रामचरितमानस · बालकाण्ड · बरात का स्वागत और चारों भाइयों का मिलन
बरात का स्वागत और चारों भाइयों का मिलन
जनकपुर की अगवानी में उमड़ता आनन्द, जनवासे में सीता की अनदेखी सेवा, पिता से मिलता पुत्रों का स्नेह और चारों भाइयों को देखकर नगर की स्त्रियों के मन में उठती एक कामना।
सोने के कलश भरे हैं, परातों और थालों में पकवान सजे हैं, और काँवरों में दही, चिउड़ा तथा भेंटें लेकर कहार चले आ रहे हैं। जनकपुर अपनी बरात का स्वागत करने निकला है। उधर से आनेवालों ने जब अगवानों की सजधज देखी तो नगाड़े बज उठे। मिलने की प्रसन्नता दोनों ओर इतनी है कि कुछ लोग अपनी बाग छोड़कर सरपट दौड़ पड़ते हैं। तुलसीदास इस भेंट में दो आनन्द समुद्रों को देखते हैं, जिनके किनारे पीछे छूट गये हों।
इसी स्वागत के भीतर एक और पहुनाई होगी, जिसकी करनेवाली सामने नहीं आयेगी। सीता हृदय में सिद्धियों का स्मरण करके उन्हें दशरथ की मेहमानी में भेजेंगी। जनवासे के सुख देखकर सब जनक का बखान करेंगे और राम सीता के प्रेम को पहचानेंगे। फिर विश्वामित्र दोनों भाइयों को पिता के पास ले चलेंगे। बरात का वैभव अब पिता के आलिंगन, गुरु के आशीर्वाद और चारों भाइयों के मिलन में उतर आयेगा।
लग्न का दिन अभी आया नहीं है। उस दिन से पहले पहुँची बरात ने नगर को दर्शन का अतिरिक्त सुख दिया है। लोग चाहते हैं कि दिन और रात बड़े हो जायँ। स्त्रियों की बातचीत भी इसी चाह से आगे बढ़ती है: सीता फिर घर आयेंगी तो उन्हें लेने दोनों भाई आयेंगे, और आँखों को बारंबार यह आनन्द मिलेगा। फिर चारों कुमारों का रूप सुनकर उनकी कामना और बड़ी हो जाती है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- सीता जनकपुर पहुँची बरात की पहुनाई के लिये हृदय से सिद्धियों को बुलाकर भेजती हैं।
- राम और लक्ष्मण पिता से मिलने की लालसा मन में लिये गुरु के सम्मुख विनयपूर्वक ठहरे हुए दोनों भाई।
- दशरथ बरात के साथ आये राजा, जो पुत्रों को हृदय से लगाकर अपना असह्य दुःख मिटाते हैं।
- विश्वामित्र और वसिष्ठ दोनों भाई विश्वामित्र के साथ जनवासे आते हैं और वहाँ वसिष्ठ से भी प्रेम तथा आशीर्वाद पाते हैं।
- भरत और शत्रुघ्न दशरथ के साथ आये दोनों कुमार, जिनसे मिलकर राम और लक्ष्मण आनन्दित होते हैं।
- जनक और शतानन्द जनक स्वागत की वस्तुएँ भेजते हैं। शतानन्द अगवानी के समूह के साथ बरात का सत्कार करते हैं।
- जनकपुर की स्त्रियाँ दर्शन के सुख को आपस में बाँटती हुईं, चारों भाइयों के इसी नगर में विवाह की प्रार्थना करती हैं।
भेंटों से भरी अगवानी
स्वागत की पहली झलक वस्तुओं की समृद्धि से खुलती है। सोने के कलश हैं, सुन्दर परात हैं, थाल हैं और अनेक प्रकार के बर्तन हैं। पोद्दार जी की टीका कलशों में भरे पेयों को दूध, शर्बत, ठंढाई और जल आदि कहकर स्पष्ट करती है। पकवानों के लिये तुलसी अमृत का स्वाद सामने रखते हैं। उनकी अनेकता ऐसी है कि गिनाकर वर्णन करना सम्भव नहीं। जो बरात आ रही है, उसके लिये सत्कार पहले ही भरपूर हो चुका है और अब उसे सामने पहुँचाने की बारी है।
कनक कलस भरि कोपर थारा । भाजन ललित अनेक प्रकारा॥
चौपाई १
भरे सुधासम सब पकवाने । नाना भाँति न जाहिं बखाने॥
जनक ने प्रसन्न होकर भेंट के लिये उत्तम फल भेजे हैं, और उनके साथ अनेक सुहावनी वस्तुएँ भी। गहने, कपड़े और मूल्यवान मणियाँ इस भेंट का हिस्सा हैं। पक्षी और पशु, घोड़े और हाथी, तरह तरह की सवारियाँ भी भेजी गयी हैं। इस सूची का फैलाव देखिये। खाने और पीने की चीजों से चलकर वह पहनने, सजने और आने जाने की वस्तुओं तक पहुँचती है। स्वागत का आनन्द हर प्रकार की भेंट में अपना रूप पा रहा है।
इस राजसी सामग्री के साथ सुगन्धित मंगलद्रव्य और सुहावने सगुन के पदार्थ हैं। दही और चिउड़ा भी भरपूर है। इन सबको काँवरों में भरकर कहार चले हैं। कलश और महामणियाँ जितनी स्पष्ट दिखाई देती हैं, उतनी ही स्पष्ट यह उठाये हुए चलने की क्रिया भी है। भेंट किसी सूची में पड़ी नहीं रह गयी। वह लोगों के कन्धों पर चलती हुई बरात की ओर जा रही है। राजा की प्रसन्नता को अगवान अपने साथ लिये हुए हैं।
