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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 14
अवतार के कारण, नारद का अभिमान और विश्वमोहिनी
जिनकी समाधि कामदेव भी नहीं डिगा सके, वही नारद एक राजकुमारी का रूप देखकर वैराग्य भूल जाते हैं। बीच में शिव की सीख है और विष्णु का अपने सेवक के हित का प्रण।
कामदेव हार मानकर नारद के चरण पकड़ लेता है, और उसके सहायक भी डरे हुए हैं, पर नारद के मन में तनिक क्रोध नहीं उठता। वे प्रिय वचनों से उसे आश्वस्त करके विदा कर देते हैं। इस विजय के बाद नारद के मन में जो बात उठती है, वही इस कथा की अगली उलझन बनती है। काम पर विजय मिली है, और अब उस विजय का अभिमान होने लगा है। शिव उनके हित की सीख देते हैं, और विष्णु नारद के हृदय में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पहचान लेते हैं।
यह कथा पार्वती के एक आश्चर्य से खुलती है। वे सुनती हैं कि नारद के शाप के कारण भी एक कल्प में भगवान ने अवतार लिया था। विष्णु के भक्त, ज्ञानी नारद ने शाप किस कारण दिया? उत्तर में शिव पहले नारद की समाधि दिखाते हैं, फिर कामदेव की हार, और अन्त में वह राजकुमारी जिसके सामने नारद अपना वैराग्य भूल जाते हैं। उससे पहले वे अवतार के दो और कारण सुनाते हैं, और हर कारण को एक कल्प की कथा बताते हैं।
नारद के इर्दगिर्द कौन कौन
- शिव और पार्वती अवतार के कारणों पर बात करते हैं। नारद के दिये शाप की बात सुनकर पार्वती चकित होती हैं और पूछती हैं कि उन्होंने शाप क्यों दिया।
- विष्णु जो भक्तों के हित के लिये शरीर धारण करते हैं। क्षीरसागर में वे नारद के भीतर उठते गर्व को दूर करने का उपाय सोचते हैं।
- नारद भगवान के गुण गानेवाले मुनि, जिनकी कामविजय के बाद यह कथा अभिमान और मोह तक पहुँचती है।
- इन्द्र और कामदेव इन्द्र अपनी पुरी के लिये डरते हैं। वे कामदेव को नारद के पास भेजते हैं।
- शीलनिधि और विश्वमोहिनी विष्णु की माया के रचे नगर के राजा और राजकुमारी। विश्वमोहिनी के स्वयंवर में अगणित राजा आये हैं।
अवतार का कारण कितना कहा जा सकता है
शिव पार्वती से कहते हैं कि वेद और शास्त्र भगवान के सुन्दर, विस्तृत और निर्मल चरित्र गाते आये हैं। फिर कारण बताने से पहले वे कहते हैं कि भगवान का अवतार जिस कारण होता है, उसके विषय में यह नहीं कहा जा सकता कि बस, यही कारण है।
शिव अपना मत बताते हैं, पार्वती को सयानी कहकर: राम बुद्धि, मन और वाणी के तर्क से परे हैं। फिर भी सन्त, मुनि, वेद और पुराण अपनी समझ के अनुसार जो कहते हैं, और जितना शिव स्वयं समझते हैं, उतना वे कहेंगे।
पहले वह पीड़ा आती है जिसके लिये भगवान शरीर धारण करते हैं। धर्म की हानि होती है, नीच और अभिमानी असुर बढ़ जाते हैं, और उनका अन्याय इतना होता है कि कहा नहीं जा सकता। ब्राह्मण, गौ, देवता और पृथ्वी कष्ट पाते हैं। तब कृपालु भगवान तरह तरह के शरीर धारण करके सज्जनों की पीड़ा हरते हैं।
अवतार के तीन काम हैं: असुरों का नाश, देवताओं की स्थापना और वेद की मर्यादा की रक्षा। और एक चौथा भी, जगत में निर्मल यश का फैलना। फिर उस यश का क्या होता है: भक्त उसे गाकर भवसागर से पार हो जाते हैं। और भगवान भक्तों के हित के लिये ही शरीर धारण करते हैं।
