रामचरितमानस · बालकाण्ड · बाल-लीला और कौसल्या को विराट दर्शन
बाल-लीला और कौसल्या को विराट दर्शन
गोद में खेलते बालक की हँसी, प्रत्येक रोम में असंख्य ब्रह्माण्डों का दर्शन, और फिर उसी घर के आँगन में दही-भात सने मुख से निकलती किलकारी।
कौसल्या कभी बालक को गोद में हिलाती हैं, कभी पालने में झुलाती हैं। उनके लिये दिन और रात का पता इसी दुलार के बीच खो जाता है। एक दिन वे पुत्र को सुलाकर पूजा करने जाती हैं, नैवेद्य चढ़ाती हैं, और लौटने पर देखती हैं कि वही पुत्र वहाँ भोजन कर रहा है। पालने के पास जाकर देखती हैं तो वह वहाँ भी सोया है। जिन हाथों ने अभी बालक को सजाकर लिटाया था, वे थोड़ी ही देर में उसके सामने प्रणाम में जुड़ने वाले हैं।
तुलसीदास के रामचरितमानस का यह बालरूप आरम्भ से प्रेम और भक्ति के वश है। गुरु चारों पुत्रों को वेद का तत्त्व बताते हैं, और माताएँ उन्हीं की शोभा देखकर तृण तोड़ती हैं। राम के अखण्ड रूप का दर्शन इसी स्नेह के भीतर खुलता है। फिर कथा आगे बढ़ती है, चारों भाइयों का बढ़ना, संस्कार, भोजन के लिये बुलाने पर बालक का भागना, गुरुगृह में पढ़ाई और अयोध्या की गलियों में खेल। गोद से नगर तक उनका सुख फैलता जाता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम कौसल्या की गोद में खेलते, अपना अखण्ड रूप दिखाते और अपने भाइयों के साथ बाललीला करते प्रभु।
- कौसल्या प्रेम में मग्न माता, जो दो स्थानों पर पुत्र को देखकर विस्मित होती हैं और दर्शन के बाद माया से रक्षा की विनती करती हैं।
- दशरथ चारों कुमारों के पिता, जो भोजन के लिये राम को बुलाते हैं और धूल भरे बालक को हँसकर गोद में बैठा लेते हैं।
- लक्ष्मण बचपन से राम को अपना परम हितैषी स्वामी जानकर उनके चरणों में प्रेम रखने वाले भाई।
- भरत और शत्रुघ्न दो भाई जिनकी पारस्परिक प्रीति को तुलसी स्वामी और सेवक के प्रेम से पहचानते हैं।
- गुरुजी चारों पुत्रों के नामों का आशय बताने वाले गुरु, जो आगे उनके संस्कार और अध्ययन के प्रसंग में आते हैं।
- शिव और भवानी बाललीला के बीच भक्ति और माया का सम्बन्ध समझाते वक्ता और उनकी श्रोता।
नामों के साथ खुलता हुआ परिचय
गुरुजी ने हृदय में विचार करके चारों पुत्रों के नाम रखे हैं। अब वे राजा से कहते हैं कि आपके चारों पुत्र वेद के तत्त्व हैं। पोद्दार जी की टीका इस तत्त्व का अर्थ साक्षात् परात्पर भगवान् बताती है। नाम रख देने के साथ ही गुरु उन बालकों का परिचय भी दे रहे हैं। राजा जिन्हें पुत्र कहकर अपने पास पाते हैं, उनके विषय में मुनि, भक्त और शिव का सम्बन्ध एक साथ सामने आ जाता है।
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी । बेद तत्व नृप तव सुत चारी॥
चौपाई १
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि रस तेहिं सुख माना॥
वे मुनियों के धन हैं, भक्तों के सर्वस्व हैं और शिव के प्राण हैं। इन तीन सम्बन्धों में कोई दूरी नहीं बचती। मुनि का संचित धन, भक्त का सारा आश्रय और शिव का जीवन, सब उसी बालक की ओर संकेत करते हैं जो इस समय बालक्रीड़ा के रस में सुख मान रहा है। टीका यहाँ परिवार के प्रेम को भी स्पष्ट करती है, उसी प्रेम के वश उन्होंने यह सुख माना है। बाललीला उनके परिचय से अलग कोई बात नहीं रह जाती, उनके प्रेमवश होने का दृश्य रूप बनती है।
चारों भाइयों के बीच प्रीति का अपना विन्यास है। लक्ष्मण बचपन से राम को अपना परम हितैषी स्वामी जानते हैं और उनके चरणों में अनुराग रखते हैं। भरत और शत्रुघ्न की जोड़ी में स्वामी और सेवक के बीच प्रशंसित प्रेम की छटा है। अभी किसी कार्य का बँटवारा नहीं हुआ, फिर भी हृदय किस ओर लगा है, यह सामने आ गया। चार भाई साथ बढ़ते हैं और उनके भीतर का लगाव अपनी अलग पहचान रखता है।
श्याम और गौर शरीर वाली दोनों सुन्दर जोड़ियों को माताएँ देखती हैं और तृण तोड़ती हैं। टीका बताती है कि यह दीठ से बचाने के लिये है। गुरु की दृष्टि ने अभी वेद का तत्त्व पहचाना था; माँ की दृष्टि उन्हीं बालकों की सुन्दरता सँभालने में लगी है। चारों शील, रूप और गुण के धाम हैं। उनके बीच राम को तुलसी विशेष रूप से सुख का समुद्र कहते हैं। इस सुख का पता उनकी हँसी से मिलता है।
