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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 29
सीता का आगमन, राजाओं की हार और लक्ष्मण का रोष
सीता की छबि पर ठहरी सभा, अचल धनुष के सामने हारते राजा। और जनक के सन्ताप के बीच गुरु की आज्ञा पाकर उठते राम।
सीता के रंगभूमि में आने से पहले कथा उनकी शोभा पर ठहरती है। कहनेवाले को सब उपमाएँ छोटी लगती हैं, और छबि के समुद्र से उपजी लक्ष्मी को भी कवि संकोच के साथ उनके समान कहेंगे। फिर सखियों के गीतों के बीच सीता सभा में आती हैं, हाथ में जयमाला लिये। उनकी आँखें मुनि के पास बैठे राम को खोजती हैं। सभा के लोगों की इच्छा भी एक ही है: इस साँवले वर से सीता का विवाह हो।
भाट जनक का प्रण सुनाते हैं: जो शिव का धनुष तोड़ेगा, सीता उसका वरण करेंगी। शर्त सुनकर राजा उठते हैं, इष्टदेवों को सिर नवाते हैं और बल लगाते हैं। राजाओं को देखकर जनक का सन्ताप फूटता है, और उनके वचन सुनकर लक्ष्मण का रोष। अन्त में विश्वामित्र राम को उठने की आज्ञा देते हैं।
रंगभूमि के मञ्च पर
- सीता जो सखियों के साथ रंगभूमि में आती हैं, और राम को हृदय में ले आती हैं।
- राम मुनि के पास बैठे, जो लक्ष्मण को प्रेम से सँभालते हैं और गुरु की आज्ञा पाकर उठते हैं।
- जनक प्रतिज्ञा करनेवाले राजा, जो धनुष के सामने राजाओं की हार देखकर अकुला उठते हैं और मानो क्रोध में सने वचन कहते हैं।
- लक्ष्मण जनक के वचन सुनकर क्रुद्ध होनेवाले छोटे भाई, जो राम से अपनी सामर्थ्य कहते हैं और उनकी आज्ञा माँगते हैं।
- विश्वामित्र शुभ समय जानकर राम को शिव का धनुष तोड़ने और जनक का सन्ताप मिटाने की आज्ञा देनेवाले गुरु।
- बंदीजन और राजा प्रतिज्ञा की घोषणा करनेवाले भाट, और उसे सुनकर धनुष उठाने का प्रयत्न करनेवाले राजा।
जिस छबि की उपमा भी संकोच करे
सीता रूप और गुणों की खान हैं, और जगत् की माता हैं। उनकी शोभा कही नहीं जाती। कहनेवाले को सब उपमाएँ छोटी लगती हैं। वे लौकिक स्त्रियों के अंगों से जुड़ी हैं।
पोद्दार की टीका इन उपमाओं के छोटे लगने का कारण खोलती है: काव्य की उपमाएँ त्रिगुणमय, मायिक जगत् से आती हैं, और सीता का स्वरूप दिव्य और चिन्मय है। फिर प्रश्न है कि उन्हीं उपमाओं से सीता का वर्णन करके कौन कुकवि कहलाये और अपयश ले। और किसी स्त्री से तुलना करनी हो, तो जगत् में ऐसी सुन्दरी है ही कहाँ।
सरस्वती बहुत बोलनेवाली हैं। पार्वती का आधा ही अंग स्त्री का है। टीका इसे अर्धनारीश्वर रूप बताती है, जिसमें शेष आधा अंग शिव का है। रति अपने पति कामदेव को शरीररहित जानकर बहुत दुखी रहती हैं। और लक्ष्मी के प्रिय भाई विष और मदिरा हैं। पोद्दार बताते हैं कि समुद्र से उत्पन्न होने के नाते। तो सीता को लक्ष्मी के समान कैसे कहें।
छबि अमृत का समुद्र हो, कच्छप परम रूपमय हो, मथने की रस्सी शोभा की हो, मथानी का पर्वत शृंगार हो, और कामदेव अपने कमल जैसे हाथ से उसे मथें। पोद्दार की टीका इसे प्रचलित समुद्रमन्थन के कठोर उपकरणों के सामने रखकर समझाती है।
