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जनक का स्नेह और अवध का स्वागत

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 41

विदा के समय जनक राम से विनती करते हैं कि उनका मन भूलकर भी राम के चरण न छोड़े। अवध में माताएँ मंगल से भरे स्वर्णथाल लेकर परछन करने चलती हैं।

जनक अभी लौटना नहीं चाहते। दशरथ बार बार लौटने को कहते हैं। फिर दशरथ उतरकर खड़े हो जाते हैं, उनकी आँखों में प्रेम का प्रवाह बढ़ आता है। जनक हाथ जोड़कर पूछते हैं कि किस प्रकार विनती करें, और कहते हैं कि महाराज ने उन्हें बड़ाई दी है।

विदा लेते समय जनक राम का वह स्वरूप कहते हैं जिसे मन सहित वाणी नहीं जानती। वे कहते हैं कि अपने भाग्य और राम के गुणों की कथा पूरी नहीं हो सकती। फिर वे विनती करते हैं कि उनका मन भूलकर भी राम के चरणों को न छोड़े। आगे अवध है: घर घर मंगलकलश, अटारियों पर स्त्रियाँ, और बहुओं सहित कुमारों का परछन करने आती माताएँ।

लौटते जनक, आती बहुएँ

  • जनक स्नेहवश साथ चले आते राजा, जो राम से विनती करते हैं कि उनका मन भूलकर भी राम के चरण न छोड़े।
  • दशरथ जनक से लौटने को कहनेवाले और उनका सब प्रकार से सम्मान करनेवाले राजा। वे आगे गुरु की आज्ञा से समाज सहित अवध में प्रवेश करते हैं।
  • राम और उनके भाई चारों कुमार, जिनसे जनक आदरपूर्वक मिलते और जिन्हें अवध की स्त्रियाँ निहारती हैं।
  • विश्वामित्र और वसिष्ठ जनक की श्रद्धा और राम के आदर के पात्र मुनि। विश्वामित्र के चरणों की रज जनक सिर और आँखों पर लगाते हैं, और वसिष्ठ समय जानकर आज्ञा देते हैं।
  • कौसल्या और सब माताएँ प्रेम के वश देह की सुध भूलकर स्वागत सजाती रानियाँ, जिनमें सुमित्रा मंगल सामग्री जुटाती हैं।
  • सीता और सब दुलहिनें पालकियों में आती वधुएँ, जिन्हें देखकर नगर की स्त्रियाँ सुख पाती हैं।

बहुत दूर चले आये जनक

दशरथ पहले प्रतिष्ठित जनों से विनती करके उन्हें लौटाते हैं। फिर सब माँगनेवालों को आदर से बुलवाकर गहने, वस्त्र, घोड़े और हाथी देते हैं, और प्रेम से पुष्ट करके सबको खड़ा कर दिया। पोद्दार की टीका इसका अर्थ सम्पन्न और बलयुक्त कर देना बताती है।

वे बार बार विरुदावली कहकर और राम को हृदय में रखकर लौट जाते हैं। पोद्दार की टीका विरुदावली को कुलकीर्ति पढ़ती है। दशरथ जनक से बार बार लौटने को कहते हैं। जनक प्रेम के वश हैं, और लौटने की इच्छा नहीं होती।

दशरथ फिर सुहावने वचन कहते हैं: लौटिये महाराज, आप बहुत दूर आ गये हैं। फिर वे उतरकर खड़े हो जाते हैं, और उनकी आँखों में प्रेम का प्रवाह बढ़ आता है।

तब जनक हाथ जोड़कर बोलते हैं, और उनके वचन मानो स्नेह के अमृत में डुबोये हुए हैं। वे पूछते हैं कि किस प्रकार विनती करें, और कहते हैं कि महाराज ने उन्हें बड़ाई दी है।

दशरथ समधी जनक का सब प्रकार से सम्मान करते हैं। आपस के इस मिलन में अत्यन्त विनय है, और हृदय में न समानेवाली प्रीति।

