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बाल-लीला और कौसल्या को विराट दर्शन

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 23

गोद में बालक की हँसी, हर रोम में असंख्य ब्रह्माण्डों का दर्शन। और फिर उसी घर के आँगन में दही-भात सने मुख से निकलती किलकारी।

कौसल्या कभी बालक को गोद में हिलाती हैं, कभी पालने में झुलाती हैं। प्रेम में मग्न उन्हें रात और दिन का बीतना पता नहीं चलता। एक दिन वे पुत्र को सुलाकर पूजा करने जाती हैं, नैवेद्य चढ़ाती हैं। लौटकर वे देखती हैं कि वही पुत्र वहाँ भोजन कर रहा है। पालने के पास जाती हैं, तो वह वहाँ भी सोया है।

तुलसीदास के रामचरितमानस के इस प्रसंग में बालक राम प्रेम और भक्ति के वश कौसल्या की गोद में हैं। गुरु चारों पुत्रों को वेद का तत्त्व बताते हैं, और माताएँ दोनों जोड़ियों की शोभा देखकर तृण तोड़ती हैं। फिर कथा आगे बढ़ती है: चारों भाइयों का बढ़ना, संस्कार, भोजन के लिये बुलाने पर बालक का भागना, गुरु के घर पढ़ाई और अयोध्या की गलियों में खेल।

कौसल्या के आँगन में

  • राम कौसल्या की गोद में हैं, माता को अपना अखण्ड रूप दिखाते हैं और भाइयों के साथ बाललीला करते हैं।
  • कौसल्या प्रेम में मग्न माता। वे दो स्थानों पर पुत्र को देखकर विस्मित होती हैं और दर्शन के बाद माया से रक्षा की विनती करती हैं।
  • दशरथ चारों कुमारों के पिता। वे भोजन के लिये राम को बुलाते हैं और धूल भरे बालक को हँसकर गोद में बैठा लेते हैं।
  • लक्ष्मण जो बचपन से राम को अपना हितैषी स्वामी जानकर उनके चरणों में प्रेम रखते हैं।
  • भरत और शत्रुघ्न दो भाई, जिनमें स्वामी और सेवक की वैसी प्रीति है जिसकी प्रशंसा होती है।
  • गुरु जो राजा से कहते हैं कि चारों पुत्र वेद के तत्त्व हैं, और आगे उनके संस्कार और पढ़ाई में आते हैं।
  • शिव और पार्वती कथा कहनेवाले शिव, जो बाललीला के बीच माया के भय और भजन की बात कहते हैं, और सुननेवाली पार्वती।

नामों के साथ खुलता हुआ परिचय

गुरु ने हृदय में विचार करके चारों के नाम रखे हैं। अब वे राजा से कहते हैं कि आपके चारों पुत्र वेद के तत्त्व हैं। पोद्दार की टीका इसका अर्थ साक्षात् परात्पर भगवान् बताती है। नाम रखने के साथ ही गुरु उनका परिचय भी दे देते हैं।

वे मुनियों के धन हैं, भक्तों के सर्वस्व हैं और शिव के प्राण हैं। उन्होंने बाललीला के रस में सुख माना है। टीका जोड़ती है कि इस समय, आप लोगों के प्रेम के वश।

चारों भाइयों के बीच प्रीति का अपना ढंग है। लक्ष्मण बचपन से राम को अपना हितैषी स्वामी जानते हैं और उनके चरणों में अनुराग रखते हैं। भरत और शत्रुघ्न में स्वामी और सेवक की वैसी प्रीति हो गयी है जिसकी प्रशंसा की जाती है।

श्याम और गौर शरीरवाली दोनों सुन्दर जोड़ियों को देखकर माताएँ तृण तोड़ती हैं। टीका बताती है कि यह नज़र से बचाने के लिये है। चारों शील, रूप और गुण के धाम हैं, फिर भी सुख के सागर राम अधिक हैं।

उनके हृदय में कृपा का चन्द्रमा प्रकाशित है, और उनकी मन हरनेवाली हँसी उसकी किरणों का समाचार देती है। माता कभी गोद में लेकर, कभी सुन्दर पालने में लिटाकर, “प्यारे ललना” कहकर दुलार करती हैं।

