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पृथ्वी की पुकार और दशरथ का पुत्रकाम यज्ञ

रामचरितमानस · बालकाण्ड · पृथ्वी की पुकार और दशरथ का पुत्रकाम यज्ञ

पृथ्वी की पुकार और दशरथ का पुत्रकाम यज्ञ

रावण के भय से बोल न सकने वाली पृथ्वी, प्रेम से प्रकट होने वाले हरि, और गुरु के पास अपना दुःख लेकर पहुँचे दशरथ।

पृथ्वी पर्वतों को सँभाल सकती है, नदियों और समुद्रों को भी। इस समय उस पर जो भार पड़ रहा है, उसके लिये तुलसीदास एक परद्रोही को ही पर्याप्त बताते हैं। दूसरों का अनिष्ट करने वाला एक प्राणी भी उसे इन सबसे अधिक भारी लगता है। वह चारों ओर धर्म को उलटा हुआ देखती है और रावण के भय से अपना दुःख कह नहीं पाती। इस प्रसंग की पहली पीड़ा यही है: जिसे सबका भार उठाना है, उसके अपने मन की बात सुनने वाला कोई नहीं मिल रहा।

धीरे धीरे इस मौन को सुनने वाले मिलते हैं। पृथ्वी गाय का रूप लेकर देवताओं और मुनियों के पास जाती है। वे उसे ब्रह्मा के पास ले जाते हैं। फिर सबके सामने यह प्रश्न आता है कि हरि को कहाँ पुकारा जाये। उसी सभा में उपस्थित शिव प्रेम का पता देते हैं। उनके वचन के बाद स्तुति उठती है और आकाश से उत्तर आता है। भय से भरे समुदाय को मनुष्य के रूप में आने का आश्वासन मिलता है।

तुलसीदास के रामचरितमानस में इसी आश्वासन के भीतर दशरथ और कौसल्या का नाम आता है। फिर कथा अवधपुरी के उस घर की ओर लौटती है, जहाँ धर्म और भक्ति तो हैं, पर राजा को पुत्र न होने का दुःख है। पृथ्वी की विपत्ति और एक पिता बनने की इच्छा रखने वाले राजा की व्यथा, दोनों इसी प्रसंग में सुनी जाती हैं। आख़िर में अग्निदेव हाथ में चरु लिये प्रकट होंगे। अभी उस आने वाले जीवन की तैयारी हो रही है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • पृथ्वी रावण के भय और परद्रोहियों के भार से व्याकुल, जो गाय का रूप लेकर सहायता माँगती हैं।
  • ब्रह्मा पृथ्वी को धीरज देते हैं, हरि की स्तुति करते हैं और देवताओं को वानररूप में सेवा की आज्ञा देते हैं।
  • शिव पार्वती को उस सभा की बात सुनाते हैं जिसमें उन्होंने प्रेम से हरि के प्रकट होने का अपना अनुभव कहा था।
  • दशरथ और कौसल्या अवधपुरी का राजपरिवार, जिसकी भक्ति और पवित्र आचरण का वर्णन होता है।
  • वसिष्ठ और शृंगी ऋषि दशरथ के गुरु आश्वासन देकर ऋषि को बुलाते हैं और पुत्रकाम यज्ञ कराते हैं।
  • अग्निदेव यज्ञ में चरु लेकर प्रकट होते हैं और राजा को उसके भाग बनाकर बाँटने की आज्ञा देते हैं।

जो भार पर्वतों से भारी है

आरम्भ में तुलसी अत्याचार का फैलाव घरों और व्यवहार में दिखाते हैं। दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये हैं। दूसरों के धन और दूसरों की स्त्रियों पर मन लगाने वाले बढ़ रहे हैं। माता, पिता और देवताओं का मान नहीं रहा। साधुओं के साथ भी संबंध उलट गया है: लोग उनसे अपनी सेवा कराते हैं। पोद्दार की टीका इस उलटाव को और स्पष्ट करती है कि साधुओं की सेवा करने की बात तो दूर रही, उन्हीं से सेवा ली जा रही है। जिन्हें आदर मिलना था, उन्हीं पर अपना अधिकार चलाया जा रहा है।

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा । जे लंपट परधन परदारा॥
मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा॥

चौपाई १

शिव भवानी से कहते हैं कि जिन प्राणियों का ऐसा आचरण है, उन सबको राक्षस समझना। यहाँ पहचान आचरण से हो रही है। पराये धन की लालसा, परायी स्त्री पर बुरी दृष्टि, बड़ों का अपमान और साधुओं से सेवा लेना, इन बातों को कहने के बाद ही वह नाम दिया गया है। इससे पृथ्वी की अगली व्याकुलता समझ में आती है। अनिष्ट केवल कहीं युद्ध में नहीं हो रहा; जिन संबंधों में जीवन को सहारा मिलना चाहिये, उन्हीं में दूसरे को दबाने की इच्छा भर गयी है। धर्म के प्रति यह अनास्था देखकर धरती अत्यन्त डर जाती है।

गिरि सरि सिंधु भार नहिं मोही । जस मोहि गरुअ एक परद्रोही॥
सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भय भीता॥

