रामचरितमानस · बालकाण्ड · शिव की बरात और मैना का विलाप
शिव की बरात और मैना का विलाप
आग के पास पाला ठहरता ही नहीं, यह कहकर पार्वती ने मुनियों को उत्तर दिया। फिर वही बरात चली जिसे देखकर नगर के बच्चे भागे, और एक माँ ने अपनी बेटी को गोद में बिठाकर विधाता को कोसा।
इस प्रसंग में सबसे अधिक काम आँखों का है। नौ दोहों की इस कथा में बहुत से लोग एक ही आदमी को देखते हैं और हर बार कुछ और तय कर लेते हैं। देवताओं की स्त्रियाँ देखकर मुसकराती हैं और तय करती हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में है ही नहीं। विष्णु देखते हैं और तय करते हैं कि बरात दूल्हे के जोड़ की नहीं है। नगर के बच्चे देखते हैं और भागकर घर-घर कहते हैं कि यह बरात नहीं, यमराज की सेना है। और एक माँ सोने का थाल हाथ में लिये परछन करने निकलती है, देखती है, और वहीं उसके भीतर कुछ टूट जाता है। देखी सबने एक ही चीज़, और निकाला सबने अलग-अलग।
इस पन्ने का ढाँचा इसी पर खड़ा है कि इसका उत्तर सबसे पहले ही दे दिया गया था, कथा के आरम्भ में, उस लड़की के मुँह से जिसने उस समय तक वह वेष देखा भी नहीं था। मुनि उससे यह कहने आये थे कि शिव ने अभी-अभी कामदेव को भस्म किया है, यानी अब तक वे विकारवाले ही रहे होंगे। वह मुसकराकर उत्तर देती है और उत्तर में एक छोटी-सी उपमा रख देती है जो आगे की सारी घटनाओं को पहले से तौल देती है। इसके बाद जो कुछ होता है वह उसी तौल के नीचे होता है।
बरात का यह पूरा दृश्य हास्य का है और तुलसी उसे खुलकर हास्य रहने देते हैं। गणों के अनगिनत वेष, बैल पर चढ़ा हुआ दूल्हा, डरकर भागते हुए वाहन, काँपते हुए बच्चे। पर उसी के बीच एक माँ का दुःख है जो हँसी का हिस्सा नहीं है, और तुलसी उसे एक बार भी छोटा नहीं करते। यही इस प्रसंग का सबसे कठिन काम है, और वे इसे बिना मेहनत दिखाये कर जाते हैं। मैना जो कहती है उसे इस पन्ने की सबसे तीखी पंक्ति मिली हुई है, और वह पंक्ति उसकी भूल के पक्ष में खड़ी है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- पार्वती हिमाचल और मैना की पुत्री, जिनका पन इस प्रसंग के आरम्भ में बँधता है और जो अन्त तक एक बार भी अपने वर के विषय में शिकायत नहीं करतीं।
- शिव दूल्हा, जो इस पूरे प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलते और दो बार हँसते हैं।
- मैना पार्वती की माता, जो हर्ष के साथ परछन करने निकलती हैं और विलाप करती हुई लौटती हैं।
- हिमाचल पर्वतराज, जो लग्न लिखवाते हैं, सारे पर्वतों, वनों, नदियों और तालाबों को नेवता भेजते हैं, और घर की खबर पाते ही दौड़ पड़ते हैं।
- विष्णु बराती, जिनकी एक दिल्लगी इस बरात का रूप ही बदल देती है।
- नारद जिनका नाम इस प्रसंग में एक बार उलाहने की तरह लिया जाता है और दूसरी बार उद्धार की तरह।
- सप्तर्षि वे मुनि जो पार्वती की परीक्षा लेने आये थे और यहाँ लग्नपत्रिका लेकर ब्रह्मा तक जाते हैं।
आग के पास पाला
पिछला प्रसंग वहाँ छूटा था जहाँ कामदेव भस्म हो चुके थे और सप्तर्षि पार्वती की परीक्षा लेने पहुँचे थे। उनकी बात में एक काँटा छिपा हुआ था। उन्होंने कहा कि शिव ने अब जाकर कामदेव को जलाया है, और इस एक वाक्य के भीतर यह मान लिया गया था कि उस दिन से पहले तक वे काम के अधीन रहे होंगे। जिस लड़की ने उन्हीं के लिये वर्षों तप किया है, उसके सामने उसके वर पर यह छींटा डाला गया है। और यहीं से यह पन्ना खुलता है।
उत्तर देने से पहले वह जो करती है, तुलसी उसे पहले दर्ज करते हैं। वह मुसकराती है। क्रोध नहीं, सफाई नहीं, आँसू नहीं। पहले मुसकान, फिर वाक्य। और पहला वाक्य भी उलाहना नहीं है, वह मुनियों की बात को सिर पर रख लेता है, हे विज्ञानी मुनिवरो, आपने उचित ही कहा। वह उन्हें विज्ञानी कहकर पुकारती है और उसी साँस में उनकी समझ का हिसाब माँग लेती है।
सुनि बोलीं मुसुकाइ भवानी । उचित कहेहु मुनिबर बिग्यानी॥
चौपाई १
तुम्हरें जान कामु अब जारा । अब लगि संभु रहे सबिकारा॥
आपकी समझ में शिव ने अब कामदेव को जलाया, अब तक तो वे विकारयुक्त ही रहे। यह पूरी पंक्ति एक ही शब्द पर टिकी है, आपकी समझ में। वह कहती है कि जो हुआ वह आपके देखने में हुआ, उनमें नहीं हुआ। और अगली ही चौपाई में वह अपना पक्ष रख देती है, हमारी समझ से शिव सदा से ही योगी हैं, अजन्मा, अनिन्द्य, कामरहित और भोगहीन। दो समझें आमने-सामने रख दी गयी हैं, और बीच में जो घटना है वह वही की वही है।
इसके बाद वह अपना पन बाँधती है, और पन बाँधने का ढंग भी अनोखा है। वह यह नहीं कहती कि मैं ठीक हूँ। वह कहती है कि यदि मैंने मन, वचन और कर्म से प्रेमसहित उन्हें ऐसा जानकर ही सेवा की है, तो हे मुनीश्वरो, सुनिये, वे कृपानिधान मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करेंगे। प्रमाण अपने पास नहीं रखा, सामनेवाले पर छोड़ दिया। और तब वह मुनियों की बात को सीधे नाम देती है, कि शिव ने कामदेव को भस्म किया, यही आपका बड़ा भारी अविवेक है। जिस मुसकान से बात शुरू हुई थी, उसी मुसकान के भीतर यह शब्द रखा गया है।
