रामचरितमानस · बालकाण्ड · लक्ष्मण और परशुराम का संवाद
लक्ष्मण और परशुराम का संवाद
धनुष की बात से उठी तकरार में फरसा बार बार सँभलता है, लक्ष्मण की हँसी लौटती है, और राम वचन तथा संकेत से छोटे भाई को रोकते हैं।
राम बड़ी नम्रता से पूछते हैं कि क्या आज्ञा है। परशुराम के सामने शिवधनुष तोड़नेवाले का प्रसंग है, और राम उसे उन्हीं का कोई सेवक कहते हैं। इस एक सम्बोधन में बातचीत की गुंजाइश रखी गयी है। मुनि उस गुंजाइश को स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि में धनुष तोड़ना शत्रु का काम है, और ऐसा करनेवाला लड़ाई के लिये सामने आये। बात यहीं से ऐसी चढ़ती है कि उसका भय वहाँ उपस्थित सभी राजाओं तक पहुँच जाता है।
लक्ष्मण उस धमकी पर मुसकराते हैं। आगे उनकी हँसी, उनके कोमल सम्बोधन और उनकी तीखी चोटें साथ चलती हैं। फरसा दिखाया जाता है तो वे फूँक से पहाड़ उड़ाने की बात कहते हैं। गुरु का ऋण चुकाने की धमकी आती है तो ब्याज और हिसाब लगानेवाले का प्रसंग छेड़ देते हैं। सुनने में जो बात चतुर लगती है, उसी पर सभा हाय हाय कर उठती है। तुलसीदास इस संवाद में हँसने का अवसर देते हैं और उसके साथ काँपते हुए लोगों को भी दिखाते हैं।
विश्वामित्र क्षमा की बात कहेंगे और मन ही मन मुनि की भूल भी समझेंगे। राम बढ़ते क्रोध को देखेंगे, लक्ष्मण को संकेत से रोकेंगे और फिर ऐसी विनय करेंगे जिससे कुछ ठंडक आये। बालकाण्ड के इस प्रसंग में वाणी के अलग अलग काम सामने हैं: चुनौती देना, अपमान करना, बीच में पड़ना, दया जगाना। अन्त में एक और कठोर उत्तर सुनकर लक्ष्मण फिर हँसेंगे, और राम की टेढ़ी दृष्टि उन्हें गुरु के समीप पहुँचा देगी।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम जो आरम्भ में आज्ञा पूछते हैं, फिर क्रोध शान्त करने के लिये बोलते हैं और लक्ष्मण को संकेत से रोकते हैं।
- लक्ष्मण राम के छोटे भाई, जिनकी निर्भय और व्यंग्यभरी बातों से तकरार बढ़ती जाती है।
- परशुराम भृगुवंशी मुनि, जो शिवधनुष तोड़नेवाले को शत्रु मानते हैं और अपने फरसे का प्रताप सुनाते हैं।
- विश्वामित्र गुरु, जो बालक का अपराध क्षमा करने को कहते हैं और भीतर ही भीतर दोनों भाइयों का प्रभाव पहचानते हैं।
- जनक जो लक्ष्मण की बढ़ती बातों से डरकर उन्हें चुप रहने के लिये कहते हैं।
सेवक की बात और शत्रु की पहचान
नाथ संभुधनु भंजनिहारा । होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥
चौपाई १
आयसु काह कहिअ किन मोही । सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥
राम मुनि को नाथ कहकर सम्बोधित करते हैं। शिवजी का धनुष तोड़नेवाला आपका ही कोई दास होगा, वे कहते हैं, अब जो आज्ञा हो वह मुझसे कहिये। बोलने का यह ढंग मुनि के सम्मान को पूरा स्थान देता है। टूटे धनुष की चर्चा के बीच राम सेवक और स्वामी का सम्बन्ध सामने रखते हैं, जिसमें कोई आदेश दिया जा सकता है और उसे सुना जा सकता है। मुनि का उत्तर बताता है कि वे अभी उस सम्बन्ध को मानने के लिये तैयार नहीं हैं।
परशुराम क्रोध में कहते हैं कि सेवक वही है जो सेवा करे। जिसने शत्रु का काम किया है, उसे लड़ाई करनी चाहिये। फिर वे राम को सम्बोधित करके अपनी बात और स्पष्ट कर देते हैं: शिवधनुष तोड़नेवाला सहस्रबाहु के समान उनका शत्रु है। राम की ओर से रखा गया दास का शब्द मुनि के उत्तर में शत्रु हो गया। अभी किसी का नया अपराध गिनाया भी नहीं गया है, पर उस काम को किस सम्बन्ध में देखा जाय, इसी पर दोनों के वचन अलग दिशाओं में जा रहे हैं।
उनकी माँग है कि धनुष तोड़नेवाला समाज से अलग निकल आये। साथ ही धमकी है कि ऐसा न हुआ तो सभी राजा मारे जायेंगे। इसलिये सुननेवालों के लिये यह केवल दो व्यक्तियों के बीच की रुष्ट बातचीत नहीं रह जाती। एक व्यक्ति को अलग करने की माँग के पीछे सबके प्राणों का भय रख दिया गया है। इसी वाक्य को सुनकर लक्ष्मण मुसकराते हैं। कवि उनके अगले वचनों का स्वभाव भी बता देते हैं: वे परशुराम का अपमान करते हुए बोलते हैं।
