रामचरितमानस · बालकाण्ड · सीता का आगमन, राजाओं की हार और लक्ष्मण का रोष
सीता का आगमन, राजाओं की हार और लक्ष्मण का रोष
सीता की छबि पर ठहरी सभा, अचल धनुष के सामने हारते राजा, और जनक के सन्ताप के बीच गुरु की आज्ञा पाकर उठते राम।
सीता के रंगभूमि में आने से पहले तुलसीदास उनकी उपमा खोजते हुए ठहर जाते हैं। जगत् का सारा सौन्दर्य सामने रख दिया जाय, तब भी जानकी के लिये तुलना छोटी पड़ती है। इस असमर्थता को कहकर कवि आगे बढ़ते हैं, और सखियों के गीतों के बीच सीता सभा में प्रवेश करती हैं। हाथ में जयमाला है। आँखें मुनि के समीप बैठे राम को खोज लेती हैं। अब सभा के लोगों की इच्छा भी एक ही है, इस साँवले वर के साथ जानकी का विवाह हो।
किन्तु जनक की प्रतिज्ञा के बीच में शिवधनुष रखा है। उसे तोड़ने की शर्त सुनकर राजा उठते हैं, अपने इष्टदेवों को प्रणाम करते हैं और बल लगाते हैं। थोड़ी देर में राजाओं की हार से जनक का सन्ताप फूटता है और उनके वचनों से लक्ष्मण का रोष। बालकाण्ड की इस सभा में हम इच्छा, प्रतिज्ञा और सामर्थ्य को एक ही जगह देखते हैं। अन्त में विश्वामित्र राम को उठने की आज्ञा देते हैं। इस आज्ञा तक पहुँचने के लिये पहले सभा की पूरी व्याकुलता सुननी होगी।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- सीता रूप और गुणों की खान जानकी, जो सखियों के साथ रंगभूमि में आती हैं और राम को हृदय में बसा लेती हैं।
- राम मुनि के समीप विराजमान रघुकुलमणि, जो लक्ष्मण को प्रेम से सँभालते हैं और गुरु की आज्ञा पाकर उठते हैं।
- जनक प्रतिज्ञा करनेवाले राजा, जिन्हें धनुष के सामने राजाओं की असफलता देखकर सीता के विवाह की चिन्ता घेर लेती है।
- लक्ष्मण जनक के वचन सुनकर क्रुद्ध होनेवाले छोटे भाई, जिनकी सारी सामर्थ्य की घोषणा राम की अनुमति पर टिकी है।
- विश्वामित्र शुभ समय पहचानकर राम को शिवधनुष तोड़ने और जनक का सन्ताप मिटाने की आज्ञा देनेवाले गुरु।
- बंदीजन और राजा प्रतिज्ञा की घोषणा करनेवाले भाट और उसे सुनकर धनुष उठाने का प्रयत्न करनेवाले भूपाल।
जिस छबि की उपमा भी संकोच करे
कवि के सामने पहली कठिनाई वर्णन की है। सीता रूप और गुणों की खान हैं, जगज्जननी हैं। उनकी शोभा कहने के लिये जो भी उपमा उठायी जाती है, वह किसी लौकिक स्त्री के अंग से अनुराग रखनेवाली निकलती है। ऐसी तुलनाओं का अपना परिचित संसार है। जानकी को उसी में रख देने पर कवि को लगता है कि उनके स्वरूप के साथ न्याय नहीं होगा। इसीलिये वह अपनी प्रशंसा का सबसे ऊँचा शब्द खोजने से पहले तुलना की सीमा पहचानता है।
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदंबिका रूप गुन खानी॥
चौपाई १
उपमा सकल मोहि लघु लागीं । प्राकृत नारि अंग अनुरागीं॥
पोद्दार जी की टीका इस संकोच का कारण खोलती है। काव्य की उपमाएँ त्रिगुणमय, मायिक जगत् से आती हैं; जानकी का स्वरूप दिव्य और चिन्मय है। दोनों को एक ही स्तर का मान लेने पर उस दिव्यता का आशय खो जाता है। तुलसी का अगला प्रश्न भी इसी से निकलता है: उन्हीं अनुपयुक्त उपमाओं से सीता का वर्णन करके कौन अपने को कुकवि कहलवाये और अपयश ले। किसी स्त्री को सामने रखकर तुलना करनी हो तो पहले ऐसी सुन्दरी मिले भी, जो उनके समान कही जा सके।
अब देवियों की ओर दृष्टि जाती है। सरस्वती के विषय में मुखर होने की बात आती है। पार्वती का आधा अंग स्त्रीरूप है; टीका इसे अर्द्धनारीनटेश्वर के रूप में समझाती है, जिसमें शेष आधा अंग शिव का है। रति अपने पति कामदेव को शरीररहित जानकर अत्यन्त दुखी हैं। लक्ष्मी की तुलना पर कवि को विष और मद्य जैसे उनके प्रिय भाइयों का स्मरण होता है। पोद्दार जी बताते हैं कि समुद्र से उत्पन्न होने के नाते यह सम्बन्ध कहा गया है। हर सम्भावित उपमा के साथ एक ऐसा पक्ष उपस्थित हो जाता है जो जानकी की छबि पर ठीक नहीं बैठता।
