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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 12
शिव-पार्वती का विवाह और पार्वती की जिज्ञासा
एक मंडप जिसमें दूल्हा बैठने से पहले किसी और को याद करता है। एक विदाई जिसमें माता अपना दुःख टाल देती है। और कैलास के एक बरगद के नीचे पूछा गया वह प्रश्न जिससे यह पूरी पोथी खुलती है।
इस प्रसंग में दो चीज़ें होती हैं। पहली एक विवाह है, जिसकी तैयारी बहुत पहले से चल रही थी और जो यहाँ आकर पूरा होता है। दूसरी एक प्रश्न है, जो विवाह के बहुत बाद, कैलास के एक बरगद की छाया में, पार्वती शिव के सामने रखती हैं। शिव और पार्वती का जो संवाद सुनाने का वचन याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज को दिया था, वह उसी प्रश्न से खुलता है।
विवाह की कथा अपने आप में पूरी है: वेदी, लग्नपत्रिका, कन्यादान, दहेज, ससुर की विनती, सास का वर माँगना, बेटी की विदाई। और माता का वह रोना जिसे वे कुसमय जानकर रोक लेती हैं। इसी विवाह से वह दम्पति बनता है जिसके बीच आगे रामकथा कही और सुनी जायेगी। पूछनेवाली कौन है और सुनानेवाला कौन, यह जाने बिना प्रश्न का वज़न समझ में नहीं आता।
रामचरितमानस का अपना ढंग यहाँ भी दिखता है। कथा बीच में रुककर सुननेवाले की शंका का उत्तर देती है। कवि कई बार कहता है कि वह वर्णन नहीं कर सकता। और फिर एक छोटा सा दृश्य आता है जो बड़े वर्णनों से अधिक कह जाता है। एक भौंरा, माता की ओर बार बार मुड़कर देखती बेटी, और एक बाघम्बर जिसे शिव अपने हाथ से बिछाकर स्वभाव से ही बैठ जाते हैं।
दम्पति, माता-पिता और दो मुनि
- शिव इस प्रसंग के दूल्हा, जो अपने ही विवाह के सिंहासन पर बैठने से पहले सिर नवाते हैं और मन में राम का स्मरण करते हैं।
- पार्वती हिमाचल की पुत्री, जो यहाँ पहले दुलहिन हैं और अन्त में राम के बारे में वह प्रश्न पूछनेवाली, जिससे शिव-पार्वती का संवाद खुलता है।
- हिमाचल पर्वतों के राजा, कन्या के पिता, जो इतना दहेज देकर भी हाथ जोड़कर पूछते हैं कि जिसकी हर कामना पूरी है, उसे वे क्या दें।
- मैना पार्वती की माता, जो बेटी को सीख देती हैं, फिर विधाता से शिकायत करती हैं, और फिर कुसमय जानकर अपना शोक टाल देती हैं।
- भरद्वाज प्रयाग में बैठे वे मुनि, जो यह सारी शिवकथा सुनते हैं और जिनकी आँखों का पानी उनका उत्तर बन जाता है।
- याज्ञवल्क्य कथा कहनेवाले ज्ञानी मुनि, जिनका नाम इस प्रसंग में पोद्दार की टीका से मिलता है।
- षडानन शिव और पार्वती के छह मुखवाले पुत्र, जिनके हाथों आगे चलकर तारक असुर मारा जाता है। टीका उन्हें स्वामिकार्तिक कहती है।
लगन आयी, और देवता बुलाये गये
पिछले प्रसंग में बरात ने देखनेवालों के होश उड़ा दिये थे और घर में माता का कलेजा बैठ गया था। अब वह शोर पीछे छूट जाता है, और रीति लौट आती है। मुनि लौटकर हिमाचल को लग्नपत्रिका सुनाते हैं, विवाह का समय देखा जाता है, और तब देवताओं को बुलावा भेजा जाता है।
