रामचरितमानस · बालकाण्ड · ब्राह्मणों का शाप और प्रतापभानु का अंत
ब्राह्मणों का शाप और प्रतापभानु का अंत
रसोई में रचा गया छल, बिना विचार दिया गया शाप, और निर्दोष कहे जाने पर भी प्रतापभानु के कुल का विनाश। इसी कथा के अन्त में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण के जन्म आते हैं।
एक राजा भोजन परोसने को बढ़ते हैं। जिन ब्राह्मणों को उन्होंने परिवार सहित निमन्त्रण दिया है, उनके चरण धोये जा चुके हैं, वे आदर से बैठाये जा चुके हैं। उसी समय आकाश से आवाज़ आती है कि भोजन छोड़कर अपने घर चले जाइये। रसोई में ब्राह्मणों का मांस पकाया गया है। सभा उठ खड़ी होती है, राजा के मुँह से बात नहीं निकलती, और क्रोध में ऐसा शाप दिया जाता है जो उनके परिवार और अगले जन्म तक पहुँचता है। थोड़ी देर बाद उसी आकाश से दूसरी वाणी होती है: राजा ने कोई अपराध नहीं किया है।
तुलसीदास के रामचरितमानस में प्रतापभानु की यह कथा उस दूसरी वाणी को पूरा स्थान देती है। ब्राह्मण भी अन्त में उनका दोष नहीं मानते, फिर भी शाप को टाला नहीं जा सकता। हम एक ऐसे विनाश के सामने हैं जिसके बीच निर्दोषता की घोषणा सुनायी देती रहती है। पर भोजन की उस घड़ी तक पहुँचने से पहले छल की पूरी व्यवस्था देखनी होगी। किसी ने राजा को घर पहुँचाया है, असली पुरोहित को गायब किया है, उनका रूप धर लिया है, और राजा उसी छद्म को अपने विश्वास की पुष्टि समझ रहे हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- प्रतापभानु राजा, जिनके निमन्त्रण पर ब्राह्मण भोजन के लिये आते हैं और जिनकी निर्दोषता घोषित होने पर भी शाप प्रभावी रहता है।
- कपटी तपस्वी राजा राक्षस का मित्र, जो सारी बात उसे सुनाता है और बाद में राजाओं को पत्र भेजकर आक्रमण कराता है।
- कालकेतु माया से पुरोहित का रूप धरनेवाला राक्षस। पोद्दार जी की टीका पहली आकाशवाणी भी इसी की बताती है।
- पुरोहित राजा के वास्तविक पुरोहित, जिन्हें पहाड़ की खोह में छिपाकर उनके स्थान पर राक्षस आ बैठता है।
- ब्राह्मण परिवार सहित आमन्त्रित अतिथि, जो क्रोध में शाप देते हैं और बाद में राजा का दोष न होने की बात स्वीकार करते हैं।
- अरिमर्दन और धर्मरुचि राजा के छोटे भाई और मन्त्री। आगे अरिमर्दन कुम्भकर्ण तथा धर्मरुचि विभीषण होते हैं।
मित्र से मिलकर प्रसन्न हुआ तपस्वी
कथा के आरम्भ में प्रसन्नता है, और वह प्रसन्नता प्रतापभानु की नहीं है। तपस्वी बने हुए राजा अपने मित्र को देखते ही उठकर मिलते हैं। मन सुखी हो जाता है। वह मित्र राक्षस है। तपस्वी उसे सारी कथा सुनाते हैं, और सुनकर राक्षस भी आनन्दित होता है। दोनों की प्रसन्नता एक ही दिशा में लगी है: प्रतापभानु को उनके कुल सहित मिटाना। जिनके बीच यह बातचीत हो रही है, उनके लिये आनेवाला अनर्थ अभी सफलता का समाचार है।
तापस नृप निज सखहि निहारी । हरषि मिलेउ उठि भयउ सुखारी॥
चौपाई १
मित्रहि कहि सब कथा सुनाई । जातुधान बोला सुख पाई॥
राक्षस अपने मित्र को आश्वस्त करता है कि मेरी सलाह के अनुसार इतना काम हो गया, तो शत्रु अब वश में ही समझिये। आगे की चिन्ता छोड़कर सो रहिये। इस भरोसे के लिये वह रोग और औषधि की बात लाता है। विधाता ने बिना दवा के रोग दूर कर दिया, यही उसे इस समय लग रहा है। किसी मनुष्य का पूरा कुल उसके लिये रोग है और उसके नाश का अवसर रोग मिट जाने का सुख। उस एक उपमा से उसके आनन्द का अर्थ खुल जाता है।
फिर वह समय बाँध देता है। शत्रु को कुल समेत जड़ से उखाड़कर चौथे दिन आ मिलूँगा। काम अभी होना है, पर वचन ऐसे देता है जैसे उसका पूरा होना निश्चित हो। प्रतापभानु को अपने आगे आनेवाले दिनों का पता नहीं; यहाँ उनके शत्रु उन्हीं दिनों की गणना कर रहे हैं। तपस्वी को खूब सन्तोष देकर राक्षस विदा होता है। जाते हुए उसका परिचय भी दो बातों के साथ मिलता है: भारी कपट और अत्यन्त क्रोध। दिलासा देनेवाले इस मित्र के भीतर वही क्रोध काम कर रहा है जिससे दूसरे राजा का सर्वनाश होना है।
