रामचरितमानस · बालकाण्ड · वंदना का अन्तिम चरण, और राम-नाम की महिमा
वंदना का अन्तिम चरण, और राम-नाम की महिमा
अवधपुरी से लेकर सीताराम तक जिन-जिनकी वंदना बाक़ी थी, और उसके तुरन्त बाद एक ऐसी वंदना जो किसी व्यक्ति की नहीं, दो अक्षरों की है, और जिसके पक्ष में तुलसीदास पूरी दलील रखते हैं।
रामचरितमानस अभी कथा तक नहीं पहुँचा है। यहाँ तक आते-आते कवि अपनी वाणी की दीनता कह चुके हैं और शिव तथा पार्वती का प्रसाद माँग चुके हैं। जो अब बाक़ी है वह वंदना का अन्तिम चरण है, और इस प्रसंग का पहला आधा हिस्सा उसी को पूरा करता है। पर वंदना जहाँ पूरी होती है, ठीक वहीं यह प्रसंग अपना असली काम शुरू करता है। जिन-जिन के चरण छूकर तुलसीदास आगे बढ़े हैं, उन सबके बाद वे एक और चीज़ के आगे सिर झुकाते हैं, और वह चीज़ कोई व्यक्ति नहीं है। वह दो अक्षरों का एक शब्द है।
दूसरा आधा हिस्सा स्तुति नहीं है, दलील है, और यह फ़र्क़ बड़ा है। तुलसीदास एक बात कहते हैं जो सुनने में कड़ी लगती है: नाम निर्गुण ब्रह्म से भी बड़ा है और सगुण राम से भी बड़ा है। इसे कहकर वे चुप नहीं हो जाते। वे इसे अपनी सम्मति कहकर रखते हैं, फिर इसका कारण देते हैं, फिर एक-एक करके राम के कामों को नाम के कामों के सामने रखते हैं, और अन्त में इतना ही कहते हैं कि अपने मन में विचार कीजिये। इसकी ताक़त इसी में है कि यह माँगता नहीं, दिखाता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम जिनकी वंदना इस प्रसंग में सबसे अन्त में की जाती है, और जिनके अपने काम आगे चलकर उन्हीं के नाम के सामने रख दिये जाते हैं।
- जानकी जनक की पुत्री और जगत् की माता, जिनसे तुलसीदास निर्मल बुद्धि माँगते हैं।
- दशरथ अवध के राजा, जिनके विषय में यहाँ का सोरठा केवल एक बात कहता है, और वह उनके अन्त की है।
- भरत भाइयों में जिनके चरणों को सबसे पहले प्रणाम किया जाता है।
- लक्ष्मण जिनका यश रघुनाथ की कीर्ति-पताका का दंड कहा गया है।
- हनुमान जिनकी विनती दो ही पंक्तियों की है, और दोनों पंक्तियाँ राम के विषय में हैं।
- राम नाम दो अक्षर, जिन्हें यह प्रसंग एक पात्र की तरह बरतता है: उनकी वंदना होती है और उनके पक्ष में गवाही दी जाती है।
पहले नगर, फिर नगरवासी
वंदना का यह हिस्सा जहाँ से उठता है, वहाँ कोई व्यक्ति नहीं है। पहला प्रणाम एक नगर को जाता है और दूसरा एक नदी को, और दोनों को वही मिलता है जो आगे चलकर बड़े-बड़े नामों को मिलेगा।
बंदउँ अवध पुरी अति पावनि । सरजू सरि कलि कलुष नसावनि॥
चौपाई १
प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी । ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी॥
अवधपुरी को अति पावन कहा गया और सरयू को वह नदी, जो कलियुग के पाप का नाश करती है। नदी की तारीफ़ उसके पानी या उसकी लम्बाई से नहीं की गयी, उस काम से की गयी जो वह करती है। और फिर नगर के नर-नारी आते हैं, और यहीं पर एक चीज़ देखने लायक़ है। उनको प्रणाम करने का कारण उनका अपना गुण नहीं बताया गया। कारण यह बताया गया कि प्रभु की ममता उनपर थोड़ी नहीं है। श्रेय दूसरी ओर रखा गया है: ये वन्दनीय इसलिये हैं कि इनसे प्रेम किया गया, इसलिये नहीं कि इन्होंने कुछ कमाया।
अगली पंक्ति उस बात को और आगे ले जाती है, और वह इस पूरे प्रसंग की सबसे कड़ी पंक्ति है।
सिय निंदक अघ ओघ नसाए । लोक बिसोक बनाइ बसाए॥
चौपाई २
बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची। कीरति जासु सकल जग माची॥
सीता की निन्दा करनेवालों के पापों का समूह नष्ट किया गया और उनको शोक से रहित बनाकर बसा दिया गया। पद्य किसी का नाम नहीं लेता, केवल सिय निंदक कहता है। पोद्दार की टीका कोष्ठक में धोबी और उसका साथ देनेवाले पुर-नर-नारियों का नाम जोड़ती है, और वह जोड़ टीका की है, तुलसीदास की नहीं। जो तुलसीदास की है वह क्रम है। अयोध्यावासियों के विषय में पहली बात यह नहीं कही गयी कि वे भले थे। पहली बात यह कही गयी कि जिन्होंने सबसे बुरा किया, उनका भी हिसाब चुका दिया गया।
फिर कौसल्या आती हैं, और उनका परिचय माता कहकर नहीं दिया जाता। उन्हें पूर्व दिशा कहा जाता है। दिशा की अपनी कोई शोभा नहीं होती, उसकी शोभा वह होती है जो उसमें उगता है, और तुलसीदास अगली ही पंक्ति में वह उगना दिखा देते हैं: वहीं से रघुपतिरूपी सुन्दर चन्द्रमा प्रकट हुआ, जो विश्व को सुख देनेवाला है और दुष्टरूपी कमलों के लिये पाला है। एक ही चाँदनी और दो उलटे नतीजे: रोशनी वही रहती है, नीचे खड़ी हुई चीज़ बदल जाती है। उसके बाद दशरथ आते हैं, सब रानियों सहित, और कौसल्या के सिवा किसी रानी का नाम नहीं लिया जाता। इनसे माँगते हुए कवि अपना परिचय अपने नाम से नहीं देता, अपने पुत्र का सेवक जानकर कृपा कीजिये, यह कहकर देता है। और अन्त में वह बात आती है जो ब्रह्मा तक को इनके नीचे खड़ा कर देती है: इनको रचकर विधाता स्वयं बड़े हो गये।
सार: वंदना का यह चरण नगर और नदी से शुरू होता है, फिर नगरवासियों तक जाता है, जिनमें सीता की निन्दा करनेवाले भी गिने जाते हैं। कौसल्या पूर्व दिशा कहकर नमस्कार पाती हैं, दशरथ सब रानियों सहित, और तुलसीदास अपना परिचय राम के सेवक के रूप में देते हैं।
जिसने प्यारे शरीर को तिनका कह दिया
अब वह सोरठा आता है जिससे इस प्रसंग की गिनती शुरू होती है, और वह अवध के राजा के नाम है। पूरे सोरठे में दशरथ के विषय में दो ही बातें हैं, और दोनों एक ही बात के दो सिरे हैं।
बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद।
सोरठा १६
बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ॥ १६॥
पहली बात यह कि राम के चरणों में उनका सत्य प्रेम था। प्रेम के आगे सत्य लगाने की ज़रूरत क्यों पड़ी, यह दूसरी पंक्ति बता देती है, क्योंकि दूसरी पंक्ति उसी प्रेम की जाँच है। दीनदयालु के बिछुड़ते ही उन्होंने अपने प्यारे शरीर को तिनके की तरह त्याग दिया। इस पंक्ति का सारा वज़न एक शब्द पर टिका है, और वह शब्द है प्रिय। शरीर को प्यारा कहा गया है। अगर वह प्यारा न होता तो उसका छूटना किसी बात का सबूत न होता। जो चीज़ बोझ हो, उसे गिरा देना त्याग नहीं कहलाता।
इसके तुरन्त बाद दूसरे पिता आते हैं। जनक को प्रणाम किया जाता है, और अकेले नहीं, परिवार सहित। जिस राजा का नाम ही बिदेहू है, देह से परे, उसे कुटुम्ब के साथ प्रणाम किया जाना अपने आप में एक टिप्पणी है। उनका प्रेम गूढ़ कहा गया, और छिपाया कहाँ गया था यह भी बताया गया: योग में और भोग में, जो आमतौर पर एक-दूसरे के उलट गिने जाते हैं और यहाँ दोनों एक ही काम में लगे हैं, परदे के काम में।
फिर वह परदा गिरता है, और पद्य बताता है कि किस चीज़ से गिरा। न किसी उपदेश से, न किसी साधना से। राम को देखते ही वह प्रकट हो गया। जो प्रेम योग से नहीं पकड़ा गया और भोग से नहीं पकड़ा गया, वह देखे जाने भर से खुल गया।
सार: सोरठा १६ दशरथ के लिये है, और उसमें उनके प्रेम की जाँच यही है कि उन्होंने अपने प्यारे शरीर को तिनके की तरह छोड़ दिया। उसके बाद जनक की बारी है, जिनका छिपा हुआ प्रेम योग और भोग दोनों में दबा रहा और राम के दिखते ही खुल गया।
पताका और उसका दंड
भाइयों की बारी आती है, और जिससे शुरुआत होती है वह कोई संयोग नहीं है। तुलसीदास साफ़ लिखते हैं कि भाइयों में सबसे पहले भरत के चरणों को प्रणाम है, और टीका कोष्ठक में वही स्पष्ट करती है। भरत के विषय में जो कहा गया है, वह प्रशंसा का ढंग बदल देता है: उनका नियम और व्रत वर्णन नहीं किया जा सकता। एक कवि, जो इस पूरे ग्रन्थ में हर चीज़ को शब्दों में बाँधने बैठा है, यहाँ कहता है कि यह शब्दों में नहीं आयेगा। और जो चित्र वे देते हैं वह छोटा है: भरत का मन राम के चरणकमलों में भौंरे की तरह लुभाया हुआ है और पासू नहीं छोड़ता, यानी उस जगह से हटता ही नहीं जहाँ से फूल दीखता रहे।
उसके बाद लक्ष्मण आते हैं, और उनके साथ इस पूरी वंदना की सबसे बढ़िया उपमा आती है।
बंदउँ लछिमन पद जलजाता। सीतल सुभग भगत सुखदाता॥
चौपाई ३
रघुपति कीरति बिमल पताका। दंड समान भयउ जस जाका॥
पहले चरणों का वर्णन है: शीतल, सुन्दर, भक्तों को सुख देनेवाले। फिर वह उपमा, जिसमें लक्ष्मण का पूरा जीवन एक शब्द में आ जाता है। रघुनाथ की कीर्ति निर्मल पताका है, और लक्ष्मण का यश उस पताका का दंड है। टीका इसे खोलकर कहती है कि दंड वही है जो पताका को ऊँचा करके फहराता है।
अब सोचिये कि उपमा में दंड क्यों चुना गया। झंडा देखने में आता है, डंडा नहीं आता, और जो आदमी झंडे को देखकर रुकता है वह डंडे को गिनता तक नहीं। पर डंडा हटा दीजिये और झंडा कपड़े का एक टुकड़ा बनकर ज़मीन पर पड़ा रह जायेगा। फहरना कपड़े का गुण नहीं है, ऊँचाई का नतीजा है, और ऊँचाई दूसरा देता है। और उसी साँस में बता दिया जाता है कि यह भाई है कौन: हज़ार सिरवाले शेष, जिनके सिरों पर यह सारा जगत् टिका है, और जो पृथ्वी का भय दूर करने के लिये उतरे। उठाये रखना और डर हटाना, दोनों काम एक ही के नाम कर दिये गये हैं।
सार: भाइयों में पहला प्रणाम भरत को जाता है, जिनका व्रत वर्णन से बाहर बताया गया है और जिनका मन भौंरे की तरह पास नहीं छोड़ता। लक्ष्मण का यश राम की कीर्ति-पताका का दंड कहा गया है, और वही शेष हैं, जो जगत् को धारण करते हैं और उसका भय हरने उतरे।
जिनका यश राम ने अपने मुँह से कहा
अब वह चौपाई आती है जिसमें दो भाई एक साथ निपटते हैं, और जिसके दूसरे आधे में इस प्रसंग का सबसे जाना-पहचाना नाम आता है।
रिपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी॥
चौपाई ४
महाबीर बिनवउँ हनुमाना । राम जासु जस आप बखाना॥
और फिर हनुमान। यहाँ क्रिया बदल जाती है, और यह बदलना मामूली नहीं है। इस पूरे हिस्से में तुलसीदास बंदउँ कहते हैं या प्रनवउँ कहते हैं, यानी वन्दना करता हूँ या प्रणाम करता हूँ। हनुमान के लिये वे लिखते हैं बिनवउँ, विनती करता हूँ। वन्दना ऊपर की ओर की जाती है और विनती किसी से की जाती है, कुछ माँगने के लिये। पूरे प्रसंग में यह क्रिया केवल यहाँ आती है, और एक जगह और, जिसपर आगे आयेंगे।
और परिचय में जो दिया गया है, वह हनुमान का कोई काम नहीं है। समुद्र नहीं, लंका नहीं, पर्वत नहीं। कहा यह गया कि जिनके यश का वर्णन राम ने स्वयं किया है। कवि यहाँ एक क़दम पीछे हट जाता है: इस आदमी के विषय में एक बेहतर बयान मौजूद है और वह पहले ही दिया जा चुका है, मेरे जोड़ने को कुछ नहीं बचा।
प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यान घन।
सोरठा १७
जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर॥ १७॥
