इस पृष्ठ पर
रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 11
शिव की बरात और मैना का विलाप
आग के पास पाला ठहरता ही नहीं, यह कहकर पार्वती ने मुनियों को उत्तर दिया। फिर वही बरात चली जिसे देखकर नगर के बच्चे भागे, और एक माँ ने अपनी बेटी को गोद में बिठाकर विधाता को कोसा।
इस प्रसंग में सबसे अधिक काम आँखों का है। बहुत से लोग एक ही दूल्हे को देखते हैं और हर बार कुछ और तय कर लेते हैं। देवताओं की स्त्रियाँ देखकर मुसकराती हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में है ही नहीं। विष्णु देखते हैं कि बरात दूल्हे के जोड़ की नहीं है। नगर के बच्चे देखते हैं और घर जाकर पूछते हैं, यह बरात है या यमराज की सेना? और एक माँ सोने का थाल लिये परछन करने निकलती है, देखती है, और वहीं टूट जाती है।
इसका उत्तर कथा के आरम्भ में ही, दूल्हे के शृंगार से भी पहले, उस लड़की के मुँह से दे दिया गया है। मुनि उससे कहने आये थे कि शिव ने कामदेव को भस्म कर डाला है। वह मुसकराकर उत्तर देती है। उत्तर में वह एक छोटी सी उपमा रख देती है जो आगे की सारी घटनाओं को पहले से तौल देती है।
बरात का यह पूरा दृश्य हँसी का है: गणों के अनगिनत वेष, बैल पर चढ़ा दूल्हा, डरकर भागते वाहन, काँपते बच्चे। पर उसी के बीच एक माँ का दुःख भी पूरा दर्ज है। मैना के मुँह से इस कथा की बहुत तीखी बातें निकलती हैं, जबकि वह भूल में है।
घराती और बराती
- पार्वती हिमाचल और मैना की पुत्री, जिनका प्रण इस प्रसंग के आरम्भ में बँधता है। वे अन्त तक एक बार भी अपने वर के विषय में शिकायत नहीं करतीं।
- शिव दूल्हा, जो इस पूरे प्रसंग में एक शब्द नहीं बोलते और एक बार मन ही मन मुसकराते हैं, एक बार हँसते हैं।
- मैना पार्वती की माता, जो हर्ष के साथ परछन करने निकलती हैं और विलाप करती हुई लौटती हैं।
- हिमाचल पर्वतों के राजा, पार्वती के पिता, जो लग्न लिखवाते हैं, सारे पर्वतों, वनों, समुद्रों, नदियों और तालाबों को नेवता भेजते हैं। घर की ख़बर पाते ही वे दौड़ पड़ते हैं।
- विष्णु बराती, जिनकी एक दिल्लगी इस बरात का रूप ही बदल देती है।
- नारद जिनका नाम इस प्रसंग में उलाहने में भी आता है और उद्धार में भी।
- सप्तर्षि वे मुनि जो पार्वती की परीक्षा लेने आये थे और यहाँ लग्नपत्रिका लेकर ब्रह्मा तक जाते हैं।
आग के पास पाला
पिछला प्रसंग वहाँ छूटा था जहाँ कामदेव भस्म हो चुका था और सप्तर्षि पार्वती से ठिठोली करने पहुँचे थे। उन्होंने कहा था कि शिव ने कामदेव को जला डाला, इसलिये अब आपका प्रण झूठा हो गया। इस बात के भीतर यह छींटा भी था कि उस दिन से पहले तक शिव काम के अधीन रहे होंगे। और जिसने शिव के लिये वर्षों तप किया है, उसी के सामने यह कहा गया है।
पार्वती पहले मुसकराती हैं। फिर कहती हैं, हे विज्ञानी मुनिवरो, आपने उचित ही कहा।
आपकी समझ में शिव ने कामदेव को अब जलाया है, यानी अब तक वे विकार वाले ही रहे। पर हमारी समझ में शिव सदा से योगी हैं, अजन्मा, अनिन्द्य, कामरहित और भोग से दूर। एक ही घटना है, और उसे देखने की दो समझें आमने सामने रख दी गयी हैं।
