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रावण के वर, लंका और तीनों लोकों का त्रास

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 20

तीनों भाइयों को वर मिलते हैं। समुद्र से घिरी लंका रावण की राजधानी बनती है, और उसकी सभा का आदेश सारे संसार के आचरण पर उतर आता है।

तीन भाई कठोर तपस्या में लगे हैं, ऐसा उग्र तप कि उसका वर्णन भी कठिन कहा गया है। ब्रह्मा प्रसन्न होकर उनके पास आते हैं, और एक ही अवसर पर तीन अलग माँगें सामने आती हैं। रावण वानर और मनुष्य, इन दो जातियों को छोड़कर किसी के मारे न मरने का वर माँगता है। कुम्भकर्ण को देखकर ब्रह्मा के मन में विस्मय होता है, और सरस्वती के द्वारा उसकी मति फेर दी जाती है। विभीषण को भगवान् के चरणों का निर्मल प्रेम चाहिये।

तुलसीदास के बालकाण्ड में यहाँ से रावण की बढ़ती सत्ता का क्रम खुलता है: पहले वर, फिर विवाह, समुद्र के बीच एक दुर्ग, और सेना तथा स्वजनों से भरी सभा। उस सभा के आदेश के बाद गाँवों की आग, रुके हुए अनुष्ठान और देश से निकाले गये वेद पुराण कहनेवालों का दुःख आता है।

लंका का नया राजघराना

  • रावण दस सिरवाला राक्षस, जो वर पाकर लंका को राजधानी बनाता है और अपने बल से सबको अधीन करता है।
  • ब्रह्मा तीनों भाइयों के तप से प्रसन्न होकर वर देते हैं। वे कुम्भकर्ण की माँग से पहले उसकी मति फेरने का उपाय करते हैं।
  • कुम्भकर्ण अतिबलवान् भाई, जो छः महीने सोता है और जिसके जागने पर तीनों लोकों में त्रास होता है।
  • विभीषण तीसरे भाई, जो भगवान् के चरणकमलों में निर्मल अनुराग माँगते हैं।
  • मय और मन्दोदरी मय अपनी कन्या मन्दोदरी को लाकर रावण को देता है। लंका का दुर्ग भी उसी ने फिर सँवारा है।
  • मेघनाद रावण का ज्येष्ठ पुत्र, जिसे बलवान् देवताओं को जीतकर बाँध लाने की आज्ञा मिलती है।
  • कुबेर जिनके रक्षक लंका में रहते हैं और जिनसे रावण पुष्पक विमान जीत लाता है।

एक तपस्या, तीन माँगें

तीनों भाइयों ने अनेक प्रकार के अत्यन्त कठिन तप किये। कथा तप की विधियाँ नहीं गिनाती। वह उसकी उग्रता बताकर सीधे उस क्षण पर आती है जब ब्रह्मा उनके निकट आते हैं। वे अपनी प्रसन्नता कहते हैं और वर माँगने को कहते हैं।

रावण विनय करता है और चरण पकड़ लेता है। अपने लिये अनुग्रह माँगते समय वह झुकना जानता है। उसकी प्रार्थना है कि वानर और मनुष्य, इन दो जातियों को छोड़कर वह किसी और के मारे न मरे। माँग में दोनों नाम साफ़ हैं। इसी वाक्य में उसकी सुरक्षा की सीमा भी आ गयी है। रावण ने इन्हीं दो से अपने मारे जाने का रास्ता खुला छोड़ा।

उत्तर में उसका बड़ा तप स्वीकार होता है और “ऐसा ही हो” का वर मिलता है। कथा कहनेवाले बताते हैं कि यह वर उन्होंने और ब्रह्मा ने मिलकर दिया। पोद्दार की टीका इस वक्ता को शिव बताती है। फिर ब्रह्मा कुम्भकर्ण के पास जाते हैं, और उसे देखते ही उनके मन में विस्मय उठता है।

यदि यह प्रतिदिन आहार करेगा, तो सारा संसार उजड़ जायगा। टीका इसे ब्रह्मा का विचार बताती है। ब्रह्मा सरस्वती को प्रेरित करके उसकी मति फेर देते हैं, और कुम्भकर्ण छः महीने की नींद माँगता है।

फिर ब्रह्मा विभीषण के पास जाकर “पुत्र” कहकर वर माँगने को कहते हैं। विभीषण भगवान् के चरणकमलों में अमल अनुराग माँगते हैं। पोद्दार इस निर्मल प्रेम को निष्काम और अनन्य बताते हैं। उनकी माँग में न जीवन की रक्षा है, न कोई राज्य, न शत्रु पर अधिकार। उसमें केवल इतना है कि अनुराग किसके प्रति रहे और कैसा रहे।