लक्ष्मण लड़कपन की धनुहियों का उदाहरण सामने लाते हैं। उनके कहने के अनुसार बचपन में बहुत से छोटे धनुष तोड़े गये, पर गोसाईं ने कभी ऐसा क्रोध नहीं किया। फिर इसी धनुष पर इतनी ममता का कारण क्या है? सम्बोधन में आदर है, तुलना में चोट। जिस धनुष के टूटने पर मुनि समस्त राजाओं को धमका रहे हैं, उसे बालक अपने लड़कपन के टूटे हुए धनुषों के साथ रख रहा है। परशुराम इस बराबरी को सुनते ही और कुपित हो उठते हैं।
रे नृप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार।
दोहा २७१
धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार॥ २७१॥
मुनि कहते हैं कि राजपुत्र काल के वश होकर बोलने का होश खो चुके हैं। शिवजी का संसार में विख्यात धनुष किसी छोटी धनुही के समान कैसे हो सकता है? उनके उत्तर में प्रसिद्धि और महत्त्व का दावा है, और लक्ष्मण की तुलना उसी महत्त्व को चुभ रही है। धनुष का टूटना सामने की बात है, पर अब विवाद उसके मूल्य का हो चला है। एक ओर मुनि उस पर संसार की मान्यता रखते हैं; दूसरी ओर लक्ष्मण अपने अगले उत्तर में सभी धनुषों को एक जैसा कहने वाले हैं।
राम आज्ञा पूछते हैं और धनुष तोड़नेवाले को सेवक कहते हैं। परशुराम उसे शत्रु मानकर अलग होने को कहते हैं तथा सभी राजाओं को धमकाते हैं। लक्ष्मण बचपन की धनुहियों से तुलना करते हैं, जिस पर मुनि शिवधनुष का असाधारण महत्त्व जताते हैं।
पुराने धनुष की दलील और फरसे का प्रताप
लक्ष्मण हँसकर अपनी बात और आगे बढ़ाते हैं। हे देव, हमारे विचार में तो सभी धनुष समान हैं। पुराना धनुष टूट जाने से क्या हानि और क्या लाभ? वे यह भी कहते हैं कि राम ने उसे नया समझकर देखा था। पुराने और नये की यह चर्चा लक्ष्मण की दलील है, जिसमें मुनि की आसक्ति पर फिर चोट पड़ती है। वे जिस वस्तु के लिये इतना क्रोध दिखा रहे हैं, लक्ष्मण उसी को पुराने धनुष की मामूली हानि की तरह पेश कर रहे हैं।
फिर उनका कहना है कि वह तो छूते ही टूट गया, इसलिये रघुनाथ का भी दोष नहीं है। मुनि व्यर्थ क्रोध क्यों कर रहे हैं? इस उत्तर में लक्ष्मण राम की ओर से दोष हटाते हुए मुनि के क्रोध का कारण ही अस्वीकार कर देते हैं। बात उनके मुँह से कही जा रही है और उसका प्रभाव सामने दिखाई देता है। परशुराम अब अपने फरसे की ओर देखते हैं। धनुष की पुरानगी पर चलती बहस उनके अपने स्वभाव और सामर्थ्य की चेतावनी तक पहुँच गयी है।
मुनि कहते हैं कि वे बालक समझकर लक्ष्मण को मार नहीं रहे। केवल मुनि जान लेने से उनका पूरा परिचय नहीं मिल जाता। वे अपने को बालब्रह्मचारी, अत्यन्त क्रोधी और संसार में प्रसिद्ध क्षत्रियकुल का शत्रु बताते हैं। इस परिचय को देते समय वे अपने संयम का कारण बालक की आयु कहते हैं और अपनी हिंसक शक्ति को फिर स्पष्ट करते हैं। लक्ष्मण ने धनुष की बात हलकी करके कही थी; परशुराम अपने फरसे और अपने किये हुए कामों का भार उसके सामने रख देते हैं।
भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही । बिपुल बार महिदेवन्ह दीन्ही॥
चौपाई २
सहसबाहु भुज छेदनिहारा । परसु बिलोकु महीपकुमारा॥
अपने भुजबल का वर्णन करते हुए परशुराम कहते हैं कि उन्होंने पृथ्वी को राजाओं से रहित किया और बहुत बार ब्राह्मणों को दे दिया। फिर वे राजकुमार को अपने फरसे की ओर देखने को कहते हैं, वही फरसा जिसने सहस्रबाहु की भुजाएँ काटी थीं। पहले सहस्रबाहु का नाम शत्रु की तुलना में आया था। अब उसी नाम के साथ हथियार का किया हुआ काम जुड़ गया है। अपने प्रताप की स्मृति को मुनि वर्तमान धमकी की धार बना रहे हैं।
इसके बाद माता और पिता की चिन्ता का नाम आता है। परशुराम राजकुमार को सावधान करते हैं कि अपने माता पिता को शोक में न डालें। वे अपने फरसे को इतना भयानक बताते हैं कि वह गर्भों के बच्चों तक का नाश करता है। चेतावनी का यह विस्तार सुनकर सभा की आशंका समझ में आती है। यहाँ चोट केवल अपमान सहने की नहीं रह गयी है। मुनि के वचनों में मृत्यु का भय, माता पिता का दुःख और अजन्मे बच्चों तक पहुँचती हुई घोर शक्ति एक साथ खड़ी है।
