रामचरितमानस · बालकाण्ड · बरात की तैयारी और जनकपुर की यात्रा
बरात की तैयारी और जनकपुर की यात्रा
अयोध्या में घर-घर मंगल है, भरत और शत्रुघ्न यात्रा की तैयारी में लगते हैं, और दशरथ की बरात के लिये जनक नदियों पर पुल तथा मार्ग में सुन्दर पड़ाव बनवाते हैं।
सुन्दर वस्त्र पहनकर याचक विदा हो रहे हैं और नगाड़ों पर आनन्द की चोट पड़ रही है। समाचार घर-घर पहुँचता है तो बधावे शुरू हो जाते हैं। जानकी और रघुवीर के विवाह का उत्साह इतना फैलता है कि तुलसी उसके लिये चौदहों लोकों का विस्तार चुनते हैं। अयोध्या की सड़कें, गलियाँ और घर सँवरने लगते हैं। इस नगर में राम के विवाह का सुख सबका अपना सुख हो गया है, और हर घर अपनी सजावट से उसमें सम्मिलित होता है।
उसी आनन्द के बीच यात्रा का काम सँभालना है। दशरथ भरत को बुलाते हैं, भरत और शत्रुघ्न पुलकित होते हैं, घोड़े सजते हैं, रथ तैयार होते हैं और तरह-तरह की सवारियाँ नगर के बाहर जुटती हैं। सबके भीतर राम और लक्ष्मण को नेत्र भरकर देखने की लालसा है। यात्रा के दूसरे छोर पर जनक भी तैयारी कर रहे हैं। बरात के लिये नदियों पर पुल बन रहे हैं और पड़ावों में भोजन, बिस्तर तथा वस्त्र रखे गये हैं। यह प्रसंग सजती अयोध्या से चलकर उस घड़ी तक पहुँचता है जब नगाड़े सुनकर अगवानी करनेवाले बरात लेने निकलते हैं।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- दशरथ भरत को तैयारी की आज्ञा देनेवाले राजा, जो पहले वसिष्ठ को रथ पर बिठाते हैं और फिर स्वयं यात्रा के लिये चढ़ते हैं।
- भरत और शत्रुघ्न आज्ञा सुनकर पुलकित होनेवाले दोनों भाई। भरत घुड़साल के अध्यक्षों को बुलाकर घोड़े सजाने का काम सौंपते हैं।
- वसिष्ठ गुरु, जिनको आदर से रथ पर बिठाकर और जिनकी आज्ञा पाकर दशरथ प्रस्थान करते हैं।
- सुमन्त्र राजा और गुरु के लिये विशेष रूप से सजे दो सुन्दर रथ लानेवाले।
- राम और लक्ष्मण वे दोनों भाई जिनके दर्शन के लिये बरातियों के हृदय उत्सुक हैं। राम इस विवाह के वर हैं।
- सीता और जनक वधू सीता और उनके पिता जनक। जनक बरात के मार्ग पर पुल तथा सुन्दर ठहरने के स्थान बनवाते हैं।
हर घर का अपना मंगल
विदा होते याचकों के वस्त्रों से आरम्भ हुआ दृश्य धीरे-धीरे सारे नगर में फैल जाता है। नगाड़े बजानेवाले हर्ष में भरकर इतने जोर से चोट लगाते हैं कि उत्सव की ध्वनि दूर तक जाती है। लोगों को विवाह का समाचार मिलता है और उनके घरों में बधावे होने लगते हैं। यहाँ प्रसन्नता के दो रूप साथ हैं, पहनने को मिले सुन्दर वस्त्रों में व्यक्त संतोष और विवाह की बात सुनकर उपजा सामूहिक उत्साह। विदा होनेवाले चले जाते हैं, पर आनन्द नगर में बढ़ता रहता है।
भुवन चारि दस भरा उछाहू । जनकसुता रघुबीर बिआहू॥
चौपाई १
सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे । मग गृह गलीं सँवारन लागे॥
जनक की पुत्री और रघुवीर का विवाह होगा, यह सुनते ही प्रेम में भरे लोग रास्ते, घर और गलियाँ सजाने लगते हैं। तुलसी पहले उत्साह का विस्तार चौदह लोकों तक करते हैं, फिर हमारी दृष्टि को नगर की गलियों पर ले आते हैं। जितना बड़ा समाचार है, उतना ही निकट उसका काम है। अपने सामने का मार्ग सँवारना है, अपने घर को मंगलमय करना है। विवाह की खुशी इस प्रकार हर घर के हाथों तक पहुँचती है।
अयोध्या को नया सौन्दर्य देने की बात कहते हुए कवि उसका पहले से सुहावना होना भी याद रखते हैं। वह राम की पवित्र, मंगलमयी पुरी है। आज की सजावट उस निरन्तर शोभा में प्रीति की एक और वृद्धि है। पहले से प्रिय स्थान को फिर सजाने का उत्साह है। इसीलिये नगर के वर्णन में हर नई चीज के साथ प्रेम भी बढ़ता दिखाई देता है। परिचित घर अपनी जगह हैं, और उन्हीं पर विवाह की मंगल रचना तैयार हो रही है।
बाजार में ध्वजाएँ और पताकाएँ हैं, परदे और सुन्दर चँवर हैं। इनसे वह अनूठी तरह छाया हुआ शोभित होता है। घरों के लिये सोने के कलश, तोरण और मणियों की झालरें आती हैं। फिर हल्दी, दूब, दही, अक्षत और मालाएँ भी उसी सजावट में अपनी जगह पाते हैं। सोने तथा मणियों का वैभव इन छोटे मंगल पदार्थों के साथ रखा गया है। जिनके नाम लेते ही पूजा और उत्सव की तैयारी दिखाई देने लगती है, वे सब इस नगर की शोभा में उपस्थित हैं।
मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ।
दोहा २९६
बीथीं सींचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ॥ २९६॥
लोग अपने-अपने भवन सजाते हैं। गलियाँ चतुरसम से सींची जाती हैं और सुन्दर चौक पूरे जाते हैं। पोद्दारजी की टीका चतुरसम को चन्दन, केसर, कस्तूरी और कपूर से बना सुगन्धित द्रव बताती है। इसलिए सजावट को देखते हुए हमें उसकी सुगन्ध का भी पता मिलता है। टीका चौक का स्थान द्वारों पर खोलती है। बाजार की व्यापक छटा से आते-आते वर्णन अब घर के प्रवेश तक आ गया है, जहाँ सुन्दर चौक और सुगन्ध से सींची गली साथ दिखाई देते हैं।
विवाह का समाचार पाकर अयोध्या में घर-घर बधावे होते हैं। प्रेम में भरे लोग मार्ग, बाजार और अपने भवन सँवारते हैं, गलियाँ चतुरसम से सींचते हैं और सुन्दर चौक पूरते हैं।
सोलह शृंगार और नाम लेकर गाये गीत
नगर की सजावट के बीच स्त्रियों के झुंड जहाँ-तहाँ मिलते हैं। सभी सोलह शृंगार किये हुए हैं। पोद्दारजी उन्हें सुहागिनी स्त्रियाँ कहते हैं। उनके सौन्दर्य के लिये तुलसी कई अलग छवियाँ एक साथ रखते हैं। कान्ति बिजली जैसी है, मुख चन्द्रमा जैसा है, नेत्र हरिन के बच्चे जैसे हैं। उनका अपना रूप ऐसा है कि कामदेव की पत्नी रति का अभिमान भी छूट जाय। यहाँ चमक, मुख की छटा और आँखों की कोमलता को अलग-अलग देखा गया है, इसलिए समूह में भी सौन्दर्य के अंग स्पष्ट बने रहते हैं।
उनकी मनोहर वाणी से मंगलगीत उठते हैं। कोयल की मधुरता भी उस कलरव के सामने लजा जाती है, ऐसी कवि की उपमा है। अभी जिन स्त्रियों को देखा जा रहा था, अब उन्हीं का गायन सुनाई देता है। सोलह शृंगार में सजा यह उत्सव स्वर भी धारण करता है। झुंड-के-झुंड मिलना और साथ गाना, दोनों मिलकर नगर की प्रसन्नता को और सघन करते हैं। किसी एक गायिका का नाम नहीं लिया जाता, सबके सम्मिलित स्वर से यह दृश्य पूरा होता है।
फिर राजमहल की ओर दृष्टि जाती है। वहाँ ऐसा मण्डप बना है जो सारे विश्व को विमोहित कर ले। अनेकों मनोहर मंगल पदार्थ शोभित हैं और बहुत-से नगाड़े बज रहे हैं। एक ओर भाट कुल की कीर्ति सुना रहे हैं, दूसरी ओर ब्राह्मणों की वेदध्वनि हो रही है। महल में सजावट के साथ श्रवण का भी पूरा उत्सव है। विरुदावली, वेदपाठ, नगाड़े और स्त्रियों के गीत, सब अपने-अपने स्वर में इसी विवाह का आनन्द प्रकट करते हैं।
गावहिं सुंदरि मंगल गीता । लै लै नामु रामु अरु सीता॥
चौपाई २
बहुत उछाहु भवनु अति थोरा । मानहुँ उमगि चला चहु ओरा॥
गीतों में राम और सीता का नाम बार-बार लिया जाता है। इतने वैभव के बीच यही दो नाम उत्सव का प्रिय विषय बने हुए हैं। और तब तुलसी महल के आकार को बड़ी स्नेहमयी दृष्टि से देखते हैं। उत्साह बहुत अधिक है, भवन उसके सामने अत्यन्त छोटा पड़ गया है। ऐसा लगता है जैसे आनन्द भीतर समा ही न सके और चारों ओर उमड़ चला हो। महल की विशालता का अलग हिसाब देने की आवश्यकता नहीं रहती। उसमें जो भरा है, उसका फैलाव ही हमें उसकी सीमा महसूस करा देता है।
दशरथ के भवन की शोभा पर दोहा आता है तो कवि पूछते हैं कि इसका वर्णन कौन कर सकेगा। कारण उसी प्रश्न के साथ रख दिया गया है। समस्त देवताओं के शिरोमणि राम ने यहाँ अवतार लिया है। महल की शोभा के मूल में उसका यह सम्बन्ध है। मण्डप, मंगल द्रव्य और ध्वनियाँ उस शोभा को प्रकट करते हैं, और राम का अवतार उसे वह महत्त्व देता है जिसे कवि अपने वर्णन से पूरा नहीं कर पाते।
सोलह शृंगार किये स्त्रियाँ मधुर मंगलगीत गाती हैं। राजमहल में मण्डप, मंगल पदार्थ, विरुदावली और वेदध्वनि हैं। राम तथा सीता के नामों से भरा उत्साह ऐसा उमड़ता है कि महल छोटा पड़ जाता है।
भरत को आज्ञा और घोड़ों की तैयारी
इसी उत्सव में दशरथ भरत को बुलाते हैं। काम साफ है, घोड़े, हाथी और रथ सजाने हैं तथा राम की बरात में शीघ्र चलना है। पिता की बात सुनते ही दोनों भाई आनन्द से पुलकित हो उठते हैं। पोद्दारजी की टीका यहाँ दोनों भाइयों को भरत और शत्रुघ्न के रूप में पहचानती है। यात्रा की जल्दी और भाई के विवाह का सुख एक ही आज्ञा में आ गये हैं। उस आज्ञा का पहला फल उनके शरीर पर दिखाई देता है, रोमांच के रूप में।