दूसरी पंक्ति और आगे जाती है। जिनका हृदय वह भवन है जिसमें धनुष-बाण धारण किये राम बसते हैं। इस पूरी वंदना में राम को जिस एक जगह का निवासी कहा गया है, वह जगह कोई मन्दिर नहीं है, कोई नगर नहीं, कोई धाम नहीं। वह एक हृदय है। और वहाँ वे आराम करते हुए नहीं बैठे, शस्त्र लिये हुए बैठे हैं, जैसे किसी काम पर तैनात हों। जिस सेवक ने अपना सारा जीवन आज्ञा पर रखा, उसके भीतर स्वामी भी तैयार खड़ा है।
सार: शत्रुघ्न का परिचय यह है कि वे भरत के पीछे चलते हैं। हनुमान के लिये तुलसीदास विनती शब्द चुनते हैं, उनका कोई पराक्रम गिनाने के बजाय यह कहते हैं कि उनका यश राम ने स्वयं कहा है, और सोरठा १७ में उनके हृदय को वह भवन बताते हैं जिसमें धनुष-बाण लिये राम रहते हैं।
अधम शरीर में भी, और बिना किसी माँग के
हनुमान के बाद सूची चौड़ी होती है और नीचे उतरती है। वानरों, रीछों और राक्षसों के राजाओं तथा अंगद आदि सारे वानर-समाज के सुन्दर चरणों की वन्दना की जाती है, और पद्य में इनमें से केवल अंगद का नाम आता है; सुग्रीव, जाम्बवान् और विभीषण के नाम टीका देती है। और कारण जो दिया जाता है वह चौंकाता है: इन्होंने अधम शरीर में राम को पा लिया। अधम शरीर को कहा गया है, इन जीवों को नहीं, और टीका इससे पशु और राक्षस आदि की देह समझाती है। वाक्य का पूरा ज़ोर आख़िरी शब्द पर है, पाए। जिस देह को छोटा माना जाता है, उसी में वह चीज़ मिल गयी जिसके लिये और सब देहें अच्छी मानी जाती हैं।
अगली चौपाई इस दरवाज़े को और खोल देती है। पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य और असुर, जितने भी रघुपति के चरणों के उपासक हैं, सबके चरणकमलों की वन्दना की जाती है। एक ही आधी पंक्ति में पाँच जातियाँ हैं और उनमें असुर भी गिने गये हैं। जो शर्त लगायी गयी है वह जाति की नहीं है, नीयत की है: जो बिना किसी कामना के राम के सेवक हैं। किस देह में हैं, यह छाँटा नहीं गया। क्या माँगकर सेवा कर रहे हैं, यह छाँटा गया।
फिर मुनि आते हैं, शुकदेव, सनकादि और नारद, और उनके आगे कवि का शरीर भी झुकता है, धरती पर सिर टेककर, जो इस पूरे हिस्से में और कहीं नहीं होता। उसके बाद जानकी, और वहाँ क्रिया बदल जाती है: उनके चरणकमलों को तुलसीदास मनावउँ लिखते हैं, मनाता हूँ, और उनसे एक ही चीज़ माँगते हैं, निर्मल बुद्धि। और अन्त में राम आते हैं, सबसे पीछे। मन, वचन और कर्म से रघुनायक के सर्वसमर्थ चरणकमलों की वन्दना की जाती है, और उनका चित्र वही है जो हनुमान के हृदय के भीतर था: कमल जैसी आँखें, हाथ में धनुष और बाण, भक्तों की विपत्ति तोड़नेवाले और सुख देनेवाले। भीतर जो दीखा था, बाहर वही है।
सार: वंदना वानर, रीछ और राक्षसों के राजाओं तक उतरती है, फिर पक्षी, पशु, देवता, मनुष्य और असुर तक फैलती है, जहाँ शर्त देह की नहीं, निष्कामता की है। मुनियों के आगे कवि धरती पर सिर टेकता है, जानकी को मनाकर निर्मल बुद्धि माँगता है, और सबसे अन्त में राम के चरणों तक पहुँचता है।
वाणी और उसका अर्थ
अब वह दोहा आता है जिसपर यह पूरा प्रसंग मुड़ता है, और जिसे इसके ठीक बाद की पंक्ति के साथ रखकर ही पढ़ा जाना चाहिये।
गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न।
दोहा १८
बंदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न॥ १८॥
दो जोड़े रखे गये हैं। पहला, वाणी और उसका अर्थ। दूसरा, जल और जल की लहर। दोनों जोड़ों में एक ही ख़ासियत है: इनके दो नाम लिये जा सकते हैं पर इन्हें दो टुकड़ों में किया नहीं जा सकता। लहर को पानी से अलग करके कहीं रख देना सम्भव नहीं है, और शब्द से उसका अर्थ खींचकर निकाल लेना भी सम्भव नहीं है। कहने में भिन्न, होने में अभिन्न। इसी हालत में सीता और राम के चरणों की वन्दना की जाती है।
और दूसरी पंक्ति में उनके विषय में जो एक बात चुनी गयी है, वह यह नहीं है कि वे कितने बड़े हैं या कितने सुन्दर। चुनी यह गयी है कि उन्हें दुखी लोग परम प्रिय हैं। व्यक्तियों की वन्दना यहीं ख़त्म होती है, और आख़िरी वाक्य में उनका पता इस तरह दिया जाता है कि कोई भी दुखी आदमी उसे पढ़कर समझ ले कि वह ख़ुद उस सूची में है।
पर इस दोहे का दूसरा काम इससे भी बड़ा है, और वह अगली ही पंक्ति में खुलता है। यहाँ जो उपमा चुनी गयी है वह शब्द और अर्थ की है। अगर शब्द और उसका अर्थ एक ही चीज़ के दो नाम हैं, तो नाम और नामवाला भी एक ही चीज़ के दो नाम हुए। यह बात कहे बिना छोड़ दी गयी है, और अगली पंक्ति इसे उठाकर काम में ले आती है। व्यक्तियों की आख़िरी वन्दना एक उपमा पर ख़त्म होती है, और उस उपमा के ऊपर पूरा दूसरा आधा हिस्सा खड़ा हो जाता है।
सार: दोहा १८ सीता और राम के चरणों की वन्दना करता है और उनके लिये वाणी और अर्थ तथा जल और लहर की उपमा चुनता है, जो कहने में अलग और होने में एक हैं। और वही उपमा आगे नाम और नामी के लिये ज़मीन तैयार कर देती है।
एक शब्द की वंदना
जिस क्रिया से यह पूरी वंदना शुरू हुई थी, उसी क्रिया से वह अब फिर शुरू होती है, और इस बार उसके आगे कोई व्यक्ति नहीं खड़ा है।
बंदउँ नाम राम रघुबर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥
चौपाई ५
बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो॥
अवधपुरी के लिये जो शब्द था, वही शब्द यहाँ है, बंदउँ। बीच में सारा परिवार, सारे सेवक, सारे मुनि और स्वयं राम आ चुके, और सूची एक जगह से चलकर एक शब्द पर आ ठहरी।