जब स्वागत करनेवालों की आँखों को बरात दिखाई देती है तो उनके हृदय आनन्द से भर जाते हैं और शरीर पुलकित हो उठते हैं। अभी मिलन शेष है, पर दर्शन ने ही अपना प्रभाव कर दिया। बरातियों की ओर भी उत्तर उसी समय आता है। वे सजधज के साथ आये अगवानों को देखते हैं और प्रसन्न होकर नगाड़े बजाते हैं। दो समूह एक दूसरे को देखते हैं और दोनों ओर भीतर का हर्ष शरीर तथा ध्वनि में प्रकट होने लगता है।
इसके बाद कुछ लोगों से प्रतीक्षा सँभाली नहीं जाती। टीका बताती है कि बरातियों और अगवानों में से कुछ मिलने के लिये बाग छोड़कर सरपट दौड़ चले। इस दौड़ में मिलने की जल्दी है। सामने से आती सजावट अब दूर खड़ी देखने की चीज नहीं रही, उसके भीतर अपने स्वागत के लिये आये लोग दिखाई दे रहे हैं। दौड़कर मिलनेवाले इस निकटता को तुरन्त पा लेना चाहते हैं।
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल।
दोहा ३०५
जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥ ३०५॥
तुलसी की उपमा में दोनों ओर आनन्द का समुद्र है। समुद्र अपनी मर्यादा छोड़कर मिल रहे हैं, इसलिये उस मिलन का कोई संकरा रास्ता नहीं बनता। जो प्रसन्नता अगवानों के रोमांच में थी और बरातियों के नगाड़ों में सुनाई दी थी, वही अब एक दूसरे की ओर बह चली है। स्वागत करनेवाले और स्वागत पानेवाले, दोनों इस आनन्द में पूरे भागी हैं। किसी एक ओर की सम्पन्नता से अधिक यहाँ दोनों ओर की मिलने की इच्छा दिखाई देती है।
जनक ने पेय, पकवान, फल, आभूषण, वस्त्र, मणियाँ, पशु, पक्षी, सवारियाँ और मंगलद्रव्य भेंट में भेजे। काँवरों में सामग्री लिये अगवान बरात को देखकर पुलकित हुए। बरातियों ने नगाड़े बजाये और कुछ लोग दौड़कर ऐसे मिले जैसे आनन्द के दो समुद्र किनारे छोड़कर मिल रहे हों।
जनवासे में सीता की अनदेखी पहुनाई
धरती के इस स्वागत के साथ देवसुन्दरियाँ फूल बरसा रही हैं और गीत गा रही हैं। देवता भी आनन्दित होकर नगाड़े बजाते हैं। अगवानी में आये लोग सब वस्तुएँ दशरथ के आगे रखते हैं और अत्यन्त अनुराग से विनती करते हैं। भेंट के साथ विनय जुड़ी हुई है। राजा दशरथ भी उन वस्तुओं को प्रेमसहित स्वीकार करते हैं। जिस स्नेह से वे भेजी गयी थीं, उसी स्नेह से उनका ग्रहण होता है।
स्वीकार होते ही बख्शीशें होने लगती हैं। वस्तुएँ याचकों को दी जाती हैं। अभी जो भेंट जनक से दशरथ के सामने पहुँची थी, वह आगे दूसरों के हाथों में पहुँच रही है। फिर अगवान पूजा करते हैं, मान देते हैं, बड़ाई करते हैं और राजा को जनवासे की ओर लिवा चलते हैं। इस क्रम में हर बात अपनी जगह है: सामने रखी सामग्री, प्रेम से स्वीकार, दान, सम्मान और फिर निवास की ओर ले जाना।
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं । देखि धनदु धन मदु परिहरहीं॥
चौपाई २
अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा । जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥
रास्ते में विलक्षण वस्त्रों के पाँवड़े बिछाये जा रहे हैं। तुलसी इस सम्पन्नता को देखकर कुबेर तक का धनाभिमान छूट जाने की बात कहते हैं। उसके आगे दिया हुआ जनवासा अत्यन्त सुन्दर है और उसमें सबके लिये सब प्रकार का सुभीता है। बारंबार आनेवाला यह सब शब्द स्वागत का विस्तार खोलता है। पूरे बराती समुदाय के लिये ठहरने की सुविधा है। आनेवाले को अपना स्थान देखकर आराम मिल सके, इसकी पूरी व्यवस्था सामने है।
अब सीता को मालूम होता है कि बरात नगर में आ गयी है। इस समाचार पर वे अपनी कुछ महिमा प्रकट करती हैं। तुलसी यहाँ कुछ कहकर उस महिमा की सीमा भी बताते हैं: जो प्रकट होगा वह उनकी शक्ति का थोड़ा सा परिचय है। सीता अपने हृदय में स्मरण करके सभी सिद्धियों को बुलाती हैं और राजा दशरथ की पहुनाई के लिये भेज देती हैं। उनकी इच्छा का काम है अतिथि को सुख देना।
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥
चौपाई ३
हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाईं॥
हृदय में बुलाना और सेवा के लिये भेजना, दोनों क्रियाएँ इसी छोटी सी चौपाई में पूरी हो जाती हैं। सीता के हृदय का स्मरण अब जनवासे में अतिथियों का सुख बढ़ाने जा रहा है। उनके प्रेम की उपस्थिति अतिथियों को मिलनेवाले सुख में है। राजा के लिये भेजी गयी सिद्धियाँ उन्हीं की आज्ञा ग्रहण करती हैं और उस स्थान की ओर चल पड़ती हैं जहाँ बरात ठहरी है।