भूप भरत पुनि लिए बोलाई । हय गय स्यंदन साजहु जाई॥
चौपाई ३
चलहु बेगि रघुबीर बराता । सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता॥
भरत घुड़साल के सभी अध्यक्षों को बुलाते हैं। उनके लिये चौपाई में साहनी शब्द आता है, जिसे टीका घुड़साल का अध्यक्ष कहकर स्पष्ट करती है। आज्ञा पाते ही वे प्रसन्न होकर उठ दौड़ते हैं। घोड़ों की जीनें रुचि और अनुकूलता के साथ कसी जाती हैं। अनेक रंगों के उत्तम घोड़े सजकर शोभित हो उठते हैं। यहाँ काम सौंपने और काम में लग जाने के बीच विलम्ब दिखाई नहीं देता। भरत की प्रसन्नता उन लोगों की दौड़ में भी पहुँच गयी है जिन्हें तैयारी करनी है।
ये घोड़े सुन्दर हैं और उनकी चाल बहुत चञ्चल है। वे धरती पर ऐसे पाँव रखते हैं मानो जलते हुए लोहे पर पाँव पड़ रहा हो। इस उपमा में उनकी चपलता सामने आती है, पग टिकता नहीं, तुरन्त उठ जाता है। फिर गति की दूसरी उपमा हवा से जुड़ती है। अनेकों जातियों के ये घोड़े इतने तेज हैं कि मानो वायु की उपेक्षा करके उड़ना चाहते हों। कवि उन्हें गिनाने में नहीं रुकते। रंग, सजावट और तीव्र चाल, इनसे घुड़सवार दल की तैयारी दिखाई पड़ने लगती है।
उन घोड़ों पर भरत की अवस्था के छैल-छबीले राजकुमार सवार होते हैं। सभी सुन्दर हैं, सभी आभूषण पहने हुए हैं। हाथों में धनुष और बाण हैं, कमर में बड़े तरकस बँधे हैं। विवाह के उत्सव में उनका शृंगार और शूरवीर रूप साथ उपस्थित है। अलंकार से सजी देह के साथ आयुध भी तैयार हैं। आगे दोहा उन्हें चुने हुए, चतुर, शूरवीर नवयुवक कहता है और उनके साथ चलनेवाले पैदल सैनिकों का ठीक-ठीक विधान बताता है।
छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन।
दोहा २९८
जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन॥ २९८॥
हर सवार के साथ दो पैदल सिपाही हैं, और दोनों तलवार की कला में निपुण हैं। इस छोटी संख्या को ध्यान से रखिये। बड़ी बरात के भीतर एक सवार की संगति तक व्यवस्थित है। फिर शूरता का बाना धारण किये रणधीर वीर नगर से बाहर निकलकर खड़े होते हैं। वे घोड़ों को अलग-अलग चालों में फेरते हैं। भेरी और नगाड़े की ध्वनि सुनकर हर्षित होते हैं। बाहर जुटना भी अपने आप में देखने योग्य हो गया है, क्योंकि प्रतीक्षा में खड़े सवार अपने घोड़ों की चतुर चालें दिखा रहे हैं।
दशरथ की आज्ञा से भरत घोड़ों की तैयारी करवाते हैं। भरत की अवस्था के सजे हुए शूरवीर राजकुमार सवार होते हैं, प्रत्येक के साथ तलवार चलाने में निपुण दो पैदल सैनिक हैं। नगर के बाहर वे घोड़ों की विविध चालें दिखाते हैं।
रथों की शोभा और साथ चलता समाज
सारथी रथ सँवार रहे हैं। ध्वजाएँ, पताकाएँ, मणियाँ और आभूषण लगते हैं, सुन्दर चँवर सजते हैं और छोटी घंटियाँ ध्वनि करने लगती हैं। रथों की शोभा के लिये सूर्य के रथ का स्मरण आता है। ये ऐसे सुन्दर बने हैं जैसे उसकी शोभा छीन लें। फिर अगणित श्यामकर्ण घोड़े उनमें जोते जाते हैं। आभूषणों से सजे ये घोड़े इतने मनोहर हैं कि मुनियों का मन भी उन्हें देखकर मोहित हो उठे। सवारों के घोड़ों के बाद अब रथ खींचनेवाले घोड़ों का वैभव खुल रहा है।
जे जल चलहिं थलहि की नाईं । टाप न बूड़ बेग अधिकाईं॥
चौपाई ४
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई । रथी सारथिन्ह लिए बोलाई॥
इनकी गति का वर्णन करते हुए तुलसी एक अद्भुत छवि रखते हैं। ये जल पर भी स्थल के समान चलते हैं, इतने वेग से कि उनकी टाप पानी में डूबती ही नहीं। यह घोड़ों के वेग की काव्यमयी छटा है। सजावट को देखकर जो मन ठहरा था, इस गति को सुनकर वह फिर चल पड़ता है। सारथी अस्त्र, शस्त्र और पूरा साज तैयार करके रथियों को बुला लेते हैं। लोग रथों पर चढ़ते हैं और नगर के बाहर बरात का जमाव होने लगता है। जो जिस काम के लिये जाता है, उसे सुन्दर शकुन होते हैं।
