रामचरितमानस · बालकाण्ड · पुष्पवाटिका, पहली दृष्टि और सीता का गौरी-पूजन
पुष्पवाटिका, पहली दृष्टि और सीता का गौरी-पूजन
फूल लेने निकले दो भाई, गौरी से वर माँगने आयी जनकनन्दिनी, और वह पहली दृष्टि जिसकी छबि संध्या के चन्द्रमा से अगले प्रातः के सूर्य तक साथ रहती है।
सुबह दोनों भाई गुरु की पूजा के लिये फूल लेने निकलते हैं। उसी बाग में सीता को उनकी माता ने गौरी के पूजन के लिये भेजा है। एक ओर फूल चुनने की आज्ञा है, दूसरी ओर अपने योग्य सुन्दर वर की प्रार्थना। तुलसीदास इन दोनों यात्राओं को सरोवर, लताओं और पक्षियों से भरी एक वाटिका में मिला देते हैं। मिलने से पहले एक सखी देखती है, फिर उसकी दशा देखकर दूसरी सखियाँ कुछ समझती हैं, फिर आभूषणों की ध्वनि सुनायी पड़ती है। जिस रूप का दर्शन होने वाला है, उसका आगमन पहले किसी के पुलक में और किसी के कानों में होता है।
रामचरितमानस का यह प्रसंग उस पहली दृष्टि के बाद भी देर तक चलता है। सीता फिर गौरी के पास लौटती हैं। राम गुरु को सब कह सुनाते हैं। संध्या के आकाश में चन्द्रमा निकलता है तो उन्हें सीता का मुख याद आता है; अगले प्रातः सूर्य निकलता है तो लक्ष्मण को धनुष और राजाओं का विचार आता है। हम पहले उस बाग में चलें जहाँ दोनों भाई अभी माली से फूल लेने की अनुमति माँग रहे हैं। वहाँ जन्मी प्रीति के साथ प्रार्थना, संकोच, विश्वास और प्रतीक्षा सब अपनी अपनी जगह पाते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम गुरु के लिये पुष्प लेने निकले राजकुमार, जो सीता के दर्शन से अपने मन में उठी हलचल लक्ष्मण और फिर गुरु के सामने कहते हैं।
- सीता जनक की कन्या, माता की आज्ञा से गौरी-पूजन को आयी हैं और दर्शन के बाद फिर भवानी के चरणों में लौटती हैं।
- लक्ष्मण राम के साथ बाग में आये छोटे भाई, जो अगले प्रातः सूर्योदय में अपने प्रभु के प्रताप का संकेत देखते हैं।
- सखियाँ सीता की सयानी संगिनियाँ, जो दोनों भाइयों को दिखाती हैं, सीता का मन पहचानती हैं और समय होने पर उन्हें चलने को कहती हैं।
- गौरी गिरिजा और भवानी, जिनसे सीता प्रार्थना करती हैं और जिनका आशीर्वाद उन्हें हर्ष से भर देता है।
- विश्वामित्र दोनों भाइयों के गुरु, जिन्हें राम सब वृत्तान्त बताते हैं और जो दोनों के मनोरथ सफल होने की आशीष देते हैं।
- जनक और शतानन्द राजा जनक अन्त में शतानन्द को मुनि के पास अपना निमन्त्रण लेकर भेजते हैं।
फूल लेने की आज्ञा, और बाग का सुख
शौच और स्नान के बाद दोनों भाई अपने नित्यकर्म पूरे करते हैं और मुनि को सिर नवाते हैं। पोद्दारजी की टीका इन नित्यकर्मों में सन्ध्या और अग्निहोत्र का संकेत खोलती है। पूजा का समय जानकर वे गुरु की आज्ञा लेते हैं, फिर पुष्प लेने चलते हैं। कथा का पहला कदम यही छोटा सा अनुशासन है। जिस वाटिका में आँखें स्थिर हो जायँगी और मन रूप में रम जायेगा, वहाँ जाने का आरम्भ समय पहचानने और गुरु से अनुमति लेने में हुआ है। लौटते समय हाथ में फूल भी होंगे और कहने को पूरा वृत्तान्त भी।
राजा का बाग ऐसा है कि वसन्त स्वयं उसकी शोभा पर रीझकर वहीं रह गया हो। मनोहर वृक्ष हैं और अलग अलग रंगों की उत्तम लताओं के मण्डप। वृक्षों पर नये पत्ते, फल और फूल एक साथ शोभा दे रहे हैं। अपनी इस सम्पत्ति से वे कल्पवृक्ष को लजाते हैं। तुलसी पहले फैलाव दिखाते हैं, फिर उस फैलाव में जीवन भरते हैं। चातक, कोयल, तोते और चकोर बोल रहे हैं, मोर नृत्य कर रहे हैं। बाग का वैभव फल और फूल गिन लेने से पूरा नहीं होता; उसमें पक्षियों की बोली और मोरों की गति भी लगी हुई है।
बीच में सुन्दर सरोवर है। मणियों की सीढ़ियाँ अपने विचित्र विन्यास में चमक रही हैं। निर्मल जल में अनेक रंगों के कमल हैं। जलपक्षी कलरव करते हैं और भौंरे गुंजार। बाहर के वृक्षों और लताओं से भीतर के जल तक आते आते आँख के साथ कान भी इस बाग के अभ्यस्त हो चुके हैं। आगे कंकण, करधनी और नूपुर की ध्वनि इसी सुनायी पड़ती हुई वाटिका में आयेगी। अभी राम और लक्ष्मण बाग और सरोवर देखकर प्रसन्न हैं। कवि इस प्रसन्नता को बाग की सबसे बड़ी प्रशंसा बना देते हैं।
बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु हरषे बंधु समेत।
दोहा २२७
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥ २२७॥
