रामचरितमानस · बालकाण्ड · दूलह का रूप, कोहबर, भोज और विदाई की तैयारी
दूलह का रूप, कोहबर, भोज और विदाई की तैयारी
हाथ की मणि में ठहरी राम की छवि, हँसी से भरी विवाह की पंगत, चार लाख गायों का दान और वह जनकपुर जहाँ किसी का मन अतिथियों को जाने देने का नहीं होता।
दूलह बने राम की शोभा देखते हुए आँख चरणों से उठती है और मौर तक जाती है। महावर लगे पाँव हैं, पीली धोती है, हाथ में अँगूठी है और मस्तक पर मणियों से सजा मौर। चारों ओर इतने मंगल और इतना आनन्द है कि देखने वाले बार बार बलैयाँ लेते हैं। इसी उत्सव के बीच एक बहुत छोटा, बहुत अपना दृश्य है: सीता अपने हाथ की मणि में राम की छवि देख रही हैं। कहीं हाथ हिलने से वह छवि ओझल न हो जाये, इस भय से बाँह और आँख दोनों स्थिर हैं।
आगे सबको साथ बिठाने वाला विवाह का भोज है। जनक अपने हाथों से अतिथियों के चरण धोते हैं। पत्तलें पड़ती हैं, परोसने वाले आते हैं, स्त्रियाँ गारी गाती हैं और दशरथ अपने पूरे समाज के साथ हँसते हैं। अगले सवेरे यही सुख मुनियों के स्वागत और दान में फैलता है। फिर लौटने की बात उठने लगती है। दशरथ प्रतिदिन विदा माँगते हैं, जनक प्रतिदिन रोक लेते हैं। कई दिन बीत जाने पर जब भीतर समाचार देने की आज्ञा होती है, तब भी सभा प्रेम से भर उठती है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- राम और सीता कोहबर में मंगल रीति और सखियों के विनोद के बीच शोभित वर और वधू।
- दशरथ चारों पुत्रों और बहुओं को देखकर आनन्दित पिता, जो मुनियों को दान देते हैं और बाद में विदा माँगते हैं।
- जनक अतिथियों के चरण अपने हाथों से धोने और उन्हें प्रेमपूर्वक रोक रखने वाले राजा।
- वसिष्ठ दशरथ के गुरु, जिनके पास जाकर राजा मुनियों को बुलाने और गोदान की इच्छा कहते हैं।
- विश्वामित्र और शतानन्द बहुत दिन बीतने पर जनक को दशरथ के प्रस्थान की अनुमति देने के लिये समझाने वाले मुनि।
चरणों से मौर तक
स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन । सोभा कोटि मनोज लजावन॥
चौपाई १
जावक जुत पद कमल सुहाए । मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए॥
राम का साँवला शरीर अपने स्वभाव से सुन्दर है। तुलसी उसकी शोभा के सामने करोड़ों कामदेवों को लजाते हुए देखते हैं। फिर दृष्टि उनके चरणों पर टिकती है। महावर का रंग उन चरणकमलों को और सुहावना बना रहा है। इन्हीं चरणों के ऊपर मुनियों के मन भौंरों की तरह छाये रहते हैं। दूलह के पाँव देखने के इस क्षण में मुनियों का ध्यान भी साथ आ गया है। जिसे विवाह के श्रृंगार में सजाया गया है, उसी को मन बहुत पहले से अपना आश्रय बनाये हुए हैं। चरणों का लाल रंग और उन पर छाये मनरूपी भौंरे, दोनों मिलकर आरम्भ की छवि पूरी करते हैं।
पीली धोती पवित्र और मनोहर है। उसकी चमक के आगे प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति भी मन्द पड़ती है। कमर में सुन्दर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओं पर आभूषण शोभा पा रहे हैं। पीले वस्त्र का उजाला साँवले शरीर के साथ देखा जा रहा है और कमर से भुजाओं तक हर साज को उसके अपने स्थान पर रखा गया है। कवि एक झलक देकर आगे नहीं बढ़ते। विवाह के लिये सजे इस रूप को देखने का समय देते हैं, ताकि पाँव, वस्त्र और आभूषण सब अपनी अपनी सुन्दरता सहित स्मरण में रह जायें।
पीत जनेउ महाछबि देई । कर मुद्रिका चोरि चितु लेई॥
चौपाई २
सोहत ब्याह साज सब साजे । उर आयत उरभूषन राजे॥
पीला जनेऊ बड़ी छवि दे रहा है। हाथ की अँगूठी को देखते ही चित्त उसी में लग जाता है। विवाह के सभी साज सजे हैं और चौड़ी छाती पर हृदय के आभूषण राज रहे हैं। हाथ में इतनी छोटी अँगूठी है, फिर भी उसकी ओर खिंचने वाले मन के लिये वह पूरे दृश्य के बीच अपना स्थान बना लेती है। अभी आगे सीता के हाथ की मणि भी आयेगी। यहाँ राम के हाथ का आभूषण चित्त चुराता है, वहाँ उसी राम की छवि किसी दूसरे हाथ के आभूषण में ठहरकर आँखों को बाँध लेगी। दो हाथों के आभूषणों के बीच सुन्दरता को देखने की यह डोर चलती रहती है।