अब हाथियों का समूह दिखाई देता है। श्रेष्ठ हाथियों पर सुन्दर अंबारियाँ पड़ी हैं, जिनकी सजावट का पूरा बखान कवि से नहीं बनता। मतवाले हाथी घंटों से सुशोभित चल रहे हैं। तुलसी उन्हें सावन के सुन्दर बादलों के समूह जैसा देखते हैं, और टीका उस चित्र में घंटों की गूँज के साथ गरजते बादलों का भाव खोलती है। घोड़ों में हवा की तेज चाल थी, हाथियों में वर्षा के मेघों की भरपूर छटा है। प्रत्येक सवारी को उसके अपने रूप में दिखाया गया है।
बाहन अपर अनेक बिधाना । सिबिका सुभग सुखासन जाना॥
चौपाई ५
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृंदा । जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा॥
सवारियों की और भी अनेक विधाएँ हैं। सुन्दर पालकियाँ हैं, आराम से बैठने के लिये सुखासन हैं और रथ हैं। टीका सुखासन को कुर्सीनुमा तामजान कहकर पहचानती है। इन पर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चढ़कर चलते हैं। उनके लिये तुलसी की उपमा निराली है, मानो वेदों के सारे छन्द शरीर धारण करके चले आ रहे हों। अभी महल में वेदध्वनि सुनाई दी थी। अब उन्हीं वेदों के छन्द की छवि इस चलते हुए ब्राह्मण समुदाय में दिखाई देती है।
मागध, सूत, भाट और गुणगायक भी अपने योग्य सवारियों पर चलते हैं। बहुत-सी जातियों के खच्चर, ऊँट और बैल असंख्य प्रकार की वस्तुएँ लादे हुए हैं। फिर कहार हैं, जिनकी काँवरों की संख्या कवि करोड़ों में कहते हैं। उनमें भरी हुई विविध वस्तुओं का वर्णन करना भी कठिन है। सेवकों के सारे समूह अपना-अपना साज और समाज बनाकर निकलते हैं। इस बरात की परिपूर्णता में वादक, गायक, सामान ढोनेवाले पशु, कहार और सेवक, सब दिखाई देते हैं। यात्रा के साथ उसका इतना बड़ा प्रबन्ध भी चल रहा है।
रथ, श्यामकर्ण घोड़े, अंबारियोंवाले हाथी, पालकियाँ और सुखासन तैयार हैं। ब्राह्मण, मागध, सूत, भाट तथा गुणगायक अपनी सवारियों पर चलते हैं; खच्चर, ऊँट, बैल, कहार और सेवक विविध सामान लेकर साथ निकलते हैं।
इतनी बरात, और सबकी एक लालसा
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
दोहा ३००
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर॥ ३००॥
सवारियाँ बहुत प्रकार की हैं और साथ चलनेवाले लोगों के काम भी अलग-अलग हैं। उनके भीतर का आनन्द एक ही दोहे में समा जाता है। सबके हृदय हर्ष से भरे हैं, सबके शरीर पुलकित हैं। पोद्दारजी उस हर्ष में बसी लालसा को इस तरह खोलते हैं कि राम और लक्ष्मण, दोनों वीर भाइयों को हम नेत्र भरकर कब देखेंगे। विवाह राम का है, और देखने की उत्कण्ठा में लक्ष्मण भी पूरे स्नेह से उपस्थित हैं। दोनों भाइयों का नाम लेते ही बरात का सारा वैभव एक प्रिय दर्शन की ओर मुड़ जाता है।
नगर में ध्वनि बहुत बढ़ गयी है। हाथी गरजते हैं और उनके बड़े घंटे बजते हैं। चारों ओर रथों की घरघराहट है, घोड़ों की हिनहिनाहट है। नगाड़ों की घोर ध्वनि ऐसी है जैसे बादलों की गरज का निरादर कर रही हो। कोई अपनी या दूसरे की बात सुन नहीं पाता। जिस जमाव को अभी एक-एक सवारी से पहचाना जा रहा था, उसका सम्मिलित स्वर इतना प्रबल है। हम उस भीड़ का आकार उसके इस कोलाहल से भी अनुभव करते हैं।
दशरथ के द्वार पर भारी भीड़ है। उसका घनापन बताने के लिये तुलसी कहते हैं कि वहाँ पत्थर फेंका जाय तो वह भी पिसकर धूल हो जाय। इस अतिशयोक्ति में भीड़ की ठसाठस भरी हुई उपस्थिति अनुभव होती है। ऊपर अटारियों पर स्त्रियाँ चढ़ी हैं। मंगल थालों में आरती लिये वे देख रही हैं और अनेक मनोहर गीत गा रही हैं। नीचे जुटी बरात और ऊपर से देखती स्त्रियाँ, दोनों एक ही आनन्द से भरे हैं।
इन गीतों के बीच सुमन्त्र दो रथ सजाकर लाते हैं। उनके घोड़े सूर्य के घोड़ों को भी मात करनेवाले कहे गये हैं। दोनों रथ इतने सुन्दर हैं कि उनकी शोभा का वर्णन सरस्वती से भी न बन सके। एक में राजसी सामान सजा है। दूसरा तेज के पुंज जैसा अत्यन्त शोभित है। अब इस बड़े समूह में राजा और गुरु की सवारी का विशेष स्थान सामने आता है। दोनों रथ दशरथ के पास लाकर खड़े कर दिये जाते हैं।
बरातियों के मन में राम और लक्ष्मण के दर्शन की लालसा है। दशरथ के द्वार पर भीड़ और वाद्यों का प्रबल कोलाहल है, अटारियों से स्त्रियाँ आरती तथा गीतों के साथ देख रही हैं, और सुमन्त्र दो विशेष सुन्दर रथ लेकर आते हैं।
