं माँग रहा। वह कह रहा है कि जो नियम बताया गया है वह उस पर भी लागू होना चाहिये। इसमें दया की जगह तर्क रखा गया है।

और फिर कवि अपना रुख़ बदल लेता है: इस प्रकार अपने गुण और दोष कहकर, और सबको फिर सिर नवाकर, मैं राम का निर्मल यश कहता हूँ। उसे सुनकर कलियुग के पाप नष्ट होते हैं। एक शब्द यहाँ खटकता है, गुण। जो कहा गया उसमें दोषों की गिनती लम्बी थी, और गुण के नाम पर इतना ही आया था कि स्वामी ने उनकी भक्ति और बुद्धि सराही।

यह कथा यहाँ तक पहुँची कैसे

याज्ञवल्क्य ने जो सुहावनी कथा मुनिश्रेष्ठ भरद्वाज को सुनायी थी, उसी संवाद को मैं बखानकर कहूँगा। इतने में ही वह संवाद सामने आ जाता है जिसे तुलसी आगे कहेंगे, एक कहनेवाला और एक सुननेवाला। और सुननेवालों से कहा जाता है: सब सज्जन सुख मानते हुए सुनिये।

फिर परम्परा पीछे की ओर खोली जाती है। शिव ने यह सुहावना चरित रचा और फिर कृपा करके पार्वती को सुनाया। वही चरित शिव ने काकभुशुण्डि को दिया, उन्हें रामभक्त और अधिकारी पहचानकर।

इस श्रृंखला में एक ही जगह शर्त लगायी गयी है, और वह यही जगह है। पार्वती को देते समय कोई जाँच नहीं लिखी गयी, याज्ञवल्क्य के पाने में भी नहीं। जाँच वहाँ लिखी गयी जहाँ लेनेवाला एक कौआ है, और वह जाँच जाति, रूप या पद की नहीं थी: अधिकारी, यानी जो पाने के योग्य हो। योग्यता की यह परिभाषा इसी प्रसंग में आगे एक और रूप में लौटेगी।

उनसे याज्ञवल्क्य ने पाया और उन्होंने भरद्वाज को गाकर सुनाया। दोनों के विषय में कहा जाता है कि वक्ता और श्रोता समान शील के हैं, समदर्शी हैं, और भगवान् की लीला जानते हैं। ऊँच-नीच नहीं, बराबरी। फिर दायरा खोल दिया जाता है: और भी जो समझदार हरिभक्त हैं, वे इस चरित को नाना प्रकार से कहते, सुनते और समझते हैं। इसी नाना प्रकार पर इस प्रसंग का अन्त टिकेगा।

सूकरखेत का वह लड़का

अब तक जितनी कड़ियाँ गिनायी गयीं, सब पूरी थीं। देनेवाला ज्ञानी था, लेनेवाला योग्य था। इसके ठीक बाद कवि अपने को इस श्रृंखला में जोड़ता है, और जो कड़ी वह जोड़ता है वह अकेली टूटी हुई कड़ी है।

फिर वही कथा मैंने सूकरखेत में अपने गुरु से सुनी। पर लड़कपन के कारण उस समय बहुत बेसुध था, इसलिये उसे वैसा समझा नहीं। एक लड़का बैठा है, कथा चल रही है, और उसके सिर पर से गुज़र रही है।

जगह का नाम वे बता देते हैं, सूकरखेत। जिससे सुना, उनका नाम नहीं बताते। पूरे वृत्तान्त में गुरु केवल गुरु रहते हैं।

फिर कारण गिनाये जाते हैं: राम की कथा गूढ़ है और उसके वक्ता तथा श्रोता दोनों ज्ञान के खज़ाने होते हैं। मैं कलियुग के मल से ग्रसा जड़ जीव उसे कैसे समझता। थोड़ा पहले याज्ञवल्क्य और भरद्वाज को समान शील के वक्ता और श्रोता कहा गया था। अब वही वक्ता और श्रोता ज्ञान के खज़ाने कहे जाते हैं, और बात अपने ऊपर लौटती है। यहाँ जोड़ी बराबर की नहीं थी, इसलिये बात नहीं उतरी।

और जो सुधार हुआ, वह किसी वरदान से नहीं हुआ। गुरु ने बार-बार कही, तब बुद्धि के अनुसार कुछ समझ में आयी। शिक्षक ने बात दोहरा दी, और इतने से काम चल गया। जो समझ में आया उसका नाप भी छोटा ही रखा गया है, कुछ।

