रामचरितमानस · बालकाण्ड · रावण के वर, लंका और तीनों लोकों का त्रास
रावण के वर, लंका और तीनों लोकों का त्रास
तीनों भाइयों को वर मिलते हैं। समुद्र से घिरी लंका रावण की राजधानी बनती है, और उसकी सभा का आदेश धीरे धीरे सारे संसार के आचरण पर उतर आता है।
तीन भाई कठोर तपस्या में लगे हैं। तप ऐसा उग्र है कि उसका वर्णन भी कठिन कहा गया है। ब्रह्मा प्रसन्न होकर उनके पास आते हैं, और अब एक ही अवसर पर तीन अलग माँगें सामने आनेवाली हैं। रावण अपने मारे जाने की सम्भावना बाँधना चाहता है। कुम्भकर्ण की भूख देखकर ब्रह्मा पहले संसार की चिन्ता करते हैं। विभीषण को भगवान् के चरणों का निर्मल प्रेम चाहिये। एक साथ किये गये तप का फल हर भाई के हाथ में अपनी अलग आकृति लेता है।
तुलसीदास के बालकाण्ड में यहाँ से रावण की बढ़ती हुई सत्ता का क्रम खुलता है। पहले वर है, फिर विवाह, समुद्र के बीच एक दुर्ग, सेना और स्वजनों से भरी सभा। उस सभा में दिया गया आदेश अन्त तक पहुँचते पहुँचते गाँवों की आग, रुक गये अनुष्ठानों और देश से निकाले गये वेद पुराण कहनेवालों का दुःख बन जाता है। आरम्भ में रावण किसी के चरण पकड़कर विनय करता है। आगे सभी को उसके चरणों में भय से झुकना पड़ता है। इन दोनों दृश्यों के बीच उसकी शक्ति का पूरा व्यवहार सामने आता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- रावण दस सिरवाला राक्षस, जो वर पाकर लंका को राजधानी बनाता है और अपने बल से सबको अधीन करता है।
- ब्रह्मा तीनों भाइयों के तप से प्रसन्न होकर वर देनेवाले; कुम्भकर्ण की माँग से पहले उसकी बुद्धि फेरने का उपाय करते हैं।
- कुम्भकर्ण अतिबलवान् भाई, जिसकी छः महीने की नींद और जागने पर उठनेवाला त्रास साथ साथ वर्णित हैं।
- विभीषण तीसरे भाई, जो भगवान् के चरणकमलों में निर्मल अनुराग माँगते हैं।
- मय और मन्दोदरी मय अपनी कन्या मन्दोदरी का विवाह रावण से करता है; लंका का दुर्ग भी उसी ने फिर सँवारा है।
- मेघनाद रावण का ज्येष्ठ पुत्र, जिसे बलवान् देवताओं को जीतकर बाँध लाने की आज्ञा मिलती है।
- कुबेर लंका में जिनके रक्षक रहते हैं और जिनसे रावण पुष्पक विमान जीत लाता है।
एक तपस्या, तीन माँगें
तीनों भाइयों ने अनेक प्रकार के अत्यन्त कठिन तप किये। तपस्या की विधियाँ अलग अलग गिनाने में तुलसी यहाँ नहीं ठहरते। वे उसकी उग्रता बता देते हैं और सीधे उस क्षण पर पहुँचते हैं जब ब्रह्मा उनके निकट आते हैं। प्रसन्नता पहले कही जाती है, माँगने की अनुमति उसके बाद मिलती है। जो इतना कठिन साधन कर चुके हैं, अब उन्हें अपने मन की बात कहनी है। भगवान् के सामने माँग रखने के इस अवसर में आगे की कथा का आरम्भ छिपा है।
कीन्ह बिबिध तप तीनिहुँ भाई । परम उग्र नहिं बरनि सो जाई॥
चौपाई १
गयउ निकट तप देखि बिधाता । मागहु बर प्रसन्न मैं ताता॥
रावण विनय करता है और चरण पकड़ लेता है। दस सिरवाले का यह पहला व्यवहार ध्यान में रखिये। वह अपने लिये अनुग्रह माँगते समय झुकना जानता है। उसकी प्रार्थना है कि वानर और मनुष्य, इन दो जातियों को छोड़कर वह किसी और के मारे न मरे। माँग में दोनों नाम साफ़ रखे गये हैं। उसे मिलनेवाली सुरक्षा की सीमा भी इसी वाक्य में आ गयी है। इस समय कथा इतना ही बताती है कि रावण ने किनसे अपने मारे जाने का रास्ता खुला रहने दिया।
करि बिनती पद गहि दससीसा। बोलेउ बचन सुनहु जगदीसा॥
चौपाई २
हम काहू के मरहिं न मारें । बानर मनुज जाति दुइ बारें॥
उत्तर में उसका बड़ा तप स्वीकार किया जाता है और माँगी हुई बात होने का वर मिलता है। इस चौपाई में बोलनेवाला अपने और ब्रह्मा के मिलकर वर देने का उल्लेख करता है। पोद्दार की टीका इस वक्ता को शिव के रूप में पहचानती है। इसलिये रावण के वरदान में दोनों का होना यहीं कहा गया है। फिर ब्रह्मा कुम्भकर्ण के पास जाते हैं। एक भाई की माँग पूरी हुई है, दूसरे को देखते ही वर देनेवाले के मन में विस्मय उठता है।
