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मण्डप में चार विवाह

रामचरितमानस · बालकाण्ड · मण्डप में चार विवाह

मण्डप में चार विवाह

जनक का अतिथि सत्कार, मण्डप में सीता का आगमन, चारों भाइयों का विवाह और उस सारे उत्सव के बीच बार बार राम की ओर उठती सीता की आँखें।

मण्डप में अतिथियों को आसन दिये जा रहे हैं। जनक हाथ जोड़कर किसी से आशीर्वाद लेते हैं, किसी का मान बढ़ाते हैं, और पूरी बारात को ऐसा सम्मान देते हैं जैसे हर आगन्तुक उनका समधी हो। इस सत्कार के बीच कुछ अतिथि ऐसे भी हैं जिनका असली परिचय मेजबान को मालूम नहीं। ब्राह्मणों के वेष में आये देवता दूलह की लीला देख रहे हैं। जनक उन्हें पहचान नहीं पाते, फिर भी आदर में कोई कमी नहीं रहती। राम पहचान लेते हैं और मन ही मन उनकी पूजा करते हैं।

तुलसीदास का यह विवाह प्रसंग इसी दोहरे आनन्द में खुलता है। घर के रीति व्यवहार पूरे किये जा रहे हैं और देवता उनमें स्वयं भाग ले रहे हैं। आगे जनक और सुनयना अपने हाथों से राम के चरण पखारेंगे, दोनों कुलगुरु वर और कन्या की हथेलियाँ मिलायेंगे, और उसी मण्डप में चार जोड़ियाँ विराजेंगी। अन्त में राजाओं की विनय, सखियों का मङ्गलगान और सीता के नेत्र रह जायेंगे, जिन्हें बार बार देखने पर भी तृप्ति नहीं होती।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • राम और सीता मण्डप में विवाह संस्कार ग्रहण करते हुए वर और वधू, जिनकी परस्पर प्रीति का पूरा भेद दर्शकों को भी नहीं मिलता।
  • जनक और सुनयना सीता के माता पिता, जो प्रेममग्न होकर दूलह के चरण पखारते हैं और विवाह की विधियाँ पूरी करते हैं।
  • दशरथ चारों पुत्रों को वधुओं सहित देखकर हर्षित अवधनरेश, जो मिली हुई वस्तुएँ याचकों में बाँट देते हैं।
  • वसिष्ठ और शतानन्द दोनों कुलों के गुरु, जिनके निर्देशन में कुलाचार और विवाह संस्कार सम्पन्न होते हैं।
  • भरत और माण्डवी विवाहित जोड़ी, जिसमें माण्डवी को पोद्दार की टीका कुशध्वज की बड़ी कन्या बताती है।
  • लक्ष्मण और उर्मिला विवाहित जोड़ी, जिसमें उर्मिला सीता की छोटी बहिन हैं।
  • शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति विवाहित जोड़ी, जिसकी वधू के सुन्दर नेत्र, रूप, शील और गुणों का छन्द में वर्णन है।

हर अतिथि को समधी का सम्मान

जनक के हाथों सत्कार का आरम्भ ऋषियों से होता है। वामदेव आदि ऋषियों की वे प्रसन्न मन से पूजा करते हैं, सभी को दिव्य आसन देते हैं और सबसे आशीर्वाद पाते हैं। इस छोटे से दोहे में आदर दोनों दिशाओं में चलता है। राजा आसन अर्पित करते हैं और ऋषि आशीष देते हैं। विवाह के उत्साह के बीच यह क्रम मण्डप को सँभालता है, क्योंकि यहाँ उपस्थित हर बड़े का आशीर्वाद भी उत्सव का एक अंग है।

बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस।
दिए दिब्य आसन सबहि सब सन लही असीस॥ ३२०॥

दोहा ३२०

इसके बाद जनक कोसलपति दशरथ की पूजा करते हैं। उनके मन में दशरथ के प्रति महादेव के समान भाव है, और तुलसी इस भाव की एकनिष्ठता भी स्पष्ट करते हैं। हाथ जुड़ते हैं, विनय होती है, बड़ाई कही जाती है। जनक अपने भाग्य और वैभव की बढ़ती हुई महिमा का वर्णन करते हैं। पोद्दार की टीका इस बड़ाई का कारण दशरथ से बने सम्बन्ध को बताती है। मिलने आये हुए राजा को सम्मान देकर जनक अपने सौभाग्य की बात कर रहे हैं।

वही आदर आगे सारी बारात में फैल जाता है। जनक प्रत्येक बराती का समधी के समान सम्मान करते हैं और सबको उनके योग्य आसन देते हैं। दान, मान, विनती और उत्तम वाणी, सत्कार के ये सभी साधन साथ चल रहे हैं। किसी के सामने वस्तु रख दी गयी है, किसी से मधुर वचन कहे जा रहे हैं, किसी को बैठने का उचित स्थान मिला है। कवि इस फैले हुए उत्साह के सामने अपने एक मुख की सीमा मान लेते हैं। इतने लोगों का आदर एक साथ हो रहा है कि उसका पूरा वर्णन भी एक साथ देख सकने जैसी बात हो गयी है।