फिर पार्वती अपना प्रण बाँधती हैं। यदि मैंने मन, वचन और कर्म से प्रेम के साथ उन्हें ऐसा ही जानकर उनकी सेवा की है, तो हे मुनीश्वरो, सुनिये, वे कृपालु भगवान् मेरी प्रतिज्ञा सत्य करेंगे। और फिर वे सीधे कह देती हैं कि शिव ने कामदेव को भस्म किया, यह मानना ही आपका बड़ा भारी अविवेक है।
फिर वह उपमा आती है। हे तात, आग का सहज स्वभाव ही यह है कि पाला उसके पास कभी जा ही नहीं सकता। और चला जाये तो अवश्य नष्ट हो जाता है। शिव और कामदेव के बीच भी यही बात समझनी चाहिये।
मुनि जिस जलने को समाचार की तरह लाये थे, वह पार्वती की बात में वही है जो पाले के साथ होता है। जो पास आया, वह पास आने से नष्ट हुआ।
लग्न, और दूल्हे का शृंगार
पार्वती के वचन सुनकर और उनका प्रेम और विश्वास देखकर मुनि मन में बहुत प्रसन्न हुए। वे पार्वती को सिर नवाकर चल दिये और हिमाचल के पास पहुँचे। उन्होंने सारा हाल सुनाया। कामदेव के भस्म होने की बात सुनकर हिमाचल बहुत दुखी हुए, और फिर रति के वरदान की बात सुनकर बहुत सुखी हुए।
शिव का प्रभाव मन में विचारकर हिमाचल ने श्रेष्ठ मुनियों को आदर से बुलाया। शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी शोधवायी गयी, और वेद की विधि से जल्दी ही लग्न लिखवा लिया गया। हिमाचल ने वह लग्नपत्रिका सप्तर्षियों को सौंपी और उनके चरण पकड़कर विनती की। सप्तर्षि वह पत्रिका ब्रह्मा के पास ले गये, और उसे पढ़ते समय ब्रह्मा के हृदय में प्रेम समाता न था।
ब्रह्मा ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, और मुनियों और देवताओं का सारा समाज हर्षित हो गया। आकाश से फूल बरसे, बाजे बजे, दसों दिशाओं में मंगलकलश सज गये। देवता अपने तरह तरह के वाहन और विमान सजाने लगे, शुभ शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं। यहाँ तक यह किसी भी बड़े घर की बरात की तैयारी है। फिर कथा दिखाती है कि दूल्हे को कैसे तैयार किया जा रहा है।
शिव के गण शिव का शृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बाँधा गया और उस पर साँपों का मौर सजाया गया। शिव ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी, और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया। दूल्हे के शृंगार की हर चीज़ अपनी जगह पर है, केवल सामग्री बदली हुई है।
माथे पर चन्द्रमा, सिर पर गंगा, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला। और कथा साथ ही कह देती है कि वेष अशुभ है, पर पहननेवाले स्वयं कल्याण के धाम और कृपालु हैं। चन्द्रमा के बगल में साँप, गंगा के बगल में विष। शुभ और डरावना आपस में गुँथे हुए हैं।
यह बात वर्णन के भीतर ही आ जाती है। आगे जितने लोग इस वेष से घबरायेंगे, उनकी घबराहट का उत्तर इसी बात में पहले से है, और इसीलिये आगे की हँसी क्रूर नहीं होती।
एक हाथ में त्रिशूल, दूसरे में डमरू लिये, बैल पर चढ़कर शिव चल पड़े। बाजे बज रहे हैं। देवताओं की स्त्रियाँ उन्हें देखकर मुसकराती हैं और कहती हैं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में मिलेगी ही नहीं।