कुम्भकर्ण के विषय में जो विचार सामने आता है, वह उसकी भूख का है। यदि यह प्रतिदिन आहार करेगा, तो सारा संसार उजड़ जायगा। इतनी बड़ी देह और इतना आहार, कि भोजन का रोज़ का क्रम ही जगत् के लिये संकट हो सकता है। ब्रह्मा सरस्वती को प्रेरित करके उसकी बुद्धि फेर देते हैं। तब कुम्भकर्ण छः महीने की नींद माँगता है। माँग उसी के मुँह से आती है, और उससे पहले उसकी मति फेरने की घटना भी स्पष्ट रूप से कही गयी है।
नींद की अवधि छः महीने है। आगे जब इस भाई का बल गिनाया जायगा, यही अवधि फिर लौटेगी। अभी हम उसका कारण सुन रहे हैं: प्रतिदिन भोजन करने पर संसार के उजड़ जाने का भय। ब्रह्मा जिस सम्भावना को देखकर चिन्तित हुए, उसी से यह अनोखा वर जुड़ा है। कुम्भकर्ण के जागने और सोने का उल्लेख आगे उसकी वीरता के साथ होगा, इसलिये यहाँ मिली नींद को याद रखना कथा को समझने का हिस्सा है।
गए बिभीषन पास पुनि कहेउ पुत्र बर मागु।
दोहा १७७
तेहिं मागेउ भगवंत पद कमल अमल अनुरागु॥ १७७॥
फिर विभीषण के पास जाकर ब्रह्मा पुत्र कहकर वर माँगने को कहते हैं। विभीषण भगवान् के चरणकमलों में अमल अनुराग माँगते हैं। पोद्दार इस निर्मल प्रेम को निष्काम और अनन्य बताते हैं। माँग में जीवन की रक्षा, किसी राज्य की प्राप्ति अथवा शत्रु पर अधिकार का विषय नहीं आता। सामने जो अवसर मिला है, उसमें विभीषण अपने हृदय का सम्बन्ध माँगते हैं। अनुराग किसके प्रति रहे और कैसा रहे, दोहे में यही दोनों बातें रख दी गयी हैं।
तीनों को वर मिल जाते हैं। ब्रह्मा चले जाते हैं और भाई प्रसन्न होकर अपने घर लौट आते हैं। इस हर्ष में तीनों साथ हैं, जैसे तप करते समय साथ थे। उनकी माँगों का अन्तर इस साझा प्रसन्नता से मिटता नहीं। एक ही परिवार में मिला हुआ वर किस दिशा में जाता है, वह अभी से अलग दिखाई देता है। विभीषण की माँग यहीं पूरी हो जाती है; आगे की घटनाएँ रावण की बढ़ती शक्ति के पीछे चलती हैं।
रावण वानर और मनुष्य को छोड़कर किसी के मारे न मरने का वर माँगता है। कुम्भकर्ण की मति सरस्वती द्वारा फेर दी जाती है और वह छः महीने की नींद माँगता है। विभीषण को भगवान् के चरणों का निर्मल प्रेम चाहिये। वर पाकर तीनों भाई प्रसन्न होकर घर लौटते हैं।
मन्दोदरी और समुद्र के बीच का दुर्ग
घर लौटने के बाद कथा विवाह की ओर मुड़ती है। मय की कन्या का नाम मन्दोदरी है। वे परम सुन्दरी और स्त्रियों में श्रेष्ठ कही गयी हैं। मय उन्हें लाकर रावण को देता है, क्योंकि वह जान चुका है कि रावण राक्षसों का राजा होगा। इस विवाह के साथ भविष्य के राजपद की पहचान जुड़ी हुई है। रावण अच्छी स्त्री पाकर प्रसन्न होता है। फिर वह जाकर अपने दोनों भाइयों का भी विवाह कर देता है। दोनों की पत्नियों के नाम यहाँ नहीं कहे गये हैं।
अब दृष्टि समुद्र के बीच चली जाती है। वहाँ त्रिकूट पर्वत पर ब्रह्मा का बनाया हुआ अत्यन्त भारी और दुर्गम किला है। मय ने उसी को फिर सँवारा है। रचना और फिर सँवारने के ये दो काम अलग अलग कहे गये हैं। सोने से बने अनगिनत मणिभवन उस दुर्ग में हैं। पोद्दार की टीका इन महलों में मणियाँ जड़ी होने का अर्थ खोलती है। जिस मय की कन्या अभी रावण के घर आयी है, उसी की कारीगरी अब नगर के रूप में सामने आती है।
गिरि त्रिकूट एक सिंधु मझारी । बिधि निर्मित दुर्गम अति भारी॥
चौपाई ३
सोइ मय दानवँ बहुरि सँवारा । कनक रचित मनिभवन अपारा॥
उसकी सुन्दरता का अनुमान देने के लिये दो पुरियाँ सामने रखी जाती हैं। नागकुल का निवास भोगावती है और इन्द्र का निवास अमरावती। लंका उन दोनों से भी अधिक रम्य और बाँकी कही गयी है। तुलसी उसका नाम लेने से पहले उसके लिये इतना बड़ा मान रखते हैं। समुद्र के बीच का दुर्ग अपने आप में वैभव का स्थान है। रावण वहाँ पहुँचने से पहले ही वह सुन्दरता और कठिन पहुँच, दोनों से सम्पन्न है। राजधानी बनानेवाले को वह तैयार मिलती है।
खाईं सिंधु गभीर अति चारिहुँ दिसि फिरि आव।
दोहा १७८ (क, ख)
कनक कोट मनिखचित दृढ़ बरनि न जाइ बनाव॥ १७८ (क)॥
हरि प्रेरित जेहिं कलप जोइ जातुधानपति होइ।
सूर प्रतापी अतुलबल दल समेत बस सोइ॥ १७८ (ख)॥
पहला दोहा हमें बाहर खड़ा करके उसकी सुरक्षा दिखाता है। चारों ओर घूमकर आती हुई अत्यन्त गहरी समुद्र की खाई है। भीतर मणियों से जड़ा सोने का दृढ़ परकोटा है। जल की गहराई और दीवार की मजबूती एक ही चित्र में आ गयी हैं। सोने का होना उसकी शोभा है, दृढ़ होना उसकी रक्षा। बनावट ऐसी है कि उसका वर्णन नहीं किया जाता। सामनेवाले को नगर तक पहुँचने से पहले इसी घेरे का सामना करना होगा।