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास।
दोहा ३०६
लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥ ३०६॥
सिद्धियाँ अपने साथ सारी सम्पदा और सारे सुख लिये हुए हैं। तुलसी सुरपुर के भोगविलास कहते हैं, जिसे पोद्दार जी की टीका इन्द्रपुरी का सुख बताती है। अपने अपने निवास को देखते हुए बराती पाते हैं कि वहाँ देवताओं के सभी सुख हर प्रकार से सुलभ हैं। पहले जनवासे का सुन्दर होना कहा गया था, अब उस निवास के भीतर सुख की यह उपलब्धता दिखाई जाती है। अतिथि अपने रहने की जगह देखकर चकित हैं।
फिर भी इस ऐश्वर्य का भेद किसी को मालूम नहीं होता। सब जनक की बड़ाई करते हैं। यह बात कथा साफ कहती है, इसलिये हम सीता की सेवा को उसके पूरे रूप में देख पाते हैं: सुख सबको मिला है, करनेवाली का रहस्य उनके लिये छिपा है। जनक के स्वागत में जो पहले से वैभव था, उसी का बखान इस अद्भुत आतिथ्य को देखकर भी हो रहा है। बराती अपने अनुभव के आनन्द में हैं और उसका श्रेय जनक को देते हैं।
राम इस रहस्य को जानते हैं। वे सीता की महिमा भी पहचानते हैं और उसके भीतर का प्रेम भी। इसलिए उनके हृदय का हर्ष केवल ऐश्वर्य को देखकर उठी प्रसन्नता से अलग अपना कारण रखता है। सीता ने किस हेतु से यह पहुनाई भेजी, वह उनसे छिपा नहीं। समूची बरात को सुख देनेवाली सेवा और उसे समझ लेनेवाला यह हृदय, दोनों एक ही जनवासे के वर्णन में आ जाते हैं। सीता और राम के बीच प्रेम की पहचान के लिये यहाँ कोई बोला हुआ संवाद आवश्यक नहीं पड़ता।
दशरथ भेंटें प्रेम से स्वीकार करके याचकों को देते हैं और सम्मानपूर्वक जनवासे पहुँचाये जाते हैं। सीता हृदय में सिद्धियों को बुलाकर उनकी पहुनाई के लिये भेजती हैं। बराती देवताओं जैसे सुख पाकर जनक का बखान करते हैं। राम सीता की महिमा और सेवा के पीछे का प्रेम पहचानकर हर्षित होते हैं।
गुरु ने मन की लालसा जान ली
पिता के आने का समाचार सुनकर राम और लक्ष्मण दोनों के हृदय में महान आनन्द उमड़ता है। समाचार भर से मन इतना भर गया है कि वह हर्ष उसमें समाता नहीं। अब दशरथ इसी नगर में हैं, उन्हें देखा जा सकता है, उनके पास पहुँचा जा सकता है। दोनों भाइयों के मन में दर्शन की लालसा है। और फिर भी वे विश्वामित्र के सम्मुख अपनी इच्छा कहने में संकोच करते हैं।
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं । पितु दरसन लालचु मन माहीं॥
चौपाई ४
बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी । उपजा उर संतोषु बिसेषी॥
इस संकोच का अर्थ पिता से मिलने की इच्छा कम होना नहीं है। उस इच्छा को तुलसी अलग से मन में रख देते हैं, फिर गुरु के आगे न कह पाने की बात कहते हैं। दोनों साथ हैं। पुत्रों के भीतर उमड़ा आनन्द और गुरु के प्रति उनकी नम्रता, कोई भी दूसरे को हटाता नहीं। जिस प्रसन्नता ने स्वागत करनेवालों को दौड़ा दिया था, वही यहाँ विनय के भीतर ठहरी हुई दिखाई देती है।
विश्वामित्र दोनों की बड़ी विनय देखते हैं और उनके हृदय में विशेष सन्तोष उत्पन्न होता है। गुरु तक बात बिना कहे पहुँच गयी। वे हर्षित होकर दोनों भाइयों को हृदय से लगा लेते हैं। उनका अपना शरीर पुलकित हो जाता है और आँखें प्रेम के जल से भर आती हैं। मन की लालसा समझने का उत्तर एक आलिंगन में मिलता है। दोनों भाइयों का संकोच गुरु के सन्तोष में समा गया है।
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए । पुलक अंग अंबक जल छाए॥
चौपाई ५
चले जहाँ दसरथु जनवासे । मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥
अब विश्वामित्र उन्हें साथ लेकर उस जनवासे की ओर चलते हैं जहाँ दशरथ ठहरे हैं। इस चलने को तुलसी सरोवर के प्यासे की ओर चल पड़ने जैसा कहते हैं। पिता के लिये पुत्रों का दर्शन उसी जल की तरह है जिसकी प्यास लगी हुई है। गुरु दोनों को लेकर वहाँ पहुँच रहे हैं, इसलिए उपमा में जल का पूरा सरोवर ही प्यासे की ओर बढ़ आता है। अभी पिता ने कुछ कहा भी नहीं, उनके मिलने की आवश्यकता इस दृश्य से समझ में आने लगती है।