तात अनल कर सहज सुभाऊ । हिम तेहि निकट जाइ नहिं काऊ॥
चौपाई २
गएँ समीप सो अवसि नसाई । असि मन्मथ महेस की नाई॥
और यहाँ वह उपमा आती है जो इस पूरे प्रसंग की कुंजी है। हे तात, आग का तो सहज स्वभाव ही यह है कि पाला उसके पास कभी जा ही नहीं सकता, और चला जाय तो अवश्य नष्ट हो जाता है। महादेव और कामदेव के बीच भी यही न्याय समझना चाहिये। ध्यान देने की बात यह है कि इसमें आग कुछ करती नहीं। वह लड़ती नहीं, जीतती नहीं, हथियार नहीं उठाती। वह बस अपने स्वभाव में बैठी रहती है, और जो पास आता है वह अपने आप नहीं बचता।
इस उपमा का असली काम यह है कि वह उस दिन की घटना से विजय का भाव निकाल लेती है। यदि कामदेव का जलना शिव की जीत है तो उसके पहले कोई लड़ाई रही होगी, और लड़ाई वहीं होती है जहाँ ख़तरा हो। पार्वती कहती हैं कि लड़ाई थी ही नहीं। जो पास आया वह इसलिये नष्ट हुआ कि पास आया, और इसमें आग की ओर से कोई निर्णय भी नहीं था। यही उत्तर आगे के हर दृश्य पर लागू होता चला जायेगा, क्योंकि आगे जितने लोग उस वेष को देखकर डरते हैं, वे सब उसे एक घटना समझकर डरते हैं, स्वभाव समझकर नहीं।
सार: सप्तर्षि यह कहकर पार्वती की परीक्षा लेते हैं कि शिव ने अब जाकर कामदेव को जलाया है। वह मुसकराकर उत्तर देती है कि यह आपकी समझ है, हमारी समझ से वे सदा से योगी, अजन्मा और कामरहित हैं। फिर वह पन बाँधती है कि कृपानिधान उसकी प्रतिज्ञा सत्य करेंगे, और आग तथा पाले की उपमा से दिखाती है कि वहाँ कोई युद्ध हुआ ही नहीं था।
लग्न, और दूल्हे का शृंगार
पार्वती के वचन सुनकर और उनका प्रेम तथा विश्वास देखकर मुनि हृदय में प्रसन्न हुए, भवानी को सिर नवाकर चल दिये और हिमाचल के पास पहुँचे। वहाँ उन्होंने सारा हाल कह सुनाया। हिमाचल पहले दुखी हुए, क्योंकि कामदेव के भस्म होने की बात पहले आयी, और फिर सुखी हुए, क्योंकि रति के वरदान की बात उसके पीछे आयी। एक ही समाचार के दो हिस्से हैं और दोनों उलटी दिशा में ले जाते हैं, ठीक वैसे ही जैसे इस पूरे पन्ने पर आगे होगा।
फिर पर्वतराज काम पर लग जाते हैं। शिव का प्रभाव मन में विचारकर उन्होंने श्रेष्ठ मुनियों को आदर से बुलाया, शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोधवायी, और वेद की विधि से शीघ्र ही लग्न लिखवा लिया। वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियों को सौंपी गयी और सौंपते समय उन्होंने उनके चरण पकड़कर विनती की। सप्तर्षि वह पत्री ब्रह्मा तक ले गये, और तुलसी ब्रह्मा के विषय में केवल इतना कहते हैं कि पढ़ते समय उनके हृदय में प्रेम समाता न था।
ब्रह्मा ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया और सारा देवसमाज हर्षित हो गया। आकाश से फूल बरसने लगे, बाजे बजने लगे, दसों दिशाओं में मंगलकलश सज गये। देवता अपने-अपने भाँति-भाँति के वाहन और विमान सँवारने लगे, कल्याण देनेवाले शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं। यहाँ तक यह किसी भी बड़े घर की बरात की तैयारी है। और ठीक इसी जगह तुलसी दूसरी ओर का परदा उठाते हैं, जहाँ दूल्हे को तैयार किया जा रहा है।
शिव के गण शिव का शृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बाँधा गया और उस मुकुट पर साँपों का मौर सजाया गया। कुण्डल साँप के, कंकण साँप के, शरीर पर विभूति, और वस्त्र की जगह बाघम्बर। दूल्हे को सजाने की हर चीज़ अपनी जगह पर है, केवल सामग्री बदल दी गयी है। मौर वहीं है जहाँ मौर होता है, कुण्डल वहीं हैं जहाँ कुण्डल होते हैं। यह वेष लापरवाही का नहीं है, इसमें पूरा शृंगार हुआ है, और इसी से यह इतना बेचैन करता है।
ससि ललाट सुंदर सिर गंगा । नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥
चौपाई ३
गरल कंठ उर नर सिर माला । असिव बेष सिवधाम कृपाला॥
सुन्दर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला। और इसके तुरन्त बाद वह आधी पंक्ति, जिसमें तुलसी सारा फ़ैसला सुना देते हैं, कि वेष अशिव है और वे स्वयं शिव के धाम तथा कृपालु हैं। सूची छह चीज़ों की है और उनमें तीन शुभ हैं और तीन डरावनी, और वे आपस में गुँथी हुई रखी गयी हैं। चन्द्रमा के बगल में साँप, गंगा के बगल में विष।
इस आधी पंक्ति की जगह देखने लायक है। तुलसी इसे वर्णन के बाद नहीं, वर्णन के भीतर रखते हैं। नरमुण्डों की माला का नाम लेकर वे तुरन्त उसी साँस में कह देते हैं कि यह वेष अशुभ है और यह आदमी कल्याण का घर है। पाठक को डरने के लिये जितनी देर चाहिये, उतनी देर भी नहीं दी जाती। और आगे जितने लोग इसी वेष को देखकर घबरायेंगे, उनकी घबराहट का उत्तर पाठक के पास पहले से रखा हुआ है। यही कारण है कि आगे का सारा हास्य क्रूर नहीं होता।
एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू, और बैल पर सवार होकर वे चल पड़े। बाजे बज रहे हैं। और तब देवताओं की स्त्रियाँ उन्हें देखकर मुसकराती हैं और कहती हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में मिलेगी ही नहीं। यह इस पन्ने का पहला निर्णय है और वह देखने से निकला है। जिस कन्या के लिये यह बरात चली है, उसने इन्हीं के लिये तप किया है, और तप की बात इन मुसकरानेवालियों को मालूम नहीं।
सार: मुनि हिमाचल को सब समाचार देते हैं, पर्वतराज वेद की विधि से लग्न लिखवाकर सप्तर्षियों के हाथ ब्रह्मा तक भेजते हैं, और देवसमाज तैयारी में लग जाता है। उधर गण शिव का शृंगार करते हैं, साँपों का मौर, विभूति और बाघम्बर, और तुलसी उसी वर्णन के भीतर कह देते हैं कि वेष अशिव है और पहननेवाला कल्याण का धाम है।
जैसा दूल्हा, वैसी बरात
विष्णु, ब्रह्मा और देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बरात में चले। तुलसी उस समाज के विषय में दो बातें एक साथ कहते हैं, कि वह सब प्रकार से अनुपम था, और कि वह दूल्हे के योग्य नहीं था। यह उलटी शिकायत है। साधारण बरात में दोष यह निकलता है कि वह दूल्हे के दर्जे तक नहीं पहुँचती। यहाँ दोष यह है कि वह बहुत सुन्दर है, और सुन्दर होकर बेमेल हो गयी है।
यह देखकर विष्णु हँसे और सब दिक्पालों को बुलाकर कहा कि सब लोग अपने-अपने दल के साथ अलग-अलग होकर चलिये। और फिर उन्होंने कारण भी बता दिया, और कारण में ही इस पूरे प्रसंग की सबसे मीठी दिल्लगी छिपी है।
बर अनुहारि बरात न भाई । हँसी करैहहु पर पुर जाई॥
चौपाई ४
बिष्नु बचन सुनि सुर मुसुकाने । निज निज सेन सहित बिलगाने॥
हे भाई, यह बरात वर के अनुसार नहीं है, पराये नगर में जाकर हँसी कराइयेगा क्या। नाप का काँटा दूल्हा है, यह इस पंक्ति ने तय कर दिया। बरात दूल्हे के अनुसार होनी चाहिये, और चूँकि दूल्हा राख और साँप पहनकर बैल पर बैठा है, इसलिये विमानों और रत्नों की यह चमकती हुई भीड़ ग़लत है। और डर भी बड़ा घरेलू है, पराये नगर में हँसी होगी। देवता एक विवाह में अपनी नाक की चिन्ता कर रहे हैं।
विष्णु की बात सुनकर देवता मुसकराये और अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गये। महादेव यह देखकर मन ही मन मुसकराते हैं कि विष्णु की दिल्लगी नहीं छूटती। और यहाँ तुलसी एक शब्द रखते हैं जो सारा मिज़ाज खोल देता है, वे इन वचनों को अपने प्यारे के अति प्रिय वचन कहते हैं। जिस बात पर चिढ़ा जा सकता था, उस पर स्नेह किया जा रहा है। इन्हीं अति प्रिय वचनों को सुनकर शिव ने भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया।
आज्ञा सुनते ही वे सब चले आये और स्वामी के चरणकमलों में सिर नवाया। तरह-तरह की सवारियाँ, तरह-तरह के वेष। और तब तुलसी वह वाक्य लिखते हैं जिसका हक़ इस पूरे पन्ने पर केवल एक आदमी के पास है, कि अपने समाज को देखकर शिव हँसे। किसी के बिना मुँह, किसी के बहुत से मुँह, किसी के हाथ पैर नहीं, किसी के कई हाथ पैर, किसी की बहुत आँखें, किसी की एक भी नहीं, कोई मोटा, कोई अत्यन्त दुबला। भयंकर गहने, हाथों में कपाल, शरीर पर ताज़ा लहू। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार जैसे मुँह, और गिनने में न आनेवाली प्रेत, पिशाच तथा योगिनियों की जमातें।
नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब।
सोरठा ९३
देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि॥ ९३॥
भूत सब नाचते हैं, गीत गाते हैं और परम तरंगी हैं। देखने में अत्यन्त विपरीत जान पड़ते हैं और बड़े विचित्र ढंग से बोलते हैं। पूरे वर्णन में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो बताये कि ये किसी को हानि पहुँचाते हैं। ये नाच रहे हैं और गा रहे हैं, और तुलसी इन्हें मौजी कहते हैं। खोट देखने में है, करने में नहीं। इसीलिये इस पंक्ति में दोष का पता बदल जाता है, कि वे देखने में विपरीत लगते हैं, न कि वे विपरीत हैं।
जस दूलहु तसि बनी बराता । कौतुक बिबिध होहिं मग जाता॥
चौपाई ५
इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना । अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना॥
जैसा दूल्हा है, वैसी ही बरात अब बन गयी। यही उस दिल्लगी का उत्तर है। विष्णु ने कहा था कि बरात वर के जोड़ की नहीं, और शिव ने इस शिकायत को दूर करने के लिये बरात को सुधारा नहीं, उसे और बिगाड़ दिया। मेल बैठाने के दो रास्ते थे और उन्होंने वह चुना जिसमें अपने को ऊपर उठाने की एक भी कोशिश नहीं है। और इसी के साथ रास्ते भर भाँति-भाँति के कौतुक होते चलते हैं। बरात हँसती हुई चल रही है और जिस पर हँसा जा रहा है, वह सबसे पहले हँस चुका है।