दूसरे दोहे में समय का घेरा बहुत बड़ा हो जाता है। भगवान् की प्रेरणा से जिस कल्प में जो राक्षसराज होता है, वही शूर, प्रतापी और अतुल बलवान् अपनी सेना के साथ इस पुरी में बसता है। लंका का सम्बन्ध यहाँ राक्षसराज के पद से बाँधा गया है। अभी किसी सेना का घेरा नहीं पड़ा है, फिर भी इस निवास का विधान कह दिया गया है। इसके बाद कथा उस समय के निवासियों को बतायेगी और रावण के वहाँ आने की घटना सुनायेगी।
मय मन्दोदरी का विवाह रावण से करता है, और रावण दोनों भाइयों का विवाह कराता है। समुद्र के बीच त्रिकूट पर ब्रह्मा का बनाया, मय का सँवारा हुआ लंका दुर्ग है। उसकी गहरी खाई, मणिजटित सोने का परकोटा और अनगिनत भवन उसे रम्य और दुर्गम बनाते हैं।
लंका का अधिकार, पुष्पक और कैलास
लंका में पहले बड़े राक्षस योद्धा रहते थे। देवताओं ने उन सबको युद्ध में मार डाला। अब वहाँ इन्द्र की प्रेरणा से कुबेर के एक करोड़ रक्षक रहते हैं। पोद्दार की टीका उन्हें यक्ष बताती है। दुर्ग के भीतर कौन है, कथा इस समय का पता साफ़ देती है। रावण को कहीं यह समाचार मिलता है। सूचना कहाँ से आयी, उस बतानेवाले का नाम नहीं आता। समाचार मिलते ही वह सेना तैयार करके लंका को घेरने पहुँच जाता है।
दसमुख कतहुँ खबरि असि पाई । सेन साजि गढ़ घेरेसि जाई॥
चौपाई ४
देखि बिकट भट बड़ि कटकाई । जच्छ जीव लै गए पराई॥
सामने बड़ा विकट योद्धा और उसकी विशाल सेना देखकर यक्ष प्राण लेकर भाग जाते हैं। लंका लेने की घटना यहाँ इसी पलायन से पूरी होती है। पहले के राक्षसों को देवताओं ने युद्ध में मारा था, पर रावण के सामने उस समय के रक्षक ठहरते ही नहीं। नगर का वह परकोटा जिसकी कारीगरी अभी देखी थी, अब उसके अधिकार में आ जाता है। इस प्रवेश के लिये कथा किसी और मुठभेड़ का विवरण नहीं देती। भय से रिक्त हुई जगह रावण को मिल जाती है।
वह सारे नगर में घूमकर उसे देखता है। उसकी चिन्ता जाती रहती है और बहुत सुख मिलता है। पोद्दार की टीका इस चिन्ता को रहने के स्थान की चिन्ता बताती है। नगर स्वभाव से सुन्दर है और बाहर से आनेवालों के लिये दुर्गम। यही देखकर रावण वहाँ अपनी राजधानी कायम करता है। जिस दुर्ग की शोभा पहले कवि ने दिखायी थी, उसे अब रावण की दृष्टि परखती है। रहने और राज्य करने की जगह का प्रश्न उसके लिये हल हो गया है।
राजधानी बसाने का अगला काम घर बाँटना है। जिसे जैसा योग्य समझा, वैसा निवास दे दिया। इससे सभी राक्षस सुखी हुए। सेना साथ लाकर नगर लेने के बाद रावण अपने लोगों को उसमें ठिकाना देता है। अभी आगे बढ़नेवाले अत्याचार का वर्णन शुरू नहीं हुआ है; पहले अपने परिवार और राक्षस समुदाय के लिये जुटाये गये सुख का चित्र पूरा होता है। उस सुख को देखकर आगे संसार पर पड़नेवाला दुःख और साफ़ समझ में आता है।
फिर एक बार वह कुबेर पर चढ़ दौड़ता है और पुष्पक विमान जीतकर ले आता है। पहले कुबेर के रक्षक भागे थे, अब कुबेर की वस्तु उसके हाथ आयी है। इन दोनों घटनाओं को कथा अलग रखती है। राजधानी पा लेने के बाद भी रावण का बाहर निकलना चलता रहता है। विजय से उसे और साधन मिलते हैं, और हर नया अधिकार उसकी पहुँच बढ़ाता जाता है। विमान का नाम पुष्पक है; उसकी बनावट या यात्रा की कोई अतिरिक्त कथा यहाँ नहीं कही जाती।
कौतुकहीं कैलास पुनि लीन्हेसि जाइ उठाइ।
दोहा १७९
मनहुँ तौलि निज बाहुबल चला बहुत सुख पाइ॥ १७९॥
इसके बाद कैलास उठाने का प्रसंग आता है। तुलसी कहते हैं कि रावण ने जाकर खेल ही खेल में पर्वत उठा लिया। उस उठाने को वे अपनी भुजाओं का बल तौलने जैसा बताते हैं। इतनी बड़ी चीज़ उसके लिये अपनी ताकत जाँचने का अवसर है। वह बहुत सुख पाकर वहाँ से चला आता है। दोहा उसी सुख पर पूरा हो जाता है। यहाँ कैलास के प्रसंग में किसी संवाद या दण्ड का वर्णन नहीं जुड़ता; उठाना, बल तौलना और प्रसन्न होकर चल देना, यही घटना है।
कुबेर के यक्ष रावण की सेना देखकर भाग जाते हैं। रावण लंका को राजधानी बनाता है और राक्षसों को योग्यतानुसार घर देता है। फिर कुबेर से पुष्पक जीतता है और कैलास को खेल में उठाकर अपनी भुजाओं का बल मानो तौल लेता है।
