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शिव का उत्तर और रामकथा की महिमा

रामचरितमानस · बालकाण्ड · शिव का उत्तर और रामकथा की महिमा

शिव का उत्तर और रामकथा की महिमा

एक स्त्री अपने प्रश्न से पहले अपनी पात्रता पर शंका करती है, और उसी प्रश्न पर तीनों लोकों के गुरु दो घड़ी ध्यान में डूब जाते हैं, फिर बाहर आकर रामकथा कहना आरम्भ करते हैं।

यह पन्ना एक वाक्य के बीच से खुलता है। पार्वती पूछ चुकी हैं, और अभी पूछ रही हैं, और उनके प्रश्न की सूची अभी पूरी नहीं हुई है। जो पहली पंक्ति हमें मिलती है वह प्रश्न नहीं है, वह प्रश्न पूछने से पहले की सफ़ाई है। और उसी सफ़ाई में इस पूरे प्रसंग की चाबी रखी हुई है, क्योंकि उसमें यह तय हो जाता है कि इस कथा को सुनने का अधिकार किसे है।

यहाँ बड़ी घटना एक भी नहीं है। कोई युद्ध नहीं, कोई यात्रा नहीं, कोई जन्म नहीं। कैलास पर दो लोग बैठे हैं और बात कर रहे हैं। पर बालकाण्ड में इससे अधिक भार उठानेवाला कोई हिस्सा नहीं है, क्योंकि जो कुछ आगे आनेवाला है, सातों काण्ड, वह सब इसी बातचीत के भीतर कहा जानेवाला है। यहाँ जो उत्तर बन रहा है, आगे का सारा रामचरितमानस उसी उत्तर का विस्तार है।

और एक बात ध्यान में रख लेनी चाहिये। इस प्रसंग में शिव दो चीज़ें एक साथ हैं। वे किरदार भी हैं, जो अपनी पत्नी के प्रश्न सुनकर प्रसन्न होते हैं, आँखों में जल भर लेते हैं और बीच में सिर झुका देते हैं। और वे कहनेवाले भी हैं, वह कण्ठ जिससे यह पूरी पुस्तक निकलनेवाली है। इसी पन्ने पर वे दोनों काम करते हुए दिखायी देते हैं, और यही इस प्रसंग को पढ़ने का सबसे सीधा रास्ता है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • पार्वती गिरिराजकुमारी, भवानी, उमा, जो इस पन्ने पर पूछती हैं, शंका करती हैं, समाधान पाती हैं और फिर एक नया प्रश्न रख देती हैं।
  • शिव शंकर, महेश, त्रिपुरारि, कामारि, वृषकेतु, जो यहाँ उत्तर देनेवाले भी हैं और रामकथा के वक्ता भी।
  • राम जिनके विषय में यह सारी बात हो रही है, और जो इस पूरे प्रसंग में एक बार भी स्वयं उपस्थित नहीं होते।
  • दशरथ जिनका नाम यहाँ दो ही बार आता है, और दोनों बार किसी और का परिचय बनकर।
  • काकभुशुण्डि वह कहनेवाले जिनसे यह कथा पहले कही गयी थी, और जिनका नाम इस प्रसंग के ठीक अन्तिम सोरठे में खुलता है।
  • गरुड़ पक्षियों के राजा, जिन्होंने वह कथा सुनी थी, और जिनका उल्लेख आगे आनेवाले एक बड़े संवाद का वचन बनकर यहाँ रखा जाता है।

जो पूछा नहीं गया, वह भी

पन्ना एक क्षमायाचना से खुलता है। पार्वती अपने प्रश्न से पहले वह आपत्ति स्वयं उठा देती हैं जो कोई और उठा सकता था। स्त्री होने के कारण मैं इसे सुनने की अधिकारिणी नहीं हूँ, वे कहती हैं, और यह बात किसी दूसरे के मुँह से आने से पहले अपने मुँह से कह देती हैं। पर वे वहीं रुकती नहीं। उसी साँस में वे अपना दूसरा परिचय रख देती हैं, कि मन से, वचन से और कर्म से वे उनकी दासी हैं। पहली पंक्ति में एक कमी बतायी गयी और उसी पंक्ति में उसके सामने एक सम्बन्ध रख दिया गया, और आगे का सारा उत्तर इसी सम्बन्ध पर टिकेगा, उस कमी पर नहीं।

और फिर वह पंक्ति आती है जो इस पूरे प्रसंग का द्वार खोल देती है। संत लोग गूढ़ तत्त्व भी नहीं छिपाते, जहाँ उन्हें आर्त अधिकारी मिल जाये। ध्यान दीजिये कि तुलसीदास ने इसे किस क्रम में रखा है। पहले निषेध आता है, कि साधु छिपाते नहीं, और शर्त बाद में आती है। यानी वाक्य शर्त बनने से पहले वचन बन चुका होता है। और शर्त में जो शब्द रखा गया वह न विद्या है, न जाति, न लिंग, न तप। वह एक ही शब्द है, आर्त। जो भीतर से टूटा हुआ है और जिसे सचमुच चाहिये, वही अधिकारी है।

जदपि जोषिता नहिं अधिकारी । दासी मन क्रम बचन तुम्हारी॥
गूढ़उ तत्त्व न साधु दुरावहिं । आरत अधिकारी जहँ पावहिं॥

चौपाई १

और अब देखिये कि पार्वती इसके तुरन्त बाद क्या करती हैं। वे उसी शब्द को अपने ऊपर लगा लेती हैं। मैं अत्यन्त आर्त होकर पूछती हूँ, हे देवताओं के स्वामी, वे कहती हैं, और इस तरह जो पात्रता अभी परिभाषित हुई थी, वह बहस से नहीं, अपनी दशा बताकर माँग ली जाती है। पहली पंक्ति में उन्होंने कहा था कि अधिकार नहीं है। तीसरी पंक्ति तक अधिकार बन चुका है, और बनानेवाली कोई योग्यता नहीं, केवल पीड़ा है।

फिर प्रश्नों की सूची आती है, और यह सूची अपने आप में एक अद्भुत चीज़ है। पहले तो वह कारण, जिससे निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप धारण करता है। फिर राम के अवतार की कथा, फिर उनका उदार बालचरित्र, फिर जानकी से विवाह, फिर यह कि किस दोष के कारण राज्य छोड़ा गया, फिर वन में किये हुए अपार चरित्र और रावण का वध, और फिर सिंहासन पर बैठकर की गयी सारी लीलाएँ। यह कोई बिखरी हुई जिज्ञासा नहीं है। यह उस पुस्तक की अनुक्रमणिका है जो हमारे हाथ में है, और जिस क्रम से वे पूछती हैं, ठीक उसी क्रम से आगे कही जानेवाली है।

