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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 3
वंदना का अन्तिम चरण, और राम-नाम की महिमा
अवधपुरी से लेकर सीताराम तक जिन-जिनकी वंदना बाक़ी थी। और उसके तुरन्त बाद एक ऐसी वंदना जो किसी व्यक्ति की नहीं, दो अक्षरों की है। उसके पक्ष में तुलसीदास पूरी दलील रखते हैं।
रामचरितमानस अभी कथा तक नहीं पहुँचा है। कवि अपनी वाणी की दीनता कह चुके हैं और शिव तथा पार्वती का प्रसाद माँग चुके हैं। अब वंदना का अन्तिम चरण बाक़ी है, और इस प्रसंग का पहला आधा उसी को पूरा करता है। जिन-जिन के चरण छूकर तुलसीदास आगे बढ़े हैं, उन सबके बाद वे एक और चीज़ के आगे सिर झुकाते हैं। वह कोई व्यक्ति नहीं, दो अक्षरों का एक शब्द है।
दूसरा आधा स्तुति नहीं, दलील है। तुलसीदास एक कड़ी बात कहते हैं: नाम निर्गुण ब्रह्म से भी बड़ा है और सगुण राम से भी बड़ा है। वे इसे अपनी सम्मति कहकर रखते हैं, फिर इसका कारण देते हैं। फिर एक-एक करके वे राम के कामों को नाम के कामों के सामने रखते हैं। अन्त में वे इतना ही कहते हैं कि अपने मन में विचार कीजिये।
वन्दना की सूची और राम नाम
- राम जिनकी वंदना उनसे जुड़े सब लोगों के बाद, और उनके नाम से पहले, होती है। उनके अपने काम आगे चलकर उनके नाम के कामों के सामने रख दिये जाते हैं।
- सीता जनक की पुत्री और जगत् की माता, जिनसे तुलसीदास निर्मल बुद्धि माँगते हैं।
- दशरथ अवध के राजा, जिनके विषय में दो बातें कही गयी हैं: राम के चरणों में उनका सच्चा प्रेम, और उनका अन्त।
- भरत भाइयों में जिनके चरणों को सबसे पहले प्रणाम किया जाता है।
- लक्ष्मण जिनका यश राम की कीर्ति-पताका का दंड कहा गया है।
- हनुमान जिनकी विनती छोटी-सी है, और उसमें उनका परिचय यह है कि उनका यश राम ने स्वयं कहा।
- राम नाम दो अक्षर, जिन्हें यह प्रसंग एक पात्र की तरह बरतता है। उनकी वंदना होती है और उनके पक्ष में गवाहियाँ दी जाती हैं।
पहले नगर, फिर नगरवासी
वंदना का यह हिस्सा जहाँ से उठता है, वहाँ कोई व्यक्ति नहीं है। पहला प्रणाम एक नगर को जाता है और दूसरा एक नदी को।
अवधपुरी को अति पावन कहा गया और सरयू को वह नदी, जो कलियुग के पाप का नाश करती है। फिर नगर के नर-नारी आते हैं। उन्हें प्रणाम करने का कारण उनका अपना गुण नहीं बताया गया। कारण यह है कि राम की ममता उन पर थोड़ी नहीं है। ये वन्दनीय इसलिये हैं कि इनसे प्रेम किया गया।
फिर यही बात और आगे जाती है।
सीता की निन्दा करनेवालों के पापों का समूह नष्ट किया गया और उन्हें शोक से रहित बनाकर बसा दिया गया। किसी का नाम नहीं लिया जाता। पोद्दार की टीका बताती है कि यह राम ने किया, और उन्हें अपने लोक, अपने धाम में बसा दिया। यह पहचान टीका की है। तुलसीदास का अपना क्रम यह है: पहले यह कि राम की ममता अयोध्यावासियों पर थोड़ी नहीं है। और तुरन्त बाद यह कि जिन्होंने सबसे बुरा किया, उनके भी पाप नष्ट हुए और वे भी शोक से छूटकर बस गये।
फिर कौसल्या आती हैं, और उन्हें माता नहीं, पूर्व दिशा कहा जाता है, जिसकी कीर्ति सारे जगत् में फैली है। उसी दिशा से राम चन्द्रमा की तरह प्रकट हुए, जो विश्व को सुख देता है और दुष्टरूपी कमलों के लिये पाला है। उसके बाद दशरथ आते हैं, सब रानियों सहित, और कौसल्या के सिवा किसी रानी का नाम नहीं लिया जाता। इनसे कृपा माँगते हुए कवि अपना परिचय यों देता है: अपने पुत्र का सेवक जानकर कृपा कीजिये। और अन्त में कहा जाता है कि इन्हें रचकर विधाता स्वयं बड़े हो गये।