तीनों को वर देकर ब्रह्मा चले जाते हैं, और भाई प्रसन्न होकर अपने घर लौट आते हैं। हर्ष में तीनों साथ हैं, जैसे तप में साथ थे, पर उनकी माँगों का अन्तर अभी से दिखता है। विभीषण को उनका वर यहीं मिल जाता है। आगे की घटनाएँ रावण की बढ़ती शक्ति के पीछे चलती हैं।

मन्दोदरी और समुद्र के बीच का दुर्ग

घर लौटने के बाद कथा विवाह की ओर मुड़ती है। मय दानव की कन्या का नाम मन्दोदरी है, परम सुन्दरी और स्त्रियों में श्रेष्ठ। मय उन्हें लाकर रावण को देता है, क्योंकि वह जान चुका है कि रावण राक्षसों का राजा होगा। रावण अच्छी पत्नी पाकर प्रसन्न होता है, और फिर जाकर अपने दोनों भाइयों का भी विवाह कर देता है। उनकी पत्नियों के नाम यहाँ नहीं आते।

अब दृष्टि समुद्र के बीच जाती है। वहाँ त्रिकूट पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ अत्यन्त भारी और दुर्गम किला है। जिस मय की कन्या अभी रावण के घर आयी है, उसी ने इसे फिर से सँवारा है। उसमें मणियों से जड़े सोने के अनगिनत भवन हैं।

उसकी सुन्दरता बताने के लिये दो पुरियाँ सामने रखी जाती हैं: नागकुल का निवास भोगावती और इन्द्र का निवास अमरावती। लंका इन दोनों से भी अधिक रम्य और बाँकी कही गयी है, और जगत् में उसका नाम लंका प्रसिद्ध होता है। रावण के पहुँचने से पहले ही यह नगर सुन्दर भी है और दुर्गम भी।

पहली बात उसकी सुरक्षा है। चारों ओर घूमकर आती हुई समुद्र की अत्यन्त गहरी खाई है। भीतर मणियों से जड़ा सोने का दृढ़ परकोटा है, जिसकी बनावट का वर्णन नहीं हो सकता।

दूसरी बात समय का घेरा बड़ा कर देती है। भगवान् की प्रेरणा से जिस कल्प में जो राक्षसराज होता है, वही शूर, प्रतापी और अतुल बलवान् अपनी सेना के साथ इस पुरी में बसता है। लंका यहाँ राक्षसराज के पद से बँधी है। इसके बाद कथा बताती है कि उस समय वहाँ कौन रहता था, और रावण वहाँ कैसे आया।

लंका का अधिकार, पुष्पक और कैलास

लंका में बड़े राक्षस योद्धा रहते थे, जिन्हें देवताओं ने युद्ध में मार डाला। अब वहाँ इन्द्र की प्रेरणा से यक्षपति के एक करोड़ रक्षक रहते हैं। टीका यक्षपति को कुबेर बताती है। रावण को कहीं से यह समाचार मिलता है (बतानेवाले का नाम नहीं आता)। वह सेना तैयार करके लंका को घेर लेता है।

उस विकट योद्धा और उसकी विशाल सेना को देखकर यक्ष प्राण लेकर भाग जाते हैं। लंका इसी पलायन से रावण के हाथ आती है। कथा किसी और मुठभेड़ का विवरण नहीं देती। पहले के राक्षसों को देवताओं ने युद्ध में मारा था, पर रावण के सामने उस समय के रक्षक ठहरते ही नहीं।

वह सारे नगर में घूमकर उसे देखता है। उसकी चिन्ता मिट जाती है और बहुत सुख मिलता है। पोद्दार की टीका इसे रहने के स्थान की चिन्ता बताती है। नगर स्वभाव से सुन्दर और अगम है। यही देखकर रावण वहाँ अपनी राजधानी बनाता है।

फिर वह घर बाँटता है: जिसे जैसा योग्य समझा, वैसा निवास दिया, और सब राक्षस सुखी हुए। संसार पर पड़नेवाले दुःख से पहले कथा उस सुख का चित्र पूरा करती है जो रावण ने अपने लोगों के लिये जुटाया।

एक बार वह कुबेर पर चढ़ दौड़ता है और पुष्पक विमान जीतकर ले आता है। पहले कुबेर के रक्षक भागे थे, अब कुबेर की वस्तु उसके हाथ आयी है। राजधानी पा लेने के बाद भी रावण का बाहर निकलना चलता रहता है, और हर विजय उसकी पहुँच बढ़ाती है। विमान की बनावट या यात्रा की कोई और कथा यहाँ नहीं है।

