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अवतार के कारण, नारद का अभिमान और विश्वमोहिनी

रामचरितमानस · बालकाण्ड · अवतार के कारण, नारद का अभिमान और विश्वमोहिनी

अवतार के कारण, नारद का अभिमान और विश्वमोहिनी

जिनकी समाधि कामदेव भी नहीं डिगा सके, वही नारद एक राजकुमारी का रूप देखकर वैराग्य भूल जाते हैं। बीच में शिव की सीख है और श्रीहरि का अपने सेवक के हित का प्रण।

नारदजी के सामने कामदेव हार मानकर खड़े हैं। साथ आये हुए सहायक भी भयभीत हैं, पर मुनि के मन में तनिक क्रोध नहीं उठता। वे मीठे वचनों से सबको आश्वस्त करके विदा देते हैं। इतनी निर्मल विजय के बाद मन में जो बात उठती है, उसी से इस कथा की अगली उलझन बनती है। काम पर विजय मिली है, और अब उस विजय का अभिमान होने लगा है। शिवजी उसे सँभालने के लिये सीख देते हैं। श्रीहरि उस अभिमान को अंकुर की तरह पहचानते हैं, जिससे आगे भारी वृक्ष निकल सकता है।

यह कथा पार्वतीजी के एक आश्चर्य से खुलती है। वे सुनती हैं कि नारद के शाप के कारण भी भगवान् ने एक कल्प में अवतार लिया था। विष्णु के भक्त, ज्ञानी नारद ऐसा शाप कैसे दे सकते हैं? शिवजी उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए पहले मुनि की समाधि दिखाते हैं, फिर कामदेव की पराजय और अन्त में वह राजकुमारी, जिसके सामने मुनि अपना वैराग्य भूल जाते हैं। वहाँ तक पहुँचने से पहले अवतार के दूसरे कारण भी सुनाये जाते हैं। हर कारण की अपनी कथा है और हर कथा के लिये कल्प का भेद सँभालकर रखा गया है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • शिव और पार्वती अवतार के कारणों पर संवाद करते हैं। नारद के मोह की बात सुनकर पार्वती को विशेष आश्चर्य होता है।
  • श्रीहरि भक्तों के हित के लिये शरीर धारण करते हैं और नारद के भीतर उठते गर्व को दूर करने का उपाय सोचते हैं।
  • नारद हरिगुण गानेवाले देवर्षि, जिनकी कामविजय के बाद यह कथा अभिमान और मोह तक पहुँचती है।
  • इन्द्र और कामदेव इन्द्र अपने पद के लिये डरते हैं। उनके भेजे कामदेव नारद की समाधि भंग करने आते हैं।
  • शीलनिधि और विश्वमोहिनी हरिमाया के रचे नगर के राजा और राजकुमारी। विश्वमोहिनी के स्वयंवर में अगणित राजा आये हैं।

अवतार का कारण कितना कहा जा सकता है

शिवजी पार्वती से कहते हैं कि वेद और शास्त्र श्रीहरि के सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्र गाते आये हैं। फिर कारण बताने से पहले वे अपने कहने की सीमा रख देते हैं। हरि का अवतार जिस कारण होता है, उसके विषय में यह कह देना कठिन है कि बस, यही उसका पूरा कारण है। पोद्दारजी की टीका इस सावधानी को खोलती है। कारण अनेक हो सकते हैं और ऐसे भी हो सकते हैं जिन्हें कोई जान ही न सके। आगे जितनी कथाएँ आयेंगी, उन्हें सुनते समय यह पहली बात हमारे साथ रहनी चाहिये।

सुनु गिरिजा हरिचरित सुहाए । बिपुल बिसद निगमागम गाए॥
हरि अवतार हेतु जेहि होई । इदमित्थं कहि जाइ न सोई॥

चौपाई १

राम बुद्धि, मन और वाणी के तर्क से परे हैं। यह शिवजी अपना मत बताते हैं और पार्वती को सयानी कहकर सुनाते हैं। संत, मुनि, वेद और पुराण अपनी समझ के अनुसार जो कहते हैं, तथा जितना स्वयं शिवजी समझते हैं, उतना वे कहेंगे। इतना स्पष्ट करके कथा शुरू करने में सुननेवाले का भी आदर है। पार्वती का प्रश्न उत्तर पाने योग्य है, और उत्तर को अपनी पहुँच का पता है। इसीलिये आगे एक कारण सुन लेने पर शेष कारणों की जगह बनी रहती है।

पहले उस पीड़ा का वर्णन आता है जिसके लिये प्रभु शरीर धारण करते हैं। धर्म की हानि होती है, अधम और अभिमानी असुर बढ़ते हैं। उनका अन्याय इतना होता है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं। यह सूची धर्म की हानि को प्रत्यक्ष दुःख में बदल देती है। पृथ्वी तक उस दुःख का भार सह रही है। उसी समय कृपानिधान प्रभु भाँति भाँति के शरीर धारण करके सज्जनों की पीड़ा हरते हैं। अवतार की बात कहने में यहाँ सबसे पहले पीड़ितों का हाल सुनाया गया है।

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु।
जग बिस्तारहिं बिसद जस राम जन्म कर हेतु॥ १२१॥