जिसने प्यारे शरीर को तिनका कह दिया
अब अवध के राजा की वंदना आती है। उसमें दशरथ के विषय में दो ही बातें हैं, और दोनों एक ही बात के दो सिरे हैं।
पहली बात यह कि राम के चरणों में उनका सच्चा प्रेम था। दूसरी बात उसी प्रेम की जाँच है: राम के बिछुड़ते ही उन्होंने अपने प्यारे शरीर को तिनके की तरह त्याग दिया। शरीर को प्यारा कहा गया है। प्यारा न होता तो उसका छूटना किसी बात का सबूत न होता।
इसके तुरन्त बाद दूसरे पिता आते हैं। जनक को परिवार सहित प्रणाम किया जाता है। जिस राजा का नाम ही विदेह है, देह से परे, उसे कुटुम्ब के साथ प्रणाम किया जाना अपने आप में एक टिप्पणी है। राम के चरणों में उनका प्रेम गूढ़ था, और उन्होंने उसे योग में और भोग में छिपा रखा था।
फिर वह परदा गिरता है: राम को देखते ही वह प्रेम प्रकट हो गया। जो प्रेम योग से और भोग से नहीं पकड़ा गया, वह देखे जाने भर से खुल गया।
पताका और उसका दंड
भाइयों की बारी आती है। तुलसीदास साफ़ लिखते हैं कि सबसे पहले भरत के चरणों को प्रणाम है, और टीका कोष्ठक में जोड़ती है कि यह भाइयों में पहला है। भरत के नियम और व्रत के बारे में वे कहते हैं कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। और चित्र छोटा-सा है: भरत का मन राम के चरणकमलों पर भौंरे की तरह लुभाया हुआ है और कभी उनका पास नहीं छोड़ता, उस जगह से हटता ही नहीं।
उसके बाद लक्ष्मण आते हैं।
पहले उनके चरणों का वर्णन है: शीतल, सुन्दर, भक्तों को सुख देनेवाले। फिर वह उपमा, जिसमें लक्ष्मण का पूरा जीवन आ जाता है: राम की कीर्ति निर्मल पताका है, और लक्ष्मण का यश उस पताका का दंड है। टीका इसे खोलकर कहती है कि दंड वही है जो पताका को ऊँचा करके फहराता है।
झंडा दिखता है, डंडा नहीं दिखता। पर डंडा हटा दीजिये तो झंडा कपड़े का एक टुकड़ा बनकर ज़मीन पर पड़ा रह जायेगा। और उसी साँस में बताया जाता है कि यह भाई कौन है: हज़ार सिरवाले शेष। टीका के अनुसार उनके सिरों पर यह सारा जगत् टिका है, और वे पृथ्वी का भय दूर करने के लिये उतरे। कवि उनसे विनती करता है कि वे सदा उस पर प्रसन्न रहें।
जिनका यश राम ने अपने मुँह से कहा
अब शत्रुघ्न और हनुमान एक साथ आते हैं। शत्रुघ्न के चरणकमलों को प्रणाम है, जो बड़े वीर, सुशील और भरत के पीछे चलनेवाले हैं।
और फिर हनुमान। यहाँ कवि की मुद्रा बदल जाती है। इस पूरे हिस्से में तुलसीदास वन्दना या प्रणाम करते हैं। हनुमान से वे विनती करते हैं। पूरे प्रसंग में विनती केवल यहीं आती है। एक और जगह भी मुद्रा इसी तरह बदलती है, जिस पर आगे आयेंगे।
और परिचय में हनुमान का कोई काम नहीं दिया गया, न समुद्र, न लंका, न पर्वत। कहा यह गया कि उनके यश का वर्णन राम ने स्वयं किया है। उस बयान के बाद कवि के जोड़ने को कुछ नहीं बचता।
फिर उन्हें प्रणाम है, और कहा जाता है कि उनका हृदय वह भवन है जिसमें धनुष-बाण धारण किये राम बसते हैं। इस पूरी वंदना में राम को जिस एक जगह का निवासी कहा गया है, वह कोई मन्दिर, नगर या धाम नहीं, एक हृदय है। और वहाँ वे शस्त्र लिये हुए बैठे हैं, जैसे किसी काम पर तैनात हों।
