रामचरितमानस · बालकाण्ड · अवध का उत्सव और विश्वामित्र की विदाई
अवध का उत्सव और विश्वामित्र की विदाई
चारों दम्पतियों के स्वागत से माताओं की रात्रि की बातचीत तक, और दिनों तक बढ़ते आनन्द से विश्वामित्र की विदाई तथा बालकाण्ड के मंगलमय समापन तक।
अवध में माताएँ बार बार आरती उतार रही हैं। चारों पुत्र बहुओं के साथ सामने हैं, और उन्हें देखकर जीवन सफल जान पड़ता है। आभूषण, रत्न और वस्त्र निछावर होते जाते हैं; सीता का मुख देखती सखियाँ अपने भाग्य को सराहती हैं। इस घर लौटने का सुख इतनी दिशाओं में फैलता है कि देवताओं की पुष्पवर्षा, राजभवन का आतिथ्य और नगर के घरों में बजते बधावे, सब उसमें अपनी जगह पाते हैं। तुलसीदास के बालकाण्ड का यह अन्तिम प्रसंग उसी भरे हुए घर में हमें ले चलता है।
स्वागत के बाद भी कथा देर तक ठहरती है। दशरथ अतिथियों का सम्मान पूरा करके पुत्रों और बहुओं का दुलार करते हैं। रात को माताएँ राम के कोमल अंग देखकर उनके कठिन कामों का हाल पूछती हैं। फिर निद्रा है, प्रभात है, पिता की सभा है और गुरुओं का गुणगान है। आनन्द में कई दिन बीत जाते हैं; विश्वामित्र विदा चाहकर भी राम के प्रेम से रुकते रहते हैं। जब वे अन्त में चलते हैं, तब भी मन में यहाँ का रूप, भक्ति और उत्सव लिये जाते हैं। इसी स्मरण से कवि अपनी वाणी और सुनने वाले के हृदय तक पहुँचते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम और सीता जिनका रूप माताओं, सखियों और गुरुओं को आनन्द देता है और जिनके विवाह का मंगलगान इस सोपान को पूरा करता है।
- चारों भाई और बहुएँ स्वागत और पूजन में एक साथ विराजते दम्पति; प्रभात की दिनचर्या तथा गुरु को पहुँचाने में साथ रहने वाले भाई।
- दशरथ और रानियाँ आतिथ्य, उपहार और दुलार में मग्न परिवार, जिसके प्रेम में नयी बहुओं की सँभाल भी है।
- विश्वामित्र राजपरिवार की कृतज्ञता के केन्द्र, जिन्हें राम का स्नेह और विनय कई दिनों तक अवध में रोक लेते हैं।
- वसिष्ठ और वामदेव सभा में धर्म और विश्वामित्र की कीर्ति कहने वाले मुनि; वसिष्ठ परिवार के विधि और व्यवहार का मार्गदर्शन भी करते हैं।
आरती से महल के भीतर तक
आरती एक बार करके समाप्त नहीं होती। माताएँ उसे बार बार उतारती हैं और अनेक तरह की वस्तुएँ निछावर करती जाती हैं। तुलसी इस प्रेम और प्रमोद को कहते ही उसकी सीमा पूछते हैं, कौन इसे कह सकेगा। सामने चारों पुत्र हैं और उनके साथ बहुएँ हैं। माताओं की आँखें फिर सीता और राम पर लौटती हैं। देखने का यह दोहराव उनके सुख को खुलने देता है: हर बार वही छबि है, और हर बार अपना जन्म सफल होने का नया अनुभव है।
सखियाँ भी सीता के मुख को फिर फिर देखती हैं। उनके गीत में अपने पुण्य की सराहना है। जिस रूप का दर्शन मिल रहा है, उसका मिलना ही उन्हें अपने भाग्य का प्रमाण लगता है। ऊपर देवता क्षण क्षण फूल बरसाते हैं, नाचते और गाते हैं तथा अपनी अपनी सेवा अर्पित करते हैं। स्वागत में सबका कोई काम है। माताओं के हाथ आरती और निछावर में लगे हैं, सखियों की वाणी गीत में और देवताओं की प्रसन्नता पुष्पवर्षा में प्रकट हो रही है।
तभी कवि चारों मनोहर जोड़ियों के सामने सरस्वती को खड़ा कर देते हैं। वे सारी उपमाएँ ढूँढ़ लेती हैं, पर प्रत्येक इतनी छोटी लगती है कि उसे दे नहीं पातीं। रूप का वर्णन करने के लिये आयी वाणी स्वयं रूप में अनुरक्त होकर एकटक रह जाती है। यह दृश्य स्वागत के भीतर एक विराम जैसा है। जिनके पास तुलना के सारे साधन हैं, उनकी आँखों को भी इस समय बस देखते रहना प्रिय है। माताओं और सखियों के बार बार देखने के साथ सरस्वती का यह एकटक देखना जुड़ जाता है।
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
दोहा ३४९
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत॥ ३४९॥
अब वेद की विधि और कुल की रीति पूरी करके अर्घ्य और पाँवड़े दिये जाते हैं। परछन के बाद माताएँ सब पुत्रों को बहुओं सहित महल के भीतर ले चलती हैं। द्वार पर उमड़े प्रेम को घर के आचरण में प्रवेश मिल गया है। दम्पतियों को देखने वाले इतने हैं, फिर भी इस आगे ले जाने का काम माताओं के हाथ है। वे जिन्हें आरती में निहार रही थीं, उन्हें अब भीतर बैठाकर पूजेंगी। स्वागत की गति इसी कोमल क्रम से चलती है: देखना, निछावर करना, विधि निभाना और अपने घर में लिवा लेना।
चारों दम्पतियों को देखकर माताएँ आनन्द में डूबती हैं। सखियाँ गाती हैं, देवता सेवा अर्पित करते हैं और सरस्वती उपमाएँ छोटी पाकर रूप को देखती रह जाती हैं। वेद और कुल की रीति के साथ माताएँ सबको महल में ले चलती हैं।
चार सिंहासन और छह सुखों की उपमा
