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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 8
पार्वती का जन्म, नारद की भविष्यवाणी और कठिन तप
हिमवान् के घर एक कन्या जन्मी है। उसके लिये नारद जैसा वर बताते हैं वह सुनकर माता पिता का मुँह उतर जाता है। उसी घड़ी उस कन्या के भीतर हर्ष भर उठता है।
पिछला प्रसंग दक्ष के यज्ञ में सती के देह त्याग के साथ बन्द हुआ था। कथा उसी का परिणाम लेकर उठती है, और उसे बहुत जल्दी समेट देती है। वीरभद्र भेजे जाते हैं, यज्ञ उखड़ जाता है, देवताओं को उनके किये का फल मिल जाता है। और कथा कहनेवाले याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कह देते हैं कि यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये उन्होंने संक्षेप में कहा। उस पर थोड़ी-सी बात कहकर कथा आगे बढ़ जाती है, और इस प्रसंग का बाक़ी हिस्सा आगे की कथा का है।
आगे यह है कि एक कन्या हिमाचल के घर जन्म लेती है, एक अतिथि कौतुक से चला आता है, और एक पिता उससे अपनी बेटी का भविष्य पूछ बैठता है। उत्तर सच्चा मिलता है, और वह उत्तर उस घर के हर आदमी के लिये बुरी खबर है, सिवाय उस लड़की के जिसके बारे में वह कहा गया है। फिर घर को सोचना है कि ऐसी भविष्यवाणी का करे क्या, जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। और अन्त में एक लड़की वन में तप कर रही है, गिरे हुए सूखे पत्ते खाती हुई, और फिर वे भी छोड़ती हुई।
हिमवान् का घर और देवर्षि
- पार्वती सती का दूसरा जन्म, हिमाचल के घर में। इस प्रसंग में उनके नाम गिनाये भी जाते हैं, उमा, अम्बिका, भवानी, और एक नाम वे स्वयं कमाती भी हैं।
- हिमवान् पर्वतराज, जो अतिथि के चरण धोते हैं, अपनी बेटी उसके चरणों पर रख देते हैं। फिर वे वह प्रश्न पूछ लेते हैं जिसका उत्तर उन्हें भारी पड़ता है।
- मैना पार्वती की माता, जो पति के सामने अपनी शर्त साफ़ शब्दों में रखती हैं, और जिनके भीतर बेटी के लिये डर है।
- नारद जो कौतुक से चले आते हैं, हँसकर बोलते हैं, और एक ही भाषण में घर को सुख भी दे जाते हैं और चिन्ता भी।
- शिव जिनकी चर्चा नारद के उत्तर से लेकर प्रसंग के अन्त तक चलती रहती है, जिनके गुण और दोष गिनाये जाते हैं। वे आरम्भ के बाद एक बार भी सामने नहीं आते।
- वेदशिरा मुनि जो ठीक उस घड़ी आते हैं जब घर में किसी के मुँह से बात नहीं निकल रही, और समझाकर सबको सँभाल देते हैं।
एक वर, जो मरते समय माँगा गया था
समाचार शिव तक पहुँचे, और उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा। यज्ञ का विध्वंस हुआ, और सब देवताओं को यथोचित फल मिला। दक्ष की वही गति हुई जो जगत् में शिवद्रोही की हुआ करती है। इसके तुरन्त बाद कथा कहनेवाले याज्ञवल्क्य अपनी ओर से एक बात जोड़ते हैं: यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैंने संक्षेप में कह दिया।
फिर वह बात आती है कि सती ने मरते समय भगवान् से एक वर माँगा था: जन्म जन्म शिव के चरणों में अनुराग बना रहे। माँग प्रतिशोध की नहीं, एक भाव की है, और वह भी एक जन्म के लिये नहीं। और उस माँग का परिणाम रख दिया गया है।
कारण और कार्य आमने सामने रख दिये गये हैं, बीच में कुछ नहीं। अनुराग माँगा गया था, इसलिये एक शरीर मिला जिसमें वह अनुराग फिर उपजेगा। और शरीर पाने पर भी रुकिये। तुलसी कहते हैं कि उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती का शरीर पाकर जन्म लिया। देह नया है, जन्म लेनेवाली वही हैं।