अधम शरीर में भी, और बिना किसी माँग के
हनुमान के बाद सूची चौड़ी होती है। वानरों, रीछों और राक्षसों के राजाओं तथा अंगद आदि सारे वानर-समाज के चरणों की वन्दना की जाती है। इनमें से केवल अंगद का नाम लिया जाता है, और सुग्रीव, जाम्बवान् और विभीषण के नाम टीका देती है। कारण यह दिया जाता है कि इन्होंने अधम शरीर में राम को पा लिया। टीका अधम शरीर से पशु और राक्षस आदि का देह समझाती है। जिस देह को छोटा माना जाता है, उसी में वह चीज़ मिल गयी जिसके लिये और सब देह अच्छे माने जाते हैं।
फिर यह दरवाज़ा और खुल जाता है। पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य और असुर, जितने भी राम के चरणों के उपासक हैं, सबके चरणों की वन्दना है। पाँच जातियाँ गिनायी गयी हैं, उनमें असुर भी हैं, और शर्त जाति की नहीं, नीयत की है: जो बिना किसी कामना के राम के सेवक हैं।
फिर मुनि आते हैं, शुकदेव, सनकादि और नारद। उनके आगे कवि धरती पर सिर टेककर प्रणाम करता है और कृपा माँगता है, जो इस पूरे हिस्से में और कहीं नहीं होता। उसके बाद सीता, और वहाँ फिर मुद्रा बदलती है। उनके चरणों को तुलसीदास मनाते हैं, और उनसे एक ही चीज़ माँगते हैं, निर्मल बुद्धि। और अन्त में, सबसे पीछे, राम आते हैं। मन, वचन और कर्म से उनके सर्वसमर्थ चरणों की वन्दना की जाती है। उनका चित्र यह है: कमल जैसी आँखें, हाथ में धनुष और बाण, भक्तों की विपत्ति तोड़नेवाले और सुख देनेवाले। धनुष-बाण वही हैं जो हनुमान के हृदय के भीतर थे।
वाणी और उसका अर्थ
अब वह बात आती है जिस पर यह पूरा प्रसंग मुड़ता है।
दो जोड़े रखे गये हैं: वाणी और उसका अर्थ, और जल और जल की लहर। दोनों के दो नाम लिये जा सकते हैं, पर इन्हें दो टुकड़ों में किया नहीं जा सकता। कहने में भिन्न, होने में अभिन्न। इसी तरह सीता और राम के चरणों की वन्दना की जाती है।
और उनके विषय में एक ही बात चुनी गयी है: उन्हें दुखी लोग परम प्रिय हैं। व्यक्तियों की वन्दना यहीं ख़त्म होती है, और आख़िरी वाक्य ऐसा है कि कोई भी दुखी आदमी उसे पढ़कर समझ ले कि वह ख़ुद उस सूची में है।
इस उपमा का दूसरा काम आगे तुरन्त खुलता है। अगर शब्द और उसका अर्थ एक ही चीज़ के दो नाम हैं, तो नाम और नामवाला भी एक ही चीज़ के दो नाम हुए। यह बात कहे बिना छोड़ दी गयी है, और इसी उपमा पर प्रसंग का पूरा दूसरा आधा खड़ा होता है।
एक शब्द की वंदना
जिस वन्दना से यह पूरा सिलसिला शुरू हुआ था, वही अब फिर शुरू होती है, और इस बार उसके आगे कोई व्यक्ति नहीं है।
अवधपुरी की जो वन्दना थी, वही यहाँ राम-नाम की है। बीच में सारा परिवार, सारे सेवक, सारे मुनि और स्वयं राम आ चुके, और सूची एक जगह से चलकर एक शब्द पर आ ठहरी।
नाम को अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा का हेतु कहा गया है। पोद्दार की टीका बताती है कि यह बीजाक्षरों की बात है, र, आ और म, जो क्रमशः इन तीनों के बीज माने जाते हैं। आगे कहा गया है कि यह नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के रूप में है, और वेदों का प्राण है। वह एक साथ निर्गुण भी है और गुणों का भण्डार भी। यह जोड़ी आगे बार-बार लौटेगी।