हृदय में कृपा का चन्द्रमा प्रकाशित है और मन हरने वाली हँसी उसकी किरणों का समाचार देती है। भीतर के अनुग्रह को देखने के लिये बालक का हँसता मुख ही पर्याप्त हो जाता है। माता कभी गोद में लेकर, कभी सुन्दर पालने में लिटाकर प्यारे ललना कहती हैं। दुलार के इन छोटे कामों के बाद दोहा उस गोद में बैठे हुए का परिचय फिर से खोल देता है।
ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
दोहा १९८
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥ १९८॥
सर्वव्यापक, माया से रहित, निर्गुण, विनोद से रहित और अजन्मा ब्रह्म प्रेम तथा भक्ति के वश कौसल्या की गोद में हैं। एक ओर इन नामों का अपरिमित विस्तार है, दूसरी ओर माँ की गोद का निकट स्पर्श। दोहे में दोनों के बीच प्रेम और भक्ति रखे हैं। इसी से आगे के बालचरित्र समझ में आते हैं। जिन्हें कोई सीमा बाँध नहीं सकती, वे इस स्नेह में अपना खेल स्वीकार करते हैं।
गुरु चारों पुत्रों को वेद का तत्त्व बताते हैं। लक्ष्मण का राम से और शत्रुघ्न का भरत से गहरा लगाव है। माताएँ दोनों जोड़ियों को दुलारती हैं, और प्रेम तथा भक्ति के वश अजन्मा ब्रह्म कौसल्या की गोद में खेलते हैं।
चरणों की लालिमा से तोतले बोल तक
अब उस बालक को पास से देखिये। श्याम शरीर के लिये नील कमल और जल से भरे गम्भीर मेघ की उपमा आती है। उसमें करोड़ों कामदेवों की शोभा है। चरण लाल कमलों जैसे हैं और नखों की उजली ज्योति उन पर ऐसी ठहरी है जैसे कमल के पत्तों पर मोती बैठे हों। शरीर की श्यामता के बाद यह लालिमा और उसके ऊपर चमकता उजाला, बालरूप का वर्णन एक ही रंग पर नहीं ठहरता।
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥
चौपाई २
अरुन चरन पंकज नख जोती । कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥
चरणों में वज्र, ध्वजा और अंकुश की रेखाएँ शोभित हैं। पोद्दार जी की टीका इन्हें चरणतलों के चिह्न बताती है। पाँव में नूपुर हैं, और उनकी ध्वनि सुनकर मुनियों का मन भी मोहित हो जाता है। अभी तक आँख रूप देख रही थी, अब कान उस रूप की आहट पाते हैं। जिन मुनियों के धन कहकर बालक का परिचय दिया गया था, उन्हीं का मन पैजनी की ध्वनि में लग गया है।
कमर में करधनी है। पेट पर तीन रेखाएँ हैं, और नाभि की गम्भीरता के विषय में कवि देखने वाले का अनुभव सामने रख देते हैं। उसे वही जानता है जिसने देखा हो। विशाल भुजाएँ अनेक आभूषणों से सजी हैं। हृदय पर बाघ के नख की निराली शोभा है और छाती पर रत्नों से युक्त मणियों का हार। आभूषणों के साथ वहाँ ब्राह्मण का चरणचिह्न भी दिखाई देता है। टीका इस ब्राह्मण को भृगु नाम से पहचानती है। उस चिह्न को देखते ही मन लुभा जाता है।
कण्ठ शंख के समान है। टीका उसके उतार और चढ़ाव तथा तीन रेखाओं को स्पष्ट करती है। ठोड़ी सुन्दर है, मुख पर असंख्य कामदेवों की छटा छायी है। दो-दो छोटी दँतुलियाँ और लाल ओठ हैं। नासिका और तिलक के सौन्दर्य का वर्णन करते हुए कवि फिर पूछते हैं कि इसे पूरा कौन कह सकता है। बालक का रूप सामने खुलता जाता है और उसके साथ कहने वाले की सीमा भी प्रकट होती जाती है।
सुन्दर कान हैं, सुडौल गाल हैं, और बहुत प्रिय लगने वाले मधुर तोतले बोल हैं। यहाँ रूप बोल उठता है। नूपुर की ध्वनि से लेकर इस तोतली बोली तक बालक की प्रत्येक छोटी चेष्टा सुनने वाले को बाँधती है। सिर के चिकने, घुँघराले बालों को माता ने कई प्रकार से सँवारा है। टीका बताती है कि ये जन्म से रखे हुए बाल हैं। आभूषणों के बीच माँ के अपने हाथ का यह सँवारना कितना निकट लगता है।
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥
चौपाई ३
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे । बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥
शरीर पर पीली झँगुली पहनायी गयी है। बालक हाथों और घुटनों के बल विचरते हैं, और कहने वाले को यह चलना अत्यन्त प्रिय है। रूप का वर्णन चरणों से चला था, अब उन्हीं हाथों और घुटनों की चेष्टा में आकर ठहरता है। श्याम शरीर पर पीला वस्त्र है, सँवरे हुए बाल हैं, मुख से मधुर बोल निकलते हैं। इन सबके बीच चलने की बालसुलभ रीति पूरे चित्र को गति देती है।
वेद और शेष भी इस रूप को पूरा नहीं कह सकते। जिसने स्वप्न में भी इसे देखा है, वही जानता है। इतने अंग और आभूषण गिनाने के बाद भी अनुभव का अपना स्थान बचा रहता है। सुनने वाला विवरण पा सकता है; देखने का सुख देखने वाले के पास रहता है। फिर दोहा उसी बालरूप को दशरथ और कौसल्या के प्रेम के साथ रखता है।
सुख संदोह मोहपर ग्यान गिरा गोतीत।
दोहा १९९
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत॥ १९९॥
वे सुख के पुंज हैं, मोह से परे हैं, ज्ञान, वाणी और इन्द्रियों की पहुँच से अतीत हैं। दशरथ और कौसल्या के परम प्रेम के वश होकर वे पवित्र बाललीला करते हैं। अभी जिन चरणों, दाँतों, ओठों और बालों पर दृष्टि लगी थी, उन सबके भीतर यही प्रेमवशता है। माता का सँवारना और पिता का स्नेह उस बालचरित्र में अपना सुख पाते हैं जिसे तुलसी पवित्र कहते हैं।
राम का श्याम बालरूप चरणचिह्नों, नूपुर, करधनी, तीन उदररेखाओं, हार और भृगु के चरणचिह्न से सुशोभित है। दँतुलियाँ, तोतले बोल, माँ के सँवारे बाल, पीली झँगुली और हाथों तथा घुटनों के बल चलना उसी प्रेमवश बाललीला के रूप हैं।
जिसके संकेत पर माया चलती है
शिव अब भवानी से कहते हैं कि जगत् के माता और पिता राम इस प्रकार अवधपुर के निवासियों को सुख देते हैं। जिन्होंने उनके चरणों में प्रेम जोड़ा है, उनकी यह अवस्था प्रत्यक्ष है। बालक की लीला में भक्तों का आनन्द दिखाई दे रहा है। माता की गोद से आरम्भ हुआ सुख नगर तक पहुँचता है, और उसे देखकर शिव भक्ति का फल बताते हैं। प्रेम यहाँ किसी दूर मिलने वाले फल की प्रतीक्षा नहीं कर रहा, बालचरित्र के रस में अभी उसका अनुभव है।
इसी के साथ संसार के बन्धन की बात आती है। श्रीरघुनाथ से विमुख होकर करोड़ों उपाय किये जायँ, तो भी उस बन्धन को कौन छुड़ा सकेगा। जिस माया ने समस्त चर और अचर जीवों को वश में रखा है, वह स्वयं प्रभु से भय खाती है। जीवों पर उसका इतना अधिकार है, फिर भी प्रभु के सामने उसका अपना स्वाधीन बल नहीं ठहरता। वे भौंह के संकेत से उसे नचाते हैं।
भृकुटि बिलास नचावइ ताही । अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥
चौपाई ४
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई । भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥
ऐसे प्रभु को छोड़कर किसका भजन किया जाय, शिव का प्रश्न इसी सम्बन्ध से निकलता है। मन, वचन और कर्म की चतुराई छोड़कर भजन करने पर श्रीरघुनाथ कृपा करेंगे। चतुराई का त्याग तीनों जगह माँगा गया है। मन का भाव, वाणी का कहना और कर्म का करना, इन सबको भजन से जोड़ा गया है। कृपा की बात कहते हुए श्रीरघुनाथ के प्रति मन, वाणी और आचरण का यह पूरा समर्पण सामने रखा गया है।
इस विवेचन के तुरन्त बाद फिर माँ और बालक सामने हैं। श्रीराम समस्त नगरवासियों को सुख देते हैं। कौसल्या कभी गोद में लेकर उन्हें हिलाती हैं, कभी पालने में लिटाकर झुलाती हैं। कथा उसी झुलाने की गति में लौट आती है जिसमें अभी भक्ति का अर्थ बताया गया था। माया पर प्रभु का अधिकार जान लेने से गोद का सुख कम नहीं होता। वही प्रभु इस समय माता की गोद और पालने में बालक्रीड़ा करते हैं।
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
दोहा २००
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥ २००॥
कौसल्या प्रेम में इतनी मग्न हैं कि रात और दिन का बीतना नहीं जानतीं। वे पुत्र के स्नेह में उसके बालचरित्र गाती रहती हैं। दिन की गणना छूट गयी है, पर बालक की एक-एक लीला स्मरण में है। उनका गाना उसी प्रेम का काम है जिससे हाथ कभी पालना झुलाते हैं और कभी पुत्र को गोद में लेते हैं। इसी घरेलू क्रम के भीतर एक दिन ऐसा आता है जब उन्हें अपने देखे हुए पर ही विस्मय होने लगता है।
