इस पृष्ठ पर
रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 42
अवध का उत्सव और विश्वामित्र की विदाई
चारों दम्पतियों के स्वागत से माताओं की रात्रि की बातचीत तक। और दिनों तक बढ़ते आनन्द से विश्वामित्र की विदाई तथा बालकाण्ड के मंगलमय समापन तक।
अवध में माताएँ बार बार आरती उतार रही हैं। चारों पुत्र बहुओं के साथ सामने हैं, और उन्हें देखकर माताएँ अपना जीवन सफल मानती हैं। आभूषण, रत्न और वस्त्र निछावर होते जाते हैं, और सीता का मुख देखती सखियाँ अपने पुण्य को सराहती हैं।
स्वागत के बाद दशरथ अतिथियों का सम्मान पूरा करके पुत्रों और बहुओं का दुलार करते हैं। रात को माताएँ राम के कोमल अंग देखकर उनके कठिन कामों का हाल पूछती हैं। फिर निद्रा है, प्रभात है, पिता की सभा है, और गुरुओं का गुणगान। आनन्द में कई दिन बीत जाते हैं। विश्वामित्र नित्य चलना चाहते हैं, और राम के सप्रेम विनय के वश रह जाते हैं। जब वे चलते हैं, तब मन ही मन राम के रूप, राजा की भक्ति, विवाह, उत्साह और आनन्द को सराहते जाते हैं।
अवध के रनिवास और सभा में
- राम और सीता जिनकी छवि माताएँ बार बार देखती हैं। सखियाँ सीता का मुख बार बार देखती हैं, और राम को निरखकर दोनों गुरु अनुराग से भर जाते हैं। उनके विवाह का मंगलगान इस सोपान को पूरा करता है।
- चारों भाई और बहुएँ स्वागत और पूजन में एक साथ विराजते दम्पति। प्रभात की दिनचर्या तथा गुरु को पहुँचाने में साथ रहने वाले भाई।
- दशरथ और रानियाँ आतिथ्य, उपहार और दुलार में मग्न परिवार। राजा रानियों से बहुओं को पलकों की तरह रखने को कहते हैं।
- विश्वामित्र जो राम के सप्रेम विनय के वश कई दिन अवध में रह जाते हैं।
- वसिष्ठ और वामदेव सभा में धर्म और विश्वामित्र की कीर्ति कहने वाले मुनि। वसिष्ठ जो आज्ञा देते हैं, राजा उसे लोक और वेद की विधि से करते हैं।
आरती से महल के भीतर तक
माताएँ बार बार आरती उतारती हैं। इस प्रेम और आनन्द को कौन कह सकता है? वे अनेक प्रकार के आभूषण, रत्न और वस्त्र अगणित भाँति निछावर करती हैं। सामने चारों पुत्र बहुओं के साथ हैं, और माताएँ परमानन्द में मग्न हैं। वे बार बार सीता और राम की छवि देखती हैं, और प्रसन्न होकर जगत् में अपना जीवन सफल मानती हैं।
सखियाँ सीता के मुख को बार बार देखती हैं, और अपने पुण्य को सराहती हुई गान करती हैं। देवता क्षण क्षण फूल बरसाते हैं, नाचते, गाते और सेवा अर्पित करते हैं।
चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती सारी उपमाएँ ढूँढ़ती हैं, पर कोई उपमा देते नहीं बनती, सब बिलकुल छोटी लगती हैं। सरस्वती रूप में अनुरक्त होकर एकटक देखती रह जाती हैं।
अब वेद की विधि और कुल की रीति पूरी करके अर्घ्य और पाँवड़े दिये जाते हैं। परछन के बाद माताएँ सब पुत्रों को बहुओं सहित महल के भीतर ले चलती हैं।
चार सिंहासन और छह सुखों की उपमा
भीतर चार सिंहासन हैं, सहज सुहावने, मानो कामदेव ने अपने हाथों से बनाये हों। माताएँ उन पर राजकुमारियों और राजकुमारों को बैठाती हैं और आदर से उनके पवित्र चरण धोती हैं। फिर धूप, दीप और नैवेद्य के साथ वेदविधि से वरों और वधुओं की पूजा होती है। आरती बार बार होती है, और सिरों पर सुन्दर पंखे और चँवर ढल रहे हैं। अनेक वस्तुएँ निछावर होती हैं, और सब माताएँ आनन्द से भरी शोभित हैं।