ये देवियों के विषय में कवि के चुने हुए साहित्यिक प्रसंग हैं। उनका काम इस वर्णन में उपमा की कठिनाई दिखाना है। तुलना करते ही किसी दूसरे रूप की कोई सीमा, कोई दुःख या कोई सम्बन्ध साथ चला आता है। जानकी को उसके सहारे पूरी तरह कह पाना सम्भव नहीं होता। इस कठिनाई के बाद तुलसी एक कल्पना रचते हैं, जिसमें उपमा बनाने के उपकरण भी नये होंगे। यहाँ से जो समुद्रमन्थन सामने आता है, वह सौन्दर्य की सम्भावना पर रखा हुआ कवि का यदि है।
जौं छबि सुधा पयोनिधि होई । परम रूपमय कच्छपु सोई॥
चौपाई २
सोभा रजु मंदरु सिंगारू । मथै पानि पंकज निज मारू॥
कल्पना कीजिये, छबि ही अमृत हो और उसी अमृत का समुद्र हो। उसे थामनेवाला कच्छप परम रूपमय हो। मथने की रस्सी शोभा की बनी हो और मथानी के लिये शृंगार ही पर्वत बन जाय। फिर स्वयं कामदेव अपने कमल जैसे हाथों से उसे मथें। समुद्र से लेकर हाथों तक, इस कल्पित मन्थन की प्रत्येक वस्तु सौन्दर्य से रची गयी है। पोद्दार जी की टीका इस व्यवस्था को प्रचलित समुद्रमन्थन के कठोर उपकरणों के सामने रखकर समझाती है। कवि यहाँ उस सारी कठोरता की जगह छबि, रूप और शृंगार भर देते हैं।
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल।
दोहा २४७
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल॥ २४७॥
इतना सब जुटाने पर सुन्दरता और सुख की मूल लक्ष्मी प्रकट हों, तब भी कवि उन्हें सीता के समान कहने में संकोच करेंगे। सारी कल्पना अन्ततः इसी संकोच तक पहुँचाती है। सौन्दर्य के लिये सबसे सुन्दर सम्भव कारण चुन लिये गये, फिर भी तुलना आश्वस्त नहीं हुई। जानकी की अतुलनीयता कहने के लिये तुलसी उपमा को बढ़ाते जाते हैं और उसकी अपर्याप्तता अन्त तक बचाये रखते हैं।
पोद्दार जी इस दोहे की लम्बी टीका में बताते हैं कि कल्पित मन्थन का सौन्दर्य भी प्राकृत रहेगा, क्योंकि कामदेव स्वयं त्रिगुणमयी प्रकृति के विकार हैं। जानकी का परम दिव्य स्वरूप उस लौकिक सौन्दर्य से भिन्न है। टीका यह भी स्पष्ट करती है कि लक्ष्मी का अप्राकृत स्वरूप वस्तुतः यही है। उस स्वरूप को मथकर प्रकट करने की बात लागू नहीं होती; जानकी अपनी महिमा से प्रकट हैं और किसी भिन्न उपकरण की अपेक्षा नहीं रखतीं।
इसी व्याख्या में शक्ति और शक्तिमान् की अभिन्नता आती है। पोद्दार जी के अनुसार यह अद्वैत तत्त्व है, इसीलिये अनुपमेय है। उपमा के लिये एक भिन्न वस्तु चाहिये, जबकि यहाँ दिव्य सौन्दर्य जानकी के स्वरूप से अलग नहीं है। इस आशय को साथ रखें तो कवि का संकोच केवल प्रशंसा की बढ़ती हुई मात्रा नहीं रह जाता। वह दिव्य स्वरूप और उसके लिये चुनी जा रही लौकिक भाषा के बीच का अन्तर सँभालता है।
सीता के लिये लौकिक उपमाएँ छोटी पड़ती हैं। कवि सौन्दर्य से बने समुद्रमन्थन की कल्पना करके भी तुलना में संकोच रखते हैं। पोद्दार जी इस कल्पना में जानकी के अप्राकृत स्वरूप और शक्ति तथा शक्तिमान् की अभिन्नता का संकेत समझाते हैं।
सखियों के गीत और हाथ की जयमाला
अब वही जानकी सखियों के साथ चलती हैं। सयानी सखियाँ उन्हें साथ लिये मनोहर वाणी में गीत गा रही हैं। जिनके रूप के लिये अभी सम्पूर्ण सौन्दर्यलोक अपर्याप्त था, उनका आगमन साड़ी, आभूषण और साथ चलती सखियों के बीच दिखाई देता है। नवल शरीर पर सुन्दर साड़ी शोभा पा रही है। जगज्जननी की छबि अतुलनीय है, और उस छबि के अंग अंग को सजाने में सखियों का स्नेह लगा है।
प्रत्येक आभूषण अपनी उपयुक्त जगह पर सुहाता है। तुलसी विशेष रूप से बताते हैं कि सखियों ने उन्हें रचकर, सँवारकर पहनाया है। वस्त्र और गहने अलग रखी हुई सूची नहीं बनते; सजानेवाले हाथों का सम्बन्ध उनमें बना रहता है। गीत गाती हुई वे साथ हैं, सजायी हुई जानकी उनके बीच हैं, और फिर वह क्षण आता है जब सीता रंगभूमि में पाँव रखती हैं।
भूषन सकल सुदेस सुहाए । अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए॥
चौपाई ३
रंगभूमि जब सिय पगु धारी । देखि रूप मोहे नर नारी॥