दोहा १२१

असुरों का नाश, देवताओं की स्थापना और वेद की मर्यादा की रक्षा के साथ दोहे में एक और काम रखा है, जगत् में निर्मल यश का फैलना। अगली चौपाई बताती है कि उस यश का क्या होता है। भक्त उसे गाते हैं और भवसागर से पार हो जाते हैं। इस तरह अवतार का हित उस समय उपस्थित लोगों से आगे, कथा सुनने और गानेवालों तक पहुँचता है। युद्ध पूरा हो जाने पर भी यश का काम चलता रहता है। जिस चरित्र का शिवजी अब वर्णन करेंगे, उसका सुना जाना भी भक्तों के हित में आता है।

अब वे दो एक जन्मों का विस्तार सुनाने की बात कहते हैं और भवानी से सावधान होकर सुनने का आग्रह करते हैं। अनेक कारणों में से कुछ कथाएँ चुनी जा रही हैं। हर कथा के आरम्भ में सम्बन्ध फिर खुलेंगे, किसी शाप की अवधि सामने आयेगी, किसी भक्त के हित का प्रसंग आयेगा। श्रीराम के जन्म की बात समझने के लिये शिवजी उसी जीवनचरित के भीतर चलते हैं जिसमें दुःख, कृपा और दिये हुए वचन साथ काम करते हैं।

अवतार के कारण अनेक हैं। शिवजी पहले धर्म की हानि और सज्जनों की पीड़ा बताते हैं। प्रभु असुरों का नाश करते हैं, वेद की मर्यादा रखते हैं और ऐसा यश फैलाते हैं जिसे गाकर भक्त भवसागर से तरते हैं।

जय और विजय, शाप की तीन जन्मों की अवधि

पहली कथा श्रीहरि के दो प्रिय द्वारपालों की है, जय और विजय। परिचय में उनका प्रिय होना पहले आता है। दोनों भाई ब्राह्मण के शाप से असुरों के तामसी शरीर पाते हैं। चौपाई शाप देनेवाले को ब्राह्मण कहती है; पोद्दारजी की टीका सनकादि की पहचान बताती है। शाप के अवसर पर क्या हुआ था, इसका विस्तार यहाँ नहीं है। शिवजी सीधे उस परिणाम पर आते हैं जिससे अवतार का कारण समझ में आनेवाला है। हरि के प्रिय द्वारपाल अब ऐसे वीर असुर हुए हैं जिनसे इन्द्र का गर्व उतर जाता है।

कनककसिपु और हाटकलोचन, चौपाई में आये इन नामों को टीका हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के रूप में बताती है। दोनों युद्ध में विजयी और संसार में प्रसिद्ध हैं। भगवान् वराह का शरीर धारण करके हिरण्याक्ष का वध करते हैं। फिर नरसिंह रूप में हिरण्यकशिपु मारा जाता है और भक्त प्रह्लाद का सुन्दर यश फैलता है। अभी अवतार के सामान्य कारणों में यश के प्रसार की बात सुनी थी। इस कथा में उसका नाम भी मिल जाता है, प्रह्लाद का यश। भगवान् की विजय के साथ उनके भक्त की महिमा भी प्रकट होती है।

इसके बाद दोहे में उन्हीं दोनों के रावण और कुम्भकर्ण होने की बात आती है। वे फिर बलवान्, महावीर और देवताओं को जीतनेवाले योद्धा हैं। भगवान् के हाथों मारे जाने के बाद भी यह दूसरा जन्म क्यों आया, इसका उत्तर अगली चौपाई देती है। शाप में तीन जन्मों की अवधि थी। उस वचन का प्रमाण बना हुआ था, इसीलिये पहले वध के बाद मुक्ति नहीं हुई थी। कथा यहाँ मृत्यु और मुक्ति का भेद शाप की कही हुई अवधि से समझाती है।

मुकुत न भए हते भगवाना । तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना॥
एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी॥

चौपाई २

भक्तों से अनुराग रखनेवाले भगवान् एक बार फिर उन्हीं दोनों के कल्याण के लिये शरीर धारण करते हैं। जिनका परिचय अभी देवताओं को जीतनेवाले राक्षसों के रूप में हुआ था, उनके लिये भी अवतार का प्रयोजन हित और कल्याण कहा गया है। जय और विजय का पहला परिचय, हरि के प्रिय द्वारपाल, इस जगह अपना अर्थ फिर खोलता है। तामसी देह और रणवीरता के पीछे वह सम्बन्ध बना रहता है जिसे आरम्भ में बता दिया गया था।

इस अवतार में कश्यप और अदिति माता पिता होते हैं, जो दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्ध हैं। शिवजी इसे एक कल्प का अवतार बताते हैं, जिसमें प्रभु ने संसार में पवित्र चरित्र किये। यही कल्प की सीमा अगली कथा तक साथ रखनी है। आगे रावण के विषय में एक और कारण आयेगा, और उसके आरम्भ में भी एक कल्प कहा जायेगा। दोनों कथाओं को उनकी अपनी जगह सुनने से हर कथन स्पष्ट रहता है।