और सूची का अन्तिम पड़ाव दोहे में आता है, वहाँ जहाँ कथा समाप्त होती है। फिर वह अचरज कहिये जो श्रीराम ने किया, वे कहती हैं, कि रघुकुल के शिरोमणि प्रजा सहित किस प्रकार अपने धाम को गये।

बहुरि कहहु करुनायतन कीन्ह जो अचरज राम।
प्रजा सहित रघुबंसमनि किमि गवने निज धाम॥ ११०॥

दोहा ११०

इस दोहे में जो शब्द सबसे अधिक भार उठाता है वह प्रजा सहित है। प्रश्न यह नहीं है कि राम कैसे गये। प्रश्न यह है कि वे नगर को साथ लेकर कैसे गये। अचरज प्रस्थान में नहीं है, अचरज साथ में है। और यह भी देखने लायक़ है कि पूरी सूची में यही एक घटना ऐसी है जिसे पार्वती स्वयं अचरज कहती हैं। जन्म नहीं, विवाह नहीं, रावण का वध भी नहीं। अचरज वह है जिसमें एक पूरा नगर किसी के पीछे चला जाता है।

पर वे यहीं नहीं रुकतीं, और यहीं से उनका प्रश्न कथा से आगे निकल जाता है। वे उस तत्त्व को समझाकर कहने के लिये कहती हैं जिसकी अनुभूति में ज्ञानी मुनि सदा डूबे रहते हैं। फिर भक्ति, ज्ञान, विज्ञान और वैराग्य का विभाग सहित वर्णन माँगती हैं। यानी वे कथा भी चाहती हैं और कथा का अर्थ भी, और दोनों को अलग अलग माँगती हैं, जैसे कोई जानता हो कि एक के मिल जाने से दूसरा अपने आप नहीं मिलता।

और फिर उस सूची की अन्तिम माँग आती है, जो इस पूरे हिस्से की सबसे सुन्दर चीज़ है। हे प्रभु, जो बात मैंने पूछी ही न हो, हे दयालु, उसे भी छिपाकर मत रखियेगा। अपनी कमी जाननेवाला अपनी कमी माँग लेता है। पर यहाँ वे उस कमी की माँग कर रही हैं जिसका उन्हें पता ही नहीं है। यह उस व्यक्ति का वाक्य है जो जानता है कि उसका अज्ञान उसकी सूची से बड़ा है, और इसीलिये वह सूची पर भरोसा नहीं करता, कहनेवाले पर करता है।

और भरोसे का कारण भी वे बता देती हैं, और उसमें चापलूसी नहीं, प्रमाण है। वेदों ने आपको तीनों लोकों का गुरु कहा है, वे कहती हैं, दूसरा पामर जीव इस रहस्य को क्या जाने। वे यह नहीं कह रहीं कि आप महान हैं। वे यह कह रही हैं कि यह पद आपको पहले से दिया जा चुका है, और आज वह पद माँगा जा रहा है।

सार: पार्वती अपने प्रश्न से पहले स्वयं कह देती हैं कि स्त्री होने के कारण वे अधिकारिणी नहीं हैं, और उसी के साथ यह भी कि साधु आर्त अधिकारी को गूढ़ तत्त्व भी नहीं छिपाते। फिर वे क्रम से राम की पूरी कथा माँगती हैं, फिर उस तत्त्व का विवेचन, और अन्त में यह भी कि जो उन्होंने पूछा ही न हो, वह भी छिपाया न जाये।

दो घड़ी का मौन

अब देखने की बात यह है कि इस प्रश्न ने सुननेवाले पर क्या किया। तुलसीदास यह नहीं लिखते कि शिव ने प्रश्न को स्वीकार किया या सराहा। वे लिखते हैं कि पार्वती के सहज, सुन्दर और छलरहित प्रश्न शिव के मन को अच्छे लगे। जिस बात की प्रशंसा की जा रही है वह प्रश्न की गहराई नहीं है, उसमें चतुराई का न होना है। कैलास पर जो प्रश्न पूछा गया, उसका सबसे बड़ा गुण यह है कि उसके पीछे कुछ और छिपा हुआ नहीं था।

और तब जो होता है, वह एक ही चौपाई में कहा गया है और बहुत तेज़ी से बीत जाता है। महादेव के हृदय में सारे रामचरित्र एक साथ आ गये। प्रेम के मारे शरीर पुलकित हो गया, नेत्रों में जल भर आया। रघुनाथ का रूप हृदय में आ बैठा, और उससे अपार सुख मिला। इस पंक्ति को दुबारा पढ़ना चाहिये, क्योंकि इसमें एक बात चुपचाप कह दी गयी है। जिन्हें सुख मिला वे स्वयं परमानन्दस्वरूप हैं। जिनके पास पाने को कुछ बचा ही नहीं था, उन्हें भी इस रूप से कुछ मिला।

और फिर वह घटना आती है जिसे कोई भी संक्षेप करनेवाला काट देता। बोलने से पहले शिव दो घड़ी तक ध्यान के रस में डूबे रहते हैं, ऐसा टीका बताती है, और फिर मन को बाहर खींचते हैं। जिस पुस्तक को वे कहने जा रहे हैं, उसे कहने के लिये उन्हें पहले भीतर जाना पड़ता है और फिर बाहर लौटना पड़ता है। कथा का आरम्भ एक चुप्पी से होता है, और वह चुप्पी इतनी लम्बी है कि उसे नापा जा सका है।

मगन ध्यान रस दंड जुग पुनि मन बाहेर कीन्ह।
रघुपति चरित महेस तब हरषित बरनै लीन्ह॥ १११॥

दोहा १११

इस दोहे में एक और शब्द है जिस पर रुकना चाहिये, हरषित। वे बाहर अनिच्छा से नहीं लौटते। वे उस रस को छोड़कर कहने बैठते हैं और कहने में उन्हें आनन्द है, क्योंकि जिस रस में वे डूबे थे वह भी उसी का था जिसकी कथा वे कहने जा रहे हैं। इसलिये भीतर जाना और बाहर आना, दोनों एक ही दिशा में हैं।

और इसी बिन्दु से यह पन्ना अपनी सबसे अनोखी शक्ल ले लेता है। इसके बाद जो भी बोलता है वह शिव है, पर वह एक ही समय में दो जगह खड़ा है। वह कैलास पर बैठा एक पति है जो अपनी पत्नी को उत्तर दे रहा है, और वह इस पूरे रामचरितमानस का वक्ता है। आगे जो अयोध्या है, जो वन है, जो लंका है, सब इसी उत्तर के भीतर है। पाठक जब तक चाहे इस बात को भूल सकता है, पर यह पन्ना उसे भूलने नहीं देता, क्योंकि यहाँ दोनों काम साथ साथ होते हुए दिखते हैं।

