रामचरितमानस · बालकाण्ड · जनक का स्नेह और अवध का स्वागत
जनक का स्नेह और अवध का स्वागत
विदा के समय जनक की विनती राम के चरणों तक पहुँचती है, और अवध में माताओं के हाथ मंगल से भरे स्वर्णथाल सँभालते हैं।
जनक अभी लौटना नहीं चाहते। दशरथ बार बार आग्रह करते हैं, फिर भी साथ चलने का स्नेह विदा की घड़ी को आगे बढ़ाता रहता है। एक समय ऐसा आता है जब दशरथ स्वयं रथ से उतरकर खड़े हो जाते हैं। उनकी आँखों में प्रेम के आँसू हैं। जनक के हाथ जुड़ते हैं और उस मिलन की बड़ाई करने लगते हैं, जिसकी प्रीति दोनों राजाओं के हृदय में समा नहीं रही।
तुलसीदास के बालकाण्ड में इस विदा को पूरा होने के लिये बहुत कुछ कहना है। जनक राम का वह स्वरूप पहचानते हैं जिस तक मन और वाणी की पहुँच नहीं, अपने सौभाग्य की सीमा खोजते हैं और अन्त में मन को चरणों से कभी अलग न होने देने की विनती करते हैं। आगे अवध का नगर है, वहाँ घर घर मंगलकलश हैं, अटारियों पर स्त्रियाँ हैं, और माताएँ बहुओं सहित कुमारों का परछन करने को चली आती हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- जनक स्नेहवश साथ चले आते राजा, जो राम से अपने मन को उनके चरणों में बनाये रखने की विनती करते हैं।
- दशरथ जनक को आदरपूर्वक विदा देनेवाले कोसलपति, जो आगे गुरु की आज्ञा से समाज सहित अवध में प्रवेश करते हैं।
- राम और उनके भाई रूप, शील और गुणों के निधान चारों कुमार, जिनसे जनक प्रेमपूर्वक मिलते और जिन्हें अवध की स्त्रियाँ निहारती हैं।
- विश्वामित्र और वसिष्ठ जनक की श्रद्धा और राम के आदर के पात्र मुनि। विश्वामित्र से जनक आशीर्वाद लेते हैं, वसिष्ठ नगर प्रवेश की आज्ञा देते हैं।
- कौसल्या और सब माताएँ दर्शन की लालसा में देह की सुध भूलकर स्वागत सजाती रानियाँ, जिनमें सुमित्रा मंगल सामग्री जुटाती हैं।
- सीता और सब दुलहिनें पालकियों में आती वधुएँ, जिन्हें देखकर नगर की स्त्रियाँ सुख पाती हैं।
बहुत दूर चले आये जनक
दशरथ पहले प्रतिष्ठित जनों से विनती करके उन्हें लौटाते हैं। फिर सब माँगनेवालों को आदर से बुलवाते हैं। गहने, वस्त्र, घोड़े और हाथी दिये जाते हैं। देने के साथ तुलसी प्रेम से पुष्ट करने की बात कहते हैं। पोद्दार जी की टीका इसका अर्थ सम्पन्न और बलयुक्त कर देना बताती है। विदा लेनेवाले लोगों को ऐसा सहारा मिल रहा है कि वे सँभलकर खड़े हो सकें। राजा के पास आये याचकों का लौटना इस उदारता से भर जाता है।
वे बार बार कुल की कीर्ति कहते हैं और राम को हृदय में रखकर लौट जाते हैं। बाहर से मिले गहने और वस्त्र उनके साथ हैं, भीतर राम का स्मरण साथ है। इस समूह को विदा कर देने के बाद दशरथ जनक से भी लौटने का आग्रह करते हैं। पर यहाँ वही विनती बार बार करनी पड़ती है। जनक प्रेम के वश हैं। वे सुन रहे हैं कि अब लौटना चाहिये, फिर भी लौटने की इच्छा नहीं होती।
पुनि कह भूपति बचन सुहाए । फिरिअ महीस दूरि बड़ि आए॥
चौपाई १
राउ बहोरि उतरि भए ठाढ़े । प्रेम प्रबाह बिलोचन बाढ़े॥
दशरथ के वचन सुहावने हैं। वे कहते हैं कि महाराज बहुत दूर आ गये हैं, अब कृपया लौटें। इसके बाद वे रथ से उतरकर खड़े हो जाते हैं। आँखों में प्रेम का प्रवाह बढ़ आया है। जो राजा विदा का आग्रह कर रहे थे, उन्हीं के नेत्र उस आग्रह के भीतर का कष्ट दिखा देते हैं। जनक के न लौटने में स्नेह है, दशरथ के लौटने को कहने में आदर है, और दोनों के बीच खड़े इन आँसुओं में एक दूसरे से बिछुड़ने की कठिनाई है।
तब जनक हाथ जोड़ते हैं। उनके शब्दों को तुलसी स्नेह के अमृत में डूबा हुआ बताते हैं। जनक के सामने प्रश्न है कि अपनी विनती किन शब्दों में कहें। दशरथ ने उन्हें जो बड़ाई दी है, उसके अनुरूप कह पाना सहज नहीं लगता। वे उसी सम्मान का उल्लेख करते हैं और उसे अपने लिये प्राप्त बड़प्पन मानते हैं। दोनों राजाओं की भेंट में हर ओर से दूसरे का मान बढ़ाया जा रहा है। इसीलिये आग्रह के दोहराव से भी वचन की कोमलता घटती नहीं।
कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भाँति।
दोहा ३४०
मिलनि परसपर बिनय अति प्रीति न हृदयँ समाति॥ ३४०॥
दोहा इस मिलन में दो बातें एक साथ रखता है, अत्यन्त विनय और हृदय में न समानेवाली प्रीति। विनय उनके व्यवहार में दिखाई देती है, हाथ जोड़ने में, मधुर वचन कहने में, एक दूसरे का सम्मान करने में। प्रीति का विस्तार आँसुओं और बार बार रुक जाने में खुलता है। जनक को अभी मुनियों से आशीर्वाद लेना है, दामादों से मिलना है और राम से अपना मन कहना है। यह विदा उस सबके लिये जगह रखती है।
दशरथ प्रतिष्ठित लोगों और याचकों को आदरपूर्वक विदा देते हैं। जनक प्रेमवश लौटना नहीं चाहते। रथ से उतरकर खड़े दशरथ के नेत्र भर आते हैं, और जनक हाथ जोड़कर उनके दिये सम्मान की बड़ाई करते हैं।
जो मन और वाणी से परे हैं, वे सामने हैं
जनक मुनियों की मण्डली को सिर नवाते हैं और सबसे आशीर्वाद पाते हैं। इसके बाद आदर के साथ अपने दामादों से मिलते हैं। चारों भाई रूप, शील और गुणों के भण्डार हैं। उनके सामने जनक अपने कमल जैसे सुन्दर हाथ जोड़कर बोलते हैं। पहले उनके वचन स्नेह के अमृत में डूबे थे, अब तुलसी उन्हें प्रेम से जन्मे हुए कहते हैं। उस वाणी की गति उसी से समझ आती है, जिसमें जनक का हृदय भरा है।
राम से प्रशंसा करने की रीति पूछते हुए जनक उनका एक रूप सामने रखते हैं। मुनियों और महादेव के मन मानो मानसरोवर हैं, और राम उन सरोवरों के हंस। इस उपमा में मन और राम का सम्बन्ध बहुत निकट हो जाता है। जिन मनों को जनक याद कर रहे हैं, वे मुनियों के हैं और स्वयं शिव के हैं। उन्हीं के मन में रमनेवाले राम अभी उनके सम्मुख हैं। यह पहचान आगे की पूरी स्तुति का आधार बनती है।
करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मदु त्यागी॥
चौपाई २
ब्यापकु ब्रह्मु अलखु अबिनासी। चिदानंदु निरगुन गुनरासी॥
योगी उन्हीं को पाने के लिये योग करते हैं। जनक उनके साधन के साथ छोड़ी जानेवाली वृत्तियाँ भी गिनाते हैं, क्रोध, मोह, ममता और मद। पाने की लगन और त्याग का क्रम एक ही वाक्य में आता है। जिनकी प्राप्ति के लिये साधक अपना भीतर सँभालते हैं, वे सर्वव्यापक ब्रह्म हैं। वे अव्यक्त हैं, अविनाशी हैं, चेतना और आनन्द के स्वरूप हैं। जनक उन्हें निर्गुण कहते हैं और उसी के साथ गुणों की राशि भी।
इन सम्बोधनों में राम की महिमा का विस्तार खुलता है। जो सर्वत्र हैं उन्हें किसी एक स्थान में बाँधना कठिन है। जो अविनाशी हैं उनका स्वरूप विनाश से परे है। जिनके लिये निर्गुण कहा गया, उन्हीं में गुणों का असीम भण्डार देखा गया। जनक इस स्तुति को कहते हुए सामने खड़े राम से दृष्टि नहीं हटाते। आगे उनकी बात उस कठिनाई तक जाती है जहाँ जानने और कहने के साधन स्वयं सीमित पड़ जाते हैं।
मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सकहिं सकल अनुमानी॥
चौपाई ३
महिमा निगमु नेति कहि कहई । जो तिहुँ काल एकरस रहई॥
मन सहित वाणी भी उन्हें नहीं जान पाती। अनुमान करनेवाले उनका अनुमान करते रह जाते हैं, तर्क से उन्हें पा लेना सम्भव नहीं होता। वेद उनकी महिमा कहते हुए नेति कहता है, उसके वर्णन की सीमा पर भी उनका पार नहीं आता। जनक फिर तीनों कालों में एकरस रहने का स्मरण करते हैं। पोद्दार जी की टीका इस एकरसता को सदा और सर्वथा निर्विकार रहने के अर्थ में खोलती है। समय के बदलने से उनके स्वरूप में विकार नहीं आता।