सब देवता आदर से बुलाये जाते हैं और सबको यथायोग्य आसन दिया जाता है। वेद की रीति से वेदी सजायी जाती है, और स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगती हैं। एक ही साँस में वेद का विधान और स्त्रियों के गीत साथ साथ चलते हैं।
एक दिव्य सिंहासन है, इतना सुन्दर कि उसका वर्णन नहीं हो सकता। उसे स्वयं ब्रह्मा ने बनाया है। इसके बाद जो होता है, वह चुपचाप कहा गया है।
शिव उस आसन पर सीधे नहीं बैठते। पहले ब्राह्मणों को सिर नवाते हैं, फिर हृदय में अपने स्वामी राम का स्मरण करते हैं, और तब बैठते हैं। विवाह उनका अपना है, सिंहासन ब्रह्मा का बनाया है, और उस क्षण में उनका पहला काम झुकना है।
इसी प्रसंग के अन्त में बरगद के नीचे जिनसे पूछा जायेगा कि राम कौन हैं, वे अपने विवाह में राम को हृदय में लिये बैठते हैं।
दुलहिन, और वह वर्णन जो हार जाता है
अब मुनि पार्वती को बुलवाते हैं। सखियाँ शृंगार करके उन्हें ले आती हैं। उनका रूप देखते ही सारे देवता मोहित हो जाते हैं। फिर वे पहचान लेते हैं कि ये जगत की माता और शिव की पत्नी हैं, और मन ही मन प्रणाम करते हैं।
पहले मोह, फिर पहचान, और पहचान के साथ मन ही मन प्रणाम।
कवि कई बार कहता है कि यह रूप कहा नहीं जा सकता: संसार में ऐसा कवि कौन है, करोड़ों मुँह से भी इस शोभा का बखान नहीं होता। वेद, शेष और सरस्वती तक कहते हुए सकुचाते हैं, तो मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनती में। और फिर वह एक छोटा सा चित्र देता है।
पार्वती मंडप के बीच वहाँ जाती हैं जहाँ शिव बैठे हैं। संकोच के मारे वे पति के चरणों की ओर देख नहीं पातीं। पर उनका मन भौंरा बनकर वहीं पहुँच चुका है। आँख झुकी है, और मन पहले ही चरणों तक जा पहुँचा है।
जो बात करोड़ों मुँह से नहीं बनी, वह एक झुकी आँख और एक भौंरे से बन गयी। भौंरा फूल के पास जाकर लौटता नहीं, वहीं रम जाता है।
फिर मुनियों की आज्ञा से शिव और पार्वती दोनों गणेश का पूजन करते हैं। और कथा इसी पर सुननेवाले से एक बात कह देती है।
यह सुनकर कोई शंका न करे, देवताओं को मन में अनादि जाने। टीका वह शंका खोलकर बताती है: गणेश तो शिव और पार्वती के पुत्र हैं, फिर विवाह से पहले वे कहाँ से आ गये?
उत्तर इतना ही है कि देवता अनादि हैं, और कथा आगे चल पड़ती है।
कन्यादान, और एक वाक्य का विवाह
अब विधि आरम्भ होती है। वेदों में विवाह की जो रीति कही गयी है, महामुनि वह सारी रीति करवाते हैं, कुछ भी छोड़ा नहीं जाता।
फिर कन्यादान का क्षण आता है। हिमाचल हाथ में कुश लेते हैं, कन्या का हाथ पकड़ते हैं। यह जानते हुए कि यह कन्या शिव की ही पत्नी भवानी है, वे उसे शिव को समर्पित कर देते हैं। एक हाथ में कुश है, दूसरे में बेटी का हाथ, और दोनों एक साथ दिये जा रहे हैं।
यह जानना रीति को हल्का नहीं करता। हिमाचल फिर भी पिता की तरह खड़े हैं, कुश हाथ में लिये, और वही करते हैं जो एक पिता को करना होता है।
शिव पाणिग्रहण करते हैं। देवता मन में बहुत हर्षित होते हैं, श्रेष्ठ मुनि वेदमन्त्र पढ़ते हैं, और देवता जयकार करते हैं। तरह तरह के बाजे बजते हैं और आकाश से तरह तरह के फूल बरसते हैं। और विवाह की सूचना एक ही वाक्य में आती है।
