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मण्डप में चार विवाह

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 38

जनक का अतिथि सत्कार, मण्डप में सीता का आगमन, चारों भाइयों का विवाह। और उस सारे उत्सव के बीच बार बार राम की ओर उठती सीता की आँखें।

मण्डप में अतिथियों को आसन दिये जा रहे हैं। जनक प्रसन्न मन से ऋषियों की पूजा करके उनसे आशीर्वाद पाते हैं। वे दशरथ को ईश के समान जानकर पूजते हैं, और सब बरातियों का समधी के समान आदर करते हैं। अतिथियों में ब्राह्मणों के कपट वेष में आये देवता भी हैं। जनक उन्हें बिना पहचाने पूजते हैं, और राम उन्हें पहचानकर मन ही मन उनकी पूजा करते हैं।

आगे जनक और सुनयना राम के चरण पखारते हैं। दोनों कुलगुरु वर और कन्या की हथेलियाँ मिलाते हैं, और उसी मण्डप में चार जोड़ियाँ सोहती हैं। फिर दोनों समधियों की परस्पर विनय होती है। सखियाँ मङ्गलगान करती हुई वर वधुओं को कोहबर ले चलती हैं, और सीता बार बार राम को देखती हैं।

वेदी के चारों ओर

  • राम और सीता मण्डप में विवाह संस्कार ग्रहण करते हुए वर और वधू। उनका एक दूसरे को देखना और परस्पर प्रेम किसी को लख नहीं पड़ता।
  • जनक और सुनयना सीता के माता पिता, जो प्रेममग्न होकर दूलह के चरण पखारते हैं और विवाह की विधियाँ पूरी करते हैं।
  • दशरथ चारों पुत्रों को वधुओं सहित देखकर हर्षित राजा, जो मिली हुई वस्तुएँ याचकों में बाँट देते हैं।
  • वसिष्ठ और शतानन्द वसिष्ठ समय देखकर शतानन्द को बुलाते हैं और राजकुमारी को शीघ्र ले आने की आज्ञा देते हैं। उनकी आज्ञा से वर और दुलहिन एक आसन पर बैठते हैं। उनकी आज्ञा पाकर जनक तीनों राजकुमारियों को बुलवाते हैं। शतानन्द, जनक के पुरोहित, आदर से आते हैं और मुनि की आज्ञा पाकर प्रसन्न मन से चलते हैं। रानी उन्हीं की बात सुनती हैं।
  • भरत और माण्डवी विवाहित जोड़ी, जिसमें माण्डवी कुशकेतु की बड़ी कन्या हैं। पोद्दार की टीका कुशकेतु को कुशध्वज कहती है।
  • लक्ष्मण और उर्मिला विवाहित जोड़ी, जिसमें उर्मिला सीता की छोटी बहिन हैं।
  • शत्रुघ्न और श्रुतकीर्ति विवाहित जोड़ी, जिसकी वधू सुन्दर नेत्रों और मुख वाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर हैं।

बरातियों को समधी का सम्मान

जनक प्रसन्न मन से वामदेव आदि ऋषियों की पूजा करते हैं, सबको दिव्य आसन देते हैं, और सबसे आशीर्वाद पाते हैं।

फिर जनक दशरथ को ईश के समान जानकर उनकी पूजा करते हैं। पोद्दार की टीका ईश को महादेव बताती है। उनके मन में कोई दूसरा भाव नहीं है। वे हाथ जोड़कर विनय करते हैं, बड़ाई करते हैं, और अपने भाग्य और वैभव की बहुतायत कहते हैं। पोद्दार की टीका इसका कारण दशरथ से बना सम्बन्ध बताती है।

जनक सब बरातियों का समधी के समान सब प्रकार से आदर सहित पूजन करते हैं और सबको उचित आसन देते हैं। उस उत्साह का वर्णन एक मुख से नहीं हो सकता। दान, मान, विनती और उत्तम वाणी से वे सारी बारात का सम्मान करते हैं।