इसके बाद रावण जाकर खेल ही खेल में कैलास पर्वत उठा लेता है। मानो उसने अपनी भुजाओं का बल तौल लिया, और वह बहुत सुख पाकर वहाँ से चला आया। यहाँ कैलास के प्रसंग में न कोई संवाद है, न दण्ड। उठाना, बल तौलना और प्रसन्न होकर लौटना, यही घटना है।

बढ़ता हुआ वैभव और योद्धाओं की पाँत

अब रावण के सौभाग्य की वस्तुएँ एक साथ गिनायी जाती हैं। सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, विजय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई, सब नित्य नये बढ़ते जाते हैं।

यह बढ़ना वैसा ही है जैसे हर लाभ पर लोभ बढ़ता है। लाभ मिल गया, फिर भी चाह बढ़ती रहती है। रावण की उपलब्धियाँ हर दिन नयी हैं, और उनकी बढ़त थमती नहीं दिखती।

इस सामर्थ्य में कुम्भकर्ण जैसा अतिबलवान् भाई है, जिसके जोड़ का योद्धा जगत् में जन्मा ही नहीं। वह मदिरा पीकर छः महीने सोता है, और उसके जागते ही तीनों लोकों में त्रास हो जाता है। आरम्भ में मिली नींद अब उसके जीवन का ढंग बनकर लौटी है।

फिर कहा जाता है कि यदि वह प्रतिदिन भोजन करे, तो सारा विश्व शीघ्र चौपट हो जाय। वह इतना रणधीर है कि उसका वर्णन नहीं हो सकता, और उसके जैसे असंख्य बलवान् वीर हैं। रावण के पास एक असाधारण भाई भी है और बहुत बड़ी वीरमण्डली भी।

फिर ज्येष्ठ पुत्र आता है। पोद्दार की टीका उसे मेघनाद नाम से पहचानती है, और आगे कथा में भी यही नाम आता है। संसार के योद्धाओं में उसकी पहली पाँत है। रण में कोई उसके सामने नहीं ठहरता, और स्वर्ग में नित्य भगदड़ मची रहती है। देवताओं के विरुद्ध आगे का आदेश विशेष रूप से इसी पुत्र को मिलेगा।

योद्धाओं में कुमुख, अकम्पन, कुलिसरद, धूमकेतु और अतिकाय गिनाये जाते हैं। पोद्दार की टीका कुमुख को दुर्मुख और कुलिसरद को वज्रदन्त कहती है। इनमें हर एक जगत् जीत सकता है।

इस शक्ति के साथ उनका स्वभाव भी बताया जाता है। वे मनमाना रूप बना सकते हैं और सब माया जानते हैं। धर्म और दया उनके स्वप्न में भी नहीं हैं। आगे वे अनेक रूप धरकर उपद्रव करेंगे। अभी उसी की तैयारी उनके परिचय में हो गयी है।

सभा में तय होता है कि देवताओं को कैसे वश में करें

एक बार रावण सभा में बैठा अपने अगणित परिवार को देखता है। पुत्र, पौत्र, सेवक और परिजन ढेर के ढेर हैं, और राक्षस जातियों को तो गिन ही कौन सकता है। उन्हें देखते हुए रावण बोलता है, और उसके वचनों में क्रोध और मद मिला हुआ है।

वह स्वभाव से ही अभिमानी है, और सेना देखकर वही अभिमान वाणी में भर आता है। रावण सब राक्षस दलों से सुनने को कहता है। देवता उसके शत्रु हैं, वह घोषणा करता है, और वे सामने युद्ध नहीं करते, बलवान् शत्रु देखकर भाग जाते हैं। वह अपनी युक्ति निकालता है।

वह कहता है कि देवताओं का मरण एक ही उपाय से होता है। वह उसे समझाकर बताता है: जहाँ ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध हों, वहाँ जाकर बाधा डाली जाय। पोद्दार की टीका इन चारों को देवताओं का बल बढ़ानेवाले कर्म बताती है। जिनसे रण में सामना नहीं हो रहा, उन्हें उस आहार और अर्पण से वंचित करना है जिस पर उनका बल टिका माना गया है।

इस तरह देवताओं को शत्रु कहने से शुरू हुई बात मनुष्यों के शुभ कर्मों तक पहुँच जाती है।