शिव और पार्वती का विवाह हो गया। बस इतना। उसी के साथ सारे भुवन में उत्साह भर गया। जिसकी तैयारी में इतना समय लगा, वह होने में एक वाक्य लेता है।
दहेज, और वे दो हाथ जो जुड़ गये
अब दहेज आता है। उसकी सूची लम्बी और ठोस है: दासियाँ, दास, रथ, घोड़े, हाथी, गायें, वस्त्र, मणि और तरह तरह की चीज़ें, अन्न, और सोने के बर्तन, सब गाड़ियों में लदवाकर। उसका बखान नहीं हो सकता।
इतना सब देकर हिमाचल हाथ जोड़ लेते हैं और शिव से एक प्रश्न पूछते हैं।
आप तो पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दूँ? जिसकी कोई कामना ही शेष न हो, उसे क्या दिया जाये? यह कहकर वे शिव के चरण पकड़ लेते हैं, और पकड़े ही रह जाते हैं।
शिव ससुर को हर तरह से सन्तोष दिलाते हैं। फिर मैना आती हैं, हृदय प्रेम से भरा हुआ, और वे भी शिव के चरण पकड़ लेती हैं। पहले पिता झुकते हैं, फिर माता।
पिता ने पूछा था कि वे क्या दें। माता माँगती हैं, और जो माँगती हैं वह बेटी के लिये है।
हे नाथ, यह पार्वती मुझे मेरे प्राणों के समान प्यारी है। इसे अपने घर की टहलनी बना लीजियेगा, और इसके सब अपराध क्षमा करते रहियेगा। अब प्रसन्न होकर मुझे यही वर दीजिये।
जिस घर में बेटी जा रही है, उसमें उन्होंने उसके लिये टहलनी की जगह माँगी, और यह कि उसके सब अपराध क्षमा होते रहें।
माँ जानती है कि बेटी जगत की माता है। फिर भी उसी के मुँह से निकलता है कि उसे घर की टहलनी रख लीजिये। माँ की आँख में बेटी वही रहती है जो थी। और अपराध क्षमा करने की प्रार्थना में वह सारा भविष्य है जो एक माता विदाई के दिन अपने भीतर देख लेती है।
माता की सीख, और माता का प्रश्न
शिव सास को बहुत तरह से समझाते हैं। मैना उनके चरणों में सिर नवाकर घर लौटती हैं। वे पार्वती को बुलाकर गोद में बिठाती हैं, और सीख देती हैं: सदा शिव के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है। उनके लिये पति ही देवता है, दूसरा कोई नहीं।
यह कहते कहते उनकी आँखों में आँसू भर आते हैं और वे बेटी को छाती से चिपटा लेती हैं। और तभी उनके मुँह से एक प्रश्न निकलता है।
विधाता ने जगत में स्त्री को बनाया ही क्यों? पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। जो मुँह अभी नारीधर्म समझा रहा था, उसी से यह निकल रहा है।
यों कहती हुई माता प्रेम में बहुत व्याकुल हो जाती हैं।
फिर वे कुसमय जानकर धीरज धर लेती हैं। टीका के शब्दों में, दुःख करने का अवसर न जानकर।
फिर विदाई होती है।
मैना बार बार मिलती हैं और चरण पकड़कर गिर पड़ती हैं। टीका के अनुसार ये चरण पार्वती के हैं, यानी माता बेटी के चरणों में गिर रही है। पार्वती सब स्त्रियों से मिल भेंटकर फिर लौटकर माता के हृदय से लिपट जाती हैं।
माता से फिर मिलकर पार्वती चलीं, सबने उचित आशीर्वाद दिये, और वे मुड़ मुड़कर माता की ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिव के पास ले गयीं।
फिर शिव सब याचकों को सन्तुष्ट करके पार्वती के साथ कैलास की ओर चलते हैं। देवता फूल बरसाते हैं और आकाश में नगाड़े बजते हैं। हिमाचल बहुत प्रेम से शिव को पहुँचाने साथ चलते हैं, और शिव उन्हें बहुत तरह से सन्तोष दिलाकर विदा करते हैं। हिमाचल तुरन्त घर लौटते हैं, सब पर्वतों और सरोवरों को बुलाते हैं, और आदर, दान, विनय और बहुत सम्मान के साथ सबको विदा करते हैं।