मानो किसी योगी को परम तत्त्व मिल गया हो। मानो सदा रोग में पड़े रहनेवाले को अमृत मिल गया हो।
मानो जन्म से दरिद्र को पारस मिल गया हो, मानो अन्धे को सुन्दर नेत्र मिल गये हों। मानो गूँगे के मुख में सरस्वती आ विराजी हों, और मानो युद्ध में शूरवीर ने विजय पायी हो।
इस सुख से सौ करोड़ गुना आनन्द माताओं को मिल रहा है। राम भाइयों सहित विवाह करके घर आये हैं।
माताएँ रीतियाँ करती हैं, वर और वधुएँ सकुचाते हैं, और राम यह मोद और विनोद देखकर मन ही मन मुसकराते हैं।
आशीर्वाद के आँचल और सबके लिये उपहार
माताएँ देवताओं और पितरों का भली भाँति पूजन करती हैं। मन की सभी कामनाएँ पूरी होती हैं। सबकी वन्दना करके वे यह वर माँगती हैं कि भाइयों सहित राम का कल्याण हो। देवता अदृश्य रहकर आशीष देते हैं, और माताएँ हर्षित होकर आँचल भर लेती हैं।
दशरथ बरातियों को बुलवाकर उन्हें सवारियाँ, वस्त्र, रत्न और आभूषण देते हैं। आज्ञा मिलने पर सब प्रसन्न होकर, हृदय में राम को रखे हुए, अपने अपने घर चलते हैं।
राजा नगर के सब स्त्री पुरुषों को पहिरावनी देते हैं, और घर घर बधावे बज उठते हैं। याचक जो जो माँगते हैं, राजा विशेष प्रसन्न होकर वही वही देते हैं।
सब सेवकों और अलग अलग बाजे बजानेवालों को दान और सम्मान से सन्तुष्ट किया जाता है। सब जोहार करके आशीष देते हैं और गुणों की गाथा गाते हैं।
तब दशरथ गुरु और ब्राह्मणों सहित महल में जाते हैं।
दो गुरुओं की सेवा
वसिष्ठ जो आज्ञा देते हैं, दशरथ उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार आदर से करते हैं। बहुत से ब्राह्मणों को देखकर रानियाँ अपना बड़ा भाग्य मानती हुई उठ खड़ी होती हैं। चरण धोये जाते हैं, स्नान कराया जाता है, और राजा भली भाँति पूजन करके भोजन कराते हैं। आदर, दान और प्रेम से पुष्ट ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए जाते हैं।
दशरथ विश्वामित्र की अनेक प्रकार से पूजा करते हैं। वे कहते हैं, हे नाथ, मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं। पोद्दार की टीका ये वचन दशरथ के बताती है। बहुत प्रशंसा करके वे रानियों सहित उनकी चरणधूलि लेते हैं, और उन्हें महल के भीतर उत्तम निवास देते हैं। पोद्दार की टीका इसका आशय बताती है कि राजा और रनिवास उनकी इच्छा के अनुसार उनके आराम का स्वयं ध्यान रख सकें।
फिर दशरथ गुरु वसिष्ठ के चरणकमलों की पूजा और विनती करते हैं। उनके हृदय में प्रीति कम नहीं है। बहुओं सहित सब कुमार और रानियों सहित राजा बार बार गुरु के चरणों की वन्दना करते हैं, और मुनि आशीर्वाद देते हैं।
दशरथ अत्यन्त अनुराग से अपने पुत्रों और सारी सम्पत्ति को सामने रखकर विनय करते हैं। वसिष्ठ नेग माँगकर लेते हैं, जिसे टीका पुरोहित के नाते मिलनेवाला नेग बताती है, और बहुत तरह से आशीर्वाद देते हैं। फिर सीता सहित राम को हृदय में धारण करके हर्षपूर्वक अपने स्थान को चले जाते हैं।