पहली ही पंक्ति में नाम को कृशानु, भानु और हिमकर का हेतु कहा गया है, यानी अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा का। पोद्दार की टीका खोलकर बताती है कि यह बीजाक्षरों की बात है, र, आ और म, जो क्रमशः इन तीनों के बीज माने जाते हैं। यह खोलना टीका का है। पद्य केवल इतना कहता है कि ये तीनों इसी से निकलते हैं, और फिर वह और आगे बढ़ जाता है: वह नाम ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों के रूप में है, वह वेदों का प्राण है, और वह एक ही साँस में निर्गुण भी है और गुणों का भण्डार भी। दोनों बातें साथ-साथ कही गयी हैं, और यह जोड़ी आगे बार-बार लौटेगी।
अगली चौपाई गवाह पेश करती है, और पहला गवाह सबसे बड़ा है। यह वह महामन्त्र है जिसे महेश्वर जपते हैं, और काशी में उनका दिया हुआ यही उपदेश मुक्ति का कारण है। ध्यान दीजिये कि शिव यहाँ केवल सिफ़ारिश करनेवाले नहीं हैं, वे इस्तेमाल करनेवाले भी हैं। जो चीज़ दूसरों को दी जा रही है, वही ख़ुद भी बरती जा रही है।
तीसरा गवाह और भी आगे जाता है। आदिकवि इस नाम का प्रताप जानते हैं, क्योंकि वे उलटा जप करके शुद्ध हुए। टीका बताती है कि आदिकवि से तात्पर्य वाल्मीकि से है और उलटे जप से मरा-मरा से। यह कथा तुलसीदास के इसी ग्रन्थ की है और यहीं इस रूप में कही गयी है। और जो बात इस पूरी दलील के लिये सबसे काम की है वह यह है कि नाम उलटा करके लिया गया, फिर भी काम कर गया। जिसका असर उलटकर भी हो जाय, उसका असर उसमें है, क्रम में नहीं।
उसके बाद शिव और पार्वती का प्रसंग है, और उसमें सुनना और मानना अलग-अलग दो लोगों के हिस्से आता है। शिव का वचन है कि एक राम-नाम सहस्र नामों के समान है; उस वचन को सुनकर जपनेवाली पार्वती हैं, अपने पति के साथ। गवाही एक ने दी, अमल दूसरे ने किया। और उसके बाद जो हुआ वह इस चौपाई का सबसे कोमल हिस्सा है: नाम के प्रति पार्वती के हृदय की यह प्रीति देखकर शिव हर्षित हो गये और स्त्रियों में भूषणरूप उन पार्वती को अपना ही भूषण बना लिया। नाम से प्रेम करने का पहला फल जो मिला, वह उसी के और पास पहुँच जाना था जिसने नाम दिया था।
और फिर वह पंक्ति, जिसमें एक दावा है और उसी के साथ उसका सबूत नत्थी है। शिव नाम के प्रभाव को अच्छी तरह जानते हैं, और जानने का प्रमाण यह कि कालकूट ने उनको अमृत का फल दिया। यहाँ यह नहीं कहा गया कि ज़हर हट गया या मीठा हो गया। कहा यह गया कि उसने फल अमृत का दिया। चीज़ वही रही, उससे निकलनेवाला नतीजा बदल गया, और यही इस पूरे हिस्से में नाम के काम करने का ढंग है।
सार: वंदना अब एक शब्द की होती है, उसी क्रिया से जिससे वह अवधपुरी की हुई थी। नाम को अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा का हेतु, वेदों का प्राण, और निर्गुण तथा गुणनिधान दोनों कहा जाता है, और उसके पक्ष में शिव, गणेश, आदिकवि और पार्वती की गवाहियाँ एक-एक करके रखी जाती हैं।
दो अक्षर
अब तुलसीदास वह काम करते हैं जो इस हिस्से को याद रखे जाने लायक़ बनाता है। वे नाम को एक इकाई की तरह छोड़ देने के बजाय उसे उसके दो अक्षरों में तोड़ देते हैं, और फिर उन दो अक्षरों के लिये उपमाएँ ढूँढ़ने लगते हैं। शुरुआत एक खेत से होती है।
बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास।
दोहा १९
राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास॥ १९॥
रघुनाथ की भक्ति वर्षा-ऋतु है, उत्तम सेवक धान हैं, और राम-नाम के दो सुन्दर अक्षर सावन और भादों के महीने हैं। इस रूपक में हर चीज़ अपनी सही जगह पर है। धान और बरसात का रिश्ता किसी को समझाना नहीं पड़ता। सेवक को यहाँ करनेवाला नहीं बनाया गया, उगनेवाला बनाया गया, और उगनेवाला अपने उगने का इन्तज़ाम ख़ुद नहीं करता। भक्ति पूरा मौसम है, और दो अक्षर उस मौसम के वे दो महीने हैं जिनमें पानी सबसे ज़्यादा गिरता है। ऋतु बड़ी चीज़ है, पर जिस पर फ़सल टिकी है वह उसके भीतर के ये दो महीने हैं।
फिर तुलसीदास अपनी निजी बात दर्ज करते हैं, और वह बात इस प्रसंग में उनके अपने स्वर की पहली झलक है: ये दोनों अक्षर उन्हें राम और लक्ष्मण के समान प्यारे हैं। इसके बाद वे एक बारीक़ बात कहते हैं। इन दोनों का अलग-अलग बखान करने बैठिये तो प्रीति बिलगाती है, फ़र्क़ दिखने लगता है; पर हैं ये जीव और ब्रह्म की तरह स्वभाव से ही साथ रहनेवाले। अलगाव बखान में है, होने में नहीं।
इसके बाद उपमाओं की झड़ी लगती है, और उन्हें एक-एक करके पढ़ने से ज़्यादा काम इस बात पर ध्यान देने से निकलता है कि वे सब एक ही साँचे की हैं। दोनों अक्षर वर्णमालारूपी शरीर के नेत्र हैं, दो अक्षर और दो आँखें; वे स्मरण करने में सबके लिये सुलभ हैं, इस लोक में लाभ देते हैं और परलोक में निर्वाह करते हैं। और जितनी उपमाएँ आगे दी गयी हैं, लगभग हर एक जोड़े की है, और यह संयोग नहीं हो सकता। ये नर और नारायण के समान सुन्दर भाई हैं। ये भक्तिरूपी सुन्दर स्त्री के कानों के आभूषण हैं, और कर्णफूल दो ही होते हैं। ये जगत् के हित के लिये निर्मल चन्द्रमा और सूर्य हैं। ये सुगति रूपी अमृत के स्वाद और तृप्ति के समान हैं, कच्छप और शेष के समान पृथ्वी को धारण करनेवाले हैं, भक्तों के मनरूपी कमल के भौंरे हैं, और जीभरूपी यशोदा के लिये कृष्ण और बलराम के समान हैं। जिस चीज़ का वर्णन करना हो वह दो है, इसलिये जिस भी चीज़ से उसकी तुलना की गयी वह भी दो है। और इनमें तीन जोड़े भाइयों के हैं, जिनमें से किसी एक को चुनकर दूसरे को छोड़ा नहीं जाता।