जय और विजय शाप से असुर होते हैं। वराह और नरसिंह रूप में उनके वध के बाद भी तीन जन्मों का शाप शेष रहता है। रावण और कुम्भकर्ण हुए उन्हीं दोनों के हित के लिये एक कल्प में प्रभु फिर अवतार लेते हैं।

जलन्धर की कथा और स्वीकार किया हुआ शाप

एक कल्प की दूसरी कथा जलन्धर से शुरू होती है। देवता उससे युद्ध में हारकर दुःखी हैं। उनका दुःख देखकर शिवजी स्वयं संग्राम करते हैं। युद्ध घोर है, पर महाबली दैत्य मारे नहीं मरता। पहले उसके बल का परिणाम दिखता है, फिर उस बल का कारण बताया जाता है। उसकी पत्नी परम पतिव्रता है। उसी के प्रताप से शिवजी भी उसे जीत नहीं पाते। कथा में उस स्त्री का व्रत युद्ध के परिणाम को रोक रहा है।

यहाँ जलन्धर की पत्नी का नाम नहीं कहा गया। परिचय के लिये उसकी पतिव्रता निष्ठा पर्याप्त रखी गयी है, क्योंकि आगे उसी व्रत पर घटना घटेगी। प्रभु छल से उसका व्रत भंग करते हैं और देवताओं का काम पूरा होता है। छल का शब्द स्वयं दोहे में है। फिर स्त्री को उस भेद का पता चलता है। वह क्रोध में भगवान् को शाप देती है। दोहे की दो पंक्तियों में देवकार्य की सिद्धि और उस स्त्री का क्रोध, दोनों अपनी पूरी जगह पाते हैं।

छल करि टारेउ तासु ब्रत प्रभु सुर कारज कीन्ह।
जब तेहिं जानेउ मरम तब श्राप कोप करि दीन्ह॥ १२३॥

दोहा १२३

शाप के शब्द यहाँ सुनाये नहीं गये हैं। अगली चौपाई सीधे यह बताती है कि कृपालु हरि ने उस शाप को प्रमाण दिया, उसे स्वीकार किया। प्रभु को उसी जगह लीलाओं का भण्डार भी कहा गया है। देवताओं का काम करने के बाद यह शाप कथा से हटाया नहीं जाता। उसका भी मान रखा जाता है, और अवतार का एक कारण उसी से बनता है। शिवजी कारणों का जो विस्तार सुना रहे हैं, उसमें किसी क्रुद्ध स्त्री का दिया हुआ वचन भी अपना फल पाता है।

तासु श्राप हरि दीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना॥
तहाँ जलंधर रावन भयऊ । रन हति राम परम पद दयऊ॥

चौपाई ३

उसी कल्प में जलन्धर रावण हुआ। राम ने युद्ध में उसका वध किया और परमपद दिया। इसके पहले जय और विजय की कथा में रावण तथा कुम्भकर्ण का जन्म सुना गया था। यहाँ जलन्धर के रावण होने का प्रसंग अपने कल्प के भीतर है। कथा स्वयं यह भेद रखती है। इसी भेद के साथ यह भी खुलता है कि वध के परिणाम का वर्णन कैसे होता है। जलन्धर से जुड़े इस जन्म की कथा परमपद देने पर पूरी होती है।

इसके बाद एक सम्बोधन सुनायी देता है, मुनि से सावधान होकर सुनने का आग्रह। पोद्दारजी की टीका यहाँ भरद्वाज की पहचान कराती है। प्रभु के प्रत्येक अवतार की कथाएँ कवियों ने बहुत प्रकार से कही हैं। शिव और पार्वती के संवाद को सुनाती हुई कथा अपने श्रोता का ध्यान फिर उन अनेक वर्णनों की ओर ले जाती है। अब उन्हीं कारणों में एक ऐसा नाम आयेगा जिसे सुनकर पार्वती चौंक उठेंगी, नारद।

जलन्धर की पत्नी के पतिव्रत से उसकी रक्षा होती है। हरि छल से व्रत भंग करते हैं और उसके दिये शाप को स्वीकार करते हैं। उस कल्प में जलन्धर रावण होता है तथा राम के हाथों वध पाकर परमपद पाता है।

ज्ञानी नारद को मोह कैसे हुआ

शिवजी बताते हैं कि एक बार नारद ने शाप दिया था और एक कल्प में उसके कारण अवतार हुआ। पार्वती चकित होकर पूछती हैं। नारद तो विष्णुभक्त हैं, ज्ञानी भी हैं। उन्होंने किस कारण शाप दिया? लक्ष्मीपति ने उनका कौन सा अपराध किया था? उनके प्रश्न में मुनि के प्रति श्रद्धा बनी हुई है। उसी श्रद्धा के कारण मोह की बात और भी असाधारण लग रही है। जिनके विषय में ज्ञान और भक्ति दोनों निश्चित हैं, उनके मन में यह उलझन कैसे आयी होगी?