सार: देवताओं का समाज अनुपम है पर दूल्हे के योग्य नहीं, यह कहकर विष्णु हँसते हैं और सबको अलग-अलग चलने को कहते हैं। शिव इस दिल्लगी को अपने प्यारे के अति प्रिय वचन मानकर भृंगी के हाथ अपने गण बुलवा लेते हैं, अपने समाज को देखकर स्वयं हँसते हैं, और बरात दूल्हे के जोड़ की बन जाती है।
हिमाचल का नगर
उधर हिमाचल ने ऐसा मण्डप बनवाया कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। और नेवता भेजने में उन्होंने जो किया, उसमें पर्वतराज का अपना कुल दिखायी देता है। जगत् में जितने पर्वत थे, छोटे हों या विशाल, सबको बुलावा गया। फिर वन, समुद्र, नदियाँ और तालाब, इन सबको भी। बेटी का ब्याह है, इसलिये घराती में पूरी पृथ्वी बुला ली गयी है। और सूची में छोटे को पहले गिनाया गया है, बड़े को बाद में।
वे सब इच्छा के अनुसार रूप धारण कर सकनेवाले सुन्दर शरीर लेकर आये, अपनी स्त्रियों और समाज सहित, और स्नेह के साथ मंगलगीत गाते हुए हिमाचल के घर पहुँचे। पहले से बहुत से घर सजवा रखे थे, सब यथायोग्य ठहरा दिये गये। नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की रचना-चातुरी भी छोटी लगती थी। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ, सब सुन्दर। घर-घर पर मंगल के तोरण और ध्वजा-पताकाएँ। और वहाँ के स्त्री-पुरुषों की छबि ऐसी कि मुनियों तक का मन मोहित हो जाता था।
जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ।
दोहा ९४
रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ॥ ९४॥
जिस नगर में स्वयं जगदम्बा ने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है। वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित नये बढ़ते जाते हैं। इस दोहे पर रुकना ज़रूरी है, क्योंकि यहाँ एक नाम गिरा दिया गया है जिसे इस पन्ने पर आगे बड़े यत्न से खोला जायेगा। तुलसी यहीं, नगर का बखान करते-करते, पार्वती को जगदम्बा कह देते हैं। पढ़नेवाला यह जान लेता है। और उसी घर में एक स्त्री बैठी है जिसे यह अभी मालूम नहीं, और जिसका सारा दुःख आगे इसी न जानने से उठेगा। पूरे प्रसंग का सबसे कोमल हिस्सा इसी अन्तर पर खड़ा है, कि हम जानते हैं और माँ नहीं जानती।
सार: हिमाचल अवर्णनीय मण्डप बनवाते हैं और जगत् के सब छोटे-बड़े पर्वतों, वनों, समुद्रों, नदियों और तालाबों को नेवता भेजते हैं। सब सुन्दर रूप धरकर स्त्रियों और समाज सहित आते हैं, और नगर की शोभा के आगे ब्रह्मा की निपुणता छोटी लगती है। और इसी बीच तुलसी कह देते हैं कि इस नगर में जगदम्बा ने अवतार लिया है।
बच्चे भागे
बरात नगर के निकट आयी, यह सुनकर नगर में खलबली मच गयी और उसी खलबली से शोभा और बढ़ गयी। अगवानी करनेवाले बनाव-शृंगार करके, नाना प्रकार की सवारियाँ सजाकर, आदर के साथ बरात लेने चले। यहाँ तक सब ठीक चलता है। देवताओं का समाज देखकर वे हृदय में हर्षित हुए और विष्णु को देखकर तो और भी सुखी हुए। इस पूरे पन्ने पर यह आख़िरी क्षण है जब सब कुछ शान्त है।
फिर उन्होंने शिव का दल देखना शुरू किया, और पहला असर आदमियों पर नहीं, जानवरों पर हुआ। हाथी, घोड़े, रथ के बैल, सब वाहन बिदककर भाग खड़े हुए। बड़ी उम्र के समझदार लोग धीरज धरकर वहीं डटे रहे। लड़के अपने प्राण लेकर भागे। और तुलसी यहाँ एक बहुत बारीक काम करते हैं। वे नहीं कहते कि बच्चे कायर थे। वे तीन सीढ़ियाँ बनाते हैं, पशु, बच्चे, और बड़े, और यह दिखा देते हैं कि डर वहीं कम हुआ जहाँ समझ ज़्यादा थी।
घर पहुँचने पर माता-पिता पूछते हैं और बच्चे भय से काँपते हुए शरीर से उत्तर देते हैं। क्या कहें, कोई बात कही ही नहीं जाती। यह बरात है या यमराज की सेना। दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है, और साँप, कपाल तथा राख ही उसके गहने हैं। यह पूरा वर्णन अब तक का सबसे सही वर्णन है, क्योंकि इसमें एक भी बात झूठी नहीं है। जो कुछ इन्होंने गिनाया, वह सब वहाँ था। ग़लती जोड़ में है, गिनती में नहीं।
तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा।
छंद
सँग भूत प्रेत पिसाच जोगिनि बिकट मुख रजनीचरा॥
जो जिअत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही।
देखिहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही॥
शरीर पर राख, साँप और कपाल के गहने, नंगा, जटाधारी, भयंकर, और साथ में विकट मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस। और फिर वह पंक्ति जिस पर हँसी भी आती है और जो बाद में सच निकलती है, कि जो इस बरात को देखकर जीता बचेगा उसके सचमुच बड़े पुण्य होंगे, और वही उमा का विवाह देख पायेगा। बच्चों ने यह घर-घर कहा। यह बालकों का मज़ाक़ है, और इसमें अनजाने वह बात आ गयी है जो इस पूरे काण्ड में सच है, कि यह विवाह देखने के लिये सचमुच पुण्य चाहिये।