कुल समेत रिपु मूल बहाई । चौथें दिवस मिलब मैं आई॥
चौपाई २
तापस नृपहि बहुत परितोषी । चला महाकपटी अतिरोषी॥
इस भेंट में काम बँटते हुए दिखते हैं। तपस्वी बात सुना चुके हैं, राक्षस आगे की जिम्मेदारी लेकर चल पड़ा है। अब जो कुछ प्रतापभानु को असाधारण सामर्थ्य का प्रमाण लगेगा, उसका करनेवाला हमें पहले ही दिखा दिया गया है। आगे राजा आश्चर्य करेंगे और श्रद्धा बढ़ायेंगे; हम उस आश्चर्य के पीछे खड़े हाथ को पहचानते रहेंगे। इसी से उनकी हर प्रसन्नता पढ़ते हुए मन में खटकती है। जिस सहायता पर वे भरोसा करने जा रहे हैं, उसमें उनके विरोधियों का समझौता लगा हुआ है।
तपस्वी राजा और राक्षस प्रसन्न होकर मिलते हैं। राक्षस शत्रु को कुल सहित नष्ट करके चौथे दिन लौटने का आश्वासन देता है और आगे का छल करने निकलता है।
घर पहुँचे राजा, खोह में पहुँचे पुरोहित
राक्षस प्रतापभानु को उनके घोड़े सहित क्षण भर में घर पहुँचा देता है। राजा को रानी के पास सुलाता है और घोड़े को घुड़साल में अच्छी तरह बाँध देता है। व्यवस्था इतनी पूरी है कि लौटनेवाले के साथ उसका घोड़ा भी अपने स्थान पर मिलता है। राजा के जागने तक पहुँचने का काम हो चुका है। वह अपने भवन को देखेंगे, अपने लौटने की क्रिया को नहीं। उनके लिये उस असम्भव लगती वापसी का कारण अनुमान से ही तय होगा।
इसके बाद राक्षस असली पुरोहित को उठा ले जाता है। माया से उनकी बुद्धि भ्रमित करके पहाड़ की खोह में रख देता है। जिस व्यक्ति का रूप लिया जाना है, उसे पहले उसके घर से हटाया गया है। वहाँ से लौटकर राक्षस स्वयं पुरोहित का रूप बनाता है और उनकी सुन्दर सेज पर जा लेटता है। राजा के घर में राजा रख दिये गये हैं, पुरोहित के घर में उनका छद्म रखा गया है, और असली पुरोहित उस खोह में हैं जहाँ से इस षड्यन्त्र को रोकने के लिये कोई सूचना नहीं आती।
राजा के उपरोहितहि हरि लै गयउ बहोरि।
दोहा १७१
लै राखेसि गिरि खोह महुँ मायाँ करि मति भोरि॥ १७१॥
प्रतापभानु सबेरा होने से पहले जागते हैं। अपना घर देखकर बड़ा आश्चर्य होता है। वे मन में मुनि की महिमा का अनुमान करते हैं और इतनी धीरे उठते हैं कि रानी न जान पावें। फिर उसी घोड़े पर बैठकर वन को चले जाते हैं। नगर का कोई स्त्री या पुरुष उनके जाने को नहीं जानता। उनके लौटने का एक भेद था, अब उनका निकलना भी चुपचाप होता है। मन में जिस महिमा को मान रहे हैं, उसकी ओर उनका विश्वास और सिमटता जाता है।
दो पहर बीतने पर राजा आते हैं। अब घर घर उत्सव होता है और बधावे बजते हैं। भीतर की गुप्त बात और बाहर का उत्सव एक साथ चल रहे हैं। पुरोहित को देखकर राजा उसी कार्य का स्मरण करते हैं और आश्चर्य से देखते रह जाते हैं। उन्हें पुरोहित के रूप में खड़े व्यक्ति की पहचान पहले से बनी हुई आशा के अनुसार करनी है। हम जानते हैं कि वास्तविक पुरोहित वहाँ हैं ही नहीं; राजा को जो रूप दिख रहा है, उसी में उनके विश्वास का अगला संकेत छिपा है।
तीन दिन राजा को युग के समान बीतते हैं। उनकी बुद्धि कपटी मुनि के चरणों में लगी रहती है। समय आने पर पुरोहित बना राक्षस पहुँचता है और गुप्त सलाह के अनुसार सारी बातें समझा देता है। प्रतापभानु उस रूप में गुरु को पहचानकर हर्षित होते हैं। यहाँ पहचान का शब्द बड़े दुःख के साथ आया है। उनका हर्ष किसी नये संदेह को स्थान नहीं देता; वे भ्रम में हैं, उन्हें चेत नहीं होता। इसी दशा में वे एक लाख श्रेष्ठ ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित तुरन्त निमन्त्रण दे देते हैं।
नृप हरषेउ पहिचानि गुरु भ्रम बस रहा न चेत।
दोहा १७२
बरे तुरत सत सहस बर बिप्र कुटुंब समेत॥ १७२॥
