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पार्वती का जन्म, नारद की भविष्यवाणी और कठिन तप

रामचरितमानस · बालकाण्ड · पार्वती का जन्म, नारद की भविष्यवाणी और कठिन तप

पार्वती का जन्म, नारद की भविष्यवाणी और कठिन तप

हिमवान् के घर जो कन्या जन्मी है, उसके लिये देवर्षि जैसा वर बताते हैं वह सुनकर माता पिता का मुँह उतर जाता है। उसी घड़ी उस कन्या के भीतर हर्ष भर उठता है।

पिछला प्रसंग दक्ष के यज्ञ पर सती के देह त्याग के साथ बन्द हुआ था। यह पन्ना उसी का परिणाम लेकर खुलता है, और बहुत जल्दी बन्द कर देता है। वीरभद्र भेजे जाते हैं, यज्ञ उखड़ जाता है, देवताओं को उनके हिस्से का फल मिल जाता है, और कवि स्वयं कह देते हैं कि यह कथा सारा संसार जानता है इसलिये उन्होंने संक्षेप में कह दी। जिस घटना पर और कोई कवि पूरा सर्ग खर्च करता, तुलसीदास उस पर चार पंक्तियाँ खर्च करते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। आगे जो है, उसी के लिये यह पन्ना बना है।

आगे यह है कि एक कन्या हिमाचल के घर जन्म लेती है, एक अतिथि बिना बुलाये आ जाता है, और एक पिता उससे अपनी बेटी का भविष्य पूछ बैठता है। उत्तर सच्चा मिलता है, और सच्चा उत्तर उस घर के हर आदमी के लिये बुरी खबर है, सिवाय उस लड़की के जिसके बारे में वह कहा गया है। बाकी पन्ना यही है कि एक घर ऐसी भविष्यवाणी का करे क्या, जिसे न झुठलाया जा सकता है, न टाला जा सकता है। और अन्त में एक लड़की वन में अकेली खड़ी है, गिरे हुए सूखे पत्ते खाती हुई, और फिर वे भी छोड़ती हुई। यह तुलसीदास की कथा है, और इसका सुर वाल्मीकि का नहीं है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • उमा सती का दूसरा जन्म, हिमाचल के घर में। इस प्रसंग में उनके नाम गिनाये भी जाते हैं और एक नाम वे स्वयं कमाती भी हैं।
  • हिमवान् पर्वतराज। जो अतिथि का चरण धोता है, अपनी बेटी उसके चरणों पर रख देता है, और फिर वह प्रश्न पूछ लेता है जिसका उत्तर उसे भारी पड़ता है।
  • मैना उमा की माता। इस पन्ने पर सबसे सीधी बात इन्हीं के मुँह से निकलती है, और सबसे बड़ा डर भी इन्हीं के भीतर है।
  • नारद देवर्षि, जो कौतुक से चले आते हैं, हँसकर बोलते हैं, और एक ही भाषण में कुल का सुख भी दे जाते हैं और कुल की नींद भी ले जाते हैं।
  • शिव जिनकी चर्चा इस पूरे प्रसंग में चलती रहती है, जिनके गुण और दोष गिनाये जाते हैं, और जो आरम्भ की चार पंक्तियों के बाद एक बार भी सामने नहीं आते।
  • वेदशिरा मुनि जो ठीक उस घड़ी आते हैं जब घर में किसी के मुँह से बात नहीं निकल रही, और समझाकर सबको सँभाल देते हैं।

एक वर, जो मरते समय माँगा गया था

समाचार शंकर तक पहुँचे और वीरभद्र भेज दिये गये। यज्ञ का विध्वंस हुआ, और सब देवताओं को विधिवत् फल मिला। दक्ष की वही गति हुई जो जगत् में शिवद्रोही की हुआ करती है। इसके तुरन्त बाद कवि अपनी ओर से एक पंक्ति रखते हैं, और वह पंक्ति इस पन्ने की चाल तय कर देती है: यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संछेप में कह दिया। जो सुनाने वाला जानता है कि सुनने वाला यह कथा पहले से जानता है, वह उस पर रुकता नहीं। इसलिये सती के जाने का शोक इस पन्ने पर कहीं नहीं है। उसकी जगह एक और ही चीज़ रखी गयी है।

वह चीज़ यह है कि सती ने मरते समय हरि से एक वर माँगा था। ध्यान दीजिये कि उस घड़ी उन्होंने क्या माँगा। न प्रतिशोध, न वह सभा जहाँ अपमान हुआ था, न कोई ऐसी व्यवस्था जिसमें फिर ऐसा न हो। उन्होंने माँगा कि जन्म जन्म शिव के चरणों में अनुराग बना रहे। माँग किसी व्यक्ति की नहीं है, एक भाव की है, और वह भी एक जन्म के लिये नहीं। और इसी अर्धाली के दूसरे आधे में उस माँग का परिणाम रख दिया गया है।

सतीं मरत हरि सन बरु मागा । जनम जनम सिव पद अनुरागा॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई । जनमीं पारबती तनु पाई॥

चौपाई १

तेहि कारन, इसी कारण। कारण और कार्य आमने सामने रख दिये गये हैं और बीच में कुछ नहीं है। जो माँगा गया था, ठीक वही मिला, उससे रत्ती भर ज़्यादा नहीं। अनुराग माँगा गया था, इसलिये एक शरीर मिला जिसमें वह अनुराग फिर से उपजेगा। सुख नहीं माँगा गया था, इसलिये सुख का वादा भी नहीं है। इस पन्ने पर आगे जो तप है, वह इसी वर की कीमत है। और तनु पाई पर भी रुकिये, क्योंकि कवि यह नहीं कहते कि कोई नयी आत्मा जन्मी। वे कहते हैं कि उन्होंने पार्वती का शरीर पाया। बदलने वाली चीज़ देह है, माँगने वाली वही है।