पिता की इच्छा और पुत्रों की इच्छा को गुरु का यह चलना एक जगह मिला देता है। दोनों भाई दर्शन की लालसा मन में लिये हुए थे। दूसरी ओर दशरथ को जब मुनि पुत्रों सहित आते दिखाई देते हैं तो वे हर्षित होकर उठ पड़ते हैं। उनकी दृष्टि ने जिस सुख को सामने आते देखा है, शरीर अब उसकी ओर चलता है। अभी चरणों में झुकना और बाँहों में भरना बाकी है, पर मिलने की शुरुआत इस देखते ही उठ खड़े होने में हो चुकी है।
दशरथ के बढ़ने के लिये दोहे में फिर समुद्र आता है। वे मानो सुख के समुद्र की थाह लेते हुए चल रहे हों। अगवानी में दो समुद्र एक दूसरे से मिले थे। यहाँ राजा स्वयं ऐसे आनन्द के भीतर उतर रहे हैं जिसका पार पाना कठिन है। पुत्रों को साथ लिये गुरु की ओर उठता हर कदम उसी सुख का अनुभव है। जनवासे की सम्पदा के बीच अब सबसे प्रिय प्राप्ति सामने आ गयी है।
दोनों भाई पिता के दर्शन चाहते हैं, पर गुरु के आगे कहने में सकुचाते हैं। विश्वामित्र उनकी विनय समझकर उन्हें हृदय से लगाते हैं और दशरथ के जनवासे ले चलते हैं। पुत्रों सहित मुनि को आते देखकर दशरथ हर्षित होकर उठते हैं और उनकी ओर बढ़ते हैं।
पिता के पास चारों पुत्र
दशरथ पहले मुनि को दण्डवत् प्रणाम करते हैं। वे उनकी चरणधूलि बारंबार सिर पर रखते हैं। पुत्रों को देखकर उठे राजा अपनी प्रसन्नता में भी गुरु का आदर पूरे भाव से करते हैं। विश्वामित्र उन्हें हृदय से लगा लेते हैं, आशीर्वाद देते हैं और कुशल पूछते हैं। अब इस मिलन में राजा और मुनि दोनों का अनुराग सामने है। गुरु के साथ आये पुत्रों तक पहुँचने से पहले गुरु के चरणों का यह सम्मान कथा में अपनी पूरी जगह पाता है।
फिर दोनों भाई पिता को दण्डवत् करते हैं। उन्हें इस प्रकार प्रणाम करते देखकर दशरथ के हृदय में सुख समाता नहीं। वे पुत्रों को हृदय से लगा लेते हैं। अभी तक आने की खबर थी, फिर दूर से आते हुए दिखाई दिये थे, और अब दोनों पुत्र बाँहों में हैं। पिता का असह्य दुःख इसी आलिंगन में मिट जाता है। पोद्दार जी की टीका उस दुःख को वियोग से उत्पन्न हुआ दुःख स्पष्ट करती है।
पुनि दंडवत करत दोउ भाई । देखि नृपति उर सुखु न समाई॥
चौपाई ६
सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे । मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥
मृत शरीर को प्राण मिल जाने की उपमा इस मिलन की तीव्रता बता देती है। बरात में धन और सुविधा की कोई कमी नहीं थी, फिर भी पुत्रों से मिलने का सुख अपने साथ जीवन लौट आने जैसी पूर्णता लाता है। दशरथ ने जो दुःख सहा था, तुलसी उसकी अवधि नहीं गिनाते। उसका भार इस उपमा में रखते हैं। अब वही शरीर प्रिय पुत्रों को हृदय से लगाकर उस पीड़ा से छूट गया है।
इसके बाद राम और लक्ष्मण वसिष्ठ के चरणों में सिर नवाते हैं। मुनिश्रेष्ठ प्रेम के आनन्द में दोनों को हृदय से लगाते हैं। फिर दोनों भाई सारे ब्राह्मणों की वन्दना करते हैं और मन के अनुकूल आशीर्वाद पाते हैं। एक पिता का आलिंगन समाप्त होते ही गुरु का आलिंगन मिलता है, उसके आगे ब्राह्मणों का आशीर्वाद। जनवासे में मिलने की खुशी अपनी मर्यादा के साथ फैल रही है और हर सम्बन्ध का अपना आदर निभ रहा है।
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा । लिए उठाइ लाइ उर रामा॥
चौपाई ७
हरषे लखन देखि दोउ भ्राता । मिले प्रेम परिपूरित गाता॥
भरत छोटे भाई के साथ राम को प्रणाम करते हैं। टीका उस छोटे भाई को शत्रुघ्न कहकर स्पष्ट करती है। राम दोनों को उठाकर हृदय से लगा लेते हैं। अब जिस उठाने और गले लगाने का सुख राम और लक्ष्मण ने पिता तथा गुरु से पाया था, वही राम अपने दोनों भाइयों को दे रहे हैं। प्रणाम में रखा छोटों का आदर बड़े भाई के आलिंगन में उत्तर पाता है।
लक्ष्मण भी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित होते हैं और उनसे मिलते हैं। तुलसी उनके शरीर को प्रेम से परिपूर्ण कहते हैं। मिलन का आनन्द मन में ही नहीं रहता, वह मिलते हुए शरीर में भर जाता है। चारों भाई अब सामने हैं। भरत और शत्रुघ्न ने राम के चरणों में झुककर जो भेंट आरम्भ की, उसमें लक्ष्मण का हर्ष भी पूरी तरह जुड़ गया। परिवार का यह मिलन अपने प्रत्येक सम्बन्ध को अलग से प्रकाशित करता है।
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत।
दोहा ३०८
मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥ ३०८॥