जो राम को सुख दे रहा है, वह बाग कितना रमणीय होगा। पोद्दारजी इसी भाव को खोलते हैं कि जगत् को सुख देनेवाले यहाँ स्वयं सुख पा रहे हैं। फिर दोनों भाई चारों ओर देखते हैं, मालियों से पूछते हैं और प्रसन्न मन से पत्ते तथा फूल चुनने लगते हैं। बाग राजकीय है, फूल पूजा के लिये हैं, चुननेवाले राजकुमार हैं; फिर भी माली से पूछा जाता है। तुलसी अनुमति के इस छोटे व्यवहार को लिखकर आगे बढ़ते हैं, और उसी क्षण दूसरी ओर से सीता आ जाती हैं। माता ने उन्हें गिरिजा की पूजा करने भेजा है।
साथ की सखियाँ सुन्दर और सयानी हैं, उनकी मनोहर वाणी में गीत हैं। सरोवर के पास गिरिजा का मन्दिर शोभा पा रहा है। उसे देखकर मन मोहित हो जाता है, और कवि उसका पूरा वर्णन करने में अपने को असमर्थ कहते हैं। सीता सखियों के साथ सरोवर में स्नान करती हैं, प्रसन्न मन से गौरी के मन्दिर में जाती हैं और बड़े अनुराग से पूजा करती हैं। इस पहली पूजा की प्रार्थना साफ़ कही गयी है।
मज्जनु करि सर सखिन्ह समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता॥
चौपाई १
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥
सीता अपने अनुरूप सुन्दर वर माँगती हैं। अभी सखी बाग का समाचार लेकर नहीं लौटी है, अभी राम का दर्शन नहीं हुआ है। प्रार्थना में अनुरूपता और सौन्दर्य दोनों हैं। आगे इसी मन्दिर में दूसरी बार आकर सीता अपने मनोरथ को अनकहा छोड़ देंगी, क्योंकि तब वे माता को हृदय का निवासी कहकर पुकारेंगी। दोनों बार का पूजन अपने अपने क्षण का अर्थ रखता है। पहली बार माता की आज्ञा से आयी कन्या अपने योग्य वर की कामना रख रही है।
गुरु की आज्ञा से आये राम और लक्ष्मण बाग की शोभा देखकर प्रसन्न होते हैं और मालियों से पूछकर पुष्प चुनते हैं। माता की आज्ञा से आयी सीता स्नान के बाद गौरी की पहली पूजा करती हैं और अपने अनुरूप सुन्दर वर माँगती हैं।
सखी की आँखों में आया समाचार
एक सखी सीता का साथ छोड़कर फुलवाड़ी देखने गयी हुई थी। वहाँ उसकी दृष्टि दोनों भाइयों पर पड़ती है। लौटती है तो अपने देखे हुए के प्रभाव में डूबी हुई है। सखियाँ उसके पुलकित शरीर और जल भरे नेत्रों को देखकर कोमल वाणी में प्रसन्नता का कारण पूछती हैं। समाचार कहे जाने के पहले शरीर उसे बता चुका है। इतनी प्रसन्नता किस दर्शन से मिली है, सब उसी को जानना चाहती हैं। सखी उत्तर देती है कि दो किशोर राजकुमार बाग में आये हैं, एक श्याम, एक गौर, दोनों हर प्रकार से सुन्दर।
देखन बागु कुअँर दुइ आए । बय किसोर सब भाँति सुहाए॥
चौपाई २
स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी॥
उनकी शोभा कहने की कठिनाई को सखी बहुत पास की बात बना देती है। वाणी के नेत्र नहीं हैं और नेत्रों के पास वाणी नहीं है। जिसने देखा वह बोल नहीं सकता, जो बोल सकता है उसने अपने नेत्रों से देखा ही नहीं। इसीलिये उसकी आँख के जल और शरीर के पुलक का इतना अर्थ है। वे उस सौन्दर्य का प्रभाव पहुँचा रहे हैं जिसे वर्णन अभी पहुँचा नहीं पाया। सुनकर सयानी सखियाँ हर्षित होती हैं। साथ ही वे सीता के हृदय की उत्कण्ठा पहचान लेती हैं।
एक सखी कहती है कि ये वही राजकुमार हैं जिनके कल विश्वामित्र मुनि के साथ आने का समाचार सुना था। इनके रूप ने नगर के स्त्री और पुरुष सबको अपने वश में कर लिया है। जहाँ देखिये, लोग इन्हीं की छबि कहते हैं। इन्हें अवश्य देखना चाहिये, ये दर्शन के योग्य हैं। सखी नगर की उस चर्चा को सीता के सामने ले आती है; उसकी कही बातों से सीता के नेत्र दर्शन के लिये और अकुला उठते हैं। जिस प्रिय सखी ने उन्हें देखा है, उसी को आगे करके सीता चल पड़ती हैं।
यहाँ तुलसी पुरातन प्रीति कहते हैं, जिसे कोई पहचान नहीं पाता। उसी के साथ सीता को नारद के वचनों का स्मरण होता है और मन में पवित्र प्रेम जागता है। उन वचनों का विस्तार इस घड़ी नहीं सुनाया जाता। इतना जानना ही यहाँ पर्याप्त है कि जिस दर्शन की ओर कदम बढ़ रहे हैं, उसके भीतर एक स्मृति भी साथ चल रही है। सामने फुलवाड़ी है, भीतर नारद का कहा हुआ; सखियों को उत्कण्ठा दिखती है, उस पुरानी प्रीति की पूरी पहचान नहीं होती।
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत।
दोहा २२९
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत॥ २२९॥
सीता चारों ओर चकित होकर देखती हैं, जैसे भयभीत मृगछौनी। दर्शन की इच्छा इतनी तीव्र है कि आँखें एक दिशा में ठहर नहीं रहीं। उपमा में बालपन की कोमलता और सँभल सँभलकर देखने का संकोच साथ हैं। सखी आगे है, किन्तु देखने की आतुरता स्वयं सीता की है। बाग का फैलाव अब उनके लिये उन दोनों कुमारों को ढूँढ़ने का स्थान बन गया है।
दोनों भाइयों को देखकर लौटी सखी का पुलक और आँसू उनका समाचार देते हैं। सीता उसकी बात सुनकर दर्शन को चलती हैं। नारद के वचन याद आते हैं, पवित्र प्रीति जागती है और उनकी आँखें चारों ओर खोजने लगती हैं।
