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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 21
पृथ्वी की पुकार और दशरथ का पुत्रकाम यज्ञ
रावण के भय से बोल न सकनेवाली पृथ्वी, प्रेम से प्रकट होनेवाले भगवान्। और गुरु के पास अपना दुःख लेकर पहुँचे दशरथ।
पृथ्वी पर्वतों को सँभाल सकती है, नदियों और समुद्रों को भी। दूसरों का अनिष्ट करनेवाला एक परद्रोही उसे इन सबसे अधिक भारी लगता है। वह सारे धर्मों को उलटा देखती है, और रावण के भय से अपना दुःख कह नहीं पाती।
पृथ्वी गाय का रूप लेकर देवताओं और मुनियों के पास जाती है। वे सब उसे लेकर ब्रह्मा के पास जाते हैं। फिर प्रश्न उठता है कि भगवान् को कहाँ पुकारा जाये। उसी सभा में उपस्थित शिव प्रेम का पता देते हैं। उसके बाद स्तुति उठती है और आकाश से उत्तर आता है कि वे मनुष्य बनकर आयेंगे।
तुलसीदास के रामचरितमानस में इसी आश्वासन के भीतर दशरथ और कौसल्या का नाम आता है। फिर कथा अवधपुरी के उस घर की ओर लौटती है जहाँ धर्म और भक्ति हैं। वहाँ राजा को पुत्र न होने का दुःख है। प्रसंग के अन्त में अग्निदेव हाथ में चरु लिये प्रकट होते हैं।
धरती की पुकार सुननेवाले
- पृथ्वी रावण के भय और एक परद्रोही के भार से व्याकुल, जो गाय का रूप लेकर सहायता माँगती हैं।
- ब्रह्मा पृथ्वी को धीरज देते हैं, शिव की बात की बड़ाई करते हैं। वे भगवान् की स्तुति करते हैं और देवताओं को वानररूप में सेवा की आज्ञा देते हैं।
- शिव पार्वती को उस सभा की बात सुनाते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि भगवान् प्रेम से प्रकट होते हैं।
- दशरथ और कौसल्या अवधपुरी का राजपरिवार, जिसकी भक्ति और पवित्र आचरण का वर्णन होता है।
- वसिष्ठ और शृंगी ऋषि दशरथ के गुरु वसिष्ठ आश्वासन देकर शृंगी ऋषि को बुलाते हैं और पुत्रकाम यज्ञ कराते हैं।
- अग्निदेव यज्ञ में चरु लेकर प्रकट होते हैं और राजा को उसके भाग बनाकर बाँटने की आज्ञा देते हैं।
जो भार पर्वतों से भारी है
दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये हैं, और पराये धन और परायी स्त्री पर मन चलानेवाले भी। माता, पिता और देवताओं का मान नहीं रहा। लोग साधुओं से अपनी सेवा कराते हैं।
शिव पार्वती से कहते हैं कि जिन प्राणियों का ऐसा आचरण है, उन सबको राक्षस समझिये। यहाँ पहचान आचरण से हो रही है: पराये धन की लालसा, परायी स्त्री पर बुरी दृष्टि, माता, पिता और देवताओं का अनादर, और साधुओं से सेवा लेना। धर्म के प्रति अतिशय ग्लानि देखकर (टीका इसे अरुचि और अनास्था बताती है) धरती अत्यन्त भयभीत और व्याकुल हो जाती है।
टीका के अनुसार पृथ्वी मन में सोचती है कि पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ उसे इतना भारी नहीं लगता, जितना एक परद्रोही। आरम्भ में दुष्टों के बहुत बढ़ने की बात थी। यहाँ परद्रोही एक है।
वह सारे धर्मों को उलटा देख रही है, और रावण से डरी हुई कुछ कह नहीं सकती। फिर वह गाय का रूप धरकर और हृदय में विचार करके देवताओं और मुनियों के समूह के पास जाती है। टीका बताती है कि वे छिपे हुए थे। पृथ्वी रोकर उन्हें अपना दुःख सुनाती है। किसी से उसका काम नहीं बनता।
ब्रह्मा के सामने कही गयी असमर्थता
अब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्मा के लोक जाते हैं। पोद्दार की टीका उसे सत्यलोक कहती है। भय और शोक से अत्यन्त व्याकुल पृथ्वी भी गाय के शरीर में उनके साथ है।