शिव भवानी को समझाते हैं कि जीवों को बाँधने वाली माया प्रभु से भय खाती है और उनके संकेत पर चलती है। निष्कपट भजन से कृपा मिलती है। कौसल्या उसी प्रेम में बालक को झुलाती और उसके चरित्र गाती हैं, उन्हें दिन और रात के बीतने का ध्यान नहीं रहता।
पालने में सोये, पूजास्थान में भोजन करते
एक बार कौसल्या ने पुत्र को स्नान कराया। शृंगार करके पालने में लिटा दिया। अब वे अपने कुल के इष्टदेव भगवान् की पूजा की तैयारी करती हैं और उसके लिये स्वयं स्नान करती हैं। पहले बालक की सेवा पूरी होती है, फिर पूजा। अभी उनके लिये दोनों काम अपने परिचित क्रम में हैं। जिस पुत्र को उन्होंने सँवारकर पालने में लिटाया है, उसके सोने का भरोसा लेकर वे आगे बढ़ी हैं।
पूजा करके नैवेद्य चढ़ाया। इसके बाद माता उस स्थान पर गयीं जहाँ रसोई बनी थी। फिर वे पूजास्थान में लौटकर आयीं। वहाँ जो दिखा उसने पूरे क्रम को उलझा दिया। पुत्र भोजन कर रहा है। पोद्दार जी की टीका स्पष्ट करती है कि यह इष्टदेव भगवान् के लिये चढ़ाया हुआ नैवेद्य है। पूजा करने वाली माता अपने सामने चढ़ाये हुए अन्न को खाता पुत्र देखती हैं, जबकि उसे तो अभी अपने हाथों से पालने में सुलाया था।
कौसल्या भयभीत हो गयीं। टीका उनकी घबराहट को खोलती है, जो पालने में सोया था उसे यहाँ लाकर किसने बैठा दिया। वे बालक के पास, पालने की ओर गयीं। वहाँ देखा तो वह सो रहा है। पूजास्थान में भोजन करने का दृश्य आँखों में है और पालने में शान्त पड़ा पुत्र सामने है। पहला दृश्य मिटा नहीं है, दूसरा उसी के साथ जुड़ गया है।
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥
चौपाई ५
बहुरि आइ देखा सुत सोई । हृदयँ कंप मन धीर न होई॥
वे फिर लौटती हैं। पूजास्थान में वही पुत्र दिखाई देता है। टीका यहाँ भी उसके भोजन करते होने को स्पष्ट करती है। माता का हृदय काँपने लगा, मन में धीरज नहीं ठहरता। एक बार देखने में भूल हो सकती थी, पर उन्होंने तो दोनों स्थानों पर जाकर देखा है। पालने से पूजा तक और पूजा से पालने तक आने में बालक की दो अलग अवस्थाएँ उसी माँ की दृष्टि के सामने बनी हुई हैं।
अब उनके मन में प्रश्न उठता है। यहाँ और वहाँ दो बालक देखे हैं, यह बुद्धि का भ्रम है या इसका कोई और विशेष कारण है। वे किसी निर्णय पर पहुँच नहीं पातीं। घर के परिचित कामों के बीच ऐसा अनुभव आया है जिसे उन्हीं कामों की समझ से पकड़ना कठिन है। सुलाया हुआ पुत्र उठकर चला आया हो, इतनी बात से यह उलझन सुलझती नहीं, क्योंकि माता उसे पालने में सोता हुआ भी देख आयी हैं।
राम ने माता को आकुल देखा। उनके मुख पर मधुर मुसकान आयी। पहले बालरूप की हँसी में कृपा के चन्द्रमा की किरणें दिखी थीं, अब यही मुसकान माँ की घबराहट के सामने है। प्रश्न के उत्तर में वे अपना रूप दिखाने वाले हैं। कौसल्या जिस बात को बुद्धि के भ्रम या किसी विशेष कारण में बाँटकर सोच रही थीं, उसके आगे उनका अनुभव अब बहुत दूर तक खुलता है।
कौसल्या राम को सुलाकर पूजा करती हैं, नैवेद्य चढ़ाकर रसोई की ओर जाती हैं और लौटने पर पुत्र को पूजास्थान में भोजन करते देखती हैं। पालने में वही बालक सो रहा है। फिर पूजास्थान में उसे देखकर वे काँप उठती हैं। उनकी आकुलता देखकर राम मुसकराते हैं।
अखण्ड रूप के प्रत्येक रोम में
राम ने माता को अपना अद्भुत अखण्ड रूप दिखाया। दो स्थानों पर पुत्र के दिखाई देने से आरम्भ हुआ विस्मय अब इस दर्शन में प्रवेश करता है। उस रूप के एक-एक रोम में करोड़ों ब्रह्माण्ड लगे हुए हैं। देखने का विस्तार किसी एक दिशा में बढ़कर समाप्त नहीं होता। जहाँ एक रोम है, वहीं असंख्य ब्रह्माण्ड हैं, और ऐसा प्रत्येक रोम में है। दोहे की पुनरुक्ति उसी असीमता को आँखों के सामने रखती है।
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
दोहा २०१
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥ २०१॥
अखण्ड रूप के लिये रोम-रोम का यह वर्णन कितना अद्भुत है। जिसका दर्शन हो रहा है वह एक अखण्ड रूप है, और उसी में ब्रह्माण्डों की ऐसी बहुलता है कि करोड़ों की गिनती बार-बार करनी पड़े। माता अभी अपने एक पुत्र को दो स्थानों पर देखकर अकुलायी थीं। अब उनके सामने जो प्रकट है, उसकी व्यापकता में वे दोनों स्थान भी कितने छोटे लगते हैं। दृश्य की सीमा एक घर के भीतर से उठकर ब्रह्माण्डों तक पहुँच गयी है।
