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ब्राह्मणों का शाप और प्रतापभानु का अंत

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 19

रसोई में रचा गया छल, आकाशवाणी से रुका भोजन, ब्राह्मणों का शाप। और निर्दोष कहे जाने पर भी प्रतापभानु के कुल का विनाश। इसी कथा के अन्त में रावण, कुम्भकर्ण और विभीषण के जन्म आते हैं।

एक राजा भोजन परोसने को बढ़ते हैं। जिन ब्राह्मणों को उन्होंने परिवार सहित बुलाया है, उनके चरण धोये जा चुके हैं और वे आदर से बैठाये जा चुके हैं। उसी समय आकाश से आवाज़ आती है कि ब्राह्मण उठकर अपने घर जायें, अन्न न खायें। सभा उठ खड़ी होती है, राजा के मुँह से बात नहीं निकलती। और क्रोध में ऐसा शाप दिया जाता है जो उनके परिवार और अगले जन्म तक पहुँचता है। थोड़ी देर बाद उसी आकाश से दूसरी वाणी होती है: राजा ने कोई अपराध नहीं किया।

तुलसीदास के रामचरितमानस में यह कथा उस दूसरी वाणी को पूरी जगह देती है। ब्राह्मण भी अन्त में राजा का दोष नहीं मानते, फिर भी शाप बना रहता है। पर भोजन की उस घड़ी से पहले छल की पूरी व्यवस्था देखनी होगी। किसी ने राजा को घर पहुँचाया है, असली पुरोहित को गायब किया है, उनका रूप धर लिया है। और राजा उसी छद्म को अपने विश्वास का प्रमाण समझ रहे हैं।

निमन्त्रण के दिन राजा के घर

  • प्रतापभानु राजा, जिनके निमन्त्रण पर ब्राह्मण भोजन के लिये आते हैं। उनके निर्दोष कहे जाने पर भी शाप लागू रहता है।
  • कपटी तपस्वी राजा राक्षस का मित्र, जो प्रसन्न होकर उससे मिलता है और सारी बात उसे सुनाता है। उसे पुरोहित के लौटाये जाने पर ख़बर मिलती है।
  • कालकेतु माया से पुरोहित का रूप धरनेवाला राक्षस। पोद्दार की टीका पहली आकाशवाणी भी इसी की बताती है।
  • पुरोहित राजा के असली पुरोहित, जिन्हें पहाड़ की खोह में छिपाकर उनकी सेज पर राक्षस आ लेटता है।
  • ब्राह्मण परिवार सहित बुलाये गये अतिथि। वे क्रोध में शाप देते हैं और बाद में मानते हैं कि राजा का दोष नहीं था।
  • अरिमर्दन और धर्मरुचि राजा के छोटे भाई और मन्त्री। आगे अरिमर्दन कुम्भकर्ण और धर्मरुचि विभीषण होते हैं।

मित्र से मिलकर प्रसन्न हुआ तपस्वी

तपस्वी बना राजा अपने मित्र राक्षस को देखते ही प्रसन्न होकर उठकर मिलता है, और उसे सारी कथा सुनाता है। सुनकर राक्षस भी आनन्दित होता है।

राक्षस कहता है: अब मैंने शत्रु को साध लिया है। हे राजन, सुनिये, यदि आपने मेरे कहे अनुसार किया है। चिन्ता छोड़कर सो रहिये। विधाता ने बिना दवा के रोग दूर कर दिया।

फिर वह समय बाँध देता है: शत्रु को कुल सहित जड़ से उखाड़कर मैं चौथे दिन आ मिलूँगा। तपस्वी राजा को खूब दिलासा देकर वह बड़ा कपटी और बहुत क्रोधी राक्षस चल पड़ता है। प्रतापभानु उसी आश्रम में अब भी सो रहे हैं, और उन्हें कुछ पता नहीं।

आगे जो कुछ प्रतापभानु को असाधारण सामर्थ्य का प्रमाण लगेगा, उसका करनेवाला हमें पहले ही दिखा दिया गया है। राजा आश्चर्य करेंगे और श्रद्धा बढ़ायेंगे। हम उस आश्चर्य के पीछे खड़े हाथ को पहचानते रहेंगे।

