रामचरितमानस · बालकाण्ड · कपटी तपस्वी का वरदान और छल की योजना
कपटी तपस्वी का वरदान और छल की योजना
जिसे राजा अपना एकमात्र हितैषी मान लेते हैं, वही उनके विश्वास, भोजन के संकल्प और पुरोहित के रूप को उनके विनाश का उपाय बना रहा है।
राजा प्रतापभानु एक तपस्वी के चरणों में सिर झुकाये हैं। उन्हें उसके साधारण वेष में छिपा हुआ ज्ञान दिखायी देता है, उसकी निर्धनता में अभिमान का अभाव और उसके एकान्त में तप की रक्षा। वह अपने को संसार से दूर बताता है। राजा उसका विश्वास करते जाते हैं। बालकाण्ड के इस प्रसंग में अनर्थ की तैयारी इसी विश्वास के भीतर होती है। जो वचन सुननेवाले को अपने कल्याण का आश्वासन लगते हैं, उन्हीं से कहनेवाला उन्हें अपने अधीन करता जाता है।
तुलसीदास पाठक को राजा के साथ अँधेरे में नहीं रखते। वे सामने बैठे व्यक्ति का कपट बार बार खोलते हैं, और राजा की प्रीति को भी सहज कहते हैं। इसीलिये बातचीत की हर नयी आत्मीयता बेचैन करती है। नाम बताना, नाम का अर्थ समझाना, तप की महिमा कहना, फिर मनचाहा वर माँगने को कहना, इन सबके बीच राजा का संदेह घटता है और तपस्वी का अधिकार बढ़ता है।
आगे रसोई की बात आयेगी। भोजन बनानेवाला अपनी पहचान छिपायेगा, राजा स्वयं परोसेंगे, ब्राह्मण परिवार सहित बुलाये जायँगे। अभी यह सारी व्यवस्था वचनों में बन रही है। रात बहुत बीत जाने पर एक और व्यक्ति आयेगा, और तब इस मधुर बातचीत के पीछे का पुराना वैर सामने होगा।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- प्रतापभानु सत्यकेतु के पुत्र, जो तपस्वी पर विश्वास करके अजेय देह और सौ कल्प के निष्कण्टक राज्य का वर माँगते हैं।
- कपटी तपस्वी तपस्वी का वेष धारण किये राजा, जो अपना नाम एकतनु बताते हैं और प्रतापभानु को अपने वश में करते हैं।
- कालकेतु छल में निपुण राक्षस, तपस्वी राजा का मित्र और प्रतापभानु से पुराना वैर रखनेवाला।
- पुरोहित राजा के पुरोहित, जिनका हरण करके उनका रूप धरने की योजना बनती है।
- ब्राह्मण जिन्हें परिवार सहित भोजन पर बुलाकर अपने अधीन कर लेने का आश्वासन राजा को दिया जाता है।
जिस वेष पर राजा रीझ गये
राजा का पहला कथन सामनेवाले के पक्ष में है। आपके समान विज्ञान के निधान और अभिमान से रहित लोग, वे कहते हैं, अपने स्वरूप को छिपाकर रखते हैं। उनकी दृष्टि में साधारण या बिगड़ा हुआ वेष भी कल्याण का साधन है। पोद्दार की टीका इस विचार को खोलती है: प्रकट संतवेष से मान मिलने की सम्भावना रहती है, और मान से पतन हो सकता है। इस तरह राजा जिस रूप को देख रहे हैं, उसी से उस रूप के भीतर छिपे महान् व्यक्तित्व का अनुमान लगा लेते हैं।
वे संतों और वेदों की बात भी जोड़ते हैं। सर्वथा अकिञ्चन, अहंकार और ममता से रहित व्यक्ति भगवान् को प्रिय होते हैं। आपके जैसे निर्धन, भिक्षा से जीनेवाले और घर से रहित जनों को देखकर तो ब्रह्मा और शिव भी संदेह में पड़ सकते हैं। टीका बताती है कि संदेह उनके वास्तविक संत अथवा साधारण भिखारी होने का है। राजा को इस कठिन पहचान का बोध है, पर उससे उनकी सावधानी नहीं बढ़ती। उनका अगला वाक्य अपना पूरा भरोसा सौंप देता है।
जोसि सोसि तव चरन नमामी । मो पर कृपा करिअ अब स्वामी॥
चौपाई १
सहज प्रीति भूपति कै देखी। आपु बिषय बिस्वास बिसेषी॥
आप जो कोई भी हों, हम आपके चरणों में नमस्कार करते हैं। अब हम पर कृपा कीजिये। यहाँ पहचान का प्रश्न नमस्कार के भीतर रख दिया गया है। सामनेवाला कौन है, यह अनिश्चित रहता है; उसके प्रति राजा का समर्पण निश्चित हो जाता है। तुलसी उसी क्षण उसकी दृष्टि भी दिखाते हैं। वह राजा की सहज प्रीति देखता है, अपने प्रति उनका विशेष विश्वास पहचानता है और उन्हें सब प्रकार से अपनाकर अधिक स्नेह प्रकट करता है। राजा जिसे स्नेह समझते हैं, कथाकार उसी में उन्हें वश में करने की क्रिया दिखा देते हैं।