बढ़ता हुआ वैभव और योद्धाओं की पाँत
सुख संपति सुत सेन सहाई । जय प्रताप बल बुद्धि बड़ाई॥
चौपाई ५
नित नूतन सब बाढ़त जाई । जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई॥
अब रावण के बढ़ते हुए सौभाग्य की वस्तुएँ एक साथ आती हैं। सुख, सम्पत्ति, पुत्र, सेना, सहायक, विजय, प्रताप, बल, बुद्धि और बड़ाई, सब नित्य नये बढ़ते जाते हैं। केवल धन का ढेर बड़ा नहीं हो रहा है। परिवार और सेना बढ़ रहे हैं, जीत के साथ प्रतिष्ठा बढ़ रही है, काम में आनेवाला बल और बुद्धि भी गिने गये हैं। अपने चारों ओर जितने प्रकार का सहारा कोई राजा पा सकता है, इस चौपाई में वह सब रावण के पास बढ़ता दिखाई देता है।
इस बढ़ने के लिये तुलसी जो तुलना रखते हैं, वह लाभ मिलने पर लोभ बढ़ने की है। लाभ मिल गया, फिर भी चाह की वृद्धि चलती रहती है। रावण की समृद्धि का वर्णन करते समय यही उपमा साथ लगायी गयी है। उसकी उपलब्धियाँ हर दिन नयी हैं, और बढ़ने की गति थमती दिखाई नहीं देती। अभी हमने उसे राजधानी, विमान और अपने बल का सुख पाते देखा। अब उसी क्रम के पीछे लगातार बढ़ती हुई सम्पत्ति और सामर्थ्य का दृश्य खड़ा है।
इस सामर्थ्य में कुम्भकर्ण जैसा अतिबलवान् भाई है। उसके जोड़ का योद्धा जगत् में जन्मा ही नहीं, ऐसा वर्णन आता है। वह मदिरा पीकर छः महीने सोता है। उसके जागते ही तीनों लोकों में त्रास हो जाता है। आरम्भ में मिली हुई नींद अब उसके जीवन का ढंग बनकर लौटी है। सोने की अवधि वही है, और जागने पर संसार के लिये भय का कारण भी वही विशाल बल और आहार है जिसे ब्रह्मा ने पहले देख लिया था।
उसकी भूख के विषय में फिर कहा जाता है कि यदि वह प्रतिदिन भोजन करे, तो सारा विश्व शीघ्र चौपट हो जाय। वह इतना रणधीर है कि बखाना नहीं जा सकता। इसके साथ उसके जैसे असंख्य बलवान् वीरों का उल्लेख है। एक कुम्भकर्ण का परिचय देते देते दृष्टि पूरे योद्धा समुदाय तक पहुँच जाती है। रावण के पास एक असाधारण भाई का सहारा है और बहुत बड़ी वीरमण्डली भी है। आगे सभा में दिखनेवाला आत्मविश्वास इस संख्या और बल के बीच पनप रहा है।
फिर ज्येष्ठ पुत्र का नाम आता है। चौपाई उसे बारिदनाद कहती है; पोद्दार की टीका मेघनाद नाम से पहचानती है, और आगे यही नाम कथा में भी आयेगा। संसार के योद्धाओं में उसकी पहली पाँत है। रण में कोई उसके सामने नहीं ठहरता और स्वर्ग में नित्य भगदड़ होती रहती है। पिता के पास ऐसे पुत्र का बल है जिसका भय देवताओं के निवास तक पहुँच चुका है। बाद में देवताओं के विरुद्ध दिया जानेवाला आदेश इसी पुत्र को विशेष रूप से सौंपा जायगा।
कुमुख अकंपन कुलिसरद धूमकेतु अतिकाय।
दोहा १८०
एक एक जग जीति सक ऐसे सुभट निकाय॥ १८०॥
योद्धाओं में कुमुख, अकम्पन, कुलिसरद, धूमकेतु और अतिकाय गिनाये जाते हैं। पोद्दार की टीका कुमुख को दुर्मुख और कुलिसरद को वज्रदन्त कहती है। यह नामों की पाँत उनकी शक्ति का अनुमान भी देती है: ऐसा हर योद्धा अकेले जगत् जीत सकता है। योद्धाओं की इस पाँत में एक एक की ऐसी समर्थता बतायी गयी है। रावण का बढ़ता हुआ बल इसलिए संख्या भर का विषय नहीं रहता। उसके सहायक स्वयं इतने समर्थ हैं कि उनसे पूरे संसार को संकट है।
पर इस शक्ति के साथ उनके स्वभाव का परिचय भी मिलता है। वे मनमाना रूप बना सकते हैं और सब माया जानते हैं। धर्म और दया उनके स्वप्न में भी नहीं हैं। रूप बदलने का सामर्थ्य, छल की विद्या और दया का अभाव एक साथ पढ़े जाने चाहिये। आगे वे अनेक रूप धरकर उपद्रव करेंगे। अभी उसी व्यवहार की तैयारी उनके गुण और अवगुण के परिचय में हो गयी है। बल के बाद आचरण का यह वाक्य आनेवाले आदेश का अर्थ खोल देता है।
रावण का सुख, परिवार और सामर्थ्य लगातार बढ़ता है। कुम्भकर्ण, मेघनाद और अनेक असाधारण योद्धा उसके सहायक हैं। यह समुदाय मनमाना रूप और माया जानता है, पर धर्म और दया से रिक्त है।
सभा में तय होता है कि देवताओं को कैसे वश में करें