बड़ा उत्सव यहीं बीतता है।
कैलास, और एक चुप्पी
शिव कैलास पहुँचते हैं और देवता अपने अपने लोकों को लौट जाते हैं। फिर कहनेवाला अपनी ओर से बोलता है।
वह कहता है कि शिव और पार्वती जगत के माता-पिता हैं, इसलिये मैं उनके शृंगार का वर्णन नहीं करता। कुछ ही देर पहले वह कह रहा था कि वर्णन कर नहीं सकता। यहाँ वह कह रहा है कि वर्णन करेगा नहीं।
टीका के अनुसार यह कहनेवाला कवि है।
फिर कथा तेज़ी से आगे बढ़ती है। शिव और पार्वती अपने गणों के साथ कैलास पर रहने लगते हैं, नित्य नये विहार होते हैं, और बहुत समय बीत जाता है। फिर छह मुखवाले पुत्र षडानन का जन्म होता है, जिन्होंने बड़े होकर युद्ध में तारक असुर को मारा। कवि कहता है कि षडानन के जन्म, कर्म, प्रताप और पुरुषार्थ की कथा वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और सारा जगत उसे जानता है। इसलिये उसने शिव के पुत्र का चरित्र संक्षेप में ही कहा है।
यानी यहाँ दो बातें छोड़ी गयी हैं, और दोनों का कारण कथा में ही दिया है। शृंगार इसलिये नहीं कहा गया कि शिव और पार्वती जगत के माता-पिता हैं। और षडानन की कथा इसलिये संक्षेप में है कि उसे सारा जगत जानता है।
फिर कहनेवाला उनकी ओर मुड़ता है जो यह कथा आगे कहेंगे और गायेंगे।
जो स्त्री पुरुष शिव और पार्वती के इस विवाह को कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याण के कामों और विवाह जैसे मंगल अवसरों पर सदा सुख पायेंगे।
फिर कवि एक बार और कहता है कि शिव का चरित्र समुद्र जैसा है जिसका पार वेद तक नहीं पाते, तो मन्दबुद्धि तुलसीदास उसका वर्णन कैसे करे। इसी बात पर शिवकथा बन्द होती है।
प्रयाग में, एक परीक्षा जो हो चुकी थी
अब कथा एक क़दम पीछे हटती है, और याद आता है कि यह सारी शिवकथा किसी को सुनायी जा रही थी। सुननेवाले प्रयाग में बैठे भरद्वाज हैं। यह रसीली और सुहावनी कथा सुनकर उन्हें बहुत सुख मिला, और आगे सुनने की लालसा और बढ़ गयी। आँखों में पानी भर आया और रोम खड़े हो गये।
वे प्रेम में ऐसे डूबे कि मुँह से बात नहीं निकली। यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि प्रसन्न हुए। पोद्दार की टीका उन्हें याज्ञवल्क्य बताती है। वे कहते हैं, हे मुनीश, आपका जन्म धन्य है, आपको शिव प्राणों के समान प्रिय हैं।
फिर याज्ञवल्क्य वह बात कहते हैं जिस पर शिवकथा से रामकथा की ओर मोड़ आता है।
जिनकी शिव के चरणों में प्रीति नहीं है, वे राम को सपने में भी अच्छे नहीं लगते। शिव के चरणों में निष्कपट प्रेम होना ही रामभक्त का लक्षण है। रामभक्त की पहचान यहाँ शिव के प्रेम से की जा रही है।
और फिर यही बात दूसरी ओर से कही जाती है। शिव के समान राम की भक्ति का व्रत किसने निभाया है? उन्होंने बिना किसी पाप के सती जैसी पत्नी को त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके राम की भक्ति दिखा दी। और राम को शिव के समान प्यारा कौन है?
