रामचरितमानस · बालकाण्ड · राम का प्रागट्य और चारों भाइयों का नामकरण
राम का प्रागट्य और चारों भाइयों का नामकरण
कौसल्या के सामने चार भुजाओं वाला रूप प्रकट होता है। माता बाललीला माँगती हैं, और बच्चे के रुदन से उठी प्रसन्नता अवध की गलियों और आकाश तक भर जाती है।
दशरथ अपनी रानियों को बुलाते हैं और पायस बाँटते हैं। इसी घरेलू दृश्य से तुलसीदास के रामचरितमानस में राम के प्रागट्य की यह कथा खुलती है। कौसल्या, कैकेयी और सुमित्रा के महल में आने के साथ हम उस समय में प्रवेश करते हैं जिसमें सुख क्रमशः फैलता है। पहले माताओं के हृदय हर्षित होते हैं, फिर सभी लोकों में सुख और सम्पत्ति छा जाती है। जन्म की घड़ी आते आते ग्रहों से लेकर नदी के जल तक, सब कुछ अनुकूल हो उठता है।
उस बड़े उल्लास के बीच सबसे निकट का संवाद एक माता का है। कौसल्या के सामने प्रभु अपने अद्भुत रूप में हैं। वे हाथ जोड़ती हैं, महिमा कहती हैं, और इस विस्मय में पड़ जाती हैं कि जिनके एक एक रोम में ब्रह्माण्ड हैं वे उनके गर्भ में कैसे रहे। प्रभु मुसकराकर उन्हें समझाते हैं। तब माता की एक और इच्छा सामने आती है, बालक होकर लीला कीजिये। कथा इस विनती के पास ठहरती है, फिर रुदन की ध्वनि के साथ राजमहल से बाहर निकलती है। अवध का उत्सव, रुका हुआ सूर्य, गलियों में घूमते शिव और काकभुशुण्डि, और अन्त में गुरु वसिष्ठ के रखे चार नाम, इसी आनन्द के अलग अलग दृश्य हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- कौसल्या प्रभु का चतुर्भुज रूप देखकर स्तुति करती हैं और फिर उनसे बाललीला की विनती करती हैं।
- दशरथ पुत्रजन्म का समाचार सुनकर प्रेम से भर जाते हैं और नगर को दान तथा उत्सव में सहभागी करते हैं।
- कैकेयी और सुमित्रा पायस ग्रहण करने वाली रानियाँ, जिनके पुत्रजन्म से राजपरिवार का सुख पूर्ण होता है।
- राम, भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण चार राजकुमार, जिनके नामों का अर्थ गुरु वसिष्ठ इस प्रसंग के अन्त में कहते हैं।
- वसिष्ठ जन्म के समय ब्राह्मणों सहित आने वाले गुरु, जिन्हें नामकरण के अवसर पर फिर बुलाया जाता है।
- शिव और काकभुशुण्डि मनुष्य का रूप धरकर उत्सव में उपस्थित रहते हैं और अवध की गलियों में आनन्दमग्न घूमते हैं।
- पार्वती जिनसे शिव अपने उस छिपे हुए आगमन की बात कहते हैं।
पायस के भाग और प्रतीक्षा का सुख
राजा के बुलाते ही कौसल्या आदि रानियाँ वहाँ चली आती हैं। जो बाँटा जा रहा है उसे पोद्दार जी की टीका पायस कहकर स्पष्ट करती है। दशरथ उसका आधा भाग कौसल्या को देते हैं। बचे हुए आधे के दो भाग करते हैं और उनमें से एक कैकेयी को देते हैं। इस तरह कौसल्या को पूरे पायस का आधा और कैकेयी को चौथाई भाग मिलता है। अब जो चौथाई शेष है, उसका भी एक क्रम है, और तुलसी उसे अलग से बताते हैं।
कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ॥
चौपाई १
कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि॥
बचे हुए भाग के फिर दो भाग किये जाते हैं। राजा उन्हें कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रखते हैं और सुमित्रा को देते हैं। हाथ पर रखने का आशय टीका उनकी अनुमति लेना बताती है। दोनों का मन प्रसन्न करके सुमित्रा को यह अंश मिलता है। इस छोटे से वर्णन में बाँटने की मात्रा के साथ रानियों की सम्मति भी रखी गयी है। अन्तिम दोनों हिस्से सुमित्रा के हैं, पर उन्हें देते समय कौसल्या और कैकेयी के हाथ भी उस क्रिया में सम्मिलित हैं।
इस प्रकार सभी रानियाँ गर्भवती हुईं और उनके हृदय बड़े हर्ष तथा सुख से भर गये। तुलसी इसी के साथ दृष्टि महल से बाहर ले जाते हैं। जिस दिन से श्रीहरि गर्भ में आये, उसी दिन से समस्त लोकों में सुख और सम्पत्ति छा गयी। माता के भीतर होने वाली घटना का प्रभाव सभी लोकों तक पहुँच रहा है। अभी प्रागट्य का क्षण नहीं आया है, किन्तु उस आगमन का सुख पहले ही फैल चुका है। कथा गर्भावस्था को इस व्यापक प्रसन्नता के बीच रखती है।