चौपाई २

पृथ्वी अपने ऊपर रखे हुए भारों को पहचानती है। पर्वत स्थिर खड़े हैं, नदियाँ बहती हैं, समुद्र विस्तृत हैं, फिर भी उनका बोझ उसे एक परद्रोही जितना भारी नहीं लगता। चौपाई में एक की गिनती पर ध्यान दीजिये। आरम्भ में दुष्टों की बढ़ती हुई संख्या थी; अब एक ही दुष्ट के अनिष्ट का वजन बताया जाता है। इससे उस बढ़ती संख्या का भय और साफ़ होता है। जिसे दूसरों को पीड़ा देने में संकोच नहीं, उसके होने से संसार का सहना कठिन हो जाता है। धरती के लिये भारी होने का यह अर्थ उसी की व्यथा से निकलता है।

वह सारे धर्मों को विपरीत देख रही है। देखने की शक्ति है, पीड़ा का ज्ञान है, पर कहने का साहस नहीं बनता। रावण का भय उसकी वाणी रोकता है। फिर वह हृदय में विचार करती है और गाय का रूप धरती है। इस रूप में वह देवताओं तथा मुनियों के समूह के पास पहुँचती है। टीका बताती है कि वे छिपे हुए थे। जिन्हें वह अपना दुःख सुनाने गयी है, वे भी इस भय से बाहर नहीं हैं। पृथ्वी रोकर अपना संताप सुनाती है। सब सुनते हैं, किन्तु किसी से उसका काम नहीं बनता।

धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी । गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी॥
निज संताप सुनाएसि रोई । काहू तें कछु काज न होई॥

चौपाई ३

परद्रोहियों और उलटे आचरणों से पृथ्वी व्याकुल है। रावण के भय से बोल नहीं पाती, फिर गाय का रूप लेकर देवताओं और मुनियों को रोकर दुःख सुनाती है। किसी से उपाय नहीं बनता।

ब्रह्मा के सामने कही गयी असमर्थता

अब यह यात्रा पृथ्वी की अकेली यात्रा नहीं रहती। देवता, मुनि और गन्धर्व मिलकर ब्रह्मा के लोक जाते हैं। गाय का शरीर धारण किये पृथ्वी भी साथ है, भय और शोक से अत्यन्त व्याकुल। पोद्दार की टीका इस लोक को सत्यलोक कहकर पहचानती है। जहाँ जाने का निर्णय हुआ है, वहाँ पूरी व्यथा साथ पहुँचती है। किसी ने पृथ्वी से यह नहीं कहा कि अपनी कठिनाई स्वयं दूर कीजिये। उपाय न कर सकने पर भी वे उसका साथ नहीं छोड़ते और सब मिलकर दूसरे आश्रय तक जाते हैं।

ब्रह्मा सब जान लेते हैं। इसके बाद उनके मन में जो विचार आता है, वह इस प्रसंग का बड़ा संयत क्षण है: इसमें मेरा कुछ वश नहीं चलेगा। उनके सामने सहायता माँगने वाला समुदाय खड़ा है, फिर भी वे अपनी सामर्थ्य से अधिक का आश्वासन नहीं देते। वे पृथ्वी से कहते हैं कि जिनकी आप दासी हैं, वही अविनाशी हमारे और आपके सहायक हैं। इस वाक्य में ब्रह्मा भी उसी सहायता के भीतर आ जाते हैं। वे पृथ्वी को जिस आश्रय की ओर भेज रहे हैं, अपना सहायक भी उसी को कहते हैं।

धरनि धरहि मन धीर कह बिरंचि हरि पद सुमिरु।
जानत जन की पीर प्रभु भंजिहि दारुन बिपति॥ १८४॥

सोरठा १८४

सोरठे में उनका परामर्श दो कामों से बना है। पहले मन में धीरज रखिये, फिर हरि के चरणों का स्मरण कीजिये। इस धीरज का कारण भी वे बताते हैं: प्रभु अपने जनों की पीड़ा जानते हैं और कठिन विपत्ति हरेंगे। पृथ्वी का दुःख उनके जानने की पहुँच में है। जिसे रावण के भय से बोलना कठिन लग रहा था, उसे अब यह भरोसा दिया जाता है कि उसकी व्यथा अनजानी नहीं रहेगी। ब्रह्मा की अपनी असमर्थता के बाद यह विश्वास और स्पष्ट सुनाई देता है।

देवताओं के सामने फिर भी एक व्यवहार का प्रश्न बचा है। वे बैठकर विचार करते हैं कि प्रभु कहाँ मिलेंगे, जहाँ जाकर उनके सामने पुकार करें। कोई वैकुण्ठपुरी जाने को कहता है, कोई क्षीरसमुद्र में उनका निवास बताता है। टीका पुकार को फ़रियाद कहती है। इस शब्द में सभा की आवश्यकता सुनाई देती है: उन्हें अपनी विपत्ति सुनानी है और उसका उत्तर पाना है। सहायता किससे मिलेगी, यह बात ब्रह्मा ने कह दी; अब सब उस सहायता तक पहुँचने का स्थान सोच रहे हैं।