माता-पिता यह सुनकर मुसकराते हैं, क्योंकि वे समझ जाते हैं कि यह महेश का समाज है, और वे बहुत तरह से बच्चों को समझाते हैं कि निडर हो जाओ, डर की कोई बात नहीं। दो पीढ़ियाँ आमने-सामने हैं और अन्तर केवल एक बात का है। बड़ों को नाम मालूम है। जिसे वे राख और कपाल में देखकर पहचान लेते हैं, उसे बच्चे केवल राख और कपाल देखते हैं। और अगले ही दृश्य में यही अन्तर एक और घर में, एक और उम्र में लौटेगा, और वहाँ कोई समझानेवाला पास नहीं होगा।
सार: बरात के निकट आते ही नगर में चहल-पहल मचती है और अगवान सज-धजकर चलते हैं। देवसमाज देखकर वे हर्षित होते हैं, पर शिव का दल देखते ही उनके वाहन बिदककर भाग जाते हैं। बच्चे प्राण लेकर भागते हैं और घर-घर कहते हैं कि यह यमराज की सेना है और जो जीता बचेगा वही उमा का विवाह देखेगा। बड़े मुसकराकर उन्हें समझाते हैं कि यह महेश का समाज है।
सोने का थाल
अगवान बरात को लिवा लाये और सबको सुन्दर जनवासे ठहरने को दिये। मैना ने शुभ आरती सजायी और साथ की स्त्रियाँ उत्तम मंगलगीत गाने लगीं। यह घर की सबसे बड़ी घड़ी है और घर की स्वामिनी अपने हाथों उसे सँभाल रही है। दूल्हे का परछन माँ करती है, यह उसका अपना अधिकार है, और वह अधिकार निभाने वह स्वयं आगे आती है।
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
चौपाई ६
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा । अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥
सुन्दर हाथों में सोने का थाल शोभित है और वे हर्ष के साथ शिव का परछन करने चलीं। इस पंक्ति में हर्ष का नाम पहले आता है। तुलसी उसे छिपाते नहीं, टालते नहीं, और डर की भूमिका बनाने के लिये उसे धुँधला भी नहीं करते। वह ठीक उस क्षण तक प्रसन्न थी। और तब अगली आधी पंक्ति, कि जब रुद्र को विकट वेष में देखा तब स्त्रियों के हृदय में बड़ा भारी भय उत्पन्न हुआ। दो आधी पंक्तियों के बीच में एक नज़र भर का फ़ासला है, और उसी में पूरा घर बदल जाता है।
वे अत्यन्त त्रास से भागकर घर में घुस गयीं, और शिव जहाँ जनवासा था वहाँ चले गये। इस वाक्य के दो हिस्सों को साथ रखकर देखिये। एक ओर भागती हुई स्त्रियाँ हैं, दूसरी ओर एक आदमी है जो चुपचाप अपने ठहरने की जगह चला जाता है। वह न रुकता है, न सफाई देता है, न रूप बदलता है। इस पूरे प्रसंग में वह एक शब्द नहीं बोलता, और यह उसकी सबसे बड़ी बात है।
मैना के हृदय में भारी दुःख हुआ। उन्होंने गिरिराज की कुमारी को अपने पास बुलाया और अत्यन्त स्नेह से गोद में बिठा लिया। यह चार शब्दों का चित्र है और इसमें सारा मातृत्व आ गया है। जिसे गोद में बिठाया जा रहा है वह अब बालिका नहीं है, वह वर्षों तप कर चुकी तपस्विनी है जिसके सामने सप्तर्षि हार मान चुके हैं। पर माँ के लिये गोद ही एक जगह बची है। और तब नील कमल जैसी आँखों में पानी भरकर वह बोलती है।
उसकी शिकायत का पता देखने लायक है। वह बेटी से कुछ नहीं कहती, वर को कुछ नहीं कहती, नगर से कुछ नहीं कहती। वह सीधे विधाता से लड़ती है, कि जिसने यह रूप दिया उसी मूर्ख ने वर बावला क्यों बनाया। रचनेवाले को मूर्ख कहा जा रहा है, और कहनेवाली के पास इसके लिये पूरा कारण है, क्योंकि उसने अपनी आँख से एक असंगति देखी है और असंगति का हिसाब उसी से माँगा जाता है जिसने जोड़ी बनायी।
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
छंद
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं।
घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥
जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिये, वह ज़बरदस्ती बबूल में लग रहा है। यह उपमा एक माली की आँख से आयी है और यही इसे इतना तीखा बनाती है। बबूल पर दोष यह नहीं कि वह बुरा है, दोष यह है कि वह इस फल का पेड़ नहीं। और फिर वह तीन मौतें गिनाती है, कि बेटी को लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी, समुद्र में कूद पड़ूँगी। इसके बाद दो हानियाँ, कि चाहे घर उजड़ जाय और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाय। क्रम पर ध्यान दीजिये, पहले अपनी मृत्यु, सबसे पीछे अपनी बदनामी।
और अन्त में वह अपना पन बाँधती है, कि जीते जी मैं यह विवाह न करूँगी। इस पन्ने पर यह दूसरा पन है। पहला उसी की बेटी ने पहली ही चौपाइयों में बाँधा था, कि यदि मैंने प्रेम सहित उन्हें ऐसा जानकर सेवा की है तो वे मेरी प्रतिज्ञा सत्य करेंगे। दो प्रतिज्ञाएँ हैं, आमने-सामने हैं, और दोनों प्रेम से उठी हैं। एक ही घर में, एक ही दिन में, और दोनों में से केवल एक टिक सकती है।