महल में रानियाँ शोभा, शील और तेज की खान बनी सुशोभित हैं। कुछ समय इसी सुख के साथ बीतता है। यहाँ दिन गिनाये नहीं गये, प्रतीक्षा की दशा बतायी गयी है। उस समय में माताओं का हर्ष बना रहता है और उनके रूप के साथ उनका शील तथा तेज भी दिखाई देता है। फिर वह अवसर आता है जिसमें प्रभु को प्रकट होना है। तुलसी उस घड़ी के लिये आकाश और धरती दोनों को तैयार दिखाते हैं, जैसे महल में भरा सुख अब सब ओर स्पष्ट दिखाई देने लगा हो।
कौसल्या को आधा पायस, कैकेयी को बचे हुए आधे का आधा, और शेष भाग के दो हिस्से दोनों की सम्मति से सुमित्रा को मिलते हैं। रानियाँ गर्भवती होकर हर्षित होती हैं। श्रीहरि के गर्भ में आने से सभी लोकों में सुख छा जाता है और प्रागट्य का समय आता है।
वह दोपहर जिसमें सब अनुकूल है
जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल।
दोहा १९०
चर अरु अचर हर्षजुत राम जनम सुखमूल॥ १९०॥
योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि, सभी अनुकूल हो जाते हैं। इतने सारे नाम एक साथ आने से उस घड़ी की पूर्ण अनुकूलता दिखाई देती है। समय की कोई एक बात शुभ कहकर छोड़ी नहीं गयी। उसके जितने अंग गिनाये गये, सब प्रसन्न अवसर में सम्मिलित हैं। चर और अचर भी हर्ष से भरे हैं। चलते फिरते जीवों के साथ स्थिर जगत् को जोड़कर तुलसी जन्म के सुख में सारी सृष्टि को स्थान देते हैं। कारण दोहे में ही है, राम का जन्म सुख का मूल है।
नौमी तिथि मधु मास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
चौपाई २
मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक बिश्रामा॥
पवित्र चैत्र मास है, शुक्ल पक्ष की नवमी और भगवान् का प्रिय अभिजित् मुहूर्त है। दोपहर का समय है। उस मध्य दिवस में अधिक सरदी भी नहीं है और गरमी भी नहीं। घड़ी की पवित्रता के साथ उसका स्पर्श भी बताया गया है। हम उस समय को केवल पंचांग में चिह्नित नहीं देखते, उसकी शान्ति अनुभव कर सकते हैं। यह सब लोकों को विश्राम देने वाला समय है। प्रकट होने वाले प्रभु के लिये भी कुछ ही आगे यही भाव आयेगा, वे अखिल लोक को विश्राम देने वाले हैं।
वायु शीतल है, मन्द है और सुगन्ध से भरी है। देवता प्रसन्न हैं, संतों के मन में चाव है। वन फूलों से भर गये हैं। पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे हैं और सभी नदियाँ अमृत की धारा बहा रही हैं। इस दृश्य में आँख, त्वचा और गन्ध, सबके लिये सुख है। पर्वत अपनी जगह प्रकाशमान हैं, हवा धीरे बहती है और नदियों में धारा चल रही है। चर और अचर के हर्ष को पिछला दोहा एक साथ कह गया था, अब वह अलग अलग रूपों में हमारे सामने खुलता है।
ब्रह्माजी जब इस अवसर को जानते हैं, तब देवता विमान सजाकर चल पड़ते हैं। निर्मल आकाश उनके समूहों से भर जाता है। गन्धर्वों के दल गुण गाते हैं, सुन्दर अञ्जलियों में फूल सजाकर बरसाये जाते हैं, और गगन में दुन्दुभियाँ बजती हैं। नाग, मुनि और देवता स्तुति करते हैं। सब अपनी अपनी सेवा उपस्थित करते हैं। इस स्वागत में केवल देखने की उत्सुकता नहीं है, भेंट अर्पित करने का भाव भी है। जिससे जो सेवा बनती है वह उसी को लेकर आया है।
देवताओं के समूह विनती करके अपने अपने धाम पहुँचते हैं। इसके बाद दोहा प्रभु के प्रकट होने का वचन रखता है। उनका परिचय जगत् के निवास और अखिल लोक के विश्राम के रूप में आता है। आकाश में भरे विमानों, गीतों और फूलों से कथा अब कौसल्या के सामने उपस्थित रूप की ओर मुड़ती है। इतनी विशाल तैयारी के बाद हमारी दृष्टि माता के आनन्द पर ठहरती है। जिनकी प्रतीक्षा में सब लोक प्रसन्न थे, उन्हें सबसे निकट से देखने की घड़ी अब माता की है।
चैत्र शुक्ल नवमी के अभिजित् मुहूर्त में, सुखद दोपहर और सुगन्धित पवन के बीच प्रागट्य की घड़ी आती है। वन, पर्वत और नदियाँ सुशोभित हैं। देवता विमानों से आकर स्तुति और सेवा अर्पित करते हैं। जगत् के आधार प्रभु प्रकट होते हैं।
माता के सामने अद्भुत रूप
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
छन्द १
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी।
भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी॥
कृपालु, दीनों पर दया करने वाले और कौसल्या के हितकारी प्रभु प्रकट हुए। माता के सामने जो रूप है, वह मुनियों का मन हरने वाला है। उसे देखकर वे हर्ष से भर गयी हैं। शरीर मेघ के समान श्याम है, आँखों को आनन्द देता हुआ। चार भुजाओं में प्रभु अपने आयुध धारण किये हैं। आभूषण और वनमाला सुशोभित हैं, नेत्र विशाल हैं। छन्द इस रूप को शोभा का समुद्र कहता है। इतने बड़े रूपवर्णन का पहला सम्बन्ध फिर भी कौसल्या से है, वे उनके हितकारी होकर प्रकट हुए हैं।
माता दोनों हाथ जोड़ लेती हैं। उनके सामने अनन्त हैं, और उनके अपने हाथ स्तुति के लिये जुड़े हुए हैं। कैसे स्तुति करूँ, यही उनकी पहली बात है। वेद और पुराण जिन्हें माया, गुण और ज्ञान से परे बताते हैं, जिनका कोई परिमाण नहीं, उन्हें वाणी में कितना कहा जा सकता है। कौसल्या सामने उपस्थित प्रभु को पहचान रही हैं और उसी पहचान के साथ अपनी वाणी की सीमा भी अनुभव कर रही हैं। उनका विस्मय रूप की सुन्दरता से आगे उस महिमा तक जाता है जिसे वेद और पुराण कहते हैं।
वे अपनी बात जारी रखती हैं। श्रुति और संत जिनको करुणा तथा सुख का समुद्र और सब गुणों का धाम कहकर गाते हैं, वे भक्तों पर अनुराग रखने वाले लक्ष्मीपति उनके हित के लिये प्रकट हुए हैं। यहाँ एक ओर समस्त गुणों का धाम है, दूसरी ओर माता का अपना कल्याण। कौसल्या इन दोनों बातों को एक ही विनती में रखती हैं। अनन्त की महिमा को कहते हुए उन्हें अपने प्रति हुआ उपकार भी दिखाई देता है। इतने व्यापक प्रभु ने इतना निकट आना स्वीकार किया है।
फिर उनके विस्मय का सबसे कठिन प्रश्न खुलता है। वेद कहते हैं कि प्रभु के प्रत्येक रोम में माया के बनाये अनेक ब्रह्माण्डों के समूह हैं। वही प्रभु उनके गर्भ में रहे। इस बात को सुनकर धीर और विवेकी की बुद्धि भी स्थिर कैसे रहे। माता के वचनों में अपने अनुभव और सुनी हुई महिमा का मिलना है। सामने का रूप यह पहचान जगा रहा है कि जिनका विस्तार समझ में नहीं आता, वे उनके अपने गर्भ में निवास कर चुके हैं। कौसल्या इस बात को कहते हुए स्वयं उसके आश्चर्य से घिर गयी हैं।
उस क्षण प्रभु मुसकराते हैं। तुलसी माता के ज्ञान के उपजने और प्रभु की मुसकान को पास पास रखते हैं। वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं। इसीलिये माता को सुन्दर कथा कहकर समझाते हैं, जिससे उन्हें पुत्र का प्रेम प्राप्त हो। पोद्दार जी की टीका इसे पूर्वजन्म की कथा बताती है। यहाँ उसका विस्तार सुनाया नहीं गया है। उसका फल हमारे सामने है, माता के भीतर पुत्रभाव जागता है। अभी जिनकी अनन्तता के सामने वे हाथ जोड़े हुए थीं, उन्हीं के प्रति वात्सल्य का भाव उभरता है।
कौसल्या की वह बुद्धि बदल जाती है और वे फिर बोलती हैं। इस बार सम्बोधन में तात आता है। माता प्रार्थना करती हैं कि आप यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला कीजिये। उनके लिये वही परम अनुपम सुख होगा। पहले विनती में पूछा था कि स्तुति किस प्रकार हो, अब इच्छा है कि बालक का खेल मिले। महिमा की पहचान ने जितना बड़ा विस्मय जगाया था, पुत्रप्रेम उतनी ही सहज माँग कर रहा है। माता को अपने सामने बालरूप चाहिये, जिसके साथ उनका मातृत्व अपना सुख पा सके।
यह माँग सुनने की घड़ी कथा में बहुत कोमल है। कौसल्या ने किसी और उपलब्धि का नाम नहीं लिया। जो रूप सामने है उसी प्रभु से बाललीला का आनन्द माँगा है। उनके लिये वह सुख अनुपम है, यही कारण उन्होंने स्वयं कह दिया। प्रभु उनकी बात जानते और समझते हैं। देवताओं के स्वामी बालक हो जाते हैं और रोना आरम्भ करते हैं। अभी चार भुजाओं और आयुधों वाला रूप देखा गया था, अब माता की विनती का उत्तर बच्चे की ध्वनि में सुनाई देता है।