अतिथियों में विधाता, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य भी हैं, जो राम का प्रभाव जानते हैं। पोद्दार की टीका विधाता को ब्रह्मा बताती है। वे ब्राह्मणों का सुन्दर कपट वेष बनाकर बड़े सुख से विवाह की लीला देख रहे हैं। जनक उन्हें देवताओं के समान जानकर पूजते हैं, और बिना पहचाने उन्हें सुन्दर आसन देते हैं। कौन किसे पहचाने। सबको अपनी ही सुध भूली है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर दोनों ओर आनन्दमयी दशा है।

राम देवताओं को पहचान लेते हैं, और मन ही मन उनकी पूजा करके उन्हें आसन देते हैं। राम का शील और स्वभाव देखकर देवताओं को बड़ा आनन्द होता है। सबके सुन्दर नेत्र चकोर हैं और राम का मुख चन्द्रमा। सब आदर से उस छवि का पान करते हैं, और प्रेम और आनन्द कम नहीं है।

सखियों के बीच सीता

विवाह का समय देखकर वसिष्ठ शतानन्द को आदर से बुलाते हैं। वे राजकुमारी को शीघ्र ले आने की आज्ञा पाकर प्रसन्न मन से चले जाते हैं। सयानी रानी पुरोहित की बात सुनकर सखियों सहित आनन्दित होती हैं, ब्राह्मणों की पत्नियों और कुल की वृद्ध स्त्रियों को बुलाती हैं। कुल की रीति करके वे सुन्दर मङ्गलगीत गाती हैं।

श्रेष्ठ देवाङ्गनाएँ स्त्रियों के वेष में हैं, सब स्वभाव से सुन्दरी और श्यामा। पोद्दार श्यामा का अर्थ सोलह वर्ष की अवस्थावाली बताते हैं। उन्हें देखकर स्त्रियाँ सुख पाती हैं, और बिना पहचाने ही वे उन्हें प्राणों से प्रिय लगती हैं। रानी उन्हें पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के समान जानकर बार बार सम्मान देती हैं।

सीता का शृंगार किया जाता है, और स्त्रियाँ और सखियाँ मण्डली बनाकर उन्हें मण्डप की ओर लिवा चलती हैं। सुन्दरियाँ सोलहों शृंगार किये हैं, उनकी चाल मतवाले हाथियों जैसी है। उनका सुन्दर गान सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें लजा जाती हैं।

पायजेब, पैंजनी और कंकण ताल की गति पर बज रहे हैं। स्त्रियों के समूह में सहज सुहावनी सीता ऐसी सोहती हैं मानो छवि रूपी ललनाओं के बीच परम मनोहर शोभा स्वयं स्त्री के रूप में सोह रही हो।

सीता की सुन्दरता कही नहीं जाती। बुद्धि छोटी है और मनोहरता बड़ी। बराती रूप की राशि, सब प्रकार से पवित्र सीता को आते देखते हैं, और सब मन ही मन प्रणाम करते हैं। राम को देखकर सब पूर्णकाम हो जाते हैं। दशरथ पुत्रों सहित हर्षित हैं, और उनके हृदय का आनन्द कहा नहीं जाता। देवता प्रणाम करके फूल बरसाते हैं, मुनियों के आशीर्वाद की ध्वनि उठ रही है। गान और नगाड़ों का भारी कोलाहल है, और नर नारी प्रेम और आनन्द में मग्न हैं। इस प्रकार सीता मण्डप में आती हैं। मुनिराज आनन्दपूर्वक शान्तिपाठ करते हैं, और दोनों कुलगुरु उस अवसर की सब रीति, व्यवहार और कुलाचार करते हैं।

विधि में स्वयं उपस्थित देवता

आचार करके गुरु प्रसन्न होकर पार्वती, गणेश और ब्राह्मणों की पूजा कराते हैं। पोद्दार इसका एक अर्थ यह भी देते हैं कि ब्राह्मणों के द्वारा पार्वती और गणेश की पूजा करायी जाती है। देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं, और अत्यन्त सुख पाते हैं।