राक्षस राजा और घोड़े को घर पहुँचाता है, वास्तविक पुरोहित को खोह में छिपाता है और उनका रूप धर लेता है। राजा कपटी मुनि की महिमा मानते रहते हैं और समय आने पर एक लाख ब्राह्मणों को परिवार सहित बुलाते हैं।
आदर से बैठी पंगत और पहली आकाशवाणी
पुरोहित के रूप में वही राक्षस जेवनार तैयार करता है। तुलसी छः रस और चार प्रकार का भोजन कहते हैं, जैसा श्रुति में गाया गया है। फिर उसी रसोई को मायामयी बताते हैं। व्यञ्जन इतने हैं कि कोई गिन नहीं सकता। अतिथियों के लिये जो सामने आयेगा, उसमें भरपूर भोजन और शास्त्रीय रीति का आभास है। अभी घर घर उत्सव हुआ था; अब बड़ी संख्या में बुलाये गये परिवारों के लिये इतनी बड़ी रसोई तैयार हो रही है। राजा का विश्वास उसी तैयारी में लगा हुआ है।
उपरोहित जेवनार बनाई । छरस चारि बिधि जसि श्रुति गाई॥
चौपाई ३
मायामय तेहिं कीन्हि रसोई । बिंजन बहु गनि सकइ न कोई॥
पर उस भोजन के भीतर राक्षस क्या कर रहा है, यह भी साफ कहा गया है। वह कई प्रकार के पशुओं का मांस पकाता है और उसमें ब्राह्मणों का मांस मिला देता है। इस मिलावट को करनेवाला दुष्ट वही है जो पुरोहित बना बैठा है। राजा के विरुद्ध जो आरोप आगे उठेगा, उसका काम राक्षस अपने हाथ से कर चुका है। अतिथियों को बुलानेवाले और उनके लिये रसोई दूषित करनेवाले दो अलग व्यक्ति हैं। थोड़ी ही देर में सभा का क्रोध इस अन्तर को देखे बिना राजा पर पड़ेगा।
सब ब्राह्मण भोजन के लिये बुलाये जाते हैं, उनके चरण धोये जाते हैं और वे आदर सहित बैठाये जाते हैं। इन क्रियाओं के बाद राजा परोसने लगते हैं। तुलसी उस क्षण को अलग पकड़ते हैं, जैसे ही परोसना आरम्भ हुआ, उसी समय आकाशवाणी हुई। अतिथि पहुँच चुके हैं, उनका सत्कार हो चुका है, राजा स्वयं सेवा में आगे हैं। आरोप इसी तैयार पंगत के सामने आयेगा, जहाँ भोजन कराने का सारा दृश्य राजा के साथ जुड़ा दिखाई पड़ रहा है।
परुसन जबहिं लाग महिपाला । भै अकासबानी तेहि काला॥
चौपाई ४
बिप्रबृंद उठि उठि गृह जाहू । है बड़ि हानि अन्न जनि खाहू॥
वाणी ब्राह्मणों को उठकर अपने घर जाने को कहती है। यह अन्न न खाइये, इसमें बड़ी हानि है, रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है। पोद्दार जी इस पहली आकाशवाणी को कालकेतु द्वारा की गयी बताते हैं। यह पहचान इस घड़ी का कपट खोल देती है। जिसने रसोई दूषित की, उसी ने उसे खाने से रोकनेवाली सूचना भी दी। दूषण सच है; उसे सुनाने का समय और ढंग भी उसी राक्षस की योजना का अंग है। उसके कहे पर विश्वास करके सब ब्राह्मण उठ खड़े होते हैं।
राजा व्याकुल हैं। उनकी बुद्धि मोह में भूली हुई है, और होनहार के वश मुँह से एक बात भी नहीं निकलती। अभी तक वे संकेत समझकर हर्षित हो रहे थे; अब सामने उठी हुई सभा के बीच अपनी बात कहने में असमर्थ हैं। इस मौन को अपराध स्वीकार करना नहीं कहा गया। तुलसी उसका कारण मोह और भावी में रखते हैं। पंगत को जो सूचना मिली, उसका उत्तर राजा की ओर से तत्काल नहीं आता, और इसी अन्तराल में ब्राह्मण क्रोध से बोल पड़ते हैं।
पुरोहित बना राक्षस भोजन में ब्राह्मणों का मांस मिलाता है। राजा के परोसते समय पहली आकाशवाणी भोजन छोड़ने को कहती है, जिसे टीका कालकेतु की बताती है। ब्राह्मण उठ खड़े होते हैं और व्याकुल राजा कुछ कह नहीं पाते।
क्रोध में दिया गया शाप
ब्राह्मणों के बोलने से पहले तुलसी दो बातें कह देते हैं: वे क्रोध में हैं और उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया। शाप का वाक्य इसके बाद आता है। उसे पढ़ते हुए यह आरम्भ साथ रहना चाहिये, क्योंकि थोड़ी देर में दूसरी आकाशवाणी भी इसी अविचार की ओर लौटेगी। अभी ब्राह्मणों ने राजा से वृत्तान्त नहीं सुना है, रसोई का हाल देखने राजा भी नहीं गये हैं। जो हुआ है, वह पहली सूचना पर विश्वास और उसके तुरन्त बाद उठी हुई क्रुद्ध प्रतिक्रिया है।