सार: पार्वती के छलरहित प्रश्न शिव के मन को भाते हैं, रामचरित्र उनके हृदय में उमड़ आते हैं और आँखों में जल भर आता है। फिर वे दो घड़ी ध्यान में डूबे रहते हैं, मन को बाहर लौटाते हैं, और प्रसन्न होकर रघुनाथ का चरित्र कहना आरम्भ करते हैं।

पहली वन्दना बालरूप की

कथा जिस पंक्ति से आरम्भ होती है, वह वन्दना है, और वन्दना में जो चुनाव किया गया है वही इस पूरे प्रसंग का उत्तर है। शिव पहले उस तत्त्व का वर्णन करते हैं जिसके बिना जाने झूठ भी सच जान पड़ता है, जैसे बिना पहचाने रस्सी में साँप दीख जाता है, और जिसके जान लेने पर संसार वैसे ही लुप्त हो जाता है जैसे जागने पर स्वप्न का भ्रम। रस्सी और साँप, नींद और जागना। शुद्ध वेदान्त की दो उपमाएँ, और वे उस कण्ठ से आ रही हैं जो अभी मनुष्य राम का पक्ष लेनेवाला है।

और फिर पंक्ति मुड़ती है। उसी राम के बालरूप की मैं वन्दना करता हूँ, वे कहते हैं। उसी शब्द पर सारा भार है। जिसे अभी अभी संसार का आधार कहा गया, उसी को अब एक बालक के रूप में प्रणाम किया जा रहा है। और अन्तिम पंक्ति उस बालक को एक जगह भी दे देती है, दशरथ का आँगन। जो सिद्ध करना था वह इन दो पंक्तियों के पास पास रख दिये जाने से ही सिद्ध हो जाता है, बहस का एक शब्द बोले जाने से पहले।

बंदउँ बालरूप सोइ रामू । सब सिधि सुलभ जपत जिसु नामू॥
मंगल भवन अमंगल हारी । द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥

चौपाई २

मंगल भवन अमंगल हारी। यह पंक्ति इस पुस्तक की सबसे अधिक दुहरायी जानेवाली पंक्तियों में है, और इसका कारण इसके भीतर ही है। इसमें कुछ माँगा नहीं गया, केवल एक क्रिया रखी गयी है, द्रवउ, कि वे पिघलें। और जिस पर पिघलना है उसका परिचय कोई उपाधि नहीं है, वह एक दृश्य है, आँगन में खेलता हुआ बच्चा। इससे पहले वाली पंक्ति भी ध्यान खींचती है, क्योंकि उसमें सिद्धियाँ तप से नहीं, नाम जपने से सुलभ बतायी गयी हैं। स्तुति भी वहीं ठहरती है जहाँ कोई सचमुच पहुँच सकता है।

वन्दना के बाद शिव राम को प्रणाम करते हैं और तब पार्वती की ओर मुड़ते हैं, और उनका पहला वाक्य प्रश्न का उत्तर नहीं, प्रश्न करनेवाली की प्रशंसा है। धन्य हैं, धन्य हैं गिरिराजकुमारी, उनके समान कोई उपकारी नहीं। यह अटपटा लग सकता है, क्योंकि प्रश्न तो उन्होंने अपने लिये पूछा था। पर शिव उसमें कुछ और देख रहे हैं, और वह कारण भी बता देते हैं। रघुवीर के चरणों में उनका अनुराग है, और प्रश्न उन्होंने जगत के हित के लिये किये हैं। जो कथा उन्होंने माँगी है, वह सब लोकों के लिये गंगा है।

और फिर वह वाक्य आता है जो इस पूरी बातचीत की बुनियाद बदल देता है।

राम कृपा तें पारबति सपनेहुँ तव मन माहिं।
सोक मोह संदेह भ्रम मम बिचार कछु नाहिं॥ ११२॥

दोहा ११२

यानी उत्तर देनेवाला पहले यह कह रहा है कि जिस शंका का उत्तर वह देने जा रहा है, वह शंका पूछनेवाली के मन में है ही नहीं। और अगली ही पंक्ति इस बात को पूरा कर देती है, कि फिर भी वही शंका इसलिये की गयी कि इस प्रसंग के कहने और सुनने से सबका कल्याण हो। इस तरह यह पूरा प्रसंग अपने ही मुँह से कह देता है कि वह किसके लिये रचा गया है। कैलास पर जो बातचीत हो रही है, उसका असली श्रोता वहाँ बैठा हुआ नहीं है।

और दोहे की पहली ही बात भी छोड़ने लायक़ नहीं है। राम कृपा तें। शोक, मोह, सन्देह और भ्रम का न होना भी पार्वती के खाते में नहीं डाला जाता। निर्मलता भी कृपा है। इस पन्ने पर शिव जो कुछ भी किसी के पक्ष में कहेंगे, हर बार उसका श्रेय उसी एक जगह लौटाते जायेंगे, और यह आदत यहीं से शुरू होती है।

सार: शिव पहले उस तत्त्व की वन्दना करते हैं जिसके बिना जाने झूठ सच लगता है, और उसी को बालरूप में प्रणाम करते हैं। फिर वे पार्वती को धन्य कहते हैं, उनके प्रश्न को जगत का उपकार बताते हैं, और यह भी कहते हैं कि उनके मन में स्वप्न में भी सन्देह नहीं, शंका कहने और सुननेवालों के हित के लिये की गयी है।

जिन्होंने यह कथा नहीं सुनी

अब एक हिस्सा आता है जिसे बहुत से पाठक प्रशंसा समझकर तेज़ी से पार कर जाते हैं। वह प्रशंसा नहीं है। वह अंगों की एक सूची है, और हर अंग के लिये एक अलग उपमा चुनी गयी है। जिन्होंने कानों से हरिकथा नहीं सुनी, उनके कानों के छिद्र साँप के बिल के समान हैं। जिन्होंने नेत्रों से संतों के दर्शन नहीं किये, उनके नेत्र मोर के पंख पर दीखनेवाली उन नक़ली आँखों की गिनती में हैं। जो सिर हरि और गुरु के चरणतल पर नहीं झुकते, वे कड़वी तूँबी के समान हैं।