उसका कहना है कि भूख से क्षीण और बलहीन होकर देवता सहज ही आ मिलेंगे। तब वह उन्हें मार डालेगा, या भलीभाँति अपने अधीन करके छोड़ देगा। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि यह छोड़ना भी पूरी पराधीनता है। भूख, दुर्बलता, समर्पण, और फिर मृत्यु या अधीन जीवन, उसकी युक्ति में यह पूरा क्रम है।

मेघनाद की आज्ञा और रावण की गर्जना

फिर रावण मेघनाद को बुलवाता है, उसे सिखाता है, उसका बल बढ़ाता है और देवताओं के प्रति उसका वैर उभारता है। जो देवता संग्राम में धीर और बलवान् हैं, जिन्हें अपने लड़ने का अभिमान है, उन्हें युद्ध में जीतकर बाँध लाना है। सबके काम के बाद पुत्र को यह अलग काम मिलता है।

मेघनाद उठकर पिता की आज्ञा सिर पर रखता है। रावण इसी तरह सबको आदेश देता है, और फिर स्वयं हाथ में गदा लेकर निकल पड़ता है। राक्षस दलों को धार्मिक कर्म रोकने हैं, पुत्र को बलवान् देवताओं को बाँध लाना है, और रावण स्वयं भी बाहर है।

उसके चलने से पृथ्वी डोलती है, और उसकी गर्जना से देवरमणियों के गर्भ गिर जाते हैं।

देवता सुनते हैं कि रावण क्रोध में आ रहा है, और मेरु पर्वत की गुफाओं की ओर ताकते हैं। टीका के अनुसार वे भागकर वहाँ आश्रय लेते हैं। रावण दिक्पालों के सारे सुन्दर लोकों को सूना पाता है। उस सूनेपन में वह बार बार भारी सिंहगर्जना करता है, देवताओं को गालियाँ देता है और ललकारता है। पर उत्तर देनेवाला कोई सामने नहीं आता।

तब वह रण के मद में मतवाला होकर सारे जगत् में दौड़ता फिरता है। उसे अपने जोड़ का योद्धा चाहिये, और ऐसा कोई कहीं नहीं मिलता।

किसी को स्वतन्त्र न रहने देना

अब उसके पीछा करने की सीमा एक एक नाम से खुलती है: सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम, ये सब अधिकारी। फिर किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग। वह हठ करके सबके पीछे पड़ता है। पोद्दार की टीका के अनुसार उसने किसी को शान्ति से बैठने नहीं दिया।

ब्रह्मा की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री पुरुष हैं, सब उसके वश में हो जाते हैं। वे भय से उसकी आज्ञा मानते हैं और नित्य आकर नम्रता से उसके चरणों में सिर झुकाते हैं।

पहले उसके राज की बात साफ़ कही जाती है। उसने भुजाओं के बल से विश्व को वश में कर लिया और किसी को स्वतन्त्र न रहने दिया। मण्डलीक राजाओं का शिरोमणि रावण अपने ही मन्त्र से राज्य करता है। टीका इसे अपनी इच्छा से राज्य करना बताती है। जो सामर्थ्य वह अपने लिये जोड़ता आया था, उसका संसार के लिये फल पूरी पराधीनता है।

फिर वह अधिकार स्त्रियों के जीवन तक पहुँचता है। देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों और नागों की कन्याओं को, बहुत सी सुन्दर और श्रेष्ठ स्त्रियों को, वह अपनी भुजाओं के बल से जीतकर ब्याह लेता है। विश्व को अधीन करने और इन विवाहों, दोनों का आधार एक ही है: भुजाओं का बल।

रावण ने मेघनाद से जो कहा, वह उसने मानो पहले ही कर रखा था। उसका एक नाम इन्द्रजीत भी है। पोद्दार की टीका इसे आज्ञा पालने की शीघ्रता बताती है: पिता के कहने भर की देर थी। उसकी विजयों की कोई अलग युद्धकथा यहाँ नहीं खुलती। कथा उन राक्षसों की ओर लौटती है जिन्हें पहले आदेश मिला था, यह दिखाने कि उन्होंने क्या किया।

सभा का आदेश गाँवों की आग बन जाता है

वे राक्षस देखने में भयानक, पापी और देवताओं को सन्ताप देनेवाले हैं। उनके समूह माया से अनेक रूप धरकर उपद्रव करते हैं। पहले बतायी गयी रूप बदलने की विद्या अब काम में आती है। जिस विधि से धर्म की जड़ कटे, वे वही सब वेद के विरुद्ध काम करते हैं।