बोले बिप्र सकोप तब नहिं कछु कीन्ह बिचार।
दोहा १७३
जाइ निसाचर होहु नृप मूढ़ सहित परिवार॥ १७३॥
वे राजा को मूर्ख कहते हैं और परिवार सहित राक्षस होने का शाप देते हैं। जिस परिवार को निमन्त्रण के आदर में साथ बुलाया गया था, अब उसी पारिवारिक विस्तार में विनाश की बात कही जा रही है। आरोप यह है कि राजा ने ब्राह्मणों को उनके समुदाय सहित नष्ट करना चाहा था। ब्राह्मण अपने बचने को ईश्वर द्वारा धर्म की रक्षा मानते हैं। वे राजा को क्षत्रिय कुल का कलंक कहते हुए घोषणा करते हैं कि अब उनका अपना परिवार नष्ट होगा। यह राजा की इच्छा के विषय में उनका आरोप है; इस समय क्रोध उसी आरोप को निश्चित जानकर बोल रहा है।
शाप अगले जन्म तक पहुँचकर वर्तमान जीवन की अवधि भी बाँध देता है। एक वर्ष के भीतर नाश होगा। कुल में जल देनेवाला कोई नहीं बचेगा। राक्षस बनने की बात के साथ यह दूसरी कठोरता है: राजपरिवार का अन्त इतना पूरा होगा कि पीछे जल अर्पित करनेवाला भी न रहे। पहले षड्यन्त्रकारी ने शत्रु को जड़ से उखाड़ने का वचन दिया था। अब अतिथियों के मुँह से कुल का पूरा विनाश निकल रहा है। राजा के विरोधी जिस काम के लिये चले थे, उसी की घोषणा उनके अपने घर में हो रही है।
संबत मध्य नास तव होऊ। जलदाता न रहिहि कुल कोऊ॥
चौपाई ५
नृप सुनि श्राप बिकल अति त्रासा। भै बहोरि बर गिरा अकासा॥
शाप सुनकर राजा अत्यन्त भयभीत और व्याकुल होते हैं। इस भय के तुरन्त बाद फिर आकाश से सुन्दर वाणी होती है। पहली बार बोलनेवाली आवाज़ ने भोजन से उठने को कहा था; इस बार वाणी का सम्बोधन शाप देनेवाले ब्राह्मणों की ओर है। पहले अन्न में रखे गये दूषण की सूचना थी, अब राजा के कर्म का प्रश्न सामने आनेवाला है। इन दोनों को एक ही घोषणा मान लें तो बीच में दिया जा चुका शाप और उसके बाद खुलता सत्य, दोनों का क्रम खो जाता है।
बिना विचार किये ब्राह्मण राजा को परिवार सहित राक्षस होने और एक वर्ष में कुल सहित नष्ट होने का शाप देते हैं। भय से व्याकुल राजा के सामने इसके बाद दूसरी आकाशवाणी होती है।
राजा ने कोई अपराध नहीं किया
दूसरी आकाशवाणी साफ कहती है कि ब्राह्मणों ने सोचकर शाप नहीं दिया और राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया। यहाँ प्रतापभानु अपनी ओर से सफाई नहीं दे रहे। वे तो शाप के भय से व्याकुल हैं। उनकी निर्दोषता का वाक्य आकाश से आता है और सुननेवाले सभी ब्राह्मण चकित रह जाते हैं। राजा के विरुद्ध जो निश्चितता अभी इतनी कठोर होकर बोली थी, उसके सामने अब उसी राजा का अपराधरहित होना रखा गया है।
बिप्रहु श्राप बिचारि न दीन्हा । नहिं अपराध भूप कछु कीन्हा॥
चौपाई ६
चकित बिप्र सब सुनि नभबानी। भूप गयउ जहँ भोजन खानी॥
इसके बाद राजा उस स्थान पर जाते हैं जहाँ भोजन बना था। वहाँ न भोजन है, न रसोइया ब्राह्मण। जिस भरी रसोई में अगणित व्यञ्जन तैयार हुए थे, वह अब सामने नहीं मिलती। जिस पुरोहित पर काम का भरोसा किया गया था, वह भी नहीं मिलता। राजा लौटते हैं तो मन में अपार चिन्ता है। उनके लिये अब छल का सामना केवल सुनी हुई बात से नहीं है; वे स्वयं भोजन और उसे बनानेवाले, दोनों की अनुपस्थिति देखकर आये हैं।
लौटकर प्रतापभानु ब्राह्मणों को सब वृत्तान्त सुनाते हैं। जो बात परोसने की घड़ी में मुँह से नहीं निकली थी, वह अब कही जाती है। फिर वे बहुत भयभीत और व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं। कथा में इस समय उनकी राजसी स्थिति कोई रक्षा नहीं कर रही। अतिथि उठ चुके हैं, भोजन गायब है, विश्वास का आधार बना व्यक्ति भी गायब है, और शाप सुन चुके राजा उन्हीं ब्राह्मणों के सामने अपना सारा हाल कहकर धरती पर पड़े हैं।