इतना सब जुटाने पर सुन्दरता और सुख की मूल लक्ष्मी प्रकट हों, तब भी कवि उन्हें संकोच के साथ सीता के समान कहेंगे।
पोद्दार अपनी लम्बी टीका में बताते हैं कि कल्पित मन्थन का सौन्दर्य भी प्राकृत रहेगा, क्योंकि कामदेव स्वयं त्रिगुणमयी प्रकृति के विकार हैं। उनके अनुसार सीता का स्वरूप उस लौकिक सौन्दर्य से भिन्न है। टीका यह भी कहती है कि लक्ष्मी का अप्राकृत स्वरूप वस्तुतः यही है, और सीता अपनी महिमा से प्रकट हैं, किसी उपकरण से नहीं।
इसी व्याख्या में टीका शक्ति और शक्तिमान् की अभिन्नता रखती है: यह अद्वैत तत्त्व है, इसलिये अनुपमेय है, क्योंकि उपमा के लिये कोई भिन्न वस्तु चाहिये।
सखियों के गीत और हाथ की जयमाला
अब सयानी सखियाँ सीता को साथ लेकर मनोहर वाणी में गीत गाती हुई चलती हैं। नवल शरीर पर सुन्दर साड़ी है, और जगज्जननी की बड़ी छबि अतुलनीय है।
सब आभूषण अपनी अपनी जगह शोभा दे रहे हैं, जिन्हें सखियों ने अंग अंग में सजाकर पहनाया है। फिर सीता रंगभूमि में पाँव रखती हैं।
उनका रूप देखकर सब स्त्री पुरुष मोहित हो जाते हैं। देवता प्रसन्न होकर नगाड़े बजाते हैं, और फूल बरसाकर अप्सराएँ गाती हैं। सीता के हाथों में जयमाला शोभा दे रही है।
सब राजा अचानक उनकी ओर देखते हैं। सीता चकित चित्त से राम को देखती हैं, और सब राजा मोह के वश हो जाते हैं।
मुनि के पास दोनों भाई दिखते हैं, और सीता के नेत्र खजाना पाकर ललचाकर जा लगते हैं। टीका बताती है कि वे राम पर जा लगे और वहीं स्थिर हो गये।
बड़ों की लाज और भरी सभा देखकर सीता सकुचा जाती हैं। वे राम को हृदय में लाकर सखियों की ओर देखने लगती हैं।
मन की विनती और सभा में कहा गया प्रण
राम का रूप और सीता की छबि देखकर स्त्री पुरुष पलक झपकाना छोड़ देते हैं। सब मन में सोचते हैं, कहने में सकुचाते हैं। वे मन ही मन विधाता से विनती करते हैं: जनक की जड़ता शीघ्र हर लीजिये, और उन्हें हमारी जैसी सुन्दर बुद्धि दीजिये। राजा बिना विचार किये प्रण छोड़कर सीता का विवाह राम से कर दें।
मन ही मन वे यह भी कहते हैं कि संसार राजा को भला कहेगा, यह बात सबको अच्छी लगती है, और हठ करने से अन्त में भी हृदय जलेगा। सब इसी लालसा में मग्न हैं कि सीता के योग्य वर यह साँवला है।
तब जनक बंदीजनों को बुलाते हैं। भाट विरुदावली गाते हुए आते हैं, जिसे टीका वंश की कीर्ति कहती है, और राजा उन्हें अपना प्रण सबसे कहने को भेजते हैं। वे बहुत आनन्द से चल पड़ते हैं।
भाट भुजा उठाकर सब राजाओं से कहते हैं: सुनिये, हम जनक का विशाल प्रण कहते हैं। वे धनुष का परिचय देते हैं: राजाओं की भुजाओं का बल चन्द्रमा है, तो शिव का धनुष राहु। वह भारी और कठोर है, यह सब जानते हैं।
घोषणा में रावण और बाण का नाम आता है, जिन्हें टीका बाणासुर बताती है: वे बड़े भारी योद्धा धनुष को देखकर चुपके से चले गये। पोद्दार की टीका जोड़ती है कि उठाना तो दूर, छूने तक की हिम्मत न हुई।