भीतर चार सिंहासन हैं। उनकी सहज सुन्दरता ऐसी है मानो कामदेव ने अपने हाथों से उन्हें बनाया हो। माताएँ उन पर राजकुमारों और राजकुमारियों को बैठाती हैं तथा आदर से उनके पवित्र चरण धोती हैं। फिर धूप, दीप और नैवेद्य के साथ वेदविधि से वरों और वधुओं की पूजा होती है। सिरों पर सुन्दर पंखे और चँवर ढल रहे हैं। आरती यहाँ भी बार बार लौटती है, और निछावर होने वाली वस्तुओं की अनेकता के बीच माताएँ आनन्द से भरी हुई शोभा पाती हैं।
उनके इस सुख को समझाने के लिये तुलसी छह उपमाएँ पास पास रखते हैं। पहली, मानो किसी योगी को परम तत्त्व मिल गया हो। दूसरी, सदा रोग में पड़े रहने वाले को अमृत प्राप्त हो गया हो। एक में साधना की परम प्राप्ति है, दूसरे में लगातार चली आती पीड़ा के सामने अमृत है। दोनों उपमाएँ उस मिलने का स्वाद देती हैं जिसकी प्रतीक्षा में जीवन की बहुत बड़ी कमी छिपी थी। माताएँ पुत्रों और बहुओं को सामने बिठाये हैं, और कवि उस घरेलू सुख के लिये मनुष्य की सबसे बड़ी प्राप्तियों को बुला रहे हैं।
जनम रंक जनु पारस पावा । अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥
चौपाई १
मूक बदन जनु सारद छाई । मानहुँ समर सूर जय पाई॥
तीसरी उपमा जन्म से दरिद्र रहे व्यक्ति की है जिसे पारस मिल गया। चौथी, अन्धे व्यक्ति को सुन्दर नेत्र मिल गये। पाँचवीं में बोल न सकने वाले के मुख में सरस्वती आ विराजती हैं। छठी में युद्ध का शूरवीर विजय पाता है। धन की कमी, देखने की कमी, कहने की कमी और रण में विजय की आकांक्षा, ये अलग अलग अनुभव हैं। हर उपमा सुख की कोई और गहराई खोलती है। योगी और रोगी से चली यह गणना दरिद्र, अन्धे, मूक और योद्धा तक पहुँचकर पूरी होती है।
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।
दोहा ३५० (क)
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु॥ ३५० (क)॥
और तब कवि इन सब सुखों को पीछे छोड़ती हुई माताओं के आनन्द की माप रखते हैं: सौ करोड़ गुना। कारण दोहे की अगली पंक्ति में ही है। रघुकुल के चन्द्रमा राम भाइयों सहित विवाह करके घर आये हैं। छह उपमाओं की विशालता के बाद यह कारण बहुत अपना लगता है। माताओं को सामने बैठे हुए पुत्र और बहुएँ मिले हैं। जिन सुखों के लिये कवि संसार की अनेक दशाएँ गिना रहे थे, वे सब इस एक घर आने के सुख को समझाने में लगे हैं।
लोक रीति जननीं करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
दोहा ३५० (ख)
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसुकाहिं॥ ३५० (ख)॥
इतने बड़े आनन्द के बीच लोकरीति का विनोद भी चल रहा है। माताएँ रीति करती हैं, वर और वधुएँ सकुचाते हैं, और राम उस मोद तथा विनोद को देखकर मन ही मन मुसकराते हैं। यह मुसकान भीतर की है। सामने की हँसी खुशी को वे चुपचाप देख रहे हैं। पहले दोहे में माताओं के सुख का विस्तार है; उसके साथ रखे दूसरे दोहे में उन्हीं माताओं के व्यवहार से उपजा संकोच और राम की छोटी सी मुसकान है। पूजा, लाड़ और विनोद एक ही बैठक में अपना अपना रंग रखते हैं।
चारों दम्पति सिंहासनों पर विराजते हैं और माताएँ उनके चरण धोकर पूजा करती हैं। योगी, रोगी, दरिद्र, अन्धे, मूक और विजयी वीर के छह सुखों से सौ करोड़ गुना आनन्द माताओं को मिलता है। लोकरीति में दम्पति सकुचाते हैं और राम मन में मुसकराते हैं।
आशीर्वाद के आँचल और सबके लिये उपहार
मन की सभी कामनाएँ पूरी हुई जानकर माताएँ देवताओं और पितरों का भलीभाँति पूजन करती हैं। वन्दना के साथ जो वर माँगा जाता है, वह भाइयों सहित राम का कल्याण है। प्राप्त सुख उन्हें आशीर्वाद माँगने से विरत नहीं करता। चारों पुत्र सामने हैं, विवाह करके घर आ गये हैं, और अब उन्हीं के मंगल की प्रार्थना उठ रही है। देवता अदृश्य रहकर आशीष देते हैं; माताएँ हर्षित होकर आँचल भर लेती हैं। निछावर देते हाथों के बाद आशीर्वाद ग्रहण करते आँचल का यह चित्र आता है।
दशरथ बरातियों को बुलवाते हैं। सवारियाँ, वस्त्र, रत्न और आभूषण उन्हें दिये जाते हैं। आज्ञा मिलने पर सब प्रसन्न होकर अपने अपने घर चलते हैं, हृदय में राम को रखे हुए। बाहर से मिले उपहारों के साथ भीतर का यह स्मरण भी चलता है। विदा में राजा की उदारता दिखती है, और जाने वालों की दिशा उनके अपने घर होने पर भी मन का स्थान राम के पास बना रहता है।
नगर के स्त्री पुरुषों को भी कपड़े और गहने पहनाये जाते हैं। घर घर बधावे बज उठते हैं। विवाह का आनन्द अब उन अनेक घरों में सुनायी देता है जहाँ लोग लौटे हैं। याचक जो जो माँगते हैं, राजा विशेष प्रसन्न होकर वही वही देते हैं। यहाँ देने की प्रसन्नता माँग को सुनती है। वस्तुओं की सूची से आगे तुलसी इस बात पर बल रखते हैं कि जिसके मन में जो इच्छा है, उसे उसके अनुरूप प्राप्त हो रहा है।