इन्हीं अतिथियों में ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य भी हैं। वे रघुवीर का प्रभाव जानते हैं और ब्राह्मणों का सुन्दर वेष बनाकर विवाह की लीला देख रहे हैं। जनक उन्हें देवताओं के समान जानकर पूजते हैं, पर उनका वास्तविक परिचय नहीं पहचानते। आसन फिर भी सुन्दर हैं, पूजा फिर भी पूरी है। परिचय छिपा रह जाने से सत्कार रुकता नहीं। दोनों ओर दूलह के दर्शन का ऐसा आनन्द है कि अपनी ही सुध भूल गयी है, फिर दूसरे का वेष पहचानने का अवकाश किसे मिले।

पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरी भई।
आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनँदमई॥
सुर लखे राम सुजान पूजे मानसिक आसन दए।
अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए॥

छन्द, दोहा ३२१ से पूर्व

राम देवताओं को पहचान लेते हैं। उनकी पूजा और उनके लिये आसन, दोनों मानसिक हैं। बाहर जनक का सत्कार चल रहा है और भीतर राम का, इसलिए सभा के सामने कोई नया परिचय खोले बिना देवता प्रभु का आदर पा लेते हैं। उन्हें राम का शील और स्वभाव देखकर बड़ा आनन्द होता है। इसके बाद दोहे में सबके नेत्र चकोर बन जाते हैं और राम का मुख चन्द्रमा। सुन्दर नेत्र उस छवि का आदरपूर्वक पान कर रहे हैं। इतने विविध अतिथियों की दृष्टि इस समय एक ही मुख पर लगी हुई है, और उनके प्रेम तथा प्रमोद का परिमाण कवि बहुत कहकर भी खुला छोड़ देते हैं।

जनक ऋषियों, दशरथ और सारी बारात का आदर करते हैं। देवता ब्राह्मण वेष में आये हैं; जनक उन्हें पहचाने बिना पूजते हैं और राम पहचानकर मानसिक पूजा तथा आसन देते हैं। सभी के नेत्र दूलह के मुख की छवि में मग्न हैं।

सखियों के बीच सीता

विवाह का समय देखकर वसिष्ठ शतानन्द को आदर से बुलाते हैं। वे भी आदरपूर्वक उपस्थित होते हैं और राजकुमारी को शीघ्र ले आने की आज्ञा पाकर प्रसन्न मन से चले जाते हैं। मण्डप का हर्ष अपनी जगह है, किन्तु विधि का समय आते ही गुरु का निर्देश सबको अगले काम में लगा देता है। उधर रानी पुरोहित की बात सुनकर सखियों सहित आनन्दित होती हैं। ब्राह्मणों की पत्नियाँ और कुल की वृद्ध स्त्रियाँ बुलायी जाती हैं। कुल की रीति पूरी होती है और सुन्दर मङ्गलगीत गाये जाते हैं।

रनिवास में भी वेष छिपाये हुए अतिथि हैं। श्रेष्ठ देवाङ्गनाएँ मनुष्य स्त्रियों के रूप में आयी हैं। तुलसी उन्हें स्वभाव से सुन्दरी और श्यामा कहते हैं; पोद्दार श्यामा का अर्थ सोलह वर्ष की अवस्था वाली बताते हैं। उन्हें देखकर रनिवास की स्त्रियों को सुख होता है। पहचान के बिना ही वे प्राणों से प्रिय लगती हैं। रानी उन्हें उमा, लक्ष्मी और सरस्वती के समान मानकर बार बार सम्मान देती हैं। मण्डप में देवताओं और यहाँ देवाङ्गनाओं के लिये एक जैसी उदार जगह बनी हुई है।

सीता का शृंगार किया जाता है और स्त्रियाँ तथा सखियाँ मण्डली बनाकर उन्हें मण्डप की ओर लिवा चलती हैं। छन्द में इस चलने की पूरी लय सुनायी देती है। सुन्दरियाँ सोलहों शृंगार किये हुए हैं। उनकी चाल में मतवाले हाथियों का गम्भीर सौन्दर्य है, और उनके गीत इतने मनोहर हैं कि मुनि ध्यान छोड़ देते हैं। कामदेव की कोयलें भी उस स्वर के सामने लजा जाती हैं। दृश्य में आँख के साथ कान भी लगते हैं, क्योंकि चलते हुए आभूषण गीत की गति को ताल दे रहे हैं।

चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं।
नवसप्त साजे सुंदरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं॥
कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं।
मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं॥

छन्द, दोहा ३२२ से पूर्व

पायजेब, पैंजनी और कंकणों की ध्वनि को कवि अलग अलग नाम देकर सुनाते हैं। गीत अपने स्वर में चल रहा है और आभूषण उसी ताल की गति पर बज रहे हैं। इस सजी हुई मण्डली के भीतर सीता सहज सुन्दरी हैं। दोहा आसपास की स्त्रियों को छवि की ललनाएँ मानता है और उनके बीच सीता को साक्षात् शोभा। सखियों की सुन्दरता पूरी बनी रहती है, और उसी सुन्दरता के बीच सीता की शोभा का विशेष स्थान दिखाई देता है।

सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय।
छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय॥ ३२२॥

दोहा ३२२

सीता को आते देखकर बराती मन ही मन प्रणाम करते हैं। तुलसी उन्हें रूप की राशि और सब प्रकार से पवित्र कहते हैं। अपनी बुद्धि छोटी और उनकी मनोहरता बड़ी मानकर कवि वर्णन की कठिनाई बताते हैं। आगे राम को देखकर सब कृतकृत्य हो जाते हैं। दशरथ पुत्रों सहित हर्षित हैं, देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं, मुनियों के आशीर्वाद की ध्वनि उठ रही है। गान और नगाड़ों का भारी कोलाहल है, और नर नारी प्रेम तथा प्रमोद में मग्न हैं। इतने स्वागत के बीच सीता मण्डप में आती हैं। मुनि आनन्दपूर्वक शान्तिपाठ करते हैं और दोनों कुलगुरु उस अवसर के रीति व्यवहार तथा कुलाचार सम्पन्न करते हैं।