सार: वीरभद्र भेजे जाते हैं, यज्ञ नष्ट होता है और दक्ष को शिवद्रोही की गति मिलती है। कवि कहते हैं कि यह कथा सब जानते हैं इसलिये उन्होंने संक्षेप में कही। फिर वह वर सामने आता है जो सती ने मरते समय माँगा था, जन्म जन्म शिव के चरणों में अनुराग, और उसी कारण वे हिमाचल के घर पार्वती का शरीर पाकर जन्मीं।

जिस घर में वह आयीं, वहाँ ऋतुएँ ठहर गयीं

जिस दिन से उमा हिमाचल के घर आयीं, उस पर्वत का हाल बदल गया। सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ वहाँ छा गयीं। मुनियों ने जहाँ तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचल ने उन्हें उचित स्थान दिये। दोहे में यह बदलाव और आगे जाता है: सब वृक्ष नये और अनेक जातियों के हो गये, और सदा फूल तथा फल से लदे रहने लगे। पर्वत पर बहुत प्रकार की मणियों की खानें प्रकट हो गयीं। जिस पहाड़ पर बरफ़ के सिवा कुछ नहीं उगता था, वहाँ ऋतु नाम की चीज़ ही समाप्त हो गयी।

इसके बाद जीवों की बारी आती है। नदियों में पवित्र जल बहने लगा, पक्षी, पशु और भ्रमर सब सुखी रहने लगे। और फिर वह पंक्ति, जो सबसे कठिन बात को सबसे हल्के ढंग से कह जाती है: सब जीवों ने अपना सहज बयरु छोड़ दिया। स्वाभाविक वैर, यानी वह वैर जो सिखाया नहीं गया, जो चुना नहीं गया, जो शरीर के साथ ही आता है। पर्वत पर सब परस्पर प्रेम करने लगे। और अब कवि इस पूरी शोभा को नापने के लिये जो तराजू उठाते हैं, वह इस प्रसंग में सबसे अनपेक्षित है।

सोह सैल गिरिजा गृह आएँ । जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥
नित नूतन मंगल गृह तासू । ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥

चौपाई २

पर्वत ऐसा शोभा पा रहा है जैसे रामभक्ति पाकर भक्त शोभा पाता है। यह शिव की कथा है, और इसके बीच में सुन्दरता की नाप के लिये जो उपमा चुनी गयी है वह रामभक्ति है। तुलसीदास पूरे मानस में यही करते हैं, और यहाँ यह और भी साफ़ दिखता है क्योंकि उपमा की ज़रूरत ही नहीं थी। पहाड़ की शोभा किसी पहाड़ से भी नापी जा सकती थी। पर कवि जिस चीज़ से नापते हैं वह वही चीज़ है जिसके लिये यह पूरा ग्रन्थ लिखा गया है। इसके बाद वे यह भी जोड़ देते हैं कि उस घर में नित्य नये मंगल होते हैं और उसका यश ब्रह्मा तक गाते हैं। एक कन्या के आने से घर का ऐसा हाल हो, यह कवि कहे बिना कह देते हैं कि आयी कौन है।

सार: उमा के आते ही पर्वत पर सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ छा गयीं, वृक्ष सदा फूल फल से लदे रहने लगे, मणियों की खानें प्रकट हुईं, नदियों में पवित्र जल बहा और जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर तक छोड़ दिया। कवि इस शोभा की उपमा रामभक्ति पाये हुए भक्त से देते हैं।

एक अतिथि, और एक पिता का प्रश्न

ये सब समाचार नारद तक पहुँचे और वे हिमाचल के घर चल पड़े। किस लिये, यह कवि एक ही शब्द में बता देते हैं: कौतुकहीं। न किसी ने बुलाया, न कोई काम था, न कोई सन्देश ले जाना था। कुतूहल से चले आये। इस घर का सारा भविष्य जिस भेंट पर पलटने वाला है, वह भेंट किसी ने माँगी नहीं थी। पर्वतराज ने बड़ा आदर किया, चरण धोकर उत्तम आसन दिया। फिर स्त्री सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और चरणोदक सारे भवन में छिड़कवाया। अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया। और फिर बेटी को बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया।

इतनी देर जो हो रहा था वह सब स्वागत था। अब जो होता है वह प्रश्न है, और इस प्रश्न के बाद घर वैसा नहीं रहता।

त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥ ६६॥

दोहा ६६

पहले वे अतिथि को बता देते हैं कि वे कौन हैं: त्रिकालज्ञ, सर्वज्ञ, और जिनकी पहुँच सब जगह है। यानी आगे जो पूछा जा रहा है उसका कोई अधूरा उत्तर स्वीकार नहीं होगा। और फिर वे जो पूछते हैं उसका क्रम देखिये: दोष गुन। दोष पहले। जो पिता अभी अभी अपने सौभाग्य का बखान कर रहा था, वह बेटी के बारे में पहले दोष पूछता है। कोई भी पिता यही पूछता है। और उत्तर देते समय नारद यह क्रम उलट देंगे। गुण चार पंक्तियों तक चलेंगे और दोष अन्त में आयेंगे, आधी पंक्ति में। जिसने सब कुछ माँगा था, उसे सब कुछ मिलेगा, बस अपने चुने हुए क्रम में नहीं।

सार: नारद कौतूहलवश हिमाचल के घर आते हैं। पर्वतराज उनके चरण धोते हैं, चरणोदक घर में छिड़कवाते हैं, अपने सौभाग्य का बखान करते हैं और कन्या को मुनि के चरणों पर डाल देते हैं। फिर वे उन्हें त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ कहकर कन्या के दोष और गुण पूछते हैं, दोष पहले।