फिर गवाह पेश होते हैं। पहले गवाह शिव हैं: यह वह महामन्त्र है जिसे शिव जपते हैं, और काशी में उनका दिया हुआ यही उपदेश मुक्ति का कारण है। जो चीज़ वे दूसरों को देते हैं, वही ख़ुद भी बरतते हैं। दूसरे गवाह गणेश हैं, जो इस नाम की महिमा जानते हैं, और इसी नाम के प्रभाव से सबसे पहले पूजे जाते हैं।
तीसरे गवाह आदिकवि हैं, जो इस नाम का प्रताप जानते हैं, क्योंकि वे उलटा जप करके शुद्ध हुए। टीका बताती है कि आदिकवि वाल्मीकि हैं और उलटा जप मरा-मरा है। उलटे नाम की यह बात इसी ग्रन्थ में आगे अयोध्याकाण्ड में फिर आती है। वहाँ कहा गया है कि उलटा नाम जपकर वाल्मीकि ब्रह्म के समान हो गये। नाम उलटा करके लिया गया, फिर भी काम कर गया। उसका असर उसमें है, क्रम में नहीं।
फिर शिव और पार्वती। शिव का वचन है कि एक राम-नाम सहस्र नामों के समान है, और उस वचन को सुनकर पार्वती अपने पति के साथ यही नाम जपती हैं। गवाही एक ने दी, अमल दूसरे ने किया। नाम के प्रति पार्वती के हृदय की यह प्रीति देखकर शिव हर्षित हुए और स्त्रियों में भूषणरूप पार्वती को अपना भूषण बना लिया। नाम से प्रेम करने का पहला फल यह मिला कि पार्वती उसी के और पास पहुँच गयीं जिसने नाम दिया था।
और फिर वह बात जिसमें दावे के साथ सबूत भी है: शिव नाम के प्रभाव को अच्छी तरह जानते हैं, इसीलिये कालकूट विष ने उन्हें अमृत का फल दिया। यह नहीं कहा गया कि ज़हर हट गया या मीठा हो गया। चीज़ वही रही, उसका नतीजा बदल गया।
दो अक्षर
अब तुलसीदास नाम को उसके दो अक्षरों में तोड़ देते हैं, और उन दो अक्षरों के लिये उपमाएँ ढूँढ़ने लगते हैं। शुरुआत एक खेत से होती है।
राम की भक्ति वर्षा-ऋतु है, उत्तम सेवक धान हैं, और राम-नाम के दो अक्षर सावन और भादों के महीने हैं। सेवक को यहाँ करनेवाला नहीं, उगनेवाला बनाया गया है। भक्ति पूरा मौसम है, और दो अक्षर उस मौसम के वे दो महीने हैं जिनमें पानी सबसे ज़्यादा गिरता है और जिन पर फ़सल टिकी है।
फिर तुलसीदास अपनी निजी बात कहते हैं: ये दोनों अक्षर उन्हें राम और लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इन दोनों का अलग-अलग बखान करने बैठिये तो प्रीति बिलगाती है, फ़र्क़ दिखने लगता है। पर हैं ये जीव और ब्रह्म की तरह स्वभाव से ही साथ रहनेवाले। अलगाव बखान में है, होने में नहीं।
इसके बाद उपमाओं की झड़ी लगती है, और वे सब एक ही साँचे की हैं। दोनों अक्षर वर्णमालारूपी शरीर के दो नेत्र हैं। वे स्मरण करने में सबके लिये सुलभ हैं, इस लोक में लाभ देते हैं और परलोक में निर्वाह करते हैं। ये नर और नारायण के समान सुन्दर भाई हैं, भक्तिरूपी स्त्री के कानों के दो कर्णफूल हैं। ये जगत् के हित के लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं, सुन्दर गति रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति हैं। ये कच्छप और शेष की तरह पृथ्वी को धारण करनेवाले हैं, भक्तों के मनरूपी कमल के भौंरे हैं, और जीभरूपी यशोदा के लिये कृष्ण और बलराम के समान हैं। जिस चीज़ का वर्णन करना है वह दो है, इसलिये उसकी तुलना भी हर बार किसी जोड़े से की गयी है। इनमें तीन जोड़े भाइयों के हैं।
और फिर दोनों अक्षरों को वहीं बिठा दिया जाता है जहाँ वे लिखने में सचमुच बैठते हैं: एक छत्र है और दूसरा मुकुटमणि। और दोनों सब वर्णों के ऊपर विराजते हैं। टीका बताती है कि छत्र से रकार का रेफ और मुकुटमणि से मकार का अनुस्वार समझना है। दोनों उपमाएँ राजा की हैं, और राजा के शरीर पर ये ही दो चीज़ें सिर से भी ऊपर रहती हैं। देवनागरी में ये दोनों चिह्न अक्षर के ऊपर ही लिखे जाते हैं, इसलिये यह बात लिखावट में आँखों से देखी जा सकती है।
