· संपादकीय चिंतन
सुनने से पहले बना हुआ उत्तर
दूसरे की बात चल रही हो और अपना उत्तर तैयार हो चुका हो, तो सुनना कहाँ होता है? गीता 18.63 के पास बैठकर विचार और सहमति के बीच की जगह देखिए।
चिंतन पढ़िए →· संपादकीय चिंतन
प्रश्न को जगह दीजिए
नचिकेता कठिन प्रश्न के बदले दूसरा वर नहीं चुनते। उनके ठहरने में अपने अनुत्तरित प्रश्नों के लिए थोड़ी जगह खोजिए।
चिंतन पढ़िए →· संपादकीय चिंतन
वह प्रश्न जिससे सभा बचती है
द्रौपदी पूछती हैं कि स्वयं को हार चुकने के बाद युधिष्ठिर के पास कौन-सा अधिकार बचा था। सभा का उत्तर न दे पाना उस सभा में बैठे हर व्यक्ति की ज़िम्मेदारी को ध्यान से देखने का न्योता है।
चिंतन पढ़िए →· संपादकीय चिंतन
अनपेक्षित शिक्षक से सीखना
हेमचूड़ को अपनी धारणाएँ भी फिर से देखनी पड़ती हैं, और उस व्यक्ति को भी जो उन्हें दिखा रहा है। हेमलेखा की सीख उस समझ की ओर ध्यान दिलाती है जिसे हम जान-पहचान के कारण अनदेखा कर देते हैं।
चिंतन पढ़िए →· संपादकीय चिंतन
काम और उसका फल
काम पूरा हो जाता है, पर मन परिणाम के दरवाज़े पर बैठा रहता है। गीता के दो श्लोकों के पास बैठिए; शायद वे काम छोड़ने के बजाय उसे अधिक ध्यान से देखने की जगह दें।
गीता 2.47 से 48 से जुड़ा एक चिंतन। अपने दिन के किसी छोटे काम के साथ पढ़िए।
चिंतन पढ़िए →· संपादकीय चिंतन
कृतज्ञता जब बहुत माँगने लगे
ज़रूरत के समय किसी ने आपका साथ दिया था। वह भलाई आज आपसे क्या माँगती है?
कर्ण की कथा के साथ पढ़िए।
चिंतन पढ़िए →जीवन का अर्थ, और चार राही
“ज़रा बैठिए, साहब। एक सवाल है जो देर-सबेर हर दरवाज़े पर दस्तक देता है, इस सब का अर्थ क्या है।”
निबंध पढ़िए →राम कितने वर्ष जिए
“यह उलझन झुँझलाने की जगह नहीं, एक दरवाज़ा है, जो समय के चार अलग मतलबों में खुलता है।”
निबंध पढ़िए →