फिर शिव कहते हैं कि राम के जन्म के अनेक कारण हैं, एक से एक विचित्र, और वे उनमें से दो एक जन्मों का विस्तार सुनायेंगे। पार्वती सावधान होकर सुनें।
जय और विजय, शाप की तीन जन्मों की अवधि
पहली कथा विष्णु के दो प्रिय द्वारपालों की है, जय और विजय। दोनों भाई ब्राह्मण के शाप से असुरों के तामसी शरीर पाते हैं। शाप देनेवाले ब्राह्मण थे, और पोद्दार की टीका उन्हें सनकादि बताती है। शाप के समय क्या हुआ था, इसका विस्तार यहाँ नहीं है। वही प्रिय द्वारपाल अब ऐसे वीर असुर हैं जो इन्द्र का गर्व उतार देते हैं।
पोद्दार की टीका के अनुसार उनके नाम हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष थे। दोनों युद्ध में विजयी और संसार में प्रसिद्ध हैं। भगवान वराह का शरीर धारण करके हिरण्याक्ष को मारते हैं। फिर नरसिंह रूप में वे हिरण्यकशिपु को मारते हैं और अपने भक्त प्रह्लाद का यश फैलाते हैं।
वही दोनों आगे कुम्भकर्ण और रावण हुए, फिर बलवान, महावीर और देवताओं को जीतनेवाले योद्धा। भगवान के हाथों मारे जाने के बाद भी यह दूसरा जन्म क्यों आया, इसका उत्तर भी कथा देती है: ब्राह्मण के शाप में तीन जन्मों की अवधि थी। इसलिये पहले वध के बाद उनकी मुक्ति नहीं हुई।
भक्तों से प्रेम रखनेवाले भगवान एक बार फिर उन्हीं दोनों के कल्याण के लिये शरीर धारण करते हैं। जो अभी देवताओं को जीतनेवाले निशाचर कहे गये थे, उनके लिये भी अवतार का प्रयोजन उनका हित है।
इस अवतार में कश्यप और अदिति माता पिता होते हैं, जो दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्ध हैं। शिव इसे एक कल्प का अवतार बताते हैं, जिसमें भगवान ने संसार में पवित्र लीलाएँ कीं। आगे रावण के विषय में एक और कारण आयेगा, और वह भी एक कल्प की कथा है।
जलन्धर की कथा और स्वीकार किया हुआ शाप
दूसरी कथा भी एक कल्प की है और जलन्धर नाम के दैत्य से शुरू होती है। देवता उससे युद्ध में हारकर दुखी हैं। उनका दुख देखकर शिव स्वयं उससे घोर युद्ध करते हैं, पर वह महाबली दैत्य मारे नहीं मरता। कारण यह है कि उसकी पत्नी परम पतिव्रता है, और उसी के प्रताप से शिव उसे जीत नहीं पाते।
यहाँ जलन्धर की पत्नी का नाम नहीं आता। उसका परिचय उसकी पतिव्रता निष्ठा ही है, और अगली घटना उसी व्रत पर घटती है। भगवान छल से उसका व्रत भंग करते हैं, और देवताओं का काम पूरा होता है। कथा स्वयं इसे छल कहती है। जब स्त्री को यह भेद पता चलता है, तो वह क्रोध करके भगवान को शाप देती है।
शाप के शब्द यहाँ नहीं सुनाये गये। इतना बताया जाता है कि कृपालु भगवान ने, जो लीलाओं के भण्डार हैं, उस शाप को स्वीकार किया। यही शाप अवतार का एक कारण बनता है।
वहीं जलन्धर रावण हुआ, जिसे राम ने युद्ध में मारकर परमपद दिया।
फिर एक मुनि को सुनने को कहा जाता है। पोद्दार की टीका बताती है कि ये भरद्वाज हैं, जिन्हें आगे याज्ञवल्क्य स्वयं नाम से पुकारते हैं। भगवान के हर अवतार की कथा कवियों ने बहुत प्रकार से कही है। और अब उन्हीं कारणों में एक ऐसा नाम आता है जिसे सुनकर पार्वती चौंक उठती हैं, नारद।
ज्ञानी नारद को मोह कैसे हुआ
शिव बताते हैं कि एक बार नारद ने शाप दिया था, और एक कल्प में उसके कारण अवतार हुआ। यह सुनकर पार्वती चकित होती हैं और पूछती हैं: नारद तो विष्णु के भक्त हैं, ज्ञानी भी हैं। उन्होंने शाप किस कारण दिया? विष्णु ने उनका कौन सा अपराध किया था? यह कथा मुझे सुनाइये। नारद के मन में मोह होना बड़े आश्चर्य की बात है। पोद्दार की टीका ये वचन पार्वती के बताती है।