जिस घर में वह आयीं, वहाँ पेड़ सदा फूले-फले
जिस दिन से पार्वती हिमाचल के घर आयीं, उस पर्वत का हाल बदल गया। सारी सिद्धियाँ और सम्पत्तियाँ वहाँ छा गयीं। मुनियों ने जहाँ तहाँ सुन्दर आश्रम बना लिये और हिमाचल ने उन्हें उचित स्थान दिये। फिर यह बदलाव और आगे जाता है: सब वृक्ष नये और अनेक जातियों के हो गये, और सदा फूल तथा फल से लदे रहने लगे। और पर्वत पर बहुत प्रकार की मणियों की खानें प्रकट हो गयीं।
फिर जीवों की बारी आती है। नदियों में पवित्र जल बहने लगा, पक्षी, पशु और भ्रमर सब सुखी रहने लगे। और फिर एक कठिन बात हल्के ढंग से कह दी जाती है। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया, वह वैर जो शरीर के साथ ही आता है। और पर्वत पर सब परस्पर प्रेम करने लगे।
पर्वत ऐसा शोभा पा रहा है जैसे रामभक्ति पाकर भक्त शोभा पाता है। यह शिव की कथा है, और इसके बीच सुन्दरता की उपमा रामभक्ति है। फिर तुलसी जोड़ते हैं कि उस घर में नित्य नये मंगल होते हैं और उसका यश ब्रह्मा आदि गाते हैं।
एक अतिथि, और एक पिता का प्रश्न
ये सब समाचार नारद तक पहुँचे और वे हिमाचल के घर चल पड़े। किस लिये, यह एक शब्द में बता दिया गया है: कुतूहल से। पर्वतराज ने बड़ा आदर किया, चरण धोकर उत्तम आसन दिया। फिर पत्नी सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और चरणोदक सारे भवन में छिड़कवाया। अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया, और फिर बेटी को बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया।
अब तक स्वागत था। अब प्रश्न है, और इस प्रश्न के बाद घर वैसा नहीं रहता।
पहले वे अतिथि को बता देते हैं कि वे कौन हैं: त्रिकालज्ञ, सर्वज्ञ, और जिनकी पहुँच सब जगह है। और फिर वे पूछते हैं, इस क्रम में: दोष और गुण। दोष पहले। जो पिता अभी अभी अपने सौभाग्य का बखान कर रहा था, वह बेटी के बारे में पहले दोष पूछता है। उत्तर देते समय नारद यह क्रम उलट देते हैं। गुण देर तक चलते हैं, और दोष अन्त में आते हैं, थोड़े-से शब्दों में।
गुण, जो गिनते गिनते बहुत दूर निकल जाते हैं
उत्तर से पहले दो बातें कही गयी हैं। दोनों चेतावनी हैं: नारद हँसकर बोले, और उनकी वाणी कोमल थी पर उसके भीतर कुछ छिपा हुआ था। जो सुन रहे हैं उन्हें यह नहीं दिखता, पर ये दो बातें पहले ही बता चुकी हैं कि यह भाषण सीधा नहीं है।
और फिर गुण। कन्या सब गुणों की खान है, स्वभाव से ही सुन्दर, सुशील और समझदार। उसके तीन नाम गिनाये जाते हैं: उमा, अम्बिका, भवानी। वह सब शुभ लक्षणों से सम्पन्न है और अपने पति को सदा प्यारी होगी। उसका सुहाग सदा अचल रहेगा और उससे माता पिता यश पायेंगे। वह सारे जगत् में पूज्य होगी और उसकी सेवा करने से कुछ दुर्लभ न रहेगा। यहाँ तक वह सब है जो कोई भी पिता सुनना चाहता है।
पर फिर बात इस सूची से बाहर निकल जाती है: संसार की स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रत रूपी तलवार की धार पर चढ़ जायँगी। यह उपमा वर का वर्णन शुरू होने से ठीक पहले रखी गयी है।
दो चार अवगुण
गुण समाप्त होते ही नारद कहते हैं: हे पर्वतराज, आपकी कन्या सुलक्षणी है। अब जो दो चार अवगुण हैं, वे भी सुन लीजिये। दो चार, यानी वह संख्या जो कोई तब कहता है जब चीज़ छोटी हो। फिर जो सूची आती है उसमें दस बातें हैं।
गुणहीन। मानहीन। जिसके माता पिता ही नहीं। उदासीन। और संशयहीन, जिसे टीका लापरवाह कहकर खोलती है। किसी कन्या के पिता के सामने वर का यह परिचय जितना बुरा हो सकता है, उतना बुरा है, और सूची आगे पूरी होती है।
