रामचरितमानस · बालकाण्ड · जयमाला और परशुराम का आगमन
जयमाला और परशुराम का आगमन
सीता के हाथों की जयमाला राम के हृदय पर आ गयी है। नगर की बधाई के बीच कुछ राजाओं का रोष उठता है, और उसी सभा में परशुराम पहुँचते हैं।
धनुष के दोनों टुकड़े राम के हाथ में हैं। वे उन्हें धरती पर रख देते हैं, और देखते ही देखते सभा का सुख आकाश की जयध्वनि से जुड़ जाता है। विश्वामित्र को देखकर उस आनन्द की पहली झलक मिलती है। गुरु का हृदय प्रेम से भरे समुद्र जैसा है और सामने राम पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह हैं। चन्द्रमा को देखकर समुद्र में उठती लहरों के समान मुनि के शरीर में रोमांच की पंक्तियाँ उठ रही हैं। उसी उल्लास के बीच सीता को आगे बढ़ना है। हाथ में जयमाला है, साथ में सखियाँ हैं, और मन का प्रेम इतना गहरा है कि बाहर उसकी थाह किसी को नहीं मिलती।
तुलसीदास के इस प्रसंग में हर्ष के भीतर संकोच भी रहता है। सीता की आँखें राम पर ठहर जाती हैं और दोनों हाथों में उठी माला कुछ देर उठी ही रह जाती है। वह माला पहनाये जाने पर नगर फिर उमड़ पड़ता है। किन्तु सभा में ऐसे राजा भी बैठे हैं जिनकी लालसा धनुष के साथ समाप्त नहीं हुई। उनके कटु वचन सुनकर अच्छे राजा उन्हें रोकते हैं। बधाई, फटकार और चिन्ता से भरी इसी सभा में भृगुकुल के परशुराम का प्रवेश होता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम जयमाला धारण करनेवाले रघुवीर, जो सीता के प्रेम को मन में सराहते हुए गुरु के पास लौटते हैं।
- सीता जनक की पुत्री, जिनके उत्साह, संकोच और फिर भय से इस सभा के बदलते स्वरूप का पता चलता है।
- लक्ष्मण राम को प्रेम से निहारनेवाले छोटे भाई, जिनकी दृष्टि उद्दण्ड राजाओं के वचन सुनकर क्रोध से भर जाती है।
- जनक और रानी सीता के माता और पिता, जिन्हें मिला सुख सभा के नये उपद्रव से चिन्ता में बदलता है।
- विश्वामित्र और शतानन्द मुनि विश्वामित्र दोनों भाइयों को परशुराम से मिलवाते हैं। शतानन्द सीता को राम के पास जाने की आज्ञा देते हैं।
- परशुराम शिवधनुष टूटने का समाचार सुनकर आनेवाले भृगुवंशी मुनि, जिनके सामने राजा भय से प्रणाम करते हैं।
- सीता की सखियाँ और सभासद राजा सखियाँ जयमाला पहनाने में साथ देती हैं। राजाओं में कुछ धमकियाँ देते हैं और सज्जन राजा उन्हें फटकारते हैं।
धरती पर धनुष, आकाश में जयध्वनि
राम ने धनुष के दोनों खण्ड धरती पर डाल दिये। उन्हें देखकर लोग सुखी हुए। इस सुख का विस्तार बताने से पहले तुलसी विश्वामित्र के पास ठहरते हैं। मुनि के लिये पवित्र समुद्र की उपमा आती है, और उस समुद्र का जल प्रेम है। गहराई ऐसी है जिसकी थाह सहज नहीं मिलती। अभी धनुष के टुकड़े सामने रखे हैं, फिर भी गुरु की ओर देखते हुए कठोरता का कोई चित्र नहीं बनता। वहाँ जल है, प्रेम है, और उस जल को उठानेवाला सामने खड़ा राम का रूप है।
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे॥
चौपाई १
कौसिकरूप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन॥
अगली चौपाई में यह समुद्र पूरा दिखता है। राम पूर्णचन्द्र हैं और विश्वामित्र के रोमांच उसकी ओर उठती हुई भारी लहरें हैं। गुरु के आनन्द को उनका रोमांच व्यक्त कर रहा है। उसी समय आकाश में जोर से नगाड़े बजते हैं। देवाङ्गनाएँ गाते हुए नृत्य करने लगती हैं। ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर राम की प्रशंसा करते हैं और आशीर्वाद देते हैं। ऊपर से रंगबिरंगे फूल तथा मालाएँ बरसती हैं, और किन्नर रसीले गीत गाते हैं। इस बधाई में देखनेवाले, गानेवाले और आशीष देनेवाले सभी सम्मिलित हैं।
जयकार इतनी फैल गयी है कि धनुष टूटने की ध्वनि उसके बीच अलग जान ही नहीं पड़ती। स्त्री और पुरुष जहाँ हैं, वहीं प्रसन्न होकर कह रहे हैं कि राम ने शिव का भारी धनुष तोड़ दिया। एक ही समाचार अनेक कण्ठों में पहुँच रहा है। आकाश के वाद्यों के साथ धरती की वाणी भी जुड़ गयी है। धीर बुद्धिवाले भाट, मागध और सूत विरुदावली कह रहे हैं। उनके पास कीर्ति का बखान है और दूसरे लोगों के हाथों में निछावर करने की वस्तुएँ हैं।
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं
दोहा २६२
मतिधीर।
करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर॥ २६२॥
घोड़े, हाथी, धन, मणियाँ और वस्त्र निछावर होते हैं। दोहे में इनका एक एक करके आना बताता है कि आनन्द केवल मुख की बधाई तक नहीं ठहरा। लोग अपने पास की वस्तुएँ भी अर्पित कर रहे हैं। फिर बाजों की अलग अलग ध्वनियाँ सुनायी देती हैं। झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई, भेरी, ढोल और दुन्दुभी, सब बज रहे हैं। युवतियाँ जहाँ तहाँ मंगलगीत गाती हैं। जो जयध्वनि अभी सारे भुवन में भरी थी, अब उसी के भीतर नगर का गान और वाद्यों की पहचान खुल रही है।
राम धनुष के दोनों टुकड़े धरती पर रखते हैं। गुरु का रोमांच, देवताओं के गीत और पुष्पवर्षा, लोगों की जयकार, विरुदावली, निछावर और नगर के मंगलवाद्य मिलकर इस सुख को फैलाते हैं।
रानी, जनक और सीता का सुख
इतने व्यापक उत्सव के बीच तुलसी अब अलग अलग मनों का हाल देखते हैं। सखियों सहित रानी अत्यन्त हर्षित हैं। उनके सुख को समझाने के लिये सूखते धान पर पानी पड़ने का चित्र आता है। पानी वही पाता है जो सूख रहा था, इसलिये इस उपमा में पिछले सोच से मिली मुक्ति भी अनुभव होती है। राजा जनक सोच छोड़कर सुख पाते हैं। उनके लिये दूसरी उपमा है, तैरते तैरते थक चुके मनुष्य को थाह मिल जाना। थकान और आधार पा लेने का सुख साथ पढ़िये, तब राजा की राहत अपनी पूरी गहराई में दिखती है।
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी । सूखत धान परा जनु पानी॥
चौपाई २
जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई । पैरत थकें थाह जनु पाई॥
इसी धनुषभंग का प्रभाव दूसरे राजाओं पर उलटा पड़ा है। उनकी शोभा चली गयी है, जैसे दिन निकल आने पर दीपकों की छवि चली जाती है। दीपक अपनी जगह हैं, किन्तु दिन के प्रकाश में उनकी चमक का वह मान नहीं रहा। सीता के आनन्द पर आते ही कवि पूछते हैं कि उसका वर्णन किस प्रकार किया जाय। फिर चातकी को स्वाती का जल मिलने की उपमा देते हैं। रानी के लिये सूखते धान का पानी था, जनक के लिये थाह थी, और सीता के लिये वही जल है जिसकी चातकी बाट देखती है। सबको एक ही घटना से सुख मिला है, फिर भी प्रत्येक का सुख अलग रूप लेता है।
लक्ष्मण अपने बड़े भाई को देख रहे हैं। उनकी दृष्टि में राम वैसे बसे हैं जैसे चन्द्रमा को देखता हुआ चकोर का बच्चा। यहाँ छोटे भाई के प्रेम के साथ उनकी तरुणता भी उस बाल चकोर में झलकती है। अभी वे इसी निहारने में लगे हैं। इसी समय शतानन्द आज्ञा देते हैं और सीता राम के पास चलती हैं। सभा का आनन्द अब उस गमन को देखता है जिसमें सखियों का साथ है, मंगलाचार का गान है और राजकुमारी के अंगों की अपार शोभा है।
संग सखीं सुंदर चतुर गावहिं मंगलचार।
दोहा २६३
गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार॥ २६३॥
सीता की चाल बालहंसिनी की चाल जैसी है। सुन्दर और चतुर सखियाँ साथ गा रही हैं, इसलिये उनके बढ़ने में एकान्त नहीं है, प्रिय संग भी है। अभी तक हम रानी के हर्ष, जनक की राहत और लक्ष्मण की दृष्टि में राम को देख रहे थे। अब कथा की दृष्टि सीता के साथ चलती है। हाथ में आयी माला को अपने स्थान तक पहुँचना है, और उस छोटे से अन्तराल को तुलसी संकोच तथा प्रेम से भर देते हैं।
रानी को सूखते धान पर जल पड़ने जैसा सुख है, जनक को थाह मिल गयी है और सीता चातकी की तरह तृप्त हैं। लक्ष्मण राम को निहारते हैं। शतानन्द की आज्ञा पाकर सीता गाती हुई सखियों के साथ आगे बढ़ती हैं।
दोनों हाथों में उठी जयमाला
सखियों के बीच सीता ऐसी शोभित हैं जैसे बहुत सी छवियों के बीच महाछवि हो। उनके करकमल में सुन्दर जयमाला है, जिसके ऊपर विश्व को जीत लेनेवाली शोभा छायी है। सभा की सारी दृष्टि इस सौन्दर्य पर जा सकती है, किन्तु उनके भीतर के प्रेम तक किसी की दृष्टि नहीं पहुँचती। शरीर में संकोच है और मन में परम उत्साह। दोनों भाव साथ हैं। संकोच उनके गमन में दिखाई देता है, उत्साह भीतर भरा हुआ है और प्रेम गूढ़ बना रहता है।
तन सकोचु मन परम उछाहू । गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू॥
चौपाई ३
जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुअँरि चित्र अवरेखी॥