सम्पूर्ण सेवकों और अलग अलग बाजे बजाने वालों का दान तथा सम्मान से सन्तोष किया जाता है। उत्सव के जिन हाथों और स्वरों ने साथ दिया, वे भी इस वितरण में आते हैं। जोहार करके सब आशीष देते हैं और गुणों की गाथा गाते हैं। पहले देवताओं के आशीर्वाद अदृश्य आये थे; अब लोगों के मुख से आशीष सुनायी पड़ती है। लेने और देने के इस क्रम से नगर की प्रसन्नता का रूप पूरा होता है।
देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
दोहा ३५१
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ॥ ३५१॥
सबको सन्तुष्ट करने के बाद दशरथ गुरु और ब्राह्मणों सहित महल में प्रवेश करते हैं। बाहर के आदर का क्रम यहाँ समाप्त होकर भीतर के आतिथ्य को सौंप देता है। रानियों को अब इन पूज्य अतिथियों का स्वागत करना है, और राजा वसिष्ठ के निर्देश से लोक तथा वेद की विधियाँ पूरी करेंगे। उत्सव में हर समूह को उसका समय मिलता है। बराती, नगरवासी, याचक, सेवक और वादक अपने सम्मान के साथ विदा हुए हैं; मुनियों और ब्राह्मणों की सेवा के लिये राजपरिवार फिर सजग है।
माताएँ देवता और पितरों से भाइयों सहित राम का कल्याण माँगती हैं। दशरथ बरातियों, नगरवासियों, याचकों, सेवकों और वादकों को उनकी इच्छानुसार दान तथा सम्मान देते हैं। आशीर्वाद और गुणगान के बीच वे गुरु तथा ब्राह्मणों को लेकर महल में आते हैं।
दो गुरुओं की सेवा
वसिष्ठ जो आज्ञा देते हैं, दशरथ उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार आदर से करते हैं। बहुत से ब्राह्मणों को देखकर रानियाँ अपना बड़ा भाग्य मानती हुई उठ खड़ी होती हैं। चरण धोये जाते हैं, स्नान कराया जाता है और राजा भलीभाँति पूजन करके भोजन कराते हैं। आदर, दान और प्रेम से सन्तुष्ट अतिथि आशीर्वाद देते हुए चलते हैं। सेवा के प्रत्येक भाग को तुलसी अलग रखते हैं, जिससे सत्कार का अर्थ हमारे सामने खुलता जाता है: शरीर का सुख, सम्मान और मन को भरने वाला प्रेम।
विश्वामित्र के लिये दशरथ का हृदय विशेष कृतज्ञता से भरता है। वे गाधिपुत्र की अनेक प्रकार से पूजा करके अपने को धन्य कहते हैं, हे नाथ, मेरे समान दूसरा धन्य कौन है। बहुत प्रशंसा करने के बाद रानियों सहित उनकी चरणधूलि लेते हैं। उन्हें महल के भीतर उत्तम निवास दिया जाता है। पोद्दार जी की टीका इस भीतर ठहराने का आशय खोलती है: राजा और रनिवास उनके मन के अनुसार आराम की ओर स्वयं ध्यान दे सकें। अतिथि कहाँ ठहरेंगे, यह भी सेवा का ही प्रश्न है। पास रहने से उनकी इच्छा समझने और पूरा करने का अवसर बना रहेगा।
इसके बाद दशरथ फिर गुरु वसिष्ठ के चरणकमलों की पूजा करते हैं। विश्वामित्र के लिये भीतर निवास की व्यवस्था हो चुकी है; अब कुलगुरु के सामने राजा की विनती है। उनके हृदय में बहुत प्रीति है। बहुओं सहित सभी कुमार, रानियों सहित राजा, पूरा परिवार बार बार गुरु के चरणों की वन्दना करता है। सामने से आशीर्वाद मिलते हैं। इस बार नमस्कार केवल राजा का नहीं रह गया है। विवाह से बना नया पारिवारिक समाज एक साथ गुरु के सामने झुक रहा है।
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
दोहा ३५२
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु॥ ३५२॥
दशरथ अत्यन्त अनुराग से अपने पुत्रों और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर विनय करते हैं। वसिष्ठ अपना नेग माँगकर लेते हैं और बहुत तरह से आशीर्वाद देते हैं। टीका इसे पुरोहित के नाते मिलने वाला नेग बताती है। राजा का अर्पण इतना बड़ा है, और गुरु उसी में से परम्परा का अपना अंश ग्रहण करते हैं। फिर सीता सहित राम को हृदय में धारण करके हर्षपूर्वक अपने स्थान को चले जाते हैं। विश्वामित्र को महल में ठहराया गया था; वसिष्ठ इस पूजन के बाद अपने निवास को जाते हैं। दोनों सत्कारों का अपना पूरा क्रम है।
राजा सब ब्राह्मणों की स्त्रियों को बुलाकर सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनाते हैं। फिर सुआसिनियों को बुलवाते हैं और उनकी रुचि समझकर पहिरावनी देते हैं। टीका सुआसिनियों में नगर की सौभाग्यवती बहिन, बेटी और भानजी आदि का आशय बताती है। जिनका नेग बनता है, वे अपना नेग लेते हैं और राजा उनकी इच्छा के अनुसार देते हैं। प्रिय तथा पूजनीय अतिथियों का भलीभाँति सम्मान होता है। इस विस्तार में सम्बन्ध और रुचि दोनों पहचाने जाते हैं; हर किसी का आदर एक ही ढंग से निपटाया नहीं जाता।