जो सर्वव्यापक, निर्मल, निर्गुण, विनोद से रहित और अजन्मा ब्रह्म हैं, वही प्रेम और भक्ति के वश कौसल्या की गोद में हैं।

चरणों की लालिमा से तोतले बोल तक

श्याम शरीर नील कमल और गम्भीर मेघ जैसा है, और उसमें करोड़ों कामदेवों की शोभा है। लाल कमल जैसे चरणों पर नखों की ज्योति ऐसी है, मानो कमल के पत्तों पर मोती बैठे हों।

चरणों में वज्र, ध्वजा और अंकुश की रेखाएँ हैं। पोद्दार की टीका इन्हें चरणतलों के चिह्न बताती है। पाँव में नूपुर हैं, जिनकी ध्वनि सुनकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है।

कमर में करधनी है, पेट पर तीन रेखाएँ, और नाभि की गम्भीरता वही जानता है जिसने उसे देखा हो। विशाल भुजाएँ अनेक आभूषणों से सजी हैं। हृदय पर बाघ के नख की निराली शोभा है, छाती पर मणियों का हार, और ब्राह्मण का चरणचिह्न, जिसे टीका भृगु का बताती है।

कण्ठ शंख जैसा है (टीका उसकी तीन रेखाएँ बताती है), ठोड़ी सुन्दर है, और मुख पर असंख्य कामदेवों की छटा है। दो दो छोटी दँतुलियाँ और लाल ओठ हैं, और नासिका और तिलक की शोभा का वर्णन कौन कर सकता है।

सुन्दर कान हैं, सुडौल गाल हैं, और बहुत प्यारे लगनेवाले मधुर तोतले बोल। सिर के चिकने, घुँघराले बालों को माता ने कई प्रकार से सँवारा है। टीका बताती है कि ये जन्म से रखे हुए बाल हैं।

शरीर पर पीली झँगुली पहनायी गयी है। बालक हाथों और घुटनों के बल चलता है, और कहनेवाले को यह चलना बहुत प्यारा लगता है।

वेद और शेष भी इस रूप का वर्णन नहीं कर सकते। उसे वही जानता है जिसने उसे स्वप्न में भी देखा हो।

वे सुख के पुंज हैं, मोह से परे हैं, और ज्ञान, वाणी और गो से परे हैं (टीका गो को इन्द्रियाँ बताती है)। माता पिता के, टीका के अनुसार दशरथ और कौसल्या के, परम प्रेम के वश वे पवित्र बाललीला करते हैं।

जिसके संकेत पर माया चलती है

शिव अब पार्वती से कहते हैं कि जगत् के पिता और माता राम इस प्रकार अवधपुर के निवासियों को सुख देते हैं। जिन्होंने उनके चरणों में प्रेम जोड़ा है, उनकी यह गति प्रत्यक्ष है।

फिर संसार के बन्धन की बात आती है। राम से विमुख होकर कोई करोड़ों उपाय करे, संसार का बन्धन कौन छुड़ा सकता है? जिस माया ने चर और अचर जीवों को वश में रखा है, वह प्रभु से भय खाती है। वे भौंह के संकेत से उसे नचाते हैं।

ऐसे प्रभु को छोड़कर किसका भजन किया जाय, शिव पूछते हैं। मन, कर्म और वचन की चतुराई छोड़कर भजन करने पर राम कृपा करेंगे।

इसके बाद फिर माँ और बालक सामने हैं। इस प्रकार राम बाललीला करके सब नगरवासियों को सुख देते हैं। कौसल्या कभी गोद में लेकर उन्हें हिलाती हैं, कभी पालने में लिटाकर झुलाती हैं।

प्रेम में मग्न कौसल्या रात और दिन का बीतना नहीं जानतीं, और पुत्र के स्नेह में उसके बालचरित्र गाती रहती हैं।

पालने में सोये, लौटने पर भोजन करते

एक बार कौसल्या ने पुत्र को स्नान कराया, शृंगार करके पालने में लिटा दिया। फिर उन्होंने अपने कुल के इष्टदेव भगवान् की पूजा के लिये स्वयं स्नान किया। पहले बालक की सेवा, फिर पूजा।

