इस पृष्ठ पर
रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 22
राम का प्रागट्य और चारों भाइयों का नामकरण
कौसल्या के सामने चार भुजाओंवाला रूप प्रकट होता है। माता बाललीला माँगती हैं, और बच्चे के रोने के बाद प्रसन्नता अवध की गलियों तक भर जाती है।
दशरथ अपनी रानियों को बुलाते हैं और पायस बाँटते हैं। इस घरेलू दृश्य के बाद तुलसीदास के रामचरितमानस में राम प्रकट होते हैं। माताओं के हृदय हर्षित होते हैं, सब लोकों में सुख और सम्पत्ति छा जाती है। और जन्म की घड़ी में योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सब अनुकूल हो जाते हैं।
इस बड़े उल्लास के बीच एक माता का संवाद है। कौसल्या के सामने राम अपने अद्भुत चार भुजाओंवाले रूप में हैं। वे हाथ जोड़ती हैं, और कहती हैं कि जिनके एक एक रोम में ब्रह्माण्ड हैं, वे उनके भीतर रहे, यह हँसी की बात है। राम मुसकराकर उन्हें समझाते हैं, और माता माँगती हैं कि बालक होकर लीला कीजिये। फिर रोने की ध्वनि के साथ कथा महल से बाहर निकलती है: अवध का उत्सव, रुका हुआ सूर्य, गलियों में घूमते शिव और काकभुशुण्डि। और अन्त में गुरु वसिष्ठ के रखे चार नाम।
जन्म की घड़ी में अवध
- कौसल्या राम का चतुर्भुज रूप देखकर स्तुति करती हैं और फिर उनसे बाललीला की विनती करती हैं।
- दशरथ पुत्र के जन्म का समाचार सुनकर प्रेम से भर जाते हैं, बाजे बजवाते हैं और सबको मनचाहा दान देते हैं।
- कैकेयी और सुमित्रा पायस ग्रहण करनेवाली रानियाँ, जिनके भी पुत्र जन्म लेते हैं।
- राम, भरत, शत्रुघ्न और लक्ष्मण चार राजकुमार, जिनके नामों का अर्थ गुरु वसिष्ठ इस प्रसंग के अन्त में कहते हैं।
- वसिष्ठ जन्म के समय ब्राह्मणों सहित आनेवाले गुरु, जिन्हें नामकरण के अवसर पर फिर बुलाया जाता है।
- शिव और काकभुशुण्डि मनुष्यरूप में अवध की गलियों में आनन्दमग्न घूमते हैं।
- पार्वती जिनसे शिव अपनी उस चोरी, अपने छिपाव, की बात कहते हैं।
पायस के भाग और प्रतीक्षा का सुख
राजा के बुलाते ही कौसल्या आदि रानियाँ चली आती हैं। जो बाँटा जा रहा है, उसे पोद्दार की टीका पायस बताती है। दशरथ उसका आधा भाग कौसल्या को देते हैं। बचे हुए आधे के दो भाग करते हैं, और उनमें से एक कैकेयी को देते हैं। इस तरह कौसल्या को पूरे पायस का आधा और कैकेयी को चौथाई मिलता है। बची हुई चौथाई का बँटवारा अलग से होता है।
बचे हुए भाग के फिर दो भाग होते हैं। राजा उन्हें कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रखकर, मन प्रसन्न करके, सुमित्रा को देते हैं। टीका बताती है कि हाथ पर रखने का अर्थ उनकी अनुमति लेना है।
इस प्रकार सब रानियाँ गर्भवती हुईं, और उनके हृदय बड़े हर्ष और सुख से भर गये। जिस दिन से राम गर्भ में आये, उसी दिन से सब लोकों में सुख और सम्पत्ति छा गयी।
महल में रानियाँ शोभा, शील और तेज की खान बनी सुशोभित हैं। कुछ समय इसी सुख में बीतता है। फिर वह अवसर आता है जिसमें राम को प्रकट होना है।
वह दोपहर जिसमें सब अनुकूल है
योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि, सब अनुकूल हो जाते हैं। चर और अचर भी हर्ष से भर जाते हैं। राम का जन्म सुख का मूल है।
पवित्र चैत्र मास है, शुक्ल पक्ष की नवमी, और भगवान् का प्रिय अभिजित् मुहूर्त। दोपहर का समय है, न बहुत सरदी, न गरमी। यह पवित्र समय सब लोकों को विश्राम देनेवाला है। कुछ ही आगे राम के लिये भी यही बात आयेगी कि वे सब लोकों को विश्राम देते हैं।