योगी, जटाधारी, निष्काम मन वाला, नंगा, अमंगल वेष वाला। और फिर वह वाक्य जो दरवाज़ा बन्द कर देता है: ऐसा स्वामी इसको मिलेगा। मिल सकता है नहीं, मिलेगा। और कारण किसी शाप, शत्रु या ग्रह का नहीं: इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है।
और इन दस बातों में शिव का नाम एक बार भी नहीं है। पिता को यह नहीं बताया गया कि वर कौन है, केवल यह कि वर कैसा है। नाम रुका रहता है, और उसी रुके हुए नाम से आगे की कथा चलती है।
एक ही कमरे में दो तरह के आँसू
दो विपरीत बातें साथ-साथ हैं: मुनि की वाणी सुनकर और उसे हृदय में सत्य मानकर पति पत्नी को दुख हुआ, और पार्वती हर्षित हुईं। सत्य दोनों ने एक जैसा माना। अन्तर इसमें था कि एक ही वाक्य से किसने क्या सुना।
और इसके तुरन्त बाद: नारद ने भी यह भेद नहीं जाना। जिन्हें त्रिकालज्ञ कहकर बिठाया गया था, उन्हें उसी कमरे में यह नहीं दिखा कि सब में से एक को सुख हुआ है। कारण साथ ही रखा गया है: बाहरी दशा एक सी थी, भीतरी समझ अलग अलग। और फिर वह एक सी दशा दिखा दी जाती है: सारी सखियाँ, पार्वती, हिमवान् और मैना, सबका शरीर पुलकित और सबकी आँखें जल से भरी हुईं। जहाँ दुख और हर्ष का चिह्न एक ही हो, वहाँ त्रिकालज्ञ भी पढ़ नहीं पाते।
पार्वती ने उस घड़ी क्या किया, यह भी साथ ही कहा गया है: नारद की बात झूठी नहीं हो सकती, यह मानकर उन्होंने उस वचन को हृदय में धर लिया। जो वाक्य माता पिता के लिये चोट था, वही उनके लिये सम्पत्ति बन गया।
क्रम पर ठहरिये। पहले शिव के चरणकमलों में स्नेह उपजा, उसके बाद मन में यह सन्देह हुआ कि मिलना कठिन है। दोनों शब्दों की तुक भी एक है, स्नेह और सन्देह।
और फिर: अवसर ठीक नहीं है, यह जानकर पार्वती ने अपनी प्रीति छिपा ली, और उठकर सखी की गोद में जाकर बैठ गयीं। निर्णय प्रेम छोड़ने का नहीं, अभी न दिखाने का है। और जहाँ वे बैठती हैं वह एक सहेली की गोद है। जो आगे तीन हज़ार वर्ष सूखे पत्तों पर काटनेवाली है, वह इस क्षण अपने पिता के घर की एक लड़की ही है।
ललाट पर लिखी हुई बात
नारद की वाणी झूठी नहीं होगी, यह सोचकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर पर्वतराज हृदय में धीरज धरकर पूछते हैं: हे नाथ, कहिये, अब उपाय क्या किया जाय। यह उस आदमी का प्रश्न है जो मान चुका है कि जो कहा गया वह सच है। उत्तर कठोर है।
पाँच गिनाये गये हैं: देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि। विधाता ने ललाट पर जो लिख दिया, इनमें से कोई उसे मिटा नहीं सकता। उपाय पूछनेवाले पिता को इससे बड़ा इनकार नहीं मिल सकता था। पर फिर बात एक शब्द से खुलती है: फिर भी एक उपाय मैं बताता हूँ, यदि दैव सहायता करे तो वह बने। और साथ ही वे साफ़ कर देते हैं कि वर वैसा ही मिलेगा जैसा उन्होंने बताया, इसमें सन्देह नहीं। जो उपाय आ रहा है वह भविष्यवाणी के विरुद्ध नहीं, उसी के भीतर से है।
और अब वह बात, जिस पर यह प्रसंग घूम जाता है।
वर के जो जो दोष मैंने बखाने, वे सब मेरे अनुमान से शिव में हैं। मेरे अनुमान से, इस पर ध्यान दीजिये। नारद अपना अनुमान बताते हैं, और तुरन्त नतीजा निकाल देते हैं।
यदि विवाह शिव से हो जाय, तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समान ही कहेंगे। सूची में से एक शब्द नहीं हटा, एक अक्षर वापस नहीं लिया गया। बदला केवल यह कि वे शब्द किसके बारे में हैं। वही गुणहीनता, जो किसी साधारण वर में दोष होती, शिव के बारे में गुणों से परे होना भी पढ़ी जा सकती है।