ब्रह्मा सब जान लेते हैं, और मन में अनुमान करते हैं कि इसमें उनका कुछ वश नहीं चलेगा। वे पृथ्वी से कहते हैं कि जिनकी आप दासी हैं, वे अविनाशी हमारे भी सहायक हैं और आपके भी।
उनकी सीख दो बातों की है: मन में धीरज रखिये, और भगवान् के चरणों का स्मरण कीजिये। फिर वे कहते हैं कि प्रभु अपने दासों की पीड़ा जानते हैं, और इस दारुण विपत्ति का नाश करेंगे।
देवता फिर बैठकर विचार करते हैं कि प्रभु कहाँ मिलेंगे, जहाँ जाकर उनके सामने पुकार करें (टीका इसे फ़रियाद कहती है)। कोई वैकुण्ठपुरी जाने को कहता है, कोई कहता है कि वे क्षीरसमुद्र में रहते हैं। सहायता किससे मिलेगी, यह ब्रह्मा कह चुके। अब सब यह सोच रहे हैं कि वह सहायता कहाँ मिले।
प्रेम से प्रकट होने का पता
जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, भगवान् वहाँ सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं। फिर शिव पार्वती से कहते हैं कि उस सभा में वे उपस्थित थे, और अवसर पाकर उन्होंने एक बात कही थी। यानी यहाँ बोलनेवाले स्वयं अपना वचन याद करके सुना रहे हैं।
उनकी बात यह थी: भगवान् सब जगह समान रूप से व्यापक हैं और प्रेम से प्रकट होते हैं, यह वे जानते हैं। फिर वे देश, काल, दिशा और विदिशा सामने रखकर पूछते हैं कि ऐसी कौन सी जगह है जहाँ प्रभु नहीं हैं। सभा एक स्थान खोज रही थी। उत्तर में उसे प्रेम का पता मिलता है। इसके बाद कोई वैकुण्ठ या क्षीरसमुद्र नहीं जाता।
वे चर और अचर सबमें हैं, फिर भी सबसे रहित और विरक्त हैं। पोद्दार की टीका के अनुसार उनकी कहीं आसक्ति नहीं है। और वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि।
टीका इस उपमा को खोलती है: अग्नि अव्यक्त रूप से सब जगह है, पर जहाँ अरणिमन्थन आदि साधन होते हैं, वहीं प्रकट होती है। इसी तरह सब जगह व्याप्त भगवान् प्रेम से प्रकट होते हैं। शिव की यह बात सबके मन को प्रिय लगती है, और ब्रह्मा “साधु, साधु” कहकर उसकी बड़ाई करते हैं।
शिव की बात सुनकर ब्रह्मा के मन में हर्ष होता है, शरीर पुलकित हो उठता है और आँखों से आँसू बहते हैं। फिर वे धीरबुद्धि ब्रह्मा सावधान होकर हाथ जोड़ते हैं और स्तुति करने लगते हैं।
स्तुति में अपनी चतुराई छोड़ना
स्तुति भगवान् की जय से खुलती है: शरण में आये की रक्षा करनेवाले, गायों और ब्राह्मणों का हित करनेवाले, असुरों का नाश करनेवाले। समुद्र की कन्या के प्रिय स्वामी (पोद्दार की टीका उन्हें लक्ष्मी बताती है), देवताओं और पृथ्वी का पालन करनेवाले। उनकी करनी अद्भुत है, और उसका भेद कोई नहीं जानता। फिर पहली विनती आती है: जो स्वभाव से कृपालु और दीनदयालु हैं, वे अनुग्रह करें।
स्तुति में वे अविनाशी, सबके हृदय में रहनेवाले, व्यापक और परम आनन्दस्वरूप कहे जाते हैं। वे माया से रहित मुकुन्द हैं (टीका के अनुसार मोक्ष देनेवाले)। मोह से छूटे हुए विरक्त मुनि उनके अत्यन्त अनुरागी होकर रात दिन उनका ध्यान करते हैं।
फिर स्तुति सृष्टि की ओर जाती है। जिन्होंने बिना किसी संगी या सहायक के तीन प्रकार की सृष्टि रची, वे पापों का नाश करनेवाले भगवान् हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं, न पूजा।
वे संसार का भय हरते हैं (पोद्दार इसे जन्म और मृत्यु का भय बताते हैं)। वे मुनियों के मन को आनन्द देते हैं और विपत्तियों के समूह का नाश करते हैं। फिर देवताओं का पूरा समूह मन, वचन और कर्म से चतुराई छोड़कर उनकी शरण लेता है।