शीतल, मन्द और सुगन्धित पवन बह रहा है। देवता प्रसन्न हैं, और संतों के मन में चाव है। वन फूलों से भरे हैं, पर्वत मणियों से जगमगा रहे हैं, और सारी नदियाँ अमृत की धारा बहा रही हैं।
जब ब्रह्मा यह अवसर जानते हैं, तब सारे देवता विमान सजाकर चल पड़ते हैं। निर्मल आकाश उनके समूहों से भर जाता है। गन्धर्वों के दल गुण गाते हैं, सुन्दर अञ्जलियों में सजाकर फूल बरसाये जाते हैं, और आकाश में नगाड़े बजते हैं। नाग, मुनि और देवता स्तुति करते हैं, और अपनी अपनी सेवा भेंट करते हैं।
देवताओं के समूह विनती करके अपने अपने लोक लौट जाते हैं। तब जगत् के निवास, सब लोकों को विश्राम देनेवाले राम प्रकट हुए। आकाश के विमानों, गीतों और फूलों से कथा अब कौसल्या के सामने प्रकट रूप पर आती है।
माता के सामने अद्भुत रूप
दीनों पर दया करनेवाले, कौसल्या के हितकारी राम प्रकट हुए। उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर जाती हैं। शरीर मेघ के समान श्याम है, चार भुजाओं में उनके अपने आयुध हैं, आभूषण और वनमाला हैं, नेत्र विशाल हैं।
माता दोनों हाथ जोड़कर कहती हैं: हे अनन्त, मैं आपकी स्तुति किस प्रकार करूँ। वेद और पुराण आपको माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाण से रहित बताते हैं।
वे आगे कहती हैं कि श्रुतियाँ और संत उन्हें करुणा और सुख का समुद्र और सब गुणों का धाम कहकर गाते हैं। वही भक्तों से प्रेम करनेवाले लक्ष्मीपति उनके कल्याण के लिये प्रकट हुए हैं।
फिर वे कहती हैं: वेद कहते हैं कि आपके रोम रोम में माया के रचे अनेक ब्रह्माण्ड हैं। वही आप मेरे भीतर रहे, यह हँसी की बात है, जिसे सुनकर धीर की बुद्धि स्थिर नहीं रहती। टीका इसे गर्भ में रहना बताती है।
जब यह ज्ञान उपजता है, तब राम मुसकराते हैं। वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं। एक सुन्दर कथा कहकर वे माता को इस प्रकार समझाते हैं कि उन्हें पुत्र का प्रेम मिले। पोद्दार की टीका इसे पूर्वजन्म की कथा बताती है, और इस प्रेम को वात्सल्य।
माता फिर बोलती हैं, उनकी वह बुद्धि डोल गयी है। इस बार वे उन्हें “तात” कहती हैं: यह रूप छोड़कर अत्यन्त प्रिय बाललीला कीजिये, यह सुख परम अनुपम है।
माता के वचन सुनकर राम बालक होकर रोने लगते हैं। अभी चार भुजाओं और आयुधोंवाला रूप था। अब माता की विनती का उत्तर बच्चे की आवाज़ में आता है।
टीका के अनुसार यहाँ तुलसीदास कहते हैं कि जो इस चरित्र को गाते हैं, वे भगवान् का पद पाते हैं और संसाररूपी कुएँ में नहीं गिरते।
ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के हित के लिये भगवान् ने मनुष्य का अवतार लिया है। उनका शरीर उनकी अपनी इच्छा से बना है, और वे माया, गुणों और गो से परे हैं। टीका गो को इन्द्रियाँ बताती है।
बालक की ध्वनि और पिता का आनन्द
बच्चे के रोने की बहुत प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर चली आती हैं। दासियाँ प्रसन्न होकर जहाँ तहाँ दौड़ती हैं, और सारे नगरवासी आनन्द में मग्न हो जाते हैं।
दशरथ के कानों तक पुत्र के जन्म का समाचार पहुँचता है, तो वे मानो ब्रह्मानन्द में समा जाते हैं। मन अत्यन्त प्रेम से भरा है, शरीर पुलकित है। वे उठना चाहते हैं और बुद्धि को धीरज देते हैं। पोद्दार की टीका प्रेम से शिथिल शरीर को सँभालने की बात भी जोड़ती है।
