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स्वयंवर, और नारद के दो शाप

रामचरितमानस · बालकाण्ड · स्वयंवर, और नारद के दो शाप

स्वयंवर, और नारद के दो शाप

एक ऋषि सुन्दरता माँगते हैं और उन्हें हित मिलता है, सभा भर में केवल एक जोड़ी आँखें सच देखती हैं, और जो हँसी दो गणों ने शुरू की थी वह जल में दिखे एक मुख पर आकर बुझ जाती है।

इस प्रसंग में जो होता है वह पहले हँसाता है और फिर हँसने नहीं देता। एक ऋषि, जिनका नाम तीनों लोक आदर से लेते हैं, एक स्वयंवर की सभा में जाकर बैठते हैं और अपने रूप पर मुग्ध हैं। उसी पंक्ति में दो और लोग बैठे हैं जो सारा भेद जानते हैं और चुपचाप मज़ा ले रहे हैं। बीच में एक कन्या जयमाला लिये घूमती है और जिस ओर ऋषि फूले बैठे हैं, उस ओर भूलकर भी नहीं देखती। यहाँ तक पढ़ते हुए होंठ अपने आप खुल जाते हैं। फिर एक पंक्ति आती है जिसमें दोनों हँसनेवाले डर के मारे भाग खड़े होते हैं, और उसके बाद इस पन्ने पर कोई नहीं हँसता, पढ़नेवाला भी नहीं।

तुलसीदास ने यह मोड़ ठीक वहाँ रखा है जहाँ यह सबसे अधिक चुभता है: पहले हँसी, फिर दर्पण देखने का ताना, फिर जल में अपना मुख, और फिर शाप। और शाप एक नहीं, दो हैं। पहला दोनों गणों को मिलता है। दूसरा उन्हें मिलता है जिन्होंने यह सारा खेल रचा था, और वे उसे हर्ष के साथ सिर पर धर लेते हैं। सात दोहों की यह छोटी कथा बालकाण्ड के उस हिस्से में बैठी है जहाँ कथा और सिद्धान्त एक दूसरे में इतने घुले हुए हैं कि अलग नहीं किये जा सकते। जो घटना यहाँ हँसी की तरह शुरू होती है, वही आगे चलकर पूरे ग्रन्थ की कथा का नक़्शा बन जाती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • नारद देवर्षि, जिनके मन में इस समय एक कन्या बसी है और अपने रूप का गर्व। इस प्रसंग में वे न मुनि की तरह बोलते हैं, न मुनि की तरह चुप रहते हैं।
  • श्रीहरि कौतुकी और कृपालु, दोनों एक साथ। इस पन्ने पर वे जो भी करते हैं, तुलसी हर बार उसका नाम कृपा ही रखते हैं।
  • राजकन्या स्वयंवर की वह कन्या जिसे पाने के लिये यह सारी दौड़ है। इस पूरे प्रसंग में उनका नाम एक बार भी नहीं आता, केवल कुअँरि, राजकुमारी और नृपकन्या कहकर काम चलाया गया है।
  • शिवजी के दो गण ब्राह्मण का वेष धरे दो दर्शक, जो सब भेद जानते हैं और जानकर चुप नहीं रह पाते। इनके नाम भी यहाँ नहीं आते, और आगे जो होते हैं उसका नाम भी नहीं आता।
  • लक्ष्मीजी जो बीच रास्ते में हरि के साथ दिखती हैं, और माया के हटते ही वहाँ नहीं रहतीं।

एक माँग, जिसमें उत्तर पहले से रखा हुआ था

प्रसंग का आरम्भ किसी घटना से नहीं, एक मन ही मन चलती हुई बहस से होता है। मुनि के सामने एक ही काम है, स्वयंवर जीतना, और उसके लिये उन्हें अपने चेहरे पर भरोसा नहीं। तो क्या किया जाये। एक उपाय सूझता है, और उसी साँस में उस उपाय पर आपत्ति भी सूझती है कि इतनी दूर जाने में देर बहुत हो जायगी। फिर देर का डर हार जाता है, क्योंकि जिसके पास जाना है वह केवल समर्थ नहीं है, हितू भी है। तुलसी इस पूरी उधेड़बुन को दो पंक्तियों में निपटा देते हैं।

हरि सन मागौं सुंदरताई । होइहि जात गहरु अति भाई॥
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ । एहि अवसर सहाय सोइ होऊ॥