उन्होंने अगणित सूर्य और चन्द्रमा देखे। शिव और ब्रह्मा देखे। बहुत से पर्वत, नदियाँ, समुद्र, पृथ्वी और वन देखे। सूर्य तथा चन्द्रमा के साथ देवताओं का भी अगणित विस्तार सामने है। पर्वत की स्थिरता, नदी का प्रवाह, समुद्र का फैलाव और वन, जिनसे संसार की पहचानी हुई आकृति बनती है, सब उस दर्शन में हैं। माता के सामने सृष्टि के दृश्य रूप खुलते चले जाते हैं।
फिर गिनती उन बातों तक पहुँचती है जो केवल पर्वत और नदी जैसे पदार्थों की सूची में नहीं समातीं। काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव, माता ने इन्हें भी देखा। जिस समय के भीतर जगत् की चेष्टाएँ होती हैं, जिस कर्म और स्वभाव से जीवों का व्यवहार पहचाना जाता है, वे भी उस दर्शन के भीतर आ गये हैं। तुलसी यहाँ ज्ञान को भी गिनाते हैं। देखने वाले के सामने संसार के साथ उसे जानने से जुड़ी बातों का विस्तार भी है।
उन्होंने ऐसे पदार्थ भी देखे जिनके विषय में कभी सुना तक न था। इस वाक्य में दर्शन सुनने की पहुँच से आगे निकल जाता है। पहचाने हुए नामों की सूची इतनी बड़ी है, फिर भी उससे सब कहा नहीं जा सकता। सूर्य, चन्द्रमा, पर्वत और समुद्र के आगे भी जो है, उसका अनुभव माता को हुआ है। इसी व्यापक दर्शन के बीच माया, जीव और भक्ति का सम्बन्ध प्रत्यक्ष होता है।
देखी माया सब बिधि गाढ़ी । अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥
चौपाई ६
देखा जीव नचावइ जाही । देखी भगति जो छोरइ ताही॥
माया सब प्रकार से बलवती है। वही माया अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े खड़ी दिखाई देती है। टीका बताती है कि वह भगवान् के सामने खड़ी है। जीव को अपने वश में रखने वाली शक्ति का यहाँ यह रूप है। जिस भय की बात शिव ने भवानी से कही थी, माता उसे देख रही हैं। माया का बल भी सामने है और प्रभु के आगे उसके जुड़े हुए हाथ भी।
फिर जीव दिखाई देता है, जिसे वह माया नचाती है। उसके साथ भक्ति का दर्शन होता है, जो उसी जीव को छुड़ा देती है। माया, जीव और भक्ति के तीन नामों में तीन अलग कार्य सामने रखे गये हैं। एक बाँधकर नचाती है, दूसरा उसके वश में है, तीसरी छुड़ाती है। इस दर्शन में जीव का बन्धन दिखाई देने के साथ उससे छुटकारे का उपाय भी दिखाई देता है। माता ने भक्ति की मुक्ति देने वाली शक्ति देखी है। आगे उनकी विनती इसी अनुभव से अपना आशय पाएगी।
राम के अखण्ड रूप में प्रत्येक रोम के साथ करोड़ों ब्रह्माण्ड दिखाई देते हैं। कौसल्या सृष्टि, काल, कर्म, गुण, ज्ञान और स्वभाव देखती हैं। बलवती माया प्रभु के सामने भय से हाथ जोड़े खड़ी है, जीव उसके वश में है और भक्ति उसे छुड़ाती है।
जुड़े हुए हाथों की विनती
कौसल्या का शरीर पुलकित हो गया। मुख से वचन नहीं निकलता। अभी दर्शन में कितनी वस्तुएँ, कितने रूप और कितनी शक्तियाँ सामने थीं; अब माता की ओर से केवल शरीर का रोमांच दिखाई देता है। वे आँखें मूँद लेती हैं और चरणों में सिर नवाती हैं। प्रश्न से आरम्भ हुई उनकी व्याकुलता इस प्रणाम तक पहुँची है। जो कुछ देखा है, उसके सामने शब्द पीछे रह गये हैं।
राम ने माता को आश्चर्य से भरी देखा और फिर बालरूप हो गये। रूप का यह लौटना भी माता की अवस्था को देखकर होता है। पहले उन्हें अकुलायी देखकर मधुर मुसकान आयी थी, अब विस्मय में डूबी देखकर वही बालक सामने आ गया है। जिसके प्रत्येक रोम में ब्रह्माण्ड दिखे, वही फिर माँ के दुलार का शिशु है। कथा दिव्य दर्शन के बाद उसी सम्बन्ध में लौटती है जिससे वह चली थी।
माता से स्तुति भी नहीं की जाती। उन्हें भय लगता है कि जगत् के पिता को उन्होंने अपना पुत्र समझा। उनके सामने अभी-अभी जगत् का विस्तार खुला है, इसलिए पुत्र का परिचित सम्बोधन भी विस्मय से भर उठा है। जिसको नहलाना, सजाना और पालने में सुलाना उनके दिन का सुख था, उसके रूप में ऐसा दर्शन मिलने पर वह अपने स्नेह को भी नयी दृष्टि से देख रही हैं।