अब वह बात, जिसमें इस ग्रन्थ का प्रयोजन लिखा है, और वह प्रयोजन निजी है: उसी को मैं भाषा में बाँधूँगा, जिससे मेरे मन को सन्तोष हो। और जो कहेंगे वह भी अपने बल पर नहीं: जितना बुद्धि और विवेक का बल है, उसके अनुसार हृदय में हरि की प्रेरणा से कहूँगा। अपने सन्देह, मोह और भ्रम को हरनेवाली यह कथा उनके लिये संसाररूपी नदी की नाव है, और नाव बनानेवाला ख़ुद उस पार जाना चाहता है।

रामकथा किस-किस के समान है

अपने मन के लिये कही जा रही यह कथा तुरन्त सबके लिये खुल जाती है। और उपमाओं की एक लम्बी माला शुरू होती है। रामकथा पण्डितों को विश्राम देती है, सब लोगों को प्रसन्न करती है, और कलियुग के पाप का नाश करती है।

यह कलियुगरूपी साँप के लिये मोरनी है, और विवेक की अग्नि के लिये अरणि है। अरणि वह लकड़ी है जिसे रगड़ने पर आग निकलती है। कथा आग देती नहीं, उसे घिसना पड़ता है। और यह श्रम सुननेवाले के हिस्से में छोड़ दिया गया है।

माला आगे चलती है: कलियुग में मनचाहा देनेवाली कामधेनु, सज्जनों के लिये संजीवनी बूटी, पृथ्वी पर अमृत की नदी। भ्रमरूपी मेंढकों के लिये सर्पिणी, नरकों का नाश करनेवाली, साधुरूपी देवताओं के कुल का हित करनेवाली पार्वती, संतसमाज के क्षीरसागर के लिये लक्ष्मी। सारे विश्व का भार उठानेवाली अचल पृथ्वी, यमदूतों के मुँह पर कालिख लगाने के लिये यमुना, और जीव को मुक्ति देने के लिये मानो काशी।

इस पूरी माला में एक भी उपमा पुरुष की नहीं है: मोरनी, अरणि, गाय, बूटी, नदी, सर्पिणी, पार्वती, लक्ष्मी, पृथ्वी, यमुना, काशी। कारण व्याकरण में है। कथा शब्द स्त्रीलिंग है, इसलिये उसके बराबर रखी गयी हर चीज़ भी स्त्रीलिंग है। तुलसी ने इससे पूरी एक स्त्री-सृष्टि खड़ी कर दी, जिसमें देवियाँ हैं, नदियाँ हैं, एक नगरी है और एक गाय है।

और उसी माला के बीच अचानक दो नाम आ जाते हैं जो बाक़ी सबसे अलग हैं।

यह कथा राम को पवित्र तुलसी के समान प्रिय है, और तुलसीदास के लिये हृदय से हित करनेवाली हुलसी के समान है। टीका बताती है कि हुलसी तुलसीदास की माता का नाम है। एक साथ दो जोड़ी आमने-सामने बैठी हैं: राम को प्रिय तुलसी, और कवि का हृदय से हित करनेवाली उसकी माँ। और बीच में कवि अपना नाम रख देता है।

माला आगे बढ़ती है: शिव को नर्मदा के समान प्यारी, सब सिद्धियों और सुख-सम्पत्ति की राशि। सद्गुणरूपी देवताओं के लिये माता अदिति के समान, और राम की भक्ति तथा प्रेम की परम सीमा-सी। और फिर वह चित्र आता है जिसमें उपमा उपमा रहती ही नहीं।

रामकथा मन्दाकिनी है, सुन्दर चित्त चित्रकूट है, सुन्दर स्नेह वन है, और उसमें सीता और राम विहार करते हैं। नदी वह कथा है जो सुनी जा रही है, पहाड़ सुननेवाले का अपना निर्मल चित्त है, और वन उसका अपना स्नेह है। जो जगह बन रही है, वह सुननेवाले के ही सामान से बन रही है।

यहाँ जैसा या समान कुछ नहीं कहा गया। नदी, पहाड़ और वन सीधे रख दिये गये हैं। और अन्त में उपमा है ही नहीं: वहाँ सीता और राम विहार करते हैं। कथा सुनते हुए जो मन बनता है, वही वन है, और लीला वहीं चल रही है।

और राम के गुण किस-किस के समान हैं

इसके बाद दूसरी माला शुरू होती है, और विषय बदल जाता है। अब बात रामचरित की और राम के गुणसमूह की है। विषय बदलते ही उपमाएँ बदल जाती हैं। अब सद्गुरु, वैद्य, माता-पिता, मन्त्री, अगस्त्य, सिंह का बच्चा, अतिथि, मेघ, सूर्य, कल्पवृक्ष और हंस आते हैं। यहाँ भी उपमा उस शब्द के व्याकरण से मेल खाती है जिसकी बात हो रही है। दूसरी माला में भी माता है और गंगा की तरंगें हैं, पर उसकी ज़्यादातर उपमाएँ पुरुष की हैं।