राम के समीप जाकर उनकी छवि देखी तो राजकुमारी चित्र में अंकित सी रह गयीं। अभी बालहंसिनी की चाल थी, अब चित्र का ठहराव है। निकट पहुँचकर जिस काम को करना था, उसी की घड़ी में देह स्थिर हो गयी। तुलसी इस स्थिरता को मन के परम उत्साह के ठीक बाद रखते हैं। इसलिये यहाँ शिथिलता पढ़ने की जगह नहीं बचती। मन का भाव इतना सघन है कि सामने का रूप देखते हुए सीता चित्र जैसी जान पड़ती हैं। सखियाँ पास हैं और उनमें एक चतुर सखी इस दशा को समझती है।
वह समझाकर सुन्दर जयमाला पहनाने को कहती है। सखी के वचन सुनते ही सीता दोनों हाथों से माला उठा लेती हैं। अब हाथ उठ चुके हैं, फिर भी पहनायी नहीं जाती। प्रेम के वश में होना यहाँ एक पूरी क्रिया के बीच दिखाई देता है। माला हाथ में लेने और राम के गले तक पहुँचाने के बीच इतना सा काम शेष है, किन्तु प्रेम उस क्षण को ठहरा देता है। किसी आग्रह का उत्तर वचन में नहीं आता। सखी कहती है, सीता सुनती हैं, दोनों हाथ उठते हैं, और सभा के बीच वह छवि बनी रहती है।
सोहत जनु जुग जलज सनाला । ससिहि सभीत देत जयमाला॥
चौपाई ४
गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली॥
पोद्दार जी की टीका इस उपमा में सीता के हाथों को सामने रखती है। वे डंडियों सहित दो कमलों के समान हैं जो चन्द्रमा को डरते हुए जयमाला दे रहे हों। हाथ, माला और राम का रूप, तीनों एक ही चित्र में आ जाते हैं। कमलों का वह संकोच पहले कही गयी देह की लज्जा से जुड़ा है। सखियाँ इस छवि को देखकर गाने लगती हैं। उनके गान के बीच सीता जयमाला राम के हृदय पर रख देती हैं। उठा हुआ प्रेम अपना अर्पण पूरा कर देता है।
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन।
सोरठा २६४
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन॥ २६४॥
रघुनाथ के हृदय पर माला देखकर देवता फूल बरसाने लगते हैं। सभा के राजा सकुचा जाते हैं, जैसे सूर्य को देखकर कुमुदों का समूह सिकुड़ जाये। कुछ ही पहले दिन में दीपकों की छवि खोने का चित्र आया था। अब सूर्य के सामने कुमुद हैं। दोनों चित्रों में राजाओं की घटती हुई प्रभा दिखाई देती है। उसी समय राम के हृदय पर पड़ी जयमाला सबको स्पष्ट दिखाई दे रही है। सीता की सखियों का गान और देवताओं की फूलवर्षा उस पूरे हुए अर्पण के आसपास फैल जाते हैं।
सीता राम के समीप चित्र जैसी स्थिर हो जाती हैं। सखी के कहने पर दोनों हाथों से माला उठाती हैं, प्रेम कुछ देर हाथों को रोकता है, फिर सखियों के गान के बीच राम के हृदय पर जयमाला आ जाती है।
जयकार के बीच सीता का संकोच
जयमाला पड़ते ही नगर और आकाश में फिर बाजे बज उठते हैं। सज्जनों का मुख प्रसन्न है, दुष्टों का मलिन। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर जयकार करते हुए आशीष देते हैं। देवाङ्गनाएँ नाच रही हैं, गा रही हैं और उनके हाथों से बार बार फूलों की अञ्जलियाँ छूट रही हैं। जहाँ तहाँ ब्राह्मण वेदध्वनि करते हैं। भाट कुलकीर्ति का बखान कर रहे हैं। धनुष के खण्ड धरती पर रखे जाने से जो बधाई उठी थी, जयमाला ने उसे फिर भर दिया है।
पृथ्वी, पाताल और स्वर्ग तक यह यश व्याप्त होता है कि राम ने धनुष तोड़ दिया और सीता को वरण किया। नगर के स्त्री पुरुष आरती करते हैं। निछावर करते समय अपनी पूँजी का ध्यान भी भुला देते हैं। पोद्दार जी इसकी मात्रा खोलकर बताते हैं कि देनेवाले अपनी सामर्थ्य से बहुत अधिक दे रहे हैं। पहले घोड़े, हाथी, मणि, वस्त्र और धन की सूची थी। अब देनेवाले के मन की दशा सामने है। सुख इतना है कि अपनी हैसियत का हिसाब उस अर्पण को बाँध नहीं पा रहा।
सीता और राम की जोड़ी ऐसी लगती है मानो सुन्दरता और शृंगार एक ही स्थान पर मिल गये हों। इसी शोभा के बीच सखियाँ सीता से प्रभु के चरण छूने को कहती हैं। अभी वही सखियाँ माला पहनाने में उनका साथ दे रही थीं। जयमाला का काम पूरा हो चुका है, अब चरणस्पर्श की बात उठती है। किन्तु सीता बहुत भयभीत हैं और हाथ बढ़ाकर चरणों का स्पर्श नहीं करतीं। सभा का उत्सव चलता हुआ भी इस छोटे से संकोच के लिये ठहर जाता है।
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसति पग पानि।
दोहा २६५