और अब देखिये कि हर उपमा अपने अंग के लिये ही क्यों बनी है। कान के लिये बिल चुना गया, क्योंकि कान भी एक छिद्र है, और अन्तर केवल यह है कि उसमें क्या रहता है। आँख के लिये मोरपंख की आँख चुनी गयी, क्योंकि वह चीज़ आँख के आकार की है और देखती कुछ नहीं। सिर के लिये तूँबी चुनी गयी, जो गोल है, खोखली है, सिर जैसी दीखती है, और ऊपर से कड़वी भी है। खालीपन के साथ कड़वाहट जोड़ दी गयी है, क्योंकि जो सिर झुकता नहीं वह केवल खाली नहीं रहता, वह चुभता भी है।

फिर हृदय और जीभ। जिन्होंने हरिभक्ति को हृदय में स्थान नहीं दिया, वे जीते हुए ही मुर्दे के समान हैं। और जो जीभ राम के गुण नहीं गाती, वह मेढक की जीभ के समान है। इस अन्तिम उपमा में एक तीखापन है जो जल्दी में छूट जाता है। मेढक चुप नहीं रहता। वह रात भर बोलता है, और उसके बोलने से कुछ नहीं बनता। यानी आरोप मौन का नहीं है, शोर का है।

और अन्त में छाती की बारी आती है। जो हरि का चरित्र सुनकर हर्षित नहीं होती, वह छाती वज्र के समान कड़ी और निष्ठुर है। हमारी प्रति में यह पंक्ति टूटी हुई छपी है, इसलिये उसे यहाँ ज्यों का त्यों नहीं रखा गया, केवल उसका अर्थ रखा गया है। और उसके तुरन्त बाद शिव पार्वती को पुकारकर कहते हैं कि राम की लीला सुनें, जो देवताओं का हित करनेवाली और दैत्यों को मोहित करनेवाली है। एक ही लीला, दो विपरीत असर। लीला बदलती नहीं, सुननेवाला बदलता है।

रामकथा सुरधेनु सम सेवत सब सुख दानि।
सतसमाज सुरलोक सब को न सुनै अस जानि॥ ११३॥

दोहा ११३

सुरधेनु, यानी कामधेनु। ध्यान दीजिये कि दोहे में सेवत शब्द रखा गया है। कामधेनु माँगने से नहीं, सेवा करने से देती है, और कथा के साथ भी वही शर्त है। सुन लेना अलग बात है, सेवा करना अलग। और दोहे का दूसरा आधा तो भूगोल ही बदल देता है, कि सत्पुरुषों का समाज ही सब देवलोक है। जिसे पाने के लिये ऊपर जाना पड़ता था, वह एक सभा में बैठने से मिल जाता है। इसीलिये अन्त में प्रश्न पूछा जा सकता है कि ऐसा जानकर कौन न सुनेगा।

इसके आगे दो और उपमाएँ आती हैं, और हमारी प्रति में उनकी पंक्तियाँ आपस में उलट गयी हैं, इसलिये उन्हें भी केवल अर्थ के रूप में रखना ठीक है। रामकथा हाथ की वह सुन्दर ताली है जो सन्देह रूपी पक्षियों को उड़ा देती है, और रामकथा कलियुग रूपी वृक्ष को काटने की कुल्हाड़ी है। दोनों चीज़ें छोटी हैं और हाथ में आ जानेवाली हैं, एक ताली और एक कुल्हाड़ी। और यह दूसरी बार है कि थोड़ी सी पंक्तियों के भीतर सन्देह को ऐसी चीज़ माना गया है जिसे उड़ाया जाता है, समझाया नहीं जाता।

सार: शिव कहते हैं कि जो कान हरिकथा नहीं सुनते वे साँप के बिल हैं, जो नेत्र संतों को नहीं देखते वे मोरपंख की नक़ली आँखें हैं, जो सिर नहीं झुकता वह कड़वी तूँबी है और जो जीभ राम के गुण नहीं गाती वह मेढक की जीभ है। फिर वे रामकथा को कामधेनु बताते हैं और कहते हैं कि सत्संग ही सारे देवलोक हैं।

एक बात जो अच्छी नहीं लगी

प्रशंसा हो चुकी, महिमा कही जा चुकी, और अब शिव उस प्रश्न में से एक बात अलग निकालते हैं। पर उससे पहले वे अपने ऊपर एक सीमा बाँध देते हैं। जैसा मैंने सुना है और जैसी मेरी बुद्धि है, वैसा कहूँगा। इस पूरी पुस्तक का वक्ता अपना पहला वाक्य अपनी सीमा बताने में लगाता है। वह यह नहीं कह रहा कि वह जानता है। वह कह रहा है कि उसने सुना है, और आगे जो कुछ आयेगा वह दुहराया हुआ है, नया गढ़ा हुआ नहीं।

और फिर वे बात कहते हैं, और कहने के ढंग में सारा स्नेह बचा रहता है। एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी, वे कहते हैं, यद्यपि वह मोह के वश होकर ही कही गयी है। दोष का नाम लेने से पहले ही उसका बहाना दे दिया गया है। और दोष क्या है, यह अगली आधी पंक्ति में खुलता है।

एक बात नहिं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी॥
तुम्ह जो कहा राम कोउ आना । जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना॥

चौपाई ३

यही इस पूरे प्रसंग की गाँठ है, और इसे ठीक ठीक पकड़ लेना चाहिये। बहस इस पर नहीं है कि राम ईश्वर हैं या नहीं। बहस इस पर है कि वेदों के गाये हुए राम और अयोध्या के राम दो हैं या एक। जिसने यह कहा कि वे राम कोई और हैं, उसने ईश्वर को अस्वीकार नहीं किया, उसने उसे दो टुकड़ों में बाँट दिया, और शिव को वही टूटन खटकती है।

इसके बाद जो आता है वह इस पन्ने पर शिव का सबसे कठोर हिस्सा है, और वह पार्वती की ओर नहीं, उन लोगों की ओर है जो यह बात जानबूझकर कहते हैं। मोह रूपी पिशाच के ग्रसे हुए, पाखण्डी, भगवान के चरणों से विमुख, जो झूठ और सच में अन्तर नहीं जानते। अज्ञानी, मूर्ख, अंधे, भाग्यहीन, जिनके मन रूपी दर्पण पर विषय की काई जम गयी है। व्यभिचारी, छली, बड़े कुटिल, जिन्होंने स्वप्न में भी संतसमाज नहीं देखा।

पर इस पूरी झड़ी में सबसे बेधनेवाला वाक्य गाली नहीं है। वह यह है कि ऐसी बातें वे कहते हैं जिन्हें अपनी लाभ हानि नहीं सूझती। शिव उन्हें दुष्ट नहीं कहते, वे उन्हें हिसाब में कच्चा कहते हैं। उनका नुक़सान यह नहीं कि वे किसी का बुरा कर रहे हैं, उनका नुक़सान यह है कि वे अपना ही घाटा नहीं देख पा रहे। और जिनका दर्पण मैला हो और जिनके पास आँखें ही न हों, वे बेचारे राम का रूप देखें तो कैसे।