ब्रह्मा अपनी असमर्थता जानकर पृथ्वी को हरि का आश्रय बताते हैं। वे धीरज और स्मरण की सीख देते हैं। देवता विचार करते हैं कि पुकार लेकर वैकुण्ठ जायें या क्षीरसमुद्र।

प्रेम से प्रकट होने का पता

जिसके हृदय में जैसी भक्ति और जैसी प्रीति होती है, प्रभु उसके लिये उसी रीति से प्रकट होते हैं। कथा इस वाक्य के साथ सभा की अलग अलग सम्मतियों को सामने रखती है। फिर शिव पार्वती से कहते हैं कि उस समाज में मैं भी उपस्थित था। अवसर पाकर उन्होंने एक बात कही थी। इस तरह हम केवल किसी और से सुनी हुई सभा का समाचार नहीं सुन रहे; वहाँ बोलने वाले स्वयं अपना वचन स्मरण करके सुना रहे हैं। उनके कहने में अपने जाने हुए का भरोसा है।

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं । कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु नाहीं॥

चौपाई ४

हरि सब जगह समान रूप से व्यापक हैं और प्रेम से प्रकट होते हैं, शिव इतना अपना अनुभव कह देते हैं। फिर देश, काल, दिशा और विदिशा सबको सामने रखकर पूछते हैं कि ऐसी कौन सी जगह है जहाँ प्रभु नहीं हैं। सभा जिस स्थान को खोज रही थी, उसके उत्तर में उपस्थिति का यह विस्तार आ जाता है। वैकुण्ठ और क्षीरसमुद्र की चर्चा के बीच प्रेम का उल्लेख आने से पुकार का आश्रय हृदय में भी मिल जाता है। किसी एक दिशा का निश्चय अभी हुआ नहीं है, फिर भी प्रार्थना करने का आधार मिल गया है।

शिव इस व्यापकता के साथ विरक्ति भी कहते हैं। वे चर और अचर सबमें हैं, फिर भी सबसे रहित हैं। पोद्दार की टीका इसका अर्थ खोलती है कि उनकी कहीं आसक्ति नहीं है। सबमें व्याप्त होने और किसी में आसक्त न होने को चौपाई साथ रखती है। इसी के बाद अग्नि की उपमा आती है। जो उपस्थित है, उसका प्रकट होना किस तरह समझें, इस प्रश्न का उत्तर उस उपमा में है। वह प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि।

अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रभु प्रगटइ जिमि आगी॥
मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना॥

चौपाई ५

टीका कहती है कि अग्नि अव्यक्त रूप से सर्वत्र व्याप्त है; जहाँ उसके लिये अरणिमन्थन आदि साधन होते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी तरह सर्वत्र व्याप्त भगवान् प्रेम से प्रकट होते हैं। उपमा में उपस्थित होने और दिखाई देने के बीच का भेद साफ़ है। शिव के पहले वाक्य में प्रेम जिस काम के लिये आया था, अग्नि का यह उदाहरण उसी काम को समझाता है। देवताओं की पुकार अब प्रेम सहित उठ सकती है। सभा में बैठे सबके मन को यह बात प्रिय लगती है। ब्रह्मा भी भली बात कहकर उसका अनुमोदन करते हैं।

इस सम्मति के बाद कोई दूसरी जगह जाने का वृत्तान्त नहीं आता। ब्रह्मा के भीतर हर्ष होता है, उनका शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों से आँसू बहते हैं। फिर वे सावधान होकर हाथ जोड़ते हैं और स्तुति करने लगते हैं। धीरबुद्धि होना और आँखों का भर आना यहाँ एक ही व्यक्ति में साथ हैं। प्रेम ने उनका ध्यान बिखेरा नहीं है। मन हर्षित है, शरीर में उसका असर दिखाई देता है, और उसी दशा में बुद्धि को सावधान रखकर वे विनती करते हैं।

सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर।
अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर॥ १८५॥

दोहा १८५

शिव कहते हैं कि सर्वत्र व्याप्त हरि प्रेम से प्रकट होते हैं। अग्नि की उपमा उस प्रकट होने को समझाती है। सब उनकी बात मानते हैं और ब्रह्मा हर्ष, पुलक तथा आँसुओं के साथ सावधान होकर स्तुति आरम्भ करते हैं।

स्तुति में अपनी चतुराई छोड़ना

स्तुति का पहला सम्बोधन देवताओं के नायक को है। फिर सेवकों को सुख देने वाले और शरण में आये हुए की रक्षा करने वाले भगवान् की जय कही जाती है। गायों तथा ब्राह्मणों का हित करने वाले, असुरों के विनाशक, समुद्र की कन्या के प्रिय स्वामी, ऐसे नामों से उन्हें पुकारा जाता है। पोद्दार की टीका समुद्र की कन्या को लक्ष्मीजी कहती है। जिन गुणों से भगवान् का परिचय दिया जा रहा है, उन्हीं में यहाँ खड़े हुए दुःखी समुदाय की आशा भी है। पृथ्वी और देवताओं का पालन करने वाले से पृथ्वी तथा देवता अपना दुःख कह रहे हैं।