जैसा दूल्हा, वैसी बरात
विष्णु, ब्रह्मा और देवताओं के समूह अपने अपने वाहनों पर चढ़कर बरात में चले। देवताओं का समाज हर तरह से अनुपम था, पर दूल्हे के योग्य नहीं था। कथा एक ही साँस में दोनों बातें कहती है।
यह देखकर विष्णु हँसे। उन्होंने सब दिक्पालों को बुलाकर कहा कि सब लोग अपने अपने दल के साथ अलग अलग होकर चलिये, और कारण भी बताया।
हे भाई, यह बरात वर के जोड़ की नहीं है। क्या पराये नगर में जाकर हँसी करानी है? दूल्हा राख और साँप पहनकर बैल पर बैठा है, इसलिये विमानों की यह चमकती भीड़ उसके साथ मेल नहीं खाती। और चिन्ता भी घरेलू है: पराये नगर में हँसी होगी।
विष्णु की बात सुनकर देवता मुसकराये और अपनी अपनी सेना सहित अलग हो गये। शिव यह देखकर मन ही मन मुसकराते हैं कि विष्णु की दिल्लगी नहीं छूटती। शिव को अपने प्यारे विष्णु के ये वचन अति प्रिय लगते हैं। इन्हीं वचनों को सुनकर शिव ने भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया।
आज्ञा सुनते ही सब गण चले आये और उन्होंने शिव के चरणों में सिर नवाया। तरह तरह की सवारियाँ, तरह तरह के वेष। अपने इस समाज को देखकर शिव हँसे। किसी के मुँह नहीं, किसी के बहुत से मुँह। किसी के हाथ पैर नहीं, किसी के कई। किसी की बहुत आँखें, किसी की एक भी नहीं। कोई बहुत मोटा, कोई बहुत दुबला। भयंकर गहने, हाथों में कपाल, शरीर पर ताज़ा लहू। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार जैसे मुँह, और गिनती में न आनेवाली प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमातें।
भूत नाचते और गाते हैं, सब बड़े मौजी हैं। देखने में बहुत बेढंगे लगते हैं और बड़े विचित्र ढंग से बोलते हैं। पूरे वर्णन में कहीं नहीं लिखा कि ये किसी को हानि पहुँचाते हैं।
अब जैसा दूल्हा है, वैसी ही बरात बन गयी। विष्णु ने कहा था कि बरात वर के जोड़ की नहीं। शिव ने अपने गण बुलवा लिये, और अब बरात दूल्हे के जोड़ की है। रास्ते भर तरह तरह के कौतुक होते चलते हैं। पहले विष्णु बरात पर हँसे थे, फिर शिव अपने समाज पर हँसे।
हिमाचल का नगर
उधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनवाया जिसका वर्णन नहीं हो सकता। जगत में जितने छोटे बड़े पर्वत थे, सबको नेवता भेजा गया। फिर वनों, समुद्रों, नदियों और तालाबों को भी। बेटी का ब्याह है, इसलिये घराती बनकर पूरी पृथ्वी बुला ली गयी है।
वे सब अपनी इच्छा से रूप धर सकते थे। इसलिये वे सुन्दर शरीर धरकर, अपनी स्त्रियों और समाज के साथ, स्नेह से मंगलगीत गाते हुए हिमाचल के घर पहुँचे। हिमाचल ने पहले से बहुत से घर सजवा रखे थे, और सब यथायोग्य ठहरा दिये गये। नगर की शोभा के आगे ब्रह्मा की रचना की चतुराई भी छोटी लगती थी। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ, सब सुन्दर। घर घर पर मंगल के तोरण और ध्वजा पताकाएँ। वहाँ के स्त्री पुरुषों की छबि देखकर मुनियों तक का मन मोहित हो जाता था।