लक्ष्मण पुराने धनुष और छूते ही टूट जाने की दलील देकर राम का दोष न होने की बात कहते हैं। परशुराम उत्तर में अपना स्वभाव, क्षत्रियों से वैर, पृथ्वी के दान और सहस्रबाहु की भुजाएँ काटनेवाले फरसे का प्रताप सुनाते हैं। उनकी चेतावनी माता पिता के शोक और गर्भस्थ बच्चों तक पहुँचती है।
कोमल वाणी में कुम्हड़े की बतिया
इतने कठोर परिचय पर लक्ष्मण फिर हँसते हैं। तुलसी उनकी वाणी को कोमल कहते हैं, और उसके भीतर जो अर्थ रखा जाता है वह मुनि को और चुभनेवाला है। लक्ष्मण कहते हैं कि मुनीश्वर अपने को बहुत बड़ा योद्धा मानते हैं। बार बार कुल्हाड़ी दिखाकर वे मानो फूँक से पहाड़ उड़ा देना चाहते हैं। हथियार की घोरता के उत्तर में यह अनुपात रखा गया है: सामने पहाड़ हो और उसे उड़ाने के लिये केवल फूँक मारी जा रही हो।
कोमल स्वर के कारण इस उत्तर की कटुता कम नहीं होती। मुनि चाहते हैं कि उनका हथियार देखकर भय जागे; लक्ष्मण उस दिखाने को ही निष्फल बताते हैं। फिर एक और छोटा, घरेलू चित्र लाते हैं, कुम्हड़े की बतिया का। टीका बतिया का अर्थ कुम्हड़े का छोटा कच्चा फल खोलती है। लक्ष्मण कहते हैं कि यहाँ कोई ऐसा फल नहीं है जो तर्जनी उँगली देखकर मर जाय। जिस भय की अपेक्षा बार बार की जा रही है, वे उसी अपेक्षा का उपहास कर रहे हैं।
इहाँ कुम्हड़बतिया कोउ नाहीं । जे तरजनी देखि मरि जाहीं॥
चौपाई ३
देखि कुठारु सरासन बाना । मैं कछु कहा सहित अभिमाना॥
लक्ष्मण यह भी मानते हैं कि कुठार, धनुष और बाण देखकर उन्होंने कुछ अभिमान के साथ कहा था। उनकी निगाह हथियारों पर गयी तो उत्तर में अपनी वीरता का भाव आ गया। इस स्वीकार के तुरन्त बाद वे देखने की दूसरी बात जोड़ते हैं। जनेऊ देखकर और सामनेवाले को भृगुवंशी समझकर वे क्रोध रोकते हैं और मुनि के वचन सहते हैं। एक ही व्यक्ति के शस्त्र और यज्ञोपवीत, दोनों लक्ष्मण की दृष्टि में हैं, और वे अपने अलग अलग व्यवहार का कारण उन्हीं से बताते हैं।
भृगुसुत समुझि जनेउ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ रिस रोकी॥
चौपाई ४
सुर महिसुर हरिजन अरु गाई । हमरें कुल इन्ह पर न सुराई॥
उनके कुल में देवता, ब्राह्मण, भगवान् के भक्त और गाय पर वीरता नहीं दिखाई जाती, ऐसा लक्ष्मण कहते हैं। यह सीमा गिनाकर वे आगे उसका हिसाब भी देते हैं। इन्हें मारने में पाप है और इनसे हारने में अपकीर्ति। मुनि मारें तब भी उनके चरणों में पड़ना चाहिये। लक्ष्मण के मुँह से कही गयी यह मर्यादा उनके हाथ को रोके हुए दिखाती है, पर वाणी अभी भी चोट करती चली जा रही है। सम्मान का नियम सामने रखा गया है और उसी वक्त सम्बोधन में व्यंग्य बना हुआ है।
बधें पापु अपकीरति हारें । मारतहूँ पा परिअ तुम्हारें॥
चौपाई ५
कोटि कुलिस सम बचनु तुम्हारा । ब्यर्थ धरहु धनु बान कुठारा॥
अब लक्ष्मण हथियारों की आवश्यकता पर ही चुटकी लेते हैं। मुनि का एक एक वचन करोड़ों वज्रों के समान है, इसलिये धनुष, बाण और कुठार धारण करना व्यर्थ है। जिस वाणी से वे अपनी घोर शक्ति बता रहे थे, उसी को लक्ष्मण घोर हथियार कह देते हैं। यह प्रशंसा की तरह सुनाई पड़नेवाली शिकायत है। मुनि के शब्दों की चोट इतनी भारी बतायी गयी कि हाथ के शस्त्र अनावश्यक हो गये। शब्दों और हथियारों के बीच की यह खींचतान पूरे संवाद को और कस देती है।
अन्त में वे क्षमा भी माँगते हैं। हथियारों को देखकर कुछ अनुचित कह दिया हो तो धीर महामुनि क्षमा करें। धीर का सम्बोधन उसी व्यक्ति के लिये है जिसका क्रोध अभी बार बार बढ़ा है। इसलिये क्षमा का वाक्य भी बातचीत को सहज नहीं कर पाता। परशुराम क्रोध के साथ गम्भीर स्वर में बोलते हैं और अब सीधे विश्वामित्र को पुकारते हैं। लक्ष्मण को समझाने की बात उनके गुरु तक पहुँचेगी, क्योंकि मुनि के प्रताप का अपना वर्णन अब तक छोटे राजकुमार में डर उत्पन्न नहीं कर पाया है।