पहले आहट, फिर स्थिर हो गयी दृष्टि
इधर राम को कंकण, करधनी और नूपुर की ध्वनि सुनायी पड़ती है। वे मन में विचारकर लक्ष्मण से कहते हैं कि मानो कामदेव ने संसार को जीतने का संकल्प किया हो और डंके पर चोट दे दी हो। अभी देखा नहीं है, आहट ही इतनी समर्थ है। विश्वविजय का विचार इस महीन झंकार में सुन लेना राम के मन में उठते आकर्षण को सीधे सामने रख देता है। इतना कहकर वे उस दिशा में मुड़कर देखते हैं।
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा । सिय मुख ससि भए नयन चकोरा॥
चौपाई ३
भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल॥
सीता का मुख चन्द्रमा है और राम के नेत्र उसके चकोर हो गये हैं। सुन्दर आँखें अचल हो जाती हैं। पलकों के ठहरने पर निमि की जो बात आती है, उसकी पूरी कोमलता पोद्दारजी की टीका खोलती है। निमि जनक के पूर्वज हैं और सबकी पलकों में उनका निवास माना गया है। बेटी और दामाद के मिलन को देखना उचित न जानकर मानो वे संकोच से पलकों को छोड़ गये हों। इसी कल्पना में पलक गिरना रुक जाता है। दर्शन की स्थिरता के भीतर पूर्वज का संकोच आ गया है; रूप को देखती हुई आँख के साथ सम्बन्ध की मर्यादा भी दिखाई देती है।
सीता की शोभा राम को सुख देती है। वे हृदय में उसकी सराहना करते हैं, पर वाणी नहीं निकलती। जैसे ब्रह्मा ने अपनी सारी निपुणता को आकार देकर संसार के सामने प्रकट कर दिया हो। यह सौन्दर्य सुन्दरता को भी सुन्दर करता है। तुलसी उसे रूप के घर में जलती दीपशिखा कहते हैं। पोद्दारजी बताते हैं कि उस लौ से सुन्दरता का भवन ही जगमगा उठा है। उपमा का केंद्र किसी एक आभूषण पर नहीं टिकता; वह उस प्रकाश पर है जिसमें सौन्दर्य स्वयं अधिक सुन्दर दिखाई देता है।
कवि की कठिनाई भी सखी की कठिनाई के पास आ खड़ी होती है। सखी के नेत्र बोल नहीं पाते थे। कवि के पास उपमाएँ हैं, किन्तु सबको पहले के कवि बरत चुके हैं, सब जूठी पड़ी हैं। जनकनन्दिनी की तुलना किससे की जाय। इसी बीच राम अपने मन की दशा पर विचार करते हैं और पवित्र मन से समय के अनुरूप लक्ष्मण से बोलते हैं। दर्शन ने उन्हें चुप किया था; अब उसी दर्शन की बात वे अपने भाई से कह रहे हैं।
वे सीता का परिचय देते हैं कि यह वही जनक की कन्या हैं जिनके लिये धनुषयज्ञ हो रहा है। सखियाँ इन्हें गौरी के पूजन के लिये लायी हैं, और ये फुलवाड़ी में प्रकाश करती हुई विचर रही हैं। उनकी अलौकिक शोभा देखकर मेरा स्वभाव से पवित्र मन क्षुब्ध हो गया है। इसके सब कारण विधाता जानते हैं। साथ ही वे अपने मंगलदायक अंगों का फड़कना कहते हैं। टीका स्पष्ट करती है कि राम के दाहिने अंग फड़क रहे हैं। मन की हलचल और मंगल का यह संकेत एक साथ भाई के सामने रखा जाता है।
फिर राम रघुवंशियों के सहज स्वभाव का स्मरण करते हैं। उनका मन कभी कुमार्ग पर पैर नहीं रखता। उन्हें अपने मन पर बहुत विश्वास है, जिसने स्वप्न में भी परायी स्त्री की ओर दृष्टि नहीं की। आगे वे श्रेष्ठ पुरुषों की तीन पहचान कहते हैं। युद्ध में शत्रु उनकी पीठ नहीं देख पाते, परायी स्त्री उनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पाती, और माँगनेवाला उनके यहाँ से खाली नहीं लौटता। ऐसे पुरुष संसार में थोड़े हैं। साहस, संयम और उदारता को राम एक ही स्वभाव की पहचान के रूप में रखते हैं।
इस विचार के बीच उनकी सीता में लगी हुई दृष्टि और प्रीति बनी रहती है। मन के शुद्ध होने का विश्वास उन्हें अपनी दशा कहने देता है। वे आकर्षण को पहचान रहे हैं, अपने कुल का स्वभाव याद कर रहे हैं और भाई को वह सब सुना रहे हैं। दोहा इस बातचीत की दूसरी, भीतर चलती हुई गति भी दिखा देता है।
करत बतकही अनुज सन मन सिय रूप लोभान।
दोहा २३१
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान॥ २३१॥
मुख से लक्ष्मण के साथ बातचीत चल रही है। मन सीता के मुखकमल की छबि का मकरन्द भौंरे की तरह पी रहा है। बाग में जिन भ्रमरों की गुंजार अभी सुनी थी, उन्हीं का रूपक अब मन के लिये आया है। सामने के सरोवर और मन की अवस्था के बीच इतनी सहज आवाजाही है कि सौन्दर्य का वर्णन कथा से अलग नहीं पड़ता। राम जो बोल रहे हैं और जिस रूप में उनका मन लगा है, दोनों एक ही समय हमारे सामने हैं।
आभूषणों की झंकार सुनकर राम कामदेव के डंके की उपमा देते हैं और सीता को देखकर स्थिर हो जाते हैं। वे लक्ष्मण से अपना आकर्षण, मन की पवित्रता पर विश्वास और रघुवंश का स्वभाव कहते हैं। बातचीत के बीच उनका मन सीता की छबि में लगा रहता है।