गुण, जो गिनते गिनते बहुत दूर निकल जाते हैं

कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥
सुंदर सहज सुसील सयानी । नाम उमा अंबिका भवानी॥

चौपाई ३

उत्तर शुरू होने से पहले कवि दो शब्द रख देते हैं, और वे दोनों चेतावनी हैं। बिहसि, यानी हँसकर। और गूढ़ मृदु बानी, यानी वाणी कोमल थी और उसके भीतर कुछ छिपा हुआ था। इसके आगे जो कुछ कहा जायगा, वह इन्हीं दो शब्दों की छाया में पढ़ा जाना है। जो सुन रहे हैं उन्हें यह छाया नहीं दिखती, पर पढ़ने वाले को कवि पहले ही बता चुके हैं कि यह भाषण सीधा नहीं है।

और फिर गुण। कन्या सब गुणों की खान है, स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और सयानी। तीन नाम गिनाये जाते हैं: उमा, अम्बिका, भवानी। वह सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न है और अपने पति को सदा प्यारी होगी। उसका सुहाग सदा अचल रहेगा और उससे माता पिता यश पायेंगे। वह सारे जगत् में पूज्य होगी और उसकी सेवा करने से कुछ दुर्लभ न रहेगा। यहाँ तक वह सब है जो कोई भी पिता सुनना चाहता है।

पर अगली ही अर्धाली इस सूची से बाहर निकल जाती है। संसार की स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रत की असिधारा पर चढ़ जायँगी। ठहरकर देखिये कि यह कन्या को दिया गया क्या है। यह सुख नहीं है। यह उस पर रखा गया भार है। और उपमा पर भी ठहरिये: व्रत को तलवार की धार कहा गया है, यानी ऐसी चीज़ जिस पर चला जाता है और जिस पर चलने का अर्थ कटना भी है। यह उपमा वर का वर्णन शुरू होने से ठीक पहले रखी गयी है। जो स्त्रियाँ बाद में उस धार पर चढ़ेंगी, उनके लिये यह धार पहले इसी लड़की को नापनी है, और वह नाप तीन हज़ार वर्ष के सूखे पत्तों जितनी लम्बी निकलेगी।

सार: नारद हँसकर और गूढ़ कोमल वाणी में उत्तर देते हैं। कन्या सब गुणों की खान है, सुन्दर, सुशील और सयानी, नाम उमा, अम्बिका और भवानी। वह पति को सदा प्यारी होगी, सुहाग अचल रहेगा, माता पिता यश पायेंगे, वह जगत् में पूज्य होगी, और उसका नाम स्मरण करके स्त्रियाँ पतिव्रत की असिधारा पर चढ़ जायँगी।

दो चार अवगुन

गुण समाप्त होते ही नारद पर्वतराज को सम्बोधित करते हैं और कहते हैं कि अब जो दो चार अवगुण हैं वे भी सुन लीजिये। संख्या पर ध्यान दीजिये। दो चार, यानी वह संख्या जो कोई तब कहता है जब चीज़ छोटी हो। इसके बाद जो सूची आती है वह एक अर्धाली में पाँच शब्द रखती है, और फिर दोहे में पाँच और।

सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी । सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥

चौपाई ४

अगुन, यानी गुणहीन। अमान, यानी मानहीन। मातु पितु हीना, यानी जिसके माता पिता ही नहीं। उदासीन। और सब संसय छीना, जिसे टीका लापरवाह कहकर खोलती है। किसी कन्या के पिता के सामने वर का यह परिचय जितना बुरा हो सकता है, उतना बुरा है। और दोहे में यह परिचय पूरा होता है।

जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥ ६७॥

दोहा ६७

योगी, जटाधारी, निष्काम मन वाला, नंगा, अमंगल वेष वाला। और फिर वह वाक्य जो दरवाज़ा बन्द कर देता है: ऐसा स्वामी इसको मिलेगा। मिल सकता है नहीं, मिलेगा। और कारण जो दिया गया है वह किसी शाप का नहीं है, किसी शत्रु का नहीं है, किसी ग्रह का नहीं है। कारण यह है कि इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है। यानी जो बात अभी अभी बुरी खबर बनकर आयी, वह इस लड़की के हाथ में उस दिन से थी जिस दिन हाथ बना।

और अब वह बात जो इस पूरे भाषण की रीढ़ है। इन दस शब्दों में शिव का नाम एक बार भी नहीं है। पिता को यह नहीं बताया गया कि वर कौन है। उसे केवल यह बताया गया कि वर कैसा है। नाम ले लिया जाता तो यह वर्णन उसी क्षण प्रशंसा बन जाता, और तब न पिता का दुख होता, न माता की जिद, न वह तप जिसके लिये यह पन्ना लिखा गया है। कवि नाम को रोककर रखते हैं, और उस रुके हुए नाम में से ही आगे की सारी कथा निकलती है।

सार: नारद कहते हैं कि अब दो चार अवगुण सुन लीजिये, और गिनाते हैं: गुणहीन, मानहीन, माता पिता से रहित, उदासीन, संशयहीन, योगी, जटाधारी, निष्काम मन वाला, नंगा और अमंगल वेष वाला। ऐसा ही स्वामी मिलेगा, क्योंकि हाथ में वैसी ही रेखा है। पूरे वर्णन में शिव का नाम एक बार भी नहीं आता।

एक ही कमरे में दो तरह के आँसू

सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी । दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥
नारदहूँ यह भेदु न जाना । दसा एक समुझब बिलगाना॥