जहाँ जहाँ उन्हें गौ और ब्राह्मण मिलते हैं, वहाँ के नगर, गाँव और पुरवे में वे आग लगा देते हैं। बड़ी बस्ती हो या छोटा पुरवा, उनकी हिंसा सब जगह पहुँचती है। सभा का आदेश चार कर्मों में बाधा का था।

अब कहीं शुभ आचरण नहीं होता। देवता, ब्राह्मण और गुरु को कोई नहीं मानता। न भगवान् की भक्ति रही, न यज्ञ, तप और ज्ञान। वेद और पुराण स्वप्न में भी सुनायी नहीं देते। पोद्दार की टीका शुभ आचरण रुकने का कारण राक्षसों का डर बताती है। वह उनमें ब्राह्मणभोजन, यज्ञ और श्राद्ध गिनाती है, यानी आदेश में गिनाये चार कर्मों में से तीन।

वेद पुराण का सुनायी न देना आगे उनके कहनेवालों पर होनेवाले अत्याचार से जुड़ता है। अनुष्ठान रुकते हैं, सम्मान जाता है, और कथा और ज्ञान की आवाज़ बन्द हो जाती है।

अब रावण का अपना व्यवहार सामने आता है। उसके कान में कहीं जप, योग, वैराग्य, तप या यज्ञभाग की बात पड़ती है, तो वह स्वयं उठकर दौड़ता है। पोद्दार की टीका यज्ञभाग को देवताओं के भाग पाने की बात बताती है। सभा में चार कर्म गिनाये गये थे। उसे दौड़ा देनेवाली बातें पाँच हैं। और उनमें से एक, यज्ञ, दोनों सूचियों में है।

वह कुछ भी रहने नहीं देता, सबको पकड़कर विध्वंस कर डालता है। संसार का आचरण इतना भ्रष्ट हो जाता है कि धर्म कानों में भी नहीं पड़ता। जो कोई वेद और पुराण कहता है, उसे वह अनेक प्रकार से त्रास देता है और देश से निकाल देता है। कहनेवाले को दुःख और देश निकाला, सुननेवाले को मौन।

आरम्भ की लंका याद कीजिये, जहाँ रावण ने अपने लोगों को योग्यतानुसार घर देकर सुखी किया था। यहाँ दूसरे लोग अपनी बस्तियों को जलते देखते हैं और वेद पुराण कहनेवाले अपने देश से निकाले जाते हैं। रहने की जगह देना और रहने की जगह छीनना, उसकी सत्ता के ये दोनों काम कथा में साफ़ हैं।

हिंसा में प्रीति

राक्षस जो घोर अनीति करते हैं, उसका वर्णन नहीं हो सकता। हिंसा में उनकी अत्यन्त प्रीति है। ऐसों के पापों की क्या सीमा, बात इसी प्रश्न पर ठहरती है।

बुझती आवाज़ें, जलती बस्तियाँ

इस प्रसंग में शक्ति का हिसाब विस्तार से मिलता है: कठोर तप, वर, सोने का परकोटा, एक करोड़ रक्षकों का पलायन, अतिबलवान् भाई और संसार जीत सकनेवाले योद्धा। इतनी सामर्थ्य के बाद रावण का राज्य जिस बात से पहचाना जाता है, वह कथा कह चुकी है: सब भय से आज्ञा मानते हैं। और कोई स्वतन्त्र नहीं रहता।

आरम्भ में रावण वर माँगते हुए चरण पकड़ता है। आगे लोग भयभीत होकर उसके चरणों में झुकते हैं। लंका का वैभव और संसार का दुःख इसी तरह साथ साथ पढ़ने हैं।

और उन आवाज़ों को याद रखिये जो अन्त तक सुनायी देना बन्द हो गयीं। यज्ञ, जप और वेद पुराण का श्रवण रोकने के लिये हिंसा की गयी, कहनेवालों को निकाला गया। रावण का भय सबसे गहरा वहाँ दिखता है जहाँ कोई उससे लड़ भी नहीं रहा, केवल अपना शुभ आचरण कर रहा है।

तीनों भाइयों के तप से चली कथा अब ऐसे संसार पर ठहरी है जहाँ धर्म की बात कानों में नहीं पड़ती। वहाँ राक्षसों को हिंसा प्रिय है। बीच में जो बढ़ा, वह सुख और सम्पत्ति थी। जो फैला, वह भय और अनीति है। लंका का सोना अपनी चमक रखता है, और उसके बाहर जलती बस्तियों का दुःख भी आँखों के सामने बना रहता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 177 से पहले की चौपाइयों से सोरठा 183 तक, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।