ब्राह्मणों का उत्तर राजा के दोष और उनके भाग्य को अलग रखता है। वे कहते हैं कि यद्यपि आपका दोष नहीं है, होनहार नहीं मिटती। ब्राह्मणों का शाप अत्यन्त भयानक है और उसे किसी तरह पलटा नहीं जा सकता। यह स्वीकार उसी समूह की ओर से है जिसने अभी राजा को सबके नाश का इच्छुक कहा था। अब राजा निर्दोष माने गये हैं। फिर भी कही जा चुकी बात का फल रोक देने का आश्वासन नहीं मिलता।
भूपति भावी मिटइ नहिं जदपि न दूषन तोर।
दोहा १७४
किएँ अन्यथा होइ नहिं बिप्रश्राप अति घोर॥ १७४॥
इस दोहे में दोनों बातें एक साथ बनी रहती हैं। दोष नहीं है, और भावी नहीं मिटती। शाप का बने रहना राजा के अपराध का प्रमाण नहीं बन जाता, क्योंकि उसी वाक्य में उनका दोष न होना कहा गया है। कथा हमें इस कठिन स्थिति के सामने ठहराती है। प्रतापभानु के साथ छल हुआ, उनके मुँह से समय पर बात नहीं निकली, ब्राह्मणों ने विचार किये बिना शाप दिया, और सत्य प्रकट होने पर भी विनाश का क्रम नहीं लौटता। किसी एक बात को हटा दें तो उनका दुःख आसान लगने लगेगा; तुलसी इन सबको पास रखकर चलते हैं।
पहली वाणी सुनकर ब्राह्मण उठे थे। दूसरी सुनकर वे चकित हुए। फिर राजा की बात सुनकर उन्होंने दोष न होना स्वीकार किया। सुनने की इन तीन घड़ियों के बीच उनका निर्णय बदलता हुआ मिलता है, पर शाप वापस नहीं होता। यही देर इस प्रसंग को इतना कठोर बनाती है। पहचान सुधर गयी है, प्रतापभानु का पक्ष सामने आ गया है, और फिर भी उनके लिये भविष्य का वही भयानक वचन रह गया है।
दूसरी आकाशवाणी राजा को अपराधरहित कहती है। रसोई और रसोइया गायब मिलते हैं; राजा सब हाल सुनाकर धरती पर गिर पड़ते हैं। ब्राह्मण उनका दोष न होना मानते हैं, पर शाप अटल बताते हैं।
नगर का शोक और शत्रुओं का घेरा
इतना कहकर ब्राह्मण चले जाते हैं। नगरवासियों को समाचार मिलता है तो वे चिन्ता करते हैं और विधाता को दोष देते हैं। अभी इसी नगर में घर घर उत्सव था। अब उसके राजा के लिये ऐसा भविष्य कहा गया है जिसमें कुल का कोई व्यक्ति शेष नहीं रहेगा। नगर के लोगों की प्रतिक्रिया भी राजा पर दोष लगाने की नहीं है। वे विधाता के काम को उलटा हुआ देखते हैं और अपनी पीड़ा हंस तथा कौए की उपमा में कहते हैं।
उनकी दृष्टि में विधाता ने हंस बनाते बनाते कौआ कर दिया। पोद्दार जी इस चित्र का आशय खोलते हैं: ऐसे पुण्यात्मा राजा को देवता बनना चाहिये था, उन्हें राक्षस बना दिया गया। नगरवासियों का शोक इसलिये भी चुभता है कि जिस राजा को वे इस योग्य समझते हैं, उसी के लिये राक्षस जन्म घोषित हो चुका है। शाप देनेवालों का दोष न मानना और प्रजा का यह दुःख, दोनों प्रतापभानु के विनाश को उनकी दुर्जनता का सरल परिणाम समझने से रोकते हैं।
उधर छल करनेवाला अपना अगला काम करता है। कालकेतु असली पुरोहित को उनके घर पहुँचा देता है और तपस्वी को समाचार देता है। इस लौटाने पर कथा अधिक नहीं ठहरती, पर क्रम में इसका अपना स्थान है। जिसे हटाकर पुरोहित का रूप लिया गया था, अब वह व्यक्ति वापस आ गया। राजा को भ्रम में रखने का काम पूरा हो चुका है। इस समय तक दण्ड का वचन निकल चुका है और प्रतापभानु का नगर शोक में है।
समाचार पाकर कपटी तपस्वी जहाँ तहाँ पत्र भेजता है। पोद्दार जी जिन राजाओं को प्रतापभानु के वैरी बताते हैं, वे सेना सजा सजाकर दौड़ पड़ते हैं। छल की रसोई के बाद अब युद्ध की तैयारी है। पत्रों का फल सेनाओं के रूप में पहुँचता है। वे नगाड़े बजाकर नगर को घेर लेते हैं और प्रतिदिन अनेक प्रकार से लड़ाई होती है। विनाश के लिये जो शाप कहा गया था, उसके बीच मनुष्यों की चेष्टा भी दिखाई देती है: किसी ने समाचार पहुँचाया, किसी ने पत्र भेजे, और राजाओं ने आकर घेरा डाला।
घेरेन्हि नगर निसान बजाई । बिबिध भाँति नित होइ लराई॥
चौपाई ७
जूझे सकल सुभट करि करनी । बंधु समेत परेउ नृप धरनी॥