जय जय सुरनायक जन सुखदायक प्रनतपाल भगवंता।
गो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता॥
पालन सुर धरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई।
जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई॥

छन्द १

पहले छन्द के अन्त में उनकी अद्भुत करनी का भेद न जानने की बात आती है। फिर भी प्रार्थना रुकती नहीं। जो स्वभाव से कृपालु और दीनदयालु हैं, वे कृपा करें। स्तुति करने वाले उनका रहस्य समझ लेने का दावा नहीं कर रहे। उनकी सहज दया का भरोसा लेकर बोल रहे हैं। इसीलिये जय के इतने सम्बोधनों के बाद निवेदन बहुत सीधा रह जाता है: वे हम पर अनुग्रह करें। पृथ्वी के रोने से आरम्भ हुई विनती अब ऐसे प्रभु के सामने है जिनका स्वभाव ही दीनों पर दया करना कहा गया है।

दूसरे छन्द में अविनाशी और सबके हृदय में रहने वाले प्रभु की जय है। वे व्यापक और परम आनन्दस्वरूप हैं, जानने की पहुँच से परे और इन्द्रियों से अतीत हैं। उनका चरित्र पवित्र है, वे माया से रहित मुकुन्द हैं। टीका मुकुन्द का अर्थ मोक्ष देने वाले करती है। फिर मुनियों का समुदाय सामने आता है। मोह से छूटे हुए और विरक्त मुनि भी उनके अत्यन्त अनुरागी हैं। वे रात दिन उनका ध्यान करते हैं और गुण गाते हैं। विरक्ति के साथ इतना अनुराग कहने से स्तुति में प्रेम का वही विषय फिर सुनाई देता है जिसे शिव ने सभा के बीच रखा था।

उन सच्चिदानन्द की जय के बाद तीसरा छन्द सृष्टि की ओर जाता है। जिन्होंने किसी दूसरे संगी या सहायक के बिना तीन प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, वे पापों का नाश करने वाले हमारी सुधि लें। इस बड़ी सामर्थ्य का स्मरण करके देवता अपनी छोटी स्थिति साफ़ कहते हैं: हम भक्ति भी नहीं जानते और पूजा भी नहीं जानते। इतने गुणों का गान करने के बीच यह स्वीकार कितना विनीत है। अपनी स्तुति को वे किसी दक्षता का प्रमाण बनाकर नहीं रखते। सहायता की आवश्यकता है और उसे कहने में अपने जानने का अभिमान छोड़ दिया गया है।

फिर वे संसार के भय को हरने वाले, मुनियों के मन को आनन्द देने वाले और विपत्तियों के समूह का नाश करने वाले की शरण लेते हैं। पोद्दार संसार के भय को जन्म और मृत्यु का भय कहकर खोलते हैं। मन, वचन और कर्म से चतुराई करने की बान छोड़कर सब देवताओं का समूह शरण में आया है। भीतर कोई दूसरी युक्ति रखकर केवल मुख से विनय नहीं की जा रही। स्तुति में तीनों का उल्लेख इस शरण को पूरा बनाता है: मन भी, वाणी भी और कर्म भी उसी ओर हैं।

चौथे छन्द में सरस्वती, वेद, शेष और सम्पूर्ण ऋषियों का नाम आता है। इनमें से कोई जिनको नहीं जानता, वे ही दीनों से प्रेम करते हैं, और वेद इस बात को पुकारकर कहते हैं। उनकी अगम्यता के साथ दीनों के लिये उनकी करुणा कही गयी है। विनती है कि वे भगवान् द्रवित हों। फिर संसार को समुद्र और प्रभु को उसके लिये मन्दराचल कहा जाता है; टीका यहाँ मथने का अर्थ स्पष्ट करती है। वे सब प्रकार से सुन्दर, गुणों के धाम और सुखों की राशि हैं। मुनि, सिद्ध और सारे देवता अत्यन्त भयभीत होकर उनके चरणकमलों में नमस्कार करते हैं।

चारों छन्दों में डर छिपाया नहीं गया है। जय के स्वर के बीच अपनी अज्ञानता कही गयी, चतुराई छोड़ी गयी, और अन्त में भयातुर होकर प्रणाम किया गया। ब्रह्मा के आँसुओं से आरम्भ हुई स्तुति में पूरे समुदाय की दशा समा जाती है। पृथ्वी की ओर से सहारा खोजने निकले देवता स्वयं भी शरणागत हैं। अब उनके वचन सुनकर उत्तर आता है।

स्तुति में शरणागतपालक, सर्वव्यापक, सृष्टिकर्ता और दीनप्रिय भगवान् की विनती है। देवता अपनी भक्ति तथा पूजा न जानने की बात कहते हैं और मन, वचन, कर्म की चतुराई छोड़कर उनकी शरण लेते हैं।