अब इस लम्बी पहचान का फल सामने आता है। जिन तक मन और वाणी पहुँच नहीं पाते, वही जनक की आँखों के विषय हुए हैं। समस्त सुखों का मूल उन्हें दिखाई दे रहा है। स्तुति में कही हुई हर बात इस प्रत्यक्ष दर्शन का मूल्य बढ़ाती चली आयी थी। योगियों का साधन, मुनियों और शिव का मन, वेद की नेति, तीनों कालों की एकरसता, सब स्मरण करके जनक अपने नेत्रों को मिला यह सौभाग्य कह रहे हैं।
नयन बिषय मो कहुँ भयउ सो समस्त सुख मूल।
दोहा ३४१
सबइ लाभु जग जीव कहँ भएँ ईसु अनुकूल॥ ३४१॥
जनक इस उपलब्धि को ईश्वर के अनुकूल होने से जोड़ते हैं। जगत् में जीव पर ईश्वर की अनुकूलता हो तो उसे सभी लाभ मिलते हैं। सामने उपस्थित राम को देखकर वे उसी अनुग्रह का अनुभव कर रहे हैं। उनका कथन किसी दूर की प्राप्ति के विषय में नहीं ठहरता, वह उनके अपने दर्शन तक उतर आता है। जो समस्त सुखों के मूल हैं, उन्हें आँखों ने पाया है। जनक की कृतज्ञता इसी अनुभव से आगे बढ़कर अपने लिये एक प्रार्थना चुनेगी।
जनक राम को मुनियों और शिव के मन का हंस, योगियों की साधना का लक्ष्य, सर्वव्यापक अविनाशी ब्रह्म और तीनों कालों में निर्विकार कहते हैं। मन, वाणी और तर्क से परे वही प्रभु उनके नेत्रों के सामने हैं। वे इसे ईश्वर की अनुकूलता से मिला सौभाग्य मानते हैं।
अगणित सौभाग्य, एक ही माँग
जनक अब राम के व्यवहार को याद करते हैं। आपने हर प्रकार से बड़ाई दी, अपना जन जानकर अपना लिया। इतने बड़े स्वरूप का वर्णन करने के बाद वे इस अपनाये जाने पर ठहरते हैं। जो समस्त सुखों के मूल हैं, उनसे मिला आत्मीय सम्बन्ध जनक को अपने सौभाग्य का विस्तार दिखाता है। उसी के लिये वे गणना की एक ऐसी कल्पना रखते हैं जिसका पूरा समय बीत जाने पर भी कथन पूरा नहीं होगा।
दस हजार सरस्वती और शेष हों, वे करोड़ों कल्पों तक लेखा करते रहें, तब भी जनक का भाग्य और राम के गुणों की कथा समाप्त नहीं कर सकते। संख्या और अवधि दोनों इस कथन में साथ बढ़ते हैं। कहनेवालों की सामर्थ्य बहुत है, कहने के लिये समय भी बहुत है, फिर भी जिनका वर्णन होना है उनका अन्त नहीं मिलता। जनक अपनी बड़ाई का कारण उसी अपनाये जाने में देखते हैं, जिसका उल्लेख उन्होंने अभी राम के सामने किया है।
इसके बाद वे बताते हैं कि फिर भी कुछ कहने का साहस कहाँ से आता है। राम अत्यन्त थोड़े प्रेम से प्रसन्न हो जाते हैं। जनक के पास बोलने का यही एक बल है। गुणों की पूरी गणना उनके वश की बात नहीं है, पर प्रेम से कही हुई विनती राम को प्रिय है। इस विश्वास के कारण हाथ फिर जुड़ते हैं। वे बार बार माँगते हैं कि उनका मन भूलकर भी इन चरणों का परित्याग न करे।
बार बार मागउँ कर जोरें । मनु परिहरै चरन जनि भोरें॥
चौपाई ४
सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे । पूरनकाम रामु परितोषे॥
इस माँग में अभी कही गयी सारी महिमा सिमट आती है। जनक ने जिनके विषय में योगियों का साधन और वेद का कथन याद किया, उन्हीं के चरणों में अपने मन का बने रहना चाहा है। उनकी प्रार्थना में भूल की भी गुंजाइश न रहे, इतना अनुराग है। शरीर को अब लौटना होगा। मन उन चरणों से न छूटे, यह विनती लौटने की घड़ी में उनके प्रेम का अपना उपाय है।
राम इन श्रेष्ठ वचनों को सुनकर सन्तुष्ट होते हैं। तुलसी उन्हें पूर्णकाम कहते हैं। उनकी पूर्णता के साथ यह प्रसन्नता भी कही गयी है, जो जनक के प्रेम से पुष्ट वचनों को सुनकर हुई। जनक ने थोड़े प्रेम से रीझने का जो भरोसा अभी व्यक्त किया था, उसी के साथ राम की सन्तुष्टि रख दी गयी। विनती सुनी गयी है, और उस विनती को सुननेवाले के मन की प्रसन्नता कथा में साफ दिखाई देती है।