देवता विवाह का उत्सव देखकर और उसकी प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए लौटते हैं। नगाड़े बजते हैं। अपने अपने लोकों को जाते समय वे परस्पर राम का यश कहते हैं, और हृदय में प्रेम समाता नहीं। बराती भी राम को हृदय में लेकर गये थे, गुरु वसिष्ठ भी सीताराम को भीतर धारण करके चले, और अब देवताओं की विदा में भी वही भरा हुआ मन है। उत्सव देखने वाले अपनी अपनी दिशा में जाते हुए उसका यश साथ लिये हैं।
ब्राह्मणों का सत्कार पूरा करके दशरथ विश्वामित्र को महल में ठहराते हैं, ताकि परिवार उनकी इच्छानुसार सेवा कर सके। वसिष्ठ परिवार की वन्दना और अपना नेग स्वीकारकर लौटते हैं। स्त्रियों, नेग पाने वालों और अतिथियों का सम्मान होता है; देवता राम का यश कहते हुए विदा होते हैं।
रनिवास की कथा और रात का भोजन
सबका आदर करके राजा का हृदय उत्साह से भर गया है। अब वे रनिवास में जाते हैं और बहुओं सहित कुमारों को देखते हैं। आनन्द से पुत्रों को गोद में लेते हैं। फिर पुत्रवधुओं को भी प्रेम से गोद में बैठाकर बार बार दुलारते हैं। इस सुख का वर्णन कौन कर सकता है, कवि फिर वही असमर्थता प्रकट करते हैं। बाहर राजा ने सबको दान और सम्मान दिया था। यहाँ उनका हर्ष अपने घर के बीच पुत्रों तथा बहुओं को पास बैठाने में व्यक्त होता है।
रनिवास इस समाज को देखकर प्रसन्न है। सबके हृदय में आनन्द बस गया है, और दशरथ अब विवाह जिस प्रकार हुआ, वह सुनाते हैं। सुनने वाले सुन सुनकर हर्षित होते हैं। जनक के गुण, शील, महत्त्व, प्रेम की रीति और सुन्दर सम्पदा का राजा बहुत प्रकार से वर्णन करते हैं। तुलसी कहते हैं कि वे भाट की तरह बखान कर रहे हैं। दूसरे राजा की प्रशंसा करने में उन्हें इतना सुख है कि गुणगान करने वाले का काम अपने हाथ में ले लेते हैं। जनक का आचरण सुनकर रानियाँ विशेष प्रसन्न होती हैं।
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।
दोहा ३५४
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥ ३५४॥
इसके बाद राजा पुत्रों सहित स्नान करते हैं। ब्राह्मणों, गुरु और कुटुम्बियों को बुलाकर अनेक प्रकार का भोजन होता है। इतने में पाँच घड़ी रात बीत गयी है। समय की यह छोटी सी सूचना हमें उस व्यस्त संध्या का विस्तार समझाती है। स्वागत, पूजा, अतिथियों की सेवा, परिवार का मिलना और विवाह का बखान, सबके बीच रात आगे बढ़ चुकी है। सुन्दर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं; सुख देने वाली यह रात मन को हर रही है।
सब आचमन करके पान खाते हैं। फूलों की मालाएँ और सुगन्धित द्रव्य उनकी शोभा बढ़ाते हैं। राम के दर्शन करके और राजा की आज्ञा पाकर लोग सिर नवाते हुए अपने घरों को लौट जाते हैं। प्रेम, आनन्द, विनोद, महत्त्व, वह समय, वह समाज और उसकी मनोहरता, तुलसी इन सबको एक साथ स्मरण करते हैं। सैकड़ों सरस्वती और शेष, वेद, ब्रह्मा, महादेव तथा गणेश भी उसका वर्णन नहीं कर सकते। तब अपने कह सकने की सीमा के लिये वे केंचुए की उपमा रखते हैं: क्या वह पृथ्वी को सिर पर उठा सकता है।
नृप सब भाँति सबहि सनमानी । कहि मृदु बचन बोलाईं रानी॥
चौपाई २
बधू लरिकनीं पर घर आईं । राखेहु नयन पलक की नाईं॥
इस विराट सुख के बीच दशरथ रानियों को कोमल वचन कहकर बुलाते हैं। उनकी बात अब बहुओं की सँभाल पर है। बहुएँ छोटी हैं, दूसरे घर आयी हैं; उन्हें ऐसे रखना जैसे पलकें आँखों को रखती हैं। उपमा का सौन्दर्य उसकी निकटता में है। पलकें आँख के साथ लगी रहती हैं और उसकी रक्षा तथा सुख का ध्यान रखती हैं। नये घर में आयी बहुओं के लिये राजा इसी सहज, निरन्तर संरक्षण की कामना करते हैं। उनके दुलार का उत्तरदायित्व रानियों की इस देखभाल में आगे चलता है।
पुत्र भी थके हैं और नींद के वश हो रहे हैं। दशरथ उन्हें ले जाकर सुलाने के लिये कहते हैं। इतना कहकर वे राम के चरणों में चित्त लगाये अपने विश्रामभवन में चले जाते हैं। जिनके लिये घर भर में जागरण और उत्सव है, उनके शरीर की थकान भी पिता की दृष्टि में है। रात को सुन्दर बनाने वाले गीतों और साज के साथ अब विश्राम की आवश्यकता स्वीकार की जाती है। रानियाँ राजा के इन सहज सुन्दर वचनों को सुनकर शय्याओं की व्यवस्था कराती हैं।
दशरथ पुत्रों और बहुओं का दुलार करके विवाह की कथा तथा जनक के गुण सुनाते हैं। स्नान और भोजन तक पाँच घड़ी रात बीत जाती है। वे रानियों से बहुओं को पलकों की तरह सँभालने और थके पुत्रों को सुलाने को कहकर विश्राम करने जाते हैं।
माताओं के प्रश्न, और राम का विनय
मणियों से जड़े सोने के पलँग बिछाये जाते हैं। उन पर गौ के दूध के फेन जैसी सुन्दर, सफेद और कोमल चादरें हैं। मणियों के भवन में उत्तम तकिये, फूलों की मालाएँ, सुगन्धित द्रव्य, रत्नों के दीपक और सुन्दर चँदोवे, सब शयनस्थान की शोभा में मिलते हैं। जिसे यह दृश्य देखने मिला हो वही जाने, कवि कहते हैं। माताएँ राम को उठाकर प्रेम सहित पलँग पर लिटाती हैं। राम अपने भाइयों को बार बार आज्ञा देते हैं; तब वे भी अपनी अपनी सेज पर शयन करते हैं।