एक बार रावण सभा में बैठा हुआ अपने अगणित परिवार को देखता है। पुत्र, पौत्र, सेवक और परिजन बहुत बड़ी संख्या में हैं। समूची राक्षस जातियों को गिनने का अन्त कौन पा सकता है। यह उसी बढ़ती हुई सम्पत्ति का जीवित दृश्य है जिसकी सूची अभी मिली थी। सभा में उसके सामने वे सब उपस्थित हैं जिनके भरोसे वह अपनी आज्ञा दूर तक पहुँचा सकता है। उन्हें देखते हुए रावण बोलता है, और उसके वचनों में क्रोध तथा मद मिला हुआ है।
कवि उसे स्वभाव से अभिमानी बताते हैं। सेना देखकर वही अभिमान वाणी में भर आता है। रावण समस्त राक्षस दलों को सुनने के लिये कहता है। देवता उसके शत्रु हैं, यह उसकी घोषणा है। फिर वह उनकी लड़ाई का ढंग बताता है: वे सामने युद्ध नहीं करते और बलवान् शत्रु देखकर भाग जाते हैं। अपने शत्रुओं के बारे में कही गयी यह बात रावण की सभा का वक्तव्य है। इसी से वह आगे की युक्ति निकालता है।
तेन्ह कर मरन एक बिधि होई । कहउँ बुझाइ सुनहु अब सोई॥
चौपाई ६
द्विजभोजन मख होम सराधा। सब कै जाइ करहु तुम्ह बाधा॥
वह कहता है कि देवताओं का मरण एक उपाय से हो सकता है, और उसे समझाकर बताता है। ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन तथा श्राद्ध, जहाँ ये हों वहाँ जाकर बाधा डाली जाय। चार प्रकार के कर्म उसके आदेश में गिने गये हैं। पोद्दार की टीका उन्हें देवताओं का बल बढ़ानेवाले कर्म बताती है। रावण की योजना इस पोषण को रोकने की है। जिनसे रण में सामना नहीं हो रहा, उन्हें उन आहार और अर्पण से वंचित करना है जिन पर उनका बल टिका माना गया है।
इस आदेश का फैलाव सभा के बाहर है। जिस ब्राह्मण को भोजन कराया जाना था, जो यज्ञ या हवन होनेवाला था, जो श्राद्ध सम्पन्न किया जाना था, अब वह सब राक्षसों की बाधा का लक्ष्य बनता है। देवताओं को शत्रु कहने से शुरू हुई बात मनुष्यों के शुभ कर्म तक पहुँच गयी है। आगे गाँव और नगर जलाये जाने का वर्णन इसी आदेश का परिणाम होगा। अभी रावण अपने सेवकों को कार्य सौंप रहा है और उस कार्य का फल भी बता रहा है।
छुधा छीन बलहीन सुर सहजेहिं मिलिहहिं आइ।
दोहा १८१
तब मारिहउँ कि छाड़िहउँ भली भाँति अपनाइ॥ १८१॥
उसका कहना है कि भूख से क्षीण और बलहीन होकर देवता अपने आप आ मिलेंगे। उस समय वह उन्हें मार डालेगा या भलीभाँति अपने अधीन करके छोड़ देगा। छोड़ने का अर्थ भी यहाँ पूरी पराधीनता है, जैसा पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है। अपने पास आ जाने के बाद उनके भाग्य का निर्णय रावण अपनी इच्छा से करना चाहता है। भूख, दुर्बलता, समर्पण और उसके बाद दण्ड अथवा अधीन जीवन, उसकी युक्ति में यह पूरा क्रम जुड़ा है।
इस दोहे में रावण को अपेक्षित अन्तिम दृश्य दिखाई देता है। वह देवताओं को स्वयं आता देखना चाहता है, इतना बलहीन कि उनका विरोध समाप्त हो चुका हो। इसीलिये आदेश में युद्ध की तैयारी से पहले अनुष्ठानों में बाधा रखी गयी है। प्रहार उन कर्मों पर होगा जिनसे देवताओं को बल मिलता है। सभा को दिया गया काम स्पष्ट है और उद्देश्य भी स्पष्ट: किसी प्रतिद्वन्द्वी के पास स्वतन्त्र रहने की शक्ति बचने न दी जाय।
रावण राक्षस दलों को ब्राह्मणभोजन, यज्ञ, हवन और श्राद्ध में बाधा डालने का आदेश देता है। उसकी योजना है कि भूख से दुर्बल देवता अपने आप आयेंगे, तब वह उन्हें मारेगा या पूर्ण अधीनता में छोड़ देगा।
मेघनाद की आज्ञा और रावण की गर्जना
फिर रावण मेघनाद को बुलवाता है। उसे सिखाता है, उसका बल बढ़ाता है और देवताओं के प्रति वैर को उत्तेजित करता है। सभा में सब राक्षसों को जो कार्य मिला, उसके बाद पुत्र को अलग काम सौंपा जा रहा है। जो देवता संग्राम में धीर और बलवान् हैं, जिन्हें अपने लड़ने का अभिमान है, उन्हें युद्ध में जीतकर बाँध लाना है। रावण इस आदेश में विशेष रूप से उन्हीं को चुनता है जिनके पास अभी युद्ध करने का भरोसा है।
मेघनाद उठकर पिता की आज्ञा सिर पर रखता है। इस स्वीकार के साथ उस ओर का काम चल पड़ता है। रावण इसी तरह सभी को आदेश देता है, फिर स्वयं हाथ में गदा लेकर निकलता है। सभा में बैठकर अपने विशाल परिवार को देखने से शुरू हुई बात अब अलग अलग दिशाओं में फैलनेवाली है। राक्षस दलों को धार्मिक कर्म रोकने हैं, पुत्र को बलवान् देवताओं को बाँध लाना है, और रावण स्वयं भी अपनी शक्ति लेकर बाहर निकल पड़ा है।