मधुपर्क और दूसरे माङ्गलिक द्रव्य मुनि जिस समय मन में चाहते हैं, उसी समय सेवक उन्हें सोने की परातों और कलशों में भरे लिये तैयार मिलते हैं।

सूर्य प्रेम सहित अपने कुल की सब रीतियाँ बता देते हैं, और वे सब आदर से की जाती हैं। इस प्रकार देवताओं की पूजा कराकर सीता को सुन्दर सिंहासन दिया जाता है। सीता और राम का एक दूसरे को देखना और उनका परस्पर प्रेम किसी को लख नहीं पड़ता।

जो मन, बुद्धि और श्रेष्ठ वाणी से परे है, उसे कवि कैसे प्रकट करे। हवन के समय अग्निदेव शरीर धारण करके बड़े सुख से आहुतियाँ लेते हैं, और सारे वेद ब्राह्मण का वेष धरकर विवाह की विधियाँ बताते हैं।

जनक और सुनयना के हाथों चरण प्रक्षालन

जनक की जगत् में विख्यात पटरानी, सीता की माता का बखान कैसे हो। सुयश, पुण्य, सुख और सुन्दरता सब बटोरकर विधाता ने उन्हें सँवारा है। समय जानकर श्रेष्ठ मुनि उन्हें बुलवाते हैं, और सुनते ही सुहागिनी स्त्रियाँ उन्हें आदर से ले आती हैं। सुनयना जनक की बायीं ओर ऐसी सोहती हैं मानो हिमाचल के साथ मैना हों।

सोने के कलश और मणियों की सुन्दर परातें पवित्र, सुगन्धित, मङ्गल जल से भरी हैं। राजा और रानी प्रसन्न होकर उन्हें अपने हाथों से लाकर राम के आगे रखते हैं। मुनि मङ्गल वाणी में वेदपाठ कर रहे हैं, और आकाश से फूलों की झड़ी लगती है। दूलह को देखकर दोनों अनुराग में भर जाते हैं और उनके पवित्र चरण पखारने लगते हैं। प्रेम से दोनों के शरीर में पुलकावली है। आकाश और नगर में गान, नगाड़े और जयध्वनि मानो चारों दिशाओं में उमड़ चली है।

ये वे चरणकमल हैं जो शिव के हृदय रूपी सरोवर में सदा विराजते हैं। उनके एक बार स्मरण से मन निर्मल होता है और कलियुग के सारे मल भाग जाते हैं।

उनके स्पर्श से गौतम मुनि की पत्नी अहल्या ने, जो पापमयी थीं, गति पायी। पोद्दार की टीका इसे परम गति बताती है। उन चरणकमलों का मकरन्द, जिसे टीका गङ्गा बताती है, शिव के सिर पर है, और देवता उसे पवित्रता की सीमा कहते हैं। मुनि और योगी अपने मन को भौंरा बनाकर इन चरणकमलों की सेवा करते हैं, और मनोवाञ्छित गति पाते हैं।

उन्हीं चरणों को बड़भागी जनक धो रहे हैं, और देखनेवाले जय जय कहते हैं।

हथेलियाँ मिलती हैं, गाँठ जुड़ती है

चरण पखारने के बाद दोनों कुलगुरु वर और कन्या की हथेलियाँ मिलाते हैं, और शाखोच्चार होता है, अर्थात् कुल की शाखाओं का उच्चारण। पाणिग्रहण सम्पन्न होता देखकर विधाता, देवता, मनुष्य और मुनि आनन्द से भर जाते हैं।

राजा और रानी सुख के मूल दूलह को देखते हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और हृदय हर्ष से उमड़ रहा है। जनक लोक और वेद, दोनों की विधि करके कन्यादान करते हैं।

जैसे हिमवान ने शिव को पार्वती दी थीं और समुद्र ने विष्णु को लक्ष्मी, वैसे ही जनक ने राम को सीता समर्पित कीं। विश्व में सुन्दर नयी कीर्ति फैली।