शिव हँसकर उत्तर देते हैं कि न कोई ज्ञानी है, न मूर्ख। राम जब जिसे जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा हो जाता है। यह उत्तर कथा से पहले आता है, और आगे की कथा इसी को दिखाती है।
इस उत्तर के बाद श्रोता को फिर पुकारा जाता है। याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कहते हैं कि वे राम के गुणों की कथा कहते हैं, आदर से सुनिये। यह पहचान पोद्दार की टीका देती है। फिर तुलसीदास कहते हैं कि जन्म मरण का चक्र मिटानेवाले राम को भजिये, मान और मद छोड़कर। पोद्दार की टीका यह बात तुलसीदास की बताती है।
जिस मद और मान को आगे विष्णु नारद के स्मरण से मिटनेवाला कहेंगे, उसी जोड़ी को छोड़ने की बात कथा से पहले ही कह दी जाती है। और फिर, बिना कोई परिभाषा दिये, सामने हिमालय की एक गुफा और उसके पास बहती गंगा आ जाती हैं।
पर्वत की गुफा और इन्द्र का भय
हिमालय में एक बहुत पवित्र गुफा है, और पास ही गंगा बहती हैं। उस पावन, सुहावने आश्रम को देखकर नारद का मन प्रसन्न होता है। पर्वत, नदी और वन देखते हुए उनके भीतर विष्णु के चरणों का प्रेम उठता है। उसी स्मरण में उनका स्वभाव से निर्मल मन समाधि में लग जाता है।
यहाँ एक शाप की गति रुकने की बात भी है, और यह उस शाप से अलग है जिसका कारण पार्वती ने पूछा है। पोद्दार की टीका बताती है कि दक्ष प्रजापति के शाप के कारण नारद कहीं एक जगह ठहर नहीं सकते थे। विष्णु का स्मरण करते ही उस शाप की गति रुक गयी। इसलिये गुफा के पास नारद का ठहरना भी भगवान के स्मरण से जुड़ा है।
नारद की यह दशा देखकर इन्द्र डर जाते हैं। वे कामदेव को बुलाकर उसका आदर करते हैं और उसे सहायकों सहित अपने लिये भेजते हैं। कामदेव मन में प्रसन्न होकर चल पड़ता है। इन्द्र के मन में डर यह है कि नारद उनकी पुरी में बसना चाहते हैं। नारद का मन विष्णु के चरणों में है, और इन्द्र उसे अपनी पुरी की चाह समझ बैठते हैं।
कथा उस डर पर ठहरती है। संसार के कामी और लोभी लोग कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं। और फिर एक चित्र: मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागता है, यह सोचकर कि कहीं सिंह उसकी हड्डी न छीन ले।
वैसे ही इन्द्र को ऐसा सोचते लाज नहीं आयी।
वसन्त का सारा विस्तार, समाधि की अडिग शान्ति
कामदेव आश्रम में पहुँचकर अपनी माया से वसन्त रचता है। तरह तरह के पेड़ों पर रंग बिरंगे फूल खिल उठते हैं, कोयलें कूकती हैं, भौंरे गुंजार करते हैं।
तीन प्रकार की सुहावनी हवा चलती है, जिसे टीका शीतल, मन्द और सुगन्धित बताती है। वह काम की आग भड़कानेवाली है। रम्भा आदि तरुण अप्सराएँ आती हैं, सब कामकला में निपुण। वे अनेक तानों में गाती हैं और हाथ में गेंद लेकर तरह तरह के खेल खेलती हैं। कामदेव अपने इन सहायकों को देखकर प्रसन्न होता है और बहुत प्रकार के मायाजाल रचता है।
पर परिणाम साफ़ है: कामदेव की कोई कला नारद पर असर नहीं करती। तब कामदेव अपने ही भय से डर जाता है, जिसे टीका नाश का भय बताती है। और कथा नारद की रक्षा का कारण भी रख देती है: जिसके बड़े रखवाले विष्णु हों, उसकी मर्यादा को कौन दबा सकता है?