राम की साँवली, सुन्दर और कोमल देह देखते हुए माताओं की बातचीत शुरू होती है। वही देह सामने है जिसके कठिन कामों की बात वे जानती हैं। प्रेम से पूछती हैं, मार्ग में जाते हुए इतनी भयानक ताड़का को किस प्रकार मारा। प्रश्न में सामने दिखती कोमलता और किये गये विकट कर्म एक साथ हैं। वे राम को देखती हैं और उस देखे हुए रूप के साथ सुने हुए पराक्रम को रखकर विस्मित होती हैं।
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।
दोहा ३५६
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥ ३५६॥
अगला प्रश्न मारीच और सुबाहु के विषय में है। माताएँ उन्हें भयानक निशाचर और ऐसे विकट योद्धा कहती हैं जो युद्ध में किसी को कुछ नहीं गिनते। फिर राम से पूछती हैं कि उन दुष्टों को सहायकों सहित कैसे मारा। यह उन्हीं की प्रेमभरी जिज्ञासा है। प्रश्न कहते हुए भी वे उनके सामने बैठे पुत्र की कोमलता से बाहर नहीं आतीं। ताड़का के बाद ये नाम उनकी वाणी में आते हैं, और कठिन कार्यों का विस्मय अब मुनि की कृपा के प्रति कृतज्ञता में खुलता है।
वे बलैया लेती हुई कहती हैं कि मुनि की कृपा से ईश्वर ने बहुत सी बलाएँ टाल दीं। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रक्षा की और गुरु के प्रसाद से सभी विद्याएँ पायीं। चरणों की धूलि लगते ही मुनिपत्नी का उद्धार हुआ और यह कीर्ति पूरे जगत में फैल गयी। पोद्दार जी की टीका यहाँ मुनिपत्नी को अहल्या के नाम से पहचानती है। माताओं के स्मरण में रक्षा, शिक्षा और उद्धार एक के बाद एक आते हैं; हर उपलब्धि के साथ उनका आभार और प्रगाढ़ होता चलता है।
वे शिवधनुष के टूटने की बात भी कहती हैं। कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर धनुष राजाओं के समाज में तोड़ा गया। विश्वविजय का यश मिला, जानकी मिलीं और सभी भाई विवाह करके घर आये। माताएँ राम के इन कर्मों को मनुष्य की शक्ति से परे कहती हैं तथा उनके सम्पन्न होने का श्रेय केवल विश्वामित्र की कृपा को देती हैं। उनका कथन इसी सम्बन्ध को बार बार सँभालता है: पुत्र की सामर्थ्य विस्मित करती है और गुरु का अनुग्रह उसके साथ स्मरण में आता है।
फिर यह पूरी प्रशंसा एक बहुत निजी इच्छा पर आकर ठहरती है। राम का चन्द्रमा जैसा मुख देखकर माताएँ आज अपने जन्म को सफल मानती हैं। जो दिन उनके दर्शन के बिना बीते, ब्रह्मा उन्हें आयु की गिनती में न लायें। इतने महान् काम गिनाने के बाद भी उनके मन का हिसाब दर्शन से बनता है। पुत्र को देख पाने वाला आज का दिन सार्थक है; बिना देखे बीता समय ऐसा है जिसे वे अपनी आयु में जोड़ना नहीं चाहतीं। इस वाक्य में उनके विरह का परिमाण कोई संख्या लिये बिना प्रकट हो जाता है।
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
दोहा ३५७
सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन॥ ३५७॥
राम विनय से भरे उत्तम वचन कहकर सब माताओं को सन्तुष्ट करते हैं। उनकी ओर से उत्तर का यही रूप मिलता है, कोमल आश्वासन और विनय। इसके बाद वे शिव, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण करके नेत्रों को नींद के वश कर देते हैं। माताओं की वाणी में गुरु की कृपा बार बार आयी थी; राम की निद्रा भी पूज्य चरणों के स्मरण के साथ आती है। प्रश्नों, प्रशंसा और स्नेह का यह लम्बा संवाद अन्त में संतोष देकर शान्त हो जाता है।
राम को शय्या पर लिटाकर माताएँ ताड़का, मारीच और सुबाहु के विषय में प्रश्न करती हैं। वे यज्ञरक्षा, विद्याप्राप्ति, अहल्या के उद्धार, धनुषभंग और विवाह का स्मरण करके विश्वामित्र की कृपा सराहती हैं। दर्शनरहित दिनों को आयु में न गिनने की इच्छा सुनकर राम उन्हें विनयपूर्ण वचनों से सन्तुष्ट करते हैं और सो जाते हैं।
कमल सा सोया मुख और सरयू का प्रभात
नींद में भी राम का सलोना मुख सुन्दर लग रहा है, मानो सन्ध्या के समय लाल कमल हो। घर घर स्त्रियाँ जागरण कर रही हैं और आपस में मंगलमयी गारियाँ देती हैं। दिन का लोकविनोद रात्रि में भी बना हुआ है। रानियाँ अपनी सखियों को रात की शोभा दिखाती हैं, उससे अवध और भी सुशोभित है। फिर सासुएँ सुन्दर बहुओं को साथ लेकर सोती हैं। कवि उन्हें ऐसे देखते हैं मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियाँ हृदय में छिपा ली हों। दिन भर रत्न निछावर हुए थे; इस समय बहुएँ ही हृदय में रखी हुई मणियों जैसी हैं।