चौपाई १

इन दो पंक्तियों में जो शब्द सबसे अधिक भार उठाता है वह है हित। मुनि स्वयं कह रहे हैं कि हरि के समान उनका हितू कोई नहीं। यह वाक्य सच है, और मुनि उसे जिस अर्थ में कह रहे हैं उससे कहीं अधिक सच है। जो माँगने जा रहे हैं वह है सुंदरताई, और जिसके पास जा रहे हैं उसे वे अपना सबसे बड़ा हितैषी बता चुके हैं। आगे का सारा प्रसंग इन्हीं दो शब्दों के बीच का फ़ासला है। जो माँगा गया वह सुन्दरता थी। जो दिया गया वह हित था। और दोनों एक चीज़ नहीं निकलीं।

बहुत प्रकार से विनती होती है और लीलामय कृपालु प्रभु वहीं प्रकट हो जाते हैं। मुनि के नेत्र शीतल हो जाते हैं और हृदय हर्ष से भर जाता है कि अब काम बन ही जायगा। फिर वे अत्यन्त आर्त होकर सारी कथा कह सुनाते हैं और अपनी माँग रखते हैं कि प्रभु अपना रूप मुझे दे दीजिये, दूसरी किसी भाँति मैं उसे पा नहीं सकता। अपनी माया का यह विशाल बल देखकर दीनदयालु हृदय में हँसते हैं, और तब वह उत्तर आता है जिसमें आगे की सारी कथा तह करके रखी हुई है।

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार।
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार॥ १३२॥

दोहा १३२

इस उत्तर को ध्यान से पढ़िये। इसमें हाँ नहीं है और ना भी नहीं है। मुनि ने रूप माँगा था, उत्तर में रूप का नाम तक नहीं आता। उत्तर जिस शब्द पर खड़ा है वह वही है जो मुनि अभी अपने मुँह से कह चुके हैं: हित। जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, और उसके सिवा कुछ नहीं। फिर एक पंक्ति और जुड़ती है, कि हमारा वचन असत्य नहीं होता। यह वाक्य यहाँ देने की कोई ज़रूरत नहीं थी, पर तुलसी इसे यहाँ रखते हैं, क्योंकि इसी प्रसंग के अन्त में एक और वचन निकलेगा, वह भी असत्य नहीं होने दिया जायगा, और वह वचन इन्हीं के विरुद्ध होगा।

नारद सुन्दरता माँगने का निश्चय करते हैं और हरि को अपना सबसे बड़ा हितैषी कहते हैं। हरि प्रकट होकर वचन देते हैं कि जिससे उनका परम हित हो वही किया जायगा, और अपना वचन कभी मिथ्या न होने की बात जोड़ देते हैं।

वैद्य कुपथ्य नहीं देता

अब वह उपमा आती है जिसने इस चौपाई को घर घर पहुँचा दिया। बात करुणा की है, पर करुणा का बखान नहीं है। एक रोगी है, रोग से व्याकुल है, और व्याकुलता में वही चीज़ माँग रहा है जो उसे और गिरा देगी। वैद्य उसे वह चीज़ नहीं देता। यह मना करना निर्दयता नहीं है, यही चिकित्सा का ढंग है। तुलसी इस पूरे शास्त्र को एक अर्धाली में बाँध देते हैं और फिर अगली ही अर्धाली में उसे मुनि पर लागू कर देते हैं।

कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी॥
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ॥

चौपाई २

दो बातें यहाँ एक साथ होती हैं। पहली, प्रभु यह छिपाते नहीं कि वे मुनि की माँग पूरी नहीं कर रहे। वे साफ़ कह देते हैं कि आपका हित मैंने इस प्रकार ठान लिया है। दूसरी, कहते ही अन्तर्धान हो जाते हैं। कोई सफ़ाई नहीं, कोई समझाना नहीं, कोई तसल्ली नहीं। जिसे समझना था वह अभी समझने की हालत में नहीं है, और यह बात कहनेवाले को पता है। इसीलिये आगे की पंक्ति में तुलसी माया को दोष देते हैं, मुनि को नहीं।

पोद्दार जी की टीका यहाँ एक बारीक बात खोलती है। मूल में शब्द है निगूढ़ा, और टीका उसे अगूढ़ यानी स्पष्ट वाणी के अर्थ में लेती है। अर्थात जो कहा गया वह पहेली थी ही नहीं। वैद्य और रोगी की उपमा से साफ़ कोई बात हो नहीं सकती। फिर भी मुनि उसे नहीं पकड़ पाते, क्योंकि जो चीज़ सुनने में बाधा बनी हुई है वह कान में नहीं, मन में है। इसके तुरन्त बाद वे सीधे उसी भूमि की ओर चल देते हैं जहाँ स्वयंवर सजाया गया है।

प्रभु उत्तर देते हैं कि रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता, और इतना कहकर अन्तर्धान हो जाते हैं। माया के वश मुनि इस साफ़ बात को भी नहीं समझ पाते और स्वयंवर की भूमि की ओर चल देते हैं।