लक्ष्मण फूँक और पहाड़ तथा कुम्हड़े की बतिया के उदाहरण से धमकी का उपहास करते हैं। वे शस्त्र देखकर अभिमान और जनेऊ देखकर संयम की बात कहते हैं, अपने कुल की चार मर्यादाएँ गिनाते हैं और मुनि के वचनों को ही करोड़ों वज्रों जैसा बताकर क्षमा माँगते हैं।
विश्वामित्र से शिकायत, लक्ष्मण से फिर उत्तर
परशुराम अब विश्वामित्र से कहते हैं कि यह बालक कुबुद्धि, कुटिल और काल के वश है। उनके आरोप में लक्ष्मण अपने कुल का घात करनेवाले बन जाते हैं। सूर्यवंश को पूर्णचन्द्र की उपमा देकर वे बालक को उसका कलंक कहते हैं। अभी तक शिवधनुष और फरसे का प्रताप सामने था; अब लक्ष्मण के स्वभाव तथा उनके कुल की प्रतिष्ठा पर आक्षेप है। मुनि उन्हें उद्दण्ड, अज्ञानी और निडर बताते हुए गुरु से शिकायत कर रहे हैं।
वे घोषणा करते हैं कि क्षण भर में बालक काल का ग्रास हो जायेंगे। इस चेतावनी के साथ अपने ऊपर दोष न आने की बात भी रख देते हैं। विश्वामित्र उन्हें बचाना चाहते हों तो रोकें, मुनि का प्रताप, बल और रोष बतायें। परशुराम की माँग में गुरु की मध्यस्थता का अर्थ अभी इतना है कि लक्ष्मण को भय का उचित कारण समझा दिया जाय। अपने विषय में वे जो कह चुके हैं, उसे गुरु की वाणी से फिर कहलवाना चाहते हैं।
लक्ष्मण इसी बात को अपने अगले उत्तर का विषय बना लेते हैं। मुनि का सुयश उनके रहते दूसरा कौन सुना सकता है? अपने मुँह से वे अनेक बार बहुत प्रकार से अपनी करनी कह चुके हैं। लक्ष्मण के अनुसार परिचय की कमी नहीं रह गयी है। जो कहना है वह स्वयं मुनि पर्याप्त कह रहे हैं। गुरु से प्रताप सुनाने के आग्रह को वे इस तरह उलटते हैं कि किसी दूसरे वक्ता की आवश्यकता ही नहीं बचती। अपने यश का वर्णन करनेवाले को उसी वर्णन पर व्यंग्य सुनना पड़ता है।
फिर लक्ष्मण कहते हैं कि इतने पर सन्तोष न हुआ हो तो और कुछ कह लीजिये। क्रोध रोककर असह्य दुःख क्यों सहना? वे मुनि को वीरता का व्रत धारण करनेवाले, धीर और क्षोभरहित कहकर गाली देने को अशोभनीय बताते हैं। एक ओर गाली रोकने की बात है, दूसरी ओर ऐसे विशेषण हैं जो अभी दिख रहे क्रोध से बार बार टकराते हैं। विनय की शक्ल लिये यह उत्तर मुनि को शान्त करने में सहायता नहीं देता।
सूर समर करनी करहिं कहि न जनावहिं आपु।
दोहा २७४
बिद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रतापु॥ २७४॥
लक्ष्मण शूरवीर और कायर के आचरण का भेद कहते हैं। शूरवीर युद्ध में अपना काम करते हैं; वे अपने मुँह से अपनी वीरता नहीं जताते। शत्रु को रण में उपस्थित देखकर प्रताप की डींग मारना कायर का काम है। इस कथन का निशाना सामने है, क्योंकि परशुराम अभी अपने शौर्य का वर्णन कर रहे थे। वीरता की कसौटी का यह वाक्य उसी वक्त कही गयी व्यक्तिगत चोट भी है। इसे सुनते समय सभा के सामने खड़ा शस्त्रधारी मुनि बराबर याद रहता है।
काल का नाम बार बार सुनकर लक्ष्मण कहते हैं कि मुनि मानो हाँक लगाकर उसे उनके लिये बुला रहे हैं। इस बार उत्तर के साथ हाथ की गति दिखाई देती है। परशुराम अपने भयानक फरसे को सँभालकर हाथ में ले लेते हैं। इतने समय से जो हथियार दिखाया और जिसका प्रताप सुनाया जा रहा था, वह फिर तैयार किया गया है। कड़े वचन और सँभलता हुआ फरसा एक ही चौपाई में आते हैं; व्यंग्य का परिणाम केवल अगला उत्तर नहीं रह जाता।
परशुराम विश्वामित्र से लक्ष्मण को रोकने को कहते हैं और उनके कुल तथा स्वभाव पर आरोप लगाते हैं। लक्ष्मण आत्मप्रशंसा पर व्यंग्य करके वीर की करनी और कायर की डींग का भेद कहते हैं। काल को बुलाने की उनकी अगली चुटकी पर मुनि फरसा सँभाल लेते हैं।
गुरु की क्षमा और मन के भीतर की हँसी
परशुराम सभा को सुनाकर कहते हैं कि अब लोग उन्हें दोष न दें। कटु बोलनेवाला बालक वध के योग्य है। बालक देखकर उन्होंने बहुत बचाया, पर अब वह सचमुच मरने को आया है। अपने को रोकने का जो कारण वे पहले बताते थे, उसी कारण के चुक जाने की घोषणा कर रहे हैं। बालक होना एक ओर उनकी अब तक की दया का प्रमाण बनाया जाता है; दूसरी ओर उसी बालक की वाणी को उसके वध का कारण ठहराया जाता है।
कौसिक कहा छमिअ अपराधू । बाल दोष गुन गनहिं न साधू॥
चौपाई ६