राम अपने ससुर का सुन्दर विनय से सम्मान करते हैं। उनके लिये जनक का मान पिता दशरथ, विश्वामित्र और वसिष्ठ के समान है। पोद्दार जी की टीका कौसिक को गुरु विश्वामित्र और वसिष्ठ को कुलगुरु कहकर यह सम्बन्ध स्पष्ट करती है। इस उत्तर में राम की ओर से आदर का व्यवहार सामने आता है। जनक ने हाथ जोड़कर जो प्रेम कहा था, उसे ऐसे सम्मान से ग्रहण किया गया जिसमें पिता और गुरुओं की समान मर्यादा है।
मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्हि असीस महीस।
दोहा ३४२
भए परसपर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस॥ ३४२॥
फिर जनक भरत से विनती करते हैं, प्रेम से मिलते हैं और आशीर्वाद देते हैं। उनके बाद लक्ष्मण और शत्रुघ्न से मिलकर उन्हें भी आशीष मिलती है। इस क्रम में किसी भाई की भेंट छूटती नहीं। पहले सब दामादों के रूप, शील और गुण याद किये गये थे, अब विदा के समय सबसे अलग अलग मिलना पूरा होता है। राजा और कुमार प्रेम के वश होकर बार बार एक दूसरे को सिर नवाते हैं। आदर का उत्तर आदर से मिल रहा है।
जनक कहते हैं कि दस हजार सरस्वती और शेष करोड़ों कल्पों में भी उनके भाग्य और राम के गुणों का वर्णन पूरा नहीं कर सकते। वे मन को राम के चरणों में सदा बनाये रखने की विनती करते हैं। राम प्रसन्न होकर उनका सम्मान करते हैं, फिर जनक भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न से मिलकर आशीर्वाद देते हैं।
विश्वामित्र से आशीर्वाद लेकर ही विदा
राम भी जनक से बार बार विनती करते और उनकी बड़ाई कहते हैं। इसके बाद वे सब भाइयों के साथ चल देते हैं। जनक की विदा में अब विश्वामित्र के प्रति कृतज्ञता प्रकट होती है। वे जाकर मुनि के चरण पकड़ लेते हैं। चरणों की रज सिर पर लगाते हैं, आँखों पर लगाते हैं। अभी आँखों को मिला राम का दर्शन उनके लिये समस्त सुखों की प्राप्ति था, अब उन्हीं आँखों पर मुनि की चरणधूलि रखी जा रही है।
वे विश्वामित्र को मुनीश्वर कहकर सम्बोधित करते हैं। उनके मन का विश्वास है कि मुनि के सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं रह जाता। इस बात को कहने के लिये जनक लोकपालों का उदाहरण रखते हैं। लोकपाल जिस सुख और सुयश की इच्छा करते हैं, जिसकी कामना करते हुए भी सकुचाते हैं, वही सुख और सुयश जनक को सहज सुलभ हो गया है। पोद्दार जी की टीका उस संकोच का कारण प्राप्ति को असम्भव समझना बताती है।
सो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी॥
चौपाई ५
कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई । फिरे महीसु आसिषा पाई॥
जनक का वचन विश्वामित्र के दर्शन की महिमा को और स्पष्ट करता है। सारी सिद्धियाँ इन दर्शनों की अनुगामिनी हैं, उनके पीछे चलती हैं। जिस उपलब्धि पर अभी वे चकित थे, उसे मुनि की कृपा के सामने रखते हैं। राम से अपनी प्रार्थना कह लेने के बाद यह कृतज्ञता भी अपने पूरे विस्तार से कही जाती है। उनके लिये प्राप्त सुख की कथा में विश्वामित्र का दर्शन और आशीर्वाद आदर के साथ स्मरण करने योग्य हैं।
बार बार विनती होती है और सिर झुकता है। विश्वामित्र से आशीर्वाद पाकर तब जनक लौटते हैं। जिस लौटने का आग्रह दशरथ पहले से कर रहे थे, वह यहाँ पूरा हुआ। बीच में मुनियों की वन्दना थी, राम की स्तुति और प्रार्थना थी, सब भाइयों से प्रेमपूर्वक भेंट थी, फिर विश्वामित्र के चरणों में यह निवेदन था। जनक की विदा को समझने के लिये इस पूरे क्रम का साथ रहना आवश्यक है। उनका स्नेह हर सम्बन्ध को उसका समय देता चला आया है।
राम भाइयों सहित आगे चलते हैं। जनक विश्वामित्र की चरणरज सिर और आँखों पर लगाते हैं, प्राप्त सुख और सुयश के लिये कृतज्ञता कहते हैं, और सब सिद्धियों को उनके दर्शन का अनुगामी मानते हैं। मुनि का आशीर्वाद लेकर तब वे लौटते हैं।
रास्ते के लोगों को दर्शन का सुख