और फिर शिव बहस से बाहर निकल आते हैं, और यह इस हिस्से की सबसे व्यावहारिक सलाह है। जिन्हें वायु का रोग हो गया हो, जो भूत के वश हों, जो नशे में चूर हों, वे विचारकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने महामोह की मदिरा पी रखी है, उनके कहने पर कान नहीं देना चाहिये। यहाँ यह नहीं कहा गया कि उन्हें उत्तर दो और हरा दो। यहाँ कहा गया है कि सुनो ही मत। जो बात नशे से निकली है, उसका खण्डन भी उसी नशे को मान्यता दे देता है।

और यह सब कहकर वे उसी क्षण फिर उसी कोमलता से अपनी सुननेवाली की ओर लौट आते हैं।

अस निज हृदयँ बिचारि तजु संसय भजु राम पद।
सुनु गिरिराज कुमारि भ्रम तम रबि कर बचन मम॥ ११५॥

सोरठा ११५

इस सोरठे में दो आज्ञाएँ हैं और उनका क्रम मायने रखता है। पहले संशय छोड़ना, फिर चरणों को भजना। ख़ाली हुए बिना भरा नहीं जाता। और अपने वचनों के लिये उन्होंने जो उपमा चुनी है वह भी देखने लायक़ है। दीपक नहीं, सूर्य की किरणें। दीपक अन्धकार से लड़ता हुआ जान पड़ता है, किरण लड़ती नहीं। वह आती है और अन्धकार का कोई अवशेष नहीं बचता।

सार: शिव अपनी बात को सुनी हुई बताकर आरम्भ करते हैं, फिर कहते हैं कि एक बात उन्हें अच्छी नहीं लगी, कि वेदों के राम कोई और हैं। ऐसा कहनेवालों को वे मोहग्रस्त, पाखण्डी और अपनी लाभ हानि न समझनेवाला बताते हैं, और सलाह देते हैं कि उनकी बात पर कान न दिया जाये। फिर वे पार्वती से संशय छोड़कर राम के चरण भजने को कहते हैं।

सगुण और निर्गुण में भेद नहीं

अब आख़िर वह उत्तर आता है जो पार्वती ने सबसे पहले माँगा था, कि निर्गुण ब्रह्म सगुण रूप क्यों धारण करता है। और उत्तर से पहले उसकी भूमिका रखी जाती है, कि सगुण और निर्गुण में भेद है ही नहीं, और यह बात शिव अपने अधिकार से नहीं कहते। वे चार गवाह गिनाते हैं, मुनि, पुराण, पण्डित और वेद।

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा॥
अगुन अरूप अलख अज जोई । भगत प्रेम बस सगुन सो होई॥

चौपाई ४

और इसी चौपाई के दूसरे आधे में वह कारण रख दिया गया है जिसके लिये पूरा प्रश्न पूछा गया था। जो निर्गुण है, अरूप है, अलख है, अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेम के वश सगुण हो जाता है। ध्यान दीजिये कि कारण क्या नहीं बताया गया। न संसार की आवश्यकता, न दैत्यों का अत्याचार, न कोई प्रतिज्ञा। कारण एक ही है, और वह उसके बाहर है, किसी और के भीतर है। चार निषेधों से जिसका परिचय दिया गया, वह एक अकेली सकारात्मक चीज़ के वश में आ जाता है।

और फिर उपमा आती है, कि जैसे जल और ओला अलग नहीं हैं। यह उपमा जितनी सीधी दीखती है उतनी है नहीं। कहा जा सकता था जल और घड़ा, या जल और लहर। ओला इसलिये चुना गया कि ओला वह जल है जिसने आकार ले लिया है, वज़न ले लिया है, धार ले ली है, और फिर भी जल होना नहीं छोड़ा। और इसलिये भी कि ओला पिघल जायेगा और पीछे कुछ बचेगा नहीं, कोई दूसरी वस्तु शेष नहीं रहेगी। जिसका नाम ही भ्रम रूपी अन्धकार के लिये सूर्य है, उसके विषय में मोह की बात उठे तो कैसे उठे।

राम सच्चिदानंद दिनेसा । नहिं तहँ मोह निसा लवलेसा॥
सहज प्रकासरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि बिग्यान बिहाना॥

चौपाई ५

यह चौपाई इस पूरे प्रसंग की सबसे कसी हुई चीज़ है, और उसका असली वार दूसरी पंक्ति में है। पहली पंक्ति वही कहती है जिसकी आशा थी, कि राम सच्चिदानन्द के सूर्य हैं और वहाँ मोह रूपी रात्रि का लवलेश भी नहीं। पर दूसरी पंक्ति यह जोड़ देती है कि वहाँ विज्ञान रूपी प्रातःकाल भी नहीं होता। सवेरा तभी सवेरा है जब उससे पहले रात रही हो। जहाँ रात कभी हुई ही नहीं, वहाँ सुबह भी नहीं हो सकती। यानी यह कहना भी उतनी ही बड़ी भूल है कि उन्हें ज्ञान हुआ, जितनी बड़ी यह कहना कि उन्हें मोह हुआ। तुलसीदास दोनों बातों से एक साथ इनकार कर देते हैं, और यह इनकार एक ही आधी पंक्ति में समा जाता है।

इसके बाद एक सूची आती है जो चीज़ों को उनकी जगह पर रखती है। हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंता और अभिमान, ये सब जीव के धर्म हैं। ध्यान दीजिये कि ज्ञान और अज्ञान एक ही सूची में साथ साथ रखे गये हैं। दोनों उसी के होते हैं जिसमें उनकी कमी सम्भव है। और इस सूची के ठीक सामने राम को रखा जाता है, व्यापक ब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, परात्पर, पुराण।

पुरुष प्रसिद्ध प्रकास निधि प्रगट परावर नाथ।
रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ कहि सिवँ नायउ माथ॥ ११६॥

दोहा ११६

और इस दोहे का अन्तिम चौथाई वह है जिसे कोई सारांश छोड़ नहीं सकता। मेरे स्वामी, ऐसा कहकर शिव ने मस्तक नवाया। वे अपने ही प्रवचन के बीच में हैं, अपनी पत्नी से बात कर रहे हैं, कोई सभा नहीं है, कोई देखनेवाला नहीं है, और वे रुककर सिर झुका देते हैं। जो प्रमाण वे दे रहे हैं वह तर्क नहीं है, और यहाँ वह बात छिप नहीं पाती। इस पन्ने पर पहले भी वे राम को प्रणाम कर चुके हैं, और उस बार वह वन्दना थी। इस बार यह वाक्य के बीच में आया हुआ प्रणाम है, और इसीलिये अधिक बोलता है।