पूजा करके उन्होंने नैवेद्य चढ़ाया, और उस स्थान पर गयीं जहाँ रसोई बनी थी। फिर वे वहीं लौटीं (टीका के अनुसार पूजास्थान में), तो देखा कि पुत्र भोजन कर रहा है। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि यह इष्टदेव के लिये चढ़ाया हुआ नैवेद्य है।

कौसल्या भयभीत हो गयीं। टीका उनकी घबराहट बताती है: जो पालने में सोया था, उसे यहाँ लाकर किसने बैठा दिया। वे पालने के पास गयीं, तो देखा कि बालक वहीं सो रहा है।

वे फिर लौटीं, तो वही पुत्र दिखा, टीका के अनुसार भोजन करता हुआ। माता का हृदय काँपने लगा, मन में धीरज नहीं ठहरता।

टीका के अनुसार अब उनके मन में प्रश्न उठता है: यहाँ और वहाँ दो बालक देखे, यह मेरी बुद्धि का भ्रम है या कोई और विशेष कारण।

राम माता को घबरायी हुई देखते हैं, और मधुर मुसकान से हँस देते हैं।

अखण्ड रूप के प्रत्येक रोम में

राम माता को अपना अद्भुत अखण्ड रूप दिखाते हैं, जिसके एक एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं।

वे अगणित सूर्य और चन्द्रमा देखती हैं, अगणित शिव और ब्रह्मा, और बहुत से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी और वन।

फिर वे काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव भी देखती हैं।

उन्होंने ऐसे पदार्थ भी देखे जिनके बारे में कभी सुना तक न था।

सब प्रकार से बलवती माया अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े खड़ी दिखती है। टीका बताती है कि वह भगवान् के सामने खड़ी है। जिस भय की बात शिव ने पार्वती से कही थी, माता उसे आँखों से देख रही हैं।

फिर जीव दिखता है, जिसे वह माया नचाती है, और भक्ति, जो उसी जीव को छुड़ा देती है।

जुड़े हुए हाथों की विनती

कौसल्या का शरीर पुलकित हो जाता है, मुख से वचन नहीं निकलता। वे आँखें मूँद लेती हैं और राम के चरणों में सिर नवाती हैं।

माता को आश्चर्य में डूबी देखकर राम फिर बालरूप हो जाते हैं। पहले उन्हें अकुलायी देखकर मुसकान आयी थी। अब विस्मय में देखकर वही बालक फिर सामने है। जिसके हर रोम में ब्रह्माण्ड दिखे, वही फिर माँ का शिशु है।

माता से स्तुति नहीं होती। उन्हें डर लगता है कि मैंने जगत् के पिता को पुत्र करके जाना।

राम माता को बहुत प्रकार से समझाते हैं और कहते हैं: यह बात कहीं कहियेगा नहीं, माँ, सुनिये।

कौसल्या बार बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं: प्रभु, आपकी माया अब मुझे कभी न व्यापे। जिस माया को उन्होंने भयभीत खड़े देखा था, उसी से वे रक्षा माँग रही हैं, और बार बार माँग रही हैं।

भोजन की पुकार और खेलने की जल्दी

राम ने बहुत प्रकार की बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकों को बहुत आनन्द दिया। कुछ समय बीतने पर चारों भाई बड़े हुए और परिजनों को सुख देने लगे।

गुरु ने जाकर चूड़ाकर्म संस्कार किया, और ब्राह्मणों ने फिर बहुत दक्षिणा पायी। चारों सुकुमार बड़े मनोहर, अपार चरित्र करते फिरते हैं।

मन, कर्म और वचन से जिन तक पहुँचना सम्भव नहीं, वही राम दशरथ के आँगन में विचरते हैं। भोजन के समय राजा बुलाते हैं, पर राम बालसखाओं का समाज छोड़कर नहीं आते।

तब कौसल्या बुलाने जाती हैं, और राम ठुमुक ठुमुककर भाग चलते हैं। माता हठ करके उन्हें पकड़ने दौड़ती हैं। जिनका अन्त शिव ने नहीं पाया, उन्हें यह माता पकड़ लेना चाहती हैं।