नेत्रों का पथ और पलकों के किवाड़
सीता अभी चारों ओर चकित होकर देख रही हैं। मन में चिन्ता है कि वे राजकुमार कहाँ चले गये। मृगछौने जैसे नेत्र जिस ओर पड़ते हैं, तुलसी वहाँ श्वेत कमलों की कतार बरसती हुई देखते हैं। खोजती हुई दृष्टि भी वाटिका को और सुन्दर कर रही है। तब सखियाँ लता की ओट में खड़े श्याम और गौर किशोरों को दिखाती हैं। उनके रूप को देखकर सीता के नेत्र ललचा उठते हैं और ऐसे हर्षित होते हैं जैसे अपना ही खजाना पहचान लिया हो। यहाँ पहचान का सुख है। जिस पुरातन प्रीति को कोई लख नहीं पाया था, उसका संकेत आँखों की इस निधि में फिर सुनायी पड़ता है।
राम की छबि देखते हुए सीता के नेत्र स्थिर हो जाते हैं। पलकों का गिरना रुक जाता है और अधिक स्नेह से शरीर विह्वल हो उठता है। शरद के चन्द्रमा को देखती चकोरी की उपमा आती है। कुछ ही पहले राम की आँखें चकोर थीं और सीता का मुख चन्द्रमा। अब सीता चकोरी हैं और सामने राम की छबि है। कवि दोनों ओर की दृष्टि को पूरा समय देते हैं। एक की देखने की अवस्था कहकर दूसरे के देखने को उसी में समेट नहीं देते।
लोचन मग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी॥
चौपाई ४
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी॥
आँखों के रास्ते राम को हृदय में लाकर सीता पलकों के किवाड़ लगा देती हैं। पहले पलक झपकना अपने आप रुक गया था; अब पलकों का बन्द होना भी उसी प्रेम का काम है। भीतर उतारी हुई छबि के सामने ध्यान ठहर गया है। सखियाँ उन्हें प्रेम के वश जानकर मन में संकोच करती हैं, कुछ कह नहीं पातीं। इस दृश्य में बहुत लोग साथ हैं, फिर भी प्रत्येक को दूसरे के मन की सीमा समझ में आ रही है। अभी जिन सखियों ने राजकुमार दिखाये थे, वही इस क्षण मौन हो जाती हैं।
तभी दोनों भाई लताओं के मण्डप से बाहर आते हैं, जैसे बादलों का पर्दा हटाकर दो निर्मल चन्द्रमा निकले हों। दोनों शोभा की सीमा हैं, एक की आभा नीले कमल जैसी और दूसरे की पीले कमल जैसी। सिर पर मोरपंख हैं, बीच बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे लगे हैं। माथे का तिलक और श्रम की बूँदें एक साथ सुशोभित हैं। कानों में आभूषणों की छबि, टेढ़ी भौंहें, घुँघराले केश और नये लाल कमलों जैसे नेत्र हैं। फूल चुनने आये कुमारों के इस रूप में बाग की कलियाँ भी उनके साथ बाहर आयी हैं।
ठोड़ी, नासिका और कपोल सुन्दर हैं। हँसी की शोभा मन को मोल ले लेती है। मुख की छबि पर कवि फिर कहते हैं कि उसका वर्णन उनसे नहीं बनता, उसे देखकर अनेक कामदेव लजा जाते हैं। वक्ष पर मणियों की माला है और गला शंख के समान सुन्दर। भुजाओं की उपमा कामदेव के हाथी के बच्चे की सूँड़ से दी गयी है। पोद्दारजी इस उपमा में भुजाओं की कोमलता और सुन्दर उतार चढ़ाव बताते हैं; उसी चौपाई में वे भुजाएँ बल की सीमा भी हैं। कोमल रूप और असाधारण बल एक ही देह में दिखाई देते हैं।
उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बलसींवा॥
चौपाई ५
सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुअँर सखी सुठि लोना॥
बायें हाथ में फूलों से भरा दोना है। उसी छोटे संकेत से सामने के दो भाइयों में साँवले कुमार की सलोनी छबि पर दृष्टि ठहरती है। सिंह के समान कमर, पीत वस्त्र और शोभा के साथ शील का भण्डार। सूर्यकुल के भूषण राम को देखकर सखियाँ अपने आप को भूल जाती हैं। जिस सखी के आँसू देखकर आरम्भ में सबने कारण पूछा था, उस अनुभव के भीतर अब पूरा सखीसमूह आ गया है। देखने के लिये दूसरों को लानेवाली आँखों को स्वयं भी सँभलना पड़ रहा है।
सखियाँ लताओं की ओट में दोनों भाई दिखाती हैं। सीता राम को नेत्रों से हृदय में उतारकर पलकें बन्द कर लेती हैं। दोनों भाई बाहर आते हैं तो मोरपंख, कलियों, तिलक, श्रमबिन्दुओं, आभूषणों और फूलों के दोने सहित उनकी शोभा देखकर सखियाँ भी अपने को भूल जाती हैं।
पिता का प्रण और बार बार लौटती आँखें
एक सयानी सखी धीरज सँभालती है और सीता का हाथ पकड़कर कहती है कि गौरी का ध्यान फिर कर लीजिये, अभी राजकुमार को देख लीजिये। आँखें बन्द किये हुए सीता राम का ध्यान कर रही हैं; सखी उसे गौरी का ध्यान कहकर पुकारती है। उसी विनोद में उन्हें फिर सामने देखने का अवसर देती है। सीता सकुचाकर आँखें खोलती हैं। सामने दोनों रघुकुल के सिंह हैं। नख से शिख तक राम की शोभा देखती हैं और उसी के साथ पिता का प्रण याद आ जाता है। मन में बड़ा क्षोभ उठता है।