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि॥ २६५॥
सीता को गौतम की पत्नी की गति याद आ रही है। टीका उन्हें अहल्या कहकर पहचानती है। उसी स्मरण के कारण सीता अपने हाथों से राम के चरण नहीं छू रही हैं। इतना कहकर दोहा राम के मन की ओर जाता है। वे सीता की अलौकिक प्रीति को जानते हैं और भीतर ही भीतर हँसते हैं। यहाँ उस हँसी को बाहर के ठहाके का रूप नहीं दिया गया। प्रेम को पहचाननेवाला मन प्रसन्न हुआ है। सीता के हाथों का ठहरना और राम का मन में मुसकराना, दोनों उसी दोहे में पास पास रखे हैं।
जयमाला के बाद तीनों लोकों में यश फैलता है और नगर अपनी सामर्थ्य भूलकर निछावर करता है। सखियों के आग्रह पर भी सीता अहल्या की गति याद करके चरण नहीं छूतीं। उनकी अलौकिक प्रीति जानकर राम मन में मुसकराते हैं।
कवच पहने हुए राजाओं की धमकियाँ
उधर कुछ राजाओं की दृष्टि सीता पर पड़ती है और उनके भीतर लालसा उठती है। तुलसी उन्हें दुष्ट, कुपूत और मूढ़ कहते हैं। वे मन में तमतमा रहे हैं। उठ उठकर कवच पहनते हैं और जहाँ तहाँ डींगें मारने लगते हैं। अभी तक उनकी मलीनता तथा संकोच देखा गया था, अब वह द्वेष वचन बनकर बाहर आ रहा है। इस उपद्रव में सबसे पहले सीता को छीन लेने की बात कही जाती है। साथ ही दोनों राजकुमारों को पकड़कर बाँधने का प्रस्ताव है।
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ । धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ॥
चौपाई ५
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई । जीवत हमहि कुअँरि को बरई॥
उन राजाओं का कहना है कि धनुष टूट जाने भर से चाह पूरी नहीं हो जायगी। वे अपने जीते जी किसी को राजकुमारी से विवाह करने देने को तैयार नहीं हैं। इस घोषणा में अपने बल का दावा बना हुआ है, यद्यपि धनुष के सामने उसका परिणाम वे देख चुके हैं। जनक का भी विचार किया जाता है। यदि वे दोनों भाइयों की सहायता करें, तो उन्हें भी भाइयों सहित युद्ध में जीत लेने की बात उठती है। धमकी केवल राजकुमारों तक सीमित नहीं रही, मेजबान राजा भी उसी में घेर लिये गये हैं।
राजसमाज में सज्जन राजा भी हैं। वे इन वचनों को सुनते हैं और फटकारते हैं कि इस सभा को देखकर तो लज्जा भी लजा गयी। उनके उत्तर में पहले उस हठ का हिसाब है जो अभी बोला जा रहा है। बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और प्रतिष्ठा, सब धनुष के साथ चले गये। वे पूछते हैं कि यही वीरता पहले थी, या अब कहीं से नयी मिल गयी है। टूटे हुए धनुष के बाद कवच पहनकर धमकानेवालों के सामने वही धनुष प्रमाण बनकर रख दिया जाता है।
अच्छे राजा आगे कहते हैं कि ऐसी दूषित बुद्धि होने से ही विधाता ने मुख पर कालिख लगायी है। फटकार के बाद वे दृष्टि बदलने को कहते हैं। ईर्ष्या, घमण्ड और क्रोध छोड़कर राम को आँख भरकर देखिये। जिस रूप के सामने सखियाँ गा रही थीं और सीता प्रेम में ठहरी थीं, उसी को देखने की सीख इन राजाओं को मिल रही है। लालसा और द्वेष में लगे हुए लोग सामने के राम को देख ही किस भाव से रहे हैं, इस प्रश्न को उनकी सीख बिना फैलाये सामने रख देती है।
देखहु रामहि नयन भरि तजि इरिषा मदु कोहु।
दोहा २६६
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु॥ २६६॥
साथ ही लक्ष्मण के क्रोध का स्मरण कराया जाता है। अच्छे राजा उसे प्रबल अग्नि कहते हैं और उद्दण्ड राजाओं को उसके पतंगे बनने से रोकते हैं। उनकी बात में राम के रूप की ओर देखने का निमन्त्रण भी है और आसन्न विपत्ति की चेतावनी भी। अब तक केवल वचन उठे हैं। वे इन्हीं वचनों को रोककर सबको उस सीमा का बोध कराना चाहते हैं जिसके आगे अपने ही विनाश की ओर बढ़ना होगा।
कुछ दुष्ट राजा सीता को छीनने, दोनों भाइयों को बाँधने और सहायता करने पर जनक को भी जीतने की धमकी देते हैं। सज्जन राजा उनकी खोयी प्रतिष्ठा याद दिलाते हैं और राम को देखकर ईर्ष्या छोड़ने तथा लक्ष्मण की क्रोधाग्नि से बचने को कहते हैं।
लालसा के सामने रखे गये सात चित्र