सार: बरात जनवासे में ठहरती है और मैना सोने का थाल लेकर हर्ष के साथ परछन करने निकलती हैं। शिव को विकट वेष में देखते ही स्त्रियाँ भयभीत होकर भाग जाती हैं और शिव चुपचाप जनवासे चले जाते हैं। मैना अपनी बेटी को गोद में बिठाकर विधाता को कोसती हैं, कल्पवृक्ष का फल बबूल में लगने की उपमा देती हैं, और पन बाँधती हैं कि जीते जी यह विवाह न करेंगी।
बाँझ क्या जाने
गिरिराज की स्त्री को दुखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं। मैना अपनी कन्या का स्नेह याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं। तुलसी यहाँ तीन क्रियाएँ एक साथ रखते हैं और तीनों अलग-अलग काम करती हैं। विलाप करना ऊँची आवाज़ है, रोना शरीर है, और कहना वह है जो अभी आने वाला है। और जो आने वाला है वह किसी अनजान पर नहीं, एक नाम पर गिरता है।
उसने पूछा कि मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने उमा को ऐसा उपदेश दिया कि उसने बावले वर के लिये तप किया। आरोप सीधा है और उसमें एक बात सच भी है, क्योंकि उपदेश सचमुच नारद ने ही दिया था। पर आरोप की जड़ यह नहीं है। जड़ आगे आती है, और आगे जो आता है वह इस पूरे पन्ने की सबसे तेज़ चोट है।
साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया । उदासीन धनु धामु न जाया॥
चौपाई ७
पर घर घालक लाज न भीरा । बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥
सचमुच उनके न मोह है न माया, न धन, न घर, न स्त्री, वे सबसे उदासीन हैं, और इसी से वे दूसरे का घर उजाड़नेवाले हैं। उन्हें न लाज है न डर। भला बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा क्या जाने। इस तर्क की बनावट देखिये, क्योंकि वह उलटा चलता है। जो गुण सन्त का गुण है, उसी को दोष का कारण बना दिया गया है। जिसके पास घर नहीं है वही घर की क़ीमत नहीं जान सकता, और इसलिये वही उसे बिना हिचक उजाड़ सकता है।
और अन्तिम उपमा वह जगह है जहाँ तुलसी सबसे बड़ा जोखिम उठाते हैं। पूरे पन्ने की सबसे पैनी पंक्ति उस स्त्री को दी गयी है जो ग़लत है। नारद ने घर नहीं उजाड़ा, उपदेश ठीक दिया था, और जिसे बावला कहा जा रहा है वह जगत् का कल्याण है। यह सब पाठक को मालूम है। फिर भी कवि उस भूल को कमज़ोर शब्द नहीं देता। वह उसे पूरी ताक़त देता है, क्योंकि माँ का दुःख सचमुच इतना ही ताक़तवर है, और उसे छोटा करके दिखाना उसके साथ बेईमानी होती।
माता को विकल देखकर पार्वती विवेक से भरी कोमल वाणी बोलीं। इस पंक्ति में दो शब्द साथ-साथ रखे गये हैं जो प्रायः साथ नहीं मिलते, विवेक और कोमलता। जो ठीक बात कहनी है वह कड़ी होकर भी कही जा सकती थी। और उसने जो पहली बात कही वह यह है कि जो विधाता रच देते हैं वह टलता नहीं, ऐसा विचारकर सोच मत कीजिये। ध्यान दीजिये कि उसने अपने वर का बचाव एक शब्द से भी नहीं किया।
करम लिखा जौं बाउर नाहू । तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥
चौपाई ८
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका । मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥
जो मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है तो किसी को क्यों दोष लगाया जाय। हे माता, क्या विधाता के अंक आपसे मिट सकते हैं, व्यर्थ कलंक का टीका मत लीजिये। यह उत्तर की सबसे चतुर चाल है। उसने माँ की बात काटी नहीं, उसे मान लिया और मानकर उससे शिकायत निकाल ली। यदि यही लिखा है तो दोष किसका। और फिर वह माँ की रक्षा उस चीज़ से करती है जिसका माँ को ध्यान भी नहीं, कि दोष देते-देते कलंक शिकायत करनेवाले पर चढ़ता है।
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।
छंद
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं।
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
हे माता, कलंक मत लीजिये, रोना छोड़िये, यह अवसर उसका नहीं है। मेरे भाग्य में जो दुःख सुख लिखा है, जहाँ जाऊँगी वहीं पाऊँगी। यह दूसरी पंक्ति विवाह के दिन कही गयी सबसे शान्त बात है। इसमें यह नहीं कहा गया कि वहाँ सुख मिलेगा। इसमें यह कहा गया है कि जाने से कुछ नहीं बदलता, इसलिये न जाना कोई बचाव नहीं है। रोकनेवाले का सारा तर्क इसी एक वाक्य से हट जाता है।
और तुलसी इसके बाद वह लिखते हैं जो कोई सजानेवाला कवि नहीं लिखता। पार्वती के विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँति से विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं। यानी वह समझ किसी के भीतर नहीं उतरी। जिस बात से शोक मिटना चाहिये था, उसी को सुनकर रोना बढ़ गया। यह हार दर्ज की गयी है, और इसी हार के कारण आगे किसी और का आना ज़रूरी हो जाता है।
सार: मैना नारद पर दोष रखती हैं कि उन्होंने बसता हुआ घर उजाड़ दिया, और कहती हैं कि जिसके घर ही नहीं वह घर उजड़ने का दुःख क्या जाने, जैसे बाँझ प्रसव की पीड़ा नहीं जानती। पार्वती विवेकभरी कोमल वाणी में उत्तर देती हैं कि विधाता का लिखा टलता नहीं, दोष किसी को मत दीजिये, कलंक मत लीजिये, और जो लिखा है वह जहाँ जाऊँगी वहीं मिलेगा। पर स्त्रियाँ और अधिक रोने लगती हैं।