खर कुठार मैं अकरुन कोही । आगें अपराधी गुरुद्रोही॥
विश्वामित्र बीच में पड़ते हैं। अपराध क्षमा कीजिये, वे कहते हैं, साधु बालकों के गुण और दोष नहीं गिनते। गुरु की बात छोटी है और ठीक मुनि के वर्तमान निर्णय पर रखी गयी है। परशुराम गुण दोष गिनकर दण्ड का निष्कर्ष निकाल रहे हैं; विश्वामित्र बालपन पर दृष्टि रखने और क्षमा करने को कहते हैं। वे लक्ष्मण की कटुता का नया पक्ष प्रस्तुत नहीं करते। उनकी विनती मुनि के साधु होने और बालक के क्षमा पाने के योग्य होने पर टिकी है।
परशुराम उत्तर में तीन बातों को एक साथ सामने रखते हैं। कुठार तीखा है, वे स्वयं दयारहित और क्रोधी हैं, और सामने अपराधी तथा गुरुद्रोही उत्तर दिये जा रहा है। इसके बाद भी उसे बिना मारे छोड़ना वे केवल विश्वामित्र के शील और प्रेम का प्रभाव बताते हैं। उनके कथन में गुरु की विनती का मान रखा गया है, पर खतरे को वापस नहीं लिया गया। वे स्पष्ट करते हैं कि अन्यथा कठोर कुठार से काटकर थोड़े ही परिश्रम में अपने गुरु के ऋण से मुक्त हो जाते।
यहीं विश्वामित्र के भीतर की बात हमें सुनाई देती है। बाहर उन्होंने अपराध क्षमा करने को कहा है; हृदय में वे हँसते हैं। मुनि को सर्वत्र हरा ही हरा दिखाई दे रहा है। पोद्दार की टीका इस आशय को खोलती है: परशुराम अपनी सर्वत्र विजय के कारण राम और लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय समझ रहे हैं। उनके सामने कौन है, उसकी पहचान में भूल बनी हुई है। गुरु इस भूल को समझते हैं, जबकि मुनि अपने प्रताप की पिछली सफलता के आधार पर वर्तमान का निर्णय करते जा रहे हैं।
गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ।
दोहा २७५
अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहुँ न बूझ अबूझ॥ २७५॥
इस दोहे की हँसी खाँड़ के दो अर्थों में खुलती है। टीका लोहे की खाँड़ का अर्थ फौलाद का खाँड़ा, अर्थात् खड्ग बताती है, और ऊख की खाँड़ गन्ने के रस से बनी मिठास है। मुनि जिसे आसानी से गल जानेवाली वस्तु समझ रहे हैं, वह उनकी कल्पना से कहीं अधिक कठोर है। यह विश्वामित्र के मन में उठी उपमा है। उनके सामने कोई मिठाई या नया खड्ग लाया नहीं गया; दो अर्थों वाला शब्द मुनि की गलत पहचान को एक साथ तीखा और विनोदी बना देता है।
विश्वामित्र बालक का अपराध क्षमा करने की विनती करते हैं। परशुराम उन्हें मान देने के कारण वध से रुकने की बात कहते हैं। गुरु हृदय में हँसते हैं: मुनि राम और लक्ष्मण का प्रभाव नहीं समझ रहे, और फौलाद की खाँड़ को ऊख की खाँड़ मान रहे हैं।
ऋण का हिसाब, सभा की पुकार और राम के वचन
परशुराम ने गुरु का ऋण चुकाने की बात कही थी। लक्ष्मण का अगला व्यंग्य उसी शब्द से बढ़ता है। वे कहते हैं कि मुनि का शील संसार भर में प्रसिद्ध है, उसे कौन नहीं जानता। फिर माता पिता और गुरु के ऋण की बात जोड़ते हैं। उनके कथन के अनुसार माता पिता से तो मुनि अच्छी तरह उऋण हो चुके हैं, केवल गुरु का ऋण रह गया है और उसी का बड़ा सोच है। आदरभरे शील के उल्लेख से शुरू हुआ वाक्य फिर कड़ा उलाहना बन गया है।
लक्ष्मण इस बचे हुए ऋण को अपने माथे लिखे हुए दावे की तरह दिखाते हैं। मानो उसका भुगतान उन्हीं से लिया जाना हो। बहुत दिन निकल गये होंगे, इसलिये ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब लगानेवाले को बुला लिया जाय, वे तुरंत थैली खोल देंगे। एक प्राणघातक धमकी को वे लेन देन की भाषा में रख देते हैं। गुरु का ऋण चुकाने के लिये उन्हें काट देने का जो कथन आया था, उसी पर यह हिसाब और भुगतान की चुटकी है।
सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा । दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा॥
चौपाई ७
अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली । तुरत देउँ मैं थैली खोली॥