प्रतापभानु के सभी योद्धा शूरवीरों के योग्य पराक्रम करके युद्ध में मारे जाते हैं। राजा भी अपने भाई सहित रण में गिरते हैं। सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचता। यहाँ कवि ब्राह्मणों के शाप के सत्य होने की बात कहते हैं। जिन शब्दों में कुल के अन्त की घोषणा हुई थी, युद्ध का फल उन्हीं तक पहुँचता है। राजा का भय, नगर का शोक और सैनिकों का पराक्रम, सभी इस मृत्युक्रम में समा जाते हैं।
विजेता राजा शत्रु को जीतकर नगर बसाते हैं और विजय का यश लिये अपने अपने नगरों को लौट जाते हैं। कथा पराजित कुल और लौटते विजेताओं, दोनों को दिखाती है। एक ओर सत्यकेतु का कोई वंशज शेष नहीं; दूसरी ओर वही नगर फिर बसाया गया है। नगर का जीवन आगे चल सकेगा, पर प्रतापभानु और उनके भाई उस लौटती हुई दिनचर्या में नहीं होंगे। जिनके लिये सेनाएँ आयी थीं, उनका काम पूरा हुआ और वे प्रस्थान कर गये।
नगरवासी विधाता को दोष देते हैं। कालकेतु पुरोहित को लौटाकर तपस्वी को खबर देता है; उसके पत्रों पर राजा सेनाएँ लेकर घेरते हैं। प्रतापभानु, उनके भाई और योद्धा रण में मारे जाते हैं, सत्यकेतु का कुल समाप्त होता है।
धूल, पिता और रस्सी
युद्ध और विजेताओं के लौटने के बाद भरद्वाज को सम्बोधित करता हुआ दोहा आता है। पोद्दार जी यहाँ वक्ता याज्ञवल्क्य को बताते हैं। वे कहते हैं कि विधाता जब किसी के विपरीत होते हैं, तब उसके लिये धूल सुमेरु के समान, पिता यम के समान और रस्सी साँप के समान हो जाती है। प्रतापभानु का वृत्तान्त सुनाते हुए यह कथन ठीक उस स्थान पर आता है जहाँ उनका जीवन समाप्त हो गया है और अगले जन्म की बात अभी कही जानी है।
भरद्वाज सुनु जाहि जब होइ बिधाता बाम।
दोहा १७५
धूरि मेरुसम जनक जम ताहि ब्यालसम दाम॥ १७५॥
तीनों उपमाओं में रोज़ पहचानी हुई वस्तु का फल भयावह हो गया है। धूल में पर्वत का भारीपन आ गया, पिता में यम की कठोरता और रस्सी में सर्प का भय। टीका इनका आशय कुचल डालने, कालरूप होने और काट खाने तक खोलती है। इतने छोटे दोहे में प्रतिकूलता केवल बाहर से आयी कोई नयी विपत्ति नहीं रहती। जो हल्का था, जो निकट का सम्बन्ध था, जो साधारण वस्तु थी, वही विपत्ति का रूप ले लेता है।
राजा की अभी सुनी कथा में भी परिचित रूपों पर रखा भरोसा बार बार दुखद हुआ। अपना भवन देखकर मुनि की महिमा मानी गयी। परिचित पुरोहित का रूप देखकर गुरु पहचाने गये। आदर से बैठाये गये अतिथियों के सामने भोजन परोसने की घड़ी में शाप मिला। दोहा इन घटनाओं को फिर से गिनाता नहीं; तीन उपमाओं में उस दशा का भार रख देता है जिसमें अपने आसपास की वस्तुओं और सम्बन्धों से मिलनेवाला सहारा उलट जाता है।
यह कहते हुए भी राजा के निर्दोष होने की पहले कही बात मिटती नहीं। विधाता की प्रतिकूलता इसीलिये यहाँ इतनी तीखी सुनायी देती है कि अपराध का अभाव घोषित हो चुका है। नगरवासियों ने भी विधाता को ही दोष दिया था। अब कथा सुनानेवाले उसी प्रतिकूलता को भरद्वाज के सामने रखते हैं। युद्ध समाप्त हो गया है, पर उसका दुःख अगले जन्म का परिचय सुनने से पहले इस दोहे में ठहरता है।
भरद्वाज से कहा जाता है कि विधाता के प्रतिकूल होने पर धूल पर्वत, पिता यम और रस्सी साँप के समान हो जाती है। प्रतापभानु के अन्त और उनके अगले जन्म के बीच यह दोहा रखा गया है।
वही राजा रावण हुए
इसके बाद सम्बोधन फिर आता है, हे मुनि, सुनिये। समय पाकर वही राजा अपने समाज सहित राक्षस होते हैं। प्रतापभानु की मृत्यु पर उनका वृत्तान्त समाप्त नहीं हुआ था; ब्राह्मणों का शाप राक्षस जन्म की बात भी कह चुका था। अब उस जन्म का नाम मिलता है। राजा रावण हुए, दस सिर और बीस भुजाओंवाले, बड़े प्रचण्ड शूरवीर। यह परिचय उनके शरीर और बल को सामने लाता है और पिछले जीवन के राजा से उनका सम्बन्ध भी साथ बाँध देता है।