सार: शिव कहते हैं कि सगुण और निर्गुण में भेद नहीं, और निर्गुण भक्तों के प्रेम के वश सगुण होता है, जैसे जल और ओले में भेद नहीं। राम सच्चिदानन्द के सूर्य हैं, जहाँ न मोह की रात है न विज्ञान का सवेरा। हर्ष, शोक, ज्ञान और अज्ञान जीव के धर्म हैं, और इतना कहकर शिव उनको मस्तक नवाते हैं।

आँख पर उँगली

यदि राम वही हैं, तो लोगों को उनमें मोह क्यों दीखता है। शिव का उत्तर राम के विषय में है ही नहीं। अज्ञानी अपने भ्रम को समझते नहीं, वे कहते हैं, और वे जड़ प्राणी उसे प्रभु पर आरोपित कर देते हैं। जिस त्रुटि की जगह देखनेवाले की आँख है, उसे देखी जानेवाली वस्तु के खाते में डाल दिया जाता है।

और फिर तीन चित्र आते हैं, और वे बढ़ते हुए क्रम में रखे गये हैं। पहला बादल का है। आकाश में बादलों का परदा देखकर कुविचारी कहते हैं कि सूर्य ढक गया। सूर्य ढका नहीं है, पर इस भूल में एक बात फिर भी सच है, कि बादल सचमुच है और सचमुच बीच में है। दूसरा चित्र इस सहारे को भी छीन लेता है।

जो आँख में उँगली लगाकर देखता है, उसके लिये दो चन्द्रमा प्रकट हैं। प्रकट, यानी सामने, साफ़, प्रत्यक्ष। यहाँ बीच में कुछ भी नहीं है। जो दूसरा चन्द्रमा दिखायी दे रहा है, उसे अपने ही हाथ के दबाव ने बनाया है, और वह उतना ही स्पष्ट दीखता है जितना असली। पहले चित्र में कारण बाहर था, दूसरे में वह देखनेवाले के हाथ पर आ गया है।

और तीसरा चित्र सबसे निर्मम है। राम के विषय में मोह की कल्पना करना ऐसा ही है जैसा आकाश में अन्धकार, धूएँ और धूल का शोभा पाना। टीका इसे खोलकर कहती है कि आकाश निर्मल और निर्लेप है, उसे कोई मैला नहीं कर सकता। और इस चित्र की बारीकी यह है कि यहाँ तीनों चीज़ें, अँधेरा, धुआँ और धूल, सचमुच हैं और दीखती भी हैं। वे झूठ नहीं हैं। पर जिस पर वे दीखती हैं, उस पर उनका एक निशान नहीं बैठता।

इसके बाद एक छोटा सा तर्क आता है जो यह समझाता है कि कोई चीज़ जानी कैसे जाती है। विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीवात्मा, ये सब एक के सहारे एक चेतन होते हैं। और इन सबका जो परम प्रकाशक है, वही अनादि अवधपति है। जगत प्रकाश्य है और राम प्रकाशक। और फिर वह पंक्ति आती है जो माया को ठीक उतना ही दर्जा देती है जितना उसका है, कि जिनकी सत्ता से जड़ माया भी सत्य सी भासित होती है। माया के पास अपना सच नहीं है। जो थोड़ा सा सच उसमें दीखता है, वह उधार का है।

फिर दोहा दो उदाहरण देता है और दोनों रोज़ के हैं, सीप में चाँदी और सूर्य की किरणों में पानी। दोनों तीनों कालों में झूठ हैं और फिर भी उस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता। यहाँ यह नहीं कहा गया कि जानकारी से भ्रम मिट जाता है। कहा यह गया है कि जानकर भी वह दीखता रहता है।

और इसके तुरन्त बाद वह पंक्ति आती है जो इस पूरे पन्ने को किसी दुखी आदमी के काम की बना देती है। यदि स्वप्न में कोई सिर काट ले, तो बिना जागे वह दुख दूर नहीं होता। ध्यान दीजिये कि यहाँ यह नहीं कहा जा रहा कि संसार झूठा है इसलिये दुख भी झूठा है और इसलिये सहा जा सकता है। कहा यह जा रहा है कि संसार झूठा है और दुख फिर भी पूरा है, और उससे निकलने का एक ही रास्ता है, जागना। झूठ होने से पीड़ा में एक कण की भी कमी नहीं आती।

और जगानेवाला कौन है, यह भी उसी साँस में कह दिया जाता है। जिनकी कृपा से ऐसा भ्रम मिट जाता है, हे गिरिजा, वही कृपालु रघुनाथ हैं। और फिर वेदों का अपना वर्णन आता है, जिसे टीका के अनुसार वेदों ने अपनी बुद्धि से अनुमान करके गाया है, यानी नापकर नहीं, अटकल से।

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥
आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥

चौपाई ६

बिना पैर के चलता है, बिना कान के सुनता है, बिना हाथ के नाना काम करता है, बिना मुँह के सारे रस भोगता है, बिना वाणी के बड़ा वक्ता है। और आगे की चौपाई इसे पूरा करती है, कि बिना शरीर के स्पर्श करता है, बिना आँख के देखता है, बिना नाक के सब गन्ध ग्रहण करता है। आठ इन्द्रियाँ छीन ली गयीं और आठों काम बचे रहे। यह सूची अभाव की सूची नहीं है। यह उस बात की सूची है कि काम अपने औज़ार का मोहताज नहीं है, और औज़ार हट जाने पर भी काम ज्यों का त्यों रहता है।

और अब वह दोहा आता है जिसके लिये ये सारी पंक्तियाँ खर्च की गयी थीं।

जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान।
सोइ दसरथ सुत भगत हित कोसलपति भगवान॥ ११८॥

दोहा ११८

चार पंक्तियों तक एक एक अंग छीना गया, फिर वेदों की अटकल का हवाला दिया गया, मुनियों का ध्यान गिनाया गया, और उसके बाद उत्तर आता है, सोइ दसरथ सुत। पूरा प्रमाण तीन शब्दों में निपट जाता है, और तीनों शब्द इस पुस्तक के सबसे सादे शब्दों में से हैं। एक नाम, और उसके साथ बाप का नाम। जो कुछ इतनी दूर से लाया गया था, वह घर के पते पर आकर रुक जाता है।