इसके बाद राम सबसे यथायोग्य मिलते हैं। दोहा उन सबको नाम लेकर गिनाता है: नगरवासी, कुटुम्बी, जाति के लोग, याचक, मन्त्री और मित्र। पोद्दार जी पुरजनों को अयोध्यावासी कहते हैं। जिस जनवासे में राजपरिवार मिला है, उसी में आये हुए इन सभी लोगों की भेंट भी कथा का आवश्यक हिस्सा है। राम को परम कृपालु और विनीत कहकर तुलसी इस मिलने का भाव बताते हैं। हर एक अपने सम्बन्ध के योग्य आदर पाता है।
राम को देखकर पूरी बरात शीतल हो जाती है। टीका इसे वियोग में जलती हृदय की आग के शान्त होने के रूप में खोलती है। यह शब्द पहले वर्णित देवताओं के सुखों से भी आगे जाता है। रहने का सुख सबको मिल चुका था, अब प्रिय को देखने से भीतर की पीड़ा शान्त हुई है। प्रीति की रीति का वर्णन नहीं हो सकता, इतना कहकर तुलसी फिर हमें एक दृश्य की ओर ले जाते हैं।
रामहि देखि बरात जुड़ानी । प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥
चौपाई ८
नृप समीप सोहहिं सुत चारी । जनु धन धरमादिक तनुधारी॥
दशरथ के पास चारों पुत्र शोभा पा रहे हैं। तुलसी उन्हें शरीर धारण किये हुए धन और धर्म आदि की तरह देखते हैं। पोद्दार जी इस उपमा के चारों पुरुषार्थ स्पष्ट गिनाते हैं: अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। पिता के पास चारों संतानों की शोभा में जीवन के सभी पुरुषार्थ मूर्त हो उठे हैं। उपमा पूरे समूह की है। उसे देखता हुआ मन पिता और पुत्रों के इस एकत्र आनन्द में ठहर जाता है।
दशरथ पहले विश्वामित्र को प्रणाम करते हैं, फिर दोनों पुत्रों को हृदय से लगाते हैं। राम और लक्ष्मण वसिष्ठ तथा ब्राह्मणों का आशीर्वाद पाते हैं। भरत और शत्रुघ्न राम से मिलते हैं, लक्ष्मण दोनों से प्रेमपूर्वक मिलते हैं। राम सभी जनों से यथायोग्य मिलते हैं और पूरी बरात शीतल हो जाती है। पिता के पास चारों पुत्र मूर्तिमान पुरुषार्थों जैसे शोभित हैं।
बढ़ जायँ दिन और रात
चारों पुत्रों सहित दशरथ को देखकर नगर के स्त्री और पुरुष विशेष प्रसन्न होते हैं। पिता की प्रसन्नता अब नगर के लिये भी देखने का सुख है। देवता फूल बरसाते हैं और नगाड़े बजाते हैं। अप्सराएँ गाती और नाचती हैं। अगवानी के समय जो मंगलध्वनि सुनाई दी थी, वह परिवार के इस मिलन में भी है। बरात के आने और चारों पुत्रों के पिता के पास एकत्र होने, दोनों को आनन्द ने घेर लिया है।
शतानन्द, अन्य ब्राह्मण, मन्त्रीगण, मागध, सूत, विद्वान और भाट, जो अगवानी में आये थे, बरात सहित दशरथ का आदर करते हैं। यहाँ स्वागत के पूरे समूह को याद रखा गया है। इन सभी ने अपना सत्कार पूरा किया और फिर आज्ञा माँगकर लौटे। विदा होने की इस रीति में भी वही विनय है जो भेंट सामने रखते समय थी। अतिथि को निवास तक लाने के बाद अगवान अनुमति लेकर वापस जाते हैं।
प्रथम बरात लगन तें आई । तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥
चौपाई ९
ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं । बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥
बरात लग्न के दिन से पहले आ पहुँची है। इसी कारण जनकपुर में आनन्द और बढ़ गया है। विवाह की घड़ी आने से पहले का समय अब सबके लिये प्रियजनों को देखने का समय है। तुलसी कहते हैं कि लोग ब्रह्मानन्द प्राप्त कर रहे हैं और विधाता से दिन तथा रात बड़े हो जाने की बात कहते हैं। मिलनेवाले सुख के साथ उसे अधिक देर तक पाने की इच्छा उठती है।
यहाँ चाह समय की है। अतिथियों को सब प्रकार का सुभीता मिला है, पिता से पुत्रों का मिलन हो गया है, नगर को चारों भाइयों सहित दशरथ के दर्शन हुए हैं। ऐसे समय में लोगों को दिन छोटे जान पड़ रहे हैं। कथा यह नहीं बताती कि बरात कितने दिन पहले आयी। वह इतना बताती है कि लग्न से पहले आने का सुख लोगों को इतना प्रिय लगा कि वे दिन और रात बढ़ जाने की प्रार्थना करने लगे।
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज।
दोहा ३०९
जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥ ३०९॥
जहाँ तहाँ स्त्रियों और पुरुषों के समूह इकट्ठे होकर एक बात कहते हैं: राम और सीता सुन्दरता की सीमा हैं, दोनों राजा पुण्य की सीमा हैं। रूप को देखकर उनके मन में दोनों पिताओं के सौभाग्य का भाव आता है। सीता और राम की शोभा अपनी पराकाष्ठा पर है और जनक तथा दशरथ का सुकृत उसी प्रकार अपरिमित जान पड़ता है। नगर की चर्चा में यही रूप और पुण्य बारंबार एक साथ आते हैं।