तपस्वी कहता है कि उसे यहाँ रहते बहुत काल हो गया। अब तक उससे कोई मिला नहीं और उसने अपने को किसी पर प्रकट नहीं किया। लोक में मान मिलना आग के समान है, जो तप के वन को जला देता है। बात राजा की कही हुई बात से मेल खाती है। राजा ने वेष छिपाने का पक्ष रखा था; अब तपस्वी उसी के लिये अपने एकान्त का प्रमाण देता है। उसकी गोपनीयता राजा को उसी निर्लोभ साधना का लक्षण लग सकती है, जिसकी वे अभी प्रशंसा कर चुके हैं।
तुलसी देखि सुबेषु भूलहिं मूढ़ न चतुर नर।
सोरठा १६१ (ख)
सुंदर केकिहि पेखु बचन सुधा सम असन अहि॥ १६१ (ख)॥
इस सोरठे में तुलसी मोर सामने ले आते हैं। उसका रूप सुन्दर है, वचन अमृत के समान है और भोजन साँप है। टीका सावधान करती है कि सुन्दर वेष से धोखा खानेवालों में चतुर मनुष्य भी हैं। राजा की भूल को केवल मूर्खता कहकर हम उससे दूर नहीं हो सकते। वाणी और आहार, दोनों एक ही पक्षी के हैं। सुन्दरता अपना काम करती रहती है, भले भीतर का आचरण कुछ और हो। तप की रक्षा का यह मधुर दावा सुनते हुए हमें उस मोर का भोजन भी याद रहता है।
राजा तपस्वी के छिपे हुए जीवन को निरभिमान साधना का प्रमाण मानते हैं और कृपा माँगते हैं। तपस्वी उनका विश्वास पहचानकर अपने एकान्त की महिमा कहता है। तुलसी सुन्दर मोर की वाणी और उसके आहार का अन्तर दिखाकर सावधान करते हैं।
एकतनु की कथा और बढ़ता हुआ विश्वास
तपस्वी अपनी बात आगे बढ़ाता है। संसार में छिपकर रहने का उसका कारण यही है कि श्रीहरि के अतिरिक्त उसे किसी से प्रयोजन नहीं। प्रभु बिना बताये सब जानते हैं, फिर संसार को प्रसन्न करके कौन सी सिद्धि मिलेगी। अभी वह स्वयं को किसी भी सांसारिक चाह से दूर रख रहा है। उसी के साथ राजा को अपने विशेष स्नेह का पात्र बना देता है। आप पवित्र हैं, सुन्दर बुद्धिवाले हैं, आपमें प्रीति और विश्वास है। ऐसे व्यक्ति से कुछ छिपाने पर उसे बड़ा दोष लगेगा।
जिमि जिमि तापसु कथइ उदासा। तिमि तिमि नृपहि उपज बिस्वासा॥
चौपाई २
देखा स्वबस कर्म मन बानी। तब बोला तापस बगध्यानी॥
उदासीनता की जितनी बातें कही जाती हैं, राजा को उतना अधिक विश्वास होता है। इस बढ़ने का क्रम तुलसी साफ रख देते हैं। तपस्वी बोल रहा है, राजा के भीतर उसका प्रभाव पड़ रहा है, और बोलनेवाला उस प्रभाव को परख भी रहा है। जब वह देख लेता है कि कर्म, मन और वाणी, तीनों से राजा उसके वश में हैं, तब अपना नाम बताता है। उससे पहले कवि का बगुले की तरह ध्यान लगानेवाले का संकेत सुन पड़ता है। बाहर ध्यान का आकार है, भीतर सामने बैठे व्यक्ति पर लगी हुई निगाह।
वह अपने को एकतनु कहता है। राजा फिर सिर नवाते हैं और अनुरागी सेवक मानकर इस नाम का अर्थ समझाने को कहते हैं। इस नाम का अर्थ उसके परिचय को और असाधारण बनाता है। तपस्वी अपनी उत्पत्ति को सृष्टि के आरम्भ से जोड़ता है। जब पहली सृष्टि हुई थी, उसी समय वह उत्पन्न हुआ था; फिर दूसरा शरीर धारण ही नहीं किया। एक ही तन में बने रहने के कारण उसका नाम एकतनु है।
आदिसृष्टि उपजी जबहिं तब उतपति भै मोरि।
दोहा १६२
नाम एकतनु हेतु तेहि देह न धरी बहोरि॥ १६२॥
इस दावे का आश्चर्य भी वह अपने ही उत्तर से सँभाल लेता है। मन में अचरज न करें, तप से कोई वस्तु दुर्लभ नहीं। फिर तप के बल से ब्रह्मा की सृष्टि, विष्णु का पालन और शिव का संहार गिनाता है। यह पूरी महिमा उसके अपने परिचय को विश्वास दिलाने के लिये कही जा रही है। राजा सुनकर और अनुरक्त होते हैं। तब कर्म, धर्म, अनेक इतिहास, वैराग्य, विवेक और सृष्टि की उत्पत्ति, पालन तथा प्रलय की आश्चर्यभरी कथाएँ आती हैं। बातचीत में उसके ज्ञान का विस्तार भी जुड़ जाता है।
राजा उसके अधीन होकर अपना नाम बताने लगते हैं। तपस्वी उन्हें रोककर कहता है कि वह पहले से जानता है। राजा ने अपनी पहचान छिपायी थी, इसे वह अच्छी नीति और चतुराई कहता है। राजाओं को जहाँ तहाँ अपना नाम बताना भी नहीं चाहिये। इस तरह जिस बात पर राजा को संकोच हो सकता था, उसी को वह स्नेह बढ़ने का कारण बना देता है। राजा का परिचय छिपाना अब दोष से मुक्त है, और उसे पहचान लेनेवाले की पहुँच और ऊँची हो जाती है।
नाम तुम्हार प्रताप दिनेसा । सत्यकेतु तव पिता नरेसा॥