विदेह विनय कैसे करें। उस साँवली मूर्ति ने उन्हें सचमुच विदेह कर दिया है।

विधिपूर्वक हवन होता है, गठजोड़ी होती है, और भाँवरें आरम्भ होती हैं। जयध्वनि, बन्दीजनों की ध्वनि, वेदध्वनि, मङ्गलगान और नगाड़ों की ध्वनि सुनकर सुजान देवता हर्षित होते हैं और कल्पवृक्ष के फूल बरसाते हैं।

मणियों में झलकती जोड़ी और सिन्दूर

वर और कन्या सुन्दर भाँवरें दे रहे हैं, और सब आदर से नेत्रों का लाभ लेते हैं। मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता। जो उपमा कही जाय वही थोड़ी है। मणियों के खम्भों में राम और सीता की सुन्दर परछाहियाँ जगमगाती हैं।

मानो कामदेव और रति अनेक रूप धरकर राम का अनुपम विवाह देख रहे हों। उन्हें दर्शन की लालसा और संकोच कम नहीं, और वे बार बार प्रकट होते और छिपते हैं।

देखनेवाले आनन्द में मग्न होकर जनक की भाँति अपनी सुध भूल जाते हैं। मुनि प्रसन्न होकर भाँवरें पूरी कराते हैं और नेग सहित सब रीतियाँ सम्पन्न करते हैं। फिर राम सीता के सिर में सिन्दूर देते हैं।

लाल पराग से कमल को भलीभाँति भरकर साँप अमृत के लोभ से चन्द्रमा को भूषित करता है। पोद्दार इसे उपमा बताते हैं और हर अंग खोलते हैं: राम का हाथ कमल है, सिन्दूर उसका लाल पराग है। राम की श्याम भुजा साँप है, और सीता का मुख चन्द्रमा।

फिर वसिष्ठ की आज्ञा से दूलह और दुलहिन एक आसन पर बैठते हैं। राम और सीता श्रेष्ठ आसन पर बैठते हैं, और दशरथ का मन आनन्द से भर जाता है। अपने पुण्य रूपी कल्पवृक्ष में नये फल देखकर उनका शरीर बार बार पुलकित होता है। पोद्दार की टीका इस उत्साह को चौदहों भुवनों में फैला बताती है। सब कहते हैं कि राम का विवाह हो गया। इतने बड़े मङ्गल का वर्णन एक जीभ कैसे करे।

एक मण्डप में चार जोड़ियाँ

राम और सीता के बैठने के बाद जनक वसिष्ठ की आज्ञा पाते हैं। वे विवाह का सामान सँवारकर माण्डवी, श्रुतकीर्ति और उर्मिला, तीनों राजकुमारियों को बुलवाते हैं।

माण्डवी कुशकेतु की बड़ी कन्या हैं, जिन्हें पोद्दार की टीका कुशध्वज की कन्या कहती है। वे गुण, शील, सुख और शोभा की मूर्ति हैं। जनक सब रीतियाँ प्रेम सहित पूरी करके उनका विवाह भरत से करते हैं। फिर सीता की छोटी बहिन उर्मिला को सब सुन्दरियों में शिरोमणि जानकर जनक सब प्रकार से सम्मान करके उनका विवाह लक्ष्मण से करते हैं।

फिर श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से होता है। वे सुन्दर नेत्रों और सुन्दर मुख वाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर हैं। चारों दूलह और दुलहिनें अपनी अनुरूप जोड़ियों को देखकर सकुचते हुए मन में हर्षित हैं। सब प्रसन्न होकर सुन्दरता की सराहना करते हैं, और देवता फूल बरसाते हैं। अब एक मण्डप में चारों वधुएँ अपने अपने वरों के साथ विराज रही हैं।