जनक के लौटने पर बारात डंका बजाती हुई चलती है। छोटे और बड़े, सब समुदाय प्रसन्न हैं। मार्ग के गाँवों में स्त्रियाँ और पुरुष राम को देखते हैं और आँखों का फल पाकर सुखी होते हैं। जनक ने जिन नेत्रों के सौभाग्य का इतना विस्तृत वर्णन किया था, उसी दर्शन का सुख यहाँ गाँव के लोगों तक पहुँचता है। तुलसी उनके प्रसन्न होने को नेत्रों का फल मिलना कहते हैं। देखने की लालसा और उसे पूरा करनेवाला दर्शन इस चलती बारात के साथ साथ हैं।
बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत।
दोहा ३४३
अवध समीप पुनीत दिन पहुँची आइ जनेत॥ ३४३॥
बीच बीच में सुन्दर पड़ाव होते हैं। बारात रास्ते के लोगों को सुख देती हुई पवित्र दिन में अयोध्या के समीप पहुँचती है। इस यात्रा की गति में चलना और ठहरना दोनों हैं। गाँवों के स्त्री पुरुषों की प्रसन्नता साथ रखते हुए कथा अवध के पास आती है। वहाँ पहुँचने की खबर अब नगर में जाएगी और जो लोग अपने घरों में हैं, वे भी इस मिलन की तैयारी में लग जाएँगे।
नगाड़ों पर चोट पड़ती है, ढोल बजते हैं, भेरी और शंख की बड़ी ध्वनि है। हाथियों और घोड़ों की आवाजें भी उसी कोलाहल में मिलती हैं। झाँझों और डफलियों के साथ शहनाई रसीले राग बजा रही है। अलग अलग बाजों का नाम लेने से इस आगमन की ध्वनि कई ओर खुल जाती है। चोट की गूँज भी है और राग की मिठास भी। बारात के आने का समाचार सुनकर अवधवासी हर्षित होते हैं, उनके शरीर पर रोमांच छा जाता है।
जनक को विदा करके बारात गाँवों के लोगों को रामदर्शन का सुख देती चलती है। सुन्दर पड़ावों के बाद पवित्र दिन में अवध के निकट पहुँचती है। बाजे बजते हैं और आगमन का समाचार नगरवासियों को आनन्दित कर देता है।
घर घर मंगल, फलभार से झुके वृक्ष
अवधवासी अपने अपने सुन्दर घर सँवारते हैं। सजावट घरों के बाहर भी फैलती है, बाजारों में, गलियों में, चौराहों पर और नगर के द्वारों तक। जिन राहों से बारात आनेवाली है, उनकी शोभा नगर के उत्साह को सामने ला रही है। सब गलियाँ अरगजे से सींची गयी हैं। जहाँ तहँ सुन्दर चौक पूरे गये हैं। तोरण, ध्वजाएँ, पताकाएँ और वितान बाजारों पर छाये हैं। तुलसी कहते हैं कि बाजार का बना हुआ रूप बखान में नहीं आ सकता।
सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥
चौपाई ६
लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥
फल सहित सुपारी, केला और आम के वृक्ष लगाये गये हैं। मौलसिरी, कदम्ब और तमाल भी हैं। इन वृक्षों के साथ फल का उल्लेख सजावट को भरा हुआ रूप देता है। पोद्दार जी की टीका स्पष्ट करती है कि फल के भार से वे पृथ्वी को छू रहे हैं। ऊपर शाखाओं की शोभा है और नीचे उनके चारों ओर मणियों से बने थाले हैं। उन थालों में सुन्दर कारीगरी है। नगर ने वृक्षों को रोपने की जगह भी उतने ही साज से बनाई है।
घर घर अनेक प्रकार के मंगलकलश सजाकर रखे गये हैं। इस तैयारी में बार बार हर घर का स्मरण आता है। पहले प्रत्येक ने अपना सदन सँवारा, अब प्रत्येक घर में कलश हैं। राम की पुरी को देखकर ब्रह्मा आदि सभी देवता सिहाते हैं। नगर का रूप ऐसा बना है कि देवताओं की दृष्टि भी उसकी शोभा और सौभाग्य पर ठहरती है। स्वागत की सामग्री में अरगजे की सुगन्ध, चौकों की रचना, पताकाओं का फैलाव और फलभरे वृक्षों का झुकाव एक साथ जुड़ गये हैं।
अब दशरथ का भवन दिखाई देता है। उसकी रचना मन को ऐसा मोहती है कि कामदेव का मन भी मोहित हो जाए। मंगल, शुभ शकुन, मनोहरता, ऋद्धि, सिद्धि, सुख और सम्पत्ति, सब उस भवन में शोभा पा रहे हैं। तुलसी कल्पना करते हैं कि सब प्रकार के उत्साह सहज सुन्दर देह धारण करके दशरथ के घर में छा गये हों। जिन भावों के नाम सुनते हैं, वे यहाँ मानो रूप लेकर उपस्थित हैं। राम और वैदेही को देखने की लालसा सबमें है।