प्रवेश करते ही स्त्री और पुरुष, सभी उनका रूप देखकर मोहित हो जाते हैं। उसके साथ आकाश का उल्लास भी जुड़ता है। देवता प्रसन्न होकर नगाड़े बजाते हैं, पुष्प बरसते हैं और अप्सराएँ गाती हैं। सखियों की मनोहर वाणी से आरम्भ हुआ यह आगमन अब सभा और देवताओं के आनन्द में फैल गया है। तुलसी एक ही प्रवेश के चारों ओर देखनेवालों और गानेवालों को रखते हैं; स्वयं जानकी के हाथ में जयमाला सुशोभित रहती है।
उस माला को अभी किसी के गले में नहीं डाला गया है। वह करकमलों में है और राजाओं की आँखें अचानक चकित होकर सीता की ओर उठती हैं। उन्हें देखकर राजाओं का मन मोह के वश हो जाता है। सभा के लिये जानकी देखने का केन्द्र हैं, किन्तु जानकी का चित्त राम को चाहता है। इतने बड़े समाज के बीच उनकी दृष्टि अपना एक ठिकाना ढूँढ़ रही है। तुलसी इसी छोटे से अन्तर में दृश्य को बाहर से भीतर ले आते हैं।
मुनि के समीप दोनों भाई दिखाई देते हैं। सीता के नेत्र जैसे अपना खजाना पा गये हों, ललचाकर राम में लग जाते हैं। टीका उस निधि पाने का अर्थ स्पष्ट करती है: आँखें वहीं स्थिर हो गयीं। अभी तक चारों ओर से दृष्टियाँ सीता पर थीं; अब उनकी दृष्टि के लिये वह मिल गया है जिसे देखकर देखने का प्रयोजन पूरा होता है। फिर भी रंगभूमि एक सार्वजनिक सभा है। गुरुजन उपस्थित हैं, समाज बहुत बड़ा है, और इस उपस्थिति का संकोच सीता के व्यवहार में आता है।
गुरजन लाज समाजु बड़ देखि सीय सकुचानि।
दोहा २४८
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि॥ २४८॥
बड़ों की लाज और भरी सभा देखकर जानकी सकुचा जाती हैं। वे राम को हृदय में लाती हैं और सखियों की ओर देखने लगती हैं। आँखों का स्थान बदलता है, मन का आश्रय बना रहता है। तुलसी ने यह दोनों क्रियाएँ एक दोहे में रखी हैं, इसलिये सखियों की ओर देखना राम से विमुख होना नहीं पढ़ा जा सकता। हृदय में रघुवीर को रखकर ही दृष्टि वहाँ गयी है।
इस आगमन की कोमलता इसी पूर्ण क्रम से खुलती है। सखियाँ सजाती हैं, गीत गाते हुए साथ लाती हैं, सभा रूप पर मुग्ध होती है, सीता मुनि के पास दोनों भाइयों को देखती हैं, और फिर लज्जा के कारण सखियों की ओर मुड़ती हैं। हाथ की जयमाला और हृदय के राम अब एक ही दृश्य में हैं। उनके बीच अभी जनक की वह प्रतिज्ञा है जिसकी घोषणा सुननी बाकी है।
साड़ी और सखियों के सजाये आभूषणों में सीता रंगभूमि में आती हैं। देवताओं का उत्सव होता है, हाथ में जयमाला शोभती है और उनकी आँखें मुनि के पास राम को पा लेती हैं। गुरुजनों तथा सभा की लाज से वे राम को हृदय में रखकर सखियों की ओर देखने लगती हैं।
मन की विनती और सभा में कहा गया प्रण
राम के रूप और सीता की छबि को देखकर स्त्री पुरुष पलक झपकाना तक छोड़ देते हैं। सबके मन में एक बात है, पर उसे कहने में संकोच है। इसलिये सभा के बीच कोई मुखर आग्रह उठने से पहले विधाता के सामने मौन विनय पहुँचती है। वे चाहते हैं कि जनक की जड़ता शीघ्र दूर हो और उन्हें ऐसी सुन्दर बुद्धि मिले कि वह अपनी प्रतिज्ञा छोड़कर सीता का विवाह राम से कर दें।
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई । मति हमारि असि देहि सुहाई॥
चौपाई ४
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू । सीय राम कर करै बिबाहू॥
इस प्रार्थना में लोग अपनी ही बुद्धि को सुन्दर मानकर जनक के लिये माँग रहे हैं। उन्हें सम्बन्ध इतना उचित दिखता है कि अब फिर विचार करने की आवश्यकता भी नहीं लगती। उनके मन का तर्क है कि संसार राजा को भला ही कहेगा, क्योंकि यह बात सबको प्रिय है। हठ बना रहा तो अन्त में भी हृदय जलता रहेगा। सभा की लालसा को तुलसी साफ़ शब्दों में रखते हैं: जानकी के योग्य यही साँवला वर है।