गुरु के बुलावे पर कुल की वृद्ध स्त्रियाँ, ब्राह्मण पत्नियाँ और सखियाँ सीता को सजाकर लाती हैं। देवाङ्गनाएँ भी स्त्री वेष में उपस्थित हैं। मङ्गलगीत और आभूषणों की ताल के बीच सीता मण्डप पहुँचती हैं, जहाँ प्रणाम, पुष्पवर्षा, आशीर्वाद और शान्तिपाठ से उनका स्वागत होता है।

विधि में स्वयं उपस्थित देवता

दोनों कुलों के आचार पूरे होने पर पूजा का क्रम आगे बढ़ता है। गुरु प्रसन्न होकर गौरी, गणेश और ब्राह्मणों की पूजा कराते हैं। पोद्दार इस वाक्य का एक अर्थ यह भी देते हैं कि ब्राह्मणों के द्वारा गौरी और गणेश की पूजा करायी जाती है। दोनों अर्थों में गुरु की देखरेख और पूजा की प्रसन्नता साथ हैं। छन्द आगे जिस बात को सामने लाता है वह और भी विशेष है: देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और स्वयं सुख पाते हैं। जिनका आवाहन है उनकी उपस्थिति भी प्रत्यक्ष हो उठी है।

आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहीं।
सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं॥
मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं।
भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं॥

छन्द १, दोहा ३२३ से पूर्व

मधुपर्क और दूसरे माङ्गलिक द्रव्य जिस समय चाहिये होते हैं, उसी समय परिचारक उन्हें लिये तैयार मिलते हैं। मुनि के मन में पदार्थ की इच्छा भर उठती है और सोने की परातों तथा कलशों में वह सामने है। यहाँ सेवकों की तत्परता का वर्णन मन की चाह से किया गया है। किसी वस्तु के लिये पुकारने और फिर उसके आने की प्रतीक्षा का अन्तर नहीं पड़ता। विवाह की व्यवस्था इतनी सजग है कि विधान अपनी गति से चलता जाता है और हर आवश्यक वस्तु ठीक उसके समय पर उपस्थित रहती है।

सूर्यदेव स्वयं प्रेमपूर्वक अपने कुल की रीतियाँ बताते हैं। वे सब आदर से पूरी की जाती हैं। यह बात अभी के देवदर्शन को घर के व्यवहार के और समीप ले आती है। अपने वंश का विवाह है और सूर्य उसकी कुलरीति समझा रहे हैं। देवताओं की पूजा कराकर मुनि सीता को सुन्दर सिंहासन देते हैं। सीता और राम अब एक दूसरे को देखते हैं, और उस देखने में जो प्रेम है उसका भेद कोई दूसरा नहीं पा रहा। सभा उन्हें देख सकती है, उनके बीच का पूरा भाव उसके लिये अगोचर है।

कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सबु सादर कियो।
एहि भाँति देव पुजाइ सीतहि सुभग सिंघासनु दियो॥
सिय राम अवलोकनि परसपर प्रेमु काहु न लखि परै।
मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसें करै॥

छन्द २, दोहा ३२३ से पूर्व

कवि इस प्रेम को मन, बुद्धि और श्रेष्ठ वाणी से भी परे कहते हैं। अभी पदार्थों के लिये मन में इच्छा उठते ही व्यवस्था प्रकट हो जाती थी; यहाँ मन भी इस प्रेम का पूरा पता नहीं देता। राम और सीता की परस्पर दृष्टि के पास कथा ठहरती है और फिर हवन की ओर चलती है। अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े सुख से आहुतियाँ लेते हैं। सारे वेद ब्राह्मण रूप में विवाह की विधियाँ बता रहे हैं। अनुष्ठान के मन्त्र, उनका विधान और आहुति ग्रहण करने वाले देवता, सब इसी मण्डप में भाग ले रहे हैं।

होम समय तनु धरि अनलु अति सुख आहुति लेहिं।
बिप्र बेष धरि बेद सब कहि बिबाह बिधि देहिं॥ ३२३॥

दोहा ३२३

गुरुओं के निर्देशन में पूजा होती है, देवता प्रकट होकर उसे ग्रहण करते हैं, सेवक आवश्यक द्रव्य तत्क्षण उपस्थित रखते हैं और सूर्य अपने कुल की रीतियाँ बताते हैं। सीता राम की परस्पर प्रीति अगोचर है; हवन में अग्नि सशरीर आहुति लेते हैं और वेद ब्राह्मण वेष में विवाह विधि बताते हैं।

जनक और सुनयना के हाथों चरण प्रक्षालन

अब जनक की पटरानी और सीता की माता को बुलाने का समय है। तुलसी उनके परिचय में सुयश, पुण्य, सुख और सुन्दरता को एक साथ रखते हैं, मानो विधाता ने इन सबको बटोरकर उन्हें सँवारा हो। मुनियों का बुलावा सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदर से ले आती हैं। उनका नाम सुनयना है। वे जनक की बायीं ओर बैठती हैं और यह जोड़ी हिमाचल के साथ मैना जैसी शोभित होती है। माता पिता दोनों अब उस संस्कार में अपने हाथों से भाग लेने वाले हैं जिसमें उनकी बेटी और उनके सामने बैठे वर का सम्बन्ध प्रतिष्ठित होगा।