चौपाई ५

एक ही पंक्ति में दो विपरीत बातें रख दी गयी हैं और कवि किसी पर दूसरा वाक्य खर्च नहीं करते। मुनि की वाणी सुनकर और उसे हृदय में सत्य मानकर पति पत्नी को दुख हुआ, और उमा हर्षित हुईं। सत्य दोनों ने एक जैसा माना। अन्तर विश्वास में नहीं था। अन्तर इसमें था कि एक ही वाक्य से किसने क्या सुना।

और इसके तुरन्त बाद वह वाक्य आता है जिसे इस प्रसंग में सबसे धीरे पढ़ना चाहिये: नारद ने भी यह भेदु नहीं जाना। जो त्रिकालज्ञ कहकर बिठाये गये थे, जिनकी सर्वत्र गति बतायी गयी थी, उन्हें उसी कमरे में यह नहीं दिखा कि पाँच लोगों में से एक को सुख हुआ है। कारण भी साथ ही रख दिया गया है: दसा एक समुझब बिलगाना। बाहरी दशा एक सी थी, भीतरी समझ अलग अलग। और अगली ही पंक्ति में कवि वह एक सी दशा चित्र बनाकर दिखा देते हैं। सारी सखियाँ, पार्वती, हिमवान् और मैना, सबका शरीर पुलकित और सबकी आँखें जल से भरी हुईं। शोक और हर्ष एक ही वाक्य में, एक ही वर्णन के नीचे। जिस घर में रोने और खिल उठने का चिह्न एक ही हो, वहाँ त्रिकालज्ञ भी पढ़ नहीं पाता।

पार्वती ने उस घड़ी क्या किया, यह भी उसी अर्धाली में है। देवर्षि की बात झूठी नहीं हो सकती, यह मानकर उन्होंने उस वचन को हृदय में धर लिया। जो वाक्य माता पिता के लिये चोट था, वही उनके लिये सम्पत्ति बन गया। और अब उस सम्पत्ति का पहला असर देखिये।

उपजेउ सिव पद कमल सनेहू । मिलन कठिन मन भा संदेहू॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई । सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥

चौपाई ६

क्रम पर ठहरिये, क्योंकि क्रम ही अर्थ है। पहले शिव के चरणकमलों में स्नेह उपजा। उसके बाद मन में यह सन्देह हुआ कि मिलना कठिन है। सन्देह स्नेह के बाद आया है और स्नेह से ही बना है। जिसे कुछ चाहिये ही नहीं, उसके भीतर अनिश्चय भी नहीं होता। मिलना कठिन तब लगता है जब मिलना ज़रूरी लगने लगे। तुलसीदास यह कारण और परिणाम आधी आधी पंक्ति में रखकर आगे बढ़ जाते हैं, और तुक तक एक रख देते हैं, सनेहू और संदेहू, ताकि पढ़ने वाले के कान में भी दोनों एक साथ ही पड़ें।

और फिर वह पंक्ति, जिसमें इस पूरे पन्ने का सबसे मनुष्य जैसा दृश्य है। अवसर ठीक नहीं है, यह जानकर उमा ने अपनी प्रीति छिपा ली, और उठकर सखी की गोद में जाकर बैठ गयीं। निर्णय प्रेम छोड़ने का नहीं है, अभी न दिखाने का है। और जहाँ वे जाकर बैठती हैं वह न कोई मन्दिर है न कोई वन। वह एक सहेली की गोद है। जो स्त्री आगे तीन हज़ार वर्ष सूखे पत्तों पर काटने वाली है, इस क्षण वह अपने पिता के घर की एक लड़की है, और कवि उसे वही रहने देते हैं।

सार: वही वाणी सुनकर माता पिता को दुख होता है और उमा को हर्ष। नारद भी यह भेद नहीं जान पाते, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक सी थी और भीतरी समझ अलग। उमा उस वचन को हृदय में धर लेती हैं, शिव के चरणों में स्नेह उपजता है, और उसी स्नेह से यह सन्देह कि मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर वे प्रीति छिपाकर सखी की गोद में जा बैठती हैं।

ललाट पर लिखी हुई बात

देवर्षि की वाणी झूठी नहीं होगी, यह सोचकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर पर्वतराज हृदय में धीरज धरकर पूछते हैं कि अब उपाय क्या किया जाय। यह उस आदमी का प्रश्न है जो मान चुका है कि जो कहा गया वह सच है, और अब केवल यह जानना चाहता है कि इसके साथ रहना कैसे है। उत्तर में जो मिलता है, वह इस प्रसंग का सबसे कठोर वाक्य है।

कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥ ६८॥

दोहा ६८

पाँच गिनाये गये हैं: देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि। विधाता ने ललाट पर जो लिख दिया, इनमें से कोई उसे मिटाने वाला नहीं। उपाय पूछने वाले पिता को इससे बड़ा इनकार नहीं मिल सकता था। पर इसके ठीक बाद की पंक्ति जिस शब्द से शुरू होती है, वह शब्द दोहे को वापस लिये बिना उसमें से रास्ता निकाल देता है: तदपि, फिर भी। फिर भी एक उपाय मैं बताता हूँ, यदि दैव सहायता करे तो वह बने। और साथ ही वे यह भी साफ़ कर देते हैं कि उपाय से वर नहीं बदलेगा। वर वैसा ही मिलेगा जैसा उन्होंने बताया, इसमें सन्देह नहीं। यानी जो उपाय आ रहा है वह भविष्यवाणी के विरुद्ध नहीं है, उसी के भीतर से है।