बाहर से देखिये तो सब अपनी जगह बैठे राम और सीता को निहार रहे हैं। भीतर जनक की प्रतिज्ञा छोड़ देने की प्रार्थना चल रही है। उसी समय जनक बंदीजनों को बुलाते हैं। भाट वंश की कीर्ति गाते हुए आते हैं और राजा उन्हें अपना प्रण सबसे कहने को भेजते हैं। वे हृदय में बहुत आनन्द लिये चल पड़ते हैं। जनसमाज की मौन चाह के बाद अब राजप्रतिज्ञा सबके सुनने के लिये कही जाती है।
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
दोहा २४९
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल॥ २४९॥
बंदीजन भुजा उठाकर समस्त पृथ्वीपाल राजाओं को सम्बोधित करते हैं। उनकी घोषणा में जनक का विशाल प्रण है। सबसे पहले वे सामने रखे धनुष का परिचय देते हैं: राजाओं की भुजाओं का बल यदि चन्द्रमा है तो शिवधनुष राहु है। उसका भारीपन और कठोरता सबको विदित है। जिस बल पर राजाओं को गर्व है, उसी के ऊपर इस धनुष का ग्रहण पड़ता है। उपमा सुनते ही प्रतियोगिता का दाँव समझ में आने लगता है।
नृप भुजबलु बिधु सिवधनु राहू । गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥
चौपाई ५
रावनु बानु महाभट भारे । देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥
इसी घोषणा में रावण और बाणासुर का नाम आता है। बंदीजन कहते हैं कि वे बड़े भारी योद्धा भी धनुष देखकर चुपके से चले गये। यह भाटों द्वारा सुनायी गयी बात है। उनके कथन में उन महायोद्धाओं का उदाहरण धनुष की कठिनता को और बढ़ाता है। पोद्दार जी टीका में इसे इतना कठिन बताते हैं कि उठाने की बात छोड़िये, छूने का साहस भी नहीं हुआ। घोषणा सुन रही सभा को अब अपने प्रयत्न की तुलना उन नामों से भी करनी पड़ेगी।
शर्त स्पष्ट है। जो आज इस राजसमाज में उसी शिवधनुष को तोड़ेगा, जानकी उसे बिना किसी विचार के दृढ़तापूर्वक वरण करेंगी। साथ ही तीनों लोकों की विजय का गौरव होगा। वरण और विजय को एक ही घोषणा में रखा गया है। हाथ की जयमाला का सम्बन्ध अब इस शर्त से खुलता है। सीता का रूप देखकर जागी अभिलाषा के सामने वह धनुष है, जिसे तोड़कर ही घोषित प्रण पूरा होगा।
लोग मन ही मन विधाता से जनक का प्रण छुड़ाकर राम और सीता का विवाह कराने की विनती करते हैं। जनक भाटों से वही प्रण घोषित कराते हैं: जो शिवधनुष तोड़ेगा, जानकी उसका वरण करेंगी और उसे त्रिभुवन की विजय मिलेगी। रावण और बाणासुर की असफलता घोषणा में बतायी जाती है।
धनुष अपनी जगह अचल रहा
प्रण सुनते ही राजाओं की अभिलाषा बढ़ जाती है। जिनके मन में अपनी वीरता का अभिमान है, वे विशेष रूप से तमतमा उठते हैं। कमर कसते हैं, अकुलाकर अपनी जगह से उठते हैं और इष्टदेवों को सिर नवाकर धनुष की ओर चलते हैं। अभी घोषणा में जिस कठिनाई का वर्णन हुआ, उसे सामने जाकर अपने बल से पार कर लेने की उत्कण्ठा है। कवि उनके उठने की अकुलाहट और उनके प्रणाम, दोनों को साथ रखते हैं।
धनुष के पास जाकर वे ताव से उसकी ओर देखते हैं। फिर दृष्टि जमाकर उसे पकड़ते हैं और करोड़ों भाँति से बल लगाते हैं। किन्तु धनुष उठता ही नहीं। जिस क्रिया के बाद अगली क्रिया सम्भव होती, वही आरम्भ पूरा नहीं होता। अभी प्रत्यंचा चढ़ाने या धनुष तोड़ने तक पहुँचना दूर है। हाथ लगा है, बल लगा है, किन्तु भूमि से उसका सम्बन्ध वैसा ही बना रहता है।
सभी राजाओं का आचरण एक जैसा भी नहीं है। जिनके मन में कुछ विवेक है, वे धनुष के पास जाते ही नहीं। इस छोटी सी सूचना से सभा में दो अवस्थाएँ दिखाई देती हैं। एक ओर अपनी वीरता के आग्रह में बढ़नेवाले हैं, दूसरी ओर कठिनाई को समझकर अपनी जगह रहनेवाले। आगे दोहे में उन्हीं मूर्ख राजाओं का चित्र है जो तमककर पकड़ते हैं और असफल होकर लजाये हुए लौटते हैं।
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
दोहा २५०
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ॥ २५०॥
तुलसी धनुष को मानो राजाओं की भुजाओं का बल मिलता हुआ दिखाते हैं। जितना बल लगाया जाता है, वह उतना ही अधिक भारी होता जान पड़ता है। परिश्रम बढ़ रहा है और उसके साथ लौटने की लज्जा भी। यह कवि की उपमा है, जिसमें विफल प्रयत्न का अनुभव दिखाई देता है। जिस वस्तु को उठना था, वह हाथों के नीचे और भी अचल लगने लगती है।