यहाँ हिसाब लगानेवाला और थैली दोनों लक्ष्मण के उत्तर के भीतर हैं। उनके कहने से सभा में कोई लेखा खोलने नहीं बैठता। जो सचमुच होता है वह फिर कुठार का सँभलना है। कटु वचन सुनकर परशुराम हथियार तैयार करते हैं, और सारी सभा हाय हाय पुकार उठती है। लक्ष्मण ने धमकी को विनोद का रूप दिया, सुननेवालों को उसी में प्राणों का संकट दिखाई दिया। अब उनकी सामूहिक आवाज़ इस तकरार के बीच स्पष्ट सुनाई पड़ रही है।
लक्ष्मण फिर भी कहते हैं कि भृगुश्रेष्ठ उन्हें फरसा दिखा रहे हैं, जबकि वे ब्राह्मण समझकर उन्हें छोड़ रहे हैं। मुनि अब तक अपने न मारने का एहसान जता रहे थे; लक्ष्मण उन्हीं से कहते हैं कि वे स्वयं ब्राह्मण का विचार करके तरह दे रहे हैं। इसके आगे और भी तीखा आरोप है: मुनि को कभी रण में बलवान् वीर मिले ही नहीं, ब्राह्मण देवता अपने घर में ही बड़े हैं। इस बार सब लोग इसे अनुचित कहकर पुकार उठते हैं।
सभा की प्रतिक्रिया लक्ष्मण की वाक्चातुरी के साथ उसका दूसरा फल सामने रखती है। लोग उनकी निर्भयता सुन रहे हैं और आपत्ति भी कर रहे हैं। राम इशारे से छोटे भाई को रोक देते हैं। इस हस्तक्षेप में कोई लम्बा कथन नहीं है, पर लक्ष्मण की ओर मर्यादा का संकेत पहुँचता है। अब राम परशुराम के बढ़ते क्रोध की ओर देखते हैं और बोलते हैं। जिस वाणी से वह अग्नि बढ़ रही थी, उसके बीच दूसरी तरह के वचन आने वाले हैं।
लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोपु कृसानु।
दोहा २७६
बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु॥ २७६॥
तुलसी इस क्षण को अग्नि, आहुति और जल के सम्बन्ध से समझाते हैं। परशुराम का क्रोध अग्नि है, लक्ष्मण के उत्तर आहुति के समान उसमें पड़ रहे हैं, और राम के वचन जल के समान हैं। इस उपमा में प्रत्येक की भूमिका उसकी कही हुई बात के प्रभाव से तय होती है। लक्ष्मण का प्रत्येक नया उत्तर आग को बढ़ा रहा है। राम उसका बढ़ना देखकर ऐसी बात चुनते हैं जो शान्त कर सके। आरम्भ में आज्ञा पूछनेवाले राम अब छोटे भाई के लिये कृपा माँगने को आगे आते हैं।
लक्ष्मण गुरु के ऋण पर ब्याज और भुगतान का व्यंग्य करते हैं। परशुराम कुठार सँभालते हैं और सभा हाय हाय करती है। लक्ष्मण की अगली चोट को सब अनुचित कहते हैं। राम उन्हें संकेत से रोककर बढ़ते क्रोध पर जल जैसे शान्त करनेवाले वचन बोलते हैं।
कुछ ठंडक आती है, फिर मुसकान लौटती है
राम परशुराम से बालक पर कृपा करने को कहते हैं। वे लक्ष्मण को सीधा और दुधमुँहा बच्चा बताकर क्रोध न करने की विनती करते हैं। यदि बालक मुनि के प्रभाव को कुछ भी जानता, तो क्या ऐसी बराबरी करता? राम के इस कथन में छोटे भाई की अज्ञानता को क्षमा का कारण बनाया गया है। मुनि जिस उत्तर को अपनी प्रतिष्ठा का जानबूझकर अपमान समझ रहे हैं, राम उसे बच्चे की नासमझी मानकर देखने का आग्रह करते हैं।
राम बालक की चपलता के सामने गुरु, पिता और माता के मन का स्नेह रखते हैं। बच्चे कुछ चंचलता कर बैठें तो बड़े मन में प्रसन्न होते हैं। वे मुनि से लक्ष्मण को छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा करने को कहते हैं। आरम्भ में धनुष तोड़नेवाले के लिये दास का सम्बन्ध रखा गया था। अब उसी सम्बन्ध में लक्ष्मण को देखकर दया करने की प्रार्थना है। राम के वचनों में सामनेवाले को ऊपर स्थान देकर उसके स्नेह के लिये जगह बनायी जा रही है।
जौं लरिका कछु अचगरि करहीं । गुर पितु मातु मोद मन भरहीं॥
चौपाई ८
करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील धीर मुनि ग्यानी॥
फिर राम मुनि के शील, धीरता और ज्ञान का स्मरण कराते हैं। पोद्दार की टीका यहाँ उनके समदर्शी होने का आशय भी खोलती है। लक्ष्मण ने धीर और क्षोभरहित जैसे सम्बोधन व्यंग्य में रखे थे; राम इन्हीं गुणों को कृपा की विनती का आधार बना रहे हैं। वे मुनि को अपना प्रताप सिद्ध करने की नयी चुनौती नहीं देते। वे उनके भीतर के धैर्य और स्नेह की ओर बात मोड़ते हैं, ताकि बालक का अपराध उसी दृष्टि से देखा जा सके।