अवध के घर, बाजार, गलियाँ और द्वार सजते हैं। अरगजे से सींची गलियों, मंगलकलशों और मणियों के थालों में लगे फलभरे वृक्षों से नगर शोभित है। दशरथ का भवन ऐसा है जैसे मंगल, सम्पत्ति और आनन्द ने वहाँ सुन्दर रूप धारण कर लिया हो।
माताओं का आनन्द और सुमित्रा के मंगलसाज
सुहागिनी स्त्रियाँ समूह बनाकर चली आती हैं। उनकी छवि के सामने कामदेव की प्रिया का सौन्दर्य भी दबता दिखाई देता है, जिन्हें पोद्दार जी की टीका रति नाम से पहचानती है। सभी मंगल की वस्तुएँ और आरती सजाये हुए गा रही हैं। उनका गान सुनकर ऐसा लगता है मानो सरस्वती अनेक वेशों में गा रही हों। राजभवन का आनन्द अब चलती हुई स्त्रियों, सजी आरतियों और सुनाई पड़ते गीतों में प्रकट है।
भवन में आनन्द का कोलाहल हो रहा है। उस समय और उस सुख को शब्दों में बाँधना कठिन है। कौसल्या आदि राम की सब माताएँ प्रेम के वश होकर अपने शरीर की सुध भूल जाती हैं। उनके लिये दर्शन की लालसा इतनी प्रबल है कि देह की अवस्था याद नहीं रहती। गणेश और त्रिपुरारि शिव का पूजन करके वे ब्राह्मणों को बहुत दान देती हैं। अपने सुख की इस घड़ी में पूजा भी है और उदारता भी।
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि।
दोहा ३४५
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि॥ ३४५॥
माताओं की प्रसन्नता बताने के लिये तुलसी अत्यन्त दरिद्र मनुष्य का उदाहरण लाते हैं, जिसे चारों पदार्थ मिल गये हों। प्राप्ति का आनन्द कितना गहरा है, यह उस तुलना में खुलता है। आगे उसी हर्ष का शरीर पर असर दिखाई देता है। सब माताओं के अंग शिथिल हैं, चरण चल नहीं रहे। सुख और महान् आनन्द ने उन्हें विवश कर दिया है। फिर भी राम को देखने का अत्यन्त अनुराग उन्हें परछन की सारी सामग्री सजाने में लगा देता है।
अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं। इसी बीच मंगलसाज सजाने में सुमित्रा का नाम विशेष रूप से आता है। वे हर्षपूर्वक सामग्री सँभालती हैं। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी रखे जाते हैं। फिर अक्षत, अँखुए, गोरोचन और लावा आते हैं। तुलसी की सुन्दर मंजरियाँ भी शोभा देती हैं। इन वस्तुओं को एक एक करके कहने से स्वागत की तैयारी आँखों के सामने आकार लेती है। माताओं के हाथ जिन वस्तुओं को अब थालों में रख रहे हैं, उनमें से प्रत्येक मंगल का हिस्सा है।
अच्छत अंकुर लोचन लाजा । मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥
चौपाई ७
छुहे पुरट घट सहज सुहाए । मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥
सोने के कलश अनेक रंगों से चित्रित हैं। उनकी सहज सुन्दरता के लिये तुलसी कामदेव के पक्षियों के घोंसलों की उपमा रखते हैं। रंग, कलश और उन पर रचा रूप उस कल्पना में मिलते हैं। शकुन की सुगन्धित वस्तुएँ इतनी हैं कि बखानी नहीं जातीं। सब रानियाँ सम्पूर्ण मंगलसाज सजाती हैं और बहुत प्रकार की आरतियाँ बनाती हैं। उनके आनन्द में सुन्दर मंगलगीत उठते हैं। तैयारी अब पूरी सभा के हाथों और स्वरों में फैल गयी है।
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
दोहा ३४६
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥ ३४६॥
सोने के थाल मंगल की सामग्री से भर लिये गये हैं। माताएँ उन्हें अपने कमल जैसे कोमल हाथों में लेकर परछन के लिये चलती हैं। उनके शरीर रोमांच से भरे हैं। अभी चरणों के न चलने और अंगों के शिथिल होने का वर्णन था, अब हाथों में सजे थाल लेकर उनके चल पड़ने का चित्र है। दर्शन का अनुराग स्वागत के कर्म तक पहुँच गया है। थालों में मंगल सामग्री शोभित है और उन्हें उठाये माताओं के तन पर पुलक की पल्लवित शोभा है।
