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शिव का उत्तर और रामकथा की महिमा

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 13

पार्वती अपने प्रश्न से पहले अपनी पात्रता पर शंका करती हैं। उसी प्रश्न पर शिव दो घड़ी ध्यान में डूब जाते हैं, फिर बाहर आकर रामकथा कहना आरम्भ करते हैं।

कथा यहाँ बातचीत के बीच से उठती है। पार्वती अभी बोल ही रही हैं, और उनकी विनती आगे चलती है।

कैलास पर दो लोग बैठे बात कर रहे हैं। पार्वती राम की पूरी कथा माँगती हैं। प्रसंग के अन्त में शिव उस कथा का नाम लेते हैं जो वे कहने जा रहे हैं, रामचरितमानस।

इस प्रसंग में शिव दो काम एक साथ करते हैं। वे एक पति हैं, जो पत्नी के प्रश्न सुनकर प्रसन्न होते हैं, आँखों में जल भर लेते हैं और बीच में सिर झुका देते हैं। और वे रामकथा के वक्ता भी हैं। इस प्रसंग में दोनों रूप साथ साथ दिखते हैं।

कैलास की बातचीत में कौन कौन

  • पार्वती जो कैलास की इस बातचीत में पूछती हैं, शंका करती हैं, समाधान पाती हैं और फिर एक नया प्रश्न रख देती हैं।
  • शिव जो यहाँ उत्तर देनेवाले भी हैं और रामकथा के वक्ता भी।
  • राम जिनके विषय में यह सारी बात हो रही है, और जो इस पूरे प्रसंग में एक बार भी स्वयं सामने नहीं आते।
  • दशरथ जिनका नाम यहाँ दो ही बार आता है, और दोनों बार राम का परिचय बनकर।
  • काकभुशुण्डि जिन्होंने यह कथा विस्तार से कही, और जिनका नाम प्रसंग के अन्त में शिव लेते हैं।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जिन्होंने वह कथा सुनी थी। उनका संवाद आगे कहा जायेगा।

जो पूछा नहीं गया, वह भी

पार्वती की बात आगे चलती है। वे कहती हैं: यद्यपि स्त्री अधिकारिणी नहीं होती, फिर भी मन, कर्म और वचन से मैं आपकी दासी हूँ।

फिर वे कहती हैं कि सन्त गूढ़ तत्त्व भी नहीं छिपाते, जहाँ उन्हें आर्त अधिकारी मिल जाये।

और तुरन्त बाद पार्वती वही शब्द अपने ऊपर लगा लेती हैं: मैं बहुत आर्त होकर पूछती हूँ, हे देवताओं के स्वामी, दया करके राम की कथा कहिये।

फिर प्रश्नों की सूची आती है। पहले वह कारण, जिससे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करता है। फिर राम के अवतार की कथा, उनका बालचरित्र, सीता से विवाह, किस दोष से उन्होंने राज्य छोड़ा, वन में किये हुए चरित्र और रावण का वध। और फिर राज्य करते हुए की गयी सारी लीलाएँ। सूची उसी क्रम में है जिसमें वे कथा सुनना चाहती हैं।

सूची का अन्तिम पड़ाव यह है: फिर वह अचरज कहिये जो राम ने किया, कि वे प्रजा सहित किस प्रकार अपने धाम को गये।

पूरी सूची में यही एक घटना है जिसे पार्वती स्वयं अचरज कहती हैं, और वे पूछती हैं कि राम प्रजा को साथ लेकर कैसे गये।

पर वे यहीं नहीं रुकतीं। वे उस तत्त्व को समझाकर कहने को कहती हैं जिसकी अनुभूति में ज्ञानी मुनि डूबे रहते हैं। फिर वे भक्ति, ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य का अलग अलग वर्णन माँगती हैं। वे पहले कथा माँगती हैं, फिर वह तत्त्व।

फिर वे राम के और भी जो रहस्य हैं, वे भी पूछती हैं। अन्त में वे कहती हैं: हे प्रभु, जो बात मैंने पूछी ही न हो, हे दयालु, उसे भी छिपाकर मत रखियेगा।