फिर नारद प्रमाण गिनाते हैं, और तीनों एक ही ढाँचे के हैं। विष्णु साँप की सेज पर सोते हैं, फिर भी पण्डित उन पर दोष नहीं रखते। सूर्य और अग्नि अच्छे बुरे सब रस खा जाते हैं, फिर भी उन्हें कोई बुरा नहीं कहता। गंगा में शुभ और अशुभ सब जल बहता है, फिर भी उन्हें कोई अपवित्र नहीं कहता। और निष्कर्ष: सूर्य, अग्नि और गंगा की तरह समर्थ को दोष नहीं लगता।
और फिर इस छूट की सीमा भी बाँध दी जाती है: यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान में ऐसी होड़ करें, तो वे कल्प भर नरक में पड़ते हैं। क्योंकि जीव कहीं ईश्वर के समान हो सकता है? उदाहरण ठीक तराजू पर रखा गया है: गंगाजल से बनायी हुई मदिरा को जानकर संत उसका पान नहीं करते। पर वही मदिरा गंगा में मिल जाय तो पवित्र हो जाती है। ईश्वर और जीव में यही अन्तर है। समर्थ की छूट समर्थ के लिये है, और यह बात उसी साँस में कह दी गयी है जिसमें छूट दी गयी थी।
जिस तप से वह मिलते हैं
शिव सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं, इसलिये इस विवाह में सब प्रकार कल्याण है। पर फिर आशा और चेतावनी दोनों एक साथ आती हैं: शिव दुराराध्य हैं, उनकी आराधना कठिन है, और क्लेश करने पर आशुतोष भी हैं, जल्दी सन्तुष्ट हो जाते हैं। कठिनाई प्रतीक्षा में नहीं, कीमत में है।
यदि आपकी कन्या तप करे, तो शिव होनहार को भी मिटा सकते हैं। इस बात को नारद की पहली बात के सामने रखकर पढ़िये। वहाँ पाँच गिनाये गये थे, देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि। और कहा गया था कि इनमें से कोई ललाट का लिखा नहीं मिटा सकता। उन पाँच में शिव का नाम नहीं लिया गया था। यहाँ मिटानेवाले शिव हैं। और शर्त भी साफ़ है: तप कन्या करे। पिता नहीं, माता नहीं।
फिर वे चुनाव का कारण थोड़े में बाँध देते हैं: जगत् में वर अनेक हैं, पर इसके लिये शिव को छोड़कर दूसरा नहीं है। और फिर शिव का परिचय, जो वर के वर्णन से ठीक उलटा है: वर देनेवाले, शरणागत की पीड़ा तोड़नेवाले, कृपा के समुद्र, सेवक का मन प्रसन्न करनेवाले। उनकी आराधना किये बिना करोड़ों योग और जप साधने पर भी इच्छित फल नहीं मिलता। यह कहकर, भगवान् का स्मरण करके, नारद ने पार्वती को आशीर्वाद दिया और पर्वतराज से कहा कि सन्देह छोड़ दें, अब कल्याण ही होगा। फिर वे ब्रह्मलोक चले गये। जो इस घर की सारी हलचल का कारण था, वह उसका अन्त देखने के लिये रुकता नहीं।
एक माता का डर, और पति का उत्तर
मुनि के जाते ही घर के भीतर की बात शुरू होती है। मैना पति को एकान्त में पाकर कहती हैं कि उन्होंने मुनि के वचनों का अर्थ नहीं समझा। फिर वे अपनी शर्त सीधे शब्दों में रखती हैं: घर, वर और कुल यदि अनुपम हों और कन्या के योग्य हों तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुँआरी ही रह जाय। कारण में कोई तर्क नहीं: पार्वती उन्हें प्राणों के समान प्यारी हैं।
फिर दूसरी बात, जो पहली से अलग जाति की है: यदि पार्वती के योग्य वर न मिला तो लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ होते हैं। प्रेम के बगल में लोकलाज खड़ी है, दोनों एक ही भाषण में। और अन्त में: सोच समझकर विवाह कीजियेगा, जिससे पीछे हृदय में जलन न हो। इतना कहकर वे पति के चरणों पर सिर रखकर गिर पड़ीं। उत्तर में हिमवान् बहस नहीं करते।