इस रुदन तक पहुँचने में स्तुति, विस्मय, मुसकान, समझाना और माता की इच्छा, सब आते हैं। इसलिये बच्चे का रोना यहाँ एक पूरा संवाद समेटे है। कौसल्या को बाललीला का सुख मिलने लगा है। तुलसी इस चरित्र के गाने का फल भी साथ कहते हैं, इसका गान करने वाले श्रीहरि का पद पाते हैं और संसाररूपी कुएँ में नहीं गिरते। माता के सुख का वर्णन इस प्रकार उसे सुनने और गाने वाले के कल्याण से जुड़ता है। उस अन्तरंग विनती से निकली ध्वनि अब दूसरों तक पहुँचेगी।
बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।
दोहा १९२
निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार॥ १९२॥
दोहा इस प्रागट्य का तात्पर्य स्पष्ट करता है। ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के हित के लिये भगवान् ने मनुष्य का अवतार लिया है। उनका शरीर उनकी अपनी इच्छा से निर्मित है। वे माया, गुण और इन्द्रियों से परे हैं। माता की विनती पर बालक बनकर रोने और अपनी इच्छा से शरीर धारण करने की बातें साथ पढ़ने पर इस लीला की स्वेच्छा स्पष्ट होती है। प्रभु बालरूप में आये हैं और माता के प्रेम को स्वीकार करते हैं। जिनके आगमन से सब लोकों को विश्राम है, उनकी बालध्वनि अब घर को भर देती है।
कौसल्या चतुर्भुज प्रभु की स्तुति करती हैं और उनके रोम रोम में ब्रह्माण्डों का स्मरण करके गर्भनिवास पर विस्मित होती हैं। प्रभु मुसकराकर कथा कहते हैं, जिससे माता का पुत्रभाव जागता है। उनकी बाललीला की विनती सुनकर वे बालक होकर रोने लगते हैं।
बालक की ध्वनि और पिता का आनन्द
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥
चौपाई ३
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥
बच्चे के रोने की ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर चली आती हैं। दासियाँ प्रसन्न होकर जहाँ तहाँ दौड़ती हैं और सभी नगरवासी आनन्द में मग्न हो जाते हैं। जिस रुदन में माता की इच्छा पूरी हुई, उसे सुनने वालों को भी वह बहुत प्यारा लगता है। रानियों का जल्दी से आना और दासियों का दौड़ना उस प्रिय समाचार की गति है। अभी कथा में जो ठहराव था, वह अब महल भर में हलचल बन गया है। सबके हर्ष का एक ही कारण है, बालक का जन्म।
दशरथ के कानों तक पुत्रजन्म का समाचार पहुँचता है तो वे मानो ब्रह्मानन्द में समा जाते हैं। मन अत्यन्त प्रेम से भरा है और शरीर पुलकित है। वे उठना चाहते हैं, पर अपनी बुद्धि को धीरज देने में लगे हैं। पोद्दार जी की टीका प्रेम से शिथिल शरीर को सँभालने का भाव भी खोलती है। इतनी बड़ी प्रसन्नता में उठकर चल देना भी सहज नहीं रह गया। राजा के भीतर समाचार सुन लेने और उसके उत्तर में कुछ कर पाने के बीच आनन्द का यह भराव है।
उनके मन में एक बात आती है, जिनका नाम सुनने से ही शुभ होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं। नाम के सुनने भर से होने वाला कल्याण और अपने घर में हुआ आगमन, दोनों साथ रखकर पिता अपना सौभाग्य अनुभव करते हैं। मन परम आनन्द से भर जाता है। वे बाजा बजाने वालों को बुलाते हैं और वाद्य बजाने को कहते हैं। उनकी निजी प्रसन्नता अब सुनाई देने वाला उत्सव बनती है। पुत्रजन्म की बात के पीछे पीछे बधावे की ध्वनि भी नगर में फैलने लगती है।
गुरु वसिष्ठ के पास बुलावा भेजा जाता है। वे ब्राह्मणों को साथ लेकर राजद्वार पर आते हैं और उस अनुपम बालक को देखते हैं। तुलसी उसे रूप की राशि कहते हैं, जिसके गुण कहते हुए समाप्त नहीं होते। कौसल्या ने अद्भुत रूप देखा था, पिता ने समाचार सुना था, अब गुरु का दर्शन है। एक ही जन्म के चारों ओर अलग अलग सम्बन्ध आकर मिल रहे हैं। सबके सामने बालक है और प्रत्येक की प्रसन्नता में उसका अपना स्थान है।
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
दोहा १९३
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥ १९३॥
राजा नान्दीमुख श्राद्ध करके जातकर्म आदि संस्कार सम्पन्न करते हैं। ब्राह्मणों को सोना, गौएँ, वस्त्र और मणियाँ देते हैं। घर में उमड़ा आनन्द संस्कार और दान के रूप में व्यवस्थित होता है। कुछ ही पहले पिता को अपना शरीर सँभालकर उठना कठिन हो रहा था, अब वे जन्म के अवसर का पूरा कार्य कर रहे हैं। इस परिवर्तन में प्रेम बना रहता है। वही प्रेम पहले पुलक और अधीरता में दिखा था, अब दूसरों को बुलाने, संस्कार करने और उपहार देने में व्यक्त है।