उनकी अन्तिम बात शिव के विषय में है: वेदों ने आपको तीनों लोकों का गुरु कहा है, दूसरे पामर जीव क्या जानें।

दो घड़ी का मौन

पार्वती के प्रश्न सहज थे, सुन्दर थे और छलरहित थे, और सुनकर शिव के मन को भा गये।

और तब शिव के हृदय में सारे रामचरित्र एक साथ आ गये। प्रेम से शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों में जल भर आया। राम का रूप हृदय में आ बैठा, और उससे उन्हें अपार सुख मिला। जो स्वयं परमानन्दस्वरूप हैं, उन्हें भी इस रूप से सुख मिला।

बोलने से पहले शिव दो दण्ड तक ध्यान के रस में डूबे रहते हैं, जिसे टीका दो घड़ी बताती है। फिर वे मन को बाहर खींचते हैं। शिव का उत्तर एक चुप्पी से आरम्भ होता है।

और तब वे प्रसन्न होकर राम का चरित्र कहना आरम्भ करते हैं। जिस रस में वे डूबे थे वह भी उन्हीं राम का था जिनकी कथा वे कहने जा रहे हैं।

यहाँ से बोलनेवाले शिव हैं, कैलास पर बैठे एक पति जो पत्नी को उत्तर दे रहे हैं। और वह वक्ता जिनके मुँह से आगे राम के अवतार की कथा आयेगी।

पहली वन्दना बालरूप की

कथा एक वन्दना से आरम्भ होती है। शिव पहले उस तत्त्व की बात करते हैं जिसे बिना जाने झूठ भी सच जान पड़ता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप दीख जाता है। उसे जान लेने पर संसार वैसे ही मिट जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम।

फिर बात मुड़ती है: उन्हीं राम के बालरूप की मैं वन्दना करता हूँ। जिसे जान लेने पर संसार मिट जाता है, उसी को अब एक बालक के रूप में प्रणाम किया जा रहा है। उस बालक की जगह भी बता दी जाती है, दशरथ का आँगन।

मंगल के धाम और अमंगल के हरनेवाले वे कृपा करें। जिनसे कृपा माँगी गयी है, उनका परिचय एक दृश्य है, आँगन में खेलता हुआ बच्चा। उससे ठीक पहले शिव कह चुके हैं कि उनका नाम जपने से सब सिद्धियाँ सहज मिल जाती हैं।

वन्दना के बाद शिव राम को प्रणाम करते हैं और पार्वती की ओर मुड़ते हैं। पत्नी से उनका पहला वाक्य उन्हीं की प्रशंसा है: पार्वती, आप धन्य हैं, धन्य हैं, आपके समान कोई उपकारी नहीं। कारण भी वे बता देते हैं। पार्वती के मन में राम के चरणों का प्रेम है, और प्रश्न उन्होंने जगत के हित के लिये पूछे हैं। जो कथा उन्होंने माँगी है, वह सब लोकों के लिये गंगा के समान है।

और फिर शिव कहते हैं कि मेरे विचार में आपके मन में स्वप्न में भी शोक, मोह, सन्देह और भ्रम कुछ नहीं है।

यानी उत्तर देनेवाला पहले ही कह रहा है कि जिस शंका का उत्तर वह देने जा रहा है, वह पूछनेवाली के मन में है ही नहीं। शिव आगे कहते हैं कि फिर भी पार्वती ने वह शंका की, और उसके कहने सुनने से सबका हित होता है। टीका इसे कारण की तरह पढ़ती है: वह पुरानी शंका इसीलिये की गयी कि इस प्रसंग के कहने सुनने से सबका कल्याण होगा।