घर पहुँचे राजा, खोह में पहुँचे पुरोहित

राक्षस प्रतापभानु को घोड़े सहित पल भर में घर पहुँचा देता है। वह राजा को रानी के पास सुला देता है, और घोड़े को घुड़साल में अच्छी तरह बाँध देता है। राजा जागेंगे तो अपना भवन देखेंगे, लौटने की क्रिया नहीं। उस असम्भव लगती वापसी का कारण वे अनुमान से ही तय करेंगे।

फिर राक्षस राजा के पुरोहित को उठा ले जाता है। माया से उनकी बुद्धि भ्रमित करके वह उन्हें पहाड़ की खोह में रख देता है। और स्वयं पुरोहित का रूप बनाकर उनकी सुन्दर सेज पर जा लेटता है। राजा के घर में राजा रख दिये गये हैं, पुरोहित के घर में उनका छद्म। और असली पुरोहित उस खोह में हैं जहाँ से कोई सूचना नहीं आती।

प्रतापभानु सवेरा होने से पहले जागते हैं, और अपना घर देखकर बहुत आश्चर्य करते हैं। मन में मुनि की महिमा का अनुमान करके वे इतनी धीरे उठते हैं कि रानी न जान पायें। वे उसी घोड़े पर बैठकर वन को चले जाते हैं। नगर का कोई स्त्री पुरुष उनके जाने को नहीं जानता।

दो पहर बीतने पर राजा लौटते हैं, और घर घर उत्सव होता है, बधावे बजते हैं। पुरोहित को देखकर राजा उसी काम को याद करते हैं और आश्चर्य से देखते रह जाते हैं। हम जानते हैं कि असली पुरोहित वहाँ हैं ही नहीं।

राजा के तीन दिन युग के समान बीतते हैं, और उनकी बुद्धि कपटी मुनि के चरणों में लगी रहती है। समय जानकर पुरोहित बना राक्षस आता है और सलाह के अनुसार सारी बातें समझा देता है। प्रतापभानु गुरु को पहचानकर हर्षित होते हैं। भ्रम के वश उन्हें चेत नहीं रहता, और वे तुरन्त एक लाख उत्तम ब्राह्मणों को कुटुम्ब सहित निमन्त्रण दे देते हैं।

आदर से बैठी पंगत और पहली आकाशवाणी

पुरोहित के रूप में वही राक्षस भोज तैयार करता है: छह रस और चार प्रकार का भोजन, जैसा वेद में कहा गया है। वह रसोई मायामयी है, और व्यंजन इतने हैं कि कोई गिन नहीं सकता।

वह कई प्रकार के पशुओं का मांस पकाता है, और उसमें वह दुष्ट ब्राह्मणों का मांस मिला देता है।

सब ब्राह्मण भोजन के लिये बुलाये जाते हैं, उनके चरण धोये जाते हैं और वे आदर से बैठाये जाते हैं। जैसे ही राजा परोसने लगते हैं, उसी समय आकाशवाणी होती है।

वाणी ब्राह्मणों से उठकर अपने घर जाने को कहती है: बड़ी हानि है, अन्न मत खाइये, रसोई में ब्राह्मणों का मांस बना है। पोद्दार इस पहली आकाशवाणी को कालकेतु की बताते हैं। वाणी पर विश्वास करके सब ब्राह्मण उठ खड़े होते हैं।

राजा व्याकुल हैं। उनकी बुद्धि मोह में भूली हुई है, और होनहार के वश उनके मुँह से बात नहीं निकलती।

क्रोध में दिया गया शाप

तब ब्राह्मण क्रोध से बोले। उन्होंने कुछ भी विचार नहीं किया।

वे राजा को मूर्ख कहते हैं और परिवार सहित राक्षस होने का शाप देते हैं। उन्हें नीच क्षत्रिय कहकर वे आरोप लगाते हैं कि राजा ने ब्राह्मणों को उनके समुदाय सहित नष्ट करने के लिये बुलाया था। ईश्वर ने उनके धर्म की रक्षा की, और अब राजा परिवार सहित नष्ट होंगे।

फिर वे कहते हैं: एक वर्ष के भीतर राजा का नाश हो, और उनके कुल में पानी देनेवाला कोई नहीं रहेगा।

शाप सुनकर राजा डर के मारे बहुत व्याकुल हो जाते हैं। तभी आकाश से फिर एक सुन्दर वाणी होती है।

राजा ने कोई अपराध नहीं किया

दूसरी आकाशवाणी साफ़ कहती है: हे ब्राह्मणो, आपने सोचकर शाप नहीं दिया, राजा ने कुछ भी अपराध नहीं किया। प्रतापभानु शाप के डर से व्याकुल हैं। उनकी निर्दोषता का वाक्य आकाश से आता है, और सुनकर सब ब्राह्मण चकित रह जाते हैं।