पीला दुपट्टा काँखासोती है। पोद्दार जी की टीका इस पहनावे को जनेऊ की तरह बताती है। उसके दोनों छोरों में मणि और मोती लगे हैं। ऊपर कमल जैसे नेत्र हैं और कानों में सुन्दर कुण्डल। मुख को तुलसी सम्पूर्ण सौन्दर्य का भण्डार कहते हैं, फिर उसी मुख की भौंहों और नासिका पर ठहरते हैं। भौंहें सुन्दर हैं, नासिका मनोहर है और ललाट का तिलक सुन्दरता का निवास बन गया है। इतने अलंकरणों में मुख ओझल नहीं होता। प्रत्येक आभूषण के साथ फिर कोई अंग सामने आता है, आँख, कान, भौंह, नासिका या ललाट।
माथे पर मनोहर मौर सुशोभित है, जिसमें मंगलमय मोती और मणियाँ गुँथी हैं। बहुमूल्य मणियों वाला वह मौर और राम के सभी अंग देखने वालों का चित्त चुरा लेते हैं। नगर की स्त्रियाँ और देवसुन्दरियाँ दूलह को देखकर तिनका तोड़ती हैं, जिसकी टीका बलैयाँ लेने के रूप में व्याख्या करती है। मणि, वस्त्र और आभूषण निछावर किये जाते हैं। आरती उतरती है और मंगलगीत गाये जाते हैं। देवता फूल बरसाते हैं। सूत, मागध और भाट सुयश सुनाते हैं। इस प्रकार राम की शोभा का वर्णन उसे देखकर किये जा रहे स्वागत में फैल जाता है। कोई आरती में लगा है, कोई गान में, कोई गुण सुनाने में।
साँवले दूलह के महावर लगे चरणों से मणियों वाले मौर तक प्रत्येक साज शोभित है। नगर की स्त्रियाँ और देवसुन्दरियाँ बलैयाँ लेती हैं, निछावर और आरती करती हैं। मंगलगीत, देवताओं की पुष्पवर्षा और सूत, मागध तथा भाटों के सुयश से उत्सव भरा है।
कोहबर में हँसी, मणि में ठहरी छवि
अब सुहागिनी स्त्रियाँ प्रसन्न होकर कुमारों और कुमारियों को कोहबर में लाती हैं। पोद्दार जी की टीका कोहबर को कुलदेवता का स्थान बताती है। यहाँ अत्यन्त प्रेम के साथ मंगलगीत गाते हुए लौकिक रीतियाँ होने लगती हैं। विवाह के इस हिस्से में स्त्रियों का उल्लास और उनका अपनापन सामने है। वर और वधुएँ उनके बीच हैं और वे उत्साह से रीति करवा रही हैं। बाहर जो आनन्द आरती, फूल और गुणगान में फैला हुआ था, वह यहाँ गीतों तथा हँसी के बीच निकट से अनुभव होता है।
कोहबरहिं आने कुअँर कुअँरि सुआसिनिन्ह सुख पाइ कै।
छन्द २, दोहा ३२७ से पहले
अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै॥
लहकौरि गौरि सिखाव रामहि सीय सन सारद कहैं।
रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं॥
लहकौर का समय है। टीका इसका अर्थ स्पष्ट करती है: वर और वधू का एक दूसरे को ग्रास देना। गौरी राम को सिखाती हैं और सरस्वती सीता से कहती हैं। दोनों ओर सिखाने वाली देवी उपस्थित हैं, और सिखाया जा रहा काम इतना घरेलू है कि दूसरे को अपने हाथ से कौर खिलाना है। जिनके रूप पर नगर और आकाश मुग्ध हैं, वे इसी खेलभरी रीति में भाग ले रहे हैं। तुलसी गौरी और सरस्वती को नाम लेकर सामने रखते हैं। राम की ओर गौरी हैं, सीता की ओर सरस्वती, और इस पूरी व्यवस्था में प्रेम ही प्रेम है।
रनिवास हँसी और विनोद के रस में मग्न है। सबको जन्म का फल मिल रहा है। पोद्दार जी इस आनन्द को राम और सीता के दर्शन से जोड़कर खोलते हैं। यहाँ स्त्रियाँ रीति करवाने के साथ उसका सुख भी पा रही हैं। वर और वधू के इतने पास बैठकर गीत गाना, उन्हें सिखाना और उनके साथ हँसना, इसी में वह फल अनुभव होता है। लहकौर के अर्थ में परस्परता भी बनी रहती है। एक हाथ से दिया गया ग्रास दूसरे को मिलता है और दूसरा भी उसी रीति में सहभागी है। इस दृश्य को पूरा देखकर आगे बढ़ें तो उसके भीतर दोनों की उपस्थिति बराबर स्पष्ट रहती है।
निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सुरूपनिधान की।
छन्द ३, दोहा ३२७ से पहले
चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी॥
कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं।
बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं॥