और शोक, मोह, सन्देह और भ्रम के न होने का श्रेय भी शिव राम की कृपा को देते हैं।

जिन्होंने यह कथा नहीं सुनी

अब शिव शरीर के अंगों की एक सूची रखते हैं, और हर अंग के लिये अलग उपमा। जिन्होंने कानों से भगवान की कथा नहीं सुनी, उनके कानों के छिद्र साँप के बिल के समान हैं। जिन्होंने नेत्रों से सन्तों के दर्शन नहीं किये, उनके नेत्र मोर के पंख पर दीखनेवाली आँखों की गिनती में हैं। जो सिर भगवान और गुरु के चरणों में नहीं झुकते, वे कड़वी तूँबी के समान हैं।

मोरपंख की ये आँखें नक़ली आँखें हैं, ऐसा टीका बताती है।

फिर हृदय और जीभ। जिन्होंने भक्ति को हृदय में स्थान नहीं दिया, वे जीते हुए ही मुर्दे के समान हैं। और जो जीभ राम के गुण नहीं गाती, वह मेढक की जीभ के समान है।

और अन्त में, जो छाती भगवान का चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होती, वह वज्र के समान कड़ी और निष्ठुर है। फिर शिव पार्वती से कहते हैं कि राम की लीला सुनिये, जो देवताओं का हित करनेवाली और दैत्यों को मोहित करनेवाली है। एक ही लीला, और उसके दो असर।

रामकथा देवताओं की गाय के समान है, जिसकी सेवा करने से सब सुख मिलते हैं, और सत्पुरुषों का समाज सारे देवलोक है। ऐसा जानकर कौन न सुनेगा? टीका इस गाय को कामधेनु कहती है।

फिर दो और उपमाएँ आती हैं। रामकथा हाथ की वह ताली है जो सन्देह रूपी पक्षियों को उड़ा देती है, और कलियुग रूपी वृक्ष को काटने की कुल्हाड़ी है। और शिव पार्वती से कहते हैं कि इसे आदर से सुनिये। सन्देह यहाँ ऐसी चीज़ है जिसे उड़ाया जाता है।

एक बात जो अच्छी नहीं लगी

अब शिव उस प्रश्न में से एक बात अलग निकालते हैं। पहले वे कहते हैं कि वेदों ने राम के नाम, गुण, चरित्र, जन्म और कर्म अनगिनत कहे हैं। जैसे राम अनन्त हैं, वैसे ही उनकी कथा भी। फिर भी, वे पार्वती से कहते हैं, आपकी इतनी प्रीति देखकर, जैसा मैंने सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, वैसा कहूँगा। आपका प्रश्न सहज ही सुन्दर, सुख देनेवाला और सन्तों को मान्य है, और मुझे बहुत अच्छा लगा। जैसा मैंने सुना है: प्रयाग में रामकथा आरम्भ करते हुए याज्ञवल्क्य ने भी यही कहा था।

और फिर वे बात कहते हैं, पूरे स्नेह से: एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, यद्यपि वह आपने मोह के वश होकर ही कही है। दोष का नाम लेने से पहले ही उसका कारण दे दिया गया है।

पिछले प्रसंग में पार्वती ने पूछा था कि ये राम वही अयोध्या के राजा के पुत्र हैं या कोई और। वही बात शिव यहाँ उनके कहे हुए वाक्य की तरह लौटाते हैं, कि वे राम, जिन्हें वेद गाते हैं, कोई और हैं। और यही बात उन्हें अच्छी नहीं लगी।

इसके बाद की बात उन लोगों की ओर है जो ऐसी बातें कहते सुनते हैं। वे उन्हें मोह रूपी पिशाच से ग्रस्त, पाखण्डी, भगवान के चरणों से विमुख, झूठ और सच न जाननेवाले, अज्ञानी, अंधे और भाग्यहीन कहते हैं। उनके मन रूपी दर्पण पर विषयों की काई जमी है, और उन्होंने स्वप्न में भी सन्तसमाज नहीं देखा। जिन्हें निर्गुण और सगुण का विवेक नहीं, जो मनगढ़ंत बातें बकते हैं और माया के वश संसार में भटकते हैं, उनके लिये कुछ भी कह देना असम्भव नहीं।

जिन्हें लाभ और हानि नहीं सूझती, वे वेदविरुद्ध बातें कहते हैं। और जिनका दर्पण मैला हो और जिनके पास आँखें ही न हों, वे बेचारे राम का रूप देखें तो कैसे।