जिस नगर में स्वयं जगदम्बा ने, यानी जगत की माता ने, अवतार लिया हो, उसका वर्णन कैसे हो? वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित नये बढ़ते जाते हैं। यहीं, नगर का बखान करते करते, कथा पार्वती को जगदम्बा कह देती है। प्रसंग के अन्त से पहले नारद यही बात मैना से कहेंगे।
बच्चे भागे
बरात नगर के पास आ गयी है, यह सुनकर नगर में चहल पहल मच गयी, और उससे शोभा और बढ़ गयी। अगवानी करनेवाले सज धजकर, तरह तरह की सवारियाँ सजाकर, आदर से बरात लेने चले। देवताओं का समाज देखकर वे मन में प्रसन्न हुए, और विष्णु को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए।
फिर उन्होंने शिव का दल देखा, और पहला असर जानवरों पर हुआ। हाथी, घोड़े, रथ के बैल, सब वाहन डरकर भाग खड़े हुए। कुछ बड़ी उम्र के समझदार लोग धीरज धरकर डटे रहे। लड़के तो प्राण लेकर भागे। डर वहीं कम था जहाँ समझ ज़्यादा थी।
घर पहुँचने पर माता पिता पूछते हैं, और बच्चे डर से काँपते हुए उत्तर देते हैं: क्या कहें, कुछ कहा नहीं जाता। यह बरात है या यमराज की सेना? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है, और साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं। बच्चों ने जो गिनाया, वह सब वहाँ था: वही साँप, राख और बैल जो दूल्हे के शृंगार और उसके चलने में आये थे।
दूल्हे के शरीर पर राख, साँप और कपाल के गहने, नंगा, जटाधारी, भयंकर, और साथ में भयानक मुँह वाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस। फिर बच्चे कहते हैं कि जो इस बरात को देखकर जीता बचेगा, उसके सचमुच बड़े पुण्य होंगे, और वही पार्वती का विवाह देख पायेगा। लड़कों ने घर घर यही बात कही।
माता पिता यह सुनकर मुसकराते हैं, क्योंकि वे समझ जाते हैं कि यह शिव का समाज है। वे बहुत तरह से बच्चों को समझाते हैं कि निडर हो जाइये, डर की कोई बात नहीं। बड़ों को नाम मालूम है, बच्चों को केवल राख और कपाल दिखते हैं।
सोने का थाल
अगवान बरात को लिवा लाये और सबको सुन्दर जनवासे ठहरने को दिये। मैना ने शुभ आरती सजायी, और साथ की स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगीं। दूल्हे का परछन माँ करती है, और मैना उसे निभाने स्वयं आगे आती हैं।
सुन्दर हाथों में सोने का थाल लिये, मैना हर्ष के साथ शिव का परछन करने चलीं। वे उस क्षण तक प्रसन्न थीं। फिर जब शिव को उस विकट वेष में देखा, तो स्त्रियों के मन में बहुत बड़ा भय उठा। हर्ष और भय के बीच एक नज़र भर का फ़ासला है, और उसी में पूरा घर बदल जाता है।
स्त्रियाँ बहुत डरकर भागीं और घर में घुस गयीं, और शिव चुपचाप वहाँ चले गये जहाँ जनवासा था।
मैना के हृदय में बड़ा दुःख हुआ। उन्होंने पार्वती को अपने पास बुलाया और बहुत स्नेह से गोद में बिठा लिया। जिसे गोद में बिठाया जा रहा है, वह वर्षों तप कर चुकी तपस्विनी है जिसकी सप्तर्षि जय बोल चुके हैं। पर माँ के लिये वह अभी बेटी ही है। फिर नील कमल जैसी आँखों में आँसू भरकर मैना बोलीं।
वे बेटी से कहती हैं, और दोष विधाता पर रखती हैं: जिस विधाता ने आपको इतना सुन्दर रूप दिया, उस मूर्ख ने आपका दूल्हा बावला क्यों बनाया?
जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिये, वह ज़बरदस्ती बबूल में लग रहा है। फिर वे कहती हैं कि बेटी को लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी, या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाये और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाये।
और अन्त में वे अपना प्रण बाँधती हैं: जीते जी मैं इस बावले वर से आपका विवाह न करूँगी। इस कथा में यह दूसरा प्रण है। पहला उनकी बेटी ने आरम्भ में ही बाँधा था। दोनों प्रेम से उठे हैं, दोनों एक ही घर में, और दोनों में से एक ही टिक सकता है।
बाँझ क्या जाने
मैना को दुखी देखकर सारी स्त्रियाँ व्याकुल हो गयीं। मैना अपनी बेटी का स्नेह याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं। और उनकी बात एक नाम पर जाकर गिरती है।
मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया, और पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि उसने बावले वर के लिये तप किया? इतना सच है कि उपदेश नारद ने ही दिया था। पर मैना की सबसे तेज़ चोट इसके बाद आती है।
सचमुच उनके न मोह है न माया, न धन है, न घर, न स्त्री। वे सबसे उदासीन हैं, और इसीलिये दूसरे का घर उजाड़नेवाले हैं। उन्हें न लाज है न डर। भला बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा क्या जाने? जो सन्त का गुण है, उसी को यहाँ दोष का कारण बना दिया गया है। जिसके पास घर नहीं, वह घर की क़ीमत नहीं जानता।
इतनी पैनी बात उस स्त्री के मुँह में है जो भूल में है। नारद ने घर नहीं उजाड़ा, उपदेश ठीक दिया था, और जिसे बावला कहा जा रहा है वह जगत का कल्याण करनेवाला है। फिर भी कथा माँ की भूल को कमज़ोर शब्द नहीं देती।
माँ को व्याकुल देखकर पार्वती विवेक से भरी कोमल वाणी में बोलीं: हे माता, जो विधाता रच देते हैं वह टलता नहीं, यह सोचकर चिन्ता मत कीजिये। उन्होंने अपने वर का बचाव एक शब्द से भी नहीं किया।
अगर मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है, तो किसी को दोष क्यों दिया जाये? हे माता, क्या विधाता के अंक आपसे मिट सकते हैं? व्यर्थ कलंक का टीका मत लीजिये। पार्वती माँ की बात को एक शर्त की तरह लेती हैं: अगर ऐसा ही लिखा है।
हे माता, कलंक मत लीजिये, रोना छोड़िये, यह अवसर दुःख का नहीं है। मेरे भाग्य में जो दुःख सुख लिखा है, वह जहाँ जाऊँगी वहीं पाऊँगी। पार्वती दुःख और सुख दोनों का नाम लेती हैं, और उनका उत्तर इसी पर टिका है कि भाग्य में क्या लिखा है।
पर पार्वती के ये विनय भरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच में पड़ गयीं। वे तरह तरह से विधाता को दोष देकर आँसू बहाने लगीं। पार्वती ने पूछा था कि किसी को दोष क्यों दिया जाये, और स्त्रियों ने दोष विधाता पर रखा।
नारद का भेद खोलना
यह समाचार सुनते ही हिमाचल उसी समय नारद और सप्तर्षियों को साथ लेकर घर गये। जिस नारद पर अभी घर उजाड़ने का दोष लगा है, वही साथ आ रहे हैं। वे पूर्वजन्म की कथा सुनाकर सबको समझाते हैं।
हे मैना, मेरी सच्ची बात सुनिये, आपकी यह बेटी साक्षात् जगज्जननी है, सारे जगत की माता। यही बात कथा नगर के बखान में कह चुकी है। अब नारद इसे मैना को समझाने के लिये कहते हैं।
नारद बताते हैं कि ये अजन्मा, अनादि और अविनाशिनी शक्ति हैं। ये सदा शिव के अर्द्धांग में रहती हैं, जगत की उत्पत्ति, पालन और संहार करती हैं। अपनी इच्छा से ये लीला के लिये शरीर धारण करती हैं। जिस विवाह को रोका जा रहा है, उसका सम्बन्ध पहले से बना हुआ है।
पहले ये दक्ष के घर जन्मी थीं, तब इनका नाम सती था और इन्होंने बहुत सुन्दर शरीर पाया था। तब भी सती शिव से ही ब्याही गयी थीं, और यह कथा सारे जगत में प्रसिद्ध है।