स्तुति अन्त में कहती है कि सरस्वती, वेद, शेष और सारे ऋषि उन्हें नहीं जानते। वेद पुकारकर कहते हैं कि उन्हें दीन प्रिय हैं। वे भगवान् द्रवित हों। संसार को समुद्र और भगवान् को उसे मथनेवाला मन्दराचल कहा जाता है। टीका यहाँ मथने का अर्थ जोड़ती है। मुनि, सिद्ध और सारे देवता अत्यन्त भयभीत होकर उनके चरणकमलों में नमस्कार करते हैं।
स्तुति में डर छिपाया नहीं गया: अपनी अज्ञानता कही गयी, चतुराई छोड़ी गयी, और अन्त में भयातुर होकर प्रणाम किया गया। प्रभु को कहाँ पाकर पुकार करें, यह विचारनेवाले देवता अब स्तुति के शब्दों में उनकी शरण में हैं। अब उत्तर आता है।
आकाश से आया मनुष्य होने का वचन
देवताओं और पृथ्वी का भय जाना जाता है, उनके स्नेह भरे वचन सुने जाते हैं, और गम्भीर आकाशवाणी होती है। वह वाणी शोक और सन्देह हरनेवाली है।
वाणी पहले मुनियों, सिद्धों और देवताओं के स्वामियों से कहती है: डरिये मत। आपके लिये मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा, और उदार सूर्यवंश में अंशों सहित मनुष्य का अवतार लूँगा।
फिर वाणी वह घर बताती है। कश्यप और अदिति ने बड़ा तप किया था, और उन्हें पहले वर दिया जा चुका है। वही दशरथ और कौसल्या के रूप में अयोध्यापुरी में मनुष्यों के राजा होकर प्रकट हुए हैं। पहले दिया हुआ वर और अब का आश्वासन यहाँ जुड़ जाते हैं।
उनके घर जाकर वे रघुकुल में श्रेष्ठ चार भाइयों के रूप में अवतार लेंगे। चार की संख्या यहीं पहली बार सुनायी देती है, गुरु के मुँह से दशरथ के सुनने से पहले। नारद के सब वचन सत्य किये जायेंगे, और अवतार पराशक्ति के साथ होगा। नारद के वचनों का विस्तार यहाँ नहीं खुलता। आकाशवाणी इतना ही कहती है।
अन्त में वाणी पृथ्वी का सारा भार हरने का वचन देती है, और कहती है कि देवताओं का समुदाय निर्भय हो। आरम्भ में धरती को एक परद्रोही पर्वतों, नदियों और समुद्रों से भारी लगा था।
यह आकाश में ब्रह्म की वाणी है, और टीका ब्रह्म का अर्थ भगवान् बताती है। इसे कानों से सुनकर देवता तुरन्त लौट जाते हैं, और उनका हृदय शीतल हो जाता है। फिर ब्रह्मा पृथ्वी को समझाते हैं। वह निर्भय होती है, और उसके जी में भरोसा आता है।
वनों में प्रतीक्षा करते हुए देवता
आश्वासन के बाद देवताओं को काम भी मिलता है। ब्रह्मा उन्हें सिखाते हैं कि वानरों का शरीर धारण करके पृथ्वी पर जाइये और भगवान् के चरणों की सेवा कीजिये। इतना सिखाकर वे अपने लोक चले जाते हैं।
सब देवता अपने अपने लोक जाते हैं, और पृथ्वी सहित सबके मन को शान्ति मिलती है। ब्रह्मा ने जो कुछ आज्ञा दी, देवता हर्षित होते हैं और उसे पूरा करने में देर नहीं करते। पृथ्वी पर वे वनचरों की देह धारण करते हैं, जिसे टीका वानरदेह बताती है। उनके पास अतुलित बल और प्रताप है।
पर्वत, वृक्ष और नख उनके शस्त्र हैं, और वे सब वीर हैं। धीर बुद्धिवाले वे भगवान् के आने की राह देखते हैं।
पर्वतों और जंगलों में जहाँ तहाँ वे अपनी अपनी सुन्दर सेनाएँ बनाकर भरपूर छा जाते हैं। फिर कथा कहनेवाले स्वयं मोड़ बताते हैं: यह सुन्दर चरित्र कह लिया, अब वह सुनिये जो बीच में छोड़ दिया गया था। देवताओं की प्रतीक्षा वहीं रहती है, और कथा अवधपुरी की ओर लौटती है।
अवधपुरी का भक्त राजपरिवार
अवधपुरी में रघुकुल के मणि राजा दशरथ हैं, जिनका नाम वेदों में विख्यात है। वे धर्मधुरन्धर, गुणों के भण्डार और ज्ञानी हैं। उनके हृदय में भगवान् की भक्ति है, और बुद्धि उन्हीं में लगी रहती है। जिस घर में अवतार की बात अभी आकाशवाणी ने कही थी, उस घर के स्वामी का चित्त भगवान् में है।