फिर शिव एक व्यावहारिक सलाह देते हैं। जिन्हें वायु का रोग हो, जो भूत के वश हों, जो नशे में चूर हों, वे सोचकर नहीं बोलते। जिन्होंने महामोह की मदिरा पी रखी है, उनके कहने पर कान नहीं देना चाहिये।

और फिर वे पार्वती की ओर लौटते हैं।

शिव कहते हैं: मन में ऐसा विचारकर संशय छोड़िये, राम के चरणों को भजिये। और मेरे वचन सुनिये, जो भ्रम रूपी अन्धकार के लिये सूर्य की किरणें हैं।

सगुण और निर्गुण में भेद नहीं

अब शिव उस प्रश्न के दो शब्द उठाते हैं जो पार्वती ने सबसे पहले पूछा था, निर्गुण और सगुण। वे आरम्भ यह कहकर करते हैं कि दोनों में भेद है ही नहीं। इसके लिये वे चार गवाह गिनाते हैं, मुनि, पुराण, पण्डित और वेद।

और कारण भी वे बताते हैं: जो निर्गुण, अरूप, अलख और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेम के वश सगुण हो जाता है। कारण एक ही है, भक्तों का प्रेम।

फिर उपमा आती है: जैसे जल और ओले में भेद नहीं। टीका कहती है कि दोनों जल ही हैं, वैसे ही निर्गुण और सगुण एक ही हैं। और जिनका नाम ही भ्रम रूपी अन्धकार के लिये सूर्य है, उनके विषय में मोह की बात उठे तो कैसे उठे।

शिव कहते हैं कि राम सच्चिदानन्द के सूर्य हैं और वहाँ मोह रूपी रात का लवलेश भी नहीं। फिर कहते हैं कि भगवान स्वभाव से प्रकाशरूप हैं, और साथ ही वहाँ विज्ञान रूपी सवेरा नहीं होता। टीका इसका कारण देती है: अज्ञान रूपी रात हो तब तो विज्ञान रूपी सवेरा हो। भगवान तो नित्य ज्ञानस्वरूप हैं।

फिर चीज़ें अपनी जगह रखी जाती हैं। हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान, ये सब जीव के धर्म हैं। ज्ञान और अज्ञान एक ही सूची में हैं। और इसके सामने राम हैं: व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर, पुराणपुरुष।

फिर शिव कहते हैं कि वही राम मेरे स्वामी हैं, और ऐसा कहकर मस्तक नवाते हैं। उत्तर के आरम्भ में वे बालरूप राम की वन्दना कर चुके हैं। यह दूसरा प्रणाम बात के बीच में आता है, जब वे अपनी पत्नी से बात कर रहे हैं।

आँख पर उँगली

यदि राम वही हैं, तो लोगों को उनमें मोह क्यों दीखता है? अज्ञानी अपने भ्रम को नहीं समझते, और वे मूर्ख उसे राम पर आरोपित कर देते हैं। जो भूल देखनेवाले में है, उसे देखी जानेवाली वस्तु के खाते में डाल दिया जाता है।

फिर तीन चित्र आते हैं। पहला बादल का: आकाश में बादलों का परदा देखकर कुविचारी कहते हैं कि सूर्य ढक गया।

दूसरा चित्र: जो आँख में उँगली लगाकर देखता है, उसे दो चन्द्रमा प्रकट दीखते हैं। दूसरा चन्द्रमा उँगली का बनाया हुआ है।

तीसरा चित्र: राम के विषय में ऐसा मोह वैसा ही है जैसे आकाश में अँधेरा, धुआँ और धूल दीखना। टीका यहाँ कोष्ठक में जोड़ती है कि आकाश निर्मल और निर्लेप है, उसे कोई मैला या स्पर्श नहीं कर सकता, और वैसे ही राम नित्य निर्मल और निर्लेप हैं।