इसी बीच जानकी अपने हाथ की मणियों में सुन्दर रूप के भण्डार राम की परछाईं देखती हैं। देखने का अवसर कितना छोटा है, हाथ में लगी मणि भर का। पर उस मणि में जिन्हें देख रही हैं, उनके रूप का अभी इतना बड़ा वर्णन हुआ है। सीता अपनी बाँह नहीं हिलातीं, दृष्टि भी नहीं हटातीं। उन्हें भय है कि हिलने से यह दर्शन छूट जायेगा। तुलसी बाँह को लता की तरह देखते हैं। वह लता इस समय स्थिर है, क्योंकि उसके तनिक चलने से देखने का यह सुख बदल सकता है।
यह भय अभी सामने की छवि खो जाने का है। मणि में राम दीख रहे हैं, इसलिये हाथ का ठहरना भी प्रेम का अपना काम बन गया है। सीता को किसी बड़े वचन में अपनी स्थिति बतानी नहीं पड़ती। उनकी अचल बाँह और अचल दृष्टि उसे प्रकट कर देती हैं। आसपास हँसी और खेल हैं, पर हमारी आँख थोड़ी देर उसी हाथ पर रह जाती है। कोहबर की चहल के भीतर इतना शान्त दृश्य है कि उसे समझने के लिये बस यह देखना पर्याप्त है कि हाथ चलता क्यों नहीं।
उस समय के कौतुक, विनोद, प्रमोद और प्रेम का वर्णन नहीं हो सकता। सखियाँ उसे जानती हैं। यह कहकर तुलसी उस आनन्द का परिचय उन्हीं के पास रहने देते हैं जो उसमें साथ हैं। फिर सभी सुन्दर सखियाँ वर और कन्याओं को जनवासे की ओर लिवा चलती हैं। नगर में और आकाश में जहाँ सुनिये, आशीर्वाद ही आशीर्वाद है। सब प्रसन्न मन से चारों सुन्दर जोड़ियों के दीर्घ जीवन की कामना करते हैं। कोहबर के भीतर से चला सुख फिर पूरे नगर और आकाश में पहुँच गया है। आशीष में चारों जोड़ियाँ साथ हैं।
योगिराज, सिद्ध, मुनीश्वर और देवता प्रभु को देखकर दुन्दुभी बजाते हैं। वे हर्षित होकर फूल बरसाते और जय कहते हुए अपने अपने लोकों को चले जाते हैं। इस दृश्य में लौटने वाले ये दिव्य दर्शक हैं। कुमार और वधुएँ सखियों के साथ जनवासे पहुँचे हैं। उनके सामने अब पिता हैं, और इसी मिलन को अगला दोहा स्थान देता है।
सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास।
दोहा ३२७
सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास॥ ३२७॥
चारों कुमार बहुओं सहित पिताजी के पास आते हैं। जनवासा शोभा, मंगल और आनन्द से भरकर उमड़ता हुआ लगता है। अभी नगर और आकाश में जिन जोड़ियों को चिरंजीवी होने की आशीष दी जा रही थी, वे चारों यहाँ एक साथ उपस्थित हैं। दशरथ के पास पुत्र और बहुएँ आ गये हैं। दोहे में जनवासे का उमड़ना इस दृश्य को केवल आने जाने की सूचना से बहुत आगे ले जाता है। वहाँ भरे हुए सुख के लिये जैसे स्थान भी कम पड़ रहा है।
कोहबर में गौरी राम को और सरस्वती सीता को परस्पर ग्रास देना सिखाती हैं। सीता हाथ की मणि में राम की छवि देखकर बाँह और दृष्टि स्थिर रखती हैं। सखियाँ चारों जोड़ियों को जनवासे लाती हैं, जहाँ वे पिता के पास आती हैं और शोभा, मंगल तथा आनन्द उमड़ पड़ते हैं।
निमन्त्रण और अपने हाथों से चरण धोना
इसके बाद बहुत प्रकार की रसोई तैयार होती है और जनक बरातियों को बुला भेजते हैं। दशरथ पुत्रों सहित भोजन के लिये चलते हैं। मार्ग में अनुपम वस्त्रों के पाँवड़े पड़ते जाते हैं। अतिथि के पाँव रखने तक के लिये सुन्दर वस्त्र बिछाये जा रहे हैं। यह स्वागत भोज के स्थान पर पहुँचने से पहले ही आरम्भ हो गया है। अभी थाली सामने नहीं आयी, पर आदर साथ चल रहा है। राजा अपने पुत्रों के साथ हैं और जनक की ओर से बुलावा पूरी बरात के लिये है।
पहुँचने पर सबके चरण आदर से धोये जाते हैं और सबको यथायोग्य पीढ़ों पर बिठाया जाता है। जनक स्वयं अवधपति दशरथ के चरण धोते हैं। इस काम को कहते हुए तुलसी जनक के शील और स्नेह के सामने वर्णन की अपनी सीमा रख देते हैं। एक राजा दूसरे राजा के चरणों पर झुका है, और उस झुकने में उनका अपना प्रेम दिखाई देता है। अतिथियों का सामान्य सत्कार हो चुका है, फिर कवि जनक के हाथों से दशरथ के चरण धोये जाने को अलग ध्यान में लाते हैं। व्यक्ति और उसका किया हुआ काम दोनों साफ़ सामने रहते हैं।
बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए॥
चौपाई ३
तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी॥
इसके बाद जनक राम के चरणकमल धोते हैं। ये वे चरण हैं जो शिव के हृदयकमल में छिपे रहते हैं। तुलसी एक ही वाक्य में हृदय के ध्यान और सामने की सेवा को पास ले आते हैं। शिव जिन चरणों को अपने भीतर रखते हैं, उन्हें जनक अपने हाथों से धो रहे हैं। राम के बाद तीनों भाइयों के चरण भी धोते हैं। तीनों को राम के समान जानकर जनक यह सेवा करते हैं, और कवि फिर स्पष्ट करते हैं कि उनके अपने हाथ लगे हैं। आदर की यह समानता उनके व्यवहार में पूरी होती है।
सबको उचित आसन देकर जनक परोसने वालों को बुलाते हैं। अब पत्तलें पड़ने लगती हैं। उनके पत्ते मणियों के हैं और उन्हें जोड़ने की कीलें सोने की हैं। जिस वस्तु को सामने रखकर भोजन करना है, उसमें भी स्वागत की समृद्धि दिखाई देती है। पहले मार्ग के पाँवड़े, फिर पीढ़े, फिर उचित आसन और अब पत्तलें, अतिथि के हर अगले काम के लिये व्यवस्था तैयार मिलती है। कवि इस तैयारी को अलग अलग वस्तुओं के माध्यम से दिखाते हैं। सोने और मणि का बखान भी भोजन के इसी क्रम के भीतर आता है।
सूपोदन सुरभी सरपि सुंदर स्वादु पुनीत।
दोहा ३२८
छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत॥ ३२८॥
चतुर और विनीत रसोइये क्षणभर में सबके सामने दाल, भात और गाय का घी परोस देते हैं। भोजन सुन्दर, स्वादिष्ट और पवित्र है। पोद्दार जी घी के साथ सुगन्धित होने का अर्थ भी खोलते हैं। परोसने वालों के लिये चतुराई और विनय साथ कही गयी है। वे काम जानते हैं, तेजी से करते हैं और आदर बनाये रखते हैं। इतनी बड़ी पंगत में सबके सामने भोजन पहुँचने का सुख इसी कुशलता से पूरा होता है। स्वाद की प्रशंसा के साथ उसे देने वाले हाथों की सहज दक्षता भी दिखाई देती है।
इस भोजन के आरम्भ को देखिये तो जनक की ओर से किसी एक बड़े संकेत पर बात नहीं छोड़ी गयी है। बुलावा भेजा गया, आने के लिये वस्त्र बिछे, पाँव धोये गये, बैठने का स्थान मिला, पत्तल सामने आयी और भोजन परसा गया। हर काम पिछले को पूरा करता चलता है। दशरथ के चरण धोने वाला स्नेह तीनों भाइयों तक समान रूप से पहुँचता है और वही आदर पूरे समाज के बैठने तथा भोजन पाने में बना रहता है। इसलिये पंगत का वैभव पढ़ते हुए उसके भीतर का व्यवहार भी साथ दिखाई देता है।
जनक के निमन्त्रण पर दशरथ पुत्रों सहित भोज में आते हैं। सभी का आदरपूर्वक सत्कार होता है। जनक अपने हाथों से दशरथ, राम और तीनों भाइयों के चरण धोते हैं। मणि के पत्तों और सोने की कीलों वाली पत्तलों में कुशल, विनीत रसोइये दाल, भात और गाय का घी परोसते हैं।
पंगत का स्वाद और गारी की हँसी
सब पंचकौर करके भोजन करने लगते हैं। पोद्दार जी की टीका बताती है कि भोजन के आरम्भ में प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान के लिये स्वाहा कहने वाले मन्त्रों के साथ पाँच ग्रास लिये गये। उसके बाद पंगत में भोजन चलता है। साथ ही गारी का गान सुनाई पड़ रहा है, जिसे सुनकर भोजन करने वाले अत्यन्त प्रेममग्न हो जाते हैं। स्वाद और गान का सुख साथ मिल रहा है। परोसे जाने वाले पकवानों को अमृत के समान कहा गया है, और उनकी इतनी भाँतियाँ हैं कि उनका बखान पूरा नहीं हो सकता।
परुसन लगे सुआर सुजाना । बिंजन बिबिध नाम को जाना॥
चौपाई ४
चारि भाँति भोजन बिधि गाई । एक एक बिधि बरनि न जाई॥
चतुर रसोइये नाना प्रकार के व्यञ्जन लाते हैं। उनके नाम कौन जानता है, तुलसी इस प्रश्न से उनकी अनगिनत विविधता दिखाते हैं। इसके बाद भोजन की चार विधियाँ कही जाती हैं। टीका उनका अर्थ चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर लिये जाने वाले भोजन से खोलती है। चारों विधियों में से प्रत्येक के इतने पदार्थ बने हैं कि एक विधि का ही वर्णन कठिन हो जाता है। हम पंगत की सम्पन्नता को गिनती की किसी छोटी सूची में नहीं बाँध पाते। यहाँ विभिन्न प्रकार से खाये जाने वाले पदार्थों की पूरी व्यापकता सामने है।
छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित भाँती॥
चौपाई ५
जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी । लै लै नाम पुरुष अरु नारी॥
इन व्यञ्जनों में छहों रस हैं और हर एक रस की अनगिनत भाँतियाँ हैं। चार विधियों के बाद छह रस आते हैं। पहले भोजन लेने के ढंग से उसका विस्तार दिखाया गया, अब स्वाद के भीतर उसकी विविधता खुल रही है। दाल, भात और घी से आरम्भ हुई पंगत इस तरह अनेक व्यञ्जनों से भर गयी है। एक प्रकार का पदार्थ सामने आने के बाद कथा ठहर नहीं जाती, परोसना लगातार चलता है। सबके लिये सुन्दर और रुचिकर भोजन की तैयारी में जो समृद्धि लगी है, वह इसी क्रम में अनुभव होती है।
इसी पंगत में स्त्रियाँ पुरुषों और स्त्रियों के नाम लेकर मधुर ध्वनि से गारी गाती हैं। किसी का नाम आते ही गान उस सभा के और पास पहुँचता है। तुलसी उसके लिये मधुर ध्वनि कहते हैं और उसे समय के अनुरूप सुहावना बताते हैं। विवाह के इस अवसर पर लोग उसे प्रेम से सुनते हैं। राजा दशरथ भी अपने समाज सहित हँस रहे हैं। अभी जिनके चरण इतने आदर से धोये गये थे, वे इसी अपनापे में हँसी के सहभागी हैं। सत्कार का गम्भीर शील और पंगत की यह खुली हँसी एक ही आयोजन में साथ हैं।
गारी सुनने वालों की प्रतिक्रिया कवि स्पष्ट रखते हैं: वे अनुराग से भरते हैं और हँसते हैं। नाम लेकर गाने वाली स्त्रियाँ, उसकी मधुर धुन और दशरथ के साथ हँसता हुआ समाज, इतना ही दृश्य अपने को पूरा कह देता है। भोजन परोसने का क्रम भी चलता रहता है। हाथ अपने काम में हैं, कान गान में हैं और हँसी पूरे समाज में है। इसी रीति से सभी भोजन करते हैं।
भोजन पूरा होने पर आदर के साथ आचमन के लिये जल दिया जाता है। टीका यहाँ हाथ और मुँह धोने के लिये पानी मिलने का अर्थ स्पष्ट करती है। फिर जनक समाज सहित दशरथ को पान देते और उनका पूजन करते हैं। भोजन के बाद भी सम्मान का क्रम जारी है। अतिथि जब तक वहाँ हैं, उनके अगले काम की व्यवस्था सामने आती रहती है। अन्त में दशरथ प्रसन्न होकर जनवासे की ओर जाते हैं। दोहे में उन्हें राजाओं का सिरमौर कहा गया है और लौटते समय उनकी प्रसन्नता साथ रखी गयी है।
देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज।
दोहा ३२९
जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज॥ ३२९॥
पाँच आरम्भिक ग्रासों के बाद भोजन चलता है। चार प्रकार से लिये जाने वाले और छहों रसों के व्यञ्जन परसे जाते हैं। स्त्रियों का नाम लेकर गाया गया मधुर गारी गान सुनकर दशरथ और उनका समाज हँसते हैं। जल, पान और सम्मान पाकर राजा प्रसन्न होकर जनवासे लौटते हैं।
अगले सवेरे गुरु के पास
जनकपुर में नित्य नये मंगल हो रहे हैं। दिन और रात पलक के समान बीतते हैं। इस आनन्द के बीच अगले सवेरे दशरथ बहुत भोर में जागते हैं और याचक उनके गुणों का गान करने लगते हैं। चारों कुमार सुन्दर वधुओं सहित दिखाई देते हैं। उन्हें देखकर राजा के मन में जितना सुख है, उसे कहना कठिन है। रात से सुबह हुई है, पर विवाह का उल्लास उतना ही भरा हुआ है। पिता की आँखों के सामने चारों जोड़ियाँ हैं, और यही दृश्य सुबह के उनके आनन्द को पूरा कर देता है।
प्रातःक्रिया करके वे गुरु के पास जाते हैं। पोद्दार जी की टीका यहाँ गुरु को वसिष्ठ नाम से पहचानती है। मन में महान् प्रमोद और प्रेम है। राजा प्रणाम और पूजन करते हैं, फिर हाथ जोड़कर बोलते हैं। उनकी वाणी को कवि अमृत में डूबी हुई देखते हैं। जिनके भीतर इतना सुख है, उनके शब्द भी उसी मिठास से निकलते हैं। अपने सामने बैठे मुनिराज से राजा इस सुख का कारण कहते हैं। पुत्रों और बहुओं को देखकर उठे आनन्द का पहला निवेदन गुरु के चरणों में पहुँचता है।
करि प्रनामु पूजा कर जोरी । बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी॥
चौपाई ६
तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा । भयउँ आजु मैं पूरनकाजा॥