चौपाई ३
गुर प्रसाद सब जानिअ राजा। कहिअ न आपन जानि अकाजा॥
वह राजा का नाम प्रतापभानु और पिता का नाम सत्यकेतु बताता है। इस जानकारी का कारण गुरु की कृपा है, ऐसा उसका कहना है। सब जानते हुए भी वह अपनी हानि समझकर कहा नहीं करता। फिर राजा की सरलता, प्रीति, विश्वास और नीति में निपुणता की प्रशंसा लौट आती है। इन्हीं गुणों से उसके मन में ममता उपजी है और पूछे जाने पर वह अपनी कथा कह रहा है। पहचान की सूचना स्नेह के इस आवरण में रखी जाती है, ताकि राजा को ज्ञान और कृपा एक साथ मिलते हुए लगें।
एकतनु नाम बताकर तपस्वी सृष्टि के आरम्भ से उसी देह में रहने का दावा करता है। तप और पुरानी कथाओं का वर्णन राजा का अनुराग बढ़ाता है। वह प्रतापभानु और सत्यकेतु के नाम बताकर अपनी जानकारी को गुरु की कृपा का फल कहता है।
सौ कल्प का राज्य और बची हुई एक आशंका
अब तपस्वी अपनी प्रसन्नता घोषित करता है। राजा को संदेह छोड़कर मनचाही वस्तु माँगने को कहता है। इतनी देर से मिली प्रशंसा और आत्मीयता का फल सामने रख दिया गया है। राजा हर्षित होते हैं, चरण पकड़कर अनेक प्रकार की विनती करते हैं। वे कहते हैं कि कृपासागर मुनि के दर्शन से ही चारों पदार्थ उनकी मुट्ठी में आ गये। टीका इन चार पदार्थों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष कहती है। फिर भी सामनेवाले को प्रसन्न देखकर एक दुर्लभ वर माँगने की इच्छा होती है, जिससे वे शोक से रहित हो सकें।
जरा मरन दुख रहित तनु समर जितै जनि कोउ।
दोहा १६४
एकछत्र रिपुहीन महि राज कलप सत होउ॥ १६४॥
माँग में पहले शरीर आता है। उसमें बुढ़ापा, मृत्यु और दुःख न रहें। फिर युद्ध आता है, जहाँ कोई उन्हें जीत न सके। अन्त में पूरी पृथ्वी का राज्य है, एकच्छत्र, शत्रुओं से रहित, सौ कल्प तक चलनेवाला। देह की पीड़ा से लेकर राज्य की सीमा और अवधि तक, राजा अपनी सुरक्षा का कोई पक्ष अधूरा नहीं रखना चाहते। जो व्यक्ति सामने बैठे तपस्वी के चाहरहित होने की बात पर रीझा था, वही अब अपनी मनचाही दशा का इतना विशाल रूप रखता है। राजा और तपस्वी की बातचीत में यही माँग आगे के उपाय का अवसर बनती है।
तपस्वी उत्तर देता है कि ऐसा ही हो। उसके बाद कठिन बात सुनाता है। काल भी राजा के चरणों पर सिर नवायेगा, पर ब्राह्मणकुल इस आश्वासन से अलग है। तप के बल से ब्राह्मण सदा समर्थ होते हैं, और उनके क्रोध से बचानेवाला कोई नहीं। यदि राजा उन्हें अपने वश में कर लें, तो ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी उनके अधीन हो जायँगे। बात देह और राजसत्ता के वर से बढ़कर ब्राह्मणों को वश में करने की ओर मुड़ गयी है।
चल न ब्रह्मकुल सन बरिआई । सत्य कहउँ दोउ भुजा उठाई॥
चौपाई ४
बिप्र श्राप बिनु सुनु महिपाला । तोर नास नहिं कवनेहुँ काला॥
दोनों भुजाएँ उठाकर वह सत्य कहने का दावा करता है। ब्राह्मणकुल पर जोर नहीं चल सकता। ब्राह्मणों के शाप के बिना किसी काल में राजा का नाश नहीं होगा। यहाँ बची हुई आशंका को उसने स्वयं बताया है और उसे बल से मिटाने का रास्ता भी बन्द कर दिया है। अब राजा को ऐसी युक्ति चाहिये जो किसी को बलपूर्वक दबाये बिना अधीन कर दे। उस युक्ति का प्रस्ताव अभी आया नहीं, पर उसकी आवश्यकता तैयार हो गयी है।
राजा इन वचनों पर प्रसन्न होते हैं। वे कह उठते हैं कि अब उनका नाश नहीं होगा, कृपानिधान की कृपा से हर समय कल्याण रहेगा। हमें उनकी प्रसन्नता के साथ कही हुई शर्त भी याद रहती है। तपस्वी ने अपवाद को स्पष्ट रखा था, और राजा की हर्षित वाणी में पूर्ण सुरक्षा का विश्वास सुनायी देता है। ब्राह्मणों के शाप का भय कुछ ही क्षण बाद वे स्वयं फिर उठायेंगे। फिलहाल वर मिलने का सुख उनकी बात में सबसे आगे है।
प्रतापभानु बुढ़ापे, मृत्यु और दुःख से रहित देह, युद्ध में अजेयता और सौ कल्प का निष्कण्टक राज्य माँगते हैं। तपस्वी स्वीकृति देकर ब्राह्मणों के शाप को अपवाद बताता है और उन्हें वश में करने की बात उठाता है।
छठे कान तक पहुँची बात का भय