नारद का भेद खोलना
उसी समय समाचार सुनते ही हिमाचल नारद और सप्तर्षियों को साथ लेकर तुरन्त अपने घर गये। जिस आदमी पर अभी-अभी घर उजाड़ने का दोष लगा है, वही उस घर में बुलाया नहीं गया, वह साथ आ रहा है। और आकर वह न सफाई देते हैं, न झगड़ते हैं, न अपने उपदेश का बचाव करते हैं। वे कथा सुनाते हैं। पूर्वजन्म का प्रसंग सुनाकर उन्होंने सबको समझाया।
तब नारद सबही समुझावा । पूरुब कथाप्रसंगु सुनावा॥
चौपाई ९
मयना सत्य सुनहु मम बानी । जगदंबा तव सुता भवानी॥
हे मैना, मेरी सच्ची बात सुनिये, आपकी यह पुत्री साक्षात् जगज्जननी भवानी है। यही वह वाक्य है जिसके लिये यह सारा विलाप रखा गया था। और यह नाम पाठक पहले ही सुन चुका है, नगर के बखान में, जहाँ तुलसी ने कहा था कि जिस नगर में जगदम्बा ने अवतार लिया उसका वर्णन कैसे हो। जो बात एक दोहे में चलते-चलते कह दी गयी थी, वह अब एक आदमी को बचाने के लिये फिर से कही जा रही है।
फिर नारद वह परिचय देते हैं जो ऊपर से शुरू होकर नीचे उतरता है। ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं, सदा शिव के अर्द्धांग में रहती हैं, जगत् की उत्पत्ति, पालन और संहार करती हैं, और अपनी इच्छा से लीला-शरीर धारण करती हैं। इस गिनती में एक बात जान-बूझकर दूसरे नम्बर पर रखी गयी है, कि वे सदा शिव के अर्द्धांग में रहती हैं। जिस विवाह को रोका जा रहा है, उसका सम्बन्ध पहले से बना हुआ है।
और तब पिछला जन्म। पहले ये दक्ष के घर जन्मी थीं, तब इनका नाम सती था और शरीर बहुत सुन्दर पाया था। वहाँ भी सती शंकर से ही ब्याही गयी थीं, और यह कथा सारे जगत् में प्रसिद्ध है। इस आधी पंक्ति में एक चुभन है। कथा सारे जगत् में प्रसिद्ध है, यानी यह घर भी उसे जानता ही होगा। जो बात सब जानते हैं, उसे इस घर ने अपनी बेटी से जोड़कर कभी नहीं देखा।
फिर वह क्षण, जिससे सब कुछ बदला था। एक बार शिव के साथ आते हुए इन्होंने रघुकुलरूपी कमल के सूर्य को देखा, इन्हें मोह हो गया, और शिव का कहना न मानकर भ्रमवश इन्होंने सीता का वेष धारण कर लिया। इस पन्ने पर राम का नाम सीधे नहीं आता, केवल यही एक उपमा आती है। और इसी एक भूल से आगे की सारी कथा निकलती है।
सिय बेषु सतीं जो कीन्ह तेहिं अपराध संकर परिहरीं।
छंद
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥
सीता का वेष धारण किया, उसी अपराध के कारण शंकर ने उन्हें त्याग दिया, और फिर शिव के वियोग में वे अपने पिता के यज्ञ में जाकर वहीं योग की अग्नि से जल गयीं। इसके आगे नारद वह वाक्य कहते हैं जो सारा दुःख उठा ले जाता है, कि अब इन्होंने आपके घर जन्म लेकर अपने ही पति के लिये कठिन तप किया है, इसलिये सन्देह छोड़ दीजिये, गिरिजा सदा से ही शंकर की प्रिया हैं। अपने ही पति, यही वह शब्द है। जिसे अजनबी और बेमेल समझकर रोया जा रहा था, वह पराया था ही नहीं।
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।
दोहा ९८
छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद॥ ९८॥
नारद के वचन सुनकर सबका विषाद मिट गया और क्षणभर में यह समाचार सारे नगर में घर-घर फैल गया। यह घर-घर इस पन्ने पर दूसरी बार आया है। पहली बार यह बच्चों के मुँह से आया था, जब उन्होंने भागकर घर-घर कहा था कि यह यमराज की सेना है। वही रास्ता, वही गति, और अब उसी पर उलटी ख़बर दौड़ रही है। जिस चीज़ ने डर बाँटा था, उसी ने उसका इलाज बाँट दिया।
सार: हिमाचल नारद और सप्तर्षियों को लेकर घर आते हैं और नारद पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं। वे बताते हैं कि यह कन्या साक्षात् जगदम्बा है, सदा शिव के अर्द्धांग में रहनेवाली अजन्मा शक्ति, जो पहले दक्ष के घर सती होकर जन्मी और शंकर से ही ब्याही गयी थी, फिर सीता का वेष धरने के अपराध पर त्यागी जाकर पिता के यज्ञ में योगाग्नि से जल गयी, और अब अपने ही पति के लिये तप करके इस घर में जन्मी है। सुनते ही सबका विषाद मिट जाता है।
गालियाँ
तब मैना और हिमवान् आनन्द में मग्न हो गये और उन्होंने बार-बार पार्वती के चरणों की वन्दना की। यह वाक्य चुपचाप बहुत बड़ा काम करता है। कुछ देर पहले जो माँ अपनी बेटी को गोद में बिठा रही थी, वही अब उसके चरणों में झुक रही है, और एक ही बार नहीं, बार-बार। गोद से चरणों तक का यह फ़ासला इस पूरे प्रसंग में सबसे लम्बा है और सबसे कम शब्दों में तय हुआ है। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध, सारे नगर के लोग प्रसन्न हो गये।