दशरथ कहते हैं कि मुनिराज की कृपा से आज उनके सारे काम पूरे हो गये हैं। पूर्णकाम होने की इस अनुभूति के साथ वे एक इच्छा भी रखते हैं: सभी ब्राह्मणों को बुलाकर, सब प्रकार से सजी हुई गायें दीजिये। पोद्दार जी सजावट को आभूषण और वस्त्र से स्पष्ट करते हैं। राजा गुरु से यह काम कराने के लिये कहते हैं। सुख पाकर वे उसके दान का अवसर बनाना चाहते हैं। उनकी बात सुनकर गुरु राजा की प्रशंसा करते हैं और मुनियों को बुलवा भेजते हैं।
बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि।
दोहा ३३०
आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि॥ ३३०॥
वामदेव, देवर्षि, वाल्मीकि, जाबालि और कौशिक आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह आते हैं। टीका देवर्षि को नारद और कौशिक को विश्वामित्र कहकर पहचानती है। तुलसी के इस दोहे में वाल्मीकि स्वयं आने वाले मुनियों में गिने गये हैं। यहाँ वे समारोह के अतिथि हैं। उनके साथ वामदेव, नारद, जाबालि, विश्वामित्र और अन्य तपस्वियों की उपस्थिति से गुरु का बुलावा सभा में बदलता है। जिन मुनियों के लिये गायें देने की इच्छा हुई थी, वे अब सामने आ गये हैं, और दशरथ उनके स्वागत के लिये हैं।
अगले सवेरे चारों पुत्रों और वधुओं को देखकर दशरथ आनन्दित होते हैं। वे वसिष्ठ के पास जाकर अपने को उनकी कृपा से पूर्णकाम कहते हैं और गोदान की इच्छा रखते हैं। वामदेव, नारद, वाल्मीकि, जाबालि, विश्वामित्र तथा अन्य तपस्वी मुनि बुलावे पर आते हैं।
चार लाख गायें और हर याचक की रुचि
दशरथ सब मुनियों को दण्डवत् प्रणाम करते हैं। प्रेमपूर्वक पूजन करके उन्हें उत्तम आसन देते हैं। सत्कार के बाद चार लाख उत्तम गायें मँगवाते हैं। गायों की संख्या के साथ उनका स्वभाव भी कहा गया है: वे कामधेनु के समान अच्छे स्वभाव वाली और सुहावनी हैं। दान की बड़ी मात्रा आँख को आकर्षित करती है, पर कवि उन गायों की उत्तमता भी साथ रखते हैं। जिन्हें दिया जा रहा है, उनके सामने प्रिय और सुन्दर वस्तु आये, यह बात उस वर्णन में बनी रहती है।
दंड प्रनाम सबहि नृप कीन्हे । पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे॥
चौपाई ७
चारि लच्छ बर धेनु मगाईं । काम सुरभि सम सील सुहाईं॥
चार लाख, यही संख्या इस चौपाई में है। सभी गायों को सब प्रकार से सजाया जाता है और राजा प्रसन्न होकर उन्हें ब्राह्मणों को देते हैं। टीका यहाँ भी आभूषण और वस्त्र से सजाये जाने का अर्थ खोलती है। उन्हें दान करते हुए दशरथ बहुत प्रकार से विनती करते हैं कि आज उन्होंने जगत में जीने का लाभ पाया है। देने वाले राजा के अपने शब्दों में इस अवसर का फल है। गायें दूसरे प्राप्त कर रहे हैं, और दशरथ अपने जीवन को लाभ मिला हुआ अनुभव करते हैं।
आशीर्वाद पाकर राजा और आनन्दित होते हैं। फिर याचकों के समूह बुलाये जाते हैं। मुनियों का पूजन और गोदान हो चुका है; अब अन्य माँगने वालों की बारी है। दशरथ उनकी रुचि पूछते हैं। कोई क्या चाहता है, यह पूछे जाने का छोटा सा उल्लेख उपहारों की बड़ी सूची के साथ रखा गया है। इसके कारण देने का दृश्य प्रत्येक पाने वाले तक पहुँचता है। जिस व्यक्ति को जो प्रिय है, उसका ध्यान रखा जा रहा है। सबके लिये एक ही वस्तु तय कर देने की बात यहाँ नहीं कही गयी।
पाइ असीस महीसु अनंदा । लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा॥
चौपाई ८
कनक बसन मनि हय गय स्यंदन । दिए बूझि रुचि रबिकुलनंदन॥
सोना, वस्त्र, मणि, घोड़े, हाथी और रथ दिये जाते हैं। पोद्दार जी रुचि पूछकर देने का अर्थ इसी तरह कहते हैं कि जिसने जो चाहा, उसे वही मिला। सूर्यकुल को आनन्द देने वाले दशरथ का सुख याचकों की प्राप्ति में भी फैल रहा है। वे गुणगाथा गाते और सूर्यकुल के स्वामी की जय कहते हुए जाते हैं। प्रातःकाल याचकों का गुणगान सुनते हुए राजा जागे थे। अब उपहार पाकर जाते हुए याचकों का गान सुनाई देता है। सुबह का यह प्रसंग स्वागत, दान, आशीर्वाद और जयध्वनि से पूरा होता है।