राजा के कल्याण की बात पर वह फिर स्वीकृति देता है। तुलसी इस बार उसे कपटी और कुटिल दोनों कहकर परिचित कराते हैं। फिर एक नयी चेतावनी रखी जाती है। राजा अपने राह भूलने और इस तपस्वी से मिलने की बात किसी से न कहें। कह देंगे तो उसका दोष तपस्वी पर नहीं आयेगा। अभी तक बातचीत में उसकी कृपा का विस्तार था; अब परिणाम का भार राजा की चुप्पी पर रखा जा रहा है। उसके वचन की रक्षा के लिये राजा को अपने अनुभव पर भी ताला लगाना होगा।
एवमस्तु कहि कपटमुनि बोला कुटिल बहोरि।
दोहा १६५
मिलब हमार भुलाब निज कहहु त हमहि न खोरि॥ १६५॥
वह समझाता है कि इसी कारण उन्हें रोक रहा है। इस प्रसंग को कहने से बड़ी हानि होगी। बात छठे कान में पड़ते ही राजा का नाश हो जायगा, यह उसका सत्य वचन है। संख्या छोटी है और धमकी बहुत बड़ी। अपने हित का इतना महत्त्वपूर्ण आश्वासन पाने के बाद भी राजा उसे खुलकर किसी के सामने नहीं रख सकते। तपस्वी का मिलना और राह भूलने की घटना, दोनों उसी गुप्त कथा के भीतर बाँध दिये जाते हैं। किससे क्या कहा जा सकता है, इसका अधिकार भी अब वचन देनेवाले के पास है।
आगे वह दो कारण साथ रखता है: इस बात का प्रकट होना अथवा ब्राह्मणों का शाप। इनके अतिरिक्त किसी उपाय से मृत्यु नहीं होगी, ऐसा वह फिर कहता है। यह दावा इतना बढ़ाया जाता है कि देवताओं का क्रोध भी उसके सामने निष्फल ठहराया जाता है। राजा को मिलनेवाली निर्भयता उसकी लगायी हुई शर्तों के भीतर है। जहाँ शर्त टूटेगी, वहीं अभी दिया गया आश्वासन काम नहीं करेगा। नाश का डर हटाने की बात से आरम्भ हुआ वर इस घड़ी चुप रहने का कारण बन गया है।
राजा चरण पकड़कर इस बात को सत्य मानते हैं। वे पूछते हैं कि ब्राह्मण और गुरु के क्रोध से कौन बचा सकता है। ब्रह्मा क्रोध करें तो गुरु रक्षा कर सकते हैं, पर गुरु के विरोध में जगत् में कोई रक्षक नहीं। यह उनकी अपनी स्वीकृति है। अभी सामनेवाले ने अपनी जानकारी का कारण गुरु की कृपा बताया था; अब राजा भी गुरु के संरक्षण और गुरु के विरोध का भार स्वीकार करते हैं। उनकी वाणी में श्रद्धा और भय एक साथ आ जाते हैं।
राजा कहते हैं कि यदि हम आपके कथन के अनुसार न चलें तो नाश हो जाने की चिन्ता नहीं। यह मानते ही आज्ञा पालन की ओर से उन्हें कोई उलझन नहीं रह जाती। बचा हुआ डर ब्राह्मणों के घोर शाप का है। उसे वे छिपाते नहीं। जो बात तपस्वी ने वर के बीच अपवाद बनाकर रखी थी, उसी के लिये राजा अब उपाय माँगते हैं। और उपाय माँगते हुए सामनेवाले को अपना अकेला हितैषी भी कह देते हैं।
होहिं बिप्र बस कवन बिधि कहहु कृपा करि सोउ।
दोहा १६६
तुम्ह तजि दीनदयाल निज हितू न देखउँ कोउ॥ १६६॥
ब्राह्मण किस प्रकार वश में होंगे, कृपा करके वह बताइये। आपके अतिरिक्त कोई अपना हितू दिखायी नहीं देता। राजा का यह वाक्य उस व्यक्ति के लिये कितनी बड़ी सफलता है, जिसे तुलसी पहले ही उन्हें कर्म, मन और वाणी से अधीन करते हुए दिखा चुके हैं। राजा अपने लिये मार्ग पूछ रहे हैं, पर पूछने के साथ उस मार्ग को परखने का सारा भरोसा भी उसी को सौंप देते हैं। आगे का हर कठिन प्रस्ताव अब इसी विश्वास के सहारे सुना जायगा।
तपस्वी मिलने और राह भूलने की बात गुप्त रखने को कहता है। उसके प्रकट होने और ब्राह्मणों के शाप को विनाश के कारण बताता है। राजा आज्ञा पालन स्वीकार करके ब्राह्मणों को वश में करने का उपाय उसी से माँगते हैं।
जिस आग्रह की प्रतीक्षा थी
उत्तर में तपस्वी उपायों की कमी नहीं बताता। संसार में बहुत उपाय हैं, वह कहता है, पर वे कष्ट से सिद्ध होते हैं और इतनी कठिनाई के बाद भी सफलता निश्चित नहीं। फिर एक अत्यन्त सहज उपाय का संकेत देता है। साथ ही उसमें भी एक कठिनाई रख देता है। राजा को अब आसान मार्ग का आश्वासन मिल चुका है, पर उस पर चलने का द्वार अभी उसी के हाथ में है। उपाय का नाम बताने से पहले वह उसकी उपलब्धि को अपने निर्णय पर निर्भर करता है।