जो मन और वाणी से परे हैं, वे सामने हैं

जनक मुनियों की मण्डली को सिर नवाते हैं और सबसे आशीर्वाद पाते हैं। फिर आदर के साथ अपने दामादों से मिलते हैं, और हाथ जोड़कर बोलते हैं। उनके वचन मानो प्रेम से जन्मे हैं।

जनक राम से पूछते हैं कि उनकी प्रशंसा किस प्रकार करें, और कहते हैं कि राम मुनियों और शिव के मन-मानस के हंस हैं। पोद्दार की टीका मन को ही मानसरोवर पढ़ती है।

योगी जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मद छोड़कर योग करते हैं, वे सर्वव्यापक ब्रह्म हैं, अव्यक्त हैं, अविनाशी हैं। वे चेतना और आनन्द के स्वरूप हैं, निर्गुण हैं और गुणों की राशि हैं।

मन सहित वाणी उन्हें नहीं जानती, और सब अनुमान करनेवाले उनकी तर्कना नहीं कर सकते। वेद उनकी महिमा कहते हुए नेति कहता है। वे तीनों कालों में एकरस रहते हैं। पोद्दार की टीका इस एकरसता को सदा और सर्वथा निर्विकार रहने के अर्थ में खोलती है।

जनक कहते हैं कि वही समस्त सुखों के मूल उनके नेत्रों के विषय हुए हैं, और जगत् में जीव को सब लाभ है, जब ईश्वर अनुकूल हों।

अगणित सौभाग्य, एक ही माँग

जनक राम से कहते हैं: आपने हर प्रकार से बड़ाई दी, और अपना जन जानकर अपना लिया।

दस हजार सरस्वती और शेष हों, और वे करोड़ों कल्पों तक गणना करते रहें, जनक का भाग्य और राम के गुणों की कथा कहकर समाप्त नहीं होती।

जो कुछ वे कहते हैं, एक बल पर कहते हैं: राम अत्यन्त थोड़े प्रेम से प्रसन्न हो जाते हैं। वे हाथ जोड़कर बार बार माँगते हैं कि उनका मन भूलकर भी इन चरणों को न छोड़े।

मानो प्रेम से पुष्ट किये हुए इन श्रेष्ठ वचनों को सुनकर पूर्णकाम राम सन्तुष्ट होते हैं।

राम अपने ससुर का सुन्दर विनय से सम्मान करते हैं। उनके लिये जनक का मान पिता दशरथ, विश्वामित्र और वसिष्ठ के समान है। पोद्दार की टीका विश्वामित्र को गुरु और वसिष्ठ को कुलगुरु बताती है।

फिर जनक भरत से विनती करते हैं, प्रेम से मिलते हैं और आशीर्वाद देते हैं। उनके बाद लक्ष्मण और शत्रुघ्न से मिलकर उन्हें भी आशीष देते हैं। राजा और कुमार प्रेम के वश होकर बार बार एक दूसरे को सिर नवाते हैं।

विश्वामित्र के चरणों में, फिर विदा

राम जनक से बार बार विनती करते और उनकी बड़ाई कहते हैं, और फिर सब भाइयों के साथ चल देते हैं। जनक जाकर विश्वामित्र के चरण पकड़ लेते हैं, और चरणों की रज सिर और आँखों पर लगाते हैं।

वे विश्वामित्र से कहते हैं कि मुनि के सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। लोकपाल जिस सुख और सुयश की इच्छा करते हैं, और जिसकी कामना करते हुए भी सकुचाते हैं, वही जनक को सहज सुलभ हो गया है। पोद्दार की टीका उस संकोच का कारण प्राप्ति को असम्भव समझना बताती है।

सब सिद्धियाँ मुनि के दर्शन की अनुगामिनी हैं। पोद्दार की टीका इसे पीछे पीछे चलना पढ़ती है।