सभा, और वह मुख जो किसी ने नहीं देखा

स्वयंवर की भूमि पर राजा लोग सज धजकर अपने अपने समाज के साथ आसनों पर बैठे हैं। इस भीड़ में मुनि का मन एक ही बात दुहरा रहा है, और तुलसी उस बात को बाहर से नहीं बताते, भीतर से बोलते हैं: मेरा रूप बहुत सुन्दर है, मुझे छोड़कर कन्या भूलकर भी किसी और को नहीं वरेगी। यह वाक्य कथा में मुनि का अपना है, कवि का नहीं, और इसी से उसकी चोट दुगुनी हो जाती है। जो सबसे अधिक निश्चिन्त है, वही सबसे कम जानता है।

और अब वह अर्धाली, जिसमें इस प्रसंग का सबसे कड़ा शब्द छिपा है। मुनि को जो रूप मिला वह इतना कुरूप था कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। पर तुलसी उस पंक्ति को कारण बताकर शुरू करते हैं, और कारण का नाम फिर वही है।

मुनि हित कारन कृपानिधाना । दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना॥
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा । नारद जानि सबहिं सिर नावा॥

चौपाई ३

मुनि हित कारन, और करनेवाले का नाम कृपानिधान। इस पन्ने पर तीसरी बार वही शब्द लौटा है। पर पंक्ति यहीं नहीं रुकती। दूसरी अर्धाली बताती है कि यह चरित किसी ने नहीं पहचाना, और सबने उन्हें नारद ही जानकर सिर नवाया। सोचिये कि इससे अधिक अकेला कोई कैसे हो सकता है। आदर ज्यों का त्यों मिल रहा है, प्रणाम ज्यों के त्यों हो रहे हैं, और जिस मुख को सब प्रणाम कर रहे हैं वह मुख वह नहीं है जो वे समझ रहे हैं। अपमान अभी शुरू भी नहीं हुआ, और चारों ओर से पूरा हो चुका है।

राजा अपने अपने आसनों पर बैठे हैं और नारद अपने रूप के भरोसे निश्चिन्त हैं। कृपानिधान उन्हें उनके ही हित के लिये अवर्णनीय कुरूप बना देते हैं, और यह चरित सभा में कोई नहीं पहचानता, सब उन्हें नारद जानकर प्रणाम करते हैं।

दो गण, जो सब जानते थे

अब तुलसी एक दोहे में दो नये पात्र खड़े कर देते हैं, और उनका परिचय इतना कसा हुआ है कि उसमें से एक शब्द भी निकाला नहीं जा सकता। वे कौन हैं, वे क्या जानते हैं, वे किस भेस में हैं और उनका स्वभाव कैसा है, चारों बातें दो पंक्तियों में आ जाती हैं।

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ।
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ॥ १३३॥

दोहा १३३

अन्तिम शब्दों पर ठहरिये। इन गणों को तुलसी परम कौतुकी कहते हैं। यही शब्द इस प्रसंग में पहले भी आ चुका है, जब प्रभु प्रकट हुए थे और उन्हें कौतुकी कृपाला कहा गया था। दोनों जगह लीला है, दोनों जगह खेल है, और दोनों खेलों में मुनि का मुख एक ही है। अन्तर केवल एक शब्द का है, जो गणों के साथ नहीं जुड़ा: कृपाला। जिस खेल के पीछे कृपा है वह हित करता है, और जिसके पीछे केवल मौज है वह शाप तक ले जाता है। यह अन्तर आगे दोनों के फल में दिखेगा।

गणों से रहा नहीं जाता। वे उसी पंक्ति में आ बैठते हैं जहाँ मुनि बैठे हैं और सुना सुनाकर व्यंग्य करने लगते हैं।

करहिं कूटि नारदहि सुनाई । नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥
रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥

चौपाई ४

यह ताना ठीक उसी शब्द को लौटाता है जो मुनि ने अपने मन में कहा था। उन्होंने हरि से सुंदरताई माँगी थी, और गण कह रहे हैं कि हरि ने अच्छी सुन्दरता दी है। पूरा चुटकुला अगली अर्धाली में खुलता है, और टीका उसे साफ़ कर देती है: हरि का एक अर्थ वानर भी है। तो वाक्य दो तरह से पढ़ा जा सकता है, कि राजकुमारी इन्हें हरि जानकर वरेगी, और कि वह इन्हें बन्दर जानकर वरेगी। सभा में बैठा हुआ आदमी पहला अर्थ सुनता है और उसका मुख दूसरा अर्थ है। इससे बारीक ताना इस काण्ड में दूसरा नहीं है।