पहले गुरु को रथ पर बिठाकर
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ
दोहा ३०१
हरषि चढ़ाइ नरेसु।
आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु॥ ३०१॥
दशरथ हर्षपूर्वक वसिष्ठ को उस सुन्दर रथ पर चढ़ाते हैं। उसके बाद शिव, गुरु, गौरी और गणेश का स्मरण करके स्वयं अपने रथ पर चढ़ते हैं। दोहे में इस क्रम को बड़ी सादगी से रखा गया है। गुरु का आसन पहले सँभलता है, फिर राजा की अपनी सवारी आती है। और अपने रथ पर चढ़ते समय भी गुरु स्मरण में बने रहते हैं। उत्सव की चहल-पहल में राजा का यह आदर स्पष्ट दिखाई देता है।
वसिष्ठ के साथ दशरथ की शोभा कैसी है, तुलसी उसकी उपमा देवगुरु और इन्द्र से देते हैं। पोद्दारजी देवगुरु को बृहस्पति कहकर स्पष्ट करते हैं। गुरु और राजा की यह संगति उस सम्मान को आगे बढ़ाती है जो अभी रथ पर बिठाते समय दिखा था। बारात की इतनी व्यवस्था के बीच प्रस्थान का निर्णय भी गुरु की आज्ञा से होना है। इसलिए गुरु की उपस्थिति रथ की शोभा और आगे चलने के विधान, दोनों में बनी रहती है।
राजा वेद की विधि और कुल की रीति के अनुसार सब काम पूरे करते हैं। वे देखते हैं कि सभी लोग हर तरह से तैयार हैं। इसके बाद राम का स्मरण करते हैं, गुरु की आज्ञा पाते हैं और शंख बजाकर प्रस्थान करते हैं। तैयारी का यह क्रम पूरा होने पर ही चलना होता है। अपने-अपने काम में लगे लोगों, कुल की परम्परा, वेद की विधि, गुरु की आज्ञा और राम के स्मरण, सबको उस चलने में स्थान मिला है।
बरात को देखकर देवता हर्षित होते हैं और मंगलदायक सुन्दर फूल बरसाते हैं। अयोध्या का उत्सव अब आकाश की प्रसन्नता के साथ दिखाई देता है। आरम्भ में विवाह का उत्साह चौदहों लोकों तक भरा था; यहाँ देवताओं की फूलवर्षा उसी बड़े आनन्द को दृश्य बना देती है। राजा की बरात चल पड़ी है, और तुलसी धरती तथा आकाश को उसके इस प्रस्थान में साथ रखते हैं।
दशरथ पहले वसिष्ठ को रथ पर बिठाते हैं, फिर शिव, गुरु, गौरी और गणेश का स्मरण करके स्वयं चढ़ते हैं। वेदविधि तथा कुलरीति पूरी कर, राम को याद करके और गुरु की आज्ञा पाकर वे शंख बजाते हुए चलते हैं। देवता फूल बरसाते हैं।
चलती बरात में राग और ताल
भयउ कोलाहल हय गय गाजे । ब्योम बरात बाजने बाजे॥
चौपाई ६
सुर नर नारि सुमंगल गाईं । सरस राग बाजहिं सहनाईं॥
प्रस्थान के साथ कोलाहल फिर भर उठता है। घोड़े और हाथी गरजते हैं, आकाश तथा बरात, दोनों ओर वाद्य बजते हैं। देवाङ्गनाएँ और मनुष्यों की स्त्रियाँ सुन्दर मंगलगान करती हैं। शहनाइयों में सरस राग बज रहे हैं। ध्वनि का यह विस्तार ध्यान से सुनिये, इसमें पशुओं का स्वर भी है, उत्सव के वाद्य भी और गाती हुई स्त्रियाँ भी। आकाश का गायन धरती के गायन के साथ रखा गया है।
घंटे और घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं हो सकता। पैदल चलनेवाले लोग कसरत के खेल दिखाते और ऊँचे उछलते जाते हैं। पोद्दारजी यहाँ पैदल सेवकों अथवा पट्टेबाजों का अर्थ देते हैं। उनके खेलों की कोई अलग क्रमवार सूची नहीं आती; चौपाई उनकी फुर्ती और उछाल से ही दृश्य को गतिमय कर देती है। साथ ही विदूषक अनेक कौतुक करते हैं। वे हँसाने में निपुण हैं और सुन्दर गायन में भी चतुर हैं। बरात की यात्रा में उनका हास्य और उनका संगीत अपना आनन्द जोड़ता है।
तुरग नचावहिं कुअँर बर अकनि मृदंग निसान।
दोहा ३०२
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान॥ ३०२॥
राजकुमार मृदंग और नगाड़े का शब्द सुनते हैं और उसी के अनुसार घोड़े नचाते हैं। ताल का बँधान इतना ठीक है कि घोड़े उससे तनिक भी नहीं डिगते। इसे देखकर चतुर नट भी चकित रह जाते हैं। जो लोग स्वयं कौशल से प्रदर्शन करते हैं, उन्हीं का आश्चर्य घुड़सवारों की निपुणता बताता है। घोड़ों की तेज चाल और सवारों का शौर्य पहले देखा जा चुका था। अब उन्हीं घोड़ों में संगीत की लय से निभनेवाली सधी हुई गति दिखाई देती है।