सोने के कलश और मणियों की सुन्दर परातें पवित्र, सुगन्धित, मङ्गल जल से भरी हैं। राजा और रानी प्रसन्न होकर उन्हें स्वयं उठाते हैं और राम के आगे रखते हैं। मुनि मङ्गल वाणी में वेदपाठ कर रहे हैं। आकाश से फूलों की झड़ी लगती है, मानो यह अवसर पहचान लिया गया हो। दूलह को देखकर दोनों अनुराग में भर जाते हैं और उनके पवित्र चरण पखारने लगते हैं। छन्द शरीर पर उतर आये उस प्रेम को दिखाता है: दोनों के रोम रोम में पुलक है और चारों ओर गान, नगाड़े तथा जयध्वनि उमड़ रहे हैं।

लागे पखारन पाय पंकज प्रेम तन पुलकावली।
नभ नगर गान निसान जय धुनि उमगि जनु चहुँ दिसि चली॥
जे पद सरोज मनोज अरि उर सर सदैव बिराजहीं।
जे सकृत सुमिरत बिमलता मन सकल कलि मल भाजहीं॥

छन्द १, दोहा ३२४ से पूर्व

चरणों पर जल पड़ रहा है और तुलसी उन्हीं चरणों की महिमा खोलते हैं। ये वे चरणकमल हैं जो कामदेव के शत्रु शिव के हृदय रूपी सरोवर में सदा विराजते हैं। इनके एक बार स्मरण से मन निर्मल होता है और कलियुग के सारे मल भाग जाते हैं। जनक के सामने दूलह के चरण हैं; कवि उन्हीं में शिव के हृदय का आराध्य दिखाते हैं। इस प्रकार प्रक्षालन की क्रिया के भीतर स्मरण की पवित्रता भी आ जाती है। माता पिता जिन चरणों को छू रहे हैं, उनका ध्यान मुनियों और योगियों के जीवन का आश्रय है।

अगले चरण में मुनि की पत्नी का उल्लेख है। पोद्दार की टीका उन्हें गौतम मुनि की पत्नी अहल्या बताती है और कहती है कि पापमयी कही गयी अहल्या ने इन चरणों के स्पर्श से परम गति पायी। छन्द यहीं उनके उद्धार का स्मरण करता है। फिर उन्हीं चरणकमलों के मकरन्द का चित्र आता है, जिसे टीका गङ्गाजी के रूप में खोलती है। वह रस शिव के सिर पर है और देवता उसे पवित्रता की सीमा कहते हैं। मुनि तथा योगी अपने मन को भौंरा बनाकर इन चरणकमलों की सेवा करते हैं और मनोवाञ्छित गति पाते हैं।

इस पूरे वर्णन के बाद दृष्टि फिर जनक के हाथों पर लौटती है। जिन चरणों का स्मरण, स्पर्श और सेवन इतने रूपों में फलदायी बताया गया, उन्हीं को बड़भागी जनक धो रहे हैं। देखने वाले जय जय कहते हैं। कमल, सरोवर, मकरन्द और भौंरे की छवियाँ एक दूसरे से जुड़कर उस छोटे से दृश्य को खोलती हैं। जल से भरी परात के सामने झुके राजा का भाग्य अब केवल राजकीय सम्बन्ध से नहीं मापा जा सकता; भक्त कवि उसके हाथों में अपने आराध्य के चरण देख रहे हैं।

सुनयना जनक की बायीं ओर बैठती हैं। दोनों अपने हाथों से सुगन्धित जल लाकर राम के चरण पखारते हैं। तुलसी उन चरणों का शिव के हृदय में निवास, स्मरण की पवित्रता, अहल्या की गति, गङ्गा की महिमा और मुनियों की उपासना के साथ सम्बन्ध खोलते हैं।

हथेलियाँ मिलती हैं, गाँठ जुड़ती है

चरण पखारने के बाद दोनों कुलगुरु वर और कन्या की हथेलियाँ मिलाते हैं। शाखोच्चार होता है, अर्थात् कुल की शाखाओं का उच्चारण। पाणिग्रहण सम्पन्न होता देखकर ब्रह्मा आदि देवता, मनुष्य और मुनि आनन्द से भर जाते हैं। अभी तक देखने की अनेक दृष्टियाँ थीं, राम को देखते अतिथि, सीता को देखते बराती और एक दूसरे को देखते वर वधू। यहाँ उन सबके सामने हाथ मिलाये जाते हैं और विवाह की विधि अपना स्पष्ट रूप ग्रहण करती है।

बर कुअँरि करतल जोरि साखोचारु दोउ कुलगुर करैं।
भयो पानिगहनु बिलोकि बिधि सुर मनुज मुनि आनँद भरैं॥
सुखमूल दूलहु देखि दंपति पुलक तन हुलस्यो हियो।
करि लोक बेद बिधानु कन्यादानु नृपभूषन कियो॥

छन्द ३, दोहा ३२४ से पूर्व

राजा रानी उस सुख के मूल दूलह को देखते हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और हृदय हर्ष से उमड़ रहा है। जनक लोक और वेद, दोनों की विधि करके कन्यादान करते हैं। संस्कार के इस वर्णन में दोनों रीतियों का नाम साथ आया है। घर और कुल का जाना हुआ व्यवहार भी निभ रहा है तथा वैदिक विधान भी पूरा हो रहा है। जनक की भावविह्वलता में कोई विधि छूटती नहीं; गुरु उसे सँभाले हुए हैं और माता पिता प्रेम से उसमें भाग ले रहे हैं।