टीका के अनुसार वे मन में सोचते हैं: जिनका नाम सुनने से शुभ होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं। मन परम आनन्द से भर जाता है। वे बाजेवालों को बुलाकर बाजा बजाने को कहते हैं।
गुरु वसिष्ठ के पास बुलावा भेजा जाता है। वे ब्राह्मणों को साथ लेकर राजद्वार पर आते हैं। वे उस अनुपम बालक को देखते हैं, जो रूप की राशि है और जिसके गुण कहने से समाप्त नहीं होते।
राजा नान्दीमुख श्राद्ध करके जातकर्म आदि सब संस्कार करते हैं, और ब्राह्मणों को सोना, गौएँ, वस्त्र और मणियाँ देते हैं।
द्वार से गली तक बँटता उत्सव
ध्वजाओं, पताकाओं और तोरणों से सारा नगर छा गया है। आकाश से फूल बरसते हैं, और सब लोग ब्रह्मानन्द में मग्न हैं। जो भाव अभी पिता के लिये आया था, वह अब नगरवासियों के लिये आता है।
स्त्रियाँ झुण्ड के झुण्ड चलती हैं। सहज शृंगार किये ही वे उठ दौड़ी हैं। हाथों में सोने के कलश हैं, थालों में मङ्गल की सामग्री, और वे गाती हुई राजद्वार में प्रवेश करती हैं।
वे आरती करती हैं, निछावर करती हैं और बार बार बच्चे के चरणों पर गिरती हैं। मागध, सूत, वन्दीजन और गवैये राम के पवित्र गुण गाते हैं।
राजा सबको अपना सब कुछ दान देते हैं, और जिसने पाया, उसने भी नहीं रखा। अवध की सब गलियों के बीच बीच कस्तूरी, चन्दन और केसर की कीच मच गयी है।
घर घर मङ्गल के बधावे बजते हैं, शोभा के मूल प्रकट हुए हैं। और नगर के स्त्री पुरुष जहाँ तहाँ झुण्डों में आनन्दमग्न हैं। इसी क्रम में कैकेयी और सुमित्रा भी सुन्दर पुत्रों को जन्म देती हैं। फिर अवध की शोभा आकाश की उपमा में कही जाती है।
अवध की सन्ध्या और ठहरा हुआ सूर्य
अवधपुरी ऐसी सुशोभित है मानो रात्रि स्वयं राम से मिलने आयी हो, और सूर्य को देखकर मानो मन में सकुचा गयी हो, फिर भी विचार करके सन्ध्या बन गयी हो। मिलने की इच्छा और उजाला देखकर हुई झिझक, दोनों इस कल्पना में हैं।
अगर की धूप का बहुत सा धुआँ मानो अँधेरा है, और उड़ता अबीर मानो लाली। महलों में मणियों के समूह मानो तारे हैं, और राजमहल का कलश श्रेष्ठ चन्द्रमा। सन्ध्या का सारा आकाश उत्सव की अपनी वस्तुओं से बना है।
ध्वनि भी अपनी जगह पाती है। राजभवन की अत्यन्त कोमल वेदध्वनि उस समय के अनुकूल पक्षियों की चहचहाहट जैसी है।
मानो रात्रि ने सूर्य को देखकर संकोच किया था। अब सूर्य इस कौतुक को देखकर भूल गये हैं। टीका कहती है, अपनी चाल। एक महीना बीत जाता है, और उन्हें पता भी नहीं चलता।
महीने भर का एक दिन हो गया, और इसका रहस्य कोई नहीं जानता। प्रश्न सीधा है: जब सूर्य अपने रथ समेत ठहरे हैं, तो रात कैसे हो।
फिर सूर्य गुणगान करते हुए आगे चलते हैं। महोत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग भी अपने भाग्य की सराहना करते हुए अपने अपने घर जाते हैं।
दो आगन्तुक जिन्हें कोई नहीं पहचानता था
शिव अब पार्वती से अपनी एक और छिपी हुई बात कहते हैं। सुनिये पार्वती, वे कहते हैं, आपकी बुद्धि बहुत दृढ़ है। उत्सव का वर्णन करते करते कथा कहनेवाले स्वयं उसमें दिखायी देने लगते हैं। टीका के अनुसार शिव और काकभुशुण्डि, दोनों वहाँ थे, और मनुष्यरूप के कारण उन्हें कोई जान न सका।
शिव इसे अपनी “चोरी” कहते हैं। जो छिपाया गया, वह उनकी पहचान है। मनुष्यरूप में वे और काकभुशुण्डि परम आनन्द और प्रेम के सुख में फूले हुए, मगन मन से, भूले हुए अवध की गलियों में फिरते रहे। टीका कहती है, तन मन की सुधि भूले हुए।