और अब वह आधी पंक्ति, जिस पर यह पूरा प्रसंग घूम जाता है।

जे जे बर के दोष बखाने । ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥

चौपाई ७

वर के जो जो दोष मैंने बखाने, वे सब मेरे अनुमान से शिव में हैं। मैं अनुमाने पर ध्यान दीजिये। वे यह नहीं कहते कि ये दोष शिव में हैं। वे कहते हैं कि मैं उन्हें शिव में अनुमान करता हूँ। जो हँसी भाषण के आरम्भ में थी, वह अब तक चेहरे पर बनी हुई है। और अगली अर्धाली में वे नतीजा निकाल देते हैं।

जौं बिबाहु संकर सन होई । दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥

चौपाई ८

यदि विवाह शंकर से हो जाय, तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे। देखिये कि इस एक पंक्ति ने भविष्यवाणी के साथ क्या किया। सूची में से एक शब्द नहीं हटा। एक अक्षर वापस नहीं लिया गया। बदला केवल यह कि वे शब्द किसके बारे में हैं। किसी साधारण वर के लिये अगुन का अर्थ है कि उसमें गुण नहीं। शिव के लिये उसका अर्थ है कि वे गुणों से परे हैं। किसी लड़के के लिये मातु पितु हीना का अर्थ अनाथ है। शिव के लिये उसका अर्थ यह है कि उनसे पहले कोई था ही नहीं। नंगा, अमंगल वेष, निष्काम मन, वही दस शब्द, और सही व्यक्ति पर पड़ते ही हर एक उपाधि बन जाता है।

इसके बाद नारद प्रमाण गिनाते हैं, और तीनों प्रमाण एक ही ढाँचे के हैं। विष्णु साँप की सेज पर सोते हैं, फिर भी पण्डित उन पर दोष नहीं रखते। सूर्य और अग्नि अच्छे बुरे सब रस खा जाते हैं, फिर भी उन्हें कोई बुरा नहीं कहता। गंगा में शुभ और अशुभ सब जल बहता है, फिर भी उन्हें कोई अपवित्र नहीं कहता। और फिर निष्कर्ष: समर्थ को दोष नहीं लगता, रवि, पावक और सुरसरि की तरह। तीनों उदाहरणों में वही काम हो रहा है जिसके लिये साधारण आदमी की निन्दा होती है, और तीनों में निन्दा नहीं होती, क्योंकि जो ले रहा है वह उसे पचा सकता है।

और अब वह हिस्सा जो इस पंक्ति को दोहराते समय प्रायः छोड़ दिया जाता है, यद्यपि वही इसे बचाता है। अगला दोहा कहता है कि यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान में ऐसी होड़ करें, तो वे कल्प भर नरक में पड़ते हैं, क्योंकि जीव कहीं ईश्वर के समान हो सकता है। और उदाहरण ठीक तराजू पर रखा गया है: गंगाजल से बनायी हुई मदिरा को जानकर संत उसका पान नहीं करते, पर वही मदिरा गंगा में मिल जाय तो पवित्र हो जाती है। ईश और अनीश में यही अन्तर है। एक जिसे छूता है उसे अपने जैसा कर लेता है, दूसरा जिसे छूता है उसका रंग ले लेता है। समर्थ की छूट समर्थ के लिये है, और यह वाक्य उसी साँस में कह दिया गया है जिसमें छूट दी गयी थी।

सार: नारद कहते हैं कि विधाता के लिखे को देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई नहीं मिटा सकता। फिर भी एक उपाय है। वर के जो दोष उन्होंने बताये, वे सब उनके अनुमान से शिव में हैं, और शंकर से विवाह हो जाय तो वे ही दोष गुणों के समान कहे जायँगे। समर्थ को दोष नहीं लगता, पर होड़ करने वाला मूर्ख कल्प भर नरक में पड़ता है, क्योंकि जीव ईश्वर के समान नहीं।

जिस तप से वह मिलते हैं

शम्भु सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं, इसलिये इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है। यहाँ तक बात सीधी है। पर अगली ही अर्धाली में नारद एक ऐसा वाक्य रख देते हैं जिसमें आशा और चेतावनी दोनों एक साथ हैं: महेश दुराराध्य हैं, और क्लेश करने पर आसुतोष भी हैं। आराधना कठिन है, और सन्तोष जल्दी है। दोनों बातें एक दूसरे को काटती नहीं। जो जल्दी प्रसन्न होता है, उसका दाम भी पूरा लगता है। कठिनाई प्रतीक्षा में नहीं है, कीमत में है।

जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी । भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं । एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥

चौपाई ९

इस अर्धाली को दोहा अड़सठ के सामने रखकर पढ़िये। वहाँ पाँच जातियाँ गिनायी गयी थीं और कहा गया था कि इनमें से कोई ललाट का लिखा नहीं मिटा सकता। यहाँ मिटाने वाले का नाम लिया जा रहा है, और वह उन पाँच में नहीं है। त्रिपुरारि देवता की गिनती में नहीं आते, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि की गिनती में तो बिलकुल नहीं। इसलिये नारद ने अपनी ही बात नहीं काटी। उन्होंने पिता को यह बताया है कि लिखे हुए भाग्य से बाहर निकलने का एक ही दरवाज़ा है, और वह दरवाज़ा वही व्यक्ति है जिसके बारे में वह भाग्य लिखा गया है। और शर्त भी उन्होंने साफ़ रख दी: तप कन्या करे। पिता नहीं, माता नहीं, कोई पुरोहित नहीं।