सीता के समर्पण की उपमा तुलसी दो दिव्य विवाहों से देते हैं। जैसे हिमवान ने शिव को पार्वती दी थीं और समुद्र ने विष्णु को लक्ष्मी, वैसे ही जनक ने राम को सीता समर्पित कीं। इन उपमाओं में पिता का स्थान बना रहता है। हिमवान, समुद्र और जनक, तीनों अपनी ओर से अर्पण करते हैं, और अर्पण के सामने महादेव, विष्णु तथा राम हैं। इस विवाह से विश्व में जनक की सुन्दर नयी कीर्ति फैलती है।

हिमवंत जिमि गिरिजा महेसहि हरिहि श्री सागर दई।
तिमि जनक रामहि सिय समरपी बिस्व कल कीरति नई॥
क्यों करै बिनय बिदेहु कियो बिदेहु मूरति सावँरीं।
करि होमु बिधिवत गाँठि जोरी होन लागीं भावँरीं॥

छन्द ४, दोहा ३२४ से पूर्व

अब विनय के लिये वाणी चाहिये, पर विदेह अपनी देह की सुध ही भूल गये हैं। तुलसी उनके नाम को इसी क्षण की दशा बना देते हैं: साँवली मूर्ति ने विदेह को सचमुच विदेह कर दिया। जिस राजा के पास अभी तक सबके लिये उचित आसन, दान और मधुर वचन थे, उनके लिये अब अपनी विनती कहना कठिन हो गया है। राम का रूप देखते देखते यह आत्मविस्मृति आयी है। प्रेम शरीर में पुलक बनकर प्रकट हुआ था और अब अपनी ही देह का ध्यान मिटा देता है।

विधिपूर्वक हवन किया जाता है, गठजोड़ी होती है और भाँवरें आरम्भ होती हैं। जयध्वनि, बन्दीजनों की ध्वनि, वेदपाठ, मङ्गलगान और नगाड़ों के स्वर एक साथ उठते हैं। उन्हें सुनकर देवता हर्षित होकर कल्पवृक्ष के फूल बरसाते हैं। छन्द की अन्तिम गति गाँठ से परिक्रमा की ओर है। माता पिता का समर्पण पूरा हुआ, गुरु विधान आगे बढ़ा रहे हैं और वर वधू साथ चल रहे हैं। चारों ओर उठते स्वरों के बीच यह साथ चलना सबकी आँखों के सामने विवाह को सजीव कर देता है।

दोनों कुलगुरु हथेलियाँ मिलाकर शाखोच्चार करते हैं और पाणिग्रहण होता है। जनक लोक तथा वेद की विधि से कन्यादान करते हैं। राम का रूप उन्हें देह की सुध भुला देता है; हवन और गठजोड़ी के बाद भाँवरें आरम्भ होती हैं।

मणियों में झलकती जोड़ी और सिन्दूर

राम और सीता सुन्दर भाँवरें दे रहे हैं। देखने वाले आदर से दर्शन लेकर अपने नेत्रों का लाभ मानते हैं। मनोहर जोड़ी के लिये कवि को जो उपमा सूझती है, वही थोड़ी जान पड़ती है। इस बीच मणियों के खम्भों में दोनों की परछाहियाँ जगमगाती हैं। चलता हुआ रूप खम्भों में फिर दिखाई देता है, और विवाह को देखती सभा के भीतर देखने का एक और सुन्दर चित्र बन जाता है।

राम सीय सुंदर प्रतिछाहीं । जगमगात मनि खंभन माहीं॥
मनहुँ मदन रति धरि बहु रूपा । देखत राम बिआहु अनूपा॥

चौपाई १

तुलसी कल्पना करते हैं कि मानो कामदेव और रति अनेक रूप धरकर राम का अनुपम विवाह देख रहे हों। उन्हें दर्शन की लालसा भी बहुत है और संकोच भी, इसलिए वे बार बार प्रकट होते तथा छिपते जान पड़ते हैं। यह मणि स्तम्भों की परछाहियों से उठी हुई उपमा है। खम्भों में राम और सीता का प्रतिबिम्ब जगमगाता है, और कवि उसे लजाते हुए दर्शकों का स्वभाव दे देते हैं। लालसा आगे ले आती है, संकोच फिर छिपा देता है, और यही क्रम फिर दिखाई पड़ता है।

बाहर के दर्शक भी आनन्द में मग्न होकर जनक की भाँति अपनी सुध भूल जाते हैं। जो दशा अभी राजा की थी, वह पूरे दर्शक समूह में फैल गयी है। मुनि प्रसन्न होकर भाँवरें पूरी कराते हैं और नेग सहित सब रीतियाँ सम्पन्न करते हैं। इसके बाद राम सीता के सिर में सिन्दूर देते हैं। इस शोभा के वर्णन में फिर उपमा आती है, पर अब वह हाथ, भुजा और मुख के निकट ठहरती है।

अरुन पराग जलजु भरि नीकें । ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें॥
बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन । बरु दुलहिनि बैठे एक आसन॥