फिर कौसल्या आदि प्रिय रानियों की बात आती है। सभी पवित्र आचरणवाली हैं, विनीत हैं, पति के अनुकूल चलती हैं और भगवान् के चरणकमलों में दृढ़ प्रेम रखती हैं। कौसल्या का नाम लेकर बाकी रानियाँ “आदि” में रखी गयी हैं।
हम इस राजपरिवार को पहले उसके गुणों के साथ जानते हैं। फिर पुत्र न होने का दुःख सामने आता है: राजा के मन की वह ग्लानि, जिसके बाद वे तुरन्त गुरु के घर जाते हैं।
आकाश से चार भाइयों के रूप में आने का वचन मिल चुका है। अवध में हम उस राजा को देखते हैं जिसे पुत्र न होने का दुःख है। दोनों बातें पास पास रखी गयी हैं।
गुरु के पास अपना दुःख सुख
एक बार दशरथ के मन में ग्लानि हुई कि उनके पुत्र नहीं है। राजा तुरन्त गुरु के घर जाते हैं, चरणों में प्रणाम करते हैं और बहुत विनय करते हैं।
दशरथ अपना सारा दुःख सुख गुरु को सुनाते हैं। वसिष्ठ उन्हें बहुत प्रकार से समझाते हैं।
धीरज रखिये, चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध होंगे और भक्तों का भय हरेंगे।
ब्रह्मा ने पृथ्वी से कहा था कि मन में धीरज रखिये। अब लगभग उन्हीं शब्दों में, मन का नाम लिये बिना, दशरथ से धीरज रखने को कहा जाता है।
समझाने के बाद वसिष्ठ शृंगी ऋषि को बुलाते हैं और उनसे शुभ पुत्रकाम यज्ञ कराते हैं। पोद्दार की टीका इसे पुत्रकामेष्टि कहती है। राजा की विनय, गुरु का आश्वासन, फिर गुरु के बुलाये ऋषि का अनुष्ठान, कथा इन्हें इसी क्रम से रखती है।
आहुति से अग्निदेव के हाथ तक
यज्ञ में ऋषि भक्ति सहित आहुतियाँ देते हैं, और अग्निदेव हाथ में चरु लिये प्रकट होते हैं।
पोद्दार की टीका चरु का अर्थ हविष्यान्न खीर बताती है, और आगे उसे पायस भी कहती है। इसी के साथ अग्निदेव राजा से कहते हैं कि वसिष्ठ ने हृदय में जो कुछ विचारा था, वह सारा काम सिद्ध हो गया। गुरु के मन का विचार और यज्ञ का यह फल, दोनों का सम्बन्ध स्वयं अग्निदेव बताते हैं।
फिर वे राजा को निर्देश देते हैं: जाकर इस हविष्यान्न को बाँट दीजिये, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर। यहाँ कोई भाग बँटता हुआ नहीं दिखाया गया। आदेश भाग बनाने और बाँटने का है।
अग्निदेव सारी सभा को समझाकर अन्तर्धान हो जाते हैं। दशरथ परमानन्द में मग्न हैं, और उनके हृदय में हर्ष समाता नहीं।
यहाँ रुककर पूरे प्रसंग की गति दिखती है। पृथ्वी पहले भय से कुछ कह नहीं पाती थी। अन्त में राजा के हृदय में हर्ष नहीं समाता। बीच में दोनों अपनी व्यथा लेकर किसी आश्रय तक पहुँचे। पृथ्वी को भार हरने का वचन मिला, दशरथ को चार पुत्रों का आश्वासन और यज्ञ का चरु।
न चलता वश, सुनी गयी पुकार
देवताओं और मुनियों से कुछ काम नहीं बनता, और पृथ्वी उनके साथ ब्रह्मा के लोक जाती है। वहाँ ब्रह्मा मन में अनुमान करते हैं कि इसमें उनका कुछ वश नहीं चलता। वे उसे बताते हैं कि उसका सहायक कौन है, और धीरज रखने और भगवान् के चरणों का स्मरण करने की सीख देते हैं।
शिव का प्रेम का वचन उस सभा में कहा गया है जहाँ देवता और पृथ्वी भयभीत हैं। फिर स्तुति उठती है। उसके गानेवाले स्वीकार करते हैं कि वे न भक्ति जानते हैं, न पूजा। और देवताओं का पूरा समूह मन, वचन और कर्म से चतुराई छोड़ देता है। उसके बाद उनके स्नेह भरे वचन सुने जाते हैं, और फिर वाणी आती है।
वनचरों की देह में देवता पर्वतों और वनों में राह देख रहे हैं। और अवधपुरी में यज्ञ का संदेश सुनकर दशरथ आनन्द में हैं। पृथ्वी के जी में भरोसा आ गया है। प्रसंग राजा के हर्ष पर ठहरता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा 184 से दोहा 189 तक का प्रसंग, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।