सुहागिनी स्त्रियाँ आरती और मंगलगीतों के साथ आती हैं। कौसल्या आदि माताएँ गणेश और शिव की पूजा करके दान देती हैं। सुमित्रा हल्दी, दूब, दही, अक्षत, अँखुए, गोरोचन, लावा, तुलसी मंजरियों और अन्य मंगल सामग्री को सजाती हैं। सब माताएँ स्वर्णथाल लेकर परछन करने चलती हैं।
उत्सव की छवि में सावन
नगर की सजावट और उसका कोलाहल अब मिलकर सावन का एक चित्र बनाते हैं। धूप का धुआँ आकाश को काला कर रहा है। तुलसी को वह सावन के घुमड़ते बादलों जैसा दिखाई देता है। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएँ बरसा रहे हैं। धुएँ के श्याम विस्तार के बीच वे मालाएँ बगुलों की पाँति जैसी मन को खींचती हैं। आकाश का रंग और फूलों की उड़ती पंक्तियाँ मिलकर वर्षा के दिनों की छवि जगाती हैं।
धूप धूम नभु मेचक भयऊ । सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥
चौपाई ८
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥
फिर दृष्टि तोरणों पर आती है। सुन्दर मणियों से बनी बंदनवारें मानो सजाये हुए इन्द्रधनुष हैं। अटारियों पर स्त्रियाँ आती और जाती हैं, कभी दिखाई देती हैं, कभी ओझल हो जाती हैं। उनकी सुन्दर चपलता बिजली की दमक जैसी है। इस उपमा में रंग भी हैं और गति भी। मणियों की सजावट एक ओर ठहरी है, स्त्रियों का प्रकट होना और छिपना दूसरी ओर उस चित्र में चमक भर देता है।
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा । जाचक चातक दादुर मोरा॥
चौपाई ९
सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी । सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥
नगाड़ों की ध्वनि बादलों की घोर गर्जना बनती है। याचक पपीहों, मेढकों और मोरों के समान हैं। उनके साथ सावन का चित्र सुनाई भी देने लगता है। देवता पवित्र सुगन्धरूपी जल बरसा रहे हैं और नगर के सब स्त्री पुरुष खेती जैसे सुखी हो रहे हैं। जिन लोगों ने गलियाँ और घर सँवारे थे, अब उन्हीं की प्रसन्नता उस वर्षा से हरी होती फसल की तरह दिखाई देती है। उत्सव का सुख सारे नगर को एक साथ पुष्ट कर रहा है।
इस सावन के हर अंग का सम्बन्ध सामने चल रहे स्वागत से है। बादल धूप के धुएँ में हैं, बगुलों की पाँति फूलमालाओं में, इन्द्रधनुष बंदनवारों में और बिजली अटारियों पर आती जाती स्त्रियों में। गर्जना नगाड़ों से उठती है। सुगन्ध जल का रूप लेती है और प्रसन्न नगरवासी खेती का। इन रूपों को साथ देखकर सजावट का एक एक पदार्थ अपनी जगह भी पहचाना जाता है और सब मिलकर भरपूर वर्षा का आनन्द भी देते हैं।
तुलसी स्वागत को सावन की उपमा में देखते हैं। धूप का धुआँ बादल, फूलमालाएँ बगुले, बंदनवारें इन्द्रधनुष और अटारियों की स्त्रियाँ बिजली जैसी हैं। नगाड़े गरजते हैं, याचक वर्षा के पक्षियों और मेढकों जैसे हैं, और सुगन्ध की वर्षा में नगरवासी खेती की तरह सुखी हैं।
दशरथ का नगर प्रवेश, राजद्वार पर परछन
प्रवेश का समय जानकर गुरु आज्ञा देते हैं। पोद्दार जी की टीका यहाँ गुरु को वसिष्ठ और रघुकुलमणि को महाराज दशरथ स्पष्ट करती है। दशरथ शिव, पार्वती और गणेश का स्मरण करते हैं, फिर पूरे समाज के साथ आनन्दित होकर नगर में प्रवेश करते हैं। जिस नगर ने घरों से द्वारों तक स्वागत सजाया है, उसकी ओर आते राजा के साथ यह गुरु की आज्ञा और देवताओं का स्मरण जुड़ा हुआ है।
समउ जानि गुर आयसु दीन्हा । पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥
चौपाई १०
सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा । मुदित महीपति सहित समाजा॥
शुभ शकुन हो रहे हैं। देवता दुन्दुभियाँ बजाते और फूल बरसाते हैं। देवताओं की स्त्रियाँ प्रसन्न होकर सुन्दर मंगलगीत गाती हुई नृत्य करती हैं। नगर का उत्सव आकाश तक फैला दिखाई देता है। नीचे समाज के साथ दशरथ का प्रवेश है, ऊपर देवताओं के बाजे और फूल हैं। हर ओर की ध्वनि में आगमन का आनन्द सुनाई पड़ता है।