चौपाई २

कमल लाल पराग से भरा है और अमृत के लोभ से साँप चन्द्रमा को भूषित कर रहा है। पोद्दार इस चित्र के प्रत्येक अंग को खोलते हैं। राम का हाथ कमल है, सिन्दूर उसका लाल पराग है, राम की श्याम भुजा साँप है और सीता का मुख चन्द्रमा है। इस तरह रंग और गति दोनों साथ दिखाई देते हैं: हाथ में सिन्दूर की अरुणिमा, भुजा की श्यामता और उसके सामने मुख की चन्द्रछवि। अमृत का लोभ उस स्पर्श की ओर बढ़ती गति को उपमा के भीतर पूरा करता है।

फिर वसिष्ठ की आज्ञा होती है और दूलह दुलहिन एक आसन पर बैठते हैं। उन्हें देखकर दशरथ का मन आनन्द से भर जाता है और शरीर बार बार पुलकित होता है। उन्हें ऐसा लगता है जैसे अपने पुण्य रूपी कल्पवृक्ष में नये फल आये हों। पोद्दार की टीका इस उत्साह को चौदहों भुवनों में फैला हुआ बताती है। सब कहते हैं कि राम का विवाह हो गया। इतने बड़े मङ्गल का वर्णन एक जीभ कैसे पूरा करे, इस भाव के साथ छन्द राम और जानकी की सम्पन्न हुई विवाह विधि पर ठहरता है।

भाँवरों के समय मणि स्तम्भों में राम सीता की परछाहियाँ कामदेव और रति के संकोच भरे दर्शन की उपमा पाती हैं। मुनि नेग सहित रीतियाँ पूरी करते हैं, राम सिन्दूर देते हैं और वसिष्ठ की आज्ञा से दोनों एक आसन पर बैठते हैं। दशरथ का हृदय पुत्र वधू को देखकर हर्षित होता है।

एक मण्डप में चार जोड़ियाँ

राम और जानकी के बैठने के बाद जनक वसिष्ठ की आज्ञा पाते हैं। वे विवाह का सामान सँवारकर माण्डवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला, तीनों राजकुमारियों को बुलवाते हैं। छन्द पहले बुलायी गयी कन्याओं के नाम देता है, फिर उनके विवाहों को क्रम से कहता है। इसलिए हर जोड़ी का अपना परिचय स्पष्ट रहता है। प्रेमपूर्वक की जाने वाली रीतियाँ आगे भी उसी विस्तार का आधार हैं जो राम के विवाह में अभी देखा गया।

तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै।
मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै॥
कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई।
सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई॥

छन्द २, दोहा ३२५ से पूर्व

माण्डवी को पोद्दार की टीका कुशध्वज की बड़ी कन्या बताती है। वे गुण, शील, सुख और शोभा की मूर्ति कही गयी हैं। जनक सब रीतियाँ प्रेम सहित पूरी करके उनका विवाह भरत से करते हैं। इसके बाद जानकी की छोटी बहिन उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से होता है। उर्मिला सुन्दरियों में शिरोमणि हैं और जनक उनका सब प्रकार से सम्मान करके यह संस्कार सम्पन्न करते हैं। दोनों परिचयों में सम्बन्ध और गुण साथ चलते हैं, जिससे नामों के साथ कन्याओं का अपना स्थान भी स्पष्ट हो जाता है।

फिर श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से होता है। उनके सुन्दर नेत्र, सुन्दर मुख, सभी गुणों का भण्डार होना, रूप और शील में उज्ज्वल होना, ये बातें छन्द अलग से कहता है। चारों दूलह और दुलहिनें अपनी अनुरूप जोड़ियों को देखकर सकुचते हुए मन में हर्षित हैं। उनके भीतर का आनन्द संकोच के साथ दिखता है। आसपास के लोग प्रसन्न होकर सुन्दरता की सराहना करते हैं और देवता फूल बरसाते हैं। अब एक मण्डप में चारों वधुएँ अपने अपने वरों के साथ विराज रही हैं।

अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं।
सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं॥
सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं।
जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं॥

छन्द ४, दोहा ३२५ से पूर्व

इस दृश्य को तुलसी जीव के हृदय में चार अवस्थाओं और उनके स्वामियों के निवास की उपमा देते हैं। पोद्दार नाम खोलते हैं: जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, तथा उनके स्वामी विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म। उपमा में अवस्थाएँ अपने स्वामियों सहित हैं, जैसे मण्डप में वधुएँ वरों सहित। चार जोड़ियों का एक स्थान पर विराजना यहाँ मुख्य है। बाहर विवाह का मण्डप है और उपमा के भीतर जीव का हृदय; दोनों में साथ विराजने की पूर्णता दिखाई देती है।

दशरथ के आनन्द के लिये अगला दोहा एक और चार की छवि लाता है। सभी पुत्रों को बहुओं सहित देखकर वे ऐसे प्रसन्न हैं जैसे राजाओं के शिरोमणि को क्रियाओं सहित चारों फल मिल गये हों। पोद्दार इन क्रियाओं को यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया कहते हैं, तथा फलों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष। फल के साथ क्रिया का रहना दोहे का विशेष अंश है। इसी तरह पिता के सामने पुत्रों के साथ उनकी वधुएँ हैं और उनका आनन्द इस संयुक्त दर्शन से उपजा है।

मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि।
जनु पाए महिपाल मनि क्रियन्ह सहित फल चारि॥ ३२५॥