और मुनि इसे सुनते भी हैं। तुलसी यह नहीं कहते कि गण चुपके से बोल रहे थे। वे लिखते हैं कि मुनि यह अटपटी वाणी सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम में सनी हुई थी इसलिये समझ में नहीं आती थी। यह दूसरी बार है। पहली बार वैद्य और रोगीवाली साफ़ बात नहीं पकड़ी गयी, अब यह खुला ताना नहीं पकड़ा जा रहा। दोनों बार कमी सुननेवाले के कानों में नहीं थी।

सभा में शिवजी के दो गण ब्राह्मण के वेष में बैठे हैं। वे सब भेद जानते हैं और सुना सुनाकर हरि की दी हुई सुन्दरता पर व्यंग्य करते हैं, जिसमें हरि का दूसरा अर्थ वानर छिपा है। मुनि सुनते हैं पर भ्रम के कारण समझ नहीं पाते।

जिसने देखा, केवल उसी ने

इतनी बड़ी सभा में एक व्यक्ति ऐसा है जिसकी आँखों पर परदा नहीं है, और तुलसी ने उसे चुनने में जो निर्दयता बरती है वह पढ़ते समय साँस रोक देती है। जिस रूप को राजा नहीं देख पाये, दरबारी नहीं देख पाये, ताना मारते हुए दो गण भी जिसे केवल जानते थे, उसे देखा उसी ने जिसके लिये यह सारा आयोजन था।

काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा । सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥
मर्कट बदन भयंकर देही । देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥

चौपाई ५

पूरी पंक्ति का वज़न दूसरी अर्धाली में है। बन्दर का सा मुख और भयंकर देह देखते ही कन्या के हृदय में जो उपजा वह हँसी नहीं थी, घृणा भी नहीं थी। क्रोध था। सोचिये कि क्रोध क्यों। स्वयंवर की भूमि में एक कन्या के लिये यह मुख केवल अजीब नहीं है, अपमान है। जिस सभा में उसे वर चुनना है, उसी में यह वेष बनाकर कोई आ बैठा है। तुलसी उसकी प्रतिक्रिया को कोमल नहीं बनाते, और इसी से वह जीवित लगती है।

इसके बाद का दोहा उसी कन्या को चलता हुआ दिखाता है, सखियों के साथ, ऐसे जैसे कोई राजहंसिनी चल रही हो, और कमल जैसे हाथों में जयमाला लिये सब राजाओं को देखती हुई घूमती है। उपमा में चुनाव का भाव भरा हुआ है, क्योंकि हंस के बारे में कही जानेवाली बात ही यही है कि वह चुनकर लेता है। और अगली चौपाई बताती है कि उसने क्या नहीं चुना: जिस ओर नारद फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं देखा। मुनि बार बार उचकते हैं, छटपटाते हैं, और उनकी यह दशा देखकर गण मुसकराते हैं। पूरे प्रसंग में हँसी यहीं सबसे ऊँची है, और यहीं से उतरनी शुरू होती है।

सारी सभा में केवल राजकन्या को नारद का असली रूप दिखता है, बन्दर जैसा मुख और भयंकर देह, और उसके हृदय में क्रोध उपजता है। जयमाला लिये वह सब राजाओं को देखती है पर नारद की ओर एक बार भी नहीं ताकती।

जयमाला, और दर्पण का ताना

अब वह क्षण आता है जिसके लिये इतनी तैयारी हुई थी, और वह एक ही अर्धाली में निपट जाता है। जो सबसे बड़ी घटना होनी चाहिये थी, वह सबसे कम जगह लेती है। इसका कारण यह है कि तुलसी की दिलचस्पी वरमाला में नहीं, वरमाला के बाद वाले मुख में है।

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला । कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा । नृपसमाज सब भयउ निरासा॥

चौपाई ६

यहाँ फिर वही शब्द है: कृपाला। जिस क्षण में मुनि की सारी आशा टूटती है, ठीक उसी क्षण में तुलसी करनेवाले का नाम कृपालु रखते हैं। इस पन्ने पर यह चौथी बार है। कौतुकी कृपाला, कृपानिधान, कृपाला, और आगे कृपानिधि। जहाँ जहाँ कुछ ऐसा होता है जो देखने में निर्मम है, वहाँ वहाँ तुलसी विशेषण बदलते नहीं। पूरे प्रसंग का सिद्धान्त इसी दुहराव में है, और वह कहीं अलग से समझाया नहीं गया।