इसके बाद वे चुनाव का कारण एक पंक्ति में बाँध देते हैं। जगत् में वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिव को छोड़कर दूसरा नहीं है। और फिर शिव का परिचय, जो वर के वर्णन से ठीक उलटा है: वर देने वाले, शरणागत की पीड़ा तोड़ने वाले, कृपा के समुद्र, सेवक का मन प्रसन्न करने वाले। उनकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप साधने पर भी इच्छित फल नहीं मिलता। यही कहकर, हरि का स्मरण करके, नारद ने पार्वती को आशीर्वाद दिया और पर्वतराज से कहा कि सन्देह छोड़ दें, अब कल्याण ही होगा। और फिर वे ब्रह्मलोक चले गये। जो व्यक्ति इस घर की सारी हलचल का कारण था, वह उसका अन्त देखने के लिये रुकता नहीं।

सार: नारद कहते हैं कि शम्भु सहज समर्थ हैं और यह विवाह सर्वथा कल्याणकारी है, पर महेश दुराराध्य हैं और क्लेश करने पर ही जल्दी सन्तुष्ट होते हैं। यदि कन्या तप करे तो त्रिपुरारि होनहार तक मिटा सकते हैं। जगत् में वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिव को छोड़कर दूसरा नहीं। आशीर्वाद देकर वे ब्रह्मलोक चले जाते हैं।

एक माता का डर, और पति का उत्तर

मुनि के जाते ही घर के भीतर की बात शुरू होती है। मैना पति को एकान्त में पाकर कहती हैं कि उन्होंने मुनि के वचनों का अर्थ नहीं समझा। और फिर वे अपनी शर्त रखती हैं, और इस पन्ने पर सबसे सीधी भाषा यही है: घर, वर और कुल यदि अनुपम हों और कन्या के योग्य हों तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुँआरी ही रह जाय। कारण भी वे साथ ही कह देती हैं, और कारण में कोई तर्क नहीं है: उमा उन्हें प्राणों के समान प्यारी हैं।

इसके बाद वे दूसरी बात कहती हैं, और वह पहली से अलग जाति की है। यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ होते हैं। यानी प्रेम के ठीक बगल में लोकलाज खड़ी है, और कवि दोनों को एक ही भाषण में रहने देते हैं, किसी को ऊपर नीचे किये बिना। और अन्त में वे वह कहती हैं जो हर माता कहती है: सोच समझकर विवाह कीजियेगा, जिससे पीछे हृदय में उर दाहू न हो। इतना कहकर वे पति के चरणों पर सिर रखकर गिर पड़ीं। उत्तर में हिमवान् बहस नहीं करते।

अस कहि परी चरन धरि सीसा । बोले सहित सनेह गिरीसा॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं । नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥

चौपाई १०

चन्द्रमा में चाहे आग प्रकट हो जाय, पर नारद का वचन अन्यथा नहीं होगा। उपमा के चुनाव पर ठहरिये। आकाश में जो एक चीज़ केवल शीतलता के लिये जानी जाती है, वही चन्द्रमा है। उसमें आग रखना इस कवि के पास असम्भव का सबसे बड़ा नाप है। और हिमवान् इस नाप से अपनी पत्नी का डर नहीं तौलते, अपना विश्वास तौलते हैं। इसके बाद वे उन्हें जो सान्त्वना देते हैं वह भी शिव के बारे में नहीं है: सब सोच छोड़कर भगवान् का स्मरण कीजिये, जिन्होंने पार्वती को रचा है वही कल्याण करेंगे। बेटी के बनाने वाले पर भरोसा, बेटी के वर पर नहीं। डरी हुई माता से यही कहा जा सकता था।

और फिर वे काम की बात कहते हैं। यदि कन्या पर प्रेम है तो जाकर उसे यही शिक्षा दीजिये कि वह ऐसा तप करे जिससे महेश मिल जायँ, क्योंकि दूसरे उपाय से यह क्लेश मिटने वाला नहीं। इसके बाद जो पंक्ति आती है, वह बताती है कि इस घर में कम से कम एक आदमी ने भाषण को ठीक ठीक पढ़ लिया है।

नारद बचन सगर्भ सहेतू । सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका । सबहि भाँति संकरु अकलंका॥

चौपाई ११

सगर्भ सहेतू। नारद के वचन गर्भ वाले हैं और सकारण हैं, यानी उनके भीतर कुछ और है और वे बिना कारण नहीं कहे गये। और वृषकेतु सब सुन्दर गुणों के भण्डार हैं, इसलिये शंका छोड़ दीजिये, शंकर सब भाँति निष्कलंक हैं। यह वही आदमी है जिसे कुछ पंक्तियाँ पहले यही भाषण चोट की तरह लगा था। बीच में उसने कुछ नया नहीं सुना। बीच में उसने केवल सोचा। जो सूचना पहली बार में शोक देती है और सोचने पर सहारा बन जाती है, वह बदली नहीं होती, सुनने वाला बदल जाता है।

सार: मैना कहती हैं कि उन्होंने मुनि के वचन नहीं समझे, और शर्त रखती हैं कि घर, वर और कुल अनुपम हों तभी विवाह हो, नहीं तो कन्या कुँआरी रहे। उन्हें लोकलाज का भी डर है। हिमवान् कहते हैं कि चन्द्रमा में आग प्रकट हो जाय पर नारद का वचन झूठा नहीं होगा, पार्वती के रचने वाले पर भरोसा रखिये, और कन्या को तप की शिक्षा दीजिये। नारद के वचन गूढ़ और सकारण हैं, शंकर सब भाँति निष्कलंक हैं।

जो समझाने गयी थी, वही समझायी गयी

पति के वचन सुनकर मैना मन में प्रसन्न हुईं और तुरन्त उठकर पार्वती के पास गयीं। और इसके बाद जो होता है, उसमें उनकी तैयार की हुई एक भी बात काम नहीं आती। उमा को देखते ही उनकी आँखों में जल भर आया। उन्होंने उन्हें स्नेह से गोद में बिठा लिया। बार बार हृदय से लगाने लगीं। गला भर आया और कुछ कहते नहीं बनता। जो माता शिक्षा देने गयी थी, वह एक शब्द नहीं बोल पाती।