बार बार विनती करके और सिर नवाकर, आशीर्वाद पाकर जनक लौटते हैं। जिस लौटने का आग्रह दशरथ पहले से कर रहे थे, वह यहाँ पूरा होता है।

रास्ते के लोगों को सुख

जनक के लौटने पर बारात डंका बजाती हुई चलती है, और छोटे बड़े सब समुदाय प्रसन्न हैं। गाँवों के स्त्री पुरुष राम को देखते हैं, और आँखों का फल पाकर सुखी होते हैं।

बीच बीच में सुन्दर पड़ाव होते हैं, और बारात रास्ते के लोगों को सुख देती हुई पवित्र दिन में अयोध्या के समीप पहुँचती है।

नगाड़ों पर चोट पड़ती है, ढोल बजते हैं, भेरी और शंख की बड़ी ध्वनि है। हाथियों और घोड़ों की आवाजें हैं, और झाँझों और डफलियों के साथ शहनाई रसीले राग बजा रही है। बारात के आने का समाचार सुनकर अवधवासी हर्षित होते हैं, और उनके शरीर पर रोमांच छा जाता है।

घर घर मंगल, धरती छूते वृक्ष

अवधवासी अपने अपने सुन्दर घर सँवारते हैं, और सजावट बाजारों, गलियों, चौराहों और नगर के द्वारों तक फैलती है। सब गलियाँ अरगजे से सींची गयी हैं, जहाँ तहाँ सुन्दर चौक पूरे गये हैं, और तोरण, ध्वजाएँ, पताकाएँ और वितान बाजारों पर छाये हैं। बाजार की सजावट का वर्णन नहीं हो सकता।

फल सहित सुपारी, केला और आम के वृक्ष लगाये गये हैं, और मौलसिरी, कदम्ब और तमाल भी। पोद्दार की टीका बताती है कि वे फल के भार से पृथ्वी को छू रहे हैं। उनके चारों ओर मणियों के सुन्दर कारीगरीवाले थाले बने हैं।

घर घर अनेक प्रकार के मंगलकलश सजाकर रखे गये हैं। राम की पुरी को देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवता सिहाते हैं।

उस समय राजभवन सोह रहा है। उसकी रचना देखकर कामदेव का मन मोहित हो जाता है। मंगल, शुभ शकुन, मनोहरता, ऋद्धि, सिद्धि, सुख, सुहावनी सम्पत्ति और सब प्रकार के उत्साह मानो सहज सुन्दर देह धारण करके दशरथ के घर में छा गये हैं। शिव पार्वती से पूछते हैं: राम और सीता को देखने की लालसा किसे न होगी?

माताओं का आनन्द और सुमित्रा के मंगलसाज

सुहागिनी स्त्रियाँ समूह बनाकर चली आती हैं, जो अपनी छवि से कामदेव की पत्नी रति का निरादर करती हैं। सब मंगल की वस्तुएँ और आरती सजाये गा रही हैं, मानो सरस्वती अनेक वेशों में गा रही हों।

भवन में कोलाहल है। उस समय और उस सुख का वर्णन नहीं हो सकता। कौसल्या आदि राम की माताएँ प्रेम के वश होकर अपने शरीर की सुध भूल जाती हैं। वे ब्राह्मणों को बहुत दान देती हैं, गणेश और शिव का पूजन करके।

वे परम प्रसन्न हैं, मानो अत्यन्त दरिद्र को चारों पदार्थ मिल गये हों। सब माताएँ सुख और महान् आनन्द के विवश हैं। उनके चरण नहीं चलते, अंग शिथिल हो गये हैं। राम के दर्शन के लिये अत्यन्त अनुराग में भरकर वे परछन का सब साज सजाने लगती हैं।

अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं। सुमित्रा हर्षपूर्वक मंगलसाज सजाती हैं: हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी, फिर अक्षत, अँखुए, गोरोचन और लावा, और तुलसी की सुन्दर मंजरियाँ।