बड़ा कौन, नाम या रूप
अब स्तुति दलील में बदल जाती है। पहले नाम और नामी का रिश्ता बाँधा जाता है: समझने में दोनों एक से हैं, फिर भी दोनों में स्वामी और सेवक जैसी प्रीति है। टीका इसे यों खोलती है कि जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, वैसे ही नाम के पीछे नामी चलते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं। फिर दोनों को एक ही दर्जा दिया जाता है: नाम और रूप, दोनों ईश्वर की उपाधि हैं, दोनों अकथ और अनादि हैं।
और यहीं वह बात है जिसे आगे की हर दलील के साथ याद रखना है: इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कहना अपराध है। गुणों का अन्तर सुनकर साधु लोग ख़ुद समझ लेंगे। सुनाना कवि का काम है, तय करना सुननेवाले का।
पहली कसौटी: कोई विशेष रूप, उसका नाम जाने बिना, हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जाता। रूप को दूर या अँधेरे में नहीं, हथेली पर रखा गया है, और फिर भी वह पहचान में नहीं आता। दूसरी कसौटी उलटी है: रूप को देखे बिना भी नाम का स्मरण किया जाय तो वह रूप हृदय में आ जाता है। और वह विशेष प्रेम के साथ आता है।
दोनों जाँचें एक ही तरीक़े की हैं और उनके नतीजे उलटे हैं। असली बात आख़िर में है। रूप के बिना नाम लेने पर रूप केवल आता नहीं, विशेष प्रेम के साथ आता है।
इस हिस्से के अन्त में नाम को एक काम सौंपा जाता है। नाम और रूप की गति की कहानी अकथ है, समझने में सुखद है और बखानी नहीं जाती। और निर्गुण तथा सगुण के बीच नाम सुन्दर साक्षी है, दोनों का बोध करानेवाला चतुर दुभाषिया। नाम को यहाँ बड़ा नहीं कहा गया, बीच में खड़ा कहा गया है, और आगे का सारा दावा यहीं से निकलता है।
देहली पर रखा हुआ दीपक
अब वह उपमा आती है जिसकी सारी ताक़त एक शब्द में है।
मुँह को द्वार कहा गया और जीभ को देहली। राम-नाम रूपी मणि के दीपक को देहली पर रखवाया गया है, और देहली घर का वह हिस्सा है जो न भीतर है न बाहर, दोनों की सरहद है। देहली पर रखा दीपक दोनों तरफ़ एक साथ रोशनी डालता है, और यहाँ ठीक यही दो चीज़ें चाही गयी हैं, भीतर का उजाला और बाहर का उजाला।
इसके बाद तुलसीदास दिखाते हैं कि यह दीपक किस-किस के काम आता है। पहले योगी हैं, जो ब्रह्मा के रचे इस प्रपंच से छूट चुके हैं और वैराग्यवान् हैं। वे इसी नाम को जीभ से जपते हुए जागते हैं। और वे नाम तथा रूप से रहित उस अनुपम, अकथ, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं। जो नाम और रूप से परे पहुँच चुके हैं, वे वहाँ तक एक नाम के रास्ते ही पहुँचे हैं।
दूसरे वे हैं जो परमात्मा की गूढ़ गति जानना चाहते हैं, और वे भी नाम को जीभ से जपकर उसे जान लेते हैं। तीसरे वे साधक हैं जो लौ लगाकर नाम जपते हैं और अणिमा आदि सिद्धियाँ पाकर सिद्ध हो जाते हैं। चौथे वे आर्त भक्त हैं जो संकट से घबराकर नाम जपते हैं, जिनके बड़े भारी बुरे संकट मिट जाते हैं और जो सुखी हो जाते हैं। इसके बाद ही कहा जाता है कि जगत् में राम-भक्त चार प्रकार के हैं, और टीका इन्हें अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी कहती है।