तब राजा उस जगह जाते हैं जहाँ भोजन बना था। वहाँ न भोजन है, न रसोइया ब्राह्मण। जिस भरी रसोई में अगणित व्यंजन बने थे, वह नहीं मिलती। और जिस पुरोहित पर भरोसा किया गया था, वह भी नहीं। राजा मन में अपार चिन्ता लिये लौटते हैं।

लौटकर प्रतापभानु ब्राह्मणों को सारा हाल सुनाते हैं। जो बात परोसने की घड़ी में मुँह से नहीं निकली थी, वह अब कही जाती है। फिर वे बहुत डरकर और व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़ते हैं।

ब्राह्मण कहते हैं: हे राजन, होनहार नहीं मिटती, यद्यपि आपका दोष नहीं है। यह अन्यथा नहीं किया जा सकता। ब्राह्मण का शाप बहुत भयानक होता है।

नगर का शोक और शत्रुओं का घेरा

इतना कहकर ब्राह्मण चले जाते हैं। नगर के लोग यह समाचार पाकर चिन्ता करते हैं और दैव को दोष देते हैं, जिसे टीका विधाता पढ़ती है। अभी इसी नगर में घर घर उत्सव था और बधावे बज रहे थे। अब लोग चिन्ता में हैं।

उनकी दृष्टि में दैव ने हंस बनाते बनाते कौआ बना दिया। पोद्दार इसका आशय खोलते हैं: ऐसे पुण्यात्मा राजा को देवता बनाना चाहिये था, उन्हें राक्षस बना दिया गया।

उधर कालकेतु पुरोहित को उनके घर पहुँचा देता है और तपस्वी को समाचार देता है।

वह दुष्ट जहाँ तहाँ पत्र भेजता है। सब राजा, जिन्हें पोद्दार प्रतापभानु के वैरी बताते हैं, सेना सजा सजाकर दौड़ पड़ते हैं। वे डंका बजाकर नगर को घेर लेते हैं, और हर दिन तरह तरह से लड़ाई होती है।

सब योद्धा अपनी करनी करके रण में जूझ मरते हैं, और राजा भी अपने भाई सहित रण में गिरते हैं। सत्यकेतु के कुल में कोई नहीं बचता। ब्राह्मणों का शाप झूठा कैसे होता। जिन शब्दों में कुल के अन्त की घोषणा हुई थी, युद्ध का फल उन्हीं तक पहुँचता है।

विजेता राजा शत्रु को जीतकर, नगर को बसाकर, विजय और यश लिये अपने अपने नगरों को लौट जाते हैं।

धूल, पिता और रस्सी

युद्ध के बाद वक्ता भरद्वाज को सम्बोधित करते हैं, और पोद्दार इस वक्ता को याज्ञवल्क्य बताते हैं। विधाता जब किसी के विपरीत होते हैं, तब उसके लिये धूल सुमेरु पर्वत के समान, पिता यम के समान और रस्सी साँप के समान हो जाती है। यह बात ठीक वहाँ आती है जहाँ प्रतापभानु का जीवन समाप्त हुआ है और अगले जन्म की बात अभी कही जानी है।

तीनों उपमाओं में रोज़ की पहचानी चीज़ भयावह हो गयी है: धूल में पर्वत का भार, पिता में यम की कठोरता, रस्सी में साँप का डर। टीका इनका आशय कुचल डालना, कालरूप होना और काट खाना बताती है।

वही राजा रावण हुए

फिर पुकार आती है, हे मुनि, सुनिये: समय पाकर वही राजा अपने समाज सहित राक्षस हुए। ब्राह्मणों का शाप राक्षस जन्म की बात कह चुका था। अब उस जन्म का नाम मिलता है: राजा रावण हुए, दस सिर और बीस भुजाओंवाले, बड़े प्रचण्ड वीर।

दस सिर और बीस भुजाएँ इस नये रूप को पहचानने योग्य बना देती हैं। थोड़ा पहले प्रतापभानु अपने भाई सहित रण में गिरे थे। बीच के समय का कोई और हिसाब नहीं दिया गया। कथा के लिये इतना ही ज़रूरी है कि जिनके लिये राक्षस होने का वचन निकला था, वही रावण हुए।