चन्द्रमा में चाहे आग प्रकट हो जाय, पर नारद का वचन झूठा नहीं होगा। जो चन्द्रमा शीतलता के लिये जाना जाता है, उसमें आग रखना असम्भव का नाप है, और हिमवान् इस नाप से पत्नी का डर नहीं, अपना विश्वास तौलते हैं। फिर वे जो सान्त्वना देते हैं, वह शिव के बारे में नहीं है: सब सोच छोड़कर भगवान् का स्मरण कीजिये, जिन्होंने पार्वती को रचा है वही कल्याण करेंगे। बेटी के बनानेवाले पर भरोसा, बेटी के वर पर नहीं।
और फिर काम की बात: यदि कन्या पर प्रेम है तो जाकर उसे यही शिक्षा दीजिये कि वह ऐसा तप करे जिससे शिव मिल जायँ। क्योंकि दूसरे उपाय से यह क्लेश मिटनेवाला नहीं। इसके बाद की बात बताती है कि इस घर में कम से कम एक आदमी ने नारद का भाषण ठीक ठीक पढ़ लिया है।
नारद के वचन रहस्य से भरे हैं और सकारण हैं। और शिव सब सुन्दर गुणों के भण्डार हैं, इसलिये शंका छोड़ दीजिये, शिव सब भाँति निष्कलंक हैं। यह वही आदमी है जिसे थोड़ी देर पहले यही भाषण चोट की तरह लगा था। बीच में उसने नारद का पूरा उत्तर सुना है, जो उसी से कहा गया था। जो दोष गिनाये गये वे नारद के अनुमान से शिव में हैं, समर्थ को दोष नहीं लगता, और तप करने पर शिव होनहार को भी मिटा सकते हैं। अब वह उसी उत्तर के सहारे बोल रहा है।
जो समझाने गयी थी, वही समझायी गयी
पति के वचन सुनकर मैना मन में प्रसन्न हुईं और तुरन्त उठकर पार्वती के पास गयीं। पार्वती को देखते ही उनकी आँखों में जल भर आया। उन्होंने उन्हें स्नेह से गोद में बिठा लिया, बार बार हृदय से लगाने लगीं। गला भर आया और कुछ कहते नहीं बनता। जो माता शिक्षा देने गयी थी, वह एक शब्द नहीं बोल पाती।
और ठीक यहीं गोद में बैठी लड़की का परिचय बदल जाता है। एक माता की गोद में जगत् की माता बैठी हैं, और वे सर्वज्ञ भवानी हैं। टीका के अनुसार माता के मन की दशा जानकर वे माता को सुख देनेवाली कोमल वाणी से बोलती हैं। कोमल वाणी, वही शब्द जो पहले नारद की वाणी के लिये आया था।
वे कहती हैं कि उन्होंने एक स्वप्न देखा है, और उसमें एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उन्हें उपदेश दिया है। स्वप्न का ब्राह्मण कहता है: हे पार्वती, नारद ने जो कहा उसे सत्य समझकर जाकर तप कीजिये। और फिर वह बात: यह मत माता पिता को भी अच्छा लगा है, और तप सुख देनेवाला और दुःख-दोष का नाश करनेवाला है। स्वप्न का ब्राह्मण वह निर्णय जानता है जो अभी अभी एकान्त में लिया गया था। जो बात माता कहने आयी थीं और कह नहीं पायीं, वही बात बेटी के सुनाये स्वप्न में आ जाती है।
तप के बल से ब्रह्मा संसार रचते हैं। तप के बल से विष्णु सारे जगत् की रक्षा करते हैं। तप के बल से शिव संहार करते हैं। तप के बल से शेष पृथ्वी का भार धारण करते हैं। और निष्कर्ष: सारी सृष्टि तप के ही आधार पर है, ऐसा जी में जानकर जाकर तप कीजिये। तर्क यह नहीं दिया गया कि तप से वर मिलेगा। तर्क यह है कि जगत् का बनना, चलना और मिटना, तीनों इसी के बल पर हैं।
सुनकर माता को अचरज हुआ, और उन्होंने हिमवान् को बुलाकर वह स्वप्न सुना दिया। फिर माता पिता को बहुत तरह से समझाकर पार्वती हर्ष के साथ तप करने चलीं। पीछे प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता व्याकुल हो गये, किसी के मुँह से बात नहीं निकलती। तब वेदशिरा मुनि आकर सबको समझाते हैं, और पार्वती की महिमा सुनकर सबको समाधान हो जाता है। उन्हें यह नहीं कहा गया कि वह लौट आयेगी, न यह कि तप थोड़े दिन का है। उन्हें यह बताया गया कि वह है कौन।
वन, और वह नाम जो पत्ते छोड़ने से मिला