सज्जन राजाओं की सीख दोहे पर समाप्त नहीं होती। वे अब उस लालसा के सामने कई चित्र रखते हैं जिसके वश ये लोग उपद्रव कर रहे हैं। पहली उपमा गरुड़ का भाग चाहनेवाले कौए की है। दूसरी सिंह का भाग चाहनेवाले खरगोश की। दोनों में इच्छा रखनेवाला अपने लिये उस हिस्से की माँग कर रहा है जो उसके बल की पहुँच से बाहर है। सभा में धनुष का परिणाम सामने है, इसलिये ये पशु पक्षी दूर की बात नहीं रह जाते। इनसे राजाओं के दावे का आकार दिखाई देने लगता है।
बैनतेय बलि जिमि चह कागू । जिमि ससु चहै नाग अरि भागू॥
चौपाई ६
जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही॥
फिर उदाहरण आचरण और उसके चाहे हुए फल पर आते हैं। बिना किसी कारण क्रोध करनेवाला अपनी कुशल चाहे, तो कैसी आशा कर रहा है। इसी सभा में क्रोध से भरे राजा अपनी कुशल का विचार किये बिना धमकियाँ दे रहे हैं। अच्छे राजाओं की उपमा उनकी वर्तमान दशा से जुड़ी हुई है। इसके बाद शिव से द्रोह करते हुए सब प्रकार की सम्पत्ति चाहने की बात आती है। चाह बड़ी है, किन्तु उसका आचरण उसी चाह के विरुद्ध खड़ा है। वक्ता इसे उसी निरर्थक लालसा की अगली छवि बनाकर रखते हैं।
अब लोभी और लालची मनुष्य का उदाहरण है जो सुन्दर कीर्ति चाहता है। उसके बाद कामी मनुष्य की निष्कलंक होने की इच्छा। यहाँ प्रतिष्ठा फिर लौटती है। कुछ पहले कहा गया था कि बल और वीरता के साथ इन राजाओं की नाक भी चली गयी। अब कीर्ति और निष्कलंकता के उदाहरण से वही बात दूसरी ओर से खुलती है। जो व्यवहार सामने दिखाई दे रहा है, उसके साथ किस तरह का यश प्राप्त होने की आशा की जा सकती है। सीता को छीन लेने की बात करनेवालों को सुनायी जा रही यह सीख उनके अपने वचन का फल सामने रखती है।
लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥
चौपाई ७
हरि पद बिमुख परम गति चाहा । तस तुम्हार लालचु नरनाहा ॥
अन्तिम उपमा श्रीहरि के चरणों से विमुख होकर परमगति चाहने की है। पोद्दार जी परमगति का अर्थ मोक्ष बताते हैं। फिर सज्जन राजा सीधे सभा के इन राजाओं से कहते हैं कि सीता के लिये उनकी लालसा भी ऐसी ही है। सातों चित्र इसी सम्बोधन में आकर मिलते हैं। कौआ और गरुड़, खरगोश और सिंह, अकारण क्रोध और कुशल, शिवद्रोह और सम्पत्ति, लोभ और कीर्ति, कामना और निष्कलंकता, हरि से विमुखता और मोक्ष, सभी उसी अविवेक को सामने लाते हैं जो अभी कवच पहनकर अपनी इच्छा पूरी करने का दावा कर रहा है।
यह पूरी वाणी अच्छे राजाओं की है। वे सभा के भीतर बैठे हुए उसी सभा के उपद्रवियों को समझा रहे हैं। उनके कथन में फटकार की तीक्ष्णता बनी रहती है, फिर भी आरम्भ में दिया गया उपाय साफ है, ईर्ष्या, मद और क्रोध छोड़कर राम को देखना। इस समय राजसमाज की ओर से ऐसी वाणी भी उठ रही है जो बल का झूठा दावा पहचानती है और दूसरे राजाओं को आगे बढ़ने से रोकती है।
सज्जन राजा सात उपमाओं से सीता को बलपूर्वक पाने की लालसा का व्यर्थ होना दिखाते हैं। गरुड़ का भाग चाहता कौआ और सिंह का भाग चाहता खरगोश, फिर कुशल, सम्पत्ति, कीर्ति, निष्कलंकता और मोक्ष की अनुचित आशाएँ, सब उन्हीं राजाओं की इच्छा पर लौटते हैं।
सीता माता के पास, राम गुरु के पास
राजाओं का कोलाहल सुनकर सीता शंकित हो जाती हैं। सखियाँ उन्हें वहाँ ले जाती हैं जहाँ रानी हैं। जो सखियाँ गाती हुई राम के समीप लायी थीं, वे ही अब माँ के पास लौटा रही हैं। सीता के मन में उठा संशय इस आवागमन को बदल देता है। राम भी गुरु के पास चलते हैं। उनकी चाल स्वाभाविक है और भीतर वे सीता के स्नेह का बखान कर रहे हैं। बाहर राजाओं की ऊँची वाणी है, भीतर उनके मन में उसी प्रेम की प्रशंसा है जिसे वे जयमाला और चरणस्पर्श के संकोच में देख चुके हैं।
रानियों के साथ सीता सोच में हैं कि अब विधाता क्या करनेवाले हैं। अभी उनके माता और पिता को जो राहत मिली थी, उसके बीच यह नयी चिन्ता आ गयी है। सीता का प्रश्न भविष्य के अनजानेपन से भरा है। जयमाला पड़ चुकी है, फिर भी सभा का उपद्रव थमा नहीं है। उनके आसपास रानियाँ हैं, साथ देनेवाली सखियाँ हैं, और सबके सामने राजाओं के वही कटु वचन हैं। उत्सव के बीच घरवालों के मन का सुख इस प्रकार फिर अस्थिर हो गया है।