प्रातःकाल के पवित्र समय में राम जागते हैं। टीका इसे ब्राह्ममुहूर्त कहती है। मुर्गे बोलने लगे हैं, भाट और मागध गुणगान करते हैं तथा नगर के लोग जोहार करने द्वार पर आये हैं। पिछली रात जिन स्वरों में मंगलगान था, अब उसी अवध में प्रभात का गुणगान सुनायी देता है। नगर अपने राजकुमारों के दर्शन और वन्दन के लिये फिर उपस्थित है। भीतर सभी भाई ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओं की वन्दना करते हैं। आशीर्वाद पाकर उनके मन प्रसन्न होते हैं।
माताएँ आदर के साथ उनके मुख देखती हैं। रात को जिस चन्द्रमुख को देखकर वे अपने जन्म की सफलता कह रही थीं, प्रभात में भी वही दर्शन उनके हिस्से आता है। इसके बाद राजकुमार पिता के साथ बाहर पधारते हैं। कथा में रात और सुबह के बीच यह सुन्दर निरन्तरता है: स्नेह फिर देखने में व्यक्त होता है, और पुत्रों का दिन पूज्य जनों की वन्दना तथा उनके आशीर्वाद से शुरू होता है।
कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
दोहा ३५८
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥ ३५८॥
स्वभाव से ही पवित्र चारों भाई शौचादि से निवृत्त होकर पवित्र नदी में स्नान करते हैं। पोद्दार जी की टीका इस नदी को सरयू बताती है और प्रातःक्रिया में सन्ध्या वन्दन आदि का अर्थ देती है। स्नान तथा नित्यकर्म पूरे करके वे पिता के पास लौटते हैं। विवाह की रात का उत्सव अब अगले दिन के नियम में आ गया है। चारों भाई साथ हैं और उनके लौटने पर पिता की ओर से वही स्नेह मिलता है जो रात को रनिवास में था।
भूप बिलोकि लिए उर लाई । बैठे हरषि रजायसु पाई॥
चौपाई ३
देखि रामु सब सभा जुड़ानी । लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥
दशरथ देखते ही उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। आज्ञा पाकर वे प्रसन्नतापूर्वक बैठते हैं। राम को देखकर पूरी सभा शीतल हो जाती है; लोगों को लगता है कि नेत्रों के लाभ की अन्तिम सीमा यही है। टीका इस शीतलता में तीनों प्रकार के तापों के सदा के लिये मिट जाने का अर्थ खोलती है। पिछली रात माताओं को दर्शन से जन्म सफल लगा था। अब सभा भी उसी दर्शन को आँखों का पूरा लाभ मान रही है। व्यक्तिगत दुलार से सभा के सामूहिक आनन्द तक राम का देखा जाना इसी तरह चलता है।
नगर में जागरण होता है और सासुएँ बहुओं को हृदय की मणियों की तरह साथ लेकर सोती हैं। प्रभात में चारों भाई वन्दना और आशीर्वाद के बाद सरयू में स्नान करके नित्यकर्म करते हैं। पिता उन्हें गले लगाते हैं और राम के दर्शन से पूरी सभा शीतल होती है।
सभा की कथाएँ और बढ़ते हुए दिन
वसिष्ठ और विश्वामित्र सभा में आते हैं। दशरथ उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाते हैं और पुत्रों सहित पूजा करके चरण लगते हैं। दोनों गुरु राम को देखकर प्रेम में मुग्ध हो जाते हैं। सत्कार की विधि और दर्शन का अनुराग यहाँ साथ साथ दिखाई देते हैं। राजा आसन देते हैं, कुमार वन्दना में सम्मिलित होते हैं और गुरु उस सामने बैठे हुए रूप को देखकर प्रेम में भरते हैं। अभी जिस दर्शन से सभा शीतल हुई, उसी की माधुरी गुरुओं के भाव में भी खुलती है।
वसिष्ठ धर्म के इतिहास कहते हैं। राजा रनिवास सहित सुनते हैं। फिर वे विश्वामित्र की करनी का आनन्दपूर्वक बहुत प्रकार से वर्णन करते हैं। उसे मुनियों के मन के लिये भी अगम्य बताया गया है। विश्वामित्र स्वयं उपस्थित हैं और वसिष्ठ उनका गुणगान कर रहे हैं। कथा सुनाने की जगह, सुनने वाला राजपरिवार और सामने बैठे मुनि, इन सबके बीच प्रशंसा का यह आदान प्रदान सभा का मुख्य सुख बन जाता है।
वामदेव इन बातों को सत्य कहते हैं। विश्वामित्र की सुन्दर कीर्ति तीनों लोकों में छायी हुई है। यह सुनकर सभी आनन्दित होते हैं, पर राम और लक्ष्मण के हृदय में उत्साह अधिक है। उनके इस अधिक हर्ष को तुलसी अलग से रखते हैं। सब मुनि की बड़ाई सुन रहे हैं; दोनों भाइयों के लिये उस बड़ाई का उल्लास कुछ और बढ़ा हुआ है। माताओं की रात्रि की वाणी में विश्वामित्र की कृपा का जो स्मरण था, सभा के कथन में उनका यश फिर सबके सामने आता है।
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।
दोहा ३५९
उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति॥ ३५९॥
ऐसे नित्य मंगल, आनन्द और उत्सव होते हैं तथा दिन बीतते जाते हैं। अयोध्या आनन्द से भरकर उमड़ रही है। दोहे में बढ़ने की बात फिर फिर आती है, अधिक होता सुख और उस अधिकता का भी बढ़ना। स्वागत की एक रात अब कई दिनों के उल्लास में फैल गयी है। दैनिक सभा, गुरुओं का सम्मान और उनका सुनाया हुआ वृत्तान्त उसी समय का हिस्सा हैं। कथा जल्दी करके विदाई तक नहीं पहुँचती; वह अवध के इस लगातार बढ़ते हुए आनन्द में कुछ दिन हमें भी रखती है।