मृदंग और नगाड़े की ध्वनि यहाँ सुननेवालों को हर्षित भी करती है और राजकुमारों के प्रदर्शन को ताल भी देती है। पहले नगर के बाहर वीर उन्हें सुनकर प्रसन्न हो रहे थे, अब चलती बरात में घोड़े उन्हीं के अनुसार नाचते हैं। इतनी आवाजों के बीच यह ताल अपना बँधान बनाए रखती है। घंटियों, शहनाइयों, कौतुक और गायन से भरपूर उत्सव में यह छोटा-सा अनुशासन बहुत सुन्दर लगता है, और नटों का चकित होकर देखना उस सुन्दरता पर ठहरने देता है।
आकाश और बरात में वाद्य बजते हैं, स्त्रियाँ मंगलगान करती हैं, शहनाइयाँ राग सुनाती हैं। पैदल सेवक अथवा पट्टेबाज कसरत और उछाल दिखाते हैं, विदूषक हास्य तथा गायन करते हैं, और राजकुमार घोड़ों को मृदंग तथा नगाड़े की ताल से तनिक भी चूके बिना नचाते हैं।
दायें, बायें और सामने के मंगल शकुन
बरात ऐसी सजी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता। तुलसी अब उसके आसपास हो रहे शुभ शकुनों को देखते हैं। इस वर्णन में हर पक्षी या पशु बस दिखाई भर नहीं देता, उसके साथ उसकी दिशा अथवा उसकी कोई क्रिया भी आती है। यह विवाह के मंगल का शकुनों की परम्परा में किया गया चित्रण है। जिस ओर बरात बढ़ रही है, उस ओर के दृश्य कवि के लिये कल्याण का समाचार लिये हुए हैं।
सबसे पहले बायीं ओर चारा लेता नीलकंठ है। वह मानो सारे मंगलों का संदेश कह देता है। फिर दाहिनी ओर सुन्दर खेत में कौआ शोभित होता है। दोनों पक्षियों के साथ दिशा अलग-अलग रखी गयी है, नीलकंठ बायें और कौआ दायें। नेवले का दर्शन भी सबको मिलता है। उसके लिये कोई दिशा नहीं कही गयी। आँखों के सामने आये इन जीवों के बाद हवा का स्पर्श आता है, और उसके भी तीन सुहावने गुण बताए जाते हैं।
दाहिन काग सुखेत सुहावा । नकुल दरसु सब काहूँ पावा॥
चौपाई ७
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । सघट सबाल आव बर नारी॥
अनुकूल दिशा में बहती हवा शीतल, मन्द और सुगन्धित है। इससे यात्रा के आसपास का वातावरण भी मंगल में सम्मिलित हो जाता है। सामने श्रेष्ठ स्त्रियाँ आती हैं, भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिये हुए। पोद्दारजी इन स्त्रियों को सुहागिनी बताते हैं। घड़े भरे हैं और बालक साथ हैं, इस तरह शकुन का दृश्य अपने पूरे रूप में सामने आता है। स्त्रियों के केवल आगमन का उल्लेख करके बात छोड़ नहीं दी गयी; उनके हाथ और गोद में क्या है, वह भी सुरक्षित रहता है।
आगे लोमड़ी बार-बार दिखाई देती है। सामने खड़ी गायें अपने बछड़ों को दूध पिला रही हैं। फिर हरिनों की टोली घूमकर दाहिनी ओर आती है। पोद्दारजी की टीका स्पष्ट करती है कि वह बायीं ओर से घूमकर आयी है। तुलसी इस हरिन समुदाय को देखते हुए मानो समस्त मंगलों के समूह का दर्शन पाते हैं। लोमड़ी का बार-बार दिखना, गायों का दूध पिलाना और हरिनों का दिशा बदलकर आना, हर दृश्य की अपनी क्रिया है। इन्हीं क्रियाओं से यह शकुन वर्णन जीवित और चलता हुआ बना रहता है।
छेमकरी कह छेम बिसेषी । स्यामा बाम सुतरु पर देखी॥
चौपाई ८
सनमुख आयउ दधि अरु मीना । कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना॥
क्षेमकरी विशेष रूप से कल्याण कह रही है। टीका उसे सफेद सिरवाली चील बताती है और उसके नाम में आए क्षेम का अर्थ कल्याण खोलती है। बायीं ओर सुन्दर वृक्ष पर श्यामा दिखाई देती है। फिर सामने दही और मछली आते हैं, और हाथ में पुस्तक लिये दो विद्वान् ब्राह्मण आते हैं। यहाँ ब्राह्मणों की संख्या दो है, उनके हाथ में पुस्तक है और उनकी विद्वत्ता कही गयी है। दही तथा मछली भी इसी शुभ शकुनों की शृंखला के अंग हैं।
इस पूरे क्रम में बायें और दायें की पहचान बार-बार बदलती है। नीलकंठ तथा श्यामा बायीं ओर हैं, कौआ दाहिनी ओर है और हरिन घूमकर दाहिने आते हैं। कुछ दृश्य सामने उपस्थित होते हैं और कुछ के लिये केवल दर्शन बताया गया है। कवि की मंगल दृष्टि इन सबकी अलग पहचान बनाए रखती है। बरात के अपने संगीत और सजावट के बाहर भी इतना जीवन है, और तुलसी उस जीवन के बीच इस विवाह की अनुकूलता अनुभव करते हैं।