और दोहा २० उन दोनों अक्षरों को वहीं बिठा देता है जहाँ वे लिखने में सचमुच बैठते हैं। उनमें एक छत्र है और दूसरा मुकुटमणि, और दोनों सब वर्णों के ऊपर विराजते हैं। टीका बताती है कि छत्र से रकार का रेफ और मुकुटमणि से मकार का अनुस्वार समझना है, और यह पहचान टीका की है। पर जो चीज़ पद्य की अपनी है वह दो हैं। पहली, दोनों उपमाएँ राजा की हैं, और राजा के शरीर पर वे दो ही चीज़ें हैं जो सिर से भी ऊपर रहती हैं। दूसरी, यह ऊपर होना कोरी बात नहीं है। देवनागरी में ये दोनों चिह्न अक्षर के ऊपर ही लिखे जाते हैं। जो बात कही जा रही है, वह पन्ने पर आँखों से देखी जा सकती है।
सार: नाम को दो अक्षरों में तोड़कर उनके लिये उपमाएँ दी जाती हैं, और लगभग हर उपमा जोड़े की है: दो आँखें, दो कर्णफूल, चन्द्रमा और सूर्य, कच्छप और शेष, और तीन बार दो भाई। दोहा २० उन्हें छत्र और मुकुटमणि कहकर सब अक्षरों के ऊपर बिठा देता है।
बड़ा कौन, नाम या रूप
अब स्तुति दलील में बदल जाती है। पहले नाम और नामी का रिश्ता बाँधा जाता है: समझने में दोनों एक से हैं, फिर भी दोनों में स्वामी और सेवक जैसी प्रीति है, और टीका इसे यों खोलती है कि जैसे स्वामी के पीछे सेवक चलता है, वैसे ही नाम के पीछे नामी चलते हैं, नाम लेते ही वहाँ आ जाते हैं। इसके बाद दोनों को एक ही दर्जा दे दिया जाता है: नाम और रूप, दोनों ईश्वर की उपाधि हैं, दोनों अकथ और अनादि हैं।
को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेदु समुझिहहिं साधू॥
चौपाई ६
देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना॥
और यहीं वह वाक्य है जिसे आगे की हर पंक्ति के साथ याद रखना है। इनमें कौन बड़ा है और कौन छोटा, यह कहना अपराध है। यह छूट नहीं दी गयी कि कोई कह सकता है; कहने को ही अपराध कहा गया है। और उसके तुरन्त बाद जो रास्ता सुझाया गया है वह फ़ैसले का नहीं है: गुणों का अन्तर सुनकर साधु लोग ख़ुद समझ लेंगे। सुनाना कवि का काम है, तय करना सुननेवाले का।
रूप बिसेष नाम बिनु जानें । करतल गत न परहिं पहिचानें॥
चौपाई ७
सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें । आवत हृदयँ सनेह बिसेषें॥
पहली कसौटी: कोई विशेष रूप, उसका नाम जाने बिना, हथेली पर रखा हुआ भी पहचाना नहीं जाता। ग़ौर कीजिये कि कसौटी को कितना कड़ा बनाया गया है। रूप को दूर नहीं रखा गया, अँधेरे में नहीं रखा गया, आधा ढका हुआ नहीं रखा गया। उसे हथेली पर रखा गया है, यानी उतने पास जितना पास कोई चीज़ आ सकती है, और फिर भी वह पहचान में नहीं आती। दूसरी कसौटी उलटी है: रूप को देखे बिना भी नाम का स्मरण किया जाय तो वह रूप हृदय में आ जाता है, और विशेष प्रेम के साथ आता है।
दोनों जाँचें एक ही तरीक़े की हैं और उनके नतीजे उलटे हैं, और यही इस दलील का पूरा ढाँचा है। पर असली शब्द आख़िर में है, बिसेषें। रूप के बिना नाम लेने पर रूप केवल आता नहीं, विशेष प्रेम के साथ आता है। जो आँख से देखने पर नहीं मिलता, वह नाम के रास्ते आने पर साथ चला आता है। इसीलिये कमी नहीं बतायी गयी, अधिकता बतायी गयी।
और इस हिस्से के अन्त में नाम को जो पद दिया जाता है, वह किसी ऊँची कुर्सी का नहीं है, काम का है। नाम और रूप की गति की कहानी अकथ है, समझने में सुखद है और बखानी नहीं जाती। और निर्गुण तथा सगुण के बीच नाम सुन्दर साक्षी है, दोनों का बोध करानेवाला चतुर दुभाषिया है। दुभाषिये की ज़रूरत वहाँ पड़ती है जहाँ दो पक्ष एक-दूसरे की बात सीधे नहीं समझ पाते। नाम को यहाँ बड़ा नहीं कहा गया, बीच में खड़ा कहा गया है, और यह वह जगह है जहाँ से आगे का सारा दावा निकलता है।
सार: नाम और रूप दोनों ईश्वर की उपाधि कहे जाते हैं और इनमें बड़ा-छोटा कहना अपराध बताया जाता है। फिर दो कसौटियाँ रखी जाती हैं: नाम जाने बिना हथेली का रूप भी नहीं पहचाना जाता, और रूप देखे बिना नाम लेने पर वह रूप विशेष प्रेम के साथ हृदय में आ जाता है। नाम को निर्गुण और सगुण के बीच का साक्षी और दुभाषिया कहा जाता है।
देहली पर रखा हुआ दीपक
अब वह दोहा, जो शायद पूरे रामचरितमानस से सबसे ज़्यादा उद्धृत किया जाता है, और जिसकी सारी ताक़त उसके एक शब्द में रखी हुई है।
राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरीं द्वार।
दोहा २१
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर॥ २१॥
मुँह को द्वार कहा गया और जीभ को देहली। दीपक कहीं भी रखा जा सकता था, मेज़ पर, ताक़ में, आँगन में। उसे देहली पर रखवाया गया है, और देहली घर का वह एक हिस्सा है जो न भीतर है न बाहर, दोनों की सरहद है। मेज़ पर रखा दीपक एक कमरा रोशन करता है। देहली पर रखा दीपक दोनों तरफ़ एक साथ रोशनी डालता है, और दोहा ठीक यही दो चीज़ें माँगता भी है, भीतर का उजाला और बाहर का उजाला। उपमा में जगह का चुनाव ही उसका तर्क है।
इसके बाद तुलसीदास दिखाते हैं कि यह दीपक किस-किस के काम आता है, और गिनाने का उनका ढंग उलटा है। वे पहले लोगों को काम करते हुए दिखाते हैं और गिनती बाद में करते हैं। पहले वे योगी हैं, जो ब्रह्मा के रचे इस प्रपंच से छूट चुके हैं और वैराग्यवान् हैं, और जो इसी नाम को जीभ से जपते हुए जागते हैं, और नाम तथा रूप से रहित उस अनुपम, अकथ, अनामय ब्रह्मसुख का अनुभव करते हैं। यह वाक्य पूरा पढ़िये तो इसमें एक बात चुपचाप रखी हुई है: जो नाम और रूप से परे पहुँच चुके हैं, वे वहाँ तक पहुँचे एक नाम के रास्ते ही हैं।