जो आज इस राजसमाज में शिव के उस कठोर धनुष को तोड़ेगा, तीनों लोकों की विजय के साथ सीता बिना किसी विचार के, हठ से, उसका वरण करेंगी।
धनुष अपनी जगह अचल रहा
प्रण सुनते ही सब राजा ललचा उठते हैं, और जिन्हें वीरता का अभिमान है, वे बहुत तमतमा उठते हैं। कमर कसकर, अकुलाकर उठते हैं, और इष्टदेवों को सिर नवाकर चलते हैं।
धनुष के पास जाकर वे तमककर उसे देखते हैं, फिर निगाह जमाकर पकड़ते हैं और करोड़ों भाँति से बल लगाते हैं, पर धनुष उठता नहीं।
जिन राजाओं के मन में कुछ विचार है, वे धनुष के पास नहीं जाते। मूर्ख राजा तमककर पकड़ते हैं, और न उठने पर लजाकर लौट जाते हैं।
मानो वीरों की भुजाओं का बल पाकर धनुष और भारी होता जाता है।
तब दस हजार राजा एक साथ उसे उठाने लगते हैं, फिर भी वह टलता नहीं। शिव का वह धनुष वैसे ही नहीं डिगता, जैसे कामी पुरुष के वचनों से सती स्त्री का मन नहीं डिगता।
सब राजा वैसे ही हँसी के योग्य हो जाते हैं, जैसे बिना वैराग्य का संन्यासी। कीर्ति, विजय और बड़ी वीरता, सब धनुष के हाथों बरबस हारकर वे चले जाते हैं। हृदय से हारे, कान्तिहीन राजा अपने अपने समाज में जा बैठते हैं, और जनक इन्हीं राजाओं को देखते हैं।
जनक का सन्ताप, जिसे सभा ने सुना
राजाओं को देखकर जनक अकुला उठते हैं, और ऐसे वचन बोलते हैं जो मानो क्रोध में सने हों।
वे कहते हैं कि द्वीप द्वीप के अनेक राजा मेरा प्रण सुनकर आये, देवता और दानव भी मनुष्य का शरीर धरकर आये, और बहुत से रणधीर वीर आये।
धनुष तोड़कर पाने को कितना कुछ था: मनोहर कन्या, बड़ी विजय, अत्यन्त सुन्दर कीर्ति। मानो ब्रह्मा ने इन्हें पानेवाला कोई बनाया नहीं। वे पूछते हैं: कहिये, यह लाभ किसे अच्छा नहीं लगता।
किसी ने शिव का धनुष चढ़ाया नहीं। चढ़ाना और तोड़ना तो रहने दीजिये, भाई, कोई उसे तिल भर भूमि से नहीं हटा सका।
फिर वे कहते हैं: अब कोई वीरता का अभिमानी बुरा न माने, मैंने जान लिया कि पृथ्वी वीरों से खाली है। वे सबसे कहते हैं कि आशा छोड़कर अपने अपने घर जाइये, विधाता ने सीता का विवाह नहीं लिखा।
प्रण छोड़ें, तो पुण्य जाता है। कन्या कुँआरी रहे, क्या करें।
अन्त में वे पछताते हैं कि यदि जानते कि पृथ्वी वीरों से शून्य है, तो प्रण करके हँसी के पात्र न बनते। जनक के वचन सुनकर सब स्त्री पुरुष सीता की ओर देखते हैं, और दुखी हो जाते हैं।
लक्ष्मण का रोष और राम की अनुमति
यही वचन सुनकर लक्ष्मण तमतमा उठते हैं। उनकी भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं, ओठ फड़कने लगते हैं, और आँखें क्रोध से भर उठती हैं। राम के डर से वे कुछ कह नहीं पाते, और जनक की बात उन्हें बाण जैसी लगी है।
फिर वे राम के चरणकमलों में सिर नवाकर बोलते हैं। वे जनक के कथन को अनुचित कहते हैं। जहाँ रघुवंशियों में से कोई भी हो, उस समाज में ऐसी बात कोई नहीं कहता, जैसी जनक ने राम को उपस्थित जानते हुए कही।