रामचरित सुन्दर चिन्तामणि है और संतों की सुबुद्धिरूपी स्त्री का शृंगार है। राम के गुणसमूह ज्ञान, वैराग्य और योग के लिये सद्गुरु हैं, और संसाररूपी भयंकर रोग के लिये देवताओं के वैद्य हैं। फिर वे सीता और राम के प्रेम के माता-पिता कहे जाते हैं। वे प्रेम देते नहीं, उसे जन्म देते हैं और पालते हैं, जैसे अरणि में आग तैयार नहीं मिलती, पैदा होती है।

आगे वे पाप, सन्ताप और शोक का नाश करनेवाले, और इस लोक तथा परलोक दोनों के प्रिय पालक कहे जाते हैं। फिर विचाररूपी राजा के वे शूरवीर मन्त्री हैं, और लोभरूपी अपार समुद्र के लिये कुम्भज, जिन्हें टीका अगस्त्य बताती है। इस माला में लोभ अकेला ऐसा दोष है जिसे समुद्र की तरह रखा गया है। समुद्र से लड़ा नहीं जाता, उसका एक ही उपाय है कि कोई उसे पी जाय। और लोभ भी किसी सीमा पर जाकर भरता नहीं।

फिर काम, क्रोध और कलियुग के पाप हाथियों का झुंड हैं, और वह झुंड भक्त के अपने मन के वन में रहता है। उसके सामने जो खड़ा किया जाता है वह सिंह नहीं, सिंह का बच्चा है। हाथियों के झुंड के सामने जो खड़ा होता है, उसे बड़ा होने की ज़रूरत नहीं।

फिर वे शिव के पूज्य और प्रियतम अतिथि कहे जाते हैं, और दरिद्रतारूपी दावानल के लिये कामना पूरी करनेवाला मेघ। दावानल हाथ से नहीं बुझता, उसके लिये आकाश से पानी उतरना पड़ता है। फिर विषयरूपी साँप के लिये मन्त्र और महामणि, और उसके बाद: ललाट पर लिखे हुए वे बुरे लेख, जो कठिनाई से मिटते हैं, वे मिटा देते हैं। टीका इसे मन्द प्रारब्ध कहती है। इस माला में बाक़ी जो कुछ मिटाया जाता है, वह रोग, पाप, शोक, लोभ, काम-क्रोध, दरिद्रता, विषय और मोह है। यह एक उपमा उसे मिटाती है जो लिखा जा चुका है। और माला के अन्त में वे सेवक के मनरूपी मानसरोवर के हंस कहे जाते हैं। यही शब्द इस ग्रन्थ के नाम में है, और अगला प्रसंग उसी सरोवर पर ठहरेगा।

फिर छह चीज़ें गिनायी जाती हैं: कुमार्ग, कुतर्क, कुचाल, और कलियुग के कपट, दम्भ तथा पाखण्ड। और इन सबके लिये राम के गुणसमूह वैसे हैं जैसे ईंधन के लिये प्रचण्ड अग्नि। ईंधन आग से लड़ता नहीं। दोनों का मिलना तय है और उसका नतीजा भी।

फिर चन्द्रमा आता है। रामचरित पूर्णिमा के चन्द्रमा की किरणों की तरह सबको सुख देते हैं। पर सज्जनरूपी कुमुदिनी और चकोर के चित्त के लिये उनमें विशेष हित और बड़ा लाभ है। चाँदनी सब पर बराबर पड़ती है। अन्तर लेनेवाले में है।

यही बात थोड़ा पहले एक और रूप में आ चुकी है। शिव ने काकभुशुण्डि को यह चरित तब दिया था जब उन्हें रामभक्त और अधिकारी पहचान लिया। वहाँ जो एक शब्द में था, वह यहाँ एक चित्र बनकर लौटता है। जो ले सकता है, वह अधिक पाता है।

सौ करोड़ रामायण

कथा शुरू होने से पहले कवि एक काम और करता है। जिस तरह पार्वती ने प्रश्न किया और जिस तरह शिव ने विस्तार से उत्तर दिया, वह सब कारण मैं गाकर कहूँगा। और कथा की रचना विचित्र बनाकर कहूँगा। अपने ही ग्रन्थ के बारे में पहले से बता दिया गया है कि बनावट अनोखी होगी।

जिसने यह कथा पहले न सुनी हो, वह सुनकर आश्चर्य न करे। जो ज्ञानी इस अलौकिक कथा को सुनते हैं, वे यह जानकर आश्चर्य नहीं करते कि जगत् में रामकथा की कोई सीमा नहीं है। राम के अवतार नाना प्रकार के हुए हैं और रामायण सौ करोड़ तथा अपार हैं। यह नहीं कहा गया कि दूसरी कथाएँ ग़लत हैं, न यह कि यही सही है। कहा यह गया है कि जगह बहुत है।