चलत दसानन डोलति अवनी। गर्जत गर्भ स्रवहिं सुर रवनी॥
चौपाई ७
रावन आवत सुनेउ सकोहा । देवन्ह तके मेरु गिरि खोहा॥
उसके चलने से पृथ्वी डोलती है। उसकी गर्जना ऐसी है कि देवरमणियों के गर्भ गिर जाते हैं। भय का परिणाम यहाँ बहुत कठोर और बहुत स्पष्ट है। रावण की आवाज़ अपने सामने खड़े योद्धाओं तक सीमित नहीं रहती; उससे उन स्त्रियों को भी दुःख पहुँचता है जो गर्भ धारण किये हुए हैं। तुलसी उसके निकलने का प्रभाव धरती के हिलने और गर्भों के नष्ट होने, दोनों से दिखाते हैं। बल के इस प्रदर्शन में संसार के लिये विनाश साथ चलता है।
देवता सुनते हैं कि रावण क्रोध में आ रहा है। वे मेरु की गुफाओं का आश्रय लेते हैं। जिन लोकों में पहुँचकर उसे प्रतिद्वन्द्वी मिलना चाहिये था, वहाँ अब लोग छिपने निकल गये हैं। रावण को दिक्पालों के सारे सुन्दर लोक सूने मिलते हैं। उस सूनेपन के सामने वह बार बार भारी सिंहगर्जना करता है। देवताओं को ललकारता है और गालियाँ देता है। उत्तर देनेवाला सामने नहीं आता। उसकी ललकार खाली पड़े लोकों में बनी रहती है।
तब वह रण के मद में मतवाला होकर सारे जगत् में दौड़ता फिरता है। उसे अपने जोड़ का योद्धा चाहिये, और ऐसा कोई कहीं मिलता नहीं। इस दौड़ में उसकी शक्ति की एक और दशा दिखाई देती है: विजय का भरोसा इतना है कि वह प्रतिद्वन्द्वी खोज रहा है। दूसरी ओर भय इतना फैल चुका है कि लोक सूने हैं और देवता गुफाओं में गये हैं। जिसे वह लड़ने के लिये पुकारता है, उसी ने उससे बचने का आश्रय लिया हुआ है।
मेघनाद को बलवान् देवताओं को युद्ध में जीतकर बाँध लाने की आज्ञा मिलती है। रावण गदा लेकर निकलता है; पृथ्वी डोलती है, देवरमणियों के गर्भ गिरते हैं और देवता मेरु की गुफाओं में छिप जाते हैं। सूने लोकों में वह प्रतिद्वन्द्वी को ललकारता फिरता है।
किसी को स्वतन्त्र न रहने देना
रावण के पीछा करने की सीमा अब एक एक नाम से खुलती है। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, वरुण, कुबेर, अग्नि, काल और यम, ये सब अधिकारी गिने गये हैं। फिर किन्नर, सिद्ध, मनुष्य, देवता और नाग आते हैं। वह हठ करके सबके पीछे पड़ता है। पोद्दार की टीका इस वाक्य का अर्थ बताती है कि उसने किसी को शान्तिपूर्वक बैठने नहीं दिया। अपनी जोड़ी का योद्धा खोजने निकला रावण अब सबके जीवन में बाधा बनकर उपस्थित है।
ब्रह्मा की सृष्टि में जहाँ तक शरीरधारी स्त्री पुरुष हैं, सब उसके वश में हो जाते हैं। वे भय से उसकी आज्ञा मानते हैं और नित्य आकर नम्रता से उसके चरणों में सिर झुकाते हैं। उस नम्रता का कारण पहले ही बता दिया गया है: भय। दिखाई देनेवाला सम्मान भीतर के डर से पैदा होता है। कथा इस भेद को छिपाती नहीं। चरणों में आनेवालों की संख्या से रावण की प्रियता का अनुमान नहीं किया जा सकता, क्योंकि सब भयभीत बताये गये हैं।
भुजबल बिस्व बस्य करि राखेसि कोउ न सुतंत्र।
दोहा १८२ (क, ख)
मंडलीक मनि रावन राज करइ निज मंत्र॥ १८२ (क)॥
देव जच्छ गंधर्ब नर किंनर नाग कुमारि।
जीति बरीं निज बाहुबल बहु सुंदर बर नारि॥ १८२ (ख)॥
पहला दोहा उसके शासन की बात बहुत साफ़ कहता है। उसने भुजाओं के बल से विश्व को वश में रखा और किसी को स्वतन्त्र न रहने दिया। मण्डलीक राजाओं का शिरोमणि रावण अपनी ही मति से राज्य करता है। हर ओर झुके हुए सिर और एक ओर अपनी इच्छा से निर्णय करता शासक, यही व्यवस्था अब स्थापित हुई है। अपने लिये जो सामर्थ्य वह जोड़ता चला आया था, उसका संसार के लिये फल पूर्ण पराधीनता के रूप में सामने है।
दूसरा दोहा उस अधिकार को स्त्रियों के जीवन तक ले जाता है। देवताओं, यक्षों, गन्धर्वों, मनुष्यों, किन्नरों और नागों की कन्याओं तथा अनेक अन्य सुन्दरी स्त्रियों को वह अपनी भुजाओं के बल से जीतकर ब्याह लेता है। यहाँ भी शक्ति का वही प्रयोग कहा गया है। विवाहों का उल्लेख उसके विश्व को अधीन करनेवाले दोहे के साथ रखा है, और दोनों में भुजबल आधार है। किसी को स्वतन्त्र न रहने देने की बात के बाद इन सम्बन्धों का स्वरूप भी उसी बल से पहचाना जाता है।