आकाश से आया मनुष्य होने का वचन

देवता और पृथ्वी भयभीत हैं, उनके वचन स्नेह से भरे हुए हैं। दोनों बातों को जानकर और सुनकर गम्भीर आकाशवाणी होती है। दोहा उसे शोक और सन्देह हरने वाली कहता है। उसकी गम्भीरता में डराने वाला स्वर नहीं है। जिन्हें अभी तक विपत्ति का अन्त दिखाई नहीं दे रहा था, उन्हें उत्तर मिल रहा है। शिव ने प्रेम से प्रकट होने की बात कही थी; यहाँ स्नेहयुक्त वचन सुने जाने के बाद यह वाणी प्रकट होती है।

जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह।
गगनगिरा गंभीर भइ हरनि सोक संदेह॥ १८६॥

दोहा १८६

मुनियों, सिद्धों और देवताओं को पहले निर्भय होने का सम्बोधन मिलता है। फिर कहा जाता है कि उनके लिये मनुष्य का रूप धारण किया जायेगा। उदार सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य अवतार होगा। जिनके सामने सृष्टि रचने की असीम सामर्थ्य का गान हुआ था, उन्हीं का उत्तर मनुष्य शरीर में आने का है। अभी सभा के सामने कोई मानव रूप नहीं आया है। वचन भविष्य का है, पर उसे सुनते ही वर्तमान का भय हलका पड़ने लगता है।

आकाशवाणी फिर इस आने के लिये तैयार घर का परिचय देती है। कश्यप और अदिति ने बहुत बड़ा तप किया था और उन्हें पहले ही वर दिया जा चुका है। वही दशरथ और कौसल्या के रूप में कोसलपुरी में प्रकट हुए हैं। टीका इस पुरी को अयोध्यापुरी कहती है। बात में पहले दिया हुआ वर और अब दिया जा रहा आश्वासन जुड़ते हैं। देवताओं की विनती का उत्तर उस घर में पूरा होगा जिसका संबंध पहले से प्रभु के वचन से है।

कस्यप अदिति महातप कीन्हा । तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा॥
ते दसरथ कौसल्या रूपा । कोसलपुरीं प्रगट नरभूपा॥

चौपाई ६

उन्हीं के घर जाकर रघुकुल में श्रेष्ठ चार भाइयों के रूप में अवतार लेने का वचन है। चार की संख्या यहीं सुनाई देती है, दशरथ के गुरु से कहे जाने से पहले। नारद के सारे वचन सत्य किये जायेंगे और अपनी पराशक्ति के साथ अवतार होगा। यहाँ नारद के वचनों का विस्तार नहीं खोला जाता। आकाशवाणी जितना कहती है, उतना ही सामने रहता है: उनके सभी वचन सत्य होंगे। पराशक्ति सहित आने का आश्वासन भी इसी एक क्रम में है।

तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई । रघुकुल तिलक सो चारिउ भाई॥
नारद बचन सत्य सब करिहउँ । परम सक्ति समेत अवतरिहउँ॥

चौपाई ७

अन्त में पृथ्वी की पुकार का सीधा उत्तर आता है। उसका सारा भार हर लिया जायेगा, देवताओं का समुदाय निर्भय हो। आरम्भ में धरती ने अपने लिये परद्रोही का भार कहा था। अब उसी धरती की सारी गरुआई हरने का वचन है। बीच की सभा, विचार और स्तुति के बाद उसकी मूल व्यथा फिर से नाम लेकर सुनी गयी है। संसार के सामने कही गयी घोषणा में उस पहली रोती हुई गाय की पीड़ा विस्मृत नहीं हुई।

आकाश में भगवान् की वाणी कानों से सुनकर देवता तुरन्त लौटते हैं और उनका हृदय शीतल हो जाता है। इसके बाद ब्रह्मा पृथ्वी को समझाते हैं। वह भी निर्भय होती है और उसके जी में भरोसा आता है। तुलसी उसके ढाढ़स को अलग से कहते हैं। समुदाय की प्रसन्नता बताने के बाद भी पृथ्वी की दशा पर लौटना आवश्यक है, क्योंकि इस सहायता की खोज उसी की अकुलाहट से चली थी। अभी भार हटा नहीं है; उसे हरने वाले का वचन मिल गया है और उस वचन ने भय की दशा बदल दी है।

आकाशवाणी सूर्यवंश में अंशों और पराशक्ति सहित चार भाइयों के रूप में आने का वचन देती है। कश्यप तथा अदिति अब दशरथ और कौसल्या हैं। नारद के वचन सत्य होंगे और पृथ्वी का भार हरेगा। देवताओं और पृथ्वी को ढाढ़स मिलता है।

वनों में प्रतीक्षा करते हुए देवता

आश्वासन के बाद देवताओं के लिये काम भी बताया जाता है। ब्रह्मा उन्हें सिखाते हैं कि वानरों का शरीर धारण करके पृथ्वी पर जायें और हरि के चरणों की सेवा करें। इतनी सीख देकर वे अपने लोक चले जाते हैं। देवताओं के सामने अब केवल विपत्ति दूर होने की प्रतीक्षा नहीं है। जिस अवतार का वचन सुना है, उसकी सेवा में अपना शरीर और बल देने का अवसर भी है।

निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ।
बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ॥ १८७॥

दोहा १८७

सब देवता अपने अपने धाम जाते हैं। पृथ्वी सहित सबके मन को विश्राम मिलता है। ब्रह्मा की आज्ञा से वे प्रसन्न हैं और उसके अनुसार करने में देर नहीं लगाते। पृथ्वी पर वानरदेह धारण करते हैं। इस उतरने को कथा बिना लम्बे विस्तार के कहती है, पर उनके बल और स्वभाव को स्पष्ट करती है। उनमें अतुलित बल और प्रताप है। वे सब वीर हैं और धीर बुद्धि रखते हैं।

बनचर देह धरी छिति माहीं । अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं॥
गिरि तरु नख आयुध सब बीरा । हरि मारग चितवहिं मतिधीरा॥

चौपाई ८

उनके शस्त्रों के नाम भी इसी वनचर शरीर के अनुकूल हैं: पर्वत, वृक्ष और नख। टीका इन्हीं को उनके आयुध कहती है। वे भगवान् के आने की राह देखते हैं। इस समय उनका बल युद्ध में प्रयुक्त होता हुआ नहीं दिखाया जाता। वीर तैयार हैं और चित्त प्रभु के मार्ग पर लगा है। ब्रह्मा ने जिस चरणसेवा के लिये पृथ्वी पर जाने को कहा था, उसी की प्रतीक्षा उनके बल को दिशा देती है।

पर्वतों और जंगलों में जहाँ तहाँ वे अपनी अपनी सुन्दर सेनाएँ बनाकर भरपूर छा जाते हैं। पहले देवता बैठे हुए यह सोच रहे थे कि सहायता कहाँ माँगी जाये; अब वे पृथ्वी पर सेवा के लिये तैयार हैं। इस दृश्य को कहकर कथावाचक स्वयं कथा का मोड़ बताते हैं: यह सुन्दर चरित्र कह लिया, अब वह सुनिये जो बीच में रखा गया था। वानरों की प्रतीक्षा वहीं रहती है और हमारा ध्यान अवधपुरी की ओर लौटता है।

ब्रह्मा की आज्ञा से देवता वानरदेह धारण करते हैं। अपार बल वाले वीर पर्वत, वृक्ष और नख को आयुध बनाते हैं, वनों तथा पर्वतों में सेनाएँ रचते हैं और हरि की राह देखते हैं।

अवधपुरी का भक्त राजपरिवार

अवधपुरी में रघुकुल के मणि राजा दशरथ हैं। उनका नाम वेदों में विख्यात कहा गया है। तुलसी परिचय में उन्हें धर्मधुरन्धर, गुणों का भण्डार और ज्ञानी कहते हैं। इतना कहने के बाद उनके हृदय तथा बुद्धि का आश्रय बताते हैं। हृदय में शार्ङ्गधनुष धारण करने वाले भगवान् की भक्ति है और बुद्धि भी उन्हीं में लगी हुई है। राज्य का परिचय राजा के भीतर की इस स्थिति तक पहुँचकर पूरा होता है। जिस घर में अवतार लेने की बात अभी आकाशवाणी ने कही थी, उस घर के स्वामी का चित्त हरि में है।

इसके बाद कौसल्या आदि प्रिय रानियों का दोहा आता है। सभी के आचरण पवित्र हैं। वे विनीत हैं, पति के अनुकूल हैं और हरि के चरणकमलों में दृढ़ प्रेम रखती हैं। कौसल्या का नाम देकर बाकी रानियों को आदि के भीतर रखा गया है। इस छोटे से परिचय में सबका पवित्र आचरण और सबकी भक्ति साथ कही गयी है। दशरथ के हृदय में जो भक्ति थी, रानियों के लिये वही चरणों में दृढ़ प्रेम बनकर आती है।

कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत।
पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल बिनीत॥ १८८॥

दोहा १८८

हम इस राजपरिवार को पहले उसके गुणों के साथ जानते हैं। उसके बाद पुत्रहीन होने का दुःख सामने आता है। इस क्रम से दशरथ की व्यथा को अपना स्थान मिलता है। धर्म निभाने वाले, ज्ञानी और भक्त राजा के मन में भी एक कमी चुभती है। रानियों का पवित्र आचरण उस दुःख का कारण नहीं बनाया गया है। तुलसी उनके परिचय का पूरा आदर रखते हैं और फिर राजा के मन की उस एक ग्लानि को कहते हैं जो उन्हें गुरु के पास ले जायेगी।

अवतार की घोषणा सुन चुके पाठक के लिये यह घर पहचाना हुआ है। दशरथ की अपनी कथा अब उस पहचान के भीतर खुल रही है। आकाश से चार भाइयों के रूप में आने का वचन मिल चुका है; अवध में हम उस राजा को देखते हैं जिसे अपने पुत्र न होने का दुःख है। दोनों बातें एक दूसरे के निकट रखी गयी हैं। आगे गुरु का आश्वासन इस घर में भी वही चार की संख्या सुनायेगा।