इसका फल भी आता है। राम के वचन सुनकर परशुराम कुछ ठंडे पड़ते हैं। कुछ का यह छोटा सा संकेत शान्ति की नाजुक अवस्था दिखाता है। क्रोध पूरा मिटा नहीं है, पर उसमें कमी आयी है। इतने में लक्ष्मण कुछ कहकर फिर मुसकरा देते हैं। उनकी वह बात यहाँ विस्तार से नहीं खुलती; मुसकान का प्रभाव अवश्य खुल जाता है। उसे देखते ही मुनि के नख से शिख तक फिर क्रोध फैल जाता है। राम की विनय से आया ठहराव लौटती हुई हँसी में टूट गया।
अब परशुराम राम से शिकायत करते हैं कि उनका भाई बहुत पापी है। लक्ष्मण के उजले शरीर और काले हृदय की बात कहकर वे उनके भीतर दोष होने का आरोप लगाते हैं। राम ने दुधमुँहा कहा था, मुनि उसे विषभरा मुख बताते हैं। वे लक्ष्मण को स्वभाव से टेढ़ा और राम के सदृश शील न रखनेवाला कहते हैं। ये क्रोध में दिये हुए आक्षेप हैं, जिनमें राम की क्षमा माँगनेवाली प्रत्येक बात का कठोर प्रत्युत्तर आता है।
मुनि की शिकायत का एक सिरा फिर भय पर आ टिकता है। वे कहते हैं कि लक्ष्मण उन्हें काल के समान नहीं देखते। आरम्भ से अब तक उनके प्रताप का वर्णन, हथियार दिखाना और बार बार मृत्यु की चेतावनी इसी अपेक्षा से जुड़े हैं। लक्ष्मण की निर्भयता उस अपेक्षा को पूरा नहीं करती। इसलिये राम के सामने भी मुनि की व्यथा वही है: बालक उनके घोर स्वरूप को मानकर सहम क्यों नहीं जाता? उत्तर में लक्ष्मण फिर हँसते हुए क्रोध के दोष बताने लगते हैं।
राम लक्ष्मण को दुधमुँहा बच्चा और सेवक मानकर कृपा करने की विनती करते हैं। परशुराम कुछ शान्त होते हैं, पर लक्ष्मण की लौटती मुसकान से उनका क्रोध फिर बढ़ता है। वे राम से छोटे भाई की शिकायत करते हैं और दुधमुँहे होने की बात के उत्तर में विषभरे मुख का आरोप लगाते हैं।
क्रोध की सीख, जनक का भय और गुरु के पास जाना
लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल।
दोहा २७७
जेहि बस जन अनुचित करहिं चरहिं बिस्व प्रतिकूल॥ २७७ ॥
लक्ष्मण कहते हैं कि क्रोध पाप की जड़ है। उसके वश में होकर मनुष्य अनुचित काम करते हैं और सबके प्रतिकूल चलते हैं। कथन में क्रोध से सावधान करने की सीख है, और इसे कहनेवाले स्वयं हँस रहे हैं। अभी उनकी मुसकान से मुनि का रोष फिर चढ़ा है। इसलिये यह सीख जिस घड़ी दी गयी है, उस घड़ी का स्वर भी उसमें सुनाई पड़ता है। क्रोध का दोष कहा गया है, पर उससे बचने की राह बनानेवाला संयम आगे की बातों में फिर कठिन हो जाता है।
वे अपने को मुनिराज का दास कहते हैं और क्रोध छोड़कर दया करने का अनुरोध करते हैं। उसके बाद याद दिलाते हैं कि टूटा हुआ धनुष क्रोध से जुड़ नहीं जायेगा। खड़े खड़े मुनि के पैर दुखने लगे होंगे, वे बैठ जायें। बात ऊपर से सेवा और चिन्ता की है, पर सुननेवाले के लिये उसमें उनके क्रोध का उपहास भी है। धनुष जुड़ने का काम रोष से नहीं बन सकता, इतना कहना भी यहाँ तकरार को रोक नहीं पा रहा।
लक्ष्मण उपाय भी बताते हैं। धनुष बहुत प्रिय हो तो किसी बड़े गुणी को बुलाकर जुड़वा लिया जाय। टीका यहाँ गुणी का आशय कारीगर बताती है। विशेष महत्त्व वाले शिवधनुष का विवाद फिर मरम्मत की बात तक लाया गया है। यह उसी आरम्भिक चुटकी का नया रूप है जिसमें धनुष की ममता पूछी गयी थी। मुनि के लिये प्रिय वस्तु और उससे जुड़ा अपराध सामने है; लक्ष्मण उसे जोड़ने का व्यावहारिक प्रस्ताव देकर व्यंग्य और तीखा कर देते हैं।
जौं अति प्रिय तौ करिअ उपाई। जोरिअ कोउ बड़ गुनी बोलाई॥
चौपाई ९
बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं । मष्ट करहु अनुचित भल नाहीं॥
जनक लक्ष्मण को बोलते देखकर डरते हैं। वे उन्हें चुप रहने को कहते हैं, अनुचित बोलना अच्छा नहीं है। अब रोकनेवाली आवाज़ राजा की है। पहले सभी लोग अनुचित कह चुके थे और राम संकेत कर चुके थे। फिर भी लौटती हुई बात यहाँ तक पहुँची है कि जनक को फिर कहना पड़ता है। उनकी आशंका को तुलसी नगर के स्त्री पुरुषों की दशा के साथ रखते हैं। वे थर थर काँप रहे हैं और छोटे कुमार में बहुत भारी खोट बताते हैं।
थर थर काँपहिं पुर नर नारी । छोट कुमार खोट बड़ भारी॥
चौपाई १०
भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी । रिस तन जरइ होइ बल हानी॥