लक्ष्मण राजाओं की बातें सुनकर इधर उधर देखते हैं। राम का डर उन्हें बोलने नहीं देता। उस मौन में क्रोध कम नहीं हुआ। आँखें लाल हैं, भौंहें टेढ़ी हो गयी हैं और वे रोष से राजाओं की ओर देखते हैं। तुलसी उनकी तुलना सिंह के बच्चे से करते हैं जिसे मतवाले हाथियों का झुण्ड देखकर जोश आ गया हो। राम को चकोर के बच्चे की तरह निहारनेवाले लक्ष्मण की दृष्टि अब सिंहशावक की दृष्टि है। देखनेवाला वही छोटा भाई है, सामने का विषय बदल गया है।
नगर की स्त्रियाँ भी यह खलबली देखती हैं। वे व्याकुल होकर सब मिलकर राजाओं को गालियाँ देने लगती हैं। इस समय सभा का भय और असन्तोष केवल राजपरिवार में सीमित नहीं है। नगर के लोग भी उसमें आ गये हैं। इसी अवसर पर शिवधनुष टूटने की बात सुनकर परशुराम पहुँचते हैं। तुलसी उन्हें भृगुकुल रूपी कमल के सूर्य के रूप में लाते हैं। उनका आना इसी उठे हुए कोलाहल के बीच होता है, और उनके दिखाई देते ही राजाओं की दशा फिर बदल जाती है।
सखियाँ शंकित सीता को माता के पास ले जाती हैं। राम सीता के प्रेम को मन में सराहते हुए गुरु के पास लौटते हैं। लक्ष्मण की दृष्टि क्रुद्ध है, किन्तु राम का डर उन्हें बोलने नहीं देता। नगर की स्त्रियों के आक्रोश के बीच परशुराम आते हैं।
मुनि का वेष, वीररस का रूप
परशुराम को देखते ही सब राजा सकुचा जाते हैं। जैसे बाज के झपटने पर बटेर छिप जाते हैं, वैसी उनकी दशा है। अभी कुछ राजा कवच पहनकर बड़ी बड़ी बातें कर रहे थे। अब उनके सामने ऐसा रूप उपस्थित है जिसे देखते ही राजसमाज सिमट गया है। उस भय के साथ तुलसी परशुराम का पूरा स्वरूप देखने देते हैं। गोरे शरीर पर विभूति सुशोभित है। विशाल ललाट पर त्रिपुण्ड्र है। सिर पर जटा और सुन्दर मुख चन्द्रमा जैसा है, किन्तु क्रोध के कारण उस मुख पर कुछ लालिमा आ गयी है।
भौंहें टेढ़ी हैं और नेत्र रोष से लाल हैं। सहज दृष्टि से भी वे किसी को देखें तो लगता है कि क्रोध कर रहे हैं। यह बात आगे के व्यवहार को समझने में साथ रहेगी, क्योंकि सभा केवल उनके कठोर वचन से भयभीत नहीं होती। वचन आने से पहले भी उनकी ओर से उठी एक साधारण दृष्टि लोगों को डरा देती है। मुख का सौन्दर्य, उस पर चढ़ी लालिमा और नेत्रों का रोष एक ही वर्णन में उपस्थित हैं। मुनि का रूप देखते हुए सभा को भय का अनुभव साथ साथ होता है।
उनके कन्धे वृषभ के समान हैं। पोद्दार जी इस तुलना को ऊँचे और पुष्ट कन्धों के रूप में खोलते हैं। छाती और भुजाएँ विशाल हैं। सुन्दर यज्ञोपवीत, माला और मृगचर्म शोभित हैं। कमर में मुनियों का वस्त्र है, जिसे टीका वल्कल कहती है। साथ में दो तरकस बँधे हुए हैं। हाथ में धनुष और बाण हैं, सुन्दर कन्धे पर फरसा धारण किये हैं। तपस्वी का पहनावा और ये अस्त्र एक ही देह पर दिखाई देते हैं। किसी वस्तु को अलग किये बिना चित्र पूरा होता है।
सांत बेषु करनी कठिन बरनि न जाइ सरूप।
दोहा २६८
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप॥ २६८॥
दोहा इसी रूप को एक साथ देखने को कहता है। वेष शान्त है और करनी कठिन। तुलसी उसके वर्णन की सीमा स्वीकार करके कहते हैं कि मानो वीररस ही मुनि का शरीर धारण करके सब राजाओं के बीच आ गया हो। यह उपमा सारे अंगों के वर्णन को जोड़ देती है। जटा, भस्म, त्रिपुण्ड्र और मुनिवस्त्र के साथ कन्धे का फरसा तथा दो तरकस उसी रूप में टिके रहते हैं। शान्त वेष देखकर निश्चिन्त होने की जगह सभा में नहीं बनती, क्योंकि उसके सामने परशुराम की कठिन करनी का भय भी है।
यहाँ उनकी कठोर करनी का विस्तृत वृत्तान्त नहीं खुलता। कवि के पास इस समय वही सामने उपस्थित मुनि हैं और उन्हें देखकर सकुचाये हुए राजा। वीररस को देह मिली है, इसलिये भय केवल सुनी हुई बात का नहीं जान पड़ता, वह सभा में दृष्टि के सामने खड़ा है। अगली क्रिया भी इसी के अनुरूप है। राजाओं के मुख से युद्ध की नयी घोषणा उठने के स्थान पर अपने परिचय निकलते हैं और वे प्रणाम करने लगते हैं।
गोरा शरीर, भस्म, त्रिपुण्ड्र, जटा, क्रुद्ध नेत्र, विशाल कन्धे और भुजाएँ, यज्ञोपवीत, माला, मृगचर्म, वल्कल, दो तरकस, धनुषबाण और फरसा, परशुराम का रूप पूरा दिखाई देता है। तुलसी उसे मुनिशरीर धारण किये हुए वीररस कहते हैं।
पहले परिचय, प्रणाम और आशीर्वाद