दूसरे वे हैं जो परमात्मा की गूढ़ गति जानना चाहते हैं, और वे भी नाम को जीभ से जपकर ही उसे जान लेते हैं। तीसरे वे साधक हैं जो लौ लगाकर नाम जपते हैं और अणिमा आदि सिद्धियाँ पाकर सिद्ध हो जाते हैं। चौथे वे आर्त भक्त हैं जो संकट से घबराकर नाम जपते हैं, जिनके बड़े भारी बुरे संकट मिट जाते हैं और जो सुखी हो जाते हैं। चारों दिखाये जा चुकने के बाद ही कहा जाता है कि जगत् में राम-भक्त चार प्रकार के हैं, और टीका इन चारों को अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी कहकर नाम देती है।
और अब वह वाक्य, जिसमें किसी को नीचे नहीं रखा गया। चारों ही पुण्यात्मा हैं, पापरहित हैं और उदार हैं। जो सिद्धि के लिये जप रहा है और जो मुसीबत से बचने के लिये जप रहा है, वह भी इसी सूची में उन्हीं शब्दों के साथ है। फिर जोड़ा जाता है कि चारों चतुरों को नाम का ही आधार है और इनमें ज्ञानी प्रभु को विशेष प्रिय है, पर विशेष प्रिय कहना और दूसरों को छाँट देना एक बात नहीं है। इसके बाद चारों युगों और चारों वेदों में नाम का प्रभाव बताकर एक युग अलग कर दिया जाता है: कलियुग में दूसरा कोई उपाय है ही नहीं, और जिस युग में यह ग्रन्थ लिखा जा रहा है वही वह युग है।
और इस पूरे हिस्से का आख़िरी दोहा एक पाँचवाँ आदमी लाता है जो इन चारों में नहीं आता। जो सब प्रकार की कामनाओं से रहित हैं और राम-भक्ति के रस में लीन हैं, उन्होंने भी नाम के सुन्दर प्रेमरूपी अमृत के सरोवर में अपने मन को मछली बना रखा है। यहाँ जो शब्द सबसे ज़्यादा काम कर रहा है वह है तिन्हहुँ, उन्होंने भी। पहले चारों को कुछ न कुछ चाहिये था। यह पाँचवाँ कुछ नहीं चाहता, और यह भी वहीं है। और मछली पानी पीती नहीं, पानी में रहती है, और पानी से निकलने पर उसे प्यास नहीं लगती, कुछ और होता है।
सार: दोहा २१ जीभ को देहली और मुँह को द्वार बनाकर नाम को वह दीपक कहता है जो भीतर और बाहर दोनों ओर उजाला करता है। फिर योगी, जिज्ञासु, साधक और आर्त, चारों को काम करते हुए दिखाकर चारों को पुण्यात्मा और उदार कहा जाता है, और दोहा २२ में वह भी जोड़ दिया जाता है जिसे कोई कामना नहीं बची।
निर्गुण से बड़ा, और उसका कारण
अब वह दावा आता है जिसके लिये यह पूरा प्रसंग जाना जाता है। और सबसे पहले ध्यान इस बात पर जाना चाहिये कि वह किस भाषा में रखा गया है।
अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा। अकथ अगाध अनादि अनूपा॥
चौपाई ८
मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें॥
निर्गुण और सगुण, ब्रह्म के दो स्वरूप हैं, और दोनों अकथनीय, अथाह, अनादि और अनुपम हैं। यानी जिनसे तुलना की जा रही है, उन्हें पहले पूरी ऊँचाई पर बिठा दिया गया है। और फिर वह वाक्य: मेरी सम्मति में नाम इन दोनों से बड़ा है। मोरें मत। यह फ़ैसला नहीं सुनाया गया, राय दी गयी है, और राय देनेवाले ने अपने को उसमें डाल दिया है। थोड़ी देर पहले जिस कवि ने कहा था कि बड़ा-छोटा कहना अपराध है, वही अब बड़ा कह रहा है, और शब्द बदलकर कह रहा है। वहाँ किसी को फ़ैसला सुनाने से रोका गया था; यहाँ अपनी सम्मति दर्ज की जा रही है, और दोनों एक चीज़ नहीं हैं।
अगली चौपाई में तुलसीदास अपनी बात के साथ एक सफ़ाई भी नत्थी कर देते हैं, और वह सफ़ाई इस प्रसंग का सबसे ईमानदार क्षण है। वे कहते हैं कि सज्जन इसे इस दास की ढिठाई न समझें, मैं अपने मन के विश्वास, प्रेम और रुचि की बात कह रहा हूँ। तीन शब्द गिनाये गये हैं और तीनों में से एक भी प्रमाण नहीं है। जो आदमी सबसे बड़ा दावा कर रहा है, वह साथ-साथ यह भी लिख रहा है कि यह मेरे मन की बात है।
फिर वह उपमा आती है जिससे दोनों ब्रह्मों का फ़र्क़ समझाया जाता है। दोनों का ज्ञान अग्नि के समान है, और टीका खोलती है: निर्गुण वह अग्नि है जो काठ के भीतर है और दीखती नहीं, सगुण वह है जो प्रत्यक्ष जल रही है, केवल प्रकट और अप्रकट का भेद है। और इसके बाद वह पंक्ति, जो इस पूरे दावे की धुरी है: दोनों ही जानने में अगम हैं, और दोनों नाम से सुगम हो जाते हैं, इसीलिये मैंने नाम को ब्रह्म से और राम से बड़ा कहा है। कारण ऊँचाई का नहीं दिया गया, पहुँच का दिया गया है।
अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी । सकल जीव जग दीन दुखारी॥
चौपाई ९
नाम निरूपन नाम जतन तें । सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें॥
और यह वह चौपाई है जो दलील को ज़मीन पर रख देती है। ऐसा विकाररहित प्रभु हृदय में मौजूद रहते हुए भी जगत् के सब जीव दीन और दुखी हैं, और यह ऐसी बात है जिसे कोई भी अपने आसपास देखकर जाँच सकता है। होना तब शुरू होता है जब नाम का निरूपण हो और नाम का जतन हो, और तब वही ब्रह्म ऐसे प्रकट होता है जैसे रत्न से उसका मूल्य।
रत्न की उपमा पर ठहरिये, क्योंकि उसमें यह पूरा दावा नपा हुआ रखा है। रत्न जेब में पड़ा रहे तो वह रत्न ही है, उसमें कोई कमी नहीं आती। पर उसका मूल्य तब तक कहीं नहीं होता जब तक कोई उसे पहचान न ले। पहचान से पत्थर बड़ा नहीं होता, उसका दाम खड़ा होता है। इसी तरह नाम को ब्रह्म से बड़ा कहने का मतलब यह नहीं निकाला गया कि ब्रह्म में कुछ कम है। मतलब यह निकाला गया कि ब्रह्म का होना और ब्रह्म का काम आना, दो अलग बातें हैं, और दूसरी बात नाम से होती है।