नगर में मंगलगीत गाये जाने लगे और सबने भाँति-भाँति के सोने के कलश सजाये। पाकशास्त्र में जैसी रीति है, उसके अनुसार अनेक प्रकार की ज्योनार हुई। और तुलसी यहाँ फिर वही चाल चलते हैं जो नगर के वर्णन में चली थी, कि जिस घर में स्वयं माता भवानी रहती हों वहाँ की ज्योनार का वर्णन कैसे किया जाय। हिमाचल ने आदर से सब बरातियों को बुलवाया, विष्णु को, ब्रह्मा को, और सब जाति के देवताओं को। बहुत सी पंगतें बैठीं और चतुर रसोइये परोसने लगे।
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंगय बचन सुनावहीं।
छंद
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥
जेवँत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो।
अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
सब सुन्दरियाँ मीठे स्वर में गालियाँ देने लगीं और व्यंग्य भरे वचन सुनाने लगीं। देवता विनोद सुनकर सुख पाते हैं, इसलिये भोजन करने में बहुत देर लगा रहे हैं। यह इस पन्ने का आख़िरी चित्र है और इसमें सब कुछ उलट चुका है। जो स्त्रियाँ कुछ ही देर पहले त्रास से भागकर घर में घुस गयी थीं, वही अब उन्हीं मेहमानों को मीठे स्वर में खरी-खोटी सुना रही हैं। और मेहमान जान-बूझकर धीरे खा रहे हैं ताकि सुनना बन्द न हो।
भोजन के समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँह से भी कहा नहीं जा सकता। फिर सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिये गये और जो जहाँ ठहरा था, वहाँ चला गया। इसी पर यह प्रसंग बन्द हो जाता है। विवाह अभी हुआ नहीं है। इस पन्ने को उस जगह छोड़ा गया है जहाँ भोजन हो चुका, पान दिया जा चुका, और सब अपने-अपने ठिकाने जा चुके, यानी उस शान्ति पर जो किसी बड़ी घड़ी से ठीक पहले आती है।
सार: मैना और हिमवान् आनन्दित होकर बार-बार पार्वती के चरणों में झुकते हैं और सारा नगर प्रसन्न हो जाता है। मंगलगीत, सोने के कलश और विधिपूर्वक बनी ज्योनार होती है, बराती पंगतों में बैठते हैं, और स्त्रियाँ मीठे स्वर में देवताओं को गालियाँ सुनाती हैं। देवता विनोद सुनने के लिये जान-बूझकर देर लगाते हैं, और अन्त में पान लेकर सब अपने-अपने ठिकाने लौट जाते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पूरे प्रसंग में दूल्हा एक शब्द नहीं बोलता। उसके विषय में सब बोलते हैं, देवताओं की स्त्रियाँ, विष्णु, नगर के बच्चे, बच्चों के माता-पिता, एक माँ, और अन्त में नारद। उसके अपने हिस्से में केवल तीन काम आते हैं, वह मन ही मन मुसकराता है, अपने समाज को देखकर हँसता है, और चुपचाप जनवासे चला जाता है। जिस आदमी पर इतनी बातें हो रही हैं, वह उनमें से किसी का उत्तर देने खड़ा नहीं होता। यही इस पन्ने की सबसे बड़ी चुप्पी है।
और दूसरी बात, जो इस प्रसंग को पढ़ने के बाद देर तक साथ रहती है। मैना ग़लत है, यह पाठक को पहले पन्ने से मालूम है। फिर भी इस पन्ने की सबसे पैनी उपमाएँ उसी को दी गयी हैं, कल्पवृक्ष का फल बबूल में, और बाँझ को प्रसव की पीड़ा का पता न होना। कवि ने उसकी भूल को कमज़ोर बनाकर आसान नहीं किया। उसने उसे पूरी ताक़त दी, और तब उसका उत्तर दिलवाया, वह भी किसी बड़े के मुँह से नहीं, उसी बेटी के मुँह से जिसके लिये वह रो रही थी।
और तीसरी बात, जो इस पन्ने का असली ढाँचा है। पहले हिस्से में पार्वती ने कहा था कि आग के पास पाला ठहरता ही नहीं, और उसका आशय यह था कि उस वेष के भीतर कोई विकार बचा ही नहीं है जिससे डरा जाय। उसके बाद जितने लोग उस वेष को देखकर डरे, सब उसी बात को भूलकर डरे। डर वेष से उठा, और वेष के भीतर का समाचार पहले पन्ने पर दिया जा चुका था। यही कारण है कि इस प्रसंग का हास्य किसी को नीचा नहीं करता। जो जानता है वह हँसता है, जो नहीं जानता वह डरता है, और दोनों एक ही चीज़ के सामने खड़े हैं।
बालकाण्ड के इस प्रसंग में एक भी युद्ध नहीं है, एक भी वर नहीं माँगा जाता, कोई शाप नहीं दिया जाता। पूरा पन्ना एक बरात के चलने और एक घर के घबराने में बीत जाता है। और फिर भी यह उन थोड़े पन्नों में है जहाँ तुलसी अपनी सबसे कठिन बात बिना कहे कह जाते हैं, कि पहचान देखने से नहीं होती। जिन्होंने देखा वे सब डरे, और जिसने बिना देखे मान लिया था उसका पन अन्त तक टिका रहा।
और आख़िरी बात, जो इस पन्ने की सबसे मीठी है। जिस दिन की शुरुआत कुछ मुनियों के एक व्यंग्य से हुई थी, उसी दिन का अन्त घर की स्त्रियों के व्यंग्य से होता है। पहली बार व्यंग्य परीक्षा लेने आया था, और एक लड़की ने उसे मुसकराकर लौटा दिया था। दूसरी बार वह गाली बनकर आता है, मीठे स्वर में, देवताओं के सामने परोसी हुई पंगत पर, और देवता उसे सुनने के लिये भोजन लम्बा कर देते हैं। बीच में जो कुछ हुआ, वह सब इन्हीं दो हँसियों के बीच रखा हुआ है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ९० से ९८, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।