युक्ति उसके अधीन है, पर राजा के नगर में उसका जाना सम्भव नहीं, ऐसा वह कहता है। जन्म से अब तक वह किसी के घर या गाँव नहीं गया। यह दावा उसके पहले परिचय को फिर याद दिलाता है। जिसने अपने को सृष्टि के आरम्भ से एक ही देह में रहनेवाला और जगत् से छिपा हुआ कहा था, वह अब उस एकान्त का उल्लंघन राजा के लिये करने की कठिनाई जता रहा है। उसका जाना बहुत बड़ा त्याग प्रतीत होता है।
पर यदि वह न गया तो राजा का काम बिगड़ेगा। वह इसे आज का बड़ा असमंजस कहता है। इस वाक्य पर राजा का उत्तर तुरन्त अपने लिये विनती बन जाता है। वे कोमल वाणी में वेदों की नीति का आश्रय लेते हैं। बड़े लोग छोटों पर स्नेह करते हैं। इस बात को समझाने के लिये उनके सामने पर्वत, समुद्र और पृथ्वी के रूप आते हैं। अपनी सहायता कराने की इच्छा में राजा सामने बैठे व्यक्ति को इन बड़ों की जगह रख रहे हैं।
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं । गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं॥
चौपाई ५
जलधि अगाध मौलि बह फेनू । संतत धरनि धरत सिर रेनू॥
पर्वत अपने सिर पर घास धारण करते हैं। अगाध समुद्र अपने मस्तक पर फेन रखता है। धरती अपने सिर पर धूल सँभाले रहती है। इन तीनों चित्रों में बड़ा अपने ऊपर छोटे को स्थान देता है। राजा भी वैसा ही स्थान माँगते हैं। जिस कपट को हम बातचीत के भीतर बढ़ते देख रहे हैं, उसी के सामने राजा की विनय इतनी कोमल है। वे अपने आग्रह का अधिकार बल से नहीं लेते। वे चाहते हैं कि सामनेवाला अपने बड़प्पन और दीनों पर दया के कारण उनके लिये कष्ट सहे।
राजा चरण पकड़ लेते हैं। स्वामी कृपालु हों, सज्जन और दीनदयालु प्रभु उनके लिये इतना दुःख सह लें। अब उस व्यक्ति को आने के लिये मनाया जा रहा है, जिसका आना आगे राजा के विरुद्ध योजना का साधन होगा। आग्रह राजा का है, उसका अवसर तपस्वी ने बनाया है। पहले कहा कि उपाय अपने हाथ में है; फिर कहा कि जाना कठिन है; अन्त में राजा स्वयं उसी कठिनाई को हटाने की प्रार्थना करने लगते हैं।
कपटी तपस्वी राजा को अपने अधीन जानकर कहता है कि जगत् में उसके लिये कुछ दुर्लभ नहीं। वह उनका काम अवश्य करेगा, क्योंकि वे मन, तन और वाणी से उसके भक्त हैं। यही तीनों अंग पहले कथाकार ने उसके वश में होते दिखाये थे। अब वह स्वयं उस अवस्था को भक्ति का नाम देता है। इसके साथ योग, युक्ति, तप और मन्त्र के प्रभाव का नियम सुनाता है: छिपाकर करने पर ही वे फल देते हैं। गोपनीयता की बात फिर लौटती है, इस बार साधन की सफलता के लिये आवश्यक बताकर।
तपस्वी सहज उपाय अपने हाथ में बताकर नगर आने में असमंजस जताता है। राजा पर्वत, समुद्र और धरती के उदाहरण देकर कृपा माँगते हैं। वह काम करने को राजी होता है और साधन की सफलता के लिये फिर गोपनीयता की शर्त रखता है।
रसोई उसकी, परोसना राजा का
अब सहज उपाय खुलता है। तपस्वी भोजन बनायेगा, राजा परोसेंगे, और भोजन बनानेवाले को कोई जानने न पाये। काम के ये तीन हिस्से साथ रखे गये हैं। राजा सामने रहेंगे, हाथ से परोसेंगे और आयोजन उन्हीं का होगा। जिसके बारे में पूरी बात छिपायी गयी है, रसोई उसके अधिकार में रहेगी। तपस्वी दावा करता है कि उस अन्न को जो भी खायेगा, राजा की आज्ञा का अनुसरण करने लगेगा। ब्राह्मणों को वश में करने का मार्ग भोजन बनाकर प्रस्तुत किया गया है।
जौं नरेस मैं करौं रसोई । तुम्ह परुसहु मोहि जान न कोई॥
चौपाई ६
अन्न सो जोइ जोइ भोजन करई । सोइ सोइ तव आयसु अनुसरई॥
यह प्रभाव भोजन पानेवालों तक सीमित भी नहीं रहेगा, ऐसा वह जोड़ता है। उनके घर जो कोई भोजन करेगा, वह भी राजा के वश में हो जायगा। इस तरह एक रसोई से निकलनेवाला अन्न कई घरों के भोजन तक अधिकार पहुँचाने का साधन बताया जा रहा है। राजा को जिन ब्राह्मणों के शाप का भय है, उन्हीं के माध्यम से अधीनता का विस्तार होने का आश्वासन दिया जाता है। उन्हें अपने हाथ से खिलाने की सेवा के भीतर यह असाधारण लाभ दिखाया गया है।