राजा सब ब्राह्मणों की स्त्रियों को बुलाकर सुन्दर वस्त्र और आभूषण पहनाते हैं। फिर सुआसिनियों को बुलवाकर उनकी रुचि समझकर पहिरावनी देते हैं। टीका सुआसिनियों का आशय नगर की सौभाग्यवती बहिन, बेटी और भानजी आदि बताती है। जिनका नेग बनता है, वे नेग लेते हैं, और राजा उनकी रुचि के अनुसार देते हैं। प्रिय और पूजनीय अतिथियों का राजा भली भाँति सम्मान करते हैं।
देवता राम का विवाह देखकर, फूल बरसाते और उत्सव की प्रशंसा करते हुए, नगाड़े बजाकर सुख पाकर अपने अपने नगरों को चलते हैं। वे परस्पर राम का यश कहते जाते हैं, और हृदय में प्रेम समाता नहीं।
रनिवास की कथा और रात का भोजन
सबका आदर करके राजा का हृदय उत्साह से भर गया है। वे रनिवास में जाकर बहुओं सहित कुमारों को देखते हैं, और आनन्द से पुत्रों को गोद में लेते हैं। उस समय जो सुख हुआ, उसे कौन कह सकता है? फिर वे पुत्रवधुओं को प्रेम से गोद में बैठाकर बार बार हृदय में हर्षित होकर दुलारते हैं।
रनिवास इस समाज को देखकर प्रसन्न है, और दशरथ विवाह जिस प्रकार हुआ, वह सुनाते हैं। सुननेवाले सुन सुनकर हर्षित होते हैं। जनक के गुण, शील, महत्त्व, प्रेम की रीति और सुहावनी सम्पदा का राजा भाट की तरह बहुत प्रकार से वर्णन करते हैं। जनक का आचरण सुनकर रानियाँ विशेष प्रसन्न होती हैं।
फिर राजा पुत्रों सहित स्नान करके ब्राह्मणों, गुरु और कुटुम्बियों को बुलाकर अनेक प्रकार का भोजन करते हैं। पाँच घड़ी रात बीत गयी है। सुन्दर स्त्रियाँ मंगलगान कर रही हैं, और रात सुख की मूल और मनोहर हो गयी है।
सब आचमन करके पान खाते हैं। वे फूलों की मालाओं और सुगन्धित द्रव्यों से शोभित होकर, राम को देखकर और आज्ञा पाकर, सिर नवाते हुए अपने अपने घर चलते हैं। उस प्रेम, आनन्द, विनोद, महत्त्व, समय, समाज और मनोहरता को सैकड़ों सरस्वती और शेष, वेद, ब्रह्मा, शिव और गणेश नहीं कह सकते। उसे किस प्रकार बखानकर कहा जाये? क्या केंचुआ पृथ्वी को सिर पर उठा सकता है?
दशरथ सबका सब प्रकार से सम्मान करके रानियों को कोमल वचन कहकर बुलाते हैं: बहुएँ छोटी लड़कियाँ हैं, दूसरे घर आयी हैं। उन्हें ऐसे रखियेगा जैसे पलकें आँखों को रखती हैं।
पुत्र थके हैं और नींद के वश हो रहे हैं। दशरथ उन्हें ले जाकर सुलाने को कहते हैं। इतना कहकर वे राम के चरणों में चित्त लगाये अपने विश्रामभवन में चले जाते हैं। रानियाँ राजा के सहज सुन्दर वचन सुनकर शय्याओं की व्यवस्था कराती हैं।
माताओं के प्रश्न, और राम का विनय
पलँगों पर गौ के दूध के फेन जैसी सुहावनी, कोमल और सुन्दर अनेक सफेद चादरें हैं। उत्तम तकियों का वर्णन नहीं हो सकता। मणियों के भवन में फूलों की मालाएँ और सुगन्धित द्रव्य हैं। रत्नों के दीपकों और अत्यन्त सुन्दर चँदोवे को कहते नहीं बनता। जिसने उन्हें देखा हो, वही जाने। सुन्दर शय्या सजाकर माताएँ राम को उठाती हैं और प्रेम सहित पलँग पर लिटाती हैं। राम भाइयों को बार बार आज्ञा देते हैं, और वे अपनी अपनी सेज पर सोते हैं।
राम का साँवला, कोमल, सुन्दर देह देखकर माताएँ प्रेम से पूछती हैं: मार्ग में जाते हुए इतनी भयानक ताड़का को किस प्रकार मारा?