दशरथ और चारों पुत्रों को देखकर नगर आनन्दित है। देवता पुष्पवर्षा करते हैं, अप्सराएँ गाती और नाचती हैं। शतानन्द सहित अगवान सत्कार करके अनुमति से लौटते हैं। लग्न से पहले बरात आने के कारण लोग दिन और रात बढ़ने की कामना करते हैं और राम, सीता तथा दोनों राजाओं के सौभाग्य की चर्चा करते हैं।
नगर अपने भाग्य को पहचानता है
जनकपुर के स्त्री और पुरुष जो कह रहे हैं, वह अगले शब्दों में और खुलता है। जानकी उन्हें जनक के पुण्य की मूर्ति दिखाई देती हैं। राम दशरथ के सुकृत का देह धारण किया हुआ रूप हैं। पिता के पुण्य को वे संतान के रूप में देख रहे हैं। उनके सामने सुन्दरता का दर्शन है, और उसी दर्शन से राजाओं के अर्जित सौभाग्य का बखान उठ रहा है।
जनक सुकृत मूरति बैदेही । दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥
चौपाई १०
इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे । काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥
वे कहते हैं कि इन दोनों राजाओं के समान किसी ने शिव की आराधना नहीं की और किसी ने ऐसा फल नहीं पाया। यह नगरवासियों की आनन्दभरी प्रशंसा है। उनके लिये आज दिखाई देता फल पूजा की अद्वितीयता का प्रमाण है। कोई हुआ नहीं, कहीं है नहीं और आगे होगा नहीं, इस प्रकार वे दोनों राजाओं के अनुपम भाग्य को बीते हुए, वर्तमान और आनेवाले समय में सबसे बढ़कर कहते हैं।
इसके बाद उनकी बात अपने ऊपर लौट आती है। हम सब भी सम्पूर्ण पुण्यों की राशि हैं, वे कहते हैं, क्योंकि संसार में जन्म पाकर हम जनकपुर के निवासी हुए। यह जिस नगर में रहने का सुख है, वह सीता और राम के दर्शन से जुड़ा है। राजाओं के पुण्य का फल देखते हुए उन्हें अपना यहाँ जन्म लेना भी विशेष भाग्य जान पड़ता है। उनके हिस्से में वह छबि देखने का अवसर आया है।
उन्होंने जानकी और राम की छबि देखी है, इसलिए वे अपने समान विशेष पुण्यात्मा और किसे मानें। उनके कथन में हम सब साथ आता है। इस दर्शन की प्राप्ति पूरे नगर की साझा प्रसन्नता बन गयी है। जो लोग जहाँ इकट्ठे हैं, वहीं एक दूसरे को अपने सौभाग्य का बोध करा रहे हैं। रूप की प्रशंसा, राजाओं के पुण्य का बखान और अपने जन्म का हर्ष, इन तीनों का सम्बन्ध उनकी बातचीत में खुलता जाता है।
अभी एक और सुख आगे रखा है। वे रघुवीर का विवाह देखेंगे और अपने नेत्रों का लाभ अच्छी तरह लेंगे। दर्शन की अभी की तृप्ति आगे के दर्शन की इच्छा को बढ़ाती है। बरात के पहले आ जाने से जो अतिरिक्त समय मिला है, उसमें विवाह की प्रतीक्षा भी आनन्द बन गयी है। उनकी आँखों के सामने राम और सीता की शोभा है, और मन में विवाह देखने का उल्लास है। इसी भावना से स्त्रियों की अगली बात शुरू होती है।
नगरवासी सीता को जनक के पुण्य की मूर्ति और राम को दशरथ का मूर्तिमान सुकृत कहते हैं। दोनों की शिव आराधना और प्राप्त फल का बखान करते हुए वे अपने जनकपुर में जन्म तथा सीता और राम के दर्शन को भी अनुपम सौभाग्य मानते हैं। अब वे विवाह देखने को उत्सुक हैं।
दोनों भाई नेत्रों के अतिथि होंगे
कोयल जैसे मधुर स्वरवाली स्त्रियाँ आपस में बातें करती हैं। एक सखी से दूसरी कहती है कि इस विवाह में बड़ा लाभ है। सुन्दर नेत्रोंवाली सखी को सम्बोधित करके वह नेत्रों की ही प्राप्ति का विचार रखती है। बड़े भाग्य से विधाता ने यह बात बना दी है कि दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि हुआ करेंगे। एक विवाह उनके मन में बारंबार मिलने का अवसर खोल रहा है।
अतिथि की बात अभी बहुत निकट है। जनकपुर में बरात की अगवानी हुई है, जनवासे में तरह तरह के सुख दिये गये हैं, और अब उन्हीं अतिथियों को आँखों में रखने की चाह है। स्त्रियाँ केवल आज के दर्शन पर बात नहीं रोकतीं। वे सोचती हैं कि सम्बन्ध बन जाने पर ये दोनों भाई बारंबार आयेंगे। इस आशा में सीता का अपने पिता के घर लौटना और फिर दोनों भाइयों का उन्हें लेने आना जुड़ा हुआ है।
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय।
दोहा ३१०
लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥ ३१०॥