राजमण्डली निराश हो जाती है, पर मुनि की दशा और है। तुलसी उनके लिये एक उपमा रखते हैं जो बहुत घरेलू है और इसीलिये बहुत सटीक: जैसे गाँठ से छूटकर मणि गिर गयी हो। मणि हाथ में नहीं थी, गाँठ में बँधी थी, यानी सम्हाली हुई थी, और सम्हाली हुई चीज़ का यों गिर जाना और भी अखरता है। इसी हाल में दोनों गण पास आते हैं और वह वाक्य कहते हैं जिसके बाद कुछ भी पहले जैसा नहीं रहता।

तब हर गन बोले मुसुकाई । निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥

चौपाई ७

प्रभु स्वयं राजा का शरीर धरकर आते हैं, कन्या हर्ष से उन्हीं के गले में जयमाला डाल देती है और वे दुलहिन को ले जाते हैं। सारी राजमण्डली निराश हो जाती है और मोह में डूबे मुनि से गण कहते हैं कि जाकर दर्पण में अपना मुख देख लीजिये।

जहाँ हँसी बन्द हो जाती है

अब उस पंक्ति पर आइये जिसमें यह पूरा प्रसंग पलट जाता है, और ध्यान दीजिये कि तुलसी ने पलटी कहाँ रखी है। सीधा रास्ता यह होता कि मुनि अपना मुख देखते, क्रोध करते, शाप देते, और तब गण डरते। तुलसी डर को शाप से पहले रख देते हैं।

अस कहि दोउ भागे भयँ भारी । बदन दीख मुनि बारि निहारी॥
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा । तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥

चौपाई ८

ऐसा कहकर दोनों भागे, और भागे भारी भय से। अभी मुनि ने जल में झाँका तक नहीं है। जो अब तक खेल था, वह खेलनेवालों के लिये उसी क्षण खेल नहीं रह गया जिस क्षण उन्होंने अपनी आख़िरी चोट पूरी की। हँसी सबसे पहले हँसनेवालों के मुख से जाती है। इसके बाद मुनि जल में झाँकते हैं, अपना वेष देखते हैं, और क्रोध बढ़ता ही चला जाता है। तुलसी शाप को भी एक ही विशेषण देते हैं, अति गाढ़, यानी बहुत कठोर।

होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥ १३५॥

दोहा १३५

इस दोहे की अन्तिम पंक्ति ही सबसे कड़वी है। पहली तीन बातें दण्ड हैं: जाकर राक्षस हो जाओ, कपटी हो, पापी हो। अन्तिम बात दण्ड नहीं, ताना है, कि अब फिर किसी मुनि की हँसी करना। जिस शस्त्र से गणों ने वार किया था, ठीक वही शस्त्र लौटकर उन्हीं पर चलता है, और यही इस शाप को इतना मनुष्य जैसा बना देता है। यह किसी शान्त ऋषि का दण्डविधान नहीं है, यह अपमानित आदमी का पलटवार है, और तुलसी उसे सजाकर नहीं दिखाते।

एक बात यहाँ साफ़ कह देनी चाहिये। इस प्रसंग में यह कहीं नहीं बताया जाता कि वे दोनों गण आगे चलकर कौन हुए। न उनके नाम आते हैं, न उस कुल का नाम आता है जिसमें वे जन्मे, न उस नगरी का। शाप की शब्दावली बस इतनी है कि जाकर निशाचर हो जाओ। पन्ना यहीं चुप हो जाता है, और यह चुप्पी बाद में भरी जाती है, इस प्रसंग में नहीं।

गण दर्पणवाला ताना मारकर भय से भाग जाते हैं। मुनि जल में अपना वेष देखते हैं, उनका क्रोध बहुत बढ़ जाता है और वे दोनों को अत्यन्त कठोर शाप देते हैं कि जाकर राक्षस हो जाओ।

जल में वही मुख, और वही क्रोध

शाप के बाद एक छोटी सी घटना होती है जिसे बहुत से पाठक पार कर जाते हैं, और वही इस प्रसंग की सबसे सच्ची पंक्ति है। मुनि दुबारा जल में देखते हैं।

पुनि जल दीख रूप निज पावा । तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥
फरकत अधर कोप मन माहीं । सपदि चले कमलापति पाहीं॥

चौपाई ९

रूप लौट आया, और सन्तोष नहीं आया। इतनी साफ़ बात इस पूरे पन्ने पर दूसरी नहीं है। जिसे वे अपनी पीड़ा का कारण समझ रहे थे, वह हट चुका है, और पीड़ा वहीं की वहीं है। इससे पता चलता है कि घाव मुख पर लगा ही नहीं था। ओंठ फड़क रहे हैं, मन में क्रोध भरा है, और वे तुरन्त कमलापति की ओर चल पड़ते हैं। जिस हरि को उन्होंने अपना सबसे बड़ा हितू कहा था, अब उसी की ओर चल रहे हैं, और मन में शाप या प्राण, दो में से एक बात है।