साथ ही वे कहते हैं कि इस शुभ चरित्र को वही जानता है जिस पर राम की कृपा हो। कस्तूरी, चन्दन और केसर की कीचवाली उन्हीं गलियों में ये दोनों भी थे, अपने को प्रकट किये बिना प्रेम का सुख लेते हुए।
कथा फिर राजा के दान पर लौटती है। उस अवसर पर जो जिस प्रकार आया, और जिसके मन को जो अच्छा लगा, दशरथ ने उसे वही दिया: हाथी, रथ, घोड़े, सोना, गौएँ, हीरे और अनेक प्रकार के वस्त्र। वस्तुओं से पहले पानेवाले के मन की बात कही गयी है।
सबके मन सन्तुष्ट हैं, और जहाँ तहाँ आशीर्वाद उठते हैं: सब पुत्र, जो तुलसीदास के स्वामी हैं, चिरजीवी हों। टीका इसे पूरा आशीर्वाद ही पढ़ती है, और पुत्रों को चारों राजकुमार बताती है।
गुरु के मुख से चार नाम
इसी प्रकार कुछ दिन बीतते हैं, और दिन रात जाते हुए जान नहीं पड़ते। नामकरण का अवसर जानकर राजा ज्ञानी मुनि वसिष्ठ को बुला भेजते हैं, वही गुरु जो जन्म के समाचार पर ब्राह्मणों सहित आये थे।
दशरथ मुनि की पूजा करके कहते हैं कि आपने मन में जो नाम विचार रखे हों, वे रखिये। गुरु उत्तर देते हैं कि इनके अनेक अनुपम नाम हैं, और वे अपनी बुद्धि के अनुसार कहेंगे। आगे वे हर नाम के साथ उसका अर्थ भी खोलते हैं।
पहला नाम राम है। जो आनन्द के समुद्र और सुख की राशि हैं, और जिनकी एक बूँद से तीनों लोक सुखी होते हैं, वे सुखधाम हैं। उनका नाम राम है, जो सब लोकों को विश्राम देते हैं।
जन्म की घड़ी को सब लोकों का विश्राम कहा गया था, और प्रकट होने पर भी यही बात आयी थी। अब गुरु इसी को राम नाम का अर्थ बताते हैं।
फिर भरत का नाम आता है: जो विश्व का भरण पोषण करते हैं, उनका नाम भरत होगा। फिर वे बालक, जिनके स्मरण से शत्रु का नाश होता है, उनका नाम शत्रुघ्न है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। गुरु एक साथ दो नाम उनके अपने अर्थ के साथ रखते हैं।
अन्त में लक्ष्मण का नाम आता है। उसके परिचय में तीन बातें एक साथ हैं: शुभ लक्षण, राम का प्रेम और जगत् का आधार।
जो शुभ लक्षणों के धाम हैं, राम के प्रिय हैं और सारे जगत् के आधार हैं, गुरु वसिष्ठ उनका श्रेष्ठ नाम लक्ष्मण रखते हैं। आरम्भ में पायस का अन्तिम भाग दो रानियों के हाथ पर रखा गया था। अन्त में गुरु की वाणी से चार नाम मिलते हैं।
एक रुलाई, सब लोकों का सुख
माता की इच्छा पर बालक रो पड़ता है। उससे पहले मुनियों का मन हरनेवाला रूप, कौसल्या की स्तुति और उनका विस्मय है। उसके बाद रानियाँ दौड़ती हैं, पिता प्रेम से भर जाते हैं, और नगर में बधावे बजते हैं।
दान का प्रसंग भी यही फैलाव दिखाता है: राजा ने सब कुछ दिया, पानेवालों ने भी नहीं रखा। और फिर सन्तुष्ट मनों से आशीर्वाद उठे। शिव और काकभुशुण्डि भी मनुष्यरूप में उस आनन्द में मग्न थे। कथा कहनेवाले स्वयं उन्हीं गलियों में मगन मन से फिर रहे थे।
अन्त में राम नाम के अर्थ में वही विश्राम सुनायी देता है जो जन्म की घड़ी में सब लोकों के लिये आया था।
चारों नाम रखे जा चुके हैं। लक्ष्मण के नाम में राम का प्रिय होना और जगत् का आधार होना साथ आता है। कौसल्या के पुत्र, दशरथ के राजकुमार, अवध का आनन्द और सब लोकों का विश्राम, इन सबके बीच चारों भाइयों के जन्म का सुख है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 190 से 197, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।