फिर वे मारीच और सुबाहु के विषय में पूछती हैं, जो भयानक निशाचर और विकट योद्धा थे, और युद्ध में किसी को कुछ नहीं गिनते थे। उन दुष्टों को सहायकों सहित कैसे मारा?
वे बलैया लेती हुई कहती हैं कि मुनि की कृपा से ईश्वर ने बहुत सी बलाएँ टाल दीं। दोनों भाइयों ने यज्ञ की रक्षा की, और गुरु के प्रसाद से सब विद्याएँ पायीं। चरणों की धूलि लगते ही मुनिपत्नी अहल्या का उद्धार हुआ, और यह कीर्ति पूरे जगत् में फैल गयी।
वे शिवधनुष की बात भी कहती हैं: कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर धनुष राजाओं के समाज में तोड़ा गया। विश्वविजय का यश मिला, सीता मिलीं, और सब भाई विवाह करके घर आये। माताएँ इन कर्मों को मनुष्य की शक्ति से परे कहती हैं, और उनका श्रेय केवल विश्वामित्र की कृपा को देती हैं।
राम का चन्द्रमा जैसा मुख देखकर माताएँ कहती हैं कि आज जगत् में उनका जन्म सफल हुआ। जो दिन राम को देखे बिना बीते, ब्रह्मा उन्हें गिनती में न लायें।
राम विनय से भरे उत्तम वचन कहकर सब माताओं को सन्तुष्ट करते हैं। फिर शिव, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण करके नेत्रों को नींद के वश कर देते हैं।
कमल सा सोया मुख और नदी का प्रभात
नींद में भी राम का अत्यन्त सलोना मुख सोह रहा है, मानो सन्ध्या के समय लाल कमल हो। घर घर स्त्रियाँ जागरण कर रही हैं, और आपस में मंगलमयी गारियाँ देती हैं। रानियाँ कहती हैं: नगरी शोभित है, रात्रि शोभा पा रही है। देखिये, सजनी। सासुएँ सुन्दर बहुओं को साथ लेकर सोती हैं, मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियाँ हृदय में छिपा ली हों।
प्रातःकाल के पवित्र समय में राम जागते हैं। टीका इसे ब्राह्ममुहूर्त कहती है। मुर्गे बोलने लगे हैं, भाट और मागध गुणगान करते हैं, और नगर के लोग जोहार करने द्वार पर आये हैं। सब भाई ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओं की वन्दना करते हैं, और आशीर्वाद पाकर प्रसन्न होते हैं।
माताएँ आदर के साथ उनके मुख देखती हैं, और राजकुमार पिता के साथ द्वार पर पधारते हैं।
स्वभाव से ही पवित्र चारों भाई शौचादि से निवृत्त होकर पवित्र नदी में स्नान करते हैं। पोद्दार की टीका इस नदी को सरयू बताती है, और प्रातःक्रिया में सन्ध्यावन्दन आदि का अर्थ देती है। स्नान और नित्यकर्म पूरे करके वे पिता के पास लौटते हैं।
दशरथ देखते ही उन्हें हृदय से लगा लेते हैं, और आज्ञा पाकर वे प्रसन्नतापूर्वक बैठते हैं। राम को देखकर पूरी सभा शीतल हो जाती है, और सबको लगता है कि नेत्रों का लाभ इससे बढ़कर नहीं। टीका इस शीतलता में तीनों प्रकार के तापों के सदा के लिये मिट जाने का अर्थ बताती है।
सभा की कथाएँ और बीतते हुए दिन
वसिष्ठ और विश्वामित्र सभा में आते हैं। दशरथ उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाते हैं, और पुत्रों सहित पूजा करके चरण लगते हैं। दोनों गुरु राम को देखकर प्रेम में मुग्ध हो जाते हैं।
वसिष्ठ धर्म के इतिहास कहते हैं, और राजा रनिवास सहित सुनते हैं। फिर वे विश्वामित्र की करनी का, जो मुनियों के मन के लिये भी अगम्य है, आनन्दपूर्वक बहुत प्रकार से वर्णन करते हैं।
वामदेव इन बातों को सत्य कहते हैं: सुन्दर कीर्ति तीनों लोकों में छायी हुई है। यह सुनकर सब आनन्दित होते हैं, और राम और लक्ष्मण के हृदय में उत्साह और अधिक है।