वे कहती हैं कि जनक स्नेह के कारण बारबार सीता को बुलायेंगे। सीता पिता के पास आयेंगी तो उन्हें विदा कराकर ले जाने के लिये दोनों भाई आयेंगे। तुलसी उन दोनों की सुन्दरता करोड़ों कामदेवों के समान कहते हैं। स्त्रियों के मन में बननेवाला दृश्य दोनों भाइयों का है। राम और लक्ष्मण, जिनकी छबि उन्हें अभी इतनी प्रिय है, उसी छबि को फिर देखने का सुख वे इस आने जाने में सोच रही हैं।
फिर वे उस अवसर की पहुनाई की कल्पना करती हैं। अनेक प्रकार से मेहमानी होगी। ऐसी ससुराल किसे प्रिय न होगी, सखी से सखी कहती है। अपने नगर की अतिथि सेवा पर उनका विश्वास भी इस बात में है। जिस तरह आज आनेवालों का सत्कार हो रहा है, उसी तरह वे आगे की पहुनाई में भी अनेक सुख देख रही हैं। प्रेम से बुलानेवाले पिता और सुन्दर अतिथियों का स्वागत करनेवाला नगर, दोनों उनकी आशा में साथ हैं।
उस हर अवसर पर राम और लक्ष्मण को देखकर नगर के सब लोग सुखी होंगे। इस सुख को वे अपने तक सीमित नहीं रखतीं। आज नगर को मिला दर्शन आगे भी सबको प्राप्त होता रहेगा, यही उनकी इच्छा है। दोहे में बारंबार बुलाने की बात आती है, और अगली चौपाई में हर बार देखकर सुखी होने की। सीता के पिता का स्नेह और जनकपुर की आँखों का लाभ एक ही कल्पना में जुड़ गये हैं।
यह पूरा संवाद आगे की आशा में कहा जा रहा है। जनक ने अभी बारबार बुलाने का कोई क्रम आरम्भ नहीं किया है और दोनों भाइयों की ऐसी यात्राएँ अभी घट नहीं रही हैं। स्त्रियाँ विवाह के सम्बन्ध में उन्हें सम्भव देखकर हर्षित हैं। वर्तमान में मिली प्रसन्नता से वे भविष्य का सुख रच रही हैं, और उसी बातचीत के बीच एक सखी का ध्यान दशरथ के साथ आये दूसरे दोनों कुमारों की ओर चला जाता है।
स्त्रियाँ आशा करती हैं कि जनक स्नेह से सीता को बारबार बुलायेंगे और राम तथा लक्ष्मण दोनों उन्हें लेने आयेंगे। तब अनेक प्रकार की पहुनाई होगी और समूचा नगर दोनों को देखकर सुख पायेगा। ये उनकी आगे के लिये कही हुई इच्छाएँ हैं।
चारों भाइयों के लिये फैले आँचल
सखी कहती है कि जिस प्रकार राम और लक्ष्मण का जोड़ा है, उसी प्रकार दो कुमार राजा के साथ और भी हैं। उनमें भी एक श्याम हैं और दूसरे गौर, और सभी अंग सुन्दर हैं। यह समाचार उन लोगों से मिला है जो दोनों को देख आये हैं। यहाँ रूप के दर्शन की खुशी बातचीत के द्वारा उन तक पहुँचती है जिन्होंने अभी यह जोड़ी नहीं देखी। एक सखी सुना हुआ बताती है और दूसरी अपने देखे हुए से उसकी पुष्टि करती है।
कहा एक मैं आजु निहारे । जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥
चौपाई ११
भरतु रामही की अनुहारी । सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥
एक स्त्री कहती है कि उसने आज ही उन्हें देखा है। वे ऐसे सुन्दर लगे मानो ब्रह्मा ने अपने हाथों सँवारा हो। फिर वह भरत की बात अलग से बताती है। भरत राम के इतने अनुरूप हैं कि स्त्री और पुरुष सहसा पहचान नहीं पाते। राम की छबि से परिचित आँख जब भरत को देखती है तो समानता इतनी निकट है कि तुरन्त भेद कर पाना कठिन होता है। देखनेवाली सखी का आनन्द इसी पहचानी हुई छबि को फिर सामने पाने में है।
लक्ष्मण और शत्रुघ्न का भी एक रूप है। दोनों के नख से शिख तक सभी अंग अनुपम हैं। पहले श्याम और गौर की जोड़ी सुनायी गयी थी, अब दोनों जोड़ों के भीतर अलग अलग समानता स्पष्ट हो रही है: भरत राम जैसे और शत्रुघ्न लक्ष्मण जैसे। चारों कुमारों की बात पूरी हो जाती है। जो छबि मन को भाती है, उसे मुख से पूरा कहा नहीं जा सकता, और उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई मिलता नहीं।
इस अनिर्वचनीय सुन्दरता के बाद छन्द आता है। दास तुलसी कवियों और विद्वानों की बात कहते हुए उनकी उपमा की अनुपलब्धता फिर रखते हैं। साथ ही रूप से आगे उनके गुण भी गिनाते हैं। बल, विनय, विद्या, शील और शोभा, पाँचों के वे समुद्र हैं। इनके समान ये ही हैं। उपमा खोजती हुई वाणी उन्हीं पर लौट आती है, क्योंकि जिस किसी से तुलना की जाय उससे पूरी बराबरी बैठती नहीं।
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं।
छन्द, सोरठा ३११ से पहले
बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥
पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं।
ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
छन्द का पहला भाग चारों भाइयों की शोभा और गुणों को पूर्णता देता है। दूसरे भाग में नगर की सभी स्त्रियाँ आँचल फैला देती हैं। वे विधाता से विनती करती हैं कि चारों भाइयों का विवाह इसी नगर में हो और हम सब सुन्दर मंगल गायें। अभी तक वे दोनों भाइयों के आगे भी आते रहने का सुख सोच रही थीं। अब चारों को जानकर प्रार्थना भी चारों के लिये हो गयी है। जो आनन्द रूप के वर्णन से मिला है, वह विवाह की मंगलकामना बन गया।
उनकी विनती में अपनी भागीदारी भी है: हम मंगल गायें। वे इस सुख की दर्शक रहने से आगे उसका मंगलगान करना चाहती हैं। किसी वर या कन्या का नया सम्बन्ध यहाँ निश्चित नहीं होता। नगर की स्त्रियों के फैले आँचल हैं और उन्हीं के मुख की प्रार्थना है। चारों भाई इतने प्रिय लगे हैं कि वे चारों के विवाह का उत्सव इसी पुर में चाहती हैं। उनकी चाह जिस रूप में उठी है, कथा उसे उसी रूप में सुनाती है।
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन।
सोरठा ३११
सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥ ३११॥
अब उनकी आँखों में प्रेम का जल है और शरीर पुलकित हैं। वे आपस में कहती हैं कि त्रिपुरारि शिव सब मनोरथ पूरे करेंगे, क्योंकि दोनों राजा पुण्य के समुद्र हैं। जिस शिव आराधना को नगरवासियों ने दोनों राजाओं के अद्वितीय फल का कारण माना था, उसी शिव पर उनकी आशा फिर आकर ठहरती है। पहले प्राप्त सुख के लिये पुण्य का बखान था, अब मन में उठे सुख के लिये विश्वास है।
समापन की इस घड़ी में आँख, शरीर और वाणी एक भाव कहते हैं। आँखों में आँसू, तन में रोमांच और बोल में मनोरथ पूरे होने का भरोसा है। विवाह की आगे की व्यवस्था अभी सामने नहीं आती। प्रसंग स्त्रियों की परस्पर कही बात पर ठहरता है। दो राजाओं के पुण्य और शिव की कृपा का विश्वास लिये वे अपने नगर में चारों भाइयों का मंगल चाहती हैं।
देखकर आयी सखी भरत को राम जैसा और शत्रुघ्न को लक्ष्मण जैसा बताती है। चारों बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के समुद्र हैं। नगर की स्त्रियाँ आँचल फैलाकर चारों के इसी पुर में विवाह की प्रार्थना करती हैं और विश्वास रखती हैं कि शिव मनोरथ पूरे करेंगे। प्रसंग इसी आशा पर समाप्त होता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस स्वागत में देने के अनेक रूप हैं। जनक भेंटों की विपुल सामग्री भेजते हैं, दशरथ उसे ग्रहण करके याचकों को देते हैं और सीता अपनी सिद्धियों को अतिथियों का सुख बढ़ाने भेजती हैं। हर बार पानेवाला आगे किसी दूसरे के सुख का कारण बनता है। सीता की सेवा का भेद छिपा रहना भी इसी प्रसंग का कितना कोमल हिस्सा है। बरात सुख पाती है, राम प्रेम पहचानते हैं, और करनेवाली के नाम की घोषणा हुए बिना पहुनाई पूरी होती है।
मिलन में भी ध्यान देने की वही कोमलता है। राम और लक्ष्मण कह नहीं पाते, विश्वामित्र उनकी विनय और लालसा समझ लेते हैं। दशरथ मुनि को प्रणाम करते हैं, पुत्र पिता को प्रणाम करते हैं, छोटे भाई बड़े भाई को प्रणाम करते हैं, और हर ओर उत्तर में आलिंगन मिलता है। आदर और अनुराग इस प्रकार साथ रहते हैं कि झुकनेवाले को अपनेपन से उठा लिया जाता है। पूरी बरात के शीतल होने की बात इसी मिलन के बाद आती है।
नगर की स्त्रियाँ इस सुख को अधिक समय तक पाना चाहती हैं। उनकी आशा पहले दोनों भाइयों को फिर देखने की है, फिर चारों का मंगल गाने की हो जाती है। अभी मिला हुआ दर्शन मन में नई प्रार्थना जगा रहा है। हम उनके साथ अन्तिम सोरठे तक आते हैं तो सामने किसी नये विवाह का निर्णय नहीं, प्रेम से भरी आँखें और फैले हुए आँचल हैं। उनकी कामना का स्वर उसी भरोसे में बना रहता है कि शिव सब मनोरथ पूरे करेंगे।
जनवासे में चारों पुत्र पिता के पास हैं और नगर में उनके रूप की चर्चा चल रही है। लग्न का दिन आगे है। इस बीच बरात को सेवा का सुख, परिवार को मिलन का सुख और जनकपुर को दर्शन का सुख मिला है। उस सुख को और विस्तार देने की इच्छा लिये स्त्रियाँ अपने मंगल की प्रतीक्षा कर रही हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३०५ से ३११, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।