चारों ही पुण्यात्मा हैं, पापरहित हैं और उदार हैं। जो सिद्धि के लिये जप रहा है और जो मुसीबत से बचने के लिये, वह भी इसी सूची में उन्हीं शब्दों के साथ है। फिर कहा जाता है कि चारों चतुर भक्तों को नाम का ही आधार है, और इनमें ज्ञानी भक्त राम को विशेष प्रिय है। इसके बाद चारों युगों और चारों वेदों में नाम का प्रभाव बताकर एक युग अलग कर दिया जाता है: कलियुग में दूसरा कोई उपाय है ही नहीं।
और इस हिस्से के अन्त में उनकी बात आती है जिनकी कोई कामना नहीं बची। वे सब प्रकार की कामनाओं से रहित हैं और राम-भक्ति के रस में लीन हैं। उन्होंने भी नाम के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है। टीका कहती है कि इन्हें भोग और मोक्ष, किसी की कामना नहीं, फिर भी ये नाम से क्षण भर भी अलग नहीं होना चाहते, जैसे मछली पानी से।
निर्गुण से बड़ा, और उसका कारण
अब वह दावा आता है जिसके लिये यह पूरा प्रसंग जाना जाता है, और पहले यह देखना चाहिये कि वह किस भाषा में रखा गया है।
निर्गुण और सगुण, ब्रह्म के दो स्वरूप हैं, और दोनों अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। जिनसे तुलना की जा रही है, उन्हें पहले पूरी ऊँचाई पर बिठा दिया गया है। और फिर: मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है। यह फ़ैसला नहीं, राय है। थोड़ी देर पहले जिस कवि ने कहा था कि बड़ा-छोटा कहना अपराध है, वही अब बड़ा कह रहा है, पर अपनी सम्मति कहकर।
फिर तुलसीदास एक सफ़ाई भी जोड़ देते हैं: सज्जन इसे इस दास की ढिठाई न समझें। मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कह रहा हूँ। तीन शब्द गिनाये गये हैं और उनमें से एक भी प्रमाण नहीं है।
फिर एक उपमा से दोनों ब्रह्मों का फ़र्क़ समझाया जाता है: दोनों का ज्ञान अग्नि के समान है। टीका खोलती है कि निर्गुण वह अग्नि है जो काठ के भीतर है और दीखती नहीं, सगुण वह है जो प्रत्यक्ष जल रही है। केवल प्रकट और अप्रकट का भेद है। और इसके बाद इस दावे की धुरी: दोनों ही जानने में अगम हैं, और दोनों नाम से सुगम हो जाते हैं। इसीलिये मैंने नाम को ब्रह्म से और राम से बड़ा कहा है। कारण ऊँचाई का नहीं, पहुँच का दिया गया है।
फिर दलील ज़मीन पर आ जाती है। ऐसा विकाररहित ब्रह्म हृदय में मौजूद रहते हुए भी जगत् के सब जीव दीन और दुखी हैं, और यह बात कोई भी अपने आसपास देखकर जाँच सकता है। जब नाम का निरूपण हो और नाम का जतन हो, तब वही ब्रह्म ऐसे प्रकट होता है जैसे रत्न से उसका मूल्य।
रत्न जेब में पड़ा रहे तो भी रत्न है, उसमें कोई कमी नहीं। पर उसका मूल्य तब तक कहीं नहीं होता जब तक कोई उसे पहचान न ले। इसी तरह नाम को ब्रह्म से बड़ा कहने का मतलब यह नहीं कि ब्रह्म में कुछ कम है। मतलब यह है कि ब्रह्म का होना और ब्रह्म का काम आना, दो अलग बातें हैं, और दूसरी बात नाम से होती है।
इसके बाद आधी दलील बन्द होती है और दूसरी आधी खुलती है: इस प्रकार निर्गुण से नाम का प्रभाव अत्यन्त बड़ा है। और अब अपने विचार के अनुसार कहता हूँ कि नाम सगुण राम से भी बड़ा है। तीसरी बार यह चिह्न लगाया जा रहा है कि यह किसकी राय है।
और सगुण राम से भी बड़ा