एक बार शिव के साथ लौटते हुए सती ने राह में राम को देखा। उन्हें मोह हो गया, और शिव का कहना न मानकर भ्रम में उन्होंने सीता का वेष धारण कर लिया। इसी एक भूल से आगे की सारी कथा निकलती है।
सीता का वेष धरने के उसी अपराध पर शिव ने सती को त्याग दिया। फिर शिव के वियोग में वे अपने पिता के यज्ञ में जाकर योग की अग्नि से जल गयीं। अब इन्होंने आपके घर जन्म लेकर अपने ही पति के लिये कठिन तप किया है। यह जानकर सन्देह छोड़ दीजिये, पार्वती सदा से ही शिव की प्रिया हैं।
नारद के वचन सुनकर सबका दुःख मिट गया, और क्षण भर में यह समाचार सारे नगर में घर घर फैल गया। घर घर पहले बच्चों ने यमराज की सेना की बात फैलायी थी। अब उसी रास्ते उलटी ख़बर दौड़ रही है।
गालियाँ
तब मैना और हिमाचल आनन्द में डूब गये और उन्होंने बार बार पार्वती के चरणों की वन्दना की। कुछ देर पहले जो माँ बेटी को गोद में बिठा रही थी, वही अब उसके चरणों में झुक रही है। स्त्री, पुरुष, बालक, युवा और वृद्ध, नगर के सब लोग बहुत प्रसन्न हुए।
नगर में मंगलगीत गाये जाने लगे और सबने तरह तरह के सोने के कलश सजाये। पाकशास्त्र की रीति से अनेक प्रकार की ज्योनार बनी। जिस घर में स्वयं माता पार्वती रहती हों, वहाँ की ज्योनार का वर्णन कैसे हो? हिमाचल ने आदर से सब बरातियों को बुलवाया: विष्णु को, ब्रह्मा को, और सब जाति के देवताओं को। बहुत सी पंगतें बैठीं और चतुर रसोइये परोसने लगे।
देवताओं को भोजन करते देख स्त्रियाँ मीठे स्वर में गालियाँ गाने लगीं और व्यंग्य भरी बातें सुनाने लगीं। देवताओं को यह विनोद इतना अच्छा लगा कि वे भोजन में बहुत देर लगाने लगे।
भोजन के समय जो आनन्द बढ़ा, वह करोड़ों मुँह से भी कहा नहीं जा सकता। फिर सबके हाथ मुँह धुलवाकर पान दिये गये, और जो जहाँ ठहरा था वहाँ चला गया। विवाह अभी हुआ नहीं है। वह अगले प्रसंग में है।
दो व्यंग्यों के बीच
इस पूरे प्रसंग में दूल्हा एक शब्द नहीं बोलता। उसके बारे में सब बोलते हैं: देवताओं की स्त्रियाँ, विष्णु, नगर के बच्चे, उनके माता पिता, एक माँ, और अन्त में नारद। शिव के हिस्से में ये काम आते हैं: वे बैल पर चढ़कर चलते हैं, मन ही मन मुसकराते हैं, भृंगी को भेजकर अपने गण बुलवाते हैं। वे अपने समाज को देखकर हँसते हैं, और चुपचाप जनवासे चले जाते हैं।
मैना भूल में है, यह पार्वती के पहले उत्तर से ही खुल चुका है। फिर भी कथा की बहुत पैनी उपमाएँ उसी के मुँह में हैं, कल्पवृक्ष का फल बबूल में, और बाँझ को प्रसव की पीड़ा का पता न होना। और उसका उत्तर पहले उसी बेटी के मुँह से आता है जिसके लिये वह रो रही थी, फिर नारद के मुँह से।
पार्वती ने आरम्भ में कहा था कि आग के पास पाला ठहरता ही नहीं। यानी उस वेष के भीतर कोई विकार है ही नहीं जिससे डरा जाये। उसके बाद जो भी डरा, वेष देखकर डरा। जो जानता है वह हँसता है, जो नहीं जानता वह डरता है, और दोनों एक ही दूल्हे के सामने खड़े हैं। इसीलिये इस प्रसंग की हँसी किसी को नीचा नहीं करती।
यह पूरा प्रसंग एक बरात के चलने और एक घर के घबराने में बीत जाता है। बहुत से लोग वेष देखकर डरे, और पार्वती का प्रण अन्त तक टिका रहा।
यह प्रसंग मुनियों के एक व्यंग्य के उत्तर से खुलता है, और स्त्रियों के व्यंग्य पर बन्द होता है। पहला व्यंग्य ठिठोली बनकर आया था, और पार्वती ने उसे मुसकराकर लौटा दिया। दूसरा मीठी गाली बनकर पंगत पर आता है, और देवता उसे सुनने के लिये भोजन लम्बा कर देते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 90 से 98, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।