दोहा ३२५

तुलसी यह भी स्पष्ट करते हैं कि राम के विवाह की जैसी विधि पहले वर्णित हुई, उसी रीति से सभी राजकुमारों के विवाह हुए। एक संस्कार का पूरा वर्णन शेष विवाहों को समझने का आधार बनता है। चारों जोड़ियाँ समान रूप से उस सम्पन्न विधि के साथ मण्डप में बैठी हैं। दशरथ उन्हें बार बार देखने वाले पिता हैं और आसपास का उत्सव उनकी प्रसन्नता में अपना स्वर मिला रहा है।

माण्डवी, जिन्हें टीका कुशध्वज की बड़ी बेटी कहती है, भरत से विवाह करती हैं; सीता की छोटी बहिन उर्मिला लक्ष्मण से और श्रुतकीर्ति शत्रुघ्न से। चार जोड़ियों को चार अवस्थाओं तथा उनके स्वामियों की उपमा मिलती है। दशरथ का आनन्द क्रियाओं सहित अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष पाने जैसा है।

मण्डप से याचकों तक

विवाह की रीतियों के बाद दिया गया दहेज इतना अधिक है कि मण्डप सोने और मणियों से भर गया है। कवि उसकी अधिकता कहकर फिर वस्तुओं की ओर आते हैं। बहुत से कम्बल हैं, वस्त्र हैं और भाँति भाँति के विचित्र रेशमी कपड़े हैं। उनकी कीमत साधारण नहीं है। हाथी, रथ और घोड़े भी दिये गये हैं। गहनों से सजी हुई गायें कामधेनु के समान लगती हैं। यह विवरण विवाह की राजकीय सम्पन्नता को अलग अलग वस्तुओं के रूप में सामने रखता है।

इसी ऐतिहासिक दहेज सूची में दास और दासियाँ भी हैं, अर्थात् पराधीन सेवा में रखे गये मनुष्य। तुलसी उन्हें उस समय दिये गये सामान के क्रम में गिनाते हैं। वस्त्र, पशु और वाहनों के साथ उनका उल्लेख भी इस प्रसंग के सामाजिक व्यवहार का हिस्सा है। शेष वस्तुओं की इतनी अधिकता है कि उनका लेखा करना कठिन बताया गया है। कवि कहते हैं कि जिन्होंने देखा, वही जानते हैं। लोकपाल भी इस सम्पदा को देखकर सिहा उठते हैं, और दशरथ प्रसन्न होकर सब ग्रहण करते हैं।

पर ग्रहण करने के बाद सामान की गति वहीं थमती नहीं। दशरथ याचकों को वही वस्तु देते हैं जो जिसे अच्छी लगती है। देने में पाने वाले की रुचि भी देखी गयी है। जो बचता है वह जनवासे भेजा जाता है। मण्डप की भरी हुई सम्पदा का वर्णन अब बाँटे जाने के क्रम में बदल गया है। जिस वैभव को देखकर लोकपाल तक चकित थे, उसी में याचकों की इच्छा के लिये स्थान बनाया जाता है।

इस बँटवारे के बाद जनक सारी बारात का सम्मान करके हाथ जोड़ते हैं और कोमल वाणी में बोलते हैं। आरम्भ में भी उनके हाथ सत्कार के लिये उठे थे। अब विवाह और दान सम्पन्न हो चुके हैं, और वाणी फिर विनय पर आती है। अभी की वस्तु सूची से उनकी आगे की बात का आशय और खुलता है: इतना सब अर्पित कर चुकने पर भी वे देवताओं और साधुओं को प्रसन्न करने वाली वस्तु प्रेम को ही मानते हैं। अगले छन्द में वे इसी भाव को समुद्र और अञ्जलि के छोटे से जल से समझायेंगे।

कम्बल, बहुमूल्य वस्त्र, रेशमी कपड़े, हाथी, रथ, घोड़े, दास दासियाँ, सजी हुई गायें और अन्य वस्तुएँ दी जाती हैं। दशरथ प्रसन्न होकर उन्हें स्वीकार करते हैं, याचकों की रुचि के अनुसार बाँटते हैं और बचा हुआ सामान जनवासे भेजते हैं।

दो समधियों की विनय

जनक आदर, दान, विनय और बड़ाई से सारी बारात का सम्मान करते हैं। मुनियों की पूजा तथा वन्दना में प्रेम का लाड़ भी है। वे सिर झुकाकर देवताओं को प्रसन्न करते हैं और हाथ जोड़कर सबसे कहते हैं कि देवता तथा साधु भाव चाहते हैं। अञ्जलि भर जल से समुद्र कैसे तृप्त हो सकता है। पोद्दार इसे पूर्णकाम महानुभावों के विषय में कही गयी बात बताते हैं: जिन्हें किसी वस्तु की कमी नहीं, उन्हें देकर तृप्त करने का दावा कैसा; वे प्रेम से प्रसन्न होते हैं।

यह उपमा उसी राजा के मुख से निकली है जिसके दान से मण्डप भर गया था। अपार सामान देने के बाद भी जनक सामने वालों की पूर्णता पहचानते हैं। अपनी ओर से अर्पित वस्तु को समुद्र के सामने अञ्जलि भर जल जानना उनकी विनय का परिमाण है। फिर वे अपने भाई सहित हाथ जोड़कर दशरथ की ओर आते हैं। जो बात कहते हैं उसमें स्नेह, शील और सुन्दर स्वभाव घुले हैं। सम्बन्ध बनने से वे अपने को सब प्रकार से बड़ा हुआ मानते हैं।

कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों।
बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों॥
संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए।
एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए॥