राम के विवाह का ऐसा उत्सव हुआ कि सहस्र मुख वाले भी उसका वर्णन नहीं कर सकते। टीका इस संकेत को शेषजी के रूप में स्पष्ट करती है। अनेक प्रकार के भोजन, अनगिनत व्यञ्जन, चार लाख गायें और इच्छानुसार दिये गये उपहार, इन सबके बाद वर्णन की सीमा का यह वाक्य आता है। अभी जितना कहा गया है, उसके भीतर ही समृद्धि बहुत बड़ी है। फिर भी उत्सव का पूरा आनन्द उससे अधिक रह जाता है। तुलसी संख्या जहाँ देते हैं वहाँ उसे स्पष्ट रखते हैं, और सुख के फैलाव पर पहुँचकर उसके अकथ होने को भी कह देते हैं।
दशरथ मुनियों का सम्मान करके चार लाख उत्तम, सुहावनी गायें सजाकर देते हैं और जीवन का लाभ मिलने की विनती करते हैं। फिर याचकों की रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़े, हाथी और रथ देते हैं। पाने वाले गुणगान तथा जयध्वनि करते हुए जाते हैं।
विश्वामित्र के चरणों में कृतज्ञता
बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ।
दोहा ३३१
यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ॥ ३३१॥
इस पूरे उत्सव के बाद राजा विश्वामित्र के चरणों में बार बार सिर नवाते हैं। वे कहते हैं कि यह सब सुख मुनिराज के कृपाकटाक्ष का प्रसाद है। गुरु वसिष्ठ के पास उन्होंने अपने को पूर्णकाम कहा था। अब विशेष रूप से विश्वामित्र के सामने इस सुख के लिये कृतज्ञता रखते हैं। दोनों स्थानों पर राजा अपने आनन्द को स्पष्ट शब्दों में कहते हैं। यहाँ सिर नवाने की आवृत्ति भी है। एक बार धन्यवाद कहकर बात पूरी नहीं होती, वे बार बार झुकते हैं।
दोहा समूचे सुख को एक साथ सामने लाता है। चारों पुत्र वधुओं सहित हैं, जनकपुर में रोज नये मंगल हैं और राजा दान करके आशीष पा चुके हैं। इतनी घटनाओं के बाद दशरथ का वाक्य छोटा है: यह सब आपकी कृपादृष्टि का प्रसाद है। उसके साथ कोई और माँग नहीं जुड़ी। जिन मुनिराज के सामने सिर नवाया जा रहा है, उन्हें इसी आनन्द का श्रेय दिया जा रहा है। विवाह के वैभव के बीच राजा की यह कृतज्ञता अपना अलग, आत्मीय स्थान रखती है।
दशरथ विश्वामित्र के चरणों में बार बार सिर नवाकर समस्त सुख को उनकी कृपादृष्टि का प्रसाद कहते हैं।
हर दिन विदा की बात, हर दिन नया आदर
दशरथ जनक के स्नेह, शील, करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से प्रशंसा करते हैं। इतने दिनों के आतिथ्य में ये सब बातें उन्होंने सामने पायी हैं। चरण धोने का स्नेह, सबको उचित स्थान देने का व्यवहार और बड़े भोज की व्यवस्था, जनक के आदर का रूप कथा में पहले ही दिखाई दे चुका है। अब उसकी सराहना दशरथ स्वयं करते हैं। इसी के साथ लौटने की बात आरम्भ होती है। अयोध्यानरेश प्रतिदिन उठकर विदा माँगते हैं और जनक उन्हें अनुराग से रोक लेते हैं।
एक दिन का आग्रह दूसरे दिन के लिये समय छोड़ देता है। फिर नये दिन आदर और बढ़ जाता है। प्रतिदिन हजारों प्रकार की मेहमानी होती है और नगर में नित्य नया आनन्द तथा उत्साह रहता है। दशरथ का जाना किसी को अच्छा नहीं लगता। अतिथि को रोकने की इच्छा जनक के साथ पूरे नगर में है। इसलिये विदा का प्रश्न उठते ही उसके सामने इतने लोगों का स्नेह आ जाता है। राजा की जाने की इच्छा स्पष्ट है और जनक का उन्हें रख लेने का अनुराग भी उतना ही स्पष्ट है।
तुलसी यहाँ दिनों की ठीक संख्या नहीं देते। बहुत दिन इसी प्रकार बीत जाते हैं। जो दिन और रात पहले पलक के समान जा रहे थे, उनका बीतना अब बार बार माँगी गयी विदा के साथ अनुभव होता है। हर सुबह लौटने का निवेदन है और हर नये दिन बढ़ी हुई मेहमानी। सुख के इस क्रम ने पूरी बरात को एक ही स्थान पर रोके रखा है। उसके लिये कवि जिस वस्तु को सामने लाते हैं, वह रस्सी है, पर वह रस्सी स्नेह की बनी है।
बहुत दिवस बीते एहि भाँती । जनु सनेह रजु बँधे बराती॥
चौपाई ९
कौसिक सतानंद तब जाई । कहा बिदेह नृपहि समुझाई॥