जनकपुर के मण्डप में चारों भाई अपनी दुलहिनों के साथ बैठे हैं, बहुओं सहित बेटों को देखकर दशरथ आनन्द से भर उठे हैं और देवता फूल बरसाते हैं।

मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ अपने स्वामियों सहित विराजती हों। पोद्दार नाम खोलते हैं: जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय, और उनके स्वामी विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म।

सब पुत्रों को बहुओं सहित देखकर दशरथ ऐसे प्रसन्न हैं जैसे राजाओं के शिरोमणि को क्रियाओं सहित चारों फल मिल गये हों। पोद्दार इन क्रियाओं को यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया बताते हैं, और फलों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष।

राम के विवाह की जो विधि कही गयी, उसी रीति से सब राजकुमारों के विवाह हुए।

मण्डप से याचकों तक

दहेज की अधिकता कही नहीं जाती। सारा मण्डप सोने और मणियों से भर गया है। बहुत से कम्बल हैं, वस्त्र हैं, और भाँति भाँति के बहुमूल्य, विचित्र रेशमी कपड़े। हाथी, रथ और घोड़े भी दिये गये हैं, और गहनों से सजी गायें, जो कामधेनु के समान लगती हैं।

दास और दासियाँ भी दी गयी हैं। शेष वस्तुएँ अनेक हैं। उनकी गिनती कैसे हो, वे कही नहीं जातीं, जिन्होंने देखा वही जानते हैं। उन्हें देखकर लोकपाल सिहा उठते हैं, और दशरथ सुख मानकर सब ग्रहण करते हैं।

फिर दशरथ याचकों को वही वस्तु देते हैं जो जिसे अच्छी लगती है, और जो बचता है वह जनवासे आ जाता है।

इसके बाद जनक सारी बारात का सम्मान करके हाथ जोड़ते हैं, और कोमल वाणी में बोलते हैं।

दो समधियों की विनय

जनक आदर, दान, विनय और बड़ाई से सारी बारात का सम्मान करते हैं, और प्रेम के लाड़ से मुनियों की पूजा और वन्दना करते हैं। वे सिर झुकाकर देवताओं को प्रसन्न करते हैं, और हाथ जोड़कर सबसे कहते हैं कि देवता और साधु भाव ही चाहते हैं। अञ्जलि भर जल से समुद्र कैसे तृप्त हो सकता है। पोद्दार इसे पूर्णकाम महानुभावों की बात बताते हैं: जिन्हें किसी वस्तु की कमी नहीं, वे प्रेम से ही प्रसन्न होते हैं।

फिर जनक अपने भाई सहित हाथ जोड़कर दशरथ से बोलते हैं। वे स्नेह, शील और सुन्दर स्वभाव से भरी वाणी में कहते हैं कि सम्बन्ध से वे अब सब प्रकार से बड़े हो गये हैं।

महाराज, वे कहते हैं, इस राजपाट सहित हमें बिना दाम के लिये हुए सेवक जानियेगा।

वे कहते हैं कि इन लड़कियों को टहलनी मानकर नयी दया से पालियेगा। फिर वे अपराध की क्षमा माँगते हैं और कहते हैं कि दशरथ को बुला भेजकर उन्होंने बड़ी ढिठाई की।

दशरथ समधी जनक को सम्पूर्ण सम्मान का भण्डार कर देते हैं। दोनों की परस्पर विनती कही नहीं जाती। दोनों हृदय प्रेम से परिपूर्ण हैं। देवता फूल बरसाते हैं, और राजा जनवासे की ओर चल पड़ते हैं। नगाड़ों की ध्वनि, जयध्वनि और वेदध्वनि हो रही है, और आकाश और नगर में भला कौतूहल है।

फिर मुनि की आज्ञा पाकर सुन्दर सखियाँ मङ्गलगान करती हुई दूलहों को दुलहिनों सहित कोहबर की ओर लिवा चलती हैं।

लजाती दृष्टि, अडिग मन

सीता बार बार राम को देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुन्दर मछलियों की छवि को भी हर रहे हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 320 से 326, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।