शुभ दिन का विचार करके सुन्दर कंकण खोले जाते हैं। विवाह के इस कार्य में भी बहुत मंगल, आनन्द और विनोद होता है। नित्य नये सुख देखकर देवता सिहाते हैं और ब्रह्मा से अवध में जन्म पाने की याचना करते हैं। पहले उन्होंने फूल बरसाकर सेवा की थी और अपने लोकों को जाते हुए उत्सव की प्रशंसा की थी। अब नगर के दिनों में ऐसा सुख देखते हैं कि इसी स्थान पर जन्म चाहते हैं। आनन्द के विस्तार को कवि यहाँ देवताओं की उस इच्छा में प्रकट करते हैं।
वसिष्ठ धर्म के इतिहास और विश्वामित्र की महिमा कहते हैं; वामदेव उसकी सत्यता तथा तीनों लोकों की कीर्ति बताते हैं। सबके साथ राम और लक्ष्मण विशेष हर्षित होते हैं। कई दिन बढ़ते आनन्द में बीतते हैं, शुभ समय पर कंकण खुलते हैं और देवता अवध में जन्म चाहने लगते हैं।
जिनकी विदाई बार बार रुकती है
विश्वामित्र प्रतिदिन चलना चाहते हैं। राम का प्रेम और विनय उन्हें रोक लेता है। यह एक दिन का आग्रह नहीं रह गया है; नित्य विदा की इच्छा उठती है और नित्य स्नेहवश ठहरना होता है। दशरथ का भाव भी दिनोंदिन सौ गुना बढ़ता है। उसे देखकर महामुनि राजा की सराहना करते हैं। आतिथ्य की शुरुआत में उन्हें भीतर निवास इसलिये दिया गया था कि परिवार उनकी इच्छा का ध्यान रख सके। इतने दिनों का साथ अब उसी सेवा में बढ़ते प्रेम का परिचय देता है।
अन्त में वे विदा माँगते हैं। राजा अनुराग में भर जाते हैं और पुत्रों सहित सामने खड़े होते हैं। उनके शब्दों में पूरा अर्पण है: हे नाथ, सारी सम्पत्ति आपकी है; हम स्त्री और पुत्रों सहित आपके सेवक हैं। पहले वसिष्ठ के सामने भी दशरथ ने पुत्र तथा सम्पत्ति रखी थी। अब विश्वामित्र से विदा लेते समय वही समर्पण उनकी विनती में प्रकट होता है। मुनि के जाने की घड़ी में राजा अपने पूरे घर को उनके स्नेह के अधीन कह रहे हैं।
विनती आगे भी दो बातों पर टिकी है। लड़कों पर सदा स्नेह बना रहे और राजा को भी मुनि का दर्शन मिलता रहे। विदा स्वीकारते हुए दशरथ भविष्य में बना रहने वाला यही सम्बन्ध माँगते हैं। पुत्रों और रानियों सहित वे चरणों पर गिर पड़ते हैं। मुख से वाणी नहीं निकलती। जिस राजा ने रात को जनक का बहुत बखान किया था, वही इस समय अपने अनुराग से इतना भर गया है कि बोलना रुक गया है। अन्तिम आग्रह दर्शन और बच्चों के प्रति स्नेह का है।
दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती । चले न प्रीति रीति कहि जाती॥
चौपाई ४
रामु सप्रेम संग सब भाई । आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥
विश्वामित्र बहुत प्रकार के आशीर्वाद देकर चल पड़ते हैं। इस प्रीति की रीति कही नहीं जाती, तुलसी फिर स्वीकार करते हैं। राम प्रेमपूर्वक सभी भाइयों को साथ लेकर उन्हें पहुँचाने जाते हैं। चारों भाई विदाई के इस साथ में हैं। फिर मुनि की आज्ञा पाकर लौटते हैं। चरणवन्दना से उठकर कुछ दूर साथ चलना और अन्त में अनुमति लेकर वापस आना, गुरु के जाने का यह पूरा क्रम प्रेम और आदर को कर्म में रखता है।
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
दोहा ३६०
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥ ३६०॥
जाते हुए विश्वामित्र भी मन ही मन सराहना करते हैं। उनके स्मरण में राम का रूप है, राजा की भक्ति है, विवाह है और उसका उत्साह तथा आनन्द है। इन सबको दोहा एक साथ रखता है। यहाँ रूप और भक्ति का अपना स्थान है, उत्सव और उल्लास का अपना। मुनि अवध से चल चुके हैं, पर वहाँ मिला सुख उनके भीतर चल रहा है। राजा ने दर्शन बनाये रखने की विनती की थी; विदा के इस क्षण में स्वयं मुनि का हृदय भी पीछे मिले रूप और स्नेह से भरा है।
राम के प्रेम और विनय से विश्वामित्र बार बार रुकते हैं। अन्ततः दशरथ परिवार सहित सेवाभाव प्रकट करके बच्चों पर स्नेह और अपने लिये दर्शन माँगते हैं। मुनि आशीर्वाद देकर चलते हैं; चारों भाई उन्हें पहुँचाकर लौटते हैं। विश्वामित्र राम के रूप, राजा की भक्ति और विवाह के आनन्द को मन में सराहते जाते हैं।
जो आनन्द कथा सुनने तक पहुँचता है
विश्वामित्र के चले जाने पर वामदेव और ज्ञानी कुलगुरु वसिष्ठ फिर उनकी कथा कहते हैं। मुनि का सुयश सुनकर दशरथ मन में अपने पुण्य के प्रभाव को सराहते हैं। जिनके साथ इतने दिन बीते, उनकी बड़ाई सुनना अभी भी राजा को अपने सौभाग्य का अनुभव कराता है। फिर आज्ञा मिलने पर लोग लौटते हैं और दशरथ पुत्रों सहित महल में जाते हैं। सभा का यह दिन भी पूरा होता है, पर नगर में विवाह की गाथा गाने का क्रम बना रहता है।