दशरथ धर्मधुरन्धर, गुणवान, ज्ञानी और हरिभक्त हैं। कौसल्या आदि सभी रानियाँ पवित्र आचरण वाली, विनीत और हरि के चरणों में दृढ़ प्रेम रखने वाली हैं। इसी घर में राजा का पुत्रहीन होने का दुःख उठता है।

गुरु के पास अपना दुःख सुख

एक बार दशरथ के मन में ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं हैं। चौपाई इसी बात से उनकी यात्रा आरम्भ करती है। राजा तुरन्त गुरु के घर जाते हैं। वहाँ पहुँचकर चरणों में प्रणाम करते हैं और बहुत विनय करते हैं। यह दुःख भीतर रखा हुआ नहीं रह जाता। जिस आश्रय से मार्ग मिल सकता है, राजा उसी के पास स्वयं पहुँचते हैं। उनके जाने में विलम्ब नहीं है और उनके कहने में विनय है।

दशरथ अपना सारा दुःख सुख गुरु को सुनाते हैं। केवल पुत्र पाने की एक माँग का वाक्य कहकर बात समाप्त नहीं होती। तुलसी दुःख और सुख दोनों कहते हैं। राजा अपने जीवन की स्थिति गुरु के सामने रखते हैं, और वसिष्ठ उन्हें बहुत प्रकार से समझाते हैं। उस समझाने का पूरा विस्तार चौपाई नहीं सुनाती, पर जो आश्वासन उसके भीतर से निकलता है, वह साफ़ कह देती है।

निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहु बिधि समुझायउ॥
धरहु धीर होइहहिं सुत चारी। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी॥

चौपाई ९

धीरज रखिये, चार पुत्र होंगे। वे तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे और भक्तों का भय हरेंगे। गुरु का उत्तर संख्या पर समाप्त नहीं होता। आने वाले पुत्रों का परिचय उनके यश और उनके काम से भी है। दशरथ को अपना पुत्रहीन होना दुःख दे रहा था; वसिष्ठ के वचन में उन पुत्रों से भक्तों का भय दूर होना भी जुड़ गया। इस प्रकार राजपरिवार के लिये मिले आश्वासन में फिर एक व्यापक हित सुनाई देता है।

पृथ्वी से भी ब्रह्मा ने धीरज रखने को कहा था। अब वही धीरज दशरथ से कहा जाता है। दोनों के सामने कहने वाले उनकी व्यथा सुनते हैं और आने वाली सहायता का विश्वास देते हैं। यहाँ गुरु के आश्वासन में ठीक चार पुत्र हैं, जैसे आकाशवाणी में चार भाइयों के रूप में आने का वचन था। इस समानता को देखने के लिये आगे की किसी घटना तक जाने की आवश्यकता नहीं। दोनों घोषणाएँ इसी प्रसंग में हमारे सामने हैं।

वसिष्ठ समझाने के बाद यज्ञ की व्यवस्था करते हैं। वे शृंगी ऋषि को बुलाते हैं और उनसे शुभ पुत्रकाम यज्ञ कराते हैं। पोद्दार की टीका इसे पुत्रकामेष्टि कहती है। राजा की विनय, गुरु का आश्वासन और गुरु द्वारा बुलाये गये ऋषि का अनुष्ठान, कथा इन्हें इसी क्रम से रखती है। जो धीरज दिया गया था, उसके साथ अब कर्म का निश्चित मार्ग भी बन गया है।

दशरथ गुरु के घर जाकर अपना दुःख सुख कहते हैं। वसिष्ठ चार पुत्रों का आश्वासन देते हैं, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और भक्तों का भय हरने वाले होंगे। फिर वे शृंगी ऋषि को बुलाकर पुत्रकामेष्टि कराते हैं।

आहुति से अग्निदेव के हाथ तक

यज्ञ में ऋषि भक्तिसहित आहुतियाँ देते हैं। इस एक विशेषण से अनुष्ठान की भीतर की दशा भी बतायी गयी है। आहुति दी जा रही है और उसके साथ भक्ति है। इसी के बाद अग्निदेव हाथ में चरु लिये प्रकट होते हैं। तुलसी यह दृश्य एक चौपाई में पूरा कर देते हैं: ऋषि को बुलाना, शुभ यज्ञ, भक्तिसहित आहुति, और अग्नि का प्रकट होना। हर क्रिया अगली क्रिया से जुड़ती है और राजा की व्यथा से चला मार्ग अब एक दिखाई देने वाले फल तक पहुँचता है।

सृंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा॥
भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें॥

चौपाई १०

चरु का अर्थ पोद्दार की टीका हविष्यान्न खीर करती है। अग्निदेव के हाथ में वही है। आगे उसे पायस भी कहा गया है। जिस वस्तु को लेकर वे प्रकट हुए हैं, उसके साथ राजा के लिये संदेश है। वसिष्ठ ने हृदय में जो विचार किया था, वह सारा काम सिद्ध हो गया। गुरु के मन का विचार और यज्ञ में मिले इस फल का संबंध स्वयं अग्निदेव बताते हैं। दशरथ को दिया हुआ आश्वासन अब केवल सुनने की बात नहीं रहा; यज्ञ की सभा में उसे सिद्ध होने का वचन मिल रहा है।