आगे मेघनाद का नाम इन्द्रजीत रूप में आता है। रावण ने उससे जो कहा, उसने मानो पहले ही कर रखा हो। पोद्दार की टीका इस कथन को आज्ञा पालने की शीघ्रता के रूप में समझाती है: पिता के कहने भर की देर थी। पुत्र की सफलता को किसी अलग युद्धकथा में खोलने के लिये वर्णन यहाँ नहीं रुकता। उसके तुरन्त पालन का समाचार देकर कथा उन राक्षसों की ओर लौटती है जिन्हें मेघनाद से पहले आदेश मिला था। अब उनका किया हुआ काम देखना है।
सभी शरीरधारी रावण के अधीन होकर भय से उसकी आज्ञा मानते हैं। वह किसी को स्वतन्त्र नहीं रहने देता और अनेक स्त्रियों को भुजबल से जीतकर ब्याहता है। मेघनाद पिता की आज्ञा बहुत शीघ्र पूरी करता है; फिर कथा बाकी राक्षस दलों की करतूतों पर लौटती है।
सभा का आदेश गाँवों की आग बन जाता है
वे राक्षस देखने में भयानक, पापी और देवताओं को सन्ताप देनेवाले हैं। उनके समूह माया से अनेक रूप धरकर उपद्रव करते हैं। पहले उनके परिचय में रूप बदलने की विद्या बतायी गयी थी, अब वही काम में आती है। सभा में सुनायी गयी आज्ञा लेकर वे संसार में फैलते हैं। किस जगह किस रूप में पहुँचें, इसका बन्धन उनके लिये नहीं है। उनके सारे कर्मों का उद्देश्य एक है, धर्म की जड़ काटना। वे वही वेदविरुद्ध काम करते हैं जिससे यह उद्देश्य पूरा हो।
जेहि बिधि होइ धर्म निर्मूला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला॥
चौपाई ८
जेहिं जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं । नगर गाउँ पुर आगि लगावहिं॥
जहाँ जहाँ उन्हें गौ और ब्राह्मण मिलते हैं, वहाँ के नगर, गाँव और पुरवे में आग लगा देते हैं। इन तीनों प्रकार की बस्तियों का साथ आना उपद्रव का फैलाव दिखाता है। बड़ी बस्ती हो या छोटा पुरवा, उनकी हिंसा पहुँचती है। जिन कर्मों में बाधा डालने का आदेश मिला था, उन्हें रोकने के लिये पूरा रहने का स्थान जला दिया जाता है। इस आग का वर्णन रावण की सभा से बहुत दूर लगता है, पर वहाँ बोली गयी बात का क्रियान्वयन यहीं हो रहा है।
अब कहीं शुभ आचरण नहीं होता। देवता, ब्राह्मण और गुरु का मान नहीं रह जाता। हरिभक्ति, यज्ञ, तप और ज्ञान नहीं हैं; वेद और पुराण स्वप्न में भी सुनायी नहीं देते। यह केवल कुछ कर्मों के बीच पड़ा विघ्न नहीं रह गया। पूरे संसार के व्यवहार का वर्णन बदल गया है। पोद्दार की टीका शुभ आचरण रुकने के पीछे राक्षसों का डर रखती है और ब्राह्मणभोजन, यज्ञ तथा श्राद्ध को फिर याद दिलाती है। जो कर्म पहले आदेश में गिनाये गये थे, अब उनका न होना कहा जा रहा है।
इस दशा के भीतर सुनने और कहने का संकट भी है। वेद पुराण का सुनायी न देना अगली पंक्तियों में उनके कहनेवाले पर होनेवाले अत्याचार से जुड़ता है। पहले अनुष्ठान बाधित हुए, फिर सम्मान जाता रहा, फिर कथा और ज्ञान की आवाज़ भी सुनायी नहीं देती। तुलसी इस उजाड़ को भवनों की आग पर समाप्त नहीं करते। वे उस आचरण और श्रवण तक जाते हैं जिससे लोगों का दिन बनता था। भय ने उन सबको घेर लिया है।
जप जोग बिरागा तप मख भागा श्रवन सुनइ दससीसा।
छन्द
आपुनु उठि धावइ रहै न पावइ धरि सब घालइ खीसा॥
अस भ्रष्ट अचारा भा संसारा धर्म सुनिअ नहिं काना।
तेहि बहुबिधि त्रासइ देस निकासइ जो कह बेद पुराना॥
छन्द में रावण का अपना व्यवहार सामने आता है। उसके कान में कहीं जप, योग, वैराग्य, तप या यज्ञभाग की बात पड़ती है, तो वह स्वयं उठकर दौड़ता है। पोद्दार की टीका यज्ञभाग को देवताओं के भाग पाने की बात बताती है। सभा में जिसकी व्यवस्था उसने दूसरों को सौंपी थी, उसे सुनते ही वह खुद भी नष्ट करने पहुँच जाता है। उसके लिये समाचार मिलना और उठ दौड़ना साथ हैं। कोई ऐसा शुभ कर्म बना रहे, उसे यह स्वीकार नहीं।
वह कुछ रहने नहीं देता और सबका विध्वंस कर डालता है। संसार का आचरण इतना भ्रष्ट हो जाता है कि धर्म कानों में भी नहीं पड़ता। जो कोई वेद और पुराण कहता है, उसे अनेक प्रकार से कष्ट दिया जाता है और देश से निकाल दिया जाता है। कहनेवाले के लिये दुःख और निर्वासन, सुननेवाले के लिये मौन, इस तरह दोनों ओर की जगह छिनती है। रावण की इच्छा से चलनेवाले संसार में वह वाणी टिकने नहीं दी जाती जिसे वह मिटाना चाहता है।