जहाँ तहाँ रामविवाह गाया जा रहा है। उसका पवित्र यश तीनों लोकों में छाया है। जबसे राम विवाह करके घर आये हैं, अवध में सब प्रकार का आनन्द बस गया है। कवि इस उत्साह को फिर देखते हैं और कहते हैं कि सरस्वती तथा शेष भी इसका वर्णन नहीं कर सकते। आरम्भ में चारों जोड़ियों के लिये उपमा खोजती सरस्वती एकटक रह गयी थीं। अब समापन पर भी इस आनन्द का पूरा वर्णन वाणी की पहुँच से बाहर है।
तब तुलसी अपने कहने का प्रयोजन बताते हैं। राम और सीता का यश मंगल की खान है और कविकुल के जीवन को पवित्र करता है। इसी को जानकर उन्होंने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये कुछ कहा है। वर्णन की सीमा स्वीकार करके भी कहना सार्थक रहता है, क्योंकि उस यश का थोड़ा सा गान वाणी को पवित्र करता है। अपनी कथा पूरी करते समय कवि उसी कृपा की ओर देखते हैं जिसके लिये माताओं ने प्रार्थना की और राजा ने गुरु के चरणों पर सिर रखा।
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो।
छन्द, सोरठा ३६१ से पूर्व
रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥
उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।
बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥
छन्द में रामचरित अपार समुद्र है। कौन कवि उसका पार पा सका है, यह प्रश्न उसी असीमता को सामने रखता है। अपनी वाणी पवित्र करने का प्रयोजन दोहराकर तुलसी सुनने और गाने वालों की ओर आते हैं। यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव का वर्णन जो आदर से सुनकर गाते हैं, वे वैदेही और राम की कृपा से सदा सुख पाते हैं। यहाँ यज्ञोपवीत का स्मरण भी इस फलवचन में सम्मिलित है। विवाह का विस्तृत आनन्द कहकर समाप्त होती वाणी मंगलमय उत्सवों के श्रवण और गायन का सुख बताती है।
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
सोरठा ३६१
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥ ३६१॥
अन्तिम सोरठा फिर सीता और रघुवीर के विवाह पर ठहरता है। जो प्रेम से इसे गाते और सुनते हैं, उनके लिये सदा उत्साह है, क्योंकि राम का यश मंगल का धाम है। आदर और प्रेम, छन्द तथा सोरठे में ये दोनों शब्द इस सुनने की रीति बता देते हैं। अवध के जिन घरों में विवाह की गाथा गायी जा रही थी, उसी गान में सुनने वाले को भी जगह मिलती है। नगर का आनन्द कथा के साथ आगे पहुँच सकता है; कवि उसके लिये सदा का उत्साह कहते हैं।
विश्वामित्र का यश सुनकर दशरथ अपना सौभाग्य सराहते हैं। अवध में विवाहगान चलता रहता है। तुलसी अपनी वाणी पवित्र करने के लिये रामसीता का यश कहते हैं और अन्त में आदर तथा प्रेम से उत्सव को सुनने और गाने वालों के लिये कृपा, सुख और उत्साह का फल बताते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस घर के सुख को देखें तो उसकी अनेक छोटी क्रियाएँ साथ याद आती हैं। माताएँ आँचल भरकर आशीर्वाद लेती हैं, राजा उपहार पाने वालों की रुचि पहचानते हैं, बहुओं को पलकों के संरक्षण में रखने को कहते हैं, और गुरु को ऐसा स्थान देते हैं जहाँ उनकी इच्छा का ध्यान रखा जा सके। आरती की उजली लौ के साथ इस देखभाल को भी तुलसी उतनी ही जगह देते हैं। किसी का सुख चाहना यहाँ सामने वाले को देखकर उसके लिये उचित काम करने में दिखाई देता है।
माताओं की बातचीत इस प्रसंग की सबसे आत्मीय ध्वनियों में रहती है। कोमल देह देखते हुए वे पराक्रम पूछती हैं, प्रशंसा करते हुए गुरु की कृपा याद करती हैं, और अन्त में दर्शन के बिना बीते दिनों का हिसाब बदल देना चाहती हैं। राम का उत्तर विनय है। इतना बखान सुनने के बाद वे उन्हें सन्तुष्ट करके शिव, गुरु और ब्राह्मणों के चरण स्मरण करते हैं। माताओं का प्रेम और पुत्र का यह नम्र व्यवहार रात को पूर्ण विश्राम तक ले जाते हैं।
विश्वामित्र की विदाई में भी सम्बन्ध का यही रूप है। रुकने का कारण राम का प्रेम और विनय है, जाने के समय दशरथ की माँग बच्चों पर स्नेह और अपने लिये दर्शन है, और लौटते भाइयों के पीछे मुनि का मन रूप तथा भक्ति को सराह रहा है। कथा में बार बार लोग विदा होते हैं और हृदय में राम को लिये जाते हैं। अन्त में कवि सुनने वाले को भी उसी स्मरण का अवसर सौंपते हैं। जिस आनन्द का पूरा वर्णन सम्भव नहीं हुआ, उसके गायन का मार्ग सबके लिये खुला है।
बालकाण्ड का समापन सीता और राम के विवाह को प्रेम से सुनने और गाने के आमन्त्रण पर होता है। चारों दम्पतियों के स्वागत से चलकर कथा घर की रात्रि, नगर के प्रभात, गुरुओं की सभा और विदाई के अनुराग से होकर यहाँ पहुँची है। अन्तिम वचन उसी सुख को मन में रहने देता है: राम का यश मंगल का धाम है, और उसके प्रेमपूर्वक श्रवण में उत्साह बना रहता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३४९ से ३६१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।