महादेव हँसकर उत्तर देते हैं। वे किसी की ज्ञानी या मूर्ख होने की पहचान को सदा के लिये बँधी हुई नहीं मानते। श्रीरघुनाथ जब जिसको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा हो जाता है। पार्वती ने मुनि के ज्ञान से आश्चर्य उठाया था। शिवजी उस आश्चर्य के सामने प्रभु की इच्छा रखते हैं। आगे नारद के साथ जो होनेवाला है, उसे समझने का यह सूत्र कथा शुरू होने से पहले दिया जाता है।

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ।
जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ॥ १२४ ( क )॥

दोहा १२४ (क)

इस उत्तर के बाद श्रोता को फिर सम्बोधन मिलता है। याज्ञवल्क्यजी भरद्वाज को आदर से राम के गुणों की कथा सुनने के लिये कहते हैं, यह पहचान पोद्दारजी की टीका देती है। उसी सोरठे में तुलसीदास अपने को भी पुकारते हैं। मान और मद छोड़कर आवागमन का नाश करनेवाले रघुनाथ का भजन करना है। मुनि के मोह की कथा सुनाने से पहले कवि अपने लिये भी वही सावधानी रख देते हैं जिसकी परीक्षा अब नारद के मन में होगी।

कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु।
भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद॥ १२४ (ख)॥

सोरठा १२४ (ख)

यहाँ सुनानेवाले और सुननेवाले, दोनों का ध्यान साधा जा रहा है। भरद्वाज से आदरपूर्वक सुनने का आग्रह है और तुलसी से अभिमान छोड़ने का। आगे की कथा को पढ़ते हुए हम नारद को केवल दूर खड़ा करके नहीं देख सकते। जिस मान और मद की बात उनके प्रसंग में उठती है, उसी को छोड़ने की बात सोरठा अपने कवि से कहता है। फिर वह सब समझाने के लिये कोई परिभाषा शुरू नहीं करता। सामने हिमालय की एक गुफा और उसके पास बहती गंगा आ जाती हैं।

पार्वती नारद के ज्ञान और भक्ति के कारण उनके मोह पर चकित हैं। शिवजी प्रभु की इच्छा का बल बताते हैं। कथा शुरू होने से पहले भरद्वाज को आदर से सुनने और तुलसी को मान तथा मद छोड़कर रघुनाथ का भजन करने का सम्बोधन मिलता है।

पर्वत की गुफा और इन्द्र का भय

हिमालय में एक अत्यन्त पवित्र गुफा है। पास ही सुन्दर गंगा बहती हैं। उस पावन, सुहावने आश्रम को देखकर देवर्षि का मन प्रसन्न होता है। पर्वत, नदी और वन का दृश्य देखते हुए उनके भीतर लक्ष्मीपति के चरणों का अनुराग उठता है। दृश्य से स्मरण तक का यह क्रम बहुत सहज है। आसपास की शोभा नारद को प्रिय के चरणों की याद दिलाती है, और उसी स्मरण में उनका स्वभावतः निर्मल मन समाधि में लग जाता है।

निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा॥
सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी॥

चौपाई ४

इस चौपाई में शाप की गति रुकने का भी उल्लेख है। यह नारद के दिये हुए उस शाप से अलग बात है जिसका कारण पार्वती ने पूछा है। पोद्दारजी की टीका बताती है कि दक्ष प्रजापति के दिये शाप के कारण नारद एक स्थान पर ठहर नहीं सकते थे। हरि का स्मरण करते ही उस शाप की गति रुक गयी। इसलिए गुफा के निकट मुनि का यह ठहरना भी भगवान् के स्मरण से जुड़ा है। यहाँ मन निर्मल है, चरणों में अनुराग है और समाधि बिना किसी संघर्ष के लग गयी है।

मुनि की यह स्थिति देखकर इन्द्र डर जाते हैं। वे कामदेव को बुलाते हैं, उनका आदर करते हैं और अपने हित के लिये सहायकों सहित जाने को कहते हैं। कामदेव हृदय में प्रसन्न होकर चल पड़ते हैं। उधर नारद के ध्यान का विषय लक्ष्मीपति के चरण हैं। इधर इन्द्र के मन में यह आशंका है कि देवर्षि उनकी पुरी का राज्य चाहते हैं। एक ही तप को देखने की ये दो दिशाएँ कथा ने पास पास रखी हैं। नारद के मन की बात पाठक पहले जान चुका है, इसलिये इन्द्र का डर कहाँ से उठा, यह पहचान सकता है।

तुलसी फिर उस डर पर ठहरते हैं। संसार के कामी और लोभी लोग कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं। इसके बाद एक और चित्र आता है, सूखी हड्डी लेकर भागता हुआ मूर्ख कुत्ता। वह सिंह को देखकर डरता है कि कहीं सिंह उसकी हड्डी न छीन ले। जो वस्तु उसके अपने लिये इतनी मूल्यवान है, उसी के लोभ से वह सामनेवाले को भी भरा हुआ मान लेता है। दोहे में इन्द्र की आशंका इसी चित्र से समझायी गयी है।

सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।
छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहि न लाज॥ १२५॥

दोहा १२५

नारद ने इन्द्र से कुछ माँगा नहीं है। राज्य पाने की कोई इच्छा उनके मन में इस समय नहीं कही गयी। फिर भी इन्द्र अपने पद को ख़तरे में समझकर कामदेव को भेज चुके हैं। उनकी दृष्टि अपनी आशंका से भर गयी है। इसीलिये सूखी हड्डी का चित्र इतना सटीक बैठता है। किसी दूसरे का ध्यान देखकर भी अपने ही संग्रह की चिन्ता उठना, यही इन्द्र के भय का स्वरूप है। आगे कामदेव मुनि की समाधि को डिगाने पहुँचेंगे, पर उनके इस अभियान की जड़ देवराज के भीतर उठी वही आशंका है।