सुनिये, मैं स्वभाव से कहता हूँ, अभिमान से नहीं: यदि आपकी आज्ञा पाऊँ, तो ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लूँ।
और उसे कच्चे घड़े की तरह फोड़ डालूँ। मेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकता हूँ। हे भगवान्, आपके प्रताप की महिमा से बेचारा पुराना धनुष क्या चीज़ है।
हे नाथ, ऐसा जानकर आज्ञा हो, तो कुछ खेल करूँ, उसे भी देखिये: धनुष को कमल की डंडी की तरह चढ़ाकर उसे सौ योजन तक लिये दौड़ा चला जाऊँ।
हे नाथ, आपके प्रताप के बल से उसे कुकुरमुत्ते की डंडी की तरह तोड़ दूँ। और ऐसा न करूँ, तो प्रभु के चरणों की शपथ, धनुष और तरकस हाथ में न लूँ।
लक्ष्मण के क्रोध भरे वचन निकलते ही पृथ्वी डगमगा उठती है, और दिशाओं के हाथी काँप जाते हैं। सब लोग और सब राजा डर जाते हैं। सीता के हृदय में हर्ष होता है, और जनक सकुचा जाते हैं।
गुरु विश्वामित्र, राम और सब मुनि मन में प्रसन्न होते हैं, और बार बार पुलकित होते हैं। फिर राम इशारे से लक्ष्मण को रोकते हैं, और प्रेम से अपने पास बैठा लेते हैं।
गुरु की आज्ञा, और उठते हुए राम
विश्वामित्र शुभ समय जानकर अत्यन्त स्नेह भरी वाणी कहते हैं: हे राम, उठिये, शिव का धनुष तोड़िये, और हे तात, जनक का सन्ताप मिटाइये।
गुरु के वचन सुनकर राम उनके चरणों में सिर नवाते हैं। उनके मन में न हर्ष आता है, न विषाद। वे सहज स्वभाव से उठ खड़े होते हैं।
उनके खड़े होने की शान ऐसी है कि जवान सिंह लजा जाये। यह अर्थ टीका के अनुसार है।
मंचरूपी उदयाचल पर राम बालसूर्य की तरह उदित हुए हैं। उनके उदय होते ही सब संतरूपी कमल खिल उठते हैं, और नेत्ररूपी भौंरे हर्षित हो जाते हैं।
सीता की शोभा से आरम्भ हुआ यह प्रसंग राम के उदय पर ठहरता है। बीच में धनुष अचल रहा, राजा उपहास के योग्य हुए, जनक की व्यथा बाहर आयी, और लक्ष्मण का रोष उठा। अब राम सहज खड़े हैं, और संतरूपी कमल खिल गये हैं।
वचन का बन्धन, रोष का अनुशासन
लक्ष्मण की भौंहें टेढ़ी होती हैं, ओठ फड़कते हैं, और राम के डर से वे कुछ कह नहीं पाते। बोलने से पहले वे राम के चरणों में सिर नवाते हैं, और राम की आज्ञा माँगते हैं। उनके वचनों पर पृथ्वी डगमगा उठती है, और राम इशारे से रोककर उन्हें प्रेम से पास बैठा लेते हैं।
सीता को देखकर स्त्री पुरुष मोहित होते हैं, और राजा अचानक उनकी ओर देखते हैं। मुनि के पास दोनों भाइयों को देखकर उनके नेत्र खजाना पाकर ललचाकर जा लगते हैं। फिर गुरुजनों की लाज से वे राम को हृदय में लाकर सखियों की ओर देखने लगती हैं। जनक के वचन सुनकर लोग उनकी ओर देखकर दुखी होते हैं, और लक्ष्मण के वचनों के समय उनके हृदय में हर्ष होता है।
प्रसंग के अन्त में राम मंच पर खड़े हैं। गुरु की आज्ञा सुनकर वे उन्हें प्रणाम कर चुके हैं, संतरूपी कमल खिले हैं और नेत्ररूपी भौंरे हर्षित हैं। धनुष अभी टूटा नहीं है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 247 से 254, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।