तपस्वी राजा को लौटकर यही उपाय रचने और वर्ष भर का संकल्प लेने को कहता है। वर्ष की अवधि इस योजना को एक दिन के सत्कार से बहुत आगे ले जाती है। लगातार भोजन होगा, और उसके लिये राजा का संकल्प पहले से बँधा रहेगा। अभी रसोई बनी नहीं है, निमन्त्रण भेजे नहीं गये हैं। बातचीत में एक ऐसी व्यवस्था तय हो रही है जिसके चलने पर राजा को बार बार वही काम करना होगा, और हर बार छिपे हुए भोजन बनानेवाले पर विश्वास रखना होगा।
नित नूतन द्विज सहस सत बरेहु सहित परिवार।
दोहा १६८
मैं तुम्हरे संकलप लगि दिनहिं करबि जेवनार॥ १६८॥
प्रतिदिन नये एक लाख ब्राह्मण परिवार सहित निमन्त्रित किये जायँ। संख्या ब्राह्मणों की है, परिवार उनके साथ बुलाये जाने हैं। प्रतिदिन नये अतिथि होने की बात भी स्पष्ट है। तपस्वी राजा के पूरे संकल्प काल तक रोज भोजन बनाने का वचन देता है। एक लाख, परिवार सहित, नित्य नये और वर्ष भर, ये चारों बातें मिलकर योजना का फैलाव बताती हैं। इन्हें सुननेवाले को बहुत थोड़े कष्ट से असाधारण फल पाने का आश्वासन दिया गया है, और बनाने का सारा भार वही व्यक्ति अपने ऊपर ले रहा है।
वह आगे कहता है कि इस प्रकार सब ब्राह्मण राजा के वश में हो जायँगे। वे होम, यज्ञ और सेवा पूजा करेंगे, तो उसी सम्बन्ध से देवता भी अधीन हो जायँगे। पहले ब्राह्मणों को वश में करने से देवताओं पर अधिकार का वचन दिया गया था; अब उसके लिये अनुष्ठान का सम्बन्ध समझाया जाता है। खानेवाले ब्राह्मण, उनके घर भोजन पानेवाले दूसरे लोग और उनके अनुष्ठानों से सम्बद्ध देवता, अधिकार का घेरा लगातार बढ़ाया जा रहा है।
रसोई की शर्तों को फिर एक साथ देखिये। राजा का प्रत्यक्ष काम परोसना है, तपस्वी का गुप्त काम पकाना, और अतिथियों का काम भोजन करना। राजा जिसे सबको अधीन करने की युक्ति समझते हैं, उसमें अपना भोजन आयोजन ही किसी और के हाथ दे रहे हैं। इस प्रसंग में अभी भोजन में मिलायी गयी किसी वस्तु का वर्णन नहीं आता। छल यहाँ पहले उस भरोसे की व्यवस्था करता है जिसके सहारे रसोई और राजा के हाथ एक ही काम में जुड़ सकें।
योजना है कि तपस्वी छिपकर रसोई बनाये और राजा परोसें। वर्ष भर प्रतिदिन नये एक लाख ब्राह्मण परिवार सहित बुलाये जायँ। तपस्वी उस भोजन से अतिथियों और उनके घर भोजन करनेवालों तक को अधीन करने का दावा करता है।
पुरोहित का रूप और पहचान का संकेत
रसोई की बात के बाद तपस्वी अपने आने की पहचान समझाता है। वह इस वेष में कभी नहीं आयेगा। अपनी माया से राजा के पुरोहित को हर लायेगा। जिस पुरोहित को राजा पहचानते हैं, उनकी जगह वह स्वयं उपस्थित होगा। इस प्रस्ताव में राजा की पुरानी पहचान का उपयोग है। राजा को दिखाई पड़नेवाला रूप परिचित होगा, पर उसके भीतर काम करनेवाला व्यक्ति बदल दिया जायगा।
तपबल तेहि करि आपु समाना । रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥
चौपाई ७
मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा । सब बिधि तोर सँवारब काजा॥
तप के बल से पुरोहित को अपने समान बनाकर वह यहाँ एक वर्ष रखेगा, और उनका वेष धारण करके राजा का काम सँवारेगा। एक वर्ष की अवधि फिर आती है। पहले वह भोजन के संकल्प की अवधि थी, अब पुरोहित को रोक रखने की भी है। दोनों व्यवस्थाएँ एक दूसरे के साथ चलने के लिये कही गयी हैं। पुरोहित का हरण, उनका रूप बदलना और अपने लिये उनका रूप लेना, इस छल में हर पहचान को दूसरी जगह बैठाने की योजना है।
जिस राजा को अपने वर से सब पर अधिकार मिलने का विश्वास है, उनके सामने अब उन्हीं के पुरोहित को हरण करके छिपाने की बात कही जा रही है। इसे सुनानेवाला लगातार उनका काम सँवारने की भाषा बोलता है। किसी दूसरे व्यक्ति के साथ होनेवाला यह व्यवहार भी राजा के हित की व्यवस्था के रूप में उपस्थित किया जाता है। इस बातचीत में पुरोहित स्वयं नहीं बोलते। उनका नाम तक नहीं बताया जाता। वे अपनी अनुपस्थिति में बन रही इस योजना का विषय हैं।
तपस्वी अब कहता है कि रात बहुत बीत गयी, राजा सो जायँ। आज से तीसरे दिन भेंट होगी। वह तप के बल से घोड़े सहित राजा को सोते हुए ही घर पहुँचा देगा। घर लौटने का श्रम भी राजा को नहीं उठाना होगा, ऐसा आश्वासन है। अभी घर पहुँचना घटित नहीं हुआ। थके हुए राजा के लिये घर पहुँचाने की प्रतिज्ञा और आगे का काम सँभालने का वचन एक ही व्यक्ति दे रहा है।