हिमालय के आश्रम में हरिस्मरण से नारद की समाधि लगती है। इन्द्र को अपने राज्य की चिन्ता होती है और वे कामदेव को भेजते हैं। तुलसी इस भय को उस कुत्ते के भ्रम से समझाते हैं जो सिंह से अपनी सूखी हड्डी बचाकर भागता है।

वसन्त का सारा विस्तार, समाधि की अडिग शान्ति

कामदेव आश्रम में पहुँचकर अपनी माया से वसन्त रचते हैं। नाना वृक्षों पर रंग बिरंगे फूल खिल उठते हैं। कोयलें कूकती हैं, भौंरे गुंजार करते हैं। गुफा और नदी वाले उसी प्रदेश में अब कामदेव की चेष्टा अपना वातावरण बना रही है। फूल, स्वर और हवा, सबको मुनि की समाधि भंग करने के प्रयोजन में लगाया गया है। पहले वन की शोभा देखकर नारद के मन में भगवान् का अनुराग जगा था। अब शोभा को ही उनके मन को दूसरी ओर ले जाने का साधन बनाया जा रहा है।

तीन प्रकार की सुहावनी हवा चलती है। टीका उसके तीन गुण शीतलता, मन्द गति और सुगन्ध बताती है। चौपाई कहती है कि वह काम की अग्नि बढ़ानेवाली है। रम्भा आदि तरुण देवाङ्गनाएँ भी आती हैं, सभी कामकला में प्रवीण। वे अनेक तानों में गाती हैं और हाथ में गेंद लेकर तरह तरह के खेल करती हैं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर प्रसन्न होते हैं और बहुत प्रकार के प्रपंच रचते हैं। प्रयास में विविधता है, हर ओर से मन को आकर्षित करने की चेष्टा है।

इतना विस्तार दिखाने के बाद तुलसी परिणाम एकदम स्पष्ट कह देते हैं। कामदेव की कोई कला मुनि को नहीं व्यापती। तब कामदेव अपने ही भय से डर जाते हैं। सारी तैयारी मुनि को डिगाने के लिये थी, और अब असफल होकर आया हुआ दल स्वयं भयभीत है। उस भय के आगे चौपाई नारद की रक्षा का कारण भी रख देती है। जिसके बड़े रक्षक लक्ष्मीपति हों, उसकी मर्यादा को कौन दबा सकता है?

काम कला कछु मुनिहि न ब्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी॥
सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू । बड़ रखवार रमापति जासू॥

चौपाई ५

रक्षा का यह कारण याद रखिये। अभी नारद के मन में अपनी कामविजय का अभिमान नहीं बताया गया है। चौपाई उनकी अडिग स्थिति के पीछे रमापति को रखवाला कहती है। कामदेव सहायकों सहित बहुत डरकर मन में हार मान लेते हैं। फिर आर्त वचन कहते हुए मुनि के चरण पकड़ते हैं। अपनी माया के वसन्त से शुरू हुआ उनका आगमन अन्त में शरण माँगने तक पहुँच गया है। देवर्षि के सामने अब किसी प्रयोग का प्रभाव सिद्ध करना शेष नहीं, भय से छुटकारा पाने की प्रार्थना है।

भयउ न नारद मन कछु रोषा । कहि प्रिय बचन काम परितोषा॥
नाइ चरन सिरु आयसु पाई । गयउ मदन तब सहित सहाई॥

चौपाई ६

नारद के मन में कुछ भी रोष नहीं उठता। वे प्रिय वचन कहकर कामदेव को सन्तुष्ट करते हैं। आया हुआ विघ्न उन्हें क्रोध में भी नहीं डाल सका। कामदेव चरणों में सिर नवाते हैं, आज्ञा लेते हैं और अपने सहायकों के साथ लौट जाते हैं। इस विदाई में मुनि की सुशीलता पूरी तरह प्रकट है। जिस घबराहट में उन्होंने चरण पकड़े थे, उसके उत्तर में उन्हें स्नेहपूर्ण वचन मिले हैं।

इन्द्र की सभा में पहुँचकर कामदेव अपनी करतूत और मुनि की सुशीलता, दोनों का वर्णन करते हैं। सबके मन में आश्चर्य होता है। वे नारद की प्रशंसा करके श्रीहरि को सिर नवाते हैं। दोनों को कथा ने इसी क्रम में रखा है, साधु के गुण की बड़ाई और फिर प्रभु को प्रणाम। इसके बाद नारद स्वयं शिवजी के पास जाते हैं। उसी स्थान पर पहली बार साफ़ कहा जाता है कि कामदेव को जीत लेने का अहंकार उनके मन में आया है। विजय के बाद मन के भीतर एक नया प्रश्न उठ खड़ा हुआ है।