इसके बाद का दोहा इस आधे मुक़दमे को बन्द करता है और दूसरे को खोलता है। इस प्रकार निर्गुण से नाम का प्रभाव अत्यन्त बड़ा है, और अब अपने विचार के अनुसार कहता हूँ कि नाम सगुण राम से भी बड़ा है। इस प्रकार, यानी अभी-अभी जो कारण दिया गया उसी से। और अपने विचार के अनुसार, यानी तीसरी बार यह चिह्न लगाया जा रहा है कि यह किसकी राय है।
सार: तुलसीदास निर्गुण और सगुण दोनों को अकथ और अनादि कहकर फिर अपनी सम्मति रखते हैं कि नाम दोनों से बड़ा है, और कारण यह देते हैं कि दोनों अगम हैं और नाम से सुगम हो जाते हैं। रत्न की उपमा इसे साफ़ कर देती है: प्रभु हृदय में हैं फिर भी जीव दुखी हैं, और नाम वह पहचान है जिससे मूल्य खड़ा होता है।
और सगुण राम से भी बड़ा
अब तुलसीदास एक-एक करके राम के काम गिनाते हैं और हर काम के सामने नाम का काम रख देते हैं। पहला जोड़ा ही सारी तुलनाओं की शर्त तय कर देता है: राम ने भक्तों के हित के लिये मनुष्य-शरीर धारण किया और कष्ट सहकर साधुओं को सुखी किया; और भक्त प्रेम के साथ नाम जपते हुए बिना किसी आयास के आनन्द और कल्याण के घर हो जाते हैं। एक तरफ़ देह लेना और संकट सहना, दूसरी तरफ़ अनायास। तुलना क़ीमत की है।
राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी॥
चौपाई १०
रिषि हित राम सुकेतुसुता की। सहित सेन सुत कीन्हि बिबाकी॥
सहित दोष दुख दास दुरासा। दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा॥
भंजेउ राम आपु भव चापू । भव भय भंजन नाम प्रतापू॥
राम ने एक तपस्वी की स्त्री को तारा, और नाम ने करोड़ों दुष्टों की बिगड़ी बुद्धि सुधार दी। एक ही पंक्ति में एक और करोड़ आमने-सामने रख दिये गये हैं। टीका उस स्त्री का नाम अहल्या बताती है, और अगली पंक्ति की सुकेतु की कन्या को ताड़का तथा उसके पुत्र को सुबाहु कहती है। पद्य नाम नहीं लेता, केवल रिश्ते से पहचान कराता है, और यही ढंग आगे तक चलता है।
आगे की पंक्तियाँ इसी क्रम में चलती हैं। नाम अपने दास के दोष, दुःख और दुराशा को इस तरह मिटा देता है जैसे सूर्य रात को। राम ने स्वयं शिव का धनुष तोड़ा, और नाम का प्रताप संसार के सारे भय तोड़नेवाला है। इस पंक्ति में एक ही शब्द दो बार आया है और दोनों बार अलग अर्थ में: पहले भव का धनुष, यानी शिव का, और फिर भव का भय, यानी संसार का। धनुष तोड़ना एक बार का काम है, भय तोड़ना हर रोज़ का।
सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ।
दोहा २४
नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ॥ २४॥
और यह दोहा उस बात को खोल देता है जो अब तक चुपचाप चल रही थी। रघुनाथ ने शबरी और गीध जैसे उत्तम सेवकों को सुगति दी, टीका जिनके नाम शबरी और जटायु बताती है; और नाम ने अगणित दुष्टों का उद्धार किया। दोनों तरफ़ की सूचियाँ पढ़िये। एक तरफ़ जो नाम आते हैं वे सुसेवक हैं, तपस्वी की स्त्री है, शरण में आये हुए हैं। दूसरी तरफ़ जो हैं वे खल हैं, करोड़ों खल, अगणित खल, और अनेक गरीब। तुलना केवल गिनती की नहीं है। तुलना इसकी भी है कि किसका नम्बर लगता है।
यही बात अगली चौपाई में और साफ़ हो जाती है। राम ने सुकंठ और विभीषण, इन दो को ही शरण में रखा, यह सब कोई जानता है, और टीका सुकंठ को सुग्रीव बताती है; और नाम ने अनेक गरीबों पर कृपा की, और यह विरद लोक और वेद दोनों में प्रसिद्ध है। दोऊ, दो, और दोनों के नाम लिये गये। अनेक, और एक का भी नाम नहीं। जिनके नाम लिये जा सकें वे गिने जा सकते हैं, और यहाँ गिना जा सकना ही कमी की तरह रखा गया है।
फिर सबसे बड़ा परिश्रम सामने आता है। राम ने भालू और बन्दरों की सेना बटोरी और पुल बाँधने के लिये थोड़ा परिश्रम नहीं किया; और नाम लेते ही भवसागर सूख जाता है। पुल एक समुद्र पार करने के लिये बाँधा जाता है और उसमें सेना, समय और श्रम लगता है; सूखे हुए समुद्र में पार करने को कुछ बचता ही नहीं। और इसके ठीक बाद इस पूरी दलील का इकलौता आदेश आता है, और वह आदेश मानने का नहीं है: सज्जन लोग अपने मन में विचार कीजिये। जो आदमी एक के बाद एक इतने जोड़े गिना चुका है, वह नतीजा ख़ुद नहीं सुनाता।
आख़िरी जोड़ा सबसे ऊँचा है। राम ने कुटुम्बसहित रावण को मारा, सीता के साथ अपने नगर में प्रवेश किया, राजा हुए, अवध राजधानी हुई। कथा इससे ऊपर नहीं जाती, और इसके सामने जो रखा गया है उसके पास न नगर है, न सेना, न सिंहासन।
सेवक सुमिरत नामु सप्रीती । बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती॥
चौपाई ११
फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें । नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें॥
सेवक प्रेम के साथ नाम का स्मरण करते ही बिना परिश्रम मोह की प्रबल सेना जीत लेता है, और प्रेम में मग्न होकर अपने ही सुख में विचरता है, और नाम के प्रसाद से उसे सपने में भी चिन्ता नहीं होती। एक तरफ़ राजधानी है, दूसरी तरफ़ घूमना। एक तरफ़ जीता हुआ रण है, दूसरी तरफ़ बिना श्रम जीती हुई सेना। और आख़िरी तराज़ू में राज्य के सामने जो चीज़ रखी गयी है वह सुख नहीं है, चिन्ता का न होना है, और वह भी सपने तक में।
अब पीछे मुड़कर इस पूरी सूची को एक साथ देखिये। तपस्वी की स्त्री, ऋषि के हित का काम, धनुष, दण्डक वन, राक्षसों का समूह, शबरी और गीध, सुग्रीव और विभीषण, भालू-बन्दरों की सेना और सेतु, रावण का वध, और अवध का राजसिंहासन। यह पूरे ग्रन्थ की कथा है, शुरू से आख़िर तक, और यह उस जगह रखी गयी है जहाँ कथा अभी शुरू भी नहीं हुई। पढ़नेवाले को सब कुछ पहले ही बता दिया गया है, और इस तरह बताया गया है कि हर घटना किसी और चीज़ को नापने का बटखरा बन गयी है।
ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि।
दोहा २५
रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि॥ २५॥
और मुक़दमा जिस चीज़ पर बन्द होता है वह दलील नहीं है, नज़ीर है। नाम ब्रह्म और राम दोनों से बड़ा है, और वह वर देनेवालों को भी वर देनेवाला है। इसका प्रमाण यह दिया गया कि सौ करोड़ रामचरित्रों में से शिव ने अपने हृदय में यह जानकर इसी नाम को चुना। ध्यान दीजिये कि यह गवाह नया नहीं है। इस पूरे आधे हिस्से की पहली गवाही भी शिव की थी, वही महामन्त्र जिसे महेश्वर जपते हैं, और बीच में कालकूट का प्रसंग भी उन्हीं का था। जो सबसे पहले बुलाया गया था, वही सबसे अन्त में खड़ा किया गया है।
सार: राम के कामों के सामने एक-एक करके नाम के काम रखे जाते हैं, और हर जोड़े में दो बातें बदलती हैं: संख्या और पात्रता। राम ने एक को तारा, नाम ने करोड़ों को; राम ने सुसेवकों को सुगति दी, नाम ने खलों का उद्धार किया। अन्त में राज्य के सामने वह सेवक रखा जाता है जिसे सपने में भी चिन्ता नहीं, और दोहा २५ शिव की गवाही पर सब बन्द कर देता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग को पढ़ चुकने के बाद सबसे पहले जो बात खटकती है, वह यह है कि यहाँ कोई विधि नहीं है। नाम की इतनी महिमा कही गयी, इतनी गवाहियाँ आयीं, इतनी तुलनाएँ हुईं, और कहीं यह नहीं बताया गया कि कितनी बार लेना है, किस पहर लेना है, किस दिशा में मुँह करके बैठना है, कौन-सी माला रखनी है या कौन-सा आसन। जिस एक अंग का नाम आता है वह जीभ है, और जिस एक शर्त का नाम आता है वह प्रेम है। सेवक नाम को सप्रीति सुमिरते हैं, भक्त उसे सप्रेम जपते हैं, और वह दीपक देहली पर रखा जाता है, जो घर का वह हिस्सा है जो हर घर में होता है।
दूसरी बात उस विरोध की है जो ऊपर से पढ़ने पर खटक सकता है। दोहा २० के बाद की चौपाई साफ़ कहती है कि नाम और रूप में बड़ा-छोटा कहना अपराध है, और उसके कुछ ही दोहे बाद वही कवि कहता है कि नाम दोनों से बड़ा है। इस विरोध को तुलसीदास सँभालते हैं, और सँभालने का तरीक़ा शब्दों में दिखता है। पहली जगह फ़ैसला सुनाने से रोका गया है; दूसरी जगह वे फ़ैसला सुनाते ही नहीं। वे कहते हैं मेरी सम्मति में, फिर अपने विचार के अनुसार, और बीच में जोड़ देते हैं कि यह मेरे मन का विश्वास, प्रेम और रुचि है। तीन बार वे अपनी बात पर अपना नाम लिख देते हैं।
तीसरी बात उन ग़ैरहाज़िरियों की है जो पढ़नेवाले को खलती हैं। इस पूरी वन्दना में कौसल्या के सिवा किसी रानी का नाम नहीं आता, और कौसल्या भी रानी की तरह नहीं, पूर्व दिशा की तरह आती हैं। हनुमान की विनती दो पंक्तियों की है और उनमें समुद्र नहीं है, लंका नहीं है, पर्वत नहीं है; दोनों पंक्तियाँ राम के बारे में हैं, कि उनका यश राम ने स्वयं कहा और कि राम उनके हृदय में रहते हैं। और राम स्वयं इस पूरी सूची में सबसे अन्त में आते हैं, तब, जब उनसे जुड़ा हुआ कोई नाम बाक़ी नहीं बचता।
और आख़िरी बात, जो दूसरे आधे को पूरा पढ़ने पर अपने आप खड़ी हो जाती है। राम के खाते में जो भी लिखा गया, उसमें कहीं न कहीं क़ीमत है: देह धारण करना, संकट सहना, सेना बटोरना, पुल के लिये कम परिश्रम न करना, रण लड़ना। नाम के खाते में जो लिखा गया, उसमें बार-बार वही शब्द लौटते हैं: अनायास, बिना श्रम, स्मरण करने में सबके लिये सुलभ, नाम लेते ही। जिस चीज़ को इस पन्ने पर सबसे बड़ा कहा गया है, वही इस पन्ने पर सबसे सस्ती चीज़ है, और यह विरोध नहीं है। दलील का पूरा रुख़ यही है कि जो सबके हाथ में आ सके, उसी को बड़ा कहा जाय।
सार: इस प्रसंग में नाम की कोई विधि नहीं बतायी गयी, केवल जीभ और प्रेम। बड़ा-छोटा कहने की मनाही और नाम को बड़ा कहने के बीच का फ़ासला तुलसीदास तीन बार अपनी सम्मति का चिह्न लगाकर पाटते हैं, और अन्त में फ़ैसला पढ़नेवाले के मन पर छोड़ देते हैं।
इस पूरे प्रसंग में तुलसीदास दो क्रियाएँ ऐसी बरतते हैं जो और कहीं नहीं आतीं, और दोनों एक-एक बार आती हैं। हनुमान के लिये वे लिखते हैं कि विनती करता हूँ, और जानकी के लिये कि मनाता हूँ। बाक़ी सबके लिये वन्दना है या प्रणाम है। विनती उससे की जाती है जिससे कुछ कराना हो, और मनाया उसे जाता है जिसका मन अभी अपनी ओर करना बाक़ी हो। नगर, नदी, माता, पिता, ससुर, भाई, वानर, मुनि और स्वयं राम, सबके सामने कवि एक ही मुद्रा में खड़ा है; दो जगह वह मुद्रा बदलती है, और दोनों जगह वह कुछ चाहता है।
और अन्त में जो प्रमाण रखा जाता है वह किसी तर्क का नहीं, एक चुनाव का है। सौ करोड़ रामचरित्रों में से शिव ने अपने हृदय में जानकर इसी नाम को चुना। इस वाक्य को उस जगह रखकर पढ़िये जहाँ यह रखा गया है। जो ग्रन्थ अभी शुरू होने को है वह भी उन्हीं चरित्रों में से एक है, और उसका लिखनेवाला पहला अध्याय शुरू करने से पहले बता चुका है कि इस पूरी कथा में सबसे बड़ा हिस्सा कौन-सा है। आगे जो सैकड़ों पन्ने आयेंगे, वे उसी दो अक्षर के नाम की व्याख्या हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा सोरठा १६ से दोहा २५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।