सौन्दर्य का पूरा दर्शन होते ही धनुष की बात बीच में आती है। जिसे हृदय ने अपना मान लिया, उसके मिलने की राह पर पिता का प्रण है। सखियाँ सीता को प्रेम के अधीन देखकर भय से कहती हैं कि बड़ी देर हो गयी। एक सखी यह भी कहती है कि कल इसी समय फिर आयेंगी, और मन में हँस पड़ती है। उसका वाक्य लौटने की जल्दी के बीच फिर आने की आशा रख देता है। इस रहस्यभरी बात को सुनकर सीता संकुचित होती हैं। देर हो जाने से माता का भय भी लगता है।
वे बड़ा धीरज धारण करती हैं, राम को हृदय में रखती हैं और अपने को पिता के अधीन जानकर लौट चलती हैं। लौटना बाहर की गति है, प्रेम की गति अभी उसी ओर है जहाँ राम खड़े हैं। इसलिए मार्ग में मृग, पक्षी और वृक्ष देखने का बहाना बनता है। बाग के वे ही जीव और वृक्ष अब पीछे मुड़ने के अवसर देने लगते हैं।
देखन मिस मृग बिहग तरु फिरइ बहोरि बहोरि।
दोहा २३४
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि॥ २३४॥
सीता बार बार घूमती हैं, राम की छबि फिर देखती हैं, और प्रेम बहुत बढ़ता जाता है। शिव के धनुष की कठोरता याद करके उनके मन में विलाप है। पोद्दारजी की टीका इस चिन्ता का भाव खोलती है कि ऐसे सुकुमार राम कठोर धनुष को कैसे तोड़ेंगे। टीका के अनुसार प्रेम में ऐश्वर्य का विस्मरण होने से यह व्याकुलता हुई है; भगवान् के बल का स्मरण लौटते ही हर्ष भी लौट आता है। इस तरह उनके हृदय में बसायी साँवली मूर्ति के साथ धनुष की चिन्ता और बल की स्मृति दोनों उपस्थित हैं।
राम सुख, स्नेह, शोभा और गुणों की खान जानकी को जाते हुए देखते हैं। तब वे परम प्रेम की कोमल स्याही बनाकर सीता के स्वरूप को अपने चित्त की सुन्दर भित्ति पर लिख लेते हैं। थोड़ी देर पहले सीता ने नेत्रों से राम को हृदय में उतारा था; अब राम के चित्त की दीवार पर सीता का चित्र है। बाहर दोनों अलग दिशाओं में जा रहे हैं। भीतर एक दूसरे का रूप साथ है। इसी बिन्दु पर सीता की राह फिर भवानी के मन्दिर की ओर मुड़ती है।
सखी के कहने पर सीता आँखें खोलती हैं और राम को देखकर पिता का प्रण याद करती हैं। माता के भय और पिता के अधीन होने का विचार उन्हें लौटाता है, किन्तु वे बार बार मुड़कर दर्शन करती हैं। राम भी प्रेम की स्याही से सीता का स्वरूप अपने चित्त में अंकित कर लेते हैं।
दूसरी बार गौरी के चरणों में
सीता फिर भवानी के भवन में जाती हैं। चरणों की वन्दना करके हाथ जोड़ती हैं और अब उनकी स्तुति विस्तार से खुलती है। वे श्रेष्ठ पर्वतराज हिमाचल की पुत्री की जय कहती हैं, महादेव के मुखचन्द्र को देखनेवाली चकोरी की जय कहती हैं। गणेश और छह मुखवाले स्वामिकार्तिक की माता को प्रणाम है। वे जगत् की जननी हैं और उनके शरीर की कान्ति बिजली के समान है। जिस चन्द्र और चकोर की उपमा में अभी राम और सीता की दृष्टियाँ मिली थीं, वह अब गौरी और महादेव के सम्बन्ध की स्तुति में आती है।
इसके बाद प्रार्थना उस रूप से उसके अपरिमित प्रभाव की ओर जाती है। माता का आदि, मध्य और अन्त नहीं है। वेद भी उनकी असीम महिमा को नहीं जानते। वे संसार की उत्पत्ति, पालन और नाश करनेवाली हैं। सारे विश्व को मोहित करती हैं और अपनी ही इच्छा से विहार करती हैं। सीता जिन चरणों पर झुकी हैं, उनकी शक्ति समस्त संसार में व्याप्त है। फिर वे माता के दाम्पत्य के आदर्श को सामने रखती हैं। पति को इष्टदेव माननेवाली श्रेष्ठ स्त्रियों में उनका पहला स्थान है। हजारों सरस्वती और शेष भी उनकी असीम महिमा नहीं कह सकते।
सीता उन्हें वर देनेवाली और त्रिपुर के शत्रु शिव की प्रिया कहती हैं। माता की सेवा से चारों फल सुगम हो जाते हैं। उनके चरणकमलों का पूजन करके देवता, मनुष्य और मुनि सभी सुख पाते हैं। स्तुति के इस विस्तार में कन्या की अपनी इच्छा अभी नहीं बोली गयी। वह जगज्जननी के सामर्थ्य को, उनकी दाम्पत्यनिष्ठा को और सबके लिये सुखदायी चरणों को प्रणाम करती है। फिर अपने मन की बात पर आती है, और उसे प्रकट न करने का कारण भी उन्हीं माता के स्वरूप में पाती है।
मोर मनोरथु जानहु नीकें । बसहु सदा उर पुर सबही कें॥
चौपाई ६
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
आप मेरा मनोरथ भलीभाँति जानती हैं, क्योंकि आप सबके हृदयरूपी नगर में सदा निवास करती हैं। इसी कारण मैंने उसे प्रकट नहीं किया। यह कहकर सीता चरण पकड़ लेती हैं। पहली पूजा में अपने अनुरूप सुन्दर वर माँगा था। इस बार सामने देखी हुई साँवली छबि मन में है और प्रार्थना उस हृदय को जाननेवाली देवी के सामने है। सीता को उस इच्छा के लिये अलग शब्दों की आवश्यकता नहीं लगती। माता के सर्वत्र निवास का जो बड़ा भाव स्तुति में आया, वही यहाँ अपनी छोटी सी अनकही बात का आधार हो जाता है।