छन्द २, दोहा ३२६ से पूर्व

जनक की प्रार्थना का आशय है: महाराज, इस राजपाट सहित हम दोनों को बिना दाम लिये हुए अपने सेवक समझिये। स्वयं को अर्पित करने में वे भाई को भी साथ रखते हैं। राज्य, उसकी व्यवस्था और अपना पद, सब उनके वाक्य में समा जाते हैं। आरम्भ में दशरथ के साथ सम्बन्ध को अपने भाग्य तथा वैभव की वृद्धि कहने वाले जनक अब उसी सम्बन्ध में अपना सर्वस्व सौंपते हैं। उनका बड़प्पन विनय की इसी भाषा में व्यक्त हो रहा है।

ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई।
अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई॥
पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए।
कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए॥

छन्द ३, दोहा ३२६ से पूर्व

बेटियों के लिये उनकी बात और कोमल हो जाती है। उस समय की सेविका वाली विनय भाषा में वे कहते हैं कि इन लड़कियों को टहलनी मानकर नयी नयी दया से पालियेगा। यह पिता की करुणा याचना है, जिसमें बेटियों को पाने वाले घर से उनके प्रति निरन्तर कृपा माँगी गयी है। फिर वे दशरथ को यहाँ बुला भेजने को अपनी ढिठाई कहते हैं और अपराध की क्षमा माँगते हैं। इतने यथोचित स्वागत के बाद भी उनकी ओर से बचा हुआ वाक्य क्षमा का है।

दशरथ भी समधी को भरपूर सम्मान देते हैं। तुलसी की छवि में जनक सम्मान के भण्डार बन जाते हैं। दोनों की परस्पर विनती कही नहीं जा सकती, क्योंकि दोनों हृदय प्रेम से भरे हैं। इस दृश्य में सम्मान लगातार लौटता है। जनक हाथ जोड़ते हैं और दशरथ उनका मान बढ़ाते हैं। देवता फूल बरसाते हैं और राजा जनवासे की ओर चल पड़ते हैं। आकाश तथा नगर में नगाड़े, जयध्वनि और वेदध्वनि के साथ आनन्द है।

फिर मुनि की आज्ञा पाकर सुन्दर सखियाँ मङ्गलगान करती हुई दूलहों को दुलहिनों सहित कोहबर की ओर लिवा चलती हैं। विवाह मण्डप की विधियाँ पूरी हो चुकी हैं और अब वर वधुओं के साथ सखियों की मण्डली है। तुलसी इस प्रस्थान के बाद किसी बड़े राजकीय दृश्य पर नहीं ठहरते। उनकी दृष्टि सीता की आँखों के पास जाती है। इतने लोगों के सामने सम्पन्न हुआ उत्सव अन्त में उस प्रियदर्शन की प्यास में सिमटता है जो देखने से और जागती है।

जनक कहते हैं कि देवता और साधु प्रेम चाहते हैं। भाई सहित वे अपने को राज्य समेत दशरथ का सेवक मानते हैं, बेटियों पर कृपा माँगते हैं और बुलाने के लिये क्षमा चाहते हैं। दशरथ भी उनका पूरा सम्मान करते हैं। राजा जनवासे जाते हैं और सखियाँ वर वधुओं को कोहबर ले चलती हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस विवाह में दर्शन का आनन्द बार बार अलग रूप में आया है। पहले सबके नेत्र राम के मुख को चन्द्रमा की तरह पी रहे थे। फिर स्त्रियों के बीच आती सीता को मन ही मन प्रणाम हुआ। वर वधू ने एक दूसरे को देखा तो उस प्रीति का भेद किसी को न मिला। भाँवरों के समय परछाहियों में भी दर्शन की लालसा और लज्जा की कल्पना उठी। अब उन्हीं दो भावों के पास कथा अपने अन्तिम दोहे में लौटती है।

पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न।
हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन॥ ३२६॥

दोहा ३२६

सीता बार बार राम को देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। बाहरी लज्जा के भीतर प्रेम अपनी निर्भय जगह बनाये हुए है। नेत्र प्रेम के प्यासे हैं और सुन्दर मछलियों की छवि को भी हर रहे हैं। बार बार देखने की क्रिया दोहे के आरम्भ में रखी गयी है, इसलिए लज्जा दृष्टि को अन्तिम विराम नहीं देती। सीता की आँखें फिर उठती हैं। मण्डप की सारी ध्वनियों के बाद यह छोटी सी गति देर तक दिखाई देती रहती है।

जनक की विनय और सीता की दृष्टि, दोनों हमें इसी उत्सव के भीतर ठहराते हैं। पिता सब देकर भी कृपा माँग रहे हैं। पुत्री अपने प्रिय को देखकर भी प्रेम की प्यासी है। जनक के लिये सम्बन्ध अपना सर्वस्व अर्पित करने की जगह बना, और सीता के लिये दर्शन मन की निर्भय प्रीति बना रहा। कथा इन दोनों भावों को पूरा समय देती है, इसलिए विवाह सम्पन्न होने की सूचना के साथ उसका आनन्द भी हमारे पास रह जाता है।

कोहबर की ओर सखियों का मङ्गलगान साथ चल रहा है। पीछे मण्डप में चार विवाहों का उत्सव सम्पन्न हुआ है, जनक और दशरथ एक दूसरे को प्रेम से सम्मान दे चुके हैं। इस पूरे समारोह की अन्तिम छवि सीता की है: लज्जा में सँभलती हुई दृष्टि, मन में अडिग प्रेम और राम को फिर देखने के लिये उठते हुए नेत्र।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३२० से ३२६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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