बालरुदन सुनकर रानियाँ और दासियाँ दौड़ती हैं। दशरथ समाचार पाकर प्रेम से भर जाते हैं, वाद्य बजवाते हैं और गुरु वसिष्ठ को बुलाते हैं। नान्दीमुख श्राद्ध तथा जातकर्म के बाद वे ब्राह्मणों को सोना, गौ, वस्त्र और मणियाँ देते हैं।
द्वार से गली तक बँटता उत्सव
ध्वजाओं, पताकाओं और तोरणों से पूरा नगर छा गया है। तुलसी कहते हैं कि जिस प्रकार उसे सजाया गया, उसका वर्णन नहीं हो सकता। आकाश से पुष्पों की वर्षा होती है और सभी लोग ब्रह्मानन्द में मग्न हैं। पिता के लिये आया ब्रह्मानन्द का भाव अब नगरवासियों के लिये आता है। घर का सुख सबके बीच बाँटा जा रहा है। द्वारों और गलियों की सजावट उस सम्मिलित हर्ष को आँखों के सामने रखती है, जिसे थोड़ी देर पहले बालक के रुदन की ध्वनि ने जगाया था।
स्त्रियाँ झुण्ड बनाकर चलती हैं। वे सहज शृंगार किये ही उठ दौड़ी हैं। हाथों में सोने के कलश हैं और थालों में मङ्गल की सामग्री भरी है। वे गाती हुई राजद्वार में प्रवेश करती हैं। सजावट देखने के साथ अब हमें उत्सव में आने वाले लोगों की गति दिखाई देती है। वे अपने साथ गीत और मङ्गल द्रव्य लायी हैं। जिस जन्म का समाचार नगर में फैला, उसके उत्तर में नगर की ओर से ये गाती हुई स्त्रियाँ महल में आ रही हैं।
वे आरती करती हैं, निछावर देती हैं और बच्चे के चरणों पर बार बार गिरती हैं। मागध, सूत, वन्दीजन और गवैये रघुनायक के पवित्र गुण गाते हैं। स्त्रियों के प्रवेश का गीत और गुणगान करने वालों की वाणी, दोनों से राजद्वार का दृश्य भर जाता है। हाथ आरती और निछावर में लगे हैं, मुख गाने में, और सबके हर्ष के बीच वह बालक है जिसके सामने वे झुक रहे हैं। उत्सव के प्रत्येक काम का केन्द्र उसके चरण हैं।
सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥
चौपाई ४
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥
राजा सबको भरपूर दान देते हैं। फिर एक ऐसी बात होती है जिससे इस प्रसन्नता का फैलना और स्पष्ट हो जाता है, जिसने पाया वह भी उसे अपने पास नहीं रखता। पाने वाला आगे लुटा देता है। दान केवल राजा के हाथ से निकलने वाली वस्तु तक सीमित नहीं रहता, वह पाने वालों का आचरण भी बन जाता है। अवध की गलियों में कस्तूरी, चन्दन और केसर की कीच मच गयी है। सुगन्धित पदार्थों की इतनी बहुतायत है कि गली की भूमि तक उत्सव का चिह्न सँजोये है।
घर घर मङ्गल के बधावे बजते हैं। नगर के स्त्री और पुरुष जहाँ तहाँ समूहों में आनन्दमग्न हैं। इसी क्रम में तुलसी कैकेयी और सुमित्रा के पुत्रजन्म का समाचार कहते हैं। उन दोनों ने भी सुन्दर पुत्रों को जन्म दिया है। सुख, सम्पत्ति, समय और समाज, इन सबका वर्णन सरस्वती और शेष भी नहीं कर सकते। राजमहल में बढ़ा हुआ यह आनन्द फिर पूरे नगर के चित्र में लौटता है। अब अवध को देखने के लिये कवि आकाश की उपमा लेते हैं।
नगर ध्वजा, पताका और तोरणों से सजता है। स्त्रियाँ कलश तथा मङ्गल थाल लेकर आती हैं, आरती और निछावर करती हैं। राजा के दान को पाने वाले भी आगे लुटाते हैं। घर घर बधावे बजते हैं और कैकेयी तथा सुमित्रा के पुत्रजन्म से सुख बढ़ता है।
अवध की सन्ध्या और ठहरा हुआ सूर्य
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥
चौपाई ५
देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥
अवधपुरी की शोभा ऐसी है मानो रात्रि स्वयं प्रभु से मिलने आयी हो। पर सूर्य को देखकर उसके मन में संकोच हुआ है। वह फिर भी चली नहीं जाती, विचार करके सन्ध्या बन रहती है। इस कल्पना में मिलने की इच्छा और सामने उजाला पाकर हुई झिझक, दोनों हैं। नगर को रात्रि का रूप देते समय तुलसी उसे एक मिलने आयी हुई अतिथि की तरह देखते हैं। उसके आने का उद्देश्य भी उसी प्रभु का दर्शन है जिसके लिये नगरवासी दौड़कर राजद्वार पहुँचे थे।
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥
चौपाई ६
मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥
इस सन्ध्या के अँधेरे का पदार्थ अगर की धूप है। उसका बहुत सा धुआँ नगर में भरा है। उड़ता हुआ अबीर सन्ध्या की लाली बन गया है। अन्धकार और लालिमा दोनों उत्सव की अपनी वस्तुओं से बने हैं। जिनसे सुगन्ध और रंग फैल रहे थे, उन्हीं से कवि आकाश रच रहे हैं। आगे महलों में जड़ी मणियों के समूह तारों का रूप लेते हैं और राजमहल का कलश श्रेष्ठ चन्द्रमा बन जाता है। हमारा ध्यान ऊपर के आकाश से नगर के भवनों पर आ टिकता है, जहाँ वैसी ही शोभा उपस्थित है।
इस चित्र में ध्वनि भी अपनी जगह पाती है। राजभवन की अत्यन्त कोमल वेदध्वनि उस समय के अनुकूल पक्षियों की चहचहाहट जैसी लगती है। धूप का धुआँ, अबीर, मणियाँ, कलश और वेद की वाणी, इन सबको साथ देखिये। अलग अलग उत्सव की सामग्री है, एक साथ सन्ध्या का पूरा दृश्य बन गयी है। कथा में जो नगर थोड़ी देर पहले तोरणों और ध्वजाओं से छाया था, वही अब अन्धकार, लालिमा, तारे और चन्द्रमा सँजोये प्रभु से मिलने आयी रात्रि का रूप धरता है।
इस कौतुक को देखकर सूर्य भी अपनी चाल भूल जाते हैं। एक महीना बीत जाता है और उन्हें उसके बीतने का ज्ञान नहीं होता। नगर की शोभा में रात्रि ने सूर्य को देखकर संकोच किया था, अब वही सूर्य इस शोभा को देखकर ठहर गये हैं। उपमा के बाद कथा समय के इस अद्भुत विस्तार को कहती है। प्रकाश बना रहता है। उत्सव को देखने वाला सूर्य अपने रथ सहित रुक गया है, इसलिये रात्रि के आने का क्रम भी रुका हुआ है।
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
दोहा १९५
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥ १९५॥
महीने भर का एक दिन हो गया है और कोई इसका रहस्य नहीं जानता। दोहे का प्रश्न बड़ा सीधा है, जब सूर्य अपने रथ समेत ठहरे हैं तो रात किस विधि हो। नगर के लिये समय बीतने की साधारण पहचान ही बदल गयी है। सब लोग उत्सव में मग्न हैं और उसकी अवधि का भेद उनसे छिपा है। तुलसी इस रहस्य को दो बार कहते हैं, पहले दोहे में, फिर आगे की चौपाई में। इतने लम्बे दिन को जानने वाला कथन है, नगर का कोई पात्र उसका हिसाब नहीं देता।
फिर सूर्य गुणगान करते हुए चलते हैं। उनकी गति लौट आती है और उसके साथ स्तुति चलती है। महोत्सव देखने आये देवता, मुनि और नाग भी अपना भाग्य सराहते हुए अपने भवनों की ओर जाते हैं। यहाँ लौटना भी प्रसन्नता से भरा है। देखने का सुख पूरा लेकर वे जा रहे हैं। अवध की यह शोभा देखने वालों में अभी दो और जनों की बात बची है। वे भी उत्सव के बीच उपस्थित थे, पर उनकी पहचान किसी ने नहीं पायी थी।
अवध रात्रि की तरह प्रभु से मिलने आयी जान पड़ती है, जो सूर्य को देखकर सन्ध्या बन रही है। धूप, अबीर, मणियाँ, कलश और वेदध्वनि उसका रूप बनाते हैं। सूर्य रथ सहित ठहर जाते हैं और दिन महीने भर का हो जाता है। फिर वे गुणगान करते हुए आगे चलते हैं।
दो आगन्तुक जिन्हें कोई पहचान न सका
शिव अब पार्वती से अपनी एक छिपी हुई बात कहते हैं। वे गिरिजा की बुद्धि की दृढ़ता का उल्लेख करके यह रहस्य खोलते हैं। इतने बड़े उत्सव का वर्णन करते करते कथावाचक स्वयं उसमें उपस्थित दिखाई देने लगते हैं। शिव उस नगर की शोभा के विषय में दूर की कोई बात नहीं कह रहे, वे वहाँ थे। उनके साथ काकभुशुण्डि भी थे। दोनों ने मनुष्य का रूप धारण किया था, इसलिये कोई उन्हें जान नहीं सका।
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥
चौपाई ७
काकभुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥
इस आगमन को शिव अपनी चोरी कहकर बताते हैं। छिपायी गयी बात उनकी पहचान है। मनुष्यरूप में वे और काकभुशुण्डि अवध की गलियों में फिरते रहे। परम आनन्द और प्रेम के सुख से दोनों फूले हुए हैं, मन मग्न है और सुधि भूल गयी है। कथा जिन नगरवासियों को जहाँ तहाँ आनन्दित दिखा रही थी, उनके बीच ये दोनों भी उसी सुख में डूबे हैं। शिव अब पार्वती को बताते हैं कि उत्सव का अनुभव उनके अपने मन और अपने भ्रमण का भी अनुभव था।