सार: शिव कहते हैं कि मोह प्रभु में नहीं, देखनेवाले में है, जैसे बादल से सूर्य ढका नहीं जाता और आँख दबाने से दो चन्द्रमा दीखते हैं। संसार सीप की चाँदी की तरह झूठा है, पर स्वप्न में कटे सिर की तरह दुख देता है, और जागना कृपा से होता है। वेद जिसका वर्णन बिना अंगों के करते हैं, वही दशरथ के पुत्र हैं।

काशी की गवाही

अब शिव तर्क छोड़ देते हैं और गवाही देने लगते हैं, और गवाही उनके अपने काम की है। यह पूरे पन्ने पर एकमात्र जगह है जहाँ वे अपने विषय में कुछ कहते हैं, और जो कहते हैं वह बहुत सावधानी से कहते हैं।

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी॥
सोइ प्रभु मोर चराचर स्वामी। रघुबर सब उर अंतरजामी॥

चौपाई ७

अपनी नगरी में, हर रोज़, वे मरते हुए प्राणी के लिये एक काम करते हैं, और वह काम उसी नाम से होता है। पर ध्यान दीजिये कि उन्होंने वाक्य कैसे बनाया है। वे यह नहीं कहते कि मैं शोकरहित कर देता हूँ। वे कहते हैं कि जिनके नाम के बल से मैं ऐसा कर देता हूँ। अपने विषय में जो सबसे बड़ी बात वे जानते हैं, उसे भी वे उधार की बतलाते हैं, और उसी साँस में उन्हें अपना स्वामी, चराचर का स्वामी और सबके हृदय का अन्तर्यामी कह देते हैं।

और फिर उस नाम का एक ऐसा हिसाब आता है जिसमें कोई छूटता नहीं। विवश होकर, बिना इच्छा के भी, जिनका नाम लेने से अनेक जन्मों के पाप जल जाते हैं। और जो आदरपूर्वक स्मरण करते हैं, वे संसार रूपी समुद्र को गाय के खुर से बने गड्ढे के समान पार कर जाते हैं। दोनों बराबर नहीं हैं, यह साफ़ है। पर दोनों काम करते हैं, और यह उससे भी अधिक साफ़ है। जो अनजाने में हुआ, वह भी व्यर्थ नहीं गया।

और तब चेतावनी आती है, और वह दण्ड की भाषा में नहीं, घाटे की भाषा में है। वही परमात्मा राम हैं, वे कहते हैं, उनमें भ्रम बताना अत्यन्त अनुचित है, और ऐसा सन्देह मन में लाते ही ज्ञान, वैराग्य और सारे सद्गुण चले जाते हैं। कोई सज़ा नहीं दी जाती। जो पहले से कमाया हुआ था, वह घट जाता है। इस पूरे प्रसंग में शिव एक बार भी किसी को डराते नहीं, वे हर बार हिसाब दिखाते हैं।

और इन वचनों का असर एक ही पंक्ति में बता दिया जाता है, कि शिव के भ्रम भंजन वचनों को सुनकर सारे कुतर्कों की रचना मिट गयी। रचना शब्द ध्यान खींचता है। कुतर्क कोई अकेला वाक्य नहीं था, वह एक बना हुआ ढाँचा था, जिसमें कड़ियाँ थीं और जोड़ थे। और उसकी जगह जो आया वह भी दो चीज़ें हैं, और उनका क्रम ध्यान देने लायक़ है। पहले चरणों में प्रीति, फिर प्रतीति। प्रेम पहले आता है, विश्वास उसके पीछे। और जिसे टीका कठिन असम्भावना कहती है, वह बीत गयी।

सार: शिव अपनी गवाही देते हैं कि काशी में मरते हुए प्राणी को वे उसी नाम के बल से शोकरहित करते हैं। विवश होकर लिया हुआ नाम भी अनेक जन्मों के पाप जलाता है और आदर से लिया हुआ भवसागर पार करा देता है। उनके वचनों से पार्वती के कुतर्कों की रचना मिट जाती है और चरणों में प्रीति और प्रतीति हो जाती है।

और फिर वही प्रश्न, जिससे सब शुरू हुआ था

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि।
बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि॥ ११९॥

दोहा ११९

पुनि पुनि, यानी बार बार चरण पकड़कर। और हाथ जोड़कर। और तुलसीदास जो उपमा देते हैं उसमें भी एक सावधानी रखी हुई है, कि वे वचन मानो प्रेम रस में सानकर निकले। मानो शब्द हटाया नहीं गया है। जिस पन्ने पर इतनी देर से यह समझाया जा रहा था कि दीखना और होना अलग चीज़ें हैं, उसी पन्ने पर प्रशंसा भी बिना शर्त नहीं की जाती।

और पार्वती का उत्तर एक तुलना से शुरू होता है। उनकी वाणी चन्द्रमा की किरणों के समान थी, और जो उससे मिटा वह एक ताप था, मोह रूपी शरद की धूप का भारी ताप। शरद का चुनाव सजावट नहीं है। वह साल की सबसे कष्टदायक धूप मानी जाती है, क्योंकि वह वर्षा के बाद आती है, जब कोई उसकी आशा नहीं करता और कोई उसके लिये तैयार नहीं होता। भ्रम के लिये इससे ठीक कोई मौसम नहीं हो सकता था।

और वे यह भी बता देती हैं कि भीतर क्या बदला। राम का स्वरूप मुझे जान पड़ गया, वे कहती हैं। यह वाक्य विश्वास का नहीं है, जान लेने का है। फिर वे कहती हैं कि नाथ की कृपा से विषाद जाता रहा और चरणों के प्रसाद से वे सुखी हो गयीं। और फिर वे अपने को किंकरी कहती हैं और स्वभाव से जड़ और अनजान स्त्री कहती हैं, यानी ठीक उसी ज़मीन पर लौट आती हैं जहाँ से यह पन्ना शुरू हुआ था। पर अन्तर यह है कि उस बार वह वाक्य क्षमा माँगने में समाप्त हुआ था, और इस बार वह एक माँग में समाप्त होता है।

क्योंकि उनका काम पूरा नहीं हुआ है। जो मैंने पहले पूछा था, वही कहिये, वे कहती हैं, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं। अब तक जो कुछ हुआ है उसने यह तय किया है कि राम कौन हैं, कि वे ब्रह्म हैं, चिन्मय हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित हैं और सबके हृदय रूपी नगर में बसते हैं। पहला प्रश्न इसका दूसरा आधा था, और वह अब भी ज्यों का त्यों खड़ा है।

नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू । मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू॥
उमा बचन सुनि परम बिनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता॥