नीलकंठ बायें चारा लेता है, कौआ दायें अच्छे खेत में है, नेवला दिखता है और शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा बहती है। भरे घड़े तथा बालक लिये स्त्रियाँ, बार-बार दिखती लोमड़ी, बछड़ों को दूध पिलाती गायें, दाहिने आती हरिनों की टोली, कल्याण कहती सफेद सिरवाली चील, बायें वृक्ष पर श्यामा, सामने दही, मछली और पुस्तक लिये दो विद्वान् ब्राह्मण, सब इस बरात के मंगल शकुन हैं।
जिस विवाह से शकुन स्वयं सच्चे होते हैं
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
दोहा ३०३
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार॥ ३०३॥
सभी शकुन मंगलमय हैं, कल्याणमय हैं और मन का चाहा फल देनेवाले हैं। इतने शकुन एक साथ क्यों हो रहे हैं, दोहा उसका बहुत मधुर भाव रखता है। मानो वे स्वयं सच्चे होने के लिये एक ही बार में उपस्थित हो गये हों। उनके इस एकत्र होने में विवाह की महिमा प्रकट होती है। अभी तक हम उन्हें बरात का शुभ बतानेवाले संकेतों के रूप में देख रहे थे। अब कवि उनके अपने सत्य होने की बात कहते हैं।
मंगल सगुन सुगम सब ताकें । सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥
चौपाई ९
राम सरिस बरु दुलहिनि सीता । समधी दसरथु जनकु पुनीता॥
जिसके सुन्दर पुत्र स्वयं सगुण ब्रह्म हैं, उसके लिये सभी मंगल शकुन सुलभ हैं। तुलसी यह बात सीधे दशरथ के सम्बन्ध में रखते हैं। पुत्र राम हैं, और वही सगुण ब्रह्म हैं। इसीलिये उनके पिता की यात्रा में शुभ की इतनी सहज उपलब्धता है। विवाह की मंगलता का कारण यहाँ स्पष्ट है। समूची शकुन शृंखला इस पहचान पर आकर ठहरती है, और नीलकंठ से लेकर पुस्तक लिये ब्राह्मणों तक का वर्णन इसी व्यापक भाव में अपना स्थान पाता है।
वर राम जैसे हैं, वधू सीता जैसी हैं, और समधी दशरथ तथा जनक जैसे पवित्र हैं। चौपाई इन चारों को एक साथ रखती है। दूल्हा, दुलहिन और दोनों पिता, विवाह का पूरा सम्बन्ध इस मंगल में उपस्थित है। इसलिए शकुनों की प्रसन्नता भी उस पूरे सम्बन्ध को सुनकर उमड़ती है। जनक का नाम यहाँ पहले पवित्र समधी के रूप में आता है; कुछ ही पंक्तियों बाद मार्ग की व्यवस्था में उनका किया हुआ काम दिखाई देगा।
कवि कल्पना करते हैं कि ऐसा विवाह सुनकर सभी शकुन नाच उठे। पोद्दारजी उनके भाव को वाणी देते हैं, मानो वे कह रहे हों कि अब ब्रह्माजी ने उन्हें सच्चा सिद्ध कर दिया। इस कल्पना में शकुनों का भी अपना उल्लास है। बरात में राजकुमार घोड़ों को नचा रहे थे, और यहाँ विवाह की बात सुनकर शकुन ही नाच उठते हैं। एक ही उत्सव में देखा हुआ नृत्य और कवि की यह मंगल कल्पना पास-पास रखे गये हैं।
फिर कथा की ध्वनि लौटती है। इसी प्रकार बरात ने प्रयाण किया, घोड़े तथा हाथी गरजते हैं और नगाड़ों पर चोट पड़ रही है। शकुनों की महिमा कहकर तुलसी यात्रा की गति पकड़ लेते हैं। विवाह की पवित्रता और उसके वर-वधू का स्मरण हमारे साथ रहता है, जबकि बरात आगे बढ़ती है। अब उसी यात्रा के लिये जनक ने जो मार्ग और निवास तैयार किये हैं, उनका वर्णन आने लगता है।
तुलसी के यहाँ शकुन इस विवाह से अपना सत्य पाते हैं। दशरथ के पुत्र स्वयं सगुण ब्रह्म हैं, वर राम हैं, वधू सीता हैं और दोनों समधी पवित्र हैं। ऐसा ब्याह सुनकर मानो शकुन भी नाच उठते हैं।
नदियों पर पुल, रास्ते में मनभावने पड़ाव
सूर्यवंश की पताका के समान दशरथ आ रहे हैं, यह जानकर जनक नदियों पर पुल बँधवा देते हैं। बरात की यात्रा का स्वागत नगर से पहले ही आरम्भ हो गया है। सामने आनेवाली नदियों को पार करने के लिये सेतु तैयार हैं। मार्ग के बीच-बीच में ठहरने के सुन्दर स्थान बनवाए गये हैं। उनमें देवलोक जैसी सम्पदा छायी हुई है। प्रस्थान की उमंग के बाद अब यात्रा में मिलनेवाली सुविधा और आदर का रूप सामने आता है।
आवत जानि भानुकुल केतू । सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥
चौपाई १०
बीच बीच बर बास बनाए । सुरपुर सरिस संपदा छाए॥
पुल और निवास, दोनों की तैयारी एक ही चौपाई में है। चलते समय नदी पार करनी है और ठहरते समय सुन्दर स्थान चाहिये। जनक का प्रबन्ध यात्रा की इन दोनों आवश्यकताओं तक पहुँचता है। जिनके आने का समाचार मिला है, उनके लिये रास्ते में भी आतिथ्य तैयार है। बीच-बीच में बने इन पड़ावों की शोभा देवपुर के समान कही गयी है। अयोध्या से चली सम्पन्न बरात को मार्ग में भी वैसी ही भरी-पूरी सुख सामग्री मिलती है।