बराती मानो स्नेह की रस्सी से बँध गये हैं। इतनी देर से चल रहे आदर को यह उपमा एक साथ व्यक्त करती है। वह डोर जनक की ओर से भी है और नगर के उल्लास की ओर से भी। बरात के ठहरने में किसी एक भोजन या किसी एक निमन्त्रण की बात नहीं रह गयी। प्रतिदिन के नये सत्कार ने उस ठहराव को बढ़ाया है। बहुत दिन बीत जाने पर विश्वामित्र और शतानन्द राजा जनक के पास जाते हैं। अब जाने की अनुमति के विषय में मुनि स्वयं समझाकर बात रखते हैं।
वे जनक से कहते हैं कि यद्यपि स्नेहवश छोड़ना कठिन है, फिर भी अब दशरथ को आज्ञा दीजिये। उनके कहने में जनक के प्रेम की पहचान पहले है और विदा की आवश्यकता उसके साथ रखी गयी है। जिस राजा ने इतने अनुराग से सबको रोका है, उसके लिये इस अनुमति का कठिन होना वे समझते हैं। जनक मुनियों की बात स्वीकार करते हैं। नाथ को बहुत अच्छा कहकर वे मंत्रियों को बुलवाते हैं। मंत्री आते हैं और जय जीव कहकर सिर नवाते हैं। अब भीतर सूचना पहुँचाने की व्यवस्था की जानी है।
अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ।
दोहा ३३२
भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ॥ ३३२॥
जनक कहते हैं कि अवधनाथ चलना चाहते हैं, भीतर खबर कर दीजिये। पोद्दार जी भीतर का अर्थ रनिवास से स्पष्ट करते हैं। अभी सूचना भेजने का आदेश हुआ है। दशरथ की चलने की इच्छा अन्तःपुर को बतायी जानी है। यह वाक्य सुनते ही मंत्री, ब्राह्मण, सभासद और स्वयं राजा प्रेम के वश हो जाते हैं। पहले किसी को दशरथ का जाना सुहाता नहीं था, अब उसी जाने की बात आज्ञा के रूप में सामने आ गयी है। सभा उसके सुनने से ही भर उठती है।
प्रसंग इसी सुनने पर ठहरता है। बरात अभी नगर से चली नहीं है। जिन सखियों ने चारों जोड़ियों को जनवासे पहुँचाया था, उनके बाद भोज और सुबह के दान का पूरा उत्सव बीता है; फिर मेहमानी के बहुत दिन बीते हैं। अब आगे की तैयारी के लिये भीतर बताने की घड़ी आयी है। कथा को यहाँ रोकने पर विदाई की कठिनाई साफ़ अनुभव होती है। जाने का निश्चय व्यवहार में उतरना शुरू हुआ है और उसी पहले समाचार से लोग प्रेमवश हो गये हैं।
दशरथ प्रतिदिन विदा माँगते हैं, जनक बढ़ते हुए आदर से रोक लेते हैं और बहुत दिन बीत जाते हैं। विश्वामित्र तथा शतानन्द समझाते हैं, तब जनक मंत्रियों को बुलाकर रनिवास में दशरथ की चलने की इच्छा बताने को कहते हैं। यह सुनकर सभा प्रेमवश हो जाती है। अभी प्रस्थान नहीं हुआ है।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में देखने और ठहरने का सम्बन्ध बार बार सामने आता है। सीता मणि में राम की छवि देखती हैं और उसे खोने के भय से हाथ स्थिर रखती हैं। जनक तथा नगरवासी अतिथियों का साथ पाकर उन्हें रोकते रहते हैं। दोनों दृश्य अपने आकार में बहुत अलग हैं, एक हाथ की छोटी मणि में है और दूसरा पूरे जनकपुर में। फिर भी दोनों को पढ़ते हुए यह अनुभव बना रहता है कि मिला हुआ सुख कुछ देर और साथ रहे। सीता की अचल दृष्टि और बरात को बाँधती स्नेह की रस्सी इसी इच्छा के दो याद रहने वाले चित्र हैं।
आतिथ्य की स्मृति भी यहाँ उसके छोटे कामों सहित बचती है। जनक के अपने हाथ, दशरथ के साथ हँसता समाज, विनीत परोसने वाले और याचक की रुचि पूछता राजा, प्रत्येक दृश्य में कोई सामने वाले का ध्यान रख रहा है। रत्नों की पत्तलें और बड़ी दानसंख्या उसी समय अधिक स्पष्ट लगती हैं जब उनके साथ ये व्यवहार भी दिखते हैं। हम प्रसंग के अन्त तक पहुँचते हैं तो समृद्धि के साथ लोगों के हाथ और उनकी वाणी याद रहती है। अन्तिम वाणी भीतर समाचार देने की है, और उसे सुनते ही सभा का प्रेम फिर प्रकट हो जाता है।
जनक ने अनुमति की ओर कदम बढ़ा दिया है। मंत्री सामने हैं और रनिवास को खबर दी जानी है। विवाह के गीतों, भोज की हँसी और बार बार बढ़ाये गये आतिथ्य के बाद अब इसी समाचार पर मन रुकता है। अभी मार्ग पर चलती बरात का दृश्य नहीं आया। यहाँ आखिरी दृश्य उस सभा का है जिसने जाने की बात सुनी है और जो उसे सुनते ही प्रेम के वश हो गयी है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३२७ से ३३२, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।