भूप सहस दस एकहि बारा । लगे उठावन टरइ न टारा॥
चौपाई ६
डगइ न संभु सरासनु कैसें । कामी बचन सती मनु जैसें॥
अब दस हजार राजा एक ही बार उसे उठाने लगते हैं। संख्या इतनी बड़ी हो जाने पर भी परिणाम में कोई परिवर्तन नहीं आता। उनके टाले वह धनुष टलता नहीं। उसकी इस अडिगता को तुलसी पतिव्रता स्त्री के मन से समझाते हैं, जिसे किसी कामी के वचन डिगा नहीं सकते। बाहरी आग्रह कितना ही बढ़े, भीतर का निश्चय अपने स्थान पर बना रहता है। यहाँ उसी अविचलता से शिवधनुष का न हिलना स्पष्ट होता है।
राजाओं के लिये अगली उपमा और कठोर है। वे ऐसे उपहास के योग्य हो जाते हैं जैसे वैराग्य के बिना संन्यासी। जिस पहचान का दावा हो, उसका आधार भीतर न हो तो वह दावा स्वयं लज्जा का कारण बनता है। कीर्ति, विजय और बड़ी वीरता, जिन्हें पाने की कामना लेकर वे आये थे, सब धनुष के हाथों हार जाते हैं। अन्ततः हृदय से हारकर, कान्तिहीन हुए राजा अपने अपने समाज में लौटकर बैठते हैं। अब जनक इन्हीं लौटे हुए चेहरों को देखते हैं।
राजा कमर कसकर और इष्टदेवों को प्रणाम करके धनुष उठाने जाते हैं। विवेकी राजा पास नहीं जाते। दस हजार राजा एक साथ लगकर भी उसे हिला नहीं पाते। सब कीर्ति और वीरता गँवाकर लज्जित होते हैं और अपने अपने समाज में बैठ जाते हैं।
जनक का सन्ताप, जिसे सभा ने सुना
जनक राजाओं को असफल देखकर अकुला उठते हैं। उनके वचन मानो रोष में सने हुए निकलते हैं। अभी तक प्रण भाटों के मुख से घोषित हुआ था, अब उसी प्रण को करनेवाले राजा स्वयं बोल रहे हैं। उनके सामने प्रयत्नों का पूरा परिणाम है। इतने लोग आये, धनुष के लिये उठे, और लौटकर बैठ गये। इस दृश्य से उनकी वाणी में जो पीड़ा आती है, उसमें प्रतिज्ञा की प्रतिष्ठा और कन्या के विवाह की चिन्ता दोनों हैं।
वे कहते हैं कि उनका प्रण सुनकर द्वीप द्वीप के अनेक राजा आये हैं। देवता और दैत्य भी मनुष्य का शरीर धारण करके आये, और बहुत से रणधीर वीर उपस्थित हुए। जनक अपनी सभा की व्यापकता गिनाते हैं। केवल किसी एक राज्य या छोटे राजसमूह का बल यहाँ नहीं परखा गया। उनके कथन में दूर दूर के राजाओं और देव दानवों तक का आगमन है। इसी विस्तार के बाद असफलता उन्हें और असह्य लगती है।
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
दोहा २५१
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय॥ २५१॥
धनुष तोड़कर पाने को कितना कुछ था: मनोहर कन्या, बड़ी विजय, अत्यन्त सुन्दर कीर्ति। जनक को लगता है कि इन सबका अधिकारी धनुष को वश में करनेवाला पुरुष मानो ब्रह्मा ने बनाया ही नहीं। उनके वाक्य का यह मानो दुःख का है। सभा सामने भरी हुई है और पाने योग्य फल भी सामने है, फिर भी उसे प्राप्त करनेवाला कोई दिखाई नहीं देता। इसीलिये वे अगली बात प्रश्न बनाकर रखते हैं, ऐसा लाभ किसे अच्छा नहीं लगता।
पर लाभ की इच्छा के साथ सफलता नहीं आयी। कोई शंकर के धनुष पर प्रत्यंचा नहीं चढ़ा सका। जनक बात को और नीचे, सबसे पहली आवश्यकता तक लाते हैं: चढ़ाना और तोड़ना तो रहने दीजिये, किसी ने उसे तिल भर भूमि से भी अलग नहीं किया। उनकी शिकायत केवल अन्तिम शर्त पूरी न होने की नहीं है। इतना बल एकत्र होकर प्रारम्भ भी न कर सका, इसी बात की चोट उनकी वाणी में उतरती है।
अब जनि कोउ माखै भट मानी। बीर बिहीन मही मैं जानी॥
चौपाई ७
तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू॥
फिर वह कठोर वाक्य आता है कि अब कोई वीरता का अभिमानी नाराज न हो, उन्होंने पृथ्वी को वीरों से खाली जान लिया है। वे सबको आशा छोड़कर अपने अपने घर जाने को कहते हैं। उनके दुःख का निष्कर्ष है कि विधाता ने वैदेही का विवाह लिखा ही नहीं। धनुष के सामने हुए प्रयत्नों से उनकी वाणी सीधा कन्या के भाग्य तक पहुँच गयी है। सभा की असफलता अब पिता के लिये जीवन की असम्भवता जैसी बन जाती है।