प्राणपति के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वती वन में जाकर तप करने लगीं। और इसके तुरन्त बाद तुलसी कहते हैं: यह शरीर बहुत सुकुमार है, तप के योग्य नहीं। यही शरीर थोड़ा पहले नारद के मुँह से सुन्दर और सहज सुशील कहा गया था। अब उसे उस काम के सामने रखकर नापा जा रहा है जो वह उठाने जा रहा है। फिर भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंने सारे भोग छोड़ दिये।
इसके बाद कथा हिसाब की तरह चलती है। चरणों में नित्य नया अनुराग उपजता रहा, देह की सुध बिसर गयी और मन तप में लग गया। एक हज़ार वर्ष मूल और फल खाये। फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये। कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया। कुछ दिन कठिन उपवास किये। और फिर जो बेलपत्र सूखकर अपने आप पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हज़ार वर्ष तक वही खाये: केवल वे, जो स्वयं गिर चुके थे।
फिर उन्होंने सूखे पत्ते भी छोड़ दिये, और तभी उनका नाम अपर्णा हुआ, यानी जिसके पास पर्ण भी नहीं। अब तक उन्हें जो कुछ मिला था, किसी और के मुँह से मिला था। नाम और गुण नारद ने गिनाये, वर हाथ की रेखा ने तय किया, उपदेश स्वप्न के ब्राह्मण ने दिया। यह एक नाम उन्होंने स्वयं कमाया, और कमाया घटाकर।
तप से पार्वती का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई।
हे पर्वतराज की कुमारी, सुनिये, आपका मनोरथ सफल हुआ। अब सारे असह्य क्लेश छोड़ दीजिये, अब शिव मिलेंगे। असह्य शब्द पर ठहरिये। आकाश की वाणी तप के क्लेशों को असह्य कहती है, जो वे सचमुच थे, और उन्हें छोड़ देने को कहती है। और शिव नहीं आते। प्रसंग उनके मिलने के वचन पर समाप्त होता है, आकाश की एक आवाज़ में। ठीक वैसे ही जैसे हिमवान् के घर में शिव का नाम पहली बार नारद के उत्तर के भीतर आया था।
अटल वाक्य, बदलते सुननेवाले
हिमवान् के घर में कहा गया एक वाक्य कभी वापस नहीं लिया जाता। नारद ने वर के दोष एक बार गिनाये और उनमें से एक शब्द भी नहीं हटाया। उसके बाद जो कुछ हुआ: माता पिता का दुख, बेटी का हर्ष, माता की जिद, पिता का विश्वास, और तीन हज़ार वर्ष के सूखे पत्ते। वह सब उसी अटल वाक्य के चारों ओर हुआ। इस पूरे प्रसंग में भविष्यवाणी नहीं बदलती। सुननेवाले बदलते हैं।
दूसरी बात यह कि इस कथा में कोई विरोधी नहीं है। पिता विवाह नहीं रोकते, माता अन्त में नहीं रोकतीं, और मुनि तो स्वयं उपाय बता रहे हैं। लड़की और उसकी इच्छा के बीच केवल उस इच्छा की कीमत खड़ी है, और वह कीमत उसकी जगह कोई चुका नहीं सकता।
और तीसरी बात उनकी है जो इस कथा में कहीं सामने नहीं हैं। आरम्भ में शिव क्रोध करके वीरभद्र को भेजते हैं, और उसके बाद एक बार भी सामने नहीं आते। उनका वर्णन होता है, उनका बचाव होता है, उनकी तुलना सूर्य, अग्नि और गंगा से होती है। उन्हें दुराराध्य और आशुतोष कहा जाता है, उन्हें इस कन्या का एकमात्र वर बताया जाता है। एक हज़ार वर्ष, सौ वर्ष, तीन हज़ार वर्ष, यह सब उनके लिये दिया जाता है जिन्होंने अभी तक एक शब्द भी नहीं कहा।
और अन्त में वह बात जो सबसे छोटी है। मुनि की वाणी उस कमरे में सबने सुनी, और सबने उसे सत्य माना। माता पिता दुखी हुए और पार्वती प्रसन्न, सबकी आँखें भरी थीं, और तुलसी कहते हैं कि यह भेद नारद तक नहीं पकड़ पाये। माता पिता ने सुना कि वर कैसा होगा। बेटी ने उसमें पहचान लिया कि वर कौन है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 65 से 74, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।