लक्ष्मण की निर्भय वाणी का असर परशुराम के शरीर पर भी हो रहा है। सुनते सुनते उनका तन क्रोध से जल रहा है और बल घट रहा है। जिस बल का वे लगातार परिचय दे रहे थे, उसी की हानि क्रोध के भीतर होने लगती है। इस दृश्य में भयभीत नागरिक और क्रोध से पीड़ित मुनि दोनों दिखाई देते हैं। हम केवल अगले चतुर उत्तर की प्रतीक्षा करें तो ये काँपते हुए लोग और जलता हुआ तन हमारी दृष्टि से छूट जायेंगे।
परशुराम राम पर एहसान जताकर कहते हैं कि उनके छोटे भाई होने के कारण ही वे लक्ष्मण को बचा रहे हैं। फिर सुन्दर शरीर और मैले मन का आरोप दोहराते हैं। इस बार उपमा सोने के ऐसे घड़े की है जिसमें विष का रस भरा हो। यह मुनि की क्रुद्ध दृष्टि से दिया हुआ चित्र है, जिसमें बाहर की सुन्दरता और भीतर की बुराई का आरोप जोड़ा गया है। इसे सुनकर लक्ष्मण फिर हँस पड़ते हैं।
सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम।
दोहा २७८
गुर समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम॥ २७८॥
इस बार राम अपनी आँखें तरेरकर छोटे भाई की ओर देखते हैं। लक्ष्मण सकुचा जाते हैं, विपरीत वाणी छोड़ देते हैं और गुरु के समीप चले जाते हैं। अनेक चेतावनियों के बीच लौटती रही हँसी यहाँ राम की दृष्टि से रुकती है। अन्तिम क्रिया में केवल बोलना बन्द होना नहीं है, स्थान का बदलना भी है। जो बालक मुनि के सामने उत्तर पर उत्तर दे रहे थे, वे अब विश्वामित्र के पास हैं। यह प्रसंग उसी संयम और गुरु की निकटता पर ठहरता है।
लक्ष्मण क्रोध को पाप की जड़ कहते हुए बैठने और कारीगर बुलाकर धनुष जुड़वाने की चुटकी लेते हैं। जनक रोकते हैं, नागरिक काँपते हैं और परशुराम का बल क्रोध से घटता है। मुनि का अगला आक्षेप सुनकर लक्ष्मण फिर हँसते हैं, पर राम की कड़ी दृष्टि से सकुचाकर विपरीत वचन छोड़ गुरु के पास चले जाते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस संवाद में हम बार बार एक ही बात को दो तरह से सुनते हैं। धीरता का सम्बोधन लक्ष्मण के मुँह में व्यंग्य बनता है और राम के मुँह में कृपा की विनती का आधार। सेवक होने की बात राम आरम्भ में कहते हैं और लक्ष्मण भी आगे कहते हैं, पर सुननेवाले पर दोनों का प्रभाव समान नहीं होता। शब्द का अर्थ उसके साथ आये स्वर, मुसकान और अगले वाक्य से जुड़ा हुआ है। इसीलिये कोमल वाणी भी सामनेवाले के क्रोध को बढ़ा सकती है।
विश्वामित्र इस कठिनाई को दो ओर से सँभालते हैं। वे परशुराम से बालक का अपराध क्षमा करने को कहते हैं और भीतर ही भीतर उनके गलत अनुमान को पहचानते हैं। गुरु की हँसी मन के भीतर रहती है। लक्ष्मण की हँसी मुनि के सामने बार बार लौटती है और हर बार तकरार में नया ताप जोड़ती है। दोनों हँसियों का स्थान अलग है, उनका परिणाम भी अलग दिखाई देता है। यह अन्तर हमें गुरु के बोले हुए छोटे से क्षमावचन का भार महसूस कराता है।
सभा की आवाज़ भी साथ रखनी होगी। लक्ष्मण के उत्तर याद रह जाते हैं, पर उनके बीच लोगों का हाय हाय करना, अनुचित कहना और जनक का रोकना उसी कथा का हिस्सा है। निर्भयता के साथ वाणी का परिणाम भी पूछा जा रहा है। अन्त में राम छोटे भाई को समझाने के लिये कोई नया वाद नहीं खड़ा करते। एक कड़ी दृष्टि पड़ती है और लक्ष्मण सकुचाकर रुक जाते हैं। इतने उत्तरों के बाद यह रुक सकना भी उनके सम्बन्ध का परिचय देता है।
धनुष की चर्चा से उठी हुई यह तकरार गुरु के समीप पहुँचते लक्ष्मण पर विराम लेती है। पीछे शब्दों का तीखापन, फरसे का भय और काँपती हुई सभा रह जाते हैं। राम की विनय ने कुछ ठंडक पहुँचायी थी; उनकी दृष्टि ने अब छोटे भाई की विपरीत वाणी रोक दी है।
हँसी इस प्रसंग की स्मृति में रहेगी, और उसके पास ही वह क्षण भी रहेगा जब लक्ष्मण सकुचाये। तुलसी दोनों को जगह देते हैं। सामने की चुनौती का उत्तर देने में जो तत्परता थी, राम का संकेत पाकर रुकने में वही सम्बन्ध की मर्यादा दिखाई देती है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २७१ से २७८, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।