काल पाइ मुनि सुनु सोइ राजा। भयउ निसाचर सहित समाजा॥
चौपाई ८
दस सिर ताहि बीस भुजदंडा । रावन नाम बीर बरिबंडा॥
दस सिर और बीस भुजाएँ गिनकर तुलसी उस नये रूप को पहचानने योग्य बना देते हैं। कुछ ही चौपाइयों पहले प्रतापभानु अपने भाई सहित रण में गिरे थे। अब समय बीतने के साथ उनका दूसरा जन्म कहा जा रहा है। बीच की अवधि का कोई और हिसाब नहीं दिया गया। कथा के लिये यहाँ आवश्यक सम्बन्ध यही है कि जिनके लिये राक्षस होने का वचन निकला था, वही प्रतापभानु रावण नाम के प्रबल वीर हुए।
फिर छोटे भाई का परिचय मिलता है। उनका नाम अरिमर्दन था; वे बल के धाम कुम्भकर्ण हुए। राजा के साथ रण में भाई का गिरना पहले कहा गया था। अब अगले जन्म में भी भाई का सम्बन्ध बना हुआ है और साथ में उनका अपना नाम तथा बल का परिचय है। तुलसी दोनों को एक साथ अज्ञात राक्षस कहकर आगे नहीं बढ़ते। रावण और कुम्भकर्ण के नाम अलग अलग रखते हैं, जिससे पहले जीवन के दोनों भाइयों को हम नये रूप में पहचान सकें।
भूप अनुज अरिमर्दन नामा । भयउ सो कुंभकरन बलधामा॥
चौपाई ९
सचिव जो रहा धरमरुचि जासू । भयउ बिमात्र बंधु लघु तासू॥
तीसरा परिचय मन्त्री का है। प्रतापभानु के मन्त्री धर्मरुचि थे। वे रावण के छोटे सौतेले भाई हुए। पिछले जन्म में जो सम्बन्ध शासन के काम का था, अगले जन्म में वही व्यक्ति परिवार का सदस्य है। पोद्दार जी भी इस सम्बन्ध को सौतेला छोटा भाई ही कहते हैं। इस परिचय में नाम अभी आनेवाला है, पर सम्बन्ध पहले स्पष्ट हो गया है। छोटे होने और दूसरी माता से होने, दोनों बातों को चौपाई साथ रखती है।
नाम बिभीषन जेहि जग जाना। बिष्नुभगत बिग्यान निधाना॥
चौपाई १०
रहे जे सुत सेवक नृप केरे । भए निसाचर घोर घनेरे॥
उनका नाम विभीषण हुआ, जिन्हें सारा जगत् जानता है। उनका अगला परिचय विष्णुभक्त और ज्ञान विज्ञान के भण्डार का है। यह बात इस राक्षस जन्म के वृत्तान्त के बीच पूरी स्पष्टता से लिखी गयी है। रावण की प्रचण्ड वीरता कही गयी, कुम्भकर्ण का बल कहा गया, और विभीषण की भक्ति तथा विज्ञान कहा गया। तीन व्यक्तियों की पहचान तीन अलग विशेषताओं के साथ खुलती है। विभीषण का नाम आते ही उसी पंक्ति में उनका विष्णु के प्रति प्रेम दिखाई देता है।
प्रतापभानु दस सिर और बीस भुजाओंवाले रावण हुए। छोटे भाई अरिमर्दन कुम्भकर्ण और मन्त्री धर्मरुचि रावण के सौतेले छोटे भाई विभीषण हुए, जिन्हें तुलसी विष्णुभक्त और ज्ञान विज्ञान का भण्डार कहते हैं।
पवित्र कुल और शाप का प्रभाव
विभीषण का परिचय देकर चौपाई राजा के पुत्रों और सेवकों की ओर जाती है। वे सब बहुत से भयानक राक्षस हुए। आगे उनके स्वभाव का वर्णन है: अनेक जातियों के, मनचाहा रूप धारण करनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर और विवेक से रहित। रूप बदल सकने की शक्ति के साथ विवेक का अभाव भी कहा गया है। पहली रसोई में पुरोहित का रूप धरे राक्षस का छल हम देख चुके हैं; अब इस बड़े राक्षस समुदाय के परिचय में रूप धारण करने की सामर्थ्य और कुटिलता फिर साथ आती हैं।
उनमें दया नहीं है। वे हिंसक, पापी और संसार को दुःख देनेवाले हैं। तुलसी कहते हैं कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। यहाँ बहुत से पुत्रों और सेवकों का समूह सामने है, जिनकी अलग नामावली नहीं दी गयी। इतने तीखे सामूहिक वर्णन के पास ही विभीषण का विष्णुभक्त होना रखा गया है। उनके लिये कही गयी भक्ति को साथ पढ़ते हुए हम आगे बढ़ते हैं, क्योंकि वह उनका स्पष्ट व्यक्तिगत परिचय है।