एक बात कहती है कि रामभक्त की परख शिवप्रेम है, दूसरी पूछती है कि शिव के समान रामभक्त कौन है। यह जोड़ी ठीक उस मोड़ पर आती है जहाँ शिवकथा ख़त्म होकर रामकथा शुरू होती है। वह रामकथा आगे शिव के मुँह से, पार्वती के माँगने पर निकलेगी।
और अब याज्ञवल्क्य बताते हैं कि शिवकथा पहले कहकर उन्होंने क्या जाना।
मैंने पहले शिव का चरित्र कहकर आपका मर्म समझ लिया। आप राम के पवित्र सेवक हैं और सब विकारों से रहित हैं। यानी परख शिवकथा कहते कहते ही हो चुकी थी।
याज्ञवल्क्य ने जो देखा, वह कथा पहले ही बता चुकी है: आँखों में पानी, खड़े रोम, और मुँह से न निकलती वाणी। उनके शब्द उसके बाद आते हैं।
फिर याज्ञवल्क्य कहते हैं कि मैंने आपका गुण और शील जान लिया, अब राम की लीला कहता हूँ, सुनिये। और यह भी कि आज आपसे मिलकर उनके मन में जो आनन्द हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता।
कठपुतली, सूत्रधार, और कवि का आँगन
रामकथा शुरू करने से पहले याज्ञवल्क्य एक बात साफ़ कर देते हैं। राम का चरित्र अपार है, सौ करोड़ शेष भी उसे नहीं कह सकते। फिर भी जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणी को चलानेवाले, हाथ में धनुष लिये राम का स्मरण करके कहता हूँ।
कहनेवाला यह दावा नहीं करता कि वह जानता है। वह कहता है कि जैसा उसने सुना है, वैसा कह रहा है।
फिर एक चित्र आता है। सरस्वती कठपुतली हैं और अन्तर्यामी राम सूत्रधार हैं। जिस कवि को वे अपना भक्त जानकर उस पर कृपा करते हैं, उसके हृदय रूपी आँगन में वे सरस्वती को नचाते हैं।
यानी वाणी को चलानेवाले वही राम हैं जिनका चरित्र कहा जा रहा है, और नाच का मैदान कवि का हृदय है, उसका आँगन।
कठपुतली अपने आप नाचती दिखती है, और डोर ऊपर होती है। याज्ञवल्क्य कथा आरम्भ करने से पहले ही बता देते हैं कि डोर किसके हाथ में है।
फिर याज्ञवल्क्य उन्हीं कृपालु राम को प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्हीं के निर्मल गुणों की कथा कहता हूँ। और तुरन्त दृश्य बदल जाता है, और कथा कैलास पर पहुँच जाती है।
वह बरगद, और एक साधारण दिन
कैलास पर्वतों में श्रेष्ठ और बहुत रमणीय है, जहाँ शिव और पार्वती सदा रहते हैं। सिद्ध, तपस्वी, योगी, देवता, किन्नर और मुनियों के समूह वहाँ रहते हैं, सब बड़े पुण्यात्मा, और सब शिव की सेवा करते हैं।
फिर कथा यह भी बता देती है कि वहाँ कौन नहीं पहुँचता। जो विष्णु और शिव दोनों से विमुख हैं और जिनकी धर्म में प्रीति नहीं, वे सपने में भी वहाँ नहीं जा सकते।
उस पर्वत पर एक विशाल बरगद है, नित्य नया और हर ऋतु में सुन्दर। वहाँ ठण्डी, धीमी और सुगन्धित, तीनों तरह की हवा बहती है, और उसकी छाया बड़ी ठण्डी है। वह शिव के विश्राम का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है।
फिर एक सादी सी बात आती है।
एक बार शिव उस पेड़ के नीचे गये, और उसे देखकर उनके हृदय में बहुत आनन्द हुआ। एक बार, यानी किसी एक दिन, जिसके बारे में और कुछ नहीं बताया जाता।
वह एक बेनाम दिन है, और शिव-पार्वती का संवाद उसी दिन होगा।
शिव अपने हाथ से बाघम्बर बिछाते हैं और स्वभाव से ही वहाँ बैठ जाते हैं। टीका इसका अर्थ देती है, बिना किसी ख़ास प्रयोजन के। इसी बैठक में पार्वती का प्रश्न आयेगा