ऐसे नित्य मंगल, आनन्द और उत्सव होते हैं, और दिन बीतते जाते हैं। अयोध्या आनन्द से भरकर उमड़ रही है, और अधिक से अधिक बढ़ती जाती है।
शुभ दिन विचारकर सुन्दर कंकण खोले जाते हैं, और मंगल, आनन्द और विनोद कुछ कम नहीं होते। नित्य नये सुख देखकर देवता सिहाते हैं, और ब्रह्मा से अवध में जन्म पाने की याचना करते हैं।
जिनकी विदाई बार बार रुकती है
विश्वामित्र प्रतिदिन चलना चाहते हैं, और राम के सप्रेम विनय के वश रह जाते हैं। दशरथ का भाव दिनोंदिन सौ गुना बढ़ता है, और उसे देखकर महामुनि राजा की सराहना करते हैं।
वे विदा माँगते हैं। राजा अनुराग में भरकर पुत्रों सहित सामने खड़े होते हैं, और कहते हैं: हे नाथ, सारी सम्पत्ति आपकी है। हम पुत्रों और स्त्रियों सहित आपके सेवक हैं।
वे कहते हैं: लड़कों पर सदा स्नेह करते रहियेगा, और मुनि, हमें दर्शन देते रहियेगा। यह कहकर पुत्रों और रानियों सहित वे चरणों पर गिर पड़ते हैं, और मुख से वाणी नहीं निकलती।
विश्वामित्र बहुत प्रकार के आशीर्वाद देकर चल पड़ते हैं। इस प्रीति की रीति कही नहीं जाती। राम प्रेमपूर्वक सब भाइयों को साथ लेकर उन्हें पहुँचाने जाते हैं, और आज्ञा पाकर लौटते हैं।
जाते हुए विश्वामित्र मन ही मन राम के रूप, राजा की भक्ति, विवाह, उत्साह और आनन्द को सराहते जाते हैं।
जो आनन्द कथा सुनने तक पहुँचता है
विश्वामित्र के चले जाने पर वामदेव और ज्ञानी कुलगुरु वसिष्ठ फिर उनकी कथा कहते हैं। मुनि का सुयश सुनकर दशरथ मन में अपने पुण्य के प्रभाव को सराहते हैं। फिर आज्ञा मिलने पर लोग लौटते हैं, और दशरथ पुत्रों सहित महल में जाते हैं।
जहाँ तहाँ सब रामविवाह गा रहे हैं, और पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया है। जबसे राम विवाह करके घर आये हैं, तबसे अवध में सब प्रकार का आनन्द बसता है। प्रभु के विवाह में जैसा उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और शेष नहीं कह सकते।
तब तुलसी अपने कहने का प्रयोजन बताते हैं: राम और सीता का यश मंगल की खान है, और कविकुल के जीवन को पवित्र करता है। यही जानकर उन्होंने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये कुछ कहा है।
रामचरित अपार समुद्र है। कौन कवि उसका पार पा सका है? जो यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव को आदर से सुनकर गायेंगे, वे सीता और राम की कृपा से सदा सुख पायेंगे।
जो प्रेम से सीता और राम का विवाह गाते और सुनते हैं, उनके लिये सदा उत्साह है। राम का यश मंगल का धाम है।
देखभाल के छोटे काम
माताएँ आँचल भरकर देवताओं के आशीर्वाद लेती हैं। राजा सुआसिनियों की रुचि विचारकर पहिरावनी देते हैं, बहुओं को पलकों की तरह रखने को कहते हैं। वे विश्वामित्र को महल के भीतर उत्तम निवास देते हैं, जहाँ राजा और रनिवास उनके मन को जोहते रहते हैं।
माताएँ कोमल देह देखते हुए पराक्रम पूछती हैं, प्रशंसा करते हुए मुनि और गुरु की कृपा याद करती हैं। वे चाहती हैं कि दर्शन के बिना बीते दिन ब्रह्मा न गिनें। राम विनय भरे उत्तम वचनों से उन्हें सन्तुष्ट करते हैं।
बालकाण्ड का समापन इस वचन पर होता है: जो प्रेम से सीता और राम का विवाह गाते और सुनते हैं, उनके लिये सदा उत्साह है। राम का यश मंगल का धाम है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 349 से 361, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।