लेकिन उनके भीतर एक और बन्धन है। यदि वह प्रतिज्ञा छोड़ दें तो पुण्य जाता है। जनक पूछते हैं, फिर वह क्या करें; कन्या कुँआरी ही रहे। इन वचनों में कोई सहज निकास नहीं बचा। जो लोग थोड़ी देर पहले मन ही मन प्रण छुड़ाने की प्रार्थना कर रहे थे, वे अब उसी प्रण के विषय में जनक का दूसरा पक्ष सुनते हैं। लोगों को उसे छोड़ देना उचित लगता था; जनक को उसके त्याग में अपने सुकृत की हानि दिखाई देती है।
अन्त में वे पश्चात्ताप करते हैं कि यदि जानते पृथ्वी वीरों से शून्य है तो ऐसी प्रतिज्ञा करके उपहास के पात्र ही न बनते। वचन वापस लेने की बात तक आकर वह उसके मूल्य के कारण रुक गये हैं; अब वचन देने के क्षण पर पछता रहे हैं। पूरी सभा इन बातों को सुनती है। सभी स्त्री पुरुष जानकी की ओर देखते हैं और दुखी हो जाते हैं। जनक के भाषण का सबसे कोमल परिणाम इस दृष्टि में है, लोगों का ध्यान अन्ततः उसी कन्या पर आ ठहरता है जिसका विवाह इस शर्त में अटका हुआ है।
जनक आये हुए राजाओं, देवताओं, दैत्यों और वीरों को गिनाकर कहते हैं कि कोई धनुष को भूमि से तिल भर भी न उठा सका। वे पृथ्वी को वीरहीन बताकर सबको लौटने को कहते हैं। प्रण त्यागने में पुण्य की हानि है, निभाने में कन्या का अविवाहित रहना दिखाई देता है। उनके पश्चात्ताप को सुनकर लोग सीता की ओर देखते हैं और दुखी होते हैं।
लक्ष्मण का रोष और राम की अनुमति
उसी वचन को सुनकर लक्ष्मण का भाव सबसे अलग उठता है। उनकी भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं, ओठ फड़कते हैं और आँखें क्रोध से लाल हो उठती हैं। जनक की बात उन्हें बाण जैसी लगी है। पृथ्वी पर वीर न रहने की घोषणा उस सभा में हुई है जहाँ राम उपस्थित हैं। लक्ष्मण इस चोट को अनुभव करते हैं, किन्तु राम के सामने होने का संकोच भी उन्हें रोकता है। क्रोध मुख पर स्पष्ट है, वाणी अभी रुकी हुई है।
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
दोहा २५२
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान॥ २५२॥
बोलने से पहले वे राम के चरणकमलों में सिर नवाते हैं। उनके उत्तर का आरम्भ इस प्रणाम से होता है, और आगे जितना भी सामर्थ्य कहा जाता है वह राम की आज्ञा के अधीन रहता है। वे जनक के कथन को अनुचित बताते हैं: जहाँ रघुवंशियों में से कोई भी उपस्थित हो, उस समाज में कोई ऐसी वाणी नहीं कहता। यहाँ तो स्वयं रघुकुलमणि उपस्थित हैं और यह जानते हुए भी जनक ने ऐसी बात कही।
इसलिये लक्ष्मण के कथन का सम्बोधन पहचानना आवश्यक है। जनक की वाणी उन्हें लगी है, पर आगे वे सूर्यकुलरूपी कमल के सूर्य राम से कह रहे हैं। सभा उनकी बात सुनती है और जनक भी सुनते हैं, किन्तु अनुमति वह अपने प्रभु से माँगते हैं। अपनी शक्ति का हर प्रस्ताव उसी ओर रखा जाता है। रोष में भी उनके सम्बन्ध की मर्यादा बनी हुई है, चरणों में नमन करके ही वचन निकलते हैं।
सुनहु भानुकुल पंकज भानू । कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू॥
चौपाई ८
जौं तुम्हारि अनुसासन पावौं । कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं॥
वे कहते हैं कि यह उनके स्वभाव की बात है, अभिमान से नहीं कह रहे। यदि राम की आज्ञा मिले तो ब्रह्माण्ड को गेंद की तरह उठा लें। जो धनुष राजा तिल भर भूमि से न छुड़ा सके, उसके उत्तर में लक्ष्मण पूरे ब्रह्माण्ड को उठाने की बात करते हैं। पर वाक्य में पहले अनुमति है, उसके बाद यह विशाल सामर्थ्य। वे अपने को सभा की प्रतियोगिता में स्वतन्त्र रूप से उतार देने की घोषणा नहीं करते; राम के शासन को उसके आगे रखते हैं।
काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी॥
चौपाई ९
तव प्रताप महिमा भगवाना। को बापुरो पिनाक पुराना॥