कामदेव वसन्त, संगीत और देवाङ्गनाओं की चेष्टाओं से समाधि भंग नहीं कर पाते। श्रीहरि की रक्षा से नारद अडिग रहते हैं और भयभीत कामदेव को बिना क्रोध किये विदा करते हैं। देवसभा में उनकी सुशीलता की प्रशंसा होती है; फिर उनके मन में कामविजय का अभिमान आता है।

शिव की सीख, जिसे नारद सुनकर भी नहीं मानते

नारद शिवजी के पास पहुँचकर कामदेव का सारा चरित्र सुनाते हैं। घटना सच्ची है, कामदेव हारे हैं और मुनि अविचल रहे हैं। अब उसे कहनेवाले के मन में यह अहंकार है कि हमने काम को जीत लिया। शिवजी नारद को अत्यन्त प्रिय जानते हैं। उसी प्रियता के कारण वे सीख देते हैं। सीख सुनने से पहले तुलसी उसका यह कारण कह देते हैं, जिससे महादेव के वचनों में छिपी मुनि के हित की चिन्ता स्पष्ट रहे।

बार बार बिनवउँ मुनि तोही । जिमि यह कथा सुनायहु मोही॥
तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ । चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ॥

चौपाई ७

महादेव बार बार विनती करते हैं। जिस तरह यह कथा मुझे सुनायी है, उसी तरह श्रीहरि को कभी मत सुनाइये। प्रसंग चल भी पड़े तो इसे छिपा जाइये। इतनी विशेष सीख है कि अवसर अपने आप आ जाने की छूट भी नहीं छोड़ी गयी। अभिमान से भरी इस कथा को दोबारा कहने का अवसर आये तो भी संयम चाहिये। नारद को यह बात अच्छी नहीं लगती। उपदेश हित के लिये दिया गया है, फिर भी मन में उसे स्वीकार करने की रुचि नहीं होती।

दोहा यहीं भरद्वाज का ध्यान फिर खींचता है और हरि की इच्छा को बलवान बताता है। अगली चौपाई उस बात को और स्पष्ट करती है। श्रीराम जो करना चाहते हैं, वही होता है; ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके। कथा के आरम्भ में पार्वती को यही बात बतायी गयी थी कि प्रभु जिसको जैसा करते हैं वह उसी क्षण वैसा हो जाता है। अब नारद के मन में हित की सीख न भाने के अवसर पर वह बात फिर आती है।

शिवजी के वचन अच्छे न लगने पर नारद ब्रह्मलोक चले जाते हैं। वहाँ की किसी बातचीत का विस्तार नहीं दिया गया। उसके बाद एक बार वे हाथ में सुन्दर वीणा लिये हरि के गुण गाते हुए क्षीरसागर जाते हैं। उनके गान का कौशल और हरिगुणों में लगा हुआ स्वर, दोनों साथ आते हैं। अभिमान की उपस्थिति के बीच उनकी भक्ति का परिचय बना रहता है। पार्वती ने जिस विष्णुभक्त नारद के मोह पर आश्चर्य किया था, वही भक्त अपने भगवान् से मिलने पहुँचे हैं।

लक्ष्मीपति उठकर हर्ष के साथ मिलते हैं और मुनि को साथ आसन पर बैठाते हैं। हँसकर कहते हैं कि आज बहुत दिनों के बाद दया की। इस स्नेहपूर्ण स्वागत के बीच नारद कामदेव की पूरी घटना सुना देते हैं, जबकि शिवजी पहले ही मना कर चुके थे। तुलसी फिर रघुपति की माया को अत्यन्त प्रबल कहते हैं और पूछते हैं कि जगत् में ऐसा कौन जन्मा है जिसे वह मोह में न डाल सके। जिस चेतावनी को मुनि ने अप्रिय जाना था, अब ठीक वही बात उनके सामने घट रही है।

नारद को प्रिय मानकर शिवजी बार बार कहते हैं कि कामविजय की कथा इस तरह श्रीहरि को न सुनायें। नारद को सीख अच्छी नहीं लगती। बाद में क्षीरसागर पहुँचकर वे भगवान् के स्वागत के बीच वही चरित्र कह सुनाते हैं।

कोमल वचन और गर्व के वृक्ष का अंकुर

नारद की बात सुनकर भगवान् रूखा मुँह करते हैं और मृदु वचन बोलते हैं। मुख की मुद्रा और वाणी का गुण अलग अलग बताया गया है। उनके शब्दों में नारद की महिमा है। मुनि का स्मरण करने से दूसरों के मोह, काम, मद और मान मिटते हैं। फिर वे कहते हैं कि मोह उस मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान और वैराग्य नहीं है। नारद तो ब्रह्मचर्यव्रत में रत और धीरबुद्धि हैं, उन्हें कामदेव कैसे पीड़ा दे सकता है?