और जिस चीज़ को रोका जा रहा है उसका नाम ठीक-ठीक रखा गया है: आश्चर्य। उसे बार-बार रोका जाता है। जो पाठक किसी और रामकथा में पला है, वह यहाँ कुछ ऐसा पायेगा जो उसने वैसा नहीं सुना था। उसी चौंक को पहले से सँभाला जा रहा है। कारण तीन हैं: कल्पभेद के अनुसार मुनीश्वरों ने हरि के सुन्दर चरित्र अनेक प्रकार से गाये हैं, अवतार नाना प्रकार के हुए हैं, और रामायणों की गिनती सौ करोड़ है। और फिर निर्देश: सन्देह छोड़कर, आदर और प्रेम के साथ यह कथा सुनिये।

राम अनन्त हैं, उनके गुण अनन्त हैं, और उनकी कथा का विस्तार अपरिमित है। इसलिये जिनके विचार निर्मल हैं, वे इसे सुनकर आश्चर्य नहीं मानेंगे। इलाज निर्मल विचार है। चौंक नयी जानकारी से नहीं, सोचने का ढंग साफ़ होने से मिटती है।

और एक गिनती दोनों प्रसंगों को बाँध देती है। पिछला प्रसंग इस बात पर बन्द हुआ था कि शिव ने सौ करोड़ रामचरित में से यह एक नाम चुन लिया। यह प्रसंग इस बात पर बन्द होता है कि रामायण सौ करोड़ और अपार हैं। एक जगह वही संख्या बताती है कि कितना छोड़ा गया, दूसरी जगह कि कितनी जगह है।

कहानी से पहले की शर्तें

इतनी लम्बी बात, और एक भी घटना नहीं। पाठक को कहानी नहीं, वे शर्तें दी गयीं जिन पर कहानी दी जायगी। नाम सबसे ऊपर है, इस युग में उसके सिवा कुछ बनता नहीं। कहनेवाला अपने को सबसे नीचे रखता है। कथा एक परम्परा से आयी है जिसमें एक कड़ी टूटी हुई थी। और जो आगे कहा जायगा वह दूसरी कथाओं को झुठलाने के लिये नहीं कहा जायगा।

और इन शर्तों के भीतर कवि अपना नाम बुनता चलता है। भाँग से तुलसी हुआ तुलसीदास, और सीतानाथ-जैसे स्वामी का तुलसीदास-जैसा सेवक। वह तुलसी, जिसका भला तभी होगा जब राम की अच्छाई की बात सच हो। ज़्यादातर जगह वह वाक्य के छोटे पक्ष में है, और बाक़ी जगह वह राम के शील और कथा के वन की बात कहनेवाले की छाप है।

जिस पाठक को दूसरी रामकथाएँ याद हैं, उसके लिये एक बात और। यहाँ जो परम्परा गिनायी गयी है, उसमें शिव, पार्वती, काकभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य और भरद्वाज हैं। वाल्मीकि का नाम उसमें नहीं आता। वाल्मीकि की अपनी रामायण में कथा दूसरे रास्ते से आती है। वहाँ नारद संक्षेप में रामचरित वाल्मीकि को सुनाते हैं, ब्रह्मा के कहने पर वाल्मीकि काव्य रचते हैं, और लव-कुश उसे राम के सामने गाते हैं (बालकाण्ड, सर्ग 1 से 4)। शिव से पार्वती तक और याज्ञवल्क्य से भरद्वाज तक की यह कड़ी मानस की अपनी है। और साथ ही यह भी लिख दिया गया है कि रामायण सौ करोड़ हैं। यह ग्रन्थ अपनी जगह बनाते समय किसी दूसरे की जगह नहीं छीनता।

कवि ने अपनी सारी पूँजी नाम में रख दी, और अपने विषय में जो कहा वह लगभग सब घटाकर कहा। तो लिखने का साहस कहाँ से आया? इसका उत्तर भी यहीं है: जो कहूँगा वह हृदय में हरि की प्रेरणा से कहूँगा।

और आख़िर में वह लड़का, जो सूकरखेत में बैठा था और कथा को ठीक से समझ नहीं पाया था। गुरु ने बार-बार वही बात कही, और जितना हाथ आया उतने से यह ग्रन्थ खड़ा हुआ। जिस पाठक को लगता है कि उसने पहली बार में कुछ नहीं समझा, उसके लिये सूकरखेत में एक नज़ीर पहले से रखी है। वह लिखनेवाले की अपनी है। अगला प्रसंग उसी मन को एक सरोवर बनाकर दिखायेगा।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 26 से 33, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।