भवानी उनके विनय और प्रेम के वश हो जाती हैं। माला खिसक पड़ती है और मूर्ति मुसकराती है। सीता उस माला को प्रसाद मानकर आदर से अपने सिर पर रखती हैं। अब गौरी बोलती हैं, उनका अपना हृदय भी हर्ष से भर गया है। वे सीता को अपनी सच्ची आशीष सुनाती हैं कि उनकी मनोकामना पूर्ण होगी। नारद के वचन सदा पवित्र और सत्य हैं; जिस वर में मन अनुरक्त हुआ है, वही मिलेगा। सुबह स्मरण में आये नारद के वचन अब देवी के आश्वासन में लौटते हैं। स्मृति और आशीर्वाद के बीच राम का दर्शन हो चुका है।
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
छन्द, गौरी का आशीर्वाद
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
आशीर्वाद उस वर का स्वभाव भी बताता है। वह सहज सुन्दर और साँवला है, करुणा का निधान है, सुजान है। सीता के शील और स्नेह को जानता है। इस आखिरी बात में प्रार्थना का उत्तर बहुत निकट आ जाता है। सीता ने अपने हृदय को जाननेवाली माता से कहा था कि मनोरथ खोलकर क्यों कहें; माता उत्तर देती हैं कि मिलनेवाला वर भी उनके शील और स्नेह को जानता है। बाहरी रूप का आकर्षण जिस दर्शन से खुला, उसी के भीतर परस्पर पहचान की यह आश्वस्ति भी मिलती है।
गौरी की आशीष सुनकर सीता और सखियाँ हृदय से हर्षित हो जाती हैं। सीता बार बार भवानी का पूजन करती हैं और प्रसन्न मन से राजमहल की ओर चलती हैं। पहले लौटते हुए मन में धनुष की कठोरता का दुःख था। अब माता को अनुकूल जानने का ऐसा हर्ष है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। सोरठे में शरीर भी उस मंगल का संकेत देता है।
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
सोरठा २३६
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥ २३६॥
सीता के सुन्दर बायें अंग फड़कने लगते हैं, जिन्हें कवि मंगल का मूल कहते हैं। बाग में राम ने अपने मंगलदायक अंगों का फड़कना लक्ष्मण से कहा था और टीका ने उन्हें दाहिने अंग बताया था। यहाँ सीता के बायें अंगों का उल्लेख स्वयं सोरठे में है। दो अलग हृदयों की प्रसन्नता में दो अलग शुभ संकेत हैं। दूसरी पूजा पूरी हो चुकी है, आशीर्वाद मिल चुका है और सीता का लौटना अब हर्ष से भरा है।
दूसरी पूजा में सीता गौरी की विश्वव्यापी शक्ति, दाम्पत्यनिष्ठा और वरदायिनी कृपा का स्तवन करके अपना अनकहा मनोरथ उनके चरणों में रखती हैं। माला गिरती है, मूर्ति मुसकराती है और गौरी उसी साँवले, करुणामय, सुजान वर के मिलने की आशीष देती हैं। सीता हर्षित होकर लौटती हैं।
गुरु से सब कह दिया
दोनों भाई गुरु के पास लौटते हैं। हृदय में सीता के सौन्दर्य की सराहना है और हाथ में पूजा के लिये चुने हुए फूल। राम विश्वामित्र को सब कुछ बता देते हैं। तुलसी इसका कारण भी उसी चौपाई में कहते हैं: उनका स्वभाव सरल है, उसे छल छूता भी नहीं। वाटिका की घटना के भीतर भाई से जो बात कही गयी थी, लौटकर गुरु के सामने भी उसका छिपाव नहीं रहता। सुबह की आज्ञा और लौटकर कहे गये इस वृत्तान्त के बीच शिष्य का विश्वास बना हुआ है।
हृदयँ सराहत सीय लोनाई । गुर समीप गवने दोउ भाई॥
चौपाई ७
राम कहा सबु कौसिक पाहीं । सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं॥
मुनि पुष्प पाकर पूजा करते हैं और फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद देते हैं कि उनके मनोरथ सफल हों। राम और लक्ष्मण दोनों सुनकर सुख पाते हैं। उधर सीता को गौरी से मनोरथ पूर्ण होने की आशीष मिली थी; इधर दोनों भाई गुरु से अपने मनोरथ सफल होने का आशीर्वाद सुनते हैं। सीता की विनती में प्रेम है और राम की कही बात में सरलता। दोनों के पास लौटने का स्थान है और दोनों को वहाँ प्रसन्न करनेवाला उत्तर मिलता है।
भोजन के बाद विज्ञानी मुनि कुछ पुरानी कथाएँ कहने लगते हैं। दिन उन्हीं के बीच बीतता है। तुलसी उन कथाओं को यहाँ खोलते नहीं, केवल दिन की गति दिखाते हैं। बाग में जो छबि हृदय में बस गयी थी, उसके साथ अब भोजन, गुरु की कथा और फिर सन्ध्या का समय आता है। दोनों भाई फिर गुरु की आज्ञा लेकर सन्ध्या करने जाते हैं। सुबह फूल लेने जाने की तरह शाम के इस बाहर जाने में भी समय और आज्ञा का वही क्रम है। दिन भर के नये अनुभव के बीच नित्यकर्म की रीति चलती रहती है।
राम गुरु को वाटिका का सब वृत्तान्त कहते हैं। विश्वामित्र पुष्पों से पूजा करके दोनों भाइयों के मनोरथ सफल होने की आशीष देते हैं। भोजन और पुरानी कथाओं में दिन बीतता है, फिर दोनों भाई आज्ञा लेकर सन्ध्या करने जाते हैं।