रास्ते में ही भेंट हो जाती है। प्रभु सामने से मिलते हैं, प्रतीक्षा नहीं कराते, और साथ में लक्ष्मीजी हैं तथा वही राजकुमारी भी। यह दृश्य क्रूर लग सकता है, पर आगे पढ़ने पर यही दृश्य सबसे बड़ी दया निकलता है, क्योंकि जो दिख रहा है उसे थोड़ी देर बाद हटा लिया जाना है। प्रभु मीठी वाणी में पूछते हैं कि मुनि व्याकुल की तरह कहाँ चले। यह प्रश्न ही आग में घी बन जाता है। सुनते ही अत्यन्त क्रोध उपजता है, और तुलसी कारण साथ ही लिख देते हैं कि माया के वश मन में चेत नहीं रहा।

जल में दुबारा देखने पर अपना रूप लौट आता है, फिर भी सन्तोष नहीं होता। क्रोध में भरे मुनि कमलापति की ओर चलते हैं, बीच रास्ते में हरि लक्ष्मीजी और उसी राजकुमारी के साथ मिल जाते हैं, और उनका मीठा प्रश्न सुनते ही मुनि का क्रोध फूट पड़ता है।

अभियोग, जो पढ़ने पर स्तुति निकलता है

अब जो कहा जाता है वह इस प्रसंग का सबसे लम्बा भाषण है, और उसका ढाँचा किसी मुक़दमे जैसा है। पहले आरोप, फिर उदाहरण, फिर हिसाब। आरोप यह है कि आप दूसरों की सम्पदा देख नहीं सकते, आपमें ईर्ष्या और कपट भरा है। उदाहरण समुद्रमन्थन का है, कि मथते समय आपने शिवजी को बावला कर दिया और देवताओं को प्रेरित करके उनसे विष पिलवा दिया। और फिर हिसाब, जो एक ही दोहे में चुका दिया जाता है।

असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥ १३६॥

दोहा १३६

यह लेखा जोखा है, और इसकी बनावट देखने लायक़ है। तीन हिस्सेदार हैं और तीनों के हिस्से गिनाये गये हैं: असुरों को मदिरा, शंकर को विष, और आपको लक्ष्मी तथा सुन्दर मणि। जिस आदमी ने अभी अभी एक कन्या खोयी है, वह दूसरे पर यह आरोप लगा रहा है कि उसने लक्ष्मी ले ली। क्रोध में कही गयी बात प्राय: अपना ही भेद खोल देती है, और तुलसी इस पर एक शब्द टीका नहीं लगाते। वे बस आगे बोलने देते हैं।

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू । बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥

चौपाई १०

अब इसे धीरे से दुबारा पढ़िये, और आरोप की तरह नहीं, वर्णन की तरह। परम स्वतन्त्र हैं, सिर पर कोई नहीं है, जो मन को भाता है वही करते हैं, भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हैं, हृदय में हर्ष और विषाद कुछ नहीं धरते। आगे की पंक्तियों में यह और बढ़ जाता है, कि शुभ और अशुभ कर्म आपको बाधा नहीं देते, और आज तक किसी ने आपको साध नहीं पाया। ये सब वाक्य शास्त्र में ईश्वर के लक्षण हैं। क्रोध में भरा हुआ आदमी, उन्हें गाली की तरह बोल रहा है और असल में एक एक कर उनका परिचय गिना रहा है। यह इस प्रसंग की सबसे ऊँची विडम्बना है, और यह पूरी की पूरी मुनि के अपने मुँह से आती है।

नारद हरि पर ईर्ष्या और कपट का आरोप लगाते हैं, समुद्रमन्थन का हिसाब गिनाते हैं और उन्हें परम स्वतन्त्र, कर्मों से अबाधित तथा हर्षविषाद से परे कहते हैं। जो गालियों की तरह कहा जा रहा है, वह पढ़ने पर ईश्वर का लक्षण निकलता है।

वह शाप, जो आगे की सारी कथा है

भाषण के अन्त में मुनि एक मुहावरा बोलते हैं जिसे टीका खोलकर बताती है। वे कहते हैं कि इस बार अच्छे घर बायन दिया है, अर्थात इस बार छेड़खानी ऐसे आदमी से की है जो छोड़ेगा नहीं। इसके बाद शाप आता है, और उसका पहला हिस्सा बहुत सीधा है: जिस देह को धरकर मुझे ठगा, वही देह धारण कीजिये। पर तुलसी इसे यहीं नहीं छोड़ते। अगली चौपाई में शाप का दूसरा हिस्सा आता है, और वही इस पूरे ग्रन्थ का बीज है।

कपि आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी । करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी । नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥

चौपाई ११

दो वाक्य हैं और दोनों दण्ड हैं। पहला, मेरा मुख बन्दर का सा बनाया था, इसलिये बन्दर ही सहायता करेंगे। दूसरा, मेरा बड़ा अहित किया, इसलिये स्त्री के वियोग में दुखी होना पड़ेगा। अब इन दोनों को उलटकर देखिये। एक शाप वानरों की सहायता देता है, और दूसरा वह विरह देता है जिसके बिना यह कथा है ही नहीं। जो अभिशाप की भाषा में कहा गया, वह घटनाओं की भाषा में उस अवतार का कार्यक्रम बन गया जिसकी तैयारी में यह पूरा काण्ड लगा हुआ है।

और यही बात इस प्रसंग को हँसी की कथा से उठाकर कहीं और ले जाती है। जिस क्षण मुनि सबसे कम अपने वश में हैं, उसी क्षण उनके मुँह से वह निकल रहा है जो होना ही था। शाप देनेवाला समझ रहा है कि वह बदला ले रहा है। पढ़नेवाला देख रहा है कि वह भविष्य लिख रहा है। दोनों बातें एक ही पंक्ति में सच हैं, और तुलसी दोनों में से किसी को दबाते नहीं।

नारद शाप देते हैं कि जिस देह से ठगा उसी देह को धारण करना पड़े, बन्दर ही सहायक हों, और स्त्री के वियोग का दुख भोगना पड़े। जो बदले की तरह कहा गया, वही आगे की कथा का ढाँचा बन जाता है।

शाप सिर पर, और माया का खिंच जाना

अब वह दोहा, जिसके बाद इस प्रसंग में कुछ भी वैसा नहीं रहता जैसा दिख रहा था। ध्यान इस बात पर रखिये कि इसमें दो काम किस क्रम में होते हैं।

श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥ १३७॥

दोहा १३७

पहले शाप सिर पर धरा जाता है, और हृदय में हर्ष के साथ। फिर विनती की जाती है, और वह भी बहुत प्रकार से, यानी शाप पानेवाला शाप देनेवाले को मनाता है। और सबसे अन्त में माया की प्रबलता खींची जाती है। क्रम पलटा जा सकता था। पहले माया हटती, मुनि को होश आता, वे क्षमा माँगते, तब बात सम्हाली जाती। पर तब जो स्वीकार होता वह स्वीकार नहीं, समझौता होता। तुलसी के प्रभु शाप को तब लेते हैं जब देनेवाला अभी भ्रम में है और अपनी बात वापस लेने की स्थिति में भी नहीं है।

माया हटते ही दृश्य ख़ाली हो जाता है। वहाँ न लक्ष्मी हैं, न राजकुमारी। जिस कन्या के लिये यह सारा झगड़ा था, वह उस जगह पर थी ही नहीं। मुनि अत्यन्त भयभीत होकर चरण पकड़ लेते हैं और शरणागत का दुख हरनेवाले से रक्षा माँगते हैं। यहाँ ध्यान दीजिये कि होश आने के बाद पहला भाव लज्जा नहीं, भय है। फिर वे प्रार्थना करते हैं कि मेरा शाप मिथ्या हो जाय, और उत्तर में जो कहा जाता है वह क्षमा नहीं है। दीनदयालु कहते हैं कि यह मेरी ही इच्छा है।

इस एक वाक्य से इस प्रसंग का पहला दोहा वापस लौट आता है, जहाँ कहा गया था कि हमारा वचन असत्य नहीं होता। अब मुनि का वचन भी असत्य नहीं होने दिया जा रहा, चाहे वह वचन उन्हीं के विरुद्ध क्यों न हो। शाप मिटाया नहीं जाता, अपनाया जाता है। मुनि की अगली चिन्ता अपने शाप की नहीं रहती, अपने शब्दों की हो जाती है: मैंने आपको बहुत खोटे वचन कहे, मेरे पाप कैसे मिटेंगे।

प्रभु शाप को हर्ष के साथ सिर पर धरते हैं, फिर मुनि से बहुत विनती करते हैं, और तब माया खींच लेते हैं। माया हटते ही न लक्ष्मी रहती हैं न राजकुमारी, मुनि भयभीत होकर चरण पकड़ते हैं, और शाप मिथ्या करने की प्रार्थना पर उत्तर मिलता है कि यह मेरी ही इच्छा थी।

जिनकी हँसी उड़ायी गयी थी, उन्हीं का नाम

प्रश्न पाप मिटने का है, और उत्तर में जो औषधि दी जाती है उसकी बनावट पर ठहरना चाहिये। कहा जाता है कि जाकर शंकर के शतनाम का जप कीजिये, हृदय में तुरन्त विश्राम होगा। फिर एक वाक्य और जोड़ा जाता है, कि शिव के समान मुझे कोई प्रिय नहीं, इस विश्वास को भूलकर भी मत छोड़िये। और फिर उसका कारण।