श्रीहरि ने माता को बहुत प्रकार से समझाया। उस समझाने का एक-एक वाक्य यहाँ नहीं दिया गया है, पर उसके बाद कही गयी बात स्पष्ट है। वे माता से कहते हैं कि यह बात कहीं कहियेगा नहीं। माँ को आश्वस्त किया जाता है और दर्शन को गुप्त रखने के लिये कहा जाता है। बड़े रूप का अनुभव हो चुका है, उसके बाद घर में फिर बालक और माता का साथ है।
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।
दोहा २०२
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥ २०२॥
कौसल्या बार-बार हाथ जोड़कर विनय करती हैं। उनकी प्रार्थना है कि प्रभु की माया अब उन्हें कभी न व्यापे। उन्होंने जिस माया को भयभीत होकर खड़े देखा था, उसी से रक्षा माँग रही हैं। संबोधन प्रभु का है और आग्रह बार-बार का। दर्शन के बाद उनके मन से निकली यह माँग आगे की बाललीला पढ़ते समय भी याद रखने योग्य है। वे स्वयं चाहती हैं कि माया उन पर अधिकार न करे।
यह विनती माँ के स्नेह के बीच अपनी स्पष्ट जगह रखती है। जिस भक्ति को जीव का बन्धन छुड़ाते देखा, वही उनके प्रणाम और प्रार्थना में उपस्थित है। राम फिर बालरूप हैं और कौसल्या की गोद का सम्बन्ध बना हुआ है। उनके जुड़े हाथ उस सम्बन्ध में कृपा की याचना जोड़ते हैं। आगे पुत्र को खिलाने और बुलाने का स्नेह चलता रहेगा, और इस क्षण की प्रार्थना उसका अपना गम्भीर आधार बनी रहती है।
दोहा माता को बार-बार विनय करते हुए छोड़ता है। बालक को सुलाकर पूजा करने चली थीं; अब उसी के सामने हाथ जुड़े हैं। पूजा का नैवेद्य, पालने का शिशु, अखण्ड रूप और माया से रक्षा की माँग, इस पूरे क्रम में कौसल्या की दृष्टि खुली है। उनका प्रेम उसके साथ बना रहता है। अगले चरण में चारों भाइयों की बढ़ती हुई बाललीला फिर पूरे परिवार को सुख देने लगती है।
कौसल्या आँखें मूँदकर प्रणाम करती हैं। राम फिर बालरूप होकर उन्हें समझाते हैं और दर्शन की बात गुप्त रखने को कहते हैं। माता बार-बार हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं कि प्रभु की माया अब उन्हें कभी न व्यापे।
भोजन की पुकार और खेलने की जल्दी
श्रीहरि ने अनेक प्रकार की बाललीलाएँ कीं और अपने सेवकों को बहुत आनन्द दिया। कुछ समय बीता। चारों भाई बड़े हुए और परिजनों को सुख देने लगे। कथा फिर चारों कुमारों की ओर लौटती है। उनके बढ़ने को समय की किसी ठहरी हुई गिनती से नहीं बाँधा गया है। कुछ समय बीतने की बात है, और उस बीतते समय का फल घर के बढ़ते हुए सुख में दिखाई देता है।
गुरुजी ने जाकर चूड़ाकर्म संस्कार किया। ब्राह्मणों ने बहुत दक्षिणा पायी। चारों सुकुमार मनोहर चरित्र करते फिरते हैं। संस्कार में गुरु और ब्राह्मणों का अपना स्थान है, घर में परिजनों का सुख है और बालकों के लिये खेलने का विस्तार है। बाललीला का यह अगला रूप पालने से बाहर आ चुका है। अब वे फिरते हैं, साथ खेलते हैं, और उन्हें भोजन के समय बुलाने की आवश्यकता पड़ती है।
मन, वचन और कर्म से जिन तक पहुँचना सम्भव नहीं, वही प्रभु दशरथ के आँगन में विचरते हैं। भोजन करते समय राजा बुलाते हैं, पर राम बालसखाओं का समाज छोड़कर नहीं आते। खेलने वालों का साथ उन्हें लगा हुआ है। पिता की पुकार अपनी जगह है और बालक का मन अपने खेल में है। अभी जिस अगोचर प्रभु का परिचय दिया गया, उसके साथ ही यह बहुत परिचित बालचरित्र रख दिया गया है।
अब कौसल्या बुलाने जाती हैं। उन्हें देखकर प्रभु ठुमुकते हुए भाग चलते हैं। माता का जाना भी खेल की नयी चेष्टा बन गया है। वे पकड़ने के लिये हठ करके दौड़ती हैं। बच्चे की ठुमुकती गति और माँ का उसे पकड़ने का आग्रह सामने है, और उसी के बीच वेद तथा शिव का स्मरण आता है। जिनका अन्त शिव नहीं पा सके, उन्हीं को यह माता पकड़ लेना चाहती हैं।
कौसल्या जब बोलन जाई । ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥
चौपाई ७
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥
वेद जिनका निरूपण नेति कहकर करते हैं, उनके विषय में इतना कहकर भी सीमा पूरी नहीं होती। पोद्दार जी की टीका यहाँ नेति को इतना ही नहीं कहकर खोलती है। माता के लिये इस समय काम स्पष्ट है, बालक को पकड़ना है। जिनके विषय में जानने की सीमा नहीं मिलती, वे कौसल्या के सामने ठुमुकते हुए जा रहे हैं। बालचरित्र में यह असीमता उनकी एक-एक छोटी चेष्टा के साथ रहती है।
फिर बालक धूल से भरा शरीर लिये आया। राजा ने हँसकर उसे गोद में बैठा लिया। लौटने का दृश्य इतना ही है, धूल में धूसर पुत्र और उसे देखकर हँसते पिता। अभी वह बालसखाओं को छोड़कर नहीं आ रहा था; अब उसी का धूल भरा शरीर गोद में है। दशरथ के सुख के लिये इस समय बालक का आ जाना ही पर्याप्त है। भोजन सामने है, पर खाने लगने पर भी चित्त स्थिर नहीं होता।
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
दोहा २०३
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥ २०३॥
राम भोजन करते हैं, पर उनका चित्त चञ्चल है। अवसर मिलते ही किलकारी मारते भाग चले। मुख पर दही-भात लगा है। खाने का काम पूरा होने की प्रतीक्षा कहाँ है, खेलने की गति फिर लौट आयी है। दही और भात से सना मुख, हँसी और भागते हुए बालक की चेष्टा, दोहा इन सबको एक साथ रख देता है। पिता की गोद मिली, भोजन मिला और अगला अवसर मिलते ही बालक फिर चल दिया।
इन बालचरित्रों को तुलसी अत्यन्त सरल और सुहावना कहते हैं। सरस्वती, शेष, शिव और वेद इनका गान करते हैं। जिनका मन इनमें नहीं रमा, कवि उन्हें विधाता से वञ्चित हुए मनुष्य कहते हैं। इतनी बड़ी वाणी और इतना सीधा दृश्य साथ हैं। गाने के लिये दही-भात से सना यही मुख है, यही किलकारी है। बाललीला के सुख को पाने का अवसर कवि इसी सरलता में रखते हैं।
चारों भाई बढ़ते हैं, गुरु चूड़ाकर्म करते हैं और ब्राह्मण दक्षिणा पाते हैं। राम खेल छोड़कर भोजन के लिये नहीं आते, कौसल्या के बुलाने पर भागते हैं। फिर दशरथ धूल भरे बालक को गोद में लेते हैं, और वह भोजन के बीच दही-भात सने मुख से किलकारी मारता फिर भाग जाता है।
जनेऊ, गुरुगृह और कुमारों के खेल
जब सब भाई कुमारावस्था में पहुँचे, गुरु, पिता और माता ने उनका यज्ञोपवीत संस्कार कर दिया। पहले चूड़ाकर्म हुआ था, अब जनेऊ का प्रसंग है। दोनों संस्कारों के बीच उनका बढ़ता हुआ बालचरित्र दिखाया गया है। परिवार और गुरु उनके जीवन के इस नये चरण में साथ हैं। गोद और पालने से चली कथा अब पढ़ने जाने तक पहुँचती है।
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
चौपाई ८
गुरगृहँ गए पढ़न रघुराई । अलप काल बिद्या सब आई॥
श्रीरघुनाथ गुरु के घर विद्या पढ़ने गये। टीका यहाँ भाइयों के साथ जाने को स्पष्ट करती है। थोड़े ही समय में उन्हें सब विद्याएँ आ गयीं। अध्ययन के प्रसंग में गुरु का घर है, पढ़ने के लिये जाना है और अल्प समय में विद्याओं की प्राप्ति है। चारों कुमारों की बढ़ती हुई अवस्था अब सीखने के इस क्रम में दिखाई देती है। खेल का सुख अपनी जगह बना है और शिक्षा उसका नया साथ है।
इस पढ़ने पर तुलसी को बड़ा कौतुक होता है। जिनके स्वाभाविक श्वास चारों वेद हैं, वे हरि पढ़ रहे हैं। आरम्भ में गुरु ने चारों पुत्रों को वेद का तत्त्व कहा था। अब वेद जिनके सहज श्वास हैं, उन्हीं को गुरु के घर शिक्षा लेते देखा जा रहा है। बाललीला में जैसे अजन्मा गोद में आया, वैसे ही अध्ययन में यह अचरज है। प्रभु सीखने की रीति में भी अपना कुमारचरित्र निभाते हैं।
चारों भाई विद्या, विनय, गुण और शील में निपुण हैं। सीखने के फल के साथ विनय को भी रखा गया है। आरम्भ में जिन चारों को शील, रूप और गुण का धाम कहा गया, उनका बढ़ना उन गुणों को मिटाता नहीं। वे शिक्षा और विनय के साथ सामने आते हैं। कुमार अब राजाओं की लीलाओं वाले खेल खेलते हैं। खेल का विषय उनकी राजकुमार अवस्था के साथ बदल गया है।
हाथों में धनुष और बाण शोभा देते हैं। उनका रूप देखकर चराचर मोहित हो जाता है। जिस बालरूप में हाथों और घुटनों के बल चलना प्रिय लगा था, उन्हीं हाथों में अब धनुष-बाण की शोभा है। कथा ने बीच का बढ़ना, संस्कार और पढ़ाई दिखायी है। इसीलिये कुमारों का यह रूप उसी बाललीला का आगे खुलता हुआ रूप लगता है।