मैं आउब सोइ बेषु धरि पहिचानेहु तब मोहि।
दोहा १६९
जब एकांत बोलाइ सब कथा सुनावौं तोहि॥ १६९॥
पुरोहित के वेष में आने पर पहचान कैसे होगी, यह भी बताया जाता है। वह राजा को एकान्त में बुलाकर सारी कथा सुनायेगा। वही उसका संकेत होगा। जिस कथा को दूसरों से कहने पर नाश की धमकी दी गयी थी, अब वही कथा बदले हुए रूप की पहचान बनेगी। बाहरी वेष से पहचान छिपेगी, भीतर की गुप्त बातचीत से राजा आश्वस्त होंगे। इस तरह गोपनीयता आनेवाले छल के लिये परिचय का काम भी करने लगती है।
तपस्वी पुरोहित का हरण करके उन्हें अपने समान बनाने और एक वर्ष रोक रखने की योजना बताता है। स्वयं उनका रूप धरकर आयेगा। तीसरे दिन भेंट, सोते राजा को घोड़े सहित घर पहुँचाने और एकान्त में कथा सुनाकर पहचान देने के वचन मिलते हैं।
राजा की नींद और कालकेतु का जागा हुआ वैर
राजा आज्ञा मानकर सो जाते हैं। थकान के कारण उन्हें गहरी नींद आ जाती है। कपट जाननेवाला अपने आसन पर जाकर बैठता है। उसके भीतर बहुत चिन्ता है, वह कैसे सोये। एक ही बातचीत ने दोनों को दो अलग दशाओं में पहुँचाया है। राजा अपने को सँभालनेवाला पाकर विश्राम करते हैं। जिसने इतने बड़े कामों को सहज बताकर आश्वासन दिया था, उसके लिये अब चैन की नींद नहीं है। तुलसी दोनों दशाएँ पास पास रखते हैं, और आगे का दृश्य राजा के सो जाने पर खुलता है।
कालकेतु निसिचर तहँ आवा । जेहिं सूकर होइ नृपहि भुलावा॥
चौपाई ८
परम मित्र तापस नृप केरा । जानइ सो अति कपट घनेरा॥
वहाँ कालकेतु राक्षस आता है। इसी चौपाई में उसका किया हुआ काम बताया जाता है: उसने सूअर बनकर राजा को भटकाया था। राजा का राह भूलना, जिसे छिपाने की चेतावनी मिली थी, इस खुलासे में छल से जुड़ जाता है। जिसे राजा अपनी भटकन का प्रसंग जानते हैं, उसके पीछे किसी और का लिया हुआ रूप है। कथा में वेष फिर लौटता है, इस बार उस सूअर का, जिसके द्वारा राजा को मार्ग से हटाया गया था।
कालकेतु तपस्वी राजा का परम मित्र है और बहुत छल प्रपञ्च जानता है। तुलसी यहाँ तपस्वी के साथ राजा शब्द भी रखते हैं। दोनों की मित्रता से उसकी उपस्थिति का अर्थ स्पष्ट होता है। वह यहाँ अनायास आया कोई अतिथि नहीं, छल में निपुण सहयोगी है। प्रतापभानु जिसे अभी अपना अकेला हितैषी बता चुके थे, उसका अपना अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध इसी राक्षस से है। राजा की कही हुई आत्मीयता के पीछे अब दूसरी आत्मीयता सामने आती है, जिसमें उनके लिये हित नहीं है।
कालकेतु के सौ पुत्र और दस भाई थे। वे अत्यन्त दुष्ट, अजेय और देवताओं को दुःख देनेवाले थे। ब्राह्मणों, संतों और देवताओं को पीड़ित देखकर प्रतापभानु ने उन सबको पहले ही युद्ध में मार डाला था। यह पुरानी घटना अब बतायी जाती है, जब उसके वैर का कारण समझना आवश्यक हुआ है। राजा के हाथों मारे गये वे सौ पुत्र और दस भाई कालकेतु की स्मृति में हैं। ब्राह्मणों और संतों की रक्षा करनेवाले राजा के विरुद्ध बनी योजना में अब ब्राह्मणों का भोजन साधन बनाया जा रहा है।
उस दुष्ट को पिछला वैर याद आता है। वह तपस्वी राजा से मिलकर परामर्श करता है, और दोनों वही उपाय रचते हैं जिससे शत्रु का विनाश हो। अब बातचीत का दूसरा पक्ष खुल चुका है। प्रतापभानु के सामने दीर्घ जीवन और निष्कण्टक राज्य का आश्वासन था; इन दोनों की सलाह में उन्हीं प्रतापभानु का नाश उद्देश्य है। राजा की इच्छा को जानकर बनाया गया उपाय उनके अपने हित का उपाय नहीं रह जाता।
राजा कुछ नहीं समझ पाते। तुलसी इस अनजान बने रहने के साथ भावी का वश भी कहते हैं। राजा की सरलता, उनका बढ़ता विश्वास और तपस्वी की कुशल बातों को हम विस्तार से देख चुके हैं; अब कथाकार उस घड़ी को भावी के अधीन भी रख देते हैं। प्रतापभानु सो रहे हैं और उनके शत्रु परामर्श कर रहे हैं। इस दृश्य में भोजन अभी परोसा नहीं गया है, पुरोहित का हरण अभी बताया हुआ प्रस्ताव है, पर राजा के विरुद्ध उसका प्रयोजन साफ हो चुका है।