उन स्थानों पर बरात के सभी लोग सुहावना उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं। सबसे स्नेहमयी बात यह है कि जो कुछ मिलता है वह हर व्यक्ति के अपने मन को भाता है। सबके लिये सुविधा होने के साथ उसमें निजी पसन्द का सुख भी है। तुलसी भोजन, सोने की व्यवस्था और पहनने के वस्त्र, तीनों को नाम लेकर रखते हैं। इसलिए पड़ाव की सम्पदा केवल दूर से दिखाई देनेवाली शोभा होकर नहीं रह जाती, वह ठहरे हुए लोगों के भोग और विश्राम तक पहुँचती है।
मन के अनुकूल नित्य नये सुख देखकर सभी बराती अपना घर भूल जाते हैं। यह उनके सुख का सीधा परिचय है। यात्रा में ठहरने का स्थान इतना अनुकूल मिल रहा है कि घर की याद भी पीछे रह गयी है। पहले अयोध्या के अपने-अपने घर सजते देखे थे, अब रास्ते के बने हुए घर बरातियों को ऐसा सुख देते हैं। जनक के प्रबन्ध का फल इन लोगों की प्रसन्नता में दिखाई देता है। कविता उस फल को किसी वस्तु की कीमत से नहीं, घर भूल जाने के सहज भाव से बताती है।
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान।
दोहा ३०४
सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥ ३०४॥
उधर बहुत जोर से बजते नगाड़े सुनाई देते हैं। अगवानी करनेवाले जान लेते हैं कि श्रेष्ठ बरात आ रही है। वे हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर उसे लेने चल पड़ते हैं। अयोध्या की तैयारी में भी सवारियाँ एक-एक करके तैयार हुई थीं; अब स्वागत की ओर से भी सज्जित दल निकलता है। बरात आने की पहचान उसके नगाड़ों की ध्वनि से होती है और उसका उत्तर अगवानी के प्रस्थान से मिलता है। इस घड़ी तक स्वागत करनेवाले रास्ते पर निकल चुके हैं।
जनक नदियों पर पुल और मार्ग में सुन्दर पड़ाव बनवाते हैं। सब बरातियों को मनपसन्द भोजन, बिस्तर और वस्त्र मिलते हैं, जिससे वे घर भूल जाते हैं। बरात के नगाड़े सुनकर अगवानी करनेवाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर लेने निकलते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस यात्रा में प्रेम कई तरह के काम करता दिखाई देता है। अयोध्या के लोग घर सजाते हैं, भरत घोड़ों की तैयारी करवाते हैं, सारथी रथियों को बुलाते हैं और सेवक अपना साज सँभालते हैं। फिर जनक नदियों पर पुल बनवाते हैं और ठहरने के स्थान तैयार करते हैं। इन सब कामों के भीतर एक ही विवाह की प्रसन्नता है। उत्सव की शोभा उसकी व्यवस्था में भी उतनी ही स्पष्ट है जितनी पताकाओं, आभूषणों और गाते हुए समूहों में।
हमें इस प्रसंग में बार-बार किसी दूसरे के लिये जगह बनती दिखाई देती है। दशरथ पहले गुरु को रथ पर चढ़ाते हैं। सवार के साथ दो पैदल सैनिक हैं। गायकों को उनके योग्य सवारियाँ मिलती हैं। पड़ावों में प्रत्येक बराती अपनी रुचि का भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाता है। इन अलग-अलग विवरणों से बरात का आकार समझ में आता है। बड़ा समाज एक साथ चल रहा है, और कथा उसकी छोटी संगतियों तथा सुविधाओं को भी देखती चलती है।
फिर उन सबके हृदय की बात याद आती है। इतनी तैयारी और इतना आनन्द लिये लोग राम और लक्ष्मण को नेत्र भरकर देखना चाहते हैं। उस अभिलाषा से यात्रा का मानवीय सुख बना रहता है। शकुनों के वर्णन में कवि राम को सगुण ब्रह्म कहते हैं, और बरातियों की लालसा में वही राम अपने भाई सहित प्रिय दर्शन हैं। तुलसी दोनों भावों को इसी यात्रा में साथ रखते हैं।
अयोध्या के महल में राम और सीता के नाम लेकर गाये गीत थे; मार्ग में उन्हीं के विवाह को सुनकर शकुनों के नाच उठने की कल्पना है। उस आनन्द के साथ बरात पुलों और मनभावने पड़ावों से होकर आगे बढ़ रही है। नगाड़ों की प्रबल ध्वनि अब अगवानी करनेवालों तक पहुँच गयी है। उनका सज्जित दल बरात लेने निकल चुका है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २९६ से ३०४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।