चन्द्रमा से तुलना, फिर उसी तुलना का त्याग
पूर्व दिशा में सुन्दर चन्द्रमा उदय होता है। राम उसे सीता के मुख के समान देखकर सुख पाते हैं। वाटिका से लौट आने के बाद भी देखने की आदत उस रूप से जुड़ी हुई है; आकाश का नया प्रकाश सीता की स्मृति जगा देता है। किन्तु अगला ही विचार उस पहली तुलना को रोक देता है। यह चन्द्रमा सीता के मुख जैसा नहीं है। अब वे एक एक करके उसका असमान होना कहते हैं और इसी बहाने उस अनुपम मुख की छबि का वर्णन होने लगता है।
जनमु सिंधु पुनि बंधु बिषु दिन मलीन सकलंक।
दोहा २३७
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक॥ २३७॥
पहला दोष जन्म का है। चन्द्रमा समुद्र में जन्मा है, जिसे पोद्दारजी की टीका खारा समुद्र कहती है। विष उसका भाई है, क्योंकि टीका के अनुसार दोनों उसी समुद्र से उत्पन्न हुए हैं। दिन में वह शोभाहीन और निस्तेज रहता है। उसके शरीर पर कलंक, वह काला दाग भी है। इतने दोषों के साथ यह बेचारा चन्द्रमा सीता के मुख की बराबरी कैसे पा सके। राम के विचार में रूप का साम्य देखते ही ठहर जाना सम्भव नहीं रहा; चन्द्रमा के उद्गम, उसके प्रकाश और उसके चिह्न तक सब तुलना के भीतर आ गये हैं।
इसके बाद चन्द्रमा की बदलती अवस्था आती है। वह घटता और बढ़ता है, विरहिणियों को दुःख देता है। राहु अवसर पाकर उसे ग्रस लेता है। वह चकवे को शोक पहुँचाता है; पोद्दारजी बताते हैं कि यहाँ चकवी के वियोग का दुःख है। कमल का भी वह वैरी है, उसे मुरझा देता है। पहले दोहे में जन्म, सम्बन्ध, दिन का निस्तेज होना और कलंक थे। आगे की चौपाई में घटने बढ़ने से लेकर दूसरे जीवों को मिलनेवाले दुःख तक उसके और अवगुण खुलते हैं।
चन्द्रमा को वैदेही के मुख की उपमा देना राम को बड़े अनुचित कर्म का दोष लगता है। तुलसी स्वयं कहते हैं कि चन्द्रमा के बहाने सीता की मुखछबि बखानी गयी। इसलिये यहाँ दोषों का पूरा क्रम सुनना आवश्यक है। रात की वस्तु को देखकर दिन की प्रिय छबि याद आती है, फिर स्मृति अपनी प्रिय को उस तुलना से ऊपर रख देती है। बाग में कवि ने कहा था कि सब उपमाएँ पहले ही जूठी हो चुकी हैं। संध्या में राम एक उपमा को पहले ग्रहण करके फिर उसके प्रत्येक दोष के साथ छोड़ रहे हैं।
कमल और चकवे पर यह विचार आने के बाद रात बहुत बढ़ गयी है। राम गुरु के पास लौटते हैं, मुनि के चरणकमलों को प्रणाम करते हैं और आज्ञा पाकर विश्राम करते हैं। जिस सौन्दर्य पर मन रुका है, उसकी बात दिन के अन्त तक चली है। फिर विश्राम होता है, रात बीतती है और अगली सुबह राम जागकर भाई की ओर देखते हैं। चन्द्रमा की तुलना पूरी होने के बाद कथा अब दूसरे प्रकाश के लिये तैयार है।
चन्द्रमा देखकर राम पहले सीता का मुख याद करते हैं, फिर उसकी तुलना अस्वीकार करते हैं। समुद्र में जन्म, विष का भाई होना, निस्तेजता, कलंक, घटाव बढ़ाव, विरहियों का दुःख, राहु का ग्रास और चकवे तथा कमल के प्रति प्रतिकूलता, सब कारण आते हैं। रात बढ़ने पर वे गुरु को प्रणाम करके विश्राम करते हैं।
लक्ष्मण की आँखों से सूर्योदय
प्रातः जागकर राम लक्ष्मण से अरुणोदय देखने को कहते हैं। यह कमल, चक्रवाक और सारे संसार को सुख देनेवाला है। रात के वर्णन में चन्द्रमा कमल का वैरी और चकवे के शोक का कारण था। सुबह उन्हीं के लिये सुख का प्रकाश आ गया है। सूर्य के आगमन को बताते हुए राम अभी प्रकृति की प्रसन्नता कह रहे हैं। लक्ष्मण दोनों हाथ जोड़कर कोमल वाणी में उत्तर देते हैं और उस सुबह में अपने प्रभु के प्रभाव का अर्थ खोलते चलते हैं।
अरुनोदयँ सकुचे कुमुद उडगन जोति मलीन।
दोहा २३८
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन॥ २३८॥
अरुणोदय होते ही कुमुदिनी सिमट गयी है और तारों की ज्योति फीकी पड़ गयी है। लक्ष्मण इसे उन राजाओं की दशा के समान कहते हैं जो राम का आगमन सुनकर बलहीन हो गये हैं। फिर वे उपमा को आगे बढ़ाते हैं। राजा तारों के समान कुछ उजाला तो कर रहे हैं, पर धनुष के भारी अन्धकार को हटा नहीं सकते। आकाश में असंख्य छोटे प्रकाश हैं और उनके बीच रात बनी हुई है। यही उनके वचन में राजाओं के बल और धनुष की कठिनाई का चित्र हो जाता है।
रात्रि समाप्त होने से कमल, चकवे, भौंरे और अनेक पक्षी हर्षित हैं। लक्ष्मण कहते हैं कि इसी तरह धनुष टूटने पर प्रभु के सभी भक्त सुखी होंगे। उनके वचन आगे होनेवाले कार्य की आशा में कहे जा रहे हैं। अभी सूर्योदय का दृश्य सामने है और धनुष का टूटना भविष्य में है। बाग में सीता की चिन्ता जिस कठोर धनुष पर ठहरी थी, वही लक्ष्मण की वाणी में हटनेवाला अन्धकार है। दोनों के भाव उनके अपने हैं: सीता का प्रेम सुकुमार रूप को देखकर चिन्तित हुआ था, लक्ष्मण का विश्वास भाई के प्रताप को प्रकाश की तरह देखता है।