उनकी बात के साथ एक और वचन आता है, इस शुभ चरित्र को वही जानता है जिस पर राम की कृपा हो। नगर में मनुष्यरूप होने के कारण उनकी पहचान छिपी रही, और इस चरित्र का ज्ञान भी कृपा से जुड़ा है। यह बात सुनकर हम फिर उन्हीं गलियों को याद करते हैं जिनमें कस्तूरी, चन्दन और केसर की कीच थी। उन गलियों में घूमने वालों में शिव और काकभुशुण्डि भी हैं, अपने को प्रकट किये बिना प्रेम का सुख लेते हुए।
कथा फिर राजा के दान पर लौट आती है। उस अवसर पर जो जिस प्रकार आया, जिसके मन को जो अच्छा लगा, दशरथ ने उसे वही दिया। हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गौएँ, हीरे और अनेक प्रकार के वस्त्र दिये गये। वस्तुओं की इस सूची से पहले पाने वाले के मन की बात कही गयी है। राजा का देना उसकी रुचि तक पहुँचता है। पहले दान पाकर आगे लुटाने वालों का उल्लास देखा गया था, अब उनके सन्तोष का फल सुनाई देता है।
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस।
दोहा १९६
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस॥ १९६॥
सबके मन सन्तुष्ट हुए हैं, इसलिये जहाँ तहाँ आशीर्वाद उठते हैं। चारों पुत्र चिरजीवी हों, यही उनकी कामना है। दोहे में तुलसीदास अपना सम्बन्ध भी जोड़ देते हैं, वे सभी उनके ईश्वर हैं। नगरवासी राजकुमारों की दीर्घायु की कामना कर रहे हैं और कवि उन्हें अपने स्वामी कह रहे हैं। उपहार देने वाले पिता के पास इस तरह चारों पुत्रों के लिये आशीष लौटती है। उत्सव में बाँटा गया सुख वाणी बनकर बच्चों के मंगल की प्रार्थना करता है।
शिव पार्वती को बताते हैं कि वे और काकभुशुण्डि मनुष्यरूप में वहाँ थे और आनन्दमग्न गलियों में घूमते थे। कोई उन्हें पहचान न सका। दशरथ सबको मनचाहा दान देते हैं और सन्तुष्ट लोग चारों पुत्रों को चिरजीवी होने का आशीर्वाद देते हैं।
गुरु के मुख से चार नाम
इसी प्रकार कुछ दिन बीतते हैं। दिन और रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। अभी हमने सूर्य के ठहर जाने से महीने भर का दिन देखा था, अब सुख में समय का पता न लगने की बात है। नामकरण का अवसर आने पर राजा ज्ञानी मुनि वसिष्ठ को बुला भेजते हैं। वही गुरु जन्म के समाचार पर ब्राह्मणों सहित आये थे। अब चारों राजकुमारों के नाम रखे जाने हैं। परिवार के इस अवसर में उनके आने के साथ जन्मोत्सव की कथा एक नये ठहराव पर पहुँचती है।
दशरथ मुनि की पूजा करते हैं और विनती करते हैं कि आपने विचार करके जो नाम रखे हों, वे रखिये। गुरु उत्तर देते हैं कि इनके अनेक अनुपम नाम हैं, फिर भी अपनी बुद्धि के अनुसार कहूँगा। पहले ही वाक्य में नामों की अनेकता और कहने वाले की अपनी मर्यादा साथ आती है। गुरु नाम चुनते समय प्रत्येक बालक के गुण का अर्थ खोलेंगे। जिन बच्चों के लिये नगर भर से आशीर्वाद आये, उनके नाम अब सुनने वालों के सामने उनके स्वरूप का परिचय भी रखेंगे।
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥
चौपाई ८
सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥
पहले राम का नाम कहा जाता है। वे आनन्द के समुद्र और सुख की राशि हैं। उस आनन्दसिन्धु के एक कण से तीनों लोक सुखी होते हैं। समुद्र का एक कण और तीनों लोक, इन दोनों को एक पंक्ति में रखकर वसिष्ठ उस सुख की प्रचुरता बताते हैं। उसका थोड़ा सा अंश भी इतना व्यापक है। वे सुख के धाम हैं और समस्त लोकों को विश्राम देते हैं, इसलिये उनका नाम राम है। नाम कहते हुए गुरु उसी सुख को पहचानते हैं जो पूरे जन्मवर्णन में फैला हुआ है।
प्रागट्य से पहले समय को लोकों का विश्राम कहा गया था। प्रभु के प्रकट होने पर भी वही भाव आया। अब नामकरण में गुरु उसे राम नाम के अर्थ के साथ रखते हैं। जन्म की तैयारी, प्रकट हुए रूप का परिचय और नाम का उद्घाटन, तीनों जगह लोकों की शान्ति जुड़ी है। हमने पहले उसे हवा, वन, देवताओं और मनुष्यों के हर्ष में देखा था। अब गुरु की वाणी बताती है कि उस सुख का धाम सामने का यही बालक है।
बिस्व भरन पोषन कर जोई । ताकर नाम भरत अस होई॥
चौपाई ९
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥
इसके बाद भरत नाम आता है। जो विश्व का भरण पोषण करते हैं, उनका नाम भरत होगा। नाम के साथ संसार के पालन का भाव रखा गया है। फिर उस बालक का परिचय आता है जिनके स्मरण से शत्रु का नाश होता है। उनका नाम शत्रुघ्न है, जिसे वेदों में प्रसिद्ध कहा गया है। यहाँ नाम कहने का क्रम राम, भरत और शत्रुघ्न तक पहुँचा है। गुरु एक ही चौपाई में दो नामों को उनका अपना अर्थ देकर रखते हैं, भरण पोषण और स्मरण से शत्रुनाश।
इन अर्थों को आगे की किसी घटना की आवश्यकता नहीं पड़ती। बालक अभी नामकरण के अवसर पर हैं और गुरु उनके नामों में उनके गुण का परिचय दे रहे हैं। भरत के साथ विश्व का पोषण आता है, शत्रुघ्न के साथ स्मरण की शक्ति। इन दोनों के बाद लक्ष्मण का नाम दोहे में रखा गया है। इस अन्तिम परिचय में शुभ लक्षण, राम का प्रेम और जगत् का आधार, तीन बातें एक साथ आती हैं। चारों राजकुमारों की कथा यहाँ उनके नामों और नामों में कहे गये अर्थों तक पहुँचती है।
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
दोहा १९७
गुरु बसिष्ट तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥ १९७॥
जो शुभ लक्षणों के धाम हैं, राम के प्रिय हैं और समस्त जगत् के आधार हैं, गुरु वसिष्ठ उनका श्रेष्ठ नाम लक्ष्मण रखते हैं। जगत् का आधार होने के बड़े परिचय के बीच राम का प्रिय होना उतने ही स्पष्ट शब्दों में है। नामकरण का यह अन्तिम दोहा भाई के सम्बन्ध को भी सँजोता है। आरम्भ में रानियों के हाथों में पायस के भाग रखे गये थे, अन्त में गुरु की वाणी से चार नाम मिलते हैं। उसी परिवार का सुख अब राम, भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण कहकर पुकारा जा सकता है।
नामकरण में वसिष्ठ राम को आनन्दसिन्धु और सभी लोकों को विश्राम देने वाला कहते हैं। भरत विश्व का भरण पोषण करते हैं, शत्रुघ्न के स्मरण से शत्रु नष्ट होते हैं। शुभ लक्षणों के धाम, राम के प्रिय और जगत् के आधार बालक का नाम लक्ष्मण रखा जाता है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग की एक ध्वनि देर तक साथ रहती है, माता की इच्छा पर बालक का रोना। उस ध्वनि से पहले हमने मुनियों का मन हरने वाला रूप, कौसल्या की स्तुति और उनके विस्मय को देखा था। ध्वनि के बाद रानियाँ दौड़ती हैं, पिता प्रेम से भर जाते हैं और नगर में बधावे बजते हैं। एक माता को मिला बाललीला का सुख कितने लोगों की प्रसन्नता बन गया, कथा उसका विस्तार हमारे सामने करती है। आनन्द का केन्द्र छोटा सा बालरूप है और उसका अनुभव सभी लोकों तक पहुँचता है।
दान का प्रसंग भी इसी फैलाव को दिखाता है। राजा ने दिया, पाने वालों ने आगे लुटाया और फिर सन्तुष्ट मनों से आशीर्वाद उठे। देने की वस्तुएँ बदलती जाती हैं, सुख पाने वालों के बीच घूमता है। अवध के चित्र में हम इसी प्रसन्नता को धूप के धुएँ, उड़ते अबीर और मणियों के प्रकाश में देखते हैं। शिव तथा काकभुशुण्डि की छिपी हुई उपस्थिति बताती है कि उस आनन्द में वे भी मग्न थे। कथा कहने वाला स्वयं उन्हीं गलियों में अपनी सुधि भूल चुका है।
अन्त में राम नाम के अर्थ में वही विश्राम सुनाई देता है जो जन्म की घड़ी में सब लोकों के लिये आया था। गुरु नाम कहते हैं और हम पीछे के दृश्यों को एक साथ याद कर पाते हैं, अनुकूल समय, माता की विनती, पिता का पुलक, नगर की शोभा और चारों पुत्रों को मिली आशीष। नामकरण इन दृश्यों के बाद आता है, इसलिये सुखधाम का अर्थ केवल समझाया हुआ शब्द नहीं रहता। उसका विस्तार हम कथा में देख चुके हैं।
चारों नाम रखे जा चुके हैं। लक्ष्मण के नाम पर ठहरता दोहा राम का प्रिय होना और जगत् का आधार होना साथ कहता है। इस पूरे जन्मोत्सव में भी ऐसे ही निकट के सम्बन्ध और व्यापक महिमा साथ चले हैं। कौसल्या के पुत्र, दशरथ के राजकुमार, अवध के आनन्द और सब लोकों के विश्राम, इन सबके बीच तुलसी हमें एक ही जन्म का सुख दिखाते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १९० से १९७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।