यह कारण कामदेव की कला विफल होने के ठीक बाद आता है, और नारद के अभिमान की बात से पहले। कामदेव अपने सहायकों सहित बहुत डरकर मन में हार मान लेता है, और दीन वचन कहते हुए नारद के चरण पकड़ लेता है। अपनी माया के वसन्त से शुरू हुआ उसका आना मुनि के चरण पकड़ने पर पूरा होता है।
नारद के मन में कुछ भी क्रोध नहीं आता। वे प्रिय वचन कहकर कामदेव को सन्तुष्ट करते हैं। कामदेव उनके चरणों में सिर नवाता है, आज्ञा लेता है और अपने सहायकों के साथ लौट जाता है।
इन्द्र की सभा में पहुँचकर कामदेव नारद का शील और अपनी करतूत, दोनों सुनाता है। सबके मन में आश्चर्य होता है, और वे नारद की बड़ाई करके विष्णु को सिर नवाते हैं। इसके बाद नारद स्वयं शिव के पास जाते हैं। यहीं कहा जाता है कि कामदेव को जीत लेने का अहंकार उनके मन में आ गया है।
शिव की सीख, जिसे नारद सुनकर भी नहीं मानते
नारद शिव के पास पहुँचकर कामदेव का सारा हाल सुनाते हैं। घटना सच्ची है, कामदेव हारा है और नारद अडिग रहे हैं। पर अब कहनेवाले के मन में यह अहंकार है कि हमने काम को जीत लिया। शिव नारद को बहुत प्रिय मानते हैं, और इसी प्रेम से उन्हें सीख देते हैं।
शिव बार बार विनती करते हैं: जिस तरह यह कथा आपने मुझे सुनायी है, उस तरह विष्णु को कभी मत सुनाइयेगा। बात चल भी पड़े, तब भी इसे छिपा जाइयेगा। पर नारद को यह सीख अच्छी नहीं लगती। सीख उनके हित के लिये है, फिर भी मन उसे नहीं मानता।
याज्ञवल्क्य यहीं भरद्वाज से कहते हैं कि अब तमाशा सुनिये, भगवान की इच्छा बड़ी बलवान है। राम जो करना चाहते हैं, वही होता है। ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके। कथा शुरू होने से पहले शिव ने पार्वती से कहा था कि राम जिसे जैसा करते हैं, वह वैसा हो जाता है। अब नारद को हित की सीख न भाने पर उसी आशय की बात आती है।
शिव के वचन अच्छे न लगने पर नारद ब्रह्मलोक चले जाते हैं। वहाँ की किसी बात का विस्तार नहीं है। फिर एक बार वे हाथ में वीणा लिये, भगवान के गुण गाते हुए क्षीरसागर जाते हैं, जहाँ विष्णु रहते हैं।
विष्णु उठकर बड़े आनन्द से उनसे मिलते हैं और उन्हें अपने साथ आसन पर बिठाते हैं। हँसकर कहते हैं, मुनि, आज आपने बहुत दिनों बाद दया की। इस स्नेह भरे स्वागत के बीच नारद कामदेव की पूरी घटना सुना देते हैं, यद्यपि शिव पहले ही मना कर चुके थे। राम की माया बड़ी प्रबल है। जगत में ऐसा कौन जन्मा है जिसे वह मोहित न कर दे।
कोमल वचन और गर्व के वृक्ष का अंकुर
नारद की बात सुनकर विष्णु मुँह रूखा कर लेते हैं, पर बोलते कोमल वचन हैं। उनके शब्दों में नारद की बड़ाई है: आपका स्मरण करने से मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं। टीका इसे दूसरों के विषय में पढ़ती है, और जोड़ती है कि फिर आपके लिये तो कहना ही क्या। मोह तो उस मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान और वैराग्य न हो। आप तो ब्रह्मचर्य के व्रत में लगे और धीर बुद्धि के हैं। कामदेव आपको कैसे सता सकता है?