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान।
तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह मार मद मान॥ १२८॥

दोहा १२८

इस उत्तर को सुनते समय भगवान् की रूखी मुखमुद्रा भी साथ दिखाई देती है। तुलसी उसे कोमल वचनों के ठीक पहले रखते हैं। आगे नारद का जवाब आता है, यह सब भगवान् की कृपा है। शब्दों में विजय का श्रेय प्रभु को दिया गया है, और कथावाचक साफ़ बताते हैं कि यह बात अभिमान सहित कही गयी। इसीलिये केवल उस उत्तर के विनम्र शब्द पढ़ लेने से मुनि की पूरी स्थिति नहीं खुलती। शब्दों के साथ उनके मन की दशा भी कही गयी है।

नारद कहेउ सहित अभिमाना । कृपा तुम्हारि सकल भगवाना॥
करुनानिधि मन दीख बिचारी । उर अंकुरेउ गरब तरु भारी॥

चौपाई ८

करुणानिधान अपने मन में विचारकर देखते हैं कि नारद के हृदय में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है। अंकुर अभी आरम्भ की चीज़ है, भारी वृक्ष उसका सम्भव विस्तार। प्रभु उसे तत्काल उखाड़ फेंकने का संकल्प करते हैं। इस संकल्प का कारण भी स्वयं कहते हैं, सेवक का हित करना उनका प्रण है। वे ऐसा उपाय करेंगे जिसमें मुनि का कल्याण हो और अपनी लीला भी हो। आगे आनेवाले नगर का प्रयोजन यहीं बता दिया गया है।

अब तक मुनि के लिये सहायता दो रूपों में आयी है। शिवजी ने उन्हें प्रिय जानकर रोकने की सीख दी थी। भगवान् उनके भीतर के गर्व को देखकर उसे दूर करने का उपाय सोचते हैं। दोनों जगह हित कहा गया है। मुनि को शिवजी की सीख अच्छी नहीं लगी थी; यहाँ से भी वे चरणों में सिर नवाकर उठते हैं तो हृदय का अभिमान और बढ़ा हुआ है। प्रणाम करने की क्रिया और मन में गर्व बढ़ने का समाचार साथ साथ आता है।

श्रीहरि तब अपनी माया को प्रेरित करते हैं। कथा उसकी कठिन करनी सुनने के लिये कहती है। पहले कामदेव अपनी माया लेकर आये थे और मुनि को नहीं डिगा सके थे। उस समय रक्षा का कारण लक्ष्मीपति को बताया गया था। अब वही लक्ष्मीपति सेवक के हित के लिये अपनी माया को प्रेरणा दे रहे हैं। इस क्रम को ध्यान में रखने से आगे का मोह पहले की समाधि से जुड़ा रहता है। मुनि की रक्षा और उनके गर्व को उखाड़ने का संकल्प, दोनों उसी प्रभु के हाथ में हैं।

नारद कृपा का नाम लेते हैं, पर भीतर अभिमान बना है। भगवान् उसे गर्व के वृक्ष का अंकुर पहचानते हैं और सेवक के हित के अपने प्रण से उखाड़ने का उपाय सोचते हैं। नारद के चले जाने पर वे अपनी माया को प्रेरित करते हैं।

सौ योजन का नगर और एक राजकुमारी

माया नारद के रास्ते में सौ योजन विस्तार का नगर रचती है। उसकी नाना प्रकार की रचनाएँ श्रीनिवास के नगर से भी अधिक सुन्दर कही गयी हैं। इतनी बड़ी रचना मुनि के मार्ग में अचानक सामने आती है। उसमें रहनेवाले नर और नारी ऐसे रूपवान हैं मानो अनेक कामदेव और रति शरीर धारण करके बस गये हों। नगर का रूप ही पहले परिचय में आता है, फिर उसके राजा का वैभव खुलता है।

बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन बिस्तार।
श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार॥ १२९॥

दोहा १२९

उस नगर में शीलनिधि राजा रहते हैं। घोड़े, हाथी और सेना के समूह अगणित हैं। राजा का वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान है। वे रूप, तेज, बल और नीति के निवास कहे गये हैं। उनकी कन्या का नाम विश्वमोहिनी है। उसका रूप देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायें, ऐसा उसका सौन्दर्य कहा गया है। अगली चौपाई उसकी पहचान साफ़ कर देती है, वह सब गुणों की खान हरि की माया ही है। इतनी शोभा का वर्णन कैसे हो, यह कहकर कथा स्वयं उसकी व्यापकता बताती है।

राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती है और वहाँ अगणित राजा आये हैं। नारद कौतूहल से नगर में जाते हैं, नगरवासियों से सारा हाल पूछते हैं और समाचार जानकर राजभवन पहुँचते हैं। शीलनिधि उनका पूजन करते हैं, आदर से बैठाते हैं। फिर राजकुमारी को सामने लाकर मुनि से कहते हैं कि हृदय में विचारकर इसके सब गुण और दोष बताइये। ज्ञानी के सामने एक विचार का काम रखा गया है। कन्या के लक्षण देखकर उन्हें राजा को अपना निष्कर्ष सुनाना है।

रूप देखते ही मुनि वैराग्य भूल जाते हैं। देर तक देखते रहते हैं। फिर उसके लक्षण देखकर स्वयं को भूल जाते हैं और मन में हर्षित होते हैं। जो राजा के पूछने पर प्रकट रूप में बताना था, उसे अब भीतर रख लेते हैं। इस बदलाव में रूप देखकर वैराग्य भूलना पहले आता है, फिर देर तक देखते रहना और लक्षणों को अपने हृदय में छिपा लेना। चौपाई मुनि के भीतर उठते मोह को उनकी इन्हीं क्रियाओं से दिखाती है।