सोने के कलश चित्रित और सहज सुहावने हैं, मानो कामदेव के पक्षियों ने घोंसले बनाये हों। शकुन की सुगन्धित वस्तुएँ बखानी नहीं जातीं। सब रानियाँ सम्पूर्ण मंगलसाज सजाती हैं, बहुत प्रकार की आरतियाँ बनाती हैं, और आनन्द में सुन्दर मंगलगीत गाती हैं।

सोने के थाल मंगल सामग्री से भरकर माताएँ उन्हें अपने करकमलों में लेकर परछन के लिये प्रसन्न मन से चलती हैं। उनके शरीर पुलकावली से छा गये हैं।

उत्सव की छवि में सावन

धूप के धुएँ से आकाश काला हो गया है, मानो सावन के बादलों ने घमंड ठान लिया हो। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसा रहे हैं, मानो बगुलों की पाँति मन को खींच रही हो।

सुन्दर मणियों से बनी बंदनवारें मानो सजाये हुए इन्द्रधनुष हैं। अटारियों पर सुन्दर और चपल स्त्रियाँ प्रकट होती और छिप जाती हैं, मानो बिजलियाँ चमक रही हों।

नगाड़ों की ध्वनि बादलों की घोर गर्जना है, और याचक पपीहे, मेढक और मोर हैं। देवता पवित्र सुगन्धित जल बरसा रहे हैं, और नगर के सब स्त्री पुरुष सुखी खेती हैं। पोद्दार की टीका इसे उपमा पढ़ती है, और सुगन्ध को ही जल।

दशरथ का नगर प्रवेश, राजद्वार पर परछन

समय जानकर वसिष्ठ आज्ञा देते हैं। दशरथ शिव, पार्वती और गणेश का स्मरण करके समाज सहित आनन्दित होकर नगर में प्रवेश करते हैं।

शुभ शकुन हो रहे हैं। देवता दुन्दुभियाँ बजाते और फूल बरसाते हैं, और देवताओं की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर मंगलगीत गाती हुई नृत्य करती हैं।

मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों को प्रकाशित करनेवाले राम का यश गा रहे हैं। पोद्दार की टीका यहाँ राम को सबको प्रकाश देनेवाला, परम प्रकाशस्वरूप कहती है। जयध्वनि और वेद की निर्मल वाणी दसों दिशाओं में सुनाई देती है, और बहुत से बाजे बजने लगते हैं। आकाश के देवता और नगर के लोग प्रेम में मग्न हैं। बारातियों की सजधज वर्णन से बाहर है, और उनके हृदय में सुख समाता नहीं।

नगरवासी पहले राजा को जोहार करते हैं, फिर राम को देखकर सुख पाते हैं। वे मणियाँ और वस्त्र निछावर करते हैं। उनके नेत्रों में आँसू हैं, और शरीर रोमांचित हैं।

नगर की स्त्रियाँ हर्षपूर्वक आरती करती हैं, और चारों सुन्दर कुमारों को देखकर आनन्दित होती हैं। फिर पालकियों के सुन्दर परदे हटाकर दुलहिनों को देखती हैं, और सुखी होती हैं। इस प्रकार सबको सुख देती हुई बारात राजद्वार तक आती है।

राजद्वार पर माताएँ प्रसन्न होकर बहुओं सहित कुमारों का परछन करती हैं।

भूलकर भी न छूटें चरण

विदा होते समय जनक कहते हैं कि उनके भाग्य और राम के गुणों की कथा कहकर पूरी नहीं हो सकती। जो कुछ वे कहते हैं, इस एक बल पर कहते हैं कि राम अत्यन्त थोड़े स्नेह से रीझ जाते हैं। वे बार बार माँगते हैं कि उनका मन भूलकर भी राम के चरणों को न छोड़े।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 340 से 348, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।