अब तुलसीदास एक-एक करके राम के काम गिनाते हैं और हर काम के सामने नाम का काम रख देते हैं। पहला जोड़ा ही शर्त तय कर देता है: राम ने भक्तों के हित के लिये मनुष्य-शरीर धारण किया और कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया। और भक्त प्रेम के साथ नाम जपते हुए बिना किसी आयास के आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं। एक तरफ़ देह लेना और संकट सहना, दूसरी तरफ़ अनायास।
राम ने एक तपस्वी की स्त्री को तारा, और नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि सुधार दी। यहाँ एक और करोड़ आमने-सामने हैं। टीका उस स्त्री का नाम अहल्या बताती है। फिर ऋषि के हित के लिये सुकेतु की कन्या को उसकी सेना और पुत्र सहित समाप्त किया गया। टीका उसे ताड़का तथा उसके पुत्र को सुबाहु कहती है। नाम नहीं लिया जाता, केवल रिश्ते से पहचान करायी जाती है।
आगे के जोड़े इसी क्रम में चलते हैं। नाम अपने दास के दोष, दुःख और दुराशा को ऐसे मिटा देता है जैसे सूर्य रात को। राम ने स्वयं शिव का धनुष तोड़ा, और नाम का प्रताप संसार के सारे भय तोड़नेवाला है। यहाँ भव शब्द दो बार आया है, दोनों बार अलग अर्थ में: पहले भव का धनुष, यानी शिव का, और फिर भव का भय, यानी संसार का।
राम ने शबरी और गीध जैसे उत्तम सेवकों को मुक्ति दी, टीका जिनके नाम शबरी और जटायु बताती है। और नाम ने अगणित दुष्टों का उद्धार किया। एक तरफ़ सुसेवक हैं, तपस्वी की स्त्री है, शरण में आये हुए हैं। दूसरी तरफ़ खल हैं, करोड़ों खल, अगणित खल, और अनेक गरीब। तुलना केवल गिनती की नहीं, इसकी भी है कि किसका नम्बर लगता है।
फिर यह बात और साफ़ हो जाती है। राम ने सुकंठ और विभीषण, इन दो को ही शरण में रखा, यह सब कोई जानता है। टीका सुकंठ को सुग्रीव बताती है। और नाम ने अनेक गरीबों पर कृपा की, और यह विरद लोक और वेद दोनों में प्रसिद्ध है। दो, और दोनों के नाम लिये गये। अनेक, और एक का भी नाम नहीं।
फिर सबसे बड़ा परिश्रम सामने आता है। राम ने भालू और बन्दरों की सेना बटोरी और पुल बाँधने के लिये थोड़ा परिश्रम नहीं किया। और नाम लेते ही भवसागर सूख जाता है। सूखे हुए समुद्र में पार करने को कुछ बचता ही नहीं। और इसके ठीक बाद: सज्जन लोग अपने मन में विचार कीजिये। इतने जोड़े गिनाकर भी कवि नतीजा ख़ुद नहीं सुनाता।
आख़िरी जोड़ा सबसे ऊँचा है। राम ने कुटुम्बसहित रावण को मारा, सीता के साथ अपने नगर में प्रवेश किया, राजा हुए, अवध राजधानी हुई। इसके सामने जो रखा गया है उसके पास न नगर है, न सेना, न सिंहासन।
सेवक प्रेम के साथ नाम का स्मरण करते ही बिना परिश्रम मोह की प्रबल सेना जीत लेता है। वह प्रेम में मग्न होकर अपने ही सुख में विचरता है। नाम के प्रसाद से उसे सपने में भी चिन्ता नहीं होती। एक तरफ़ जीता हुआ रण और राजधानी है, दूसरी तरफ़ बिना श्रम जीती हुई सेना। और राज्य के सामने रखा गया है चिन्ता का न होना, सपने तक में।
अब इस पूरी सूची को एक साथ देखिये: तपस्वी की स्त्री, ऋषि के हित का काम, धनुष, दण्डक वन, राक्षसों का समूह, शबरी और गीध। सुग्रीव और विभीषण, भालू-बन्दरों की सेना और सेतु, रावण का वध, और अवध का राजसिंहासन। मनुष्य-शरीर धारण करने से अवध के राजसिंहासन तक राम की कथा यहाँ उस जगह रखी गयी है जहाँ कथा अभी शुरू भी नहीं हुई। और हर घटना किसी और चीज़ को नापने का बटखरा बन गयी है।