चौपाई ८

केहि हेतू। किस कारण से। यह पन्ना उसी प्रश्न पर समाप्त होता है जिस पर वह शुरू हुआ था, और वह प्रश्न अब भी बिना उत्तर के खड़ा है। जो सबसे पहले पूछा गया था, वही सबसे अन्त में फिर पूछा जाता है, और इससे यह पूरी बातचीत एक घेरा बन जाती है। बीच में जो कुछ हुआ, वह उत्तर नहीं था। वह उस ज़मीन की सफ़ाई थी जिस पर अब उत्तर रखा जायेगा, क्योंकि जब तक यह तय न हो जाता कि राम एक ही हैं, तब तक यह पूछने का कोई अर्थ ही नहीं था कि उन्होंने शरीर क्यों धारण किया।

और इस प्रश्न को सुनकर शिव प्रसन्न होते हैं। दोहा यह भी बता देता है कि वे बहुत प्रकार से पार्वती की बड़ाई करते हैं और फिर बोलते हैं। पर उस दोहे में जो नाम उनके लिये चुना गया है, उस पर एक क्षण रुकना चाहिये। कामारि, यानी कामदेव का शत्रु। अभी जो प्रश्न पूछा गया है वह शरीर धारण करने के विषय में है, और उत्तर देनेवाले का परिचय उस नाम से कराया जा रहा है जिसने काम को भस्म कर दिया था। शरीर के बारे में पूछने का सबसे ऊँचा अधिकार उसी के पास है।

और ठीक यहीं, इसी दोहे पर, पाठ का विश्राम पड़ता है। इस पुस्तक के साथ पढ़ने के दो क्रम चले आये हैं, एक नौ दिन का और एक महीने भर का, और दोनों के विराम यहीं आकर मिलते हैं, नवाह्नपारायण का पहला विश्राम और मासपारायण का चौथा। यानी ठहराव उत्तर के बाद नहीं रखा गया, उत्तर से पहले रखा गया है, ठीक उस जगह जहाँ सन्देह समाप्त हो चुका है और कथा अभी शुरू नहीं हुई है।

सुनु सुभ कथा भवानि रामचरितमानस बिमल।
कहा भुसुंडि बखानि सुना बिहग नायक गरुड़॥ १२० (ख)॥

सोरठा १२० (ख)

और इसी सोरठे में वह ढाँचा खुल जाता है जिसके भीतर हम अब तक बैठे हुए थे। यह कथा काकभुशुण्डि ने विस्तार से कही थी और पक्षियों के राजा गरुड़ ने सुनी थी। शिव आगे के दो सोरठों में यह भी कह देते हैं कि वह श्रेष्ठ संवाद किस प्रकार हुआ, यह वे आगे कहेंगे, और अभी अवतार का चरित्र सुना जाये। यानी जिस पुस्तक को हम पढ़ रहे हैं, वह यहाँ अपने मुँह से कह देती है कि वह दुहरायी हुई है। कहनेवाले शिव हैं, पहले कहनेवाले एक कौआ थे, और सुननेवाले एक पक्षी। और अन्तिम सोरठे में शिव एक बार फिर अपना नाप बता देते हैं, कि हरि के गुण, नाम, कथा और रूप अपार और अगणित हैं, और वे अपनी बुद्धि के अनुसार कहेंगे।

सार: पार्वती बार बार चरण पकड़कर कहती हैं कि उनका मोह मिट गया और राम का स्वरूप जान पड़ गया। फिर वे अपना पहला प्रश्न दुहराती हैं, कि राम ने मनुष्य का शरीर किस कारण धारण किया। शिव हर्षित होकर उनकी बड़ाई करते हैं, और यहीं दोनों पारायणों का विश्राम पड़ता है, जहाँ काकभुशुण्डि और गरुड़ के संवाद का नाम पहली बार खुलता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस पूरे प्रसंग को एक साथ रखकर देखें तो सबसे ऊपर जो बात रह जाती है, वह यह है कि यहाँ राम एक बार भी नहीं आते। न कोई दृश्य, न कोई संवाद, न कोई कर्म। वे केवल कहे जाते हैं। ग्यारह दोहों के इस हिस्से में जिसके विषय में इतना कुछ तय किया जा रहा है, वह एक बार भी मंच पर नहीं आता, और दशरथ का नाम भी दो ही बार आता है, दोनों बार किसी और का परिचय बनकर, एक बार आँगन के रूप में और एक बार पिता के रूप में। बालकाण्ड का यह हिस्सा पूरी तरह दो लोगों की बातचीत है, और उसकी सारी शक्ति इसी में है कि वह बातचीत ही रहती है।

दूसरी बात उस क्रम की है जिससे यह उत्तर बनाया गया। शिव ने पहले वेदान्त नहीं कहा। उन्होंने पहले एक बालक को प्रणाम किया, फिर एक स्त्री को धन्य कहा, फिर कानों, आँखों और जीभ की बात की, और उसके बहुत बाद जाकर निर्गुण और सगुण की चर्चा की। और जब सारा दर्शन कह चुके, तो अन्त में गवाही अपनी नगरी से दी, कि वहाँ मरते हुए प्राणी के साथ वे रोज़ क्या करते हैं। ऊपर की बात नीचे उतरकर काम की जगह पर आकर ही ठहरती है।

और तीसरी बात उस अधिकार की है जिससे यह पन्ना शुरू हुआ था। पहली चौपाई में अधिकार न होने की बात कही गयी थी, और उसी चौपाई में यह भी कि आर्त अधिकारी से कुछ नहीं छिपाया जाता। उसके बाद जो कुछ मिला, वह किसी योग्यता के बदले नहीं मिला। सुनने का अधिकार अन्त तक पीड़ा से ही बना रहा, और जब सब समझ में आ गया, तब भी पूछनेवाली ने अपने को दासी ही कहा। जो द्वार खुला, वह विद्या से नहीं खुला था, इसलिये विद्या आ जाने पर भी बन्द नहीं हुआ।

और अन्त में वह बात, जो इस प्रसंग को आगे के सातों काण्डों से जोड़ देती है। यहाँ जो प्रश्न अनुत्तरित छोड़ा गया है, वह कथा का प्रश्न नहीं है। कोई यह नहीं पूछ रहा कि आगे क्या हुआ। पूछा यह जा रहा है कि हुआ ही क्यों। और इसीलिये इसके बाद जो कुछ भी आता है, जन्म, बाललीला, विवाह, वनवास, युद्ध और राज्य, वह सब एक उत्तर की तरह आता है, कहानी की तरह नहीं। जिसने यह पन्ना पढ़ लिया, वह आगे का रामचरितमानस उसी तरह पढ़ेगा जैसे कोई किसी प्रश्न का उत्तर पढ़ता है, और शायद तुलसीदास यही चाहते भी थे।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ११० से १२०, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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