आगे उसी ब्रह्माण्ड को कच्चे घड़े की तरह फोड़ डालने का प्रस्ताव है। सुमेरु पर्वत को मूली की तरह तोड़ सकते हैं। गेंद, कच्चा घड़ा और मूली, इन परिचित वस्तुओं के सामने ब्रह्माण्ड और सुमेरु रख दिये गये हैं। जो अत्यन्त विशाल और दृढ़ समझे जाते हैं, लक्ष्मण की वाणी में वे उठाने और तोड़ने का सहज विषय बन जाते हैं। यह उनकी क्रोधभरी सामर्थ्य की घोषणा है। वे उस सामर्थ्य का आश्रय भी उसी समय बताते हैं, भगवान् राम के प्रताप की महिमा।
उसी प्रताप के सामने यह पुराना पिनाक क्या है। लक्ष्मण फिर नाथ कहकर आज्ञा माँगते हैं कि यह जानकर आदेश हो तो कुछ कौतुक करें और राम उसे देखें। धनुष को कमल की डंडी की तरह चढ़ा दें और उसे लेकर सौ योजन तक दौड़ते चले जायँ। पहले ब्रह्माण्ड और पर्वत की उपमाएँ थीं, अब सामने रखे धनुष पर सीधा प्रस्ताव है। उसकी कठोरता उनके कथन में कमलनाल जैसी कोमल हो जाती है, और सौ योजन की दूरी उस उठाने को बहुत आगे तक ले जाती है।
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।
दोहा २५३
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ॥ २५३॥
फिर वे उसे कुकुरमुत्ते की डंडी की तरह तोड़ देने को कहते हैं। यहाँ भी बल राम के प्रताप का है। अपने वचन को वे प्रभु के चरणों की शपथ से बाँधते हैं: यदि ऐसा न कर सकें तो फिर धनुष और तरकस हाथ में भी न लें। केवल किसी एक प्रयत्न से हट जाने का वादा नहीं, अपने शस्त्रों को कभी न छूने की शपथ है। जनक के कथन से लगा बाण अब लक्ष्मण की इस दृढ़ प्रतिज्ञा तक पहुँच गया है।
उनके क्रोधभरे वचन निकलते ही पृथ्वी डगमगाती है और दिशाओं के हाथी डोल उठते हैं। सभी लोग और राजा भयभीत हो जाते हैं। उसी समय सीता के हृदय में हर्ष होता है और जनक सकुचा जाते हैं। एक ही वाणी सभा में अलग अलग फल देती है। जिस वाक्य ने पहले सबको जानकी की ओर देखकर दुखी किया था, उसके उत्तर से अब जानकी के हृदय में आनन्द आया है। जनक अपने सामने रघुवंश के इस रोष को सुन रहे हैं।
गुरु विश्वामित्र, राम और सभी मुनि मन में प्रसन्न होते हैं, बार बार पुलकित होते हैं। फिर राम संकेत से लक्ष्मण को रोकते हैं और प्रेमपूर्वक अपने निकट बैठा लेते हैं। जिस रोष से इतनी बड़ी सभा भय से भर गयी, उसे राम का एक इशारा रोक देता है। संकेत के साथ स्नेह है। लक्ष्मण को पास बिठाने में उनका आदर बना रहता है और सभा में आगे क्या होना है, उसकी बागडोर फिर गुरु तथा राम के पास आ जाती है।
लक्ष्मण राम को प्रणाम करके जनक की वाणी का प्रतिवाद करते हैं। राम की अनुमति और प्रताप पर निर्भर अपनी शक्ति को ब्रह्माण्ड, घड़े, सुमेरु, मूली, कमलनाल और कुकुरमुत्ते की उपमाओं में कहते हैं, सौ योजन दौड़ने का प्रस्ताव रखते हैं और विफल होने पर धनुष तरकस न छूने की शपथ लेते हैं। सभा डरती है, सीता हर्षित होती हैं, जनक सकुचाते हैं। राम संकेत से रोककर उन्हें प्रेम से पास बैठाते हैं।
गुरु की आज्ञा, और उठते हुए राम
विश्वामित्र शुभ समय पहचानते हैं। जिस सभा में अभी लज्जा, पश्चात्ताप और रोष की वाणियाँ सुनायी दीं, वहाँ अब गुरु की अत्यन्त स्नेहमयी वाणी आती है। वे राम को उठने के लिये कहते हैं। आज्ञा में काम भी स्पष्ट है और उसका उद्देश्य भी: शिवधनुष तोड़ें तथा जनक का सन्ताप मिटायें। जिस राजा की वाणी से लक्ष्मण व्यथित हुए, उसी राजा का दुःख हरना इस आज्ञा में सामने रखा गया है।
बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी॥
चौपाई १०
उठहु राम भंजहु भवचापा । मेटहु तात जनक परितापा॥
इस सम्बोधन का स्नेह ध्यान में रखिये। विश्वामित्र राम को तात कहकर जनक के परिताप की ओर ले जाते हैं। भाटों की घोषणा में वरण और त्रिभुवन की विजय का फल कहा गया था; गुरु की आज्ञा में दुखी जनक का मन है। वही धनुष, वही सभा और वही राम हैं, किन्तु अभी करने योग्य कर्म का प्रयोजन इस छोटी सी वाणी में सन्ताप मिटाना हो गया है।