और ठीक इसी जगह कवि गोद में बैठी हुई लड़की का परिचय बदल देते हैं। जगत मातु सर्बग्य भवानी। एक माता की गोद में जगत् की माता बैठी हैं, और वे सर्वज्ञ हैं। माता के मन की दशा जानकर वे सुख देने वाली कोमल वाणी से बोलती हैं। मृदु बानी, यानी ठीक वही शब्द जो इस पन्ने पर पहले नारद की वाणी के लिये आया था। दोनों बार कोमल आवाज़ के भीतर कुछ छिपा हुआ है, और दोनों बार जो छिपा है वह दया है।

सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥ ७२॥

दोहा ७२

वे कहती हैं कि उन्होंने एक स्वप्न देखा है, और उसमें एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उन्हें उपदेश दिया है। स्वप्न में वह ब्राह्मण क्या कहता है, यह आगे आता है: हे शैलकुमारी, नारद ने जो कहा उसे सत्य समझकर जाकर तप करो। और इसके तुरन्त बाद वह अर्धाली, जो पूरी युक्ति खोल देती है: यह मत माता पिता को भी अच्छा लगा है। स्वप्न का एक ब्राह्मण उस निर्णय को पहले से जानता है जो अभी अभी एक बन्द कमरे में लिया गया था। बेटी अपनी माता के लिये ठीक वही कर रही है जो माता उसके लिये करने आयी थी, और इस ढंग से कर रही है कि माता के पास न तर्क करने को कुछ बचे, न बाद में पछताने को। आज्ञा एक अनजान ब्राह्मण की है, इसलिये उस घर में किसी को यह नहीं ढोना पड़ेगा कि बेटी को वन उसने भेजा।

तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता । तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा । तपबल सेषु धरइ महिभारा॥

चौपाई १२

तप के बल से विधाता प्रपंच रचते हैं। तप के बल से विष्णु सारे जगत् की रक्षा करते हैं। तप के बल से शम्भु संहार करते हैं। तप के बल से शेष पृथ्वी का भार धारण करते हैं। और फिर निष्कर्ष: सारी सृष्टि तप के ही आधार पर है, ऐसा जी में जानकर जाकर तप करो। अब यह देखिये कि यह किससे कहा जा रहा है। एक लड़की को वन जाने के लिये तैयार किया जा रहा है, और तर्क यह नहीं दिया गया कि तप से वर मिलेगा। तर्क यह दिया गया है कि जगत् का बनना, चलना और मिटना, तीनों इसी एक ईंधन पर चलते हैं। उसका तप उसी पंक्ति में रखा जा रहा है। और यह पूरा भाषण वह स्वयं अपने मुँह में रख रही है।

सुनकर माता को अचरज हुआ और उन्होंने हिमवान् को बुलाकर वह स्वप्न सुना दिया। फिर माता पिता को बहुत तरह से समझाकर उमा हर्ष के साथ तप करने चलीं। पीछे प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता व्याकुल हो गये, किसी के मुँह से बात नहीं निकलती। तब वेदशिरा मुनि आकर सबको समझाते हैं, और पार्वती की महिमा सुनकर सबको समाधान हो जाता है। ध्यान दीजिये कि उन्हें किस बात से चुप कराया गया। यह नहीं कहा गया कि वह लौट आयेगी, न यह कि तप थोड़े दिन का है। उन्हें यह बताया गया कि वह है कौन। जिस घर से कोई जा रहा हो, उसे प्रायः यही एक सान्त्वना काम आती है।

सार: मैना समझाने जाती हैं पर गला भर आने से कुछ कह नहीं पातीं। तब जगज्जननी भवानी स्वयं कोमल वाणी में एक स्वप्न सुनाती हैं, जिसमें एक गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उन्हें तप का उपदेश दिया और यह भी कहा कि माता पिता को यह मत भाया है। तप के बल का वर्णन सुनकर माता अचरज में पड़ जाती हैं। उमा हर्ष से तप को चलती हैं और वेदशिरा मुनि पार्वती की महिमा सुनाकर घर को सँभालते हैं।

वन, और वह नाम जो पत्ते छोड़ने से मिला

प्राणपति के चरणों को हृदय में धारण करके उमा वन में जाकर तप करने लगीं। और इसके तुरन्त बाद कवि वह बात रख देते हैं जिसे कोई भी स्तुति करने वाला छोड़ जाता: यह शरीर अत्यन्त सुकुमार है, तप के योग्य नहीं है। यही शरीर कुछ पंक्तियाँ पहले नारद के मुँह से सुन्दर और सहज सुशील कहा गया था। अब उसी शरीर को उस काम के सामने रखकर नापा जा रहा है जो वह उठाने जा रहा है, और नाप में वह छोटा पड़ता है। फिर भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सारे भोग छोड़ दिये।

इसके बाद तुलसीदास हिसाब की तरह लिखते हैं, और यही इस हिस्से की ताक़त है। चरणों में नित्य नया अनुराग उपजता रहा, देह की सुध बिसर गयी और मन तप में लग गया। एक हज़ार वर्ष मूल और फल खाये। फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये। कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया। कुछ दिन कठिन उपवास किये। और फिर जो बेलपत्र सूखकर अपने आप पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हज़ार वर्ष तक वही खाये। किस पत्ते का नाम लिया गया है, इस पर रुकिये। बेल वही पत्ता है जो शिव पर चढ़ता है। और उन्होंने वे ही खाये जो स्वयं गिर चुके थे। पेड़ से एक भी नहीं तोड़ा। जिसके लिये तप हो रहा था, उसी की सामग्री, और उसमें से भी केवल वह जो किसी काम से लौटा दी गयी हो।