परशुराम का भयावना वेष देखकर सारे राजा व्याकुल होकर खड़े हो जाते हैं। वे अपने पिता के नाम के साथ अपना नाम कहते जाते हैं और दण्डवत् प्रणाम करते हैं। सभा के राजा अब इसी प्रकार अपना परिचय दे रहे हैं। यह सम्मान भय से भी भरा है। परशुराम किसी को हित की भावना से सहज ही देख लें, तब भी देखनेवाला समझता है कि उसकी आयु पूरी हो गयी। उनके मन में उस क्षण हित हो सकता है, पर सामनेवाले के मन में उठता हुआ अर्थ भय का ही है।
फिर जनक आते हैं और सिर नवाते हैं। वे सीता को बुलाकर प्रणाम कराते हैं। परशुराम सीता को आशीर्वाद देते हैं और सखियाँ प्रसन्न होती हैं। वे सयानी सखियाँ सीता को अपनी मण्डली में ले जाती हैं। थोड़ी देर पहले कोलाहल से शंकित सीता माता के पास ले जायी गयी थीं, अब जनक के बुलाने पर प्रणाम हुआ और मुनि की आशीष मिली। इस क्रम में परशुराम का आना केवल भय का दृश्य होकर नहीं रहता, उनके सामने आदर का व्यवहार भी पूरा होता है।
इसके बाद विश्वामित्र आकर परशुराम से मिलते हैं। वे दोनों भाइयों को उनके चरणकमलों पर प्रणाम कराते हैं। राम और लक्ष्मण का परिचय दशरथ के पुत्रों के रूप में दिया जाता है। पोद्दार जी की टीका इस परिचय के वक्ता विश्वामित्र को बताती है। जिन गुरु का समुद्र जैसा हृदय राम को देखकर आनन्द की तरंगों से भर उठा था, वे ही अब दोनों भाइयों को भृगुवंशी मुनि के चरणों तक लाये हैं। यहाँ भेंट का क्रम स्पष्ट है, पहले गुरु का मिलना, फिर भाइयों का प्रणाम और उनका परिचय।
रामु लखनु दसरथ के ढोटा । दीन्हि असीस देखि भल जोटा॥
चौपाई ८
रामहि चितइ रहे थकि लोचन । रूप अपार मार मद मोचन॥
दोनों की सुन्दर जोड़ी देखकर परशुराम आशीर्वाद देते हैं। फिर उनकी आँखें राम पर ठहर जाती हैं। सामने ऐसा अपार रूप है जो कामदेव का मद भी छुड़ा देनेवाला है। उसे निहारते हुए नेत्र स्तम्भित हो गये हैं। राम की शोभा पर इससे पहले लक्ष्मण की दृष्टि लगी थी, सीता चित्र जैसी रह गयी थीं, और अब परशुराम की आँखें भी उसी रूप पर ठहरती हैं। सभा में उनके आगमन का भय बना है, फिर भी इस ठहरे हुए निहारने के लिये चौपाई में अलग स्थान है।
इस भेंट को ध्यान से देखिये। राजाओं ने अपने पिता और अपने नाम कहकर दण्डवत् किया। जनक ने सिर झुकाया और सीता को प्रणाम कराया। सीता को आशीष मिली। विश्वामित्र ने दोनों भाइयों को चरणों में पहुँचाया और उन्हें भी आशीर्वाद मिला। इतने सम्मान और आशीष के बाद प्रश्न उठता है। राम को निहारती हुई आँखों का यह ठहराव आगे की पूछताछ को रोकता नहीं। परशुराम फिर सभा और जनक की ओर देखते हैं।
राजा परिचय देकर दण्डवत् करते हैं। जनक और सीता प्रणाम करते हैं, सीता को आशीर्वाद मिलता है। विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को मिलवाते हैं, दोनों को आशीष मिलती है और परशुराम के नेत्र राम के रूप पर ठहर जाते हैं।
सभा का कारण और टूटे हुए खण्ड
परशुराम फिर सब ओर देखकर जनक से पूछते हैं कि इतनी बड़ी भीड़ किस कारण है। वे कारण जानते हैं, फिर भी अनजान की तरह पूछ रहे हैं। उनके आने का समाचार पहले ही बता चुका है कि उन्होंने शिवधनुष का टूटना सुना है। अब यह प्रश्न उसी जाननेवाले की ओर से उठता है। तुलसी इसे छिपाते नहीं, दोहे में पूछने और जानने को एक साथ रखते हैं। मुनि के शरीर में क्रोध व्याप्त हो रहा है और उत्तर देने के लिये जनक सामने हैं।
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर।
दोहा २६९
पूँछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर॥ २६९॥
जनक वह समाचार कह सुनाते हैं जिसके कारण सभी राजा आये थे। उनका कथन सुनकर परशुराम दूसरी ओर देखते हैं। वहाँ धनुष के खण्ड धरती पर पड़े दिखाई देते हैं। कथा के आरम्भ में राम ने जिन दोनों टुकड़ों को भूमि पर रखा था और लोगों को सुख हुआ था, उन्हीं पर अब मुनि की दृष्टि पड़ती है। वे अत्यन्त क्रुद्ध होकर कठोर वचन कहते हैं। सभा का कारण पूछने के बाद अब धनुष तोड़नेवाले का नाम पूछा जाता है।
अति रिस बोले बचन कठोरा । कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा॥
चौपाई ९
बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू । उलटउँ महि जहँ लहि तव राजू॥