रूखा मुँह कोमल वचनों के ठीक पहले रखा गया है। नारद उत्तर देते हैं, भगवन, यह सब आपकी कृपा है। शब्दों में विजय का श्रेय भगवान को दिया गया है, पर कथा साफ़ बताती है कि यह बात अभिमान के साथ कही गयी।
कृपालु विष्णु मन में विचारकर देखते हैं कि नारद के हृदय में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर फूट आया है। वे उसे तुरन्त उखाड़ फेंकने का निश्चय करते हैं, और कारण भी स्वयं कहते हैं: सेवकों का हित करना उनका प्रण है। वे ऐसा उपाय करेंगे जिससे मुनि का कल्याण हो और उनकी लीला भी हो। आगे आनेवाले उपाय का प्रयोजन यहीं बता दिया गया है।
शिव और विष्णु, दोनों की बात में एक ही शब्द आता है, हित। शिव ने नारद को प्रिय जानकर हित की सीख दी थी, और विष्णु का प्रण सेवकों का हित है। नारद विष्णु के चरणों में सिर नवाकर चलते हैं, और उनके हृदय का अभिमान और बढ़ जाता है। प्रणाम और बढ़ता गर्व एक ही साँस में कहे गये हैं।
तब विष्णु अपनी माया को प्रेरित करते हैं, और कथा उसकी कठिन करनी सुनने को कहती है। पहले कामदेव अपनी माया से वसन्त रचकर भी नारद को नहीं डिगा सका था। अब विष्णु की अपनी माया मुनि के हित के लिये चलती है। दोनों जगह शब्द एक ही है, अपनी माया।
सौ योजन का नगर और एक राजकुमारी
माया नारद के रास्ते में सौ योजन लम्बा चौड़ा एक नगर रचती है। उसकी तरह तरह की रचनाएँ विष्णु के अपने नगर से भी अधिक सुन्दर कही गयी हैं। उसमें रहनेवाले स्त्री पुरुष ऐसे रूपवान हैं मानो बहुत से कामदेव और रति शरीर धरकर बस गये हों।
उस नगर में शीलनिधि राजा रहते हैं, जिनके घोड़े, हाथी और सेना के समूह अगणित हैं। उनका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान है, और वे रूप, तेज, बल और नीति के घर कहे गये हैं। उनकी कन्या का नाम विश्वमोहिनी है, जिसका रूप देखकर लक्ष्मी मोहित हो जायें। फिर उसकी पहचान साफ़ हो जाती है: वह सब गुणों की खान, विष्णु की माया ही है, और उसकी शोभा का वर्णन नहीं हो सकता।
राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती है, और वहाँ अगणित राजा आये हैं। कौतुकी नारद नगर में जाते हैं, नगरवासियों से सारा हाल पूछते हैं और राजभवन पहुँचते हैं। शीलनिधि उनकी पूजा करके उन्हें आदर से बिठाते हैं। फिर राजकुमारी को सामने लाकर कहते हैं, हे नाथ, हृदय में विचारकर इसके सब गुण और दोष बताइये।
रूप देखते ही नारद वैराग्य भूल जाते हैं और देर तक देखते रह जाते हैं। फिर उसके लक्षण देखकर वे खो जाते हैं और हृदय में हर्षित होते हैं, पर वे लक्षण प्रकट नहीं कहते।
नारद मन में सोचते हैं कि जो इसे ब्याहेगा वह अमर हो जायेगा, रणभूमि में उसे कोई जीत नहीं सकेगा, और चर अचर सब जीव उसकी सेवा करेंगे। राजा के सामने वे यह नहीं कहते। सारे लक्षण हृदय में रख लेते हैं, कुछ अपनी ओर से बनाकर कह देते हैं, और कन्या को सुलक्षण बताकर वहाँ से चल पड़ते हैं।
अब नारद की चिन्ता यह है कि जाकर ऐसा उपाय सोचें जिससे राजकुमारी उन्हीं को वरे। जप और तप से इस समय कुछ होता नहीं दिखता। वे विधाता को पुकारते हैं: यह कन्या मुझे कैसे मिलेगी? यह व्यग्रता उन्हीं नारद के भीतर है जिनका स्वभाव से निर्मल मन हिमालय के आश्रम में समाधि में लगा था।
अब उनकी तुरन्त की ज़रूरत साफ़ होती है: इस समय बड़ी भारी शोभा और विशाल रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी रीझे और जयमाला डाले। जयमाला अभी केवल एक चाह है।
सच्ची विजय पर उठता मान
इस कथा में नारद की कामविजय और कामदेव के प्रति उनका शील पूरा सामने आया है: वे डिगे नहीं, क्रोधित भी नहीं हुए। उसी सफलता के बाद अपने को विजेता मानने का भाव उठता है। यह भाव ठीक तब उठता है जब वे शिव के पास जाते हैं।
शिव की सीख भी यहीं ध्यान माँगती है। वे नारद को प्रिय जानकर विनती करते हैं, और नारद को वह हित की बात भाती नहीं।
विष्णु का निश्चय सेवक के हित का है। उन्होंने मन में विचारकर गर्व के वृक्ष को अंकुर में ही पहचान लिया है। उधर कल्याण का उपाय शुरू हो चुका है, इधर राजकुमारी को पाने के लिये रूप की चिन्ता बढ़ रही है।
पार्वती ने नारद के शाप का कारण पूछा था और उनके मोह को बड़ा आश्चर्य कहा था। उत्तर में शिव नारद की भक्ति, समाधि, विजय, अभिमान और फिर जागती हुई विवाह की इच्छा तक ले आये हैं। शाप देने की घड़ी अभी नहीं आयी। कथा यहाँ उस इच्छा पर ठहरती है कि राजकुमारी नारद को देखकर रीझे और जयमाला डाले।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 121 से 131, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।