पुनि परिहरे सुखानेउ परना । उमहि नामु तब भयउ अपरना॥
देखि उमहि तप खीन सरीरा । ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा॥

चौपाई १३

फिर उन्होंने सूखे पत्ते भी छोड़ दिये, और तभी उनका नाम अपर्णा हुआ। नाम का अर्थ उसी अर्धाली में रखा हुआ है: जिसके पास पर्ण भी नहीं। इस पन्ने पर अब तक उन्हें जो कुछ मिला था, किसी और के मुँह से मिला था। गुण नारद ने गिनाये, लक्षण हाथ की रेखा ने तय किये, उपदेश स्वप्न के ब्राह्मण ने दिया। यह एक नाम उन्होंने स्वयं कमाया, और कमाया घटाकर। जो हाथ में बचा था वही और छोड़ दिया, और नाम उसी छोड़ने से बना।

तप से उमा का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई।

भयउ मनोरथ सुफल तव सुनु गिरिराजकुमारि।
परिहरु दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि॥ ७४॥

दोहा ७४

मनोरथ सफल हुआ, अब सारे क्लेश छोड़ दो, अब त्रिपुरारि मिलेंगे। दुसह शब्द पर ठहरिये। आकाश की वाणी उस तप को महान् नहीं कहती, पुण्य नहीं कहती, प्रशंसा का एक शब्द नहीं कहती। वह उसे असह्य कहती है, जो वह था, और उसे बन्द करने को कहती है। और अब देखिये कि यह पन्ना किस पर बन्द होता है। शिव नहीं आते। प्रसंग उनके आने के वचन पर समाप्त होता है, आकाश की एक आवाज़ में, ठीक वैसे ही जैसे यह उनके आने के वचन से शुरू हुआ था, एक मुनि की हँसती हुई वाणी में।

सार: उमा वन में तप करने लगती हैं, यद्यपि उनका सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं। एक हज़ार वर्ष मूल फल, सौ वर्ष साग, कुछ दिन जल और वायु, कुछ दिन उपवास, और तीन हज़ार वर्ष अपने आप गिरे हुए सूखे बेलपत्र। फिर वे भी छोड़ देने पर उनका नाम अपर्णा हुआ। तब आकाश से गम्भीर वाणी हुई कि मनोरथ सफल हुआ, दुःसह क्लेश छोड़ दो, अब त्रिपुरारि मिलेंगे।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग को एक साथ पढ़ने पर जो बात सबसे ऊपर रह जाती है, वह यह है कि यहाँ एक वाक्य कभी वापस नहीं लिया जाता। नारद ने वर के दोष एक बार गिनाये और उनमें से एक शब्द भी नहीं हटाया। उसके बाद जो कुछ हुआ, माता पिता का शोक, बेटी का हर्ष, माता की जिद, पिता का विश्वास, और तीन हज़ार वर्ष के सूखे पत्ते, वह सब उसी अटल वाक्य के चारों ओर हुआ। पन्ने पर जो बदलता है वह भविष्यवाणी नहीं है। सुनने वाले बदलते हैं।

दूसरी बात यह है कि इस कथा में कोई विरोधी नहीं है। दूसरी रामकथाओं से आया हुआ पाठक यहाँ किसी शाप की, किसी प्रतिद्वन्द्वी की या किसी षड्यन्त्र की राह देख सकता है। ऐसा कुछ नहीं है। पिता विवाह नहीं रोकता, माता अन्त में नहीं रोकती, और मुनि तो स्वयं उसका प्रबन्ध कर रहे हैं। लड़की और उसकी इच्छा के बीच केवल एक चीज़ खड़ी है, और वह है उस इच्छा की कीमत। कोई उसे रोक नहीं रहा, और कोई उसकी जगह वह कीमत चुका भी नहीं सकता। इसीलिये वह वन में अकेली है।

और तीसरी बात उस व्यक्ति की है जो इस पूरे पन्ने पर कहीं नहीं है। आरम्भ की चार पंक्तियों में शंकर क्रोध करके वीरभद्र को भेजते हैं, और उसके बाद वे एक बार भी सामने नहीं आते। उनका वर्णन होता है, उनका बचाव होता है, उनकी तुलना सूर्य, अग्नि और गंगा से होती है, उन्हें दुराराध्य और आशुतोष कहा जाता है, उन्हें संसार का एकमात्र वर बताया जाता है, और इतनी देर वे कहीं और हैं। एक हज़ार वर्ष, सौ वर्ष, तीन हज़ार वर्ष, यह सब एक ऐसे व्यक्ति के लिये दिया जाता है जिसने अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा। मानस आगे चलकर इन दोनों को मिलायेगा, पर यहाँ नहीं, और यह दूरी ही इस पन्ने की बात है।

और अन्त में वह पंक्ति जो सबसे छोटी है और सबसे देर तक साथ रहती है। मुनि की वाणी उस कमरे में सबने सुनी, और सबने उसे हृदय में सत्य माना। अन्तर विश्वास का नहीं था। चार लोग रोये और एक प्रसन्न हुई, और तुलसीदास कहते हैं कि यह भेद देवर्षि तक नहीं पकड़ पाये। फिर वे स्वयं हमें दिखा देते हैं कि भेद था कहाँ। माता पिता ने सुना कि वर में क्या क्या नहीं होगा। बेटी ने सुना कि वर कौन होगा।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ६५ से ७४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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