अन्तिम दोहा जन्म के कुल का नाम बताता है: पुलस्त्य का पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल। राक्षसों के इस जन्म के लिये ऐसा कुल कहा गया है, जिसके गुण तीन शब्दों में आदर से रखे गये हैं। फिर भी ब्राह्मणों के शाप के वश वे सब पापरूप हुए। कुल की पवित्रता और शाप का फल, दोनों एक दोहे में आते हैं। जिस कठिन साथ को हमने प्रतापभानु की निर्दोषता और उनके विनाश में देखा, अन्त में जन्म के श्रेष्ठ कुल और शाप के प्रभाव के रूप में फिर वैसी ही कठिन बात सामने रहती है।
उपजे जदपि पुलस्त्यकुल पावन अमल अनूप।
दोहा १७६
तदपि महीसुर श्राप बस भए सकल अघरूप॥ १७६॥
यहाँ तक आते आते रसोई की घटना का फैलाव एक पूरे अगले जन्म तक पहुँच चुका है। पहले राजा को परिवार सहित राक्षस होने के लिये कहा गया था। अब उस जन्म का कुल, राजा का नया नाम, भाई और मन्त्री के नये नाम, तथा पुत्रों और सेवकों की दशा सामने है। अन्तिम दोहे का व्यापक कथन अपने स्थान पर है और विभीषण के विष्णुभक्त होने की स्पष्ट पंक्ति अपने स्थान पर। इन दोनों को साथ रखकर ही इस प्रसंग का अन्त पूरा सुनायी देता है।
राजा के पुत्र और सेवक भयानक, हिंसक राक्षस हुए। अन्तिम दोहा पुलस्त्य कुल की पवित्रता के साथ शापवश पापरूप होने का सामूहिक कथन रखता है; विभीषण का विष्णुभक्त होना इससे पहले स्पष्ट कहा जा चुका है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस कथा से लौटते हुए सबसे पहले वह अन्तर मन में रह जाता है जो भोजन के दूषित होने और राजा के दोषी होने के बीच था। भोजन में ब्राह्मणों का मांस सचमुच मिलाया गया था। उस काम का करनेवाला पुरोहित बना राक्षस था। पहली सूचना सही दूषण बताती है और ब्राह्मण उसी से राजा की इच्छा तय कर लेते हैं। तुलसी का बिना विचार करनेवाला वाक्य ठीक इसी छलाँग के सामने खड़ा है। बाद में राजा का अपराधरहित होना साफ होता है, पर शाप पहले ही दिया जा चुका है।
दूसरी बात उस बोल न पाने की घड़ी की है। प्रतापभानु का मौन उनके विरुद्ध पढ़ा जा सकता था, पर कथा उनके भीतर का मोह और होनहार का दबाव भी कहती है। बाद में वे सब हाल सुनाते हैं। हम किसी की चुप्पी देखते हैं तो उसके पीछे का कारण हमेशा साथ नहीं दिखाई देता। यहाँ कवि वह कारण बताते हैं, फिर दूसरी वाणी से निर्दोषता कहते हैं, और अन्त में ब्राह्मणों से भी दोष न होना कहलवाते हैं। राजा के विनाश के बीच उनके पक्ष की बात इतनी बार लौटती है।
और विभीषण के नाम पर पहुँचकर पढ़ने की वही सावधानी फिर काम आती है। आसपास राक्षसों का सामूहिक वर्णन कितना भी कठोर हो, उनके लिये विष्णुभक्ति और ज्ञान विज्ञान की निधि होना अलग से कहा गया है। पहले प्रतापभानु को मिला फल देखकर उनका अपराध गढ़ लेना गलत होता; अन्त में समूह का वर्णन देखकर विभीषण की कही हुई भक्ति भुला देना भी उतना ही असावधान पढ़ना होगा। कथा व्यक्ति का परिचय देती है तो उसे पूरा सुनना पड़ता है, चाहे उसके चारों ओर कैसी भी विपत्ति या कैसी भी संगति हो।
प्रतापभानु का यह प्रसंग उसी राजा को निर्दोष कहता है जिसका कुल आगे नष्ट होता है। इससे दुःख घटता नहीं, उसके भीतर का अन्याय अधिक साफ दिखाई देता है। कपटी मित्रों की प्रसन्नता से चली कथा में राजा का हर्ष, अतिथियों का क्रोध, सत्य सुनकर उनका चकित होना और नगर का शोक, सब अपनी अपनी घड़ी पर आते हैं। शाप निकल जाने के बाद सत्य भी आता है, और आकर राजा के पक्ष में बोलता है।
अन्त तक उस पक्ष को भूलने का कोई कारण नहीं मिलता। रावण का नाम आते समय हम प्रतापभानु के साथ हुए छल को जानते हैं। कुम्भकर्ण का परिचय अरिमर्दन से जुड़ा है, और विभीषण में धर्मरुचि का नया जन्म विष्णुभक्ति के साथ खुलता है। इसी पहचान पर यह कथा ठहरती है, पुलस्त्य के निर्मल कुल में हुए उन जन्मों के सामने, जिनमें शाप का प्रभाव और एक भक्त का स्पष्ट परिचय साथ साथ उपस्थित हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १७१ से १७६, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।