राजा गहरी नींद में हैं और कपटी तपस्वी चिन्तित है। कालकेतु आता है, जिसने सूअर बनकर राजा को भटकाया था। अपने सौ पुत्रों और दस भाइयों के वध का पुराना वैर स्मरण करके वह तपस्वी राजा के साथ प्रतापभानु के नाश का उपाय रचता है।
अकेले शत्रु की शेष शक्ति
इस मन्त्रणा के बाद कथा एक नीति पर ठहरती है। तेजस्वी शत्रु अकेला भी रह गया हो, तो उसे छोटा नहीं गिनना चाहिये। अभी कालकेतु के सौ पुत्रों और दस भाइयों का वध सुना गया है। इतने लोगों के न रहने पर भी उसका वैर और छल करने की शक्ति शेष है। वह तपस्वी राजा के साथ मिल सकता है और नई योजना रच सकता है। दोहा उस बचे हुए सामर्थ्य की ओर ध्यान दिलाता है।
रिपु तेजसी अकेल अपि लघु करि गनिअ न ताहु।
दोहा १७०
अजहुँ देत दुख रबि ससिहि सिर अवसेषित राहु॥ १७०॥
उदाहरण राहु का है। उसका सिर ही शेष रह गया, फिर भी वह सूर्य और चन्द्रमा को आज तक दुःख देता है। जो अंश बचा है, उसी से हानि पहुँचाने की शक्ति भी बची है। इस उपमा के लिये तुलसी राहु की कोई विस्तृत कथा नहीं कहते। सिर के अवशेष और सूर्य चन्द्र को मिलनेवाले दुःख को साथ रख देना पर्याप्त है। शत्रु कितना कुछ खो चुका है, उससे उसके वर्तमान सामर्थ्य का पूरा अनुमान नहीं हो जाता।
प्रतापभानु के सामने अभी किसी रण का दृश्य नहीं है। उन्हें अपने भोजन संकल्प और उसकी सिद्धि का आश्वासन मिला है। उधर पुराने वैर का वाहक जीवित है और दूसरे कपटी से मिलकर काम कर रहा है। दोहा इसी अन्तर पर रखी हुई चेतावनी है। राजा ने जिन दुष्टों को पहले युद्ध में हराया था, उनसे जुड़ा हुआ वैर दूसरी युक्ति से उनकी ओर लौट रहा है। कथा इस घड़ी परिणाम सुनाने से पहले उस तैयारी पर ठहरती है।
तेजस्वी शत्रु को अकेला समझकर छोटा नहीं मानना चाहिये। राहु का बचा हुआ सिर भी सूर्य और चन्द्रमा को दुःख देता है। कालकेतु का शेष वैर अब नयी मन्त्रणा का कारण बन गया है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग को पढ़कर पहले राजा का वह वाक्य याद आता है जिसमें वे सामनेवाले को अपना एकमात्र हितैषी कहते हैं। उसके बाद वे उसी से उपाय सुनते हैं, उसी को नगर आने के लिये मनाते हैं और उसी को रसोई सौंपने की व्यवस्था स्वीकार करते हैं। विश्वास का विस्तार उनकी अपनी विनती से होता है। पाठक के लिये पीड़ा इसी में है कि हर चरण पर राजा अपने कल्याण की आशा से आगे बढ़ रहे हैं, जबकि तुलसी उसके साथ कपट को स्पष्ट बताते चलते हैं।
फिर दोहराया हुआ वश का भाव ध्यान खींचता है। पहले तपस्वी राजा को अपने वश में पाता है, फिर उन्हीं से ब्राह्मणों को वश में करने की बात कहता है। दूसरे लोगों पर अधिकार पाने का आश्वासन उस समय दिया गया है जब सुननेवाला स्वयं किसी और के अधिकार में आ चुका है। रसोई की योजना में यह बात प्रत्यक्ष हो जाती है। राजा को सबकी आज्ञाकारिता मिलने वाली है, ऐसा कहा जाता है; इसके लिये उन्हें उसी छिपे हुए व्यक्ति के बनाये अन्न को अपने हाथ से परोसना होगा।
और वेष का प्रश्न अन्त तक साथ रहता है। आरम्भ में राजा वेष के भीतर छिपे तप का अनुमान करते हैं। बीच में पुरोहित का रूप बदलने की योजना है। अन्त में सूअर का रूप धरकर भटकानेवाले का नाम खुलता है। सुन्दर मोर का सोरठा इसी क्रम में फिर समझ आता है। दिखाई पड़नेवाले रूप और सुनाई पड़नेवाली वाणी के साथ यह जानना भी बचा रहता है कि सामनेवाला कर क्या रहा है।
रात में थके हुए प्रतापभानु सो गये हैं। उनके लिये एक वर्ष का संकल्प और सौ कल्प के राज्य की आशा है। जागते हुए दोनों सहयोगियों की मन्त्रणा में उसी राजा का विनाश है। तुलसी की कथा हमें इन दोनों ओर की बात सुनाकर यहीं छोड़ती है, जहाँ भोजन का आयोजन अभी भविष्य में है और उस आयोजन पर रखा हुआ विश्वास पहले ही शत्रु के हाथ पहुँच चुका है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १६१ से १७०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।