इसके बाद अग्निदेव राजा को निर्देश देते हैं। वे जाकर इस हविष्यान्न को बाँट दें। जिसको जैसा उचित हो, उसके लिये वैसा भाग बनायें। अभी कोई भाग मापा जाता हुआ नहीं दिखाया गया है। आदेश भाग बनाने और बाँटने का है। इस क्षण का पूरा ध्यान अग्निदेव के संदेश पर है: काम सिद्ध हुआ, चरु मिला, और उसके उपयोग की आज्ञा दी गयी। राजा को आगे क्या करना है, वह अब स्पष्ट है।

अग्निदेव केवल राजा से बात कहकर अदृश्य नहीं होते। दोहा कहता है कि वे सारी सभा को समझाकर अन्तर्धान होते हैं। यज्ञ का फल और संदेश सभा के बीच प्रकट हुआ है। फिर अग्निदेव दिखाई नहीं देते, पर दशरथ के भीतर हर्ष बना रहता है। वे परमानन्द में मग्न हैं। उनके हृदय में वह प्रसन्नता समाती नहीं। जिस राजा के मन में पुत्र न होने की ग्लानि उठी थी, उसी मन की अन्तिम दशा अब इतने बड़े आनन्द से कही जाती है।

तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ।
परमानंद मगन नृप हरष न हृदयँ समाइ॥ १८९॥

दोहा १८९

इस दोहे पर रुककर हम पूरे प्रसंग की गति देख सकते हैं। पृथ्वी पहले भय के कारण कुछ कह नहीं पाती थी। अन्त में राजा के हृदय में हर्ष नहीं समाता। बीच में दोनों अपनी व्यथा कहने के लिये किसी आश्रय तक पहुँचे हैं। पृथ्वी को भार हरने का वचन मिला, दशरथ को चार पुत्रों का आश्वासन और यज्ञ का चरु मिला। यहाँ तक कथा आश्वासन को उनके मनों में उतरते हुए दिखाती है। पृथ्वी के जी में भरोसा है और राजा के जी में आनन्द।

शृंगी ऋषि की भक्तिसहित आहुतियों पर अग्निदेव चरु लेकर प्रकट होते हैं। वे काम सिद्ध होने का संदेश और उचित भाग बनाकर बाँटने की आज्ञा देते हैं। सभा को समझाकर अन्तर्धान होते हैं और दशरथ परमानन्द में मग्न हो जाते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

पृथ्वी की बात में एक परद्रोही पर्वतों से अधिक भारी था। इस तुलना में दूसरों के लिये हमारे आचरण का भार दिखाई देता है। कथा पहले दूसरों का धन चाहने, मान मिटाने और सेवा लेने की प्रवृत्ति कहती है; आगे देवताओं को पृथ्वी पर उतरकर सेवा करने की आज्ञा मिलती है। दोनों जगह सेवा शब्द के आसपास संबंध की दिशा साफ़ है। आरम्भ की दुनिया साधुओं से अपना काम कराती है। आश्वासन पा चुके देवता स्वयं हरि के काम के लिये वानरदेह धारण करते हैं।

दूसरी ओर ब्रह्मा की वह स्वीकृति याद रहती है कि उनका वश नहीं चलता। इस स्वीकृति के बाद भी पृथ्वी अकेली नहीं रह जाती। उसे धीरज मिलता है, साथ मिलता है और पुकारने का आश्रय मिलता है। अपने पास समाधान न होने पर भी किसी की व्यथा सुनना और उसके साथ सहायता तक पहुँचना इस सभा में दिखाई देता है। बाद में गुरु के सामने दशरथ का दुःख सुख कहना इसी सुने जाने को एक घर के निकट ले आता है।

और शिव का प्रेम संबंधी वचन उस सभा के बीच कहा गया है जहाँ सब भयभीत हैं। प्रेम वहाँ किसी निश्चिन्त समय की बात नहीं है। उसी से स्तुति उठती है, और स्तुति में भक्ति तथा पूजा न जानने का स्वीकार भी समाता है। हम उन देवताओं की विनय में यह देख सकते हैं कि अपनी चतुराई छोड़ने पर भी पुकार बची रहती है। उनकी बुद्धि अब भी सावधान है, उनके हाथ जुड़े हुए हैं, और उनके वचन सुन लिये जाते हैं।

वानररूप देवता पर्वतों और वनों में राह देख रहे हैं। अवधपुरी में यज्ञ का संदेश सुनकर दशरथ आनन्द में हैं। दोनों दृश्य आने वाले अवतार की प्रतीक्षा से जुड़े हैं। पृथ्वी को अपने भार के हटने का भरोसा मिला है और राजा को अपने घर में चार पुत्र होने का। इस प्रसंग का अन्त उस भरोसे के साथ होता है, जब अग्निदेव अदृश्य हो चुके हैं और राजा का हृदय हर्ष से भर रहा है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा १८४ से दोहा १८९ तक का प्रसंग, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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