मागध, सूत, भाट और चतुर नट राम का यश गा रहे हैं। पोद्दार जी की टीका तीनों लोकों के उजागर राम को सबको प्रकाश देनेवाला, परम प्रकाशस्वरूप कहती है। जयध्वनि और वेद की निर्मल श्रेष्ठ वाणी मंगल से भरी हुई दसों दिशाओं में सुनाई देती है। बहुत से बाजे बजने लगते हैं। आकाश के देवता और नगर के लोग प्रेम में मग्न हैं। बारातियों की सजधज वर्णन से बाहर है और उनके हृदय में सुख समाता नहीं।
नगरवासी पहले राजा को जोहार करते हैं। फिर राम को देखकर सुख पाते हैं। वे मणियाँ और वस्त्र निछावर करते हैं। उनके नेत्रों में आँसू भरे हैं और शरीर रोमांचित हैं। विदा के समय दशरथ की आँखों में जो प्रेम का प्रवाह था, आगमन पर वही प्रेम अब नगरवासियों की आँखों में दिखाई देता है। मिलनेवालों की प्रसन्नता उपहारों में भी उतर रही है और तन की पुलक में भी।
नगर की स्त्रियाँ हर्षपूर्वक आरती करती हैं। उनकी आँखों के सामने चारों सुन्दर कुमार हैं, सभी को देखकर वे आनन्दित होती हैं। फिर पालकियों के सुन्दर परदे हटाती हैं और दुलहिनों को देखकर सुखी होती हैं। इस स्वागत में कुमारों के साथ वधुओं का दर्शन भी पूरा होता है। नगर का प्रेम इन नये जोड़ों तक पहुँचता है। परदे उठते हैं, देखने की लालसा पूरी होती है और बारात सबको सुख देती हुई राजद्वार तक आती है।
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।
दोहा ३४८
मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार॥ ३४८॥
राजद्वार पर माताएँ बहुओं सहित कुमारों का परछन करती हैं। जिन स्वर्णथालों की सामग्री इतने विस्तार से सजायी गयी थी, उनका प्रयोजन इस घड़ी सामने है। माताओं के हाथों में स्वागत है और सामने कुमार अपनी वधुओं के साथ हैं। अवध की गलियों से चले दर्शन के इस क्रम को द्वार पर माताओं का स्नेह मिल जाता है। कथा इस समय इसी परछन पर ठहरती है, प्रसन्न माताओं और उनके सामने खड़े जोड़ों के बीच।
वसिष्ठ की आज्ञा से दशरथ शिव, पार्वती और गणेश का स्मरण करके समाज सहित अवध में प्रवेश करते हैं। नगरवासी राजा को वन्दना करके राम का दर्शन पाते हैं। स्त्रियाँ चारों कुमारों की आरती करती और दुलहिनों को देखती हैं। राजद्वार पर माताएँ बहुओं सहित कुमारों का परछन करती हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
जनक की विदा में सबसे देर तक उनका एक निवेदन साथ रहता है। वे राम के गुणों की सीमा नहीं पाते, अपने भाग्य का लेखा पूरा नहीं कर सकते, फिर भी प्रेम के भरोसे बोलते हैं। उनकी माँग है कि मन भूलकर भी चरणों को न छोड़े। इतने विस्तार से कही गयी स्तुति अन्त में मन की इसी लगन पर टिकती है। हम उनके लौटने को देखते हैं तो उस लौटने के साथ यह प्रार्थना भी याद रहती है।
अवध के स्वागत में वही लगन अनेक हाथों का काम बन जाती है। कोई अपना घर सँवारता है, कोई मंगलकलश सजाता है, कोई आरती लेकर आता है। सुमित्रा के साज में हल्दी और दूब से लेकर तुलसी की मंजरियों तक हर वस्तु की अपनी जगह है। माताओं का अनुराग उन वस्तुओं को थालों में सहेजता है और फिर राजद्वार तक ले आता है। जिसे देखने की लालसा थी, उसके सामने पहुँचकर यही तैयारी परछन बनती है।
एक ओर जनक आशीर्वाद लेकर लौट चुके हैं, दूसरी ओर माताएँ बहुओं सहित कुमारों का स्वागत कर रही हैं। विदा और आगमन के बीच मार्ग के गाँव, सजा हुआ नगर और दर्शन से सुखी लोग हैं। इस पूरे विस्तार में प्रीति कभी वचन होती है, कभी आँसू, कभी फूल और कभी हाथों में उठाया हुआ स्वर्णथाल। राजद्वार पर माताओं के परछन में वह प्रीति अपने सामने खड़े परिवार को निहार रही है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३४० से ३४८, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।