फिर एक छोटा सा तर्क आता है कि कोई चीज़ जानी कैसे जाती है। विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीव, ये सब एक से एक चेतन होते हैं। इन सबका जो परम प्रकाशक है, वही अनादि राम, अयोध्या के स्वामी हैं। जगत प्रकाश्य है और राम प्रकाशक। उन्हीं की सत्ता से, मोह की सहायता पाकर, जड़ माया भी सच सी भासती है।

शिव दो रोज़ के उदाहरण देते हैं, सीप में चाँदी और सूर्य की किरणों में पानी। दोनों तीनों कालों में झूठ हैं, फिर भी उस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता।

फिर दुख की बात आती है। इसी तरह संसार भगवान के आश्रित रहता है। यद्यपि वह असत्य है, फिर भी दुख देता है, जैसे स्वप्न में कोई सिर काट ले, तो बिना जागे वह दुख दूर नहीं होता। उस दुख का एक ही अन्त है, जागना।

और फिर शिव कहते हैं: जिनकी कृपा से ऐसा भ्रम मिटता है, वही कृपालु राम हैं, जिनका आदि और अन्त किसी ने नहीं पाया। फिर वह वर्णन आता है जो वेदों ने बुद्धि से अनुमान करके गाया है।

वह बिना पैर के चलता है, बिना कान के सुनता है, बिना हाथ के नाना काम करता है। बिना मुँह के वह सारे रस भोगता है, बिना वाणी के बड़ा वक्ता है। वह बिना शरीर के छूता है, बिना आँख के देखता है, बिना नाक के सब गन्ध ग्रहण करता है। आठ इन्द्रियाँ हटा दी गयीं और आठों काम बचे रहे।

फिर शिव उनका नाम लेते हैं।

जिसका वेद और पण्डित ऐसा वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान धरते हैं, वही दशरथ के पुत्र, भक्तों के हितकारी, अयोध्या के स्वामी भगवान राम हैं। जिसका वर्णन बिना पैर और बिना हाथ के किया गया था, उसे यहाँ एक पिता का नाम और एक राज्य मिल जाता है।

काशी की गवाही

अब शिव तर्क छोड़कर गवाही देते हैं, और गवाही उनके अपने काम की है।

काशी में वे मरते हुए प्राणी को देखकर उसे शोकरहित कर देते हैं, और यह काम राम के नाम के बल से होता है। शब्द उनके अपने हैं: जिनके नाम के बल से मैं शोकरहित करता हूँ। और उसी साँस में राम को अपना स्वामी, जड़ चेतन का स्वामी और सबके हृदय की जाननेवाला कहते हैं।

फिर उस नाम का हिसाब आता है। विवश होकर, बिना इच्छा के भी, उनका नाम लेने से अनेक जन्मों के पाप जल जाते हैं। और जो आदर से स्मरण करते हैं, वे संसार के समुद्र को गाय के खुर से बने गड्ढे की तरह पार कर जाते हैं।

और फिर चेतावनी आती है। वही परमात्मा राम हैं, उनमें भ्रम बताना बहुत अनुचित है, और ऐसा सन्देह मन में लाते ही ज्ञान, वैराग्य और सारे सद्गुण चले जाते हैं।

शिव के भ्रम मिटानेवाले वचन सुनकर पार्वती के सारे कुतर्कों की रचना मिट गयी। रचना, यानी एक बनायी हुई चीज़। फिर राम के चरणों में प्रीति और प्रतीति हुई, पहले प्रेम, फिर विश्वास। और जिसे टीका कठिन असम्भावना कहती है, वह जाती रही।

वही प्रश्न, फिर से

पार्वती बार बार शिव के चरण पकड़ती हैं, हाथ जोड़ती हैं, और ऐसे वचन बोलती हैं मानो प्रेम के रस में सने हों।

पार्वती कहती हैं कि आपकी चन्द्रमा की किरणों जैसी वाणी सुनकर मोह रूपी शरद की धूप का भारी ताप मिट गया।