और यह दलील एक नज़ीर पर बन्द होती है। नाम ब्रह्म और राम दोनों से बड़ा है, और वह वर देनेवालों को भी वर देनेवाला है। प्रमाण यह कि सौ करोड़ रामचरित्र में से शिव ने अपने हृदय में यह जानकर इसी नाम को चुना। इस आधे हिस्से की पहली गवाही भी शिव की थी, वही महामन्त्र जिसे वे जपते हैं, और बीच में कालकूट का प्रसंग भी उन्हीं का था। जो सबसे पहले बुलाया गया था, वही सबसे अन्त में खड़ा किया गया है।
जीभ और प्रेम की शर्त
इस पूरी दलील में कोई विधि नहीं है। कहीं नहीं बताया गया कि नाम कितनी बार लेना है, किस पहर, किस दिशा में मुँह करके, किस माला या आसन पर। जप के लिये जिस एक अंग का नाम आता है वह जीभ है, और जिस एक शर्त का नाम आता है वह प्रेम है। सेवक प्रीति से नाम का स्मरण करते हैं, भक्त उसे प्रेम से जपते हैं, और दीपक देहली पर रखा जाता है, जो हर घर में होती है।
दूसरी बात उस विरोध की है जो ऊपर से पढ़ने पर खटक सकता है। पहले कवि कहता है कि नाम और रूप में बड़ा-छोटा कहना अपराध है। और थोड़ी ही देर बाद वही कवि कहता है कि नाम दोनों से बड़ा है। पर वे फ़ैसला नहीं सुनाते। वे कहते हैं मेरी सम्मति में, फिर अपने विचार के अनुसार। और बीच में वे जोड़ देते हैं कि यह मेरे मन का विश्वास, प्रेम और रुचि है। तीन बार वे अपनी बात पर अपना नाम लिख देते हैं।
तीसरी बात उन ग़ैरहाज़िरियों की है जो पढ़नेवाले को खलती हैं। इस वंदना में कौसल्या के सिवा किसी रानी का नाम नहीं आता, और कौसल्या भी पूर्व दिशा की तरह आती हैं। हनुमान से विनती छोटी-सी है, और उसके बाद उन्हें प्रणाम है। दोनों में समुद्र, लंका या पर्वत नहीं है। विनती में उनका परिचय यह है कि उनका यश राम ने स्वयं कहा। प्रणाम में यह कि वे दुष्टों के वन के लिये अग्नि हैं, ज्ञान के घन हैं, और राम उनके हृदय में रहते हैं। और राम स्वयं सूची में सबसे अन्त में आते हैं, जब उनसे जुड़ा कोई नाम बाक़ी नहीं बचता। उनके बाद वंदना केवल उनके नाम की होती है।
और आख़िरी बात। राम के खाते में जो भी लिखा गया, उसमें कहीं न कहीं क़ीमत है: देह धारण करना, संकट सहना, सेना बटोरना, पुल के लिये कम परिश्रम न करना, रण लड़ना। नाम के खाते में बार-बार वही शब्द लौटते हैं: अनायास, बिना श्रम, स्मरण करने में सबके लिये सुलभ, नाम लेते ही। जिसे यहाँ सबसे बड़ा कहा गया है, वही सबसे सस्ता है। दलील का पूरा रुख़ यही है कि जो सबके हाथ में आ सके, उसी को बड़ा कहा जाय।
पूरे प्रसंग में दो जगह कवि की मुद्रा बदलती है: हनुमान के लिये वे लिखते हैं कि विनती करता हूँ, और सीता के लिये कि मनाता हूँ। बाक़ी नगर, नदी, माता, पिता, ससुर, भाई, वानर, मुनि और स्वयं राम, सबके लिये वन्दना है या प्रणाम। इन दो में माँग का शब्द केवल सीता के आगे आता है, निर्मल बुद्धि। हनुमान की विनती में उनका परिचय भर है, कि उनका यश राम ने स्वयं कहा।
और अन्त में जो प्रमाण रखा जाता है वह किसी तर्क का नहीं, एक चुनाव का है। सौ करोड़ रामचरित्र में से शिव ने अपने हृदय में जानकर इसी नाम को चुना। जो ग्रन्थ अभी शुरू होने को है वह भी उसी रामचरित को कहता है। उसका लिखनेवाला कथा शुरू करने से पहले बता चुका है कि उसमें सबसे बड़ा हिस्सा कौन-सा है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, सोरठा 16 से दोहा 25, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।