राम गुरु के वचन सुनते हैं और उनके चरणों में सिर नवाते हैं। उनके मन में न हर्ष आता है, न विषाद। वे सहज स्वभाव से उठ खड़े होते हैं। तुलसी इन दोनों भावों की अनुपस्थिति स्वयं बताते हैं। उस वर्णन को पूरा सुनिये: पहले गुरु की आज्ञा, फिर चरणों में प्रणाम, फिर हर्ष और विषाद से रहित उठना। इतने व्याकुल लोगों के बीच उनका स्वभाव अपनी सहजता में स्थिर है।
उनके खड़े होने की शोभा ऐसी है कि जवान सिंह भी लजा जाय। इस तुलना में राम की मुद्रा का गौरव है। टीका भी इसे खड़े होने की शान कहकर खोलती है। कथा ने धनुष उठाने से पहले अनेक राजाओं का अकुलाकर उठना दिखाया था। यहाँ उठने की अपनी सहज लय है। राम को अपनी ओर से प्रतिज्ञा जोड़नी नहीं पड़ती; गुरु की आज्ञा पाकर वे उठ चुके हैं।
उदित उदयगिरि मंच पर रघुबर बालपतंग।
दोहा २५४
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग॥ २५४॥
अन्तिम दोहा उसी उठने को सूर्योदय बना देता है। मञ्च उदयाचल है और रघुवर बालसूर्य हैं। उस उदय से सभी संतरूपी कमल खिल उठते हैं और नेत्ररूपी भौंरे हर्षित हो जाते हैं। तुलसी केवल उठे हुए राम को दिखाकर नहीं रुकते, उनके उठने से देखनेवालों के भीतर आया प्रकाश भी दिखाते हैं। जो आँखें इस दृश्य की ओर लगी हैं, उनके लिये वह उदय आनन्द का कारण है।
सीता के रूप से आरम्भ हुई यह सभा अन्त में राम के उदय पर ठहरती है। दोनों के बीच धनुष अचल रहा, राजाओं का मान टूटा, जनक की व्यथा बाहर आयी और लक्ष्मण का रोष उठा। अब गुरु की आज्ञा पूरी स्पष्टता से मिल चुकी है। राम सहज खड़े हैं, संतों के कमल खिल गये हैं, और इस क्षण की शोभा में दोहा पूरा होता है।
विश्वामित्र शुभ समय जानकर राम को शिवधनुष तोड़ने और जनक का दुःख मिटाने की आज्ञा देते हैं। राम गुरु को प्रणाम करते हैं और बिना हर्ष या विषाद के सहज उठते हैं। मञ्च पर उनका उठना सूर्य का उदय है, जिससे संतरूपी कमल और नेत्ररूपी भौंरे आनन्दित होते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस सभा में कही हुई बात का भार बार बार बदलता है। लोगों के मन में सीता और राम का विवाह इतना प्रिय है कि वे प्रण छूट जाने की विनती करते हैं। जनक को उसी प्रण के त्याग में पुण्य की हानि दिखाई देती है। एक ओर इच्छा का निश्चय है, दूसरी ओर अपने वचन का बन्धन। तुलसी दोनों को पूरा स्थान देते हैं, इसीलिये जनक का सन्ताप सुनते समय हम उनके कठोर वचन के पीछे की विवशता भी सुन पाते हैं।
लक्ष्मण का रोष भी अपने पूरे सम्बन्ध के भीतर समझ में आता है। उनकी भौंहें चढ़ती हैं, होंठ फड़कते हैं, पृथ्वी तक डोल उठती है। फिर भी बात कहने के पहले राम के चरणों में सिर झुकता है और बार बार अनुमति माँगी जाती है। उन्हीं राम का संकेत मिलते ही वे बैठ जाते हैं। उनके बल की विशाल उपमाओं के बीच यह प्रणाम और यह बैठना रखकर तुलसी सामर्थ्य के साथ उसका अनुशासन भी दिखाते हैं।
और सीता की आँखें हैं। सभा उन्हें देख रही है, उनकी आँखें राम को पाकर स्थिर हुई हैं, फिर गुरुजनों की लाज से सखियों की ओर गयी हैं। राम हृदय में बने रहे। जनक के वचन सुनकर लोग उनकी ओर दुखी होकर देखते हैं और लक्ष्मण की वाणी से उनके अपने हृदय में हर्ष होता है। इस पूरे प्रसंग में सार्वजनिक घोषणा और भीतर के भाव साथ साथ चलते हैं। सबसे ऊँची आवाज के साथ सबसे मौन अनुभव भी कथा में अपना स्थान रखता है।
दोहे का अन्त हमें उसी मञ्च पर छोड़ता है जहाँ राम खड़े हो चुके हैं। उनके उठने में विजय की उत्तेजना और संकट का विषाद, दोनों अनुपस्थित हैं। गुरु को प्रणाम किया गया है, आज्ञा सुनी गयी है, और संतों की आँखें हर्षित हैं। धनुष अभी टूटा नहीं है। इस समय कथा का प्रकाश उठते हुए रघुवर पर है, उस बालसूर्य पर जिसके उदय से सभा के संत कमल खिल उठे हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २४७ से २५४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।