सूर्य उदित हुआ, बिना परिश्रम अन्धकार नष्ट हो गया, तारे छिप गये और संसार में तेज फैल गया। लक्ष्मण यह पूरा दृश्य राम को सम्बोधित करके कहते हैं। उनके लिये सूर्य ने अपने उदय के बहाने सभी राजाओं को प्रभु का प्रताप दिखा दिया है। जिस तरह प्रकाश फैलने पर तारे छिप जाते हैं, उसी तरह वे अपने भाई की शक्ति के आगे राजाओं का बल देखते हैं। बात किसी परिश्रम की गणना तक नहीं पहुँचती; सूर्य का उगना ही अन्धकार के नाश के लिये पर्याप्त है।
रबि निज उदय ब्याज रघुराया । प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया॥
चौपाई ८
तव भुज बल महिमा उदघाटी । प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी॥
धनुष तोड़ने की यह पद्धति प्रभु की भुजाओं के बल की महिमा प्रकट करने के लिये सामने आयी है, लक्ष्मण ऐसा कहते हैं। सुबह की कोमल वाणी में उनका अटल भरोसा है। राम उत्तर में मुसकराते हैं। वे इस व्याख्या को आगे बढ़ाकर अपनी प्रशंसा नहीं करते। भाई की बात सुनने के बाद मुसकान आती है और फिर शौच, स्नान तथा नित्यकर्म का समय। स्वभाव से पवित्र राम यह सब पूरा करके गुरु के पास आते हैं और उनके सुन्दर चरणकमलों पर सिर रखते हैं।
राम अरुणोदय का सुख दिखाते हैं। लक्ष्मण राजाओं को फीके पड़ते तारे, धनुष को अन्धकार और राम के प्रताप को उगते सूर्य की तरह कहते हैं। धनुष टूटने पर भक्तों के हर्ष की आशा प्रकट करते हैं। राम मुसकराकर नित्यकर्म पूरा करते हैं और गुरु को प्रणाम करते हैं।
जनक का बुलावा
इसी समय जनक शतानन्द को बुलाते हैं और तुरन्त विश्वामित्र मुनि के पास भेजते हैं। शतानन्द आकर राजा की विनती सुनाते हैं। मुनि हर्षित होते हैं और दोनों भाइयों को बुला लेते हैं। सूर्योदय के समय जिस धनुष को लेकर लक्ष्मण ने अपनी आशा कही थी, अब उसी आयोजन की ओर जाने का निमन्त्रण आ पहुँचा है। कथा प्रकृति की उपमा से राजकीय बुलावे तक सहज गति से आती है।
सतानंद पद बंदि प्रभु बैठे गुर पहिं जाइ।
दोहा २३९
चलहु तात मुनि कहेउ तब पठवा जनक बोलाइ॥ २३९॥
राम शतानन्द के चरणों की वन्दना करके गुरु के पास बैठते हैं। तब मुनि कहते हैं कि चलिये, जनक ने बुला भेजा है। यह प्रसंग उसी बुलावे पर ठहरता है। बाग का दर्शन, गौरी की आशीष, गुरु को कही गयी बात, चन्द्रमा से तुलना और अगले प्रातः लक्ष्मण का विश्वास, सब इस चलने की तैयारी में साथ हैं। अभी हमारे सामने गुरु के पास बैठे राम हैं और उन्हें उठकर चलने के लिये कहा गया है।
जनक शतानन्द के द्वारा विश्वामित्र को निमन्त्रण भेजते हैं। मुनि दोनों भाइयों को बुलाते हैं। राम शतानन्द को प्रणाम करके पास बैठते हैं और गुरु उन्हें जनक के बुलावे पर चलने को कहते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस वाटिका की स्मृति में सबसे पहले रूप आता है, फिर ध्यान देने पर उसे देखने की अलग अलग अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। सखी देखती है तो आँखें भर आती हैं और वाणी अपनी सीमा मानती है। राम देखते हैं तो पलकें ठहरती हैं और फिर भाई से मन की बात कहते हैं। सीता देखती हैं तो पलकों के किवाड़ बन्द करके रूप हृदय में रख लेती हैं। विदा के समय उन्हीं पलकों से फिर फिर बाहर देखती हैं। तुलसी आँखों को एक ही काम बार बार नहीं सौंपते; हर बार प्रेम की अवस्था बदलती है और देखने का अर्थ भी बदल जाता है।
उतना ही सुन्दर यह है कि भीतर बसाया हुआ रूप सरलता को बढ़ाता है। सीता माता के चरण पकड़कर अपने मन की बात उनके जाने हुए पर छोड़ देती हैं। राम गुरु के पास जाकर सब कह देते हैं। एक ओर अनकही प्रार्थना पूरी सुनी जाती है, दूसरी ओर कही हुई बात पर आशीष मिलती है। बाग में आरम्भ हुई प्रीति दोनों को अपने अपने विश्वास के स्थान तक ले जाती है। इसलिए गौरी का प्रसन्न होना और विश्वामित्र का आशीर्वाद इस कथा में दर्शन के बाद के आवश्यक पड़ाव हैं।
और दो दिनों के बीच वह छोटा सा अन्तर याद रह जाता है। एक सुबह दोनों भाई पूजा के फूल लेने निकले थे। अगली सुबह जनक का बुलावा आ गया है। बीच के समय में हृदय पर लिखी छबि, सिर पर धरा गौरी का प्रसाद और गुरु की आशीष है। सामने का कार्य अभी होना है, किन्तु उसे देखनेवाले मन इस बीच बहुत कुछ पा चुके हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २२७ से २३९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।