अब आरम्भ की सुन्दर लंका का स्मरण कीजिये। वहाँ अपने लोगों को योग्यतानुसार घर देकर रावण ने सुखी किया था। यहाँ दूसरे लोग बस्तियों की आग देखते हैं और वेद पुराण कहनेवाले अपने देश से निकाले जाते हैं। रहने की जगह देना और रहने की जगह छीनना, इस कथा में उसकी सत्ता के दोनों काम स्पष्ट हैं। अपने राक्षस समुदाय के लिये जो समृद्धि जुटी, उसके विस्तार के साथ संसार में उपद्रव बढ़ता गया। तुलसी ने दोनों पक्षों को पूरा समय दिया है।
राक्षस अनेक रूप धरकर धर्म की जड़ काटने वाले काम करते हैं और गौ ब्राह्मण मिलने पर बस्तियाँ जला देते हैं। शुभ आचरण रुक जाता है। रावण स्वयं जप, योग, तप और यज्ञभाग की बात सुनकर विध्वंस करने दौड़ता है; वेद पुराण कहनेवालों को कष्ट और देशनिकाला मिलता है।
हिंसा में प्रीति
बरनि न जाइ अनीति घोर निसाचर जो करहिं।
सोरठा १८३
हिंसा पर अति प्रीति तिन्ह के पापहि कवनि मिति॥ १८३॥
अन्त में वर्णन की सीमा मान ली जाती है। राक्षस जो घोर अनीति करते हैं, वह कही नहीं जा सकती। इतने उपद्रव बताने के बाद भी बात पूरी नहीं हुई है। अब उनके कर्मों के पीछे की रुचि बतायी जाती है: हिंसा में अत्यन्त प्रीति। जिस हिंसा से किसी और का जीवन उजड़ता है, उसी में उन्हें आनन्द है। उनके पापों की सीमा किस प्रकार बतायी जा सकती है, सोरठा इसी प्रश्न पर ठहरता है।
इस अन्त को आरम्भ के वरों के पास रखकर पढ़िये। विभीषण ने भगवान् के चरणकमलों में निर्मल अनुराग माँगा था। अन्त में राक्षसों की प्रीति हिंसा में दिखाई गयी है। प्रेम की दिशा का अन्तर दोनों जगह इतना साफ़ है कि अलग से किसी नाम की श्रेष्ठता समझानी नहीं पड़ती। एक माँग हृदय का सम्बन्ध बनाना चाहती है। दूसरी ओर प्रबल होकर दूसरों को दुःख देने में रस मिलता है। एक ही परिवार के प्रसंग में ये दोनों प्रवृत्तियाँ हमारे सामने रखी गयी हैं।
अन्तिम सोरठा राक्षसों की अनीति को अवर्णनीय कहता है। हिंसा में उनकी अत्यन्त प्रीति है, इसलिये उनके पापों की सीमा बताना सम्भव नहीं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस प्रसंग में शक्ति का हिसाब बहुत विस्तार से मिलता है। कठोर तप है, वर हैं, सोने का परकोटा है, एक करोड़ रक्षकों का पलायन है, अतिबलवान् भाई और संसार जीत सकनेवाले योद्धा हैं। इतनी सामर्थ्य के बाद रावण का राज्य किस बात से पहचाना जाता है, यह दोहा साफ़ कह चुका है: कोई स्वतन्त्र नहीं रहता। उसके पास क्या क्या है, उस सूची का उत्तर इस बात में मिलता है कि उसके अधीन लोगों के पास क्या बचता है। वे भय से आज्ञा मानते हैं।
हम आरम्भ में उसका चरण पकड़ना और आगे दूसरों का उसके चरणों में झुकना देख चुके हैं। पहले दृश्य में वह वर माँग रहा था। दूसरे में लोग भयभीत हैं। झुके हुए सिर दोनों जगह हैं, पर दोनों के कारण कथा में अलग अलग रखे गये हैं। इसी सावधानी से हमें लंका का वैभव और संसार का दुःख साथ पढ़ना है। सुन्दर नगर का वर्णन अपने स्थान पर पूरा है, और उस नगर के राजा का आचरण भी अपने स्थान पर उतना ही स्पष्ट है।
और उन अनेक आवाज़ों को याद रखिये जिन्हें अन्त तक सुनायी देना बन्द हो गया। यज्ञ, जप और वेद पुराण का श्रवण रोकने के लिये हिंसा की गयी, कहनेवालों को निकाला गया। रावण का भय सबसे गहरा वहाँ दिखता है जहाँ कोई उसके विरुद्ध युद्ध भी नहीं कर रहा, केवल अपना शुभ आचरण कर रहा है। उस कर्म को होने देना भी उसकी इच्छा पर निर्भर बना दिया गया है। इसीलिये संसार की पराधीनता का वर्णन अनुष्ठान और वाणी के नष्ट होने पर आकर पूरा होता है।
तीनों भाइयों के प्रसन्न होकर घर लौटने से चली कथा अब ऐसे संसार पर ठहरी है जहाँ राक्षसों को हिंसा प्रिय है और धर्म की बात कानों में नहीं पड़ती। बीच में जो बढ़ा, उसका नाम सुख और सम्पत्ति भी था; जो फैल गया, उसका नाम भय और अनीति है। तुलसी दोनों को एक ही क्रम में दिखाते हैं। लंका का स्वर्ण अपनी चमक रखता है, और उसके बाहर जलती हुई बस्तियों का दुःख भी आँखों के सामने बना रहता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १७७ से पहले की चौपाइयों से सोरठा १८३ तक, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।