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी । सो न पाव मुनि भगति हमारी॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई । अब न तुम्हहि माया निअराई॥

चौपाई १२

इस औषधि को उस रोग के सामने रखिये जो इस पन्ने पर लगा था। जिन दो गणों पर क्रोध उतरा, वे शिवजी के थे। जिस शाप से यह सारा उलझाव पक्का हुआ, वह उन्हीं पर गिरा। और अब जो नाम जपने को कहा जा रहा है, वह उन्हीं के स्वामी का है। चिकित्सा ठीक उसी सामग्री से बनी है जो टूटी थी। दूसरी बात यह कि यहाँ तुलसी अपने पूरे ग्रन्थ की एक बुनियाद रख देते हैं, कि शिव की कृपा के बिना हरि की भक्ति नहीं मिलती, और वे इसे किसी उपदेश खण्ड में नहीं, एक अपमानित मुनि को दी गयी सान्त्वना के भीतर रखते हैं। अन्तिम आश्वासन सबसे कोमल है, कि अब माया आपके निकट नहीं आयेगी।

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥ १३८॥

दोहा १३८

समाप्ति की ओर देखिये। प्रसंग शुरू हुआ था एक ऐसे मुनि से जो सभा में देखे जाने के लिये जा रहे थे, और समाप्त होता है एक ऐसे मुनि पर जो चलते चलते किसी और के गुण गा रहे हैं। बीच में जो कुछ हुआ, उसका कोई बदला नहीं लिया गया, कोई सफ़ाई नहीं दी गयी, कोई घटना उलटी नहीं की गयी। केवल देखनेवाला बदल गया। और अन्तिम पंक्ति में जो नाम गाया जा रहा है वह राम का है, उस कथा से एक कदम पहले जिसमें वह नाम देह धरकर आयेगा।

प्रभु उन्हें शंकर का शतनाम जपने को कहते हैं, बताते हैं कि शिव की कृपा के बिना उनकी भक्ति नहीं मिलती, और आश्वासन देते हैं कि अब माया पास नहीं आयेगी। फिर वे अन्तर्धान हो जाते हैं और नारद राम के गुण गाते हुए सत्यलोक चले जाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को एक साथ पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है, वह यह है कि यहाँ किसी का रूप नहीं बिगड़ा, किसी का मन बिगड़ा। मुख तो जल में देखते ही लौट आया था, और लौटने के बाद भी सन्तोष नहीं आया। तुलसी इस क्रम को बहुत साफ़ रखते हैं: पहले माँग, फिर गर्व, फिर हँसी, फिर क्रोध, फिर शाप, और सबसे अन्त में भय। जिस चीज़ को मुनि अपना अपमान समझते रहे, वह सभा में किसी ने देखी ही नहीं, केवल एक व्यक्ति ने देखी, और जो असली चोट थी वह किसी को नहीं दिखी क्योंकि वह भीतर लगी थी।

दूसरी बात उस शब्द की है जो इस पन्ने पर बार बार लौटता है। मुनि ने सुन्दरता माँगी और उन्हें हित मिला, और इन दोनों के बीच जो कुछ हुआ उसमें एक भी क्षण ऐसा नहीं है जो हित जैसा दिखता हो। कुरूप कर दिया गया, सभा में बैठे रह गये, कन्या ने नहीं देखा, और जिन्हें उन्होंने अपना हितू कहा था वही दूल्हा बनकर चले गये। इसके बावजूद तुलसी हर मोड़ पर करनेवाले को कृपालु ही कहते हैं। पन्ने के आख़िर में इसका फल सामने आ जाता है, क्योंकि जो वस्तु माँगी गयी थी वह मिल जाती तो आज इस कथा का कोई अस्तित्व न होता।

और एक बात जो इस प्रसंग की अपनी है। शाप दोनों दिशाओं में चला, पर लौटा एक ही ढंग से। दो गणों को दिया गया शाप उनके सिर पर पड़ा और वे भागे हुए थे, डरे हुए थे। जिसे दूसरा शाप मिला वह न भागा, न डरा, हर्ष के साथ उसे सिर पर धर लिया और फिर देनेवाले को मनाने लगा। यही अन्तर इस पूरे पन्ने का सार है, और इसे कहने के लिये तुलसीदास को एक भी उपदेश नहीं लिखना पड़ा। उन्होंने बस यह दिखाया कि एक ही वाक्य दो लोगों तक पहुँचकर दो अलग अलग चीज़ें बन जाता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १३२ से १३८, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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