वेद जिनका वर्णन “नेति” कहकर करते हैं (पोद्दार की टीका इसका अर्थ “इतना ही नहीं” बताती है), वे कौसल्या के सामने ठुमुकते हुए भाग रहे हैं।

फिर बालक धूल से भरा शरीर लिये आता है, और राजा हँसकर उसे गोद में बैठा लेते हैं। अभी वह बालसखाओं को छोड़कर नहीं आ रहा था। अब उसी का धूल भरा शरीर पिता की गोद में है।

राम चञ्चल चित्त से भोजन करते हैं। अवसर मिलते ही वे मुँह में दही-भात लपेटे किलकारी मारते इधर उधर भाग चलते हैं।

ये बालचरित्र बहुत सरल और सुहावने हैं, और सरस्वती, शेष, शिव और वेदों ने इनका गान किया है। जिनका मन इनमें नहीं रमा, उन्हें विधाता ने वञ्चित कर दिया।

जनेऊ, गुरुगृह और कुमारों के खेल

जब सब भाई कुमारावस्था में पहुँचे, तो गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। पहले चूड़ाकर्म हुआ था, अब जनेऊ। गोद और पालने से चली कथा अब पढ़ने जाने तक पहुँचती है।

राम गुरु के घर विद्या पढ़ने गये। टीका बताती है कि भाइयों के साथ। थोड़े ही समय में उन्हें सब विद्याएँ आ गयीं।

इस पढ़ाई पर बड़ा कौतुक है। जिनके स्वाभाविक श्वास चारों वेद हैं, वे राम पढ़ रहे हैं।

चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शील में निपुण हैं, और सब राजाओं की लीलाओं के खेल खेलते हैं।

हाथों में बाण और धनुष बहुत शोभा देते हैं, और उनका रूप देखकर चराचर मोहित हो जाता है।

जिन गलियों में चारों भाई विचरते हैं

चारों भाई जिन गलियों में विचरते हैं, वहाँ के सब स्त्री पुरुष थकित हो जाते हैं। पोद्दार की टीका इसके दो अर्थ देती है, स्नेह से शिथिल हो जाना या ठिठककर रह जाना।

कोसलपुर के नर और नारी, बूढ़े और बालक, सबको राम प्राणों से भी अधिक प्रिय लगते हैं।

प्रसंग उन्हीं नगरवासियों के प्रेम पर ठहरता है, जिनको बाललीला से सुख मिलने की बात दो बार कही गयी है।

सँवारती माँ, विनती करती माँ

कौसल्या इस बाललीला में दो रूपों में दिखती हैं। एक में वे पुत्र को सँवारकर पालने में लिटा रही हैं। दूसरे में हाथ जोड़कर माया से रक्षा माँग रही हैं। दर्शन के बाद वे बुलाने जाती हैं और पकड़ने दौड़ती हैं।

उनकी माँग साफ़ है: माया अब कभी न व्यापे। माता ने माया का भय, जीव का बन्धन और भक्ति की छुड़ानेवाली शक्ति भी देखी है।

फिर दही-भात सने मुख से किलकारी मारता बालक भाग चलता है। जिनका मन इन लीलाओं में नहीं रमा, उन्हें विधाता ने वञ्चित कर दिया, यह बात पहले आ चुकी है। इतने बड़े दर्शन के बाद भोजन का यह छोटा दृश्य अपने पूरे सुख के साथ आता है: दशरथ की हँसी, कौसल्या की दौड़ और बालक की चञ्चलता।

गुरु के कहे वेदतत्त्व से आरम्भ होकर प्रसंग नगरवासियों के प्राणप्रिय राम तक आता है। बीच में माताओं का दुलार, बालरूप की शोभा, कौसल्या का विस्मय और विनती, चारों भाइयों का बढ़ना और पढ़ाई है। कोई हाथ बाल सँवारता है, कोई धूल भरे बालक को गोद में लेता है, कोई गली में उसे देखकर थकित हो जाता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 198 से 204, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।