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी । बड़ी बार लगि रहे निहारी॥
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने । हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने॥

चौपाई ९

उन लक्षणों को देखकर नारद मन में सोचते हैं कि जो इसे ब्याहेगा वह अमर होगा, रणभूमि में उसे कोई जीत नहीं सकेगा, और चराचर के सब जीव उसकी सेवा करेंगे। यह उस समय मुनि के मन में चल रहा विचार है। राजा के सामने वे इसे पूरा नहीं कहते। सारे लक्षण हृदय में रख लेते हैं और कुछ अपनी ओर से बनाकर बोल देते हैं। कन्या को सुलक्षण कहकर वहाँ से चल पड़ते हैं। बाहर कही गयी बात और भीतर रखी हुई बात का अन्तर अब विवाह की अपनी इच्छा से जुड़ गया है।

नारद का विचार है कि जाकर ऐसा उपाय सोचा जाये जिससे राजकुमारी उन्हीं को वरे। अब उनके लिये प्रश्न कन्या के गुण दोष बताने का नहीं रह गया। अपना वरण कैसे हो, इसी चिन्ता में वे लग गये हैं। उस समय जप और तप से काम बनता नहीं दिखता। वे विधाता को पुकारकर पूछते हैं कि कन्या कैसे मिलेगी। यह व्यग्रता उसी मुनि के भीतर है जिसके निर्मल मन में हिमालय के आश्रम में सहज समाधि लगी थी।

अन्त में दोहे में उनकी तत्काल आवश्यकता स्पष्ट होती है। इस अवसर पर परम शोभा और अत्यन्त सुन्दर रूप चाहिये। राजकुमारी उसे देखकर रीझेगी, तभी जयमाला डालेगी। मन का सारा विचार अब अपने रूप को उस एक दृष्टि के योग्य बनाने पर आ गया है। अभी कोई जयमाला पड़ी नहीं है। मुनि के मन में उसका दृश्य है और उस दृश्य तक पहुँचने का साधन खोजा जा रहा है।

एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल।
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल॥ १३१॥

दोहा १३१

हरिमाया के रचे नगर में नारद विश्वमोहिनी को देखते हैं और वैराग्य भूल जाते हैं। उसके लक्षणों का विचार भीतर रखकर वे राजा से केवल सुलक्षण होने की बात कहते हैं। फिर ऐसा सुन्दर रूप पाने की चिन्ता में लगते हैं जिससे राजकुमारी उन्हें वरे।

और अन्त में, अपनी ओर

इस कथा में नारद की कामविजय और कामदेव के प्रति उनकी सुशीलता पूरी तरह सामने आयी है। मुनि डिगे नहीं थे, क्रुद्ध भी नहीं हुए थे। उसी सफलता के बाद अपने को विजेता मानने का भाव उठता है। हम इस क्रम पर ठहरें तो अभिमान की जगह पहचान सकते हैं। वह किसी झूठी उपलब्धि पर ही नहीं टिकता। सच्ची साधना के फल को अपना मान लेने पर भी उठ सकता है। मुनि की रक्षा के लिये पहले प्रभु को रखवाला कहा गया था; बाद में उस विजय को सुनाते समय मन में अपना मान बढ़ रहा है।

शिवजी की सीख भी इसी जगह ध्यान माँगती है। वे नारद को प्रिय जानकर विनती करते हैं, और मुनि को वह हितकारी बात भाती नहीं। कथा में किसी सलाह का अच्छा न लगना, उसके अहितकारी होने का प्रमाण नहीं बनता। यहाँ सीख का प्रेम और सुननेवाले की अरुचि, दोनों हमें स्पष्ट बताये गये हैं। अपने किसी सफल क्षण के बाद हम ऐसी बात सुनें जो मन की प्रशंसा न करे, तो नारद की यह घड़ी स्मरण रखने योग्य है।

श्रीहरि का संकल्प सेवक के हित का है। इसी बात को सामने रखकर विश्वमोहिनी के नगर तक आयी कथा पढ़ी जाती है। गर्व के वृक्ष को उन्होंने अंकुर में पहचान लिया है, पर मुनि को अभी अपनी अभिलाषा का ही पता है। पाठक प्रभु का संकल्प सुन चुका है और मुनि की व्यग्रता भी देख रहा है। दोहे के अन्त तक दोनों बातें साथ बनी रहती हैं, उधर कल्याण का उपाय आरम्भ हो चुका है, इधर राजकुमारी को पाने के लिये रूप की चिन्ता बढ़ रही है।

पार्वती ने नारद के मोह का कारण पूछा था। उसके उत्तर में शिवजी मुनि की भक्ति, समाधि, विजय, अभिमान और फिर जागती हुई विवाह की अभिलाषा तक ले आये हैं। अभी शाप देने की घड़ी नहीं आयी है। कथा यहाँ उस इच्छा पर ठहरती है जिसमें नारद चाहते हैं कि राजकुमारी उन्हें देखकर रीझे और जयमाला डाले। कामदेव को सान्त्वना देकर विदा करनेवाले मुनि अब अपनी ही आकांक्षा का उपाय सोच रहे हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १२१ से १३१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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