कुमारावस्था आने पर चारों भाइयों का यज्ञोपवीत होता है। वे गुरुगृह में पढ़ते हैं और थोड़े समय में सब विद्याएँ सीख लेते हैं। विद्या और विनय से सम्पन्न कुमार राजाओं की लीलाओं के खेल खेलते हैं, उनके हाथों में धनुष-बाण शोभा देते हैं।
जिन गलियों में चारों भाई निकलते हैं
चारों भाई जिन गलियों में विहार करते हैं, वहाँ के स्त्री-पुरुष उन्हें देखकर ठिठक जाते हैं। पोद्दार जी की टीका इस अवस्था के दो अर्थ बताती है, स्नेह से शिथिल हो जाना अथवा ठिठककर रह जाना। देखने का प्रेम शरीर की गति में उतर आया है। कुमार खेलते हुए निकलते हैं और उन्हें देखने वाले अपनी जगह थम जाते हैं। नगर में उनका होना इस तरह अनुभव होता है।
आरम्भ में दोनों सुन्दर जोड़ियों की छवि देखकर माताएँ तृण तोड़ रही थीं। अब वही चारों भाई नगर की गलियों में हैं और उन्हें देखकर लोगों की गति रुकती है। माँ के घर का आनन्द नगर के स्त्री-पुरुषों तक पहुँच गया है। शिव ने कहा था कि राम कोसलपुर के निवासियों को सुख देते हैं। गलियों का यह दृश्य उसी कथन को लोगों के व्यवहार में प्रकट करता है।
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
दोहा २०४
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥ २०४॥
कोसलपुर के रहने वाले नर और नारी, वृद्ध और बालक, सबको कृपालु राम प्राणों से भी अधिक प्रिय लगते हैं। दोहा नगर के लोगों को अलग-अलग गिनता है ताकि उस प्रेम का विस्तार साफ हो। बालकों का अपना साथ है, वृद्धों का अपना देखना है, और स्त्री तथा पुरुष सभी उसमें सम्मिलित हैं। किसी एक घर में सीमित रहने वाली बात यहाँ पूरे नगर की प्रीति बन गयी है।
अन्तिम विशेषण कृपालु है। बालरूप की हँसी में आरम्भ से जिस अनुग्रह का चन्द्रमा चमक रहा था, वही कृपा यहाँ नगर के अनुभव में लौटती है। प्राणों से अधिक प्रिय लगने की बात किसी एक देखने वाले की नहीं रह जाती। चारों ओर एक ही लगाव है। इस प्रसंग का अन्त उन्हीं नगरवासियों के प्रेम पर होता है, जिनके लिये बाललीला बार-बार सुख का कारण कही गयी है।
चारों भाई जिन गलियों में निकलते हैं, स्त्री-पुरुष स्नेह से ठिठक जाते हैं। कोसलपुर के नर, नारी, वृद्ध और बालक, सभी को कृपालु राम अपने प्राणों से अधिक प्रिय हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस बाललीला को पढ़ते हुए हमें कौसल्या की दो मुद्राएँ साथ याद रहती हैं। एक में वे पुत्र को सँवारकर पालने में लिटा रही हैं, दूसरी में हाथ जोड़कर माया से रक्षा माँग रही हैं। दर्शन के बाद भी स्नेह का काम चलता है। वे फिर बुलाने जाती हैं, फिर पकड़ने को दौड़ती हैं। जिस पुत्र का अखण्ड रूप देखा, उसी की भूख, खेल और चेष्टा से उनका दिन भरा है। प्रेम के भीतर प्रार्थना के लिये भी पूरी जगह है।
दोहे में उनकी माँग कितनी स्पष्ट है, माया अब कभी न व्यापे। इस बात को सुनकर हम उस दर्शन को केवल ब्रह्माण्डों की विशालता में नहीं रोक सकते। माता ने माया का भय, जीव का बन्धन और भक्ति की छुड़ाने वाली शक्ति भी देखी है। इन तीनों का दर्शन उनकी विनती तक पहुँचता है। आँखों ने जो देखा, उसका फल जुड़े हुए हाथों में दिखाई देता है।
फिर दही-भात से सने मुख की किलकारी सुनायी देती है। तुलसी स्वयं इन लीलाओं की सरलता और सुन्दरता पर मन रमाने को कहते हैं। इतने बड़े दर्शन के बाद भी भोजन का यह छोटा दृश्य अपने पूरे सुख के साथ बचा है। हम उसे पढ़ते हैं तो दशरथ की हँसी, कौसल्या की दौड़ और बालक की चञ्चलता सब साथ दिखाई देते हैं। इसी घर से होकर कथा गुरुगृह और नगर की गलियों तक जाती है।
गुरु के कहे वेदतत्त्व से आरम्भ होकर प्रसंग नगरवासियों के प्राणप्रिय राम तक आता है। बीच में माताओं का दुलार, बालरूप की शोभा, कौसल्या का विस्मय और विनती, चारों भाइयों का बढ़ना तथा अध्ययन है। हर जगह प्रेम का अपना काम दिखाई देता है, किसी के हाथ बाल सँवारते हैं, कोई धूल भरे बालक को गोद में लेता है, कोई गली में उसे देखकर ठहर जाता है। कृपालु राम का सुख इसी तरह सबके पास पहुँचता है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १९८ से २०४, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।