और वे कहती हैं: हे कृपालु, आपने सब सन्देह हर लिया, राम का स्वरूप मेरी समझ में आ गया। आपकी कृपा से अब विषाद चला गया और आपके चरणों के प्रसाद से मैं सुखी हो गयी। अब मुझे अपनी दासी जानकर, यद्यपि स्त्री स्वभाव से जड़ और अनजान होती है, वही कहिये जो मैंने पहले पूछा था, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं।

जो अब उनके लिये तय है, वह वे एक ही वाक्य में कहती हैं: राम ब्रह्म हैं, चिन्मय, अविनाशी, सबसे अलग और सबके हृदय रूपी नगर में बसनेवाले।

उन्होंने मनुष्य का शरीर किस कारण धारण किया? पार्वती की बात उसी प्रश्न पर रुकती है जिससे उनकी सूची शुरू हुई थी। रास्ते में जो सन्देह खड़ा था, कि अयोध्या के राम और वेदों के गाये हुए ब्रह्म एक हैं या नहीं, उसका उत्तर इसी प्रसंग में मिल चुका है।

पार्वती के बहुत नम्र वचन सुनकर और रामकथा में उनका सच्चा प्रेम देखकर शिव मन में बहुत हर्षित होते हैं। वे बहुत तरह से उनकी बड़ाई करके फिर बोलते हैं। यहाँ कथा शिव को कामदेव का शत्रु कहकर याद करती है। प्रश्न शरीर धारण करने का है, और उत्तर देनेवाले का परिचय उस नाम से कराया गया है जिसने काम को जला दिया था।

ठीक यहीं पाठ का विश्राम पड़ता है। इस पुस्तक के पाठ के दो क्रम चले आये हैं, नौ दिन का और महीने भर का। दोनों के विराम यहीं मिलते हैं: नवाह्नपारायण का पहला विश्राम और मासपारायण का चौथा। विश्राम वहाँ पड़ता है जहाँ सन्देह मिट चुका है और राम के अवतार की कथा अभी शुरू नहीं हुई।

फिर शिव उस कथा का नाम लेते हैं जो वे कहने जा रहे हैं, निर्मल रामचरितमानस। वे बताते हैं कि यह कथा काकभुशुण्डि ने विस्तार से कही थी और पक्षियों के राजा गरुड़ ने सुनी थी। फिर वे कहते हैं कि वह संवाद कैसे हुआ, यह आगे कहेंगे। वे पार्वती से राम के अवतार का चरित्र सुनने को कहते हैं। अन्त में शिव फिर अपनी सीमा बताते हैं: भगवान के गुण, नाम, कथा और रूप अपार और अगणित हैं, फिर भी वे अपनी बुद्धि के अनुसार कहेंगे।

अनुपस्थित राम, और अनुत्तरित प्रश्न

राम इस बातचीत के हर हिस्से में हैं, और इसके किसी दृश्य में वे स्वयं सामने नहीं आते। दशरथ का नाम दो ही बार आता है, एक बार अपने आँगन के साथ और एक बार पिता के रूप में। यह पूरा प्रसंग दो लोगों की बातचीत है।

उत्तर का क्रम भी देखने लायक़ है। शिव ने पहले एक बालक को प्रणाम किया, फिर पार्वती को धन्य कहा। फिर कानों, आँखों और जीभ की बात की, और बहुत बाद में निर्गुण और सगुण की चर्चा की। और अन्त में गवाही दी कि काशी में मरते हुए प्राणी के साथ वे क्या करते हैं।

इस प्रसंग के आरम्भ में पार्वती ने अपने को शिव की दासी कहा था। अपनी अन्तिम विनती में उन्होंने फिर अपने को दासी ही कहा।

जो प्रश्न यहाँ खुला छूटता है, वह पार्वती का पहला प्रश्न है, कि राम ने मनुष्य का शरीर किस कारण धारण किया। इस प्रसंग में उसका उत्तर इतना ही है। शिव पार्वती से आदर से सुनने को कहते हैं, और उस कथा का नाम लेते हैं जो वे कहने जा रहे हैं। अगला प्रसंग अवतार के कारणों से खुलता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 110 से 120, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।