परशुराम जनक को मूढ़ कहकर सम्बोधित करते हैं और धनुष तोड़नेवाले को शीघ्र दिखाने की माँग करते हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आज जहाँ तक जनक का राज्य है, वहाँ तक पृथ्वी उलट देने की धमकी है। उनके वचन की कठोरता केवल सम्बोधन में नहीं है। वह जनक के पूरे राज्य पर आनेवाली विपत्ति का रूप लेती है। धनुष के टुकड़े सामने हैं और राजा से तत्काल उत्तर माँगा जा रहा है। जनक को इतना भय हो गया है कि वे उत्तर नहीं देते।
इस मौन को देखकर कुटिल राजा भीतर प्रसन्न हो उठते हैं। जयमाला पड़ने पर जो मलिन थे, उन्हें अब जनक का डर अच्छा लग रहा है। उधर देवता, मुनि, नाग और नगर के स्त्री पुरुष सभी सोच में पड़ गये हैं। उनके हृदय में भारी त्रास है। एक ही सभा में फिर दो तरह के मन साथ दिखाई देते हैं। दूसरों को संकट में देखकर दुष्ट राजा हर्ष पा रहे हैं, और बाकी सब उस संकट को अपना भय बनाकर अनुभव कर रहे हैं।
सीता की माता मन में पछता रही हैं कि विधाता ने अब बनी हुई बात बिगाड़ दी। पहले उनका हर्ष सूखते धान को पानी मिलने जैसा था। अब उसी माता को सँवर चुकी बात फिर बिगड़ती जान पड़ती है। सीता परशुराम का स्वभाव सुनती हैं तो आधा निमेष भी कल्प जैसा बीतता है। उस समय को केवल लम्बा कहना पर्याप्त नहीं होता, इसलिये तुलसी इतनी छोटी और इतनी विशाल अवधि को एक साथ रखते हैं। बाहर उत्तर की प्रतीक्षा है, भीतर सीता के लिये आधे क्षण का बीतना भी अत्यन्त कठिन हो गया है।
परशुराम कारण जानते हुए सभा का कारण पूछते हैं। जनक के बताने पर टूटे खण्ड देखते हैं और धनुष तोड़नेवाले को दिखाने की माँग करते हैं। पूरे राज्य को उलट देने की धमकी से जनक मौन हैं, कुटिल राजा प्रसन्न हैं और सीता सहित सब भयभीत हैं।
राम सबका भय देखते हैं
राम सब लोगों को भय से भरा हुआ देखते हैं। वे यह भी जानते हैं कि जानकी डरी हुई हैं। दोहे में दोनों बातें अलग आती हैं, सभा का व्यापक भय और सीता की भीरु दशा। लोगों की चिन्ता उनके सामने है और सीता की दशा भी उनसे छिपी नहीं है। ऐसे समय वे बोलते हैं। उनके हृदय में हर्ष या विषाद का कोई उद्वेग नहीं है। सभा के बदलते हुए भावों के बीच उनका यह स्थिर मन अब वाणी का आधार बनता है।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु।
दोहा २७०
हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु॥ २७०॥
अभी कुटिल राजाओं के मन का हर्ष देखा गया था, जनक का डर देखा गया था और माता का पछतावा सुना गया था। सीता के लिये आधा क्षण कल्प हो रहा था। इन्हीं सबके पास खड़े राम का हृदय हर्ष और विषाद से रहित है। वे लोगों से अलग हटकर निश्चिन्त नहीं हुए हैं। उनका बोलना ही सबका भय देखकर आरम्भ होता है। इस स्थिरता में सभा की दशा का पूरा बोध बना हुआ है।
राम सबको भयभीत और जानकी को डरी हुई जानकर बोलना आरम्भ करते हैं। उनके हृदय में हर्ष और विषाद नहीं हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस सभा को याद करते समय धरती पर रखे दोनों खण्ड देर तक सामने रहते हैं। आरम्भ में उन्हें देखकर सुख फैला था। अन्त में उन्हीं को देखकर परशुराम का क्रोध बढ़ता है। खण्ड अपनी जगह हैं, उनके पास आनेवाली दृष्टियाँ अलग हैं। बीच में सीता की माला राम के हृदय तक पहुँची है और कुछ राजाओं की चाह धमकी बन गयी है। सज्जन राजाओं ने उसी चाह को रोकने के लिये राम का रूप आँख भर देखने की सीख दी थी। सभा में बार बार देखना आता है, और हर दृष्टि अपने मन का हाल साथ लाती है।
सखियों का साथ भी इस बदलती सभा में निरन्तर बना रहता है। वे सीता के साथ गाती हुई चलती हैं, ठिठकी हुई जयमाला के समय समझाती हैं, भय लगने पर माता के पास ले जाती हैं और आशीर्वाद मिलने पर फिर अपनी मण्डली में लौटा लाती हैं। सीता का संकोच और भय अकेला नहीं पड़ता। उसी प्रकार अन्त में राम सबके भय को देखते हैं और जानकी की दशा जानते हैं। वे जिस घड़ी बोलना आरम्भ करते हैं, उस घड़ी सभा की सारी व्याकुलता उनके सामने है।
राम के हृदय पर जयमाला है, धरती पर धनुष के खण्ड हैं, और सामने क्रुद्ध परशुराम हैं। जनक उत्तर नहीं दे पा रहे। लोगों के हृदय भय से भरे हैं। इन्हीं सबको देखकर, मन में हर्ष और विषाद से रहित श्रीरघुवीर बोलने लगते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २६२ से २७०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।