फिर छोटे भाई का परिचय: राजा के छोटे भाई अरिमर्दन बल के धाम कुम्भकर्ण हुए। रण में दोनों भाई साथ गिरे थे, और अगले जन्म में भी भाई का सम्बन्ध बना रहता है।

तीसरा परिचय मन्त्री का है: प्रतापभानु के मन्त्री धर्मरुचि रावण के छोटे सौतेले भाई हुए। पिछले जन्म में जो सम्बन्ध राजकाज का था, अगले जन्म में वह परिवार का हो गया।

उनका नाम विभीषण हुआ, जिन्हें सारा जगत जानता है। वे विष्णु के भक्त और ज्ञान विज्ञान के भण्डार थे। तीन व्यक्तियों की पहचान तीन अलग विशेषताओं के साथ खुलती है: रावण की प्रचण्ड वीरता, कुम्भकर्ण का बल, और विभीषण की भक्ति और ज्ञान।

पवित्र कुल और शाप का प्रभाव

फिर कथा राजा के पुत्रों और सेवकों की ओर जाती है। वे सब बहुत से भयानक राक्षस हुए, अनेक जातियों के, मनचाहा रूप धरनेवाले, दुष्ट, कुटिल, भयंकर और विवेक से रहित। रूप बदलने की शक्ति फिर आती है, जैसे पुरोहित का रूप धरे राक्षस के छल में आयी थी।

उनमें दया नहीं। वे हिंसक, पापी और संसार को दुख देनेवाले हैं। उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी अलग अलग नामावली नहीं दी गयी। इतने कठोर सामूहिक वर्णन के ठीक पास ही विभीषण का विष्णुभक्त होना रखा गया है।

उनका जन्म पुलस्त्य ऋषि के पवित्र, निर्मल और अनुपम कुल में हुआ। फिर भी ब्राह्मणों के शाप के वश वे सब पाप का रूप हुए। कुल की पवित्रता और शाप का फल, दोनों एक साथ आते हैं, जैसे प्रतापभानु की निर्दोषता और उनका विनाश एक कथा में आये थे।

रसोई की घटना अब एक पूरे अगले जन्म तक फैल चुकी है। उस जन्म का कुल, राजा का नया नाम, भाई और मन्त्री के नये नाम, और पुत्रों और सेवकों की दशा, सब सामने है।

दूषित अन्न, निर्दोष राजा

भोज में राजा का हिस्सा निमन्त्रण देना और परोसना था। रसोई उस दुष्ट का काम थी जिसने पुरोहित का रूप धरा था। टीका के अनुसार भोजन रोकनेवाली पहली वाणी भी उसी की थी। आकाश की दोनों वाणियाँ ब्राह्मणों से बोली थीं, और दूसरी वाणी का बोलनेवाला नहीं बताया गया।

प्रतापभानु की चुप्पी उनके विरुद्ध पढ़ी जा सकती थी, पर कथा उसके पीछे का मोह और होनहार का दबाव भी बताती है। फिर दूसरी वाणी से उनकी निर्दोषता कहलवाती है, और अन्त में ब्राह्मणों से भी। राजा के विनाश के बीच उनके पक्ष की बात इतनी बार लौटती है।

और विभीषण के नाम पर भी वही सावधानी काम आती है। आसपास राक्षसों का वर्णन कितना भी कठोर हो, उनके लिये विष्णुभक्ति और ज्ञान विज्ञान अलग से कहा गया है। प्रतापभानु का फल देखकर उनका अपराध गढ़ लेना ग़लत होता। उसी तरह समूह का वर्णन देखकर विभीषण की भक्ति भुला देना भी ग़लत होता।

यह प्रसंग उसी राजा को निर्दोष कहता है जिसका कुल आगे नष्ट होता है। शाप निकल जाने के बाद सत्य भी आता है, और आकर राजा के पक्ष में बोलता है।

रावण का नाम आते समय हम प्रतापभानु के साथ हुए छल को जानते हैं। कुम्भकर्ण का परिचय अरिमर्दन से जुड़ा है, और विभीषण में धर्मरुचि का नया जन्म विष्णुभक्ति के साथ खुलता है। कथा इसी पहचान पर ठहरती है, पुलस्त्य के निर्मल कुल में हुए उन जन्मों के सामने। उनमें शाप का प्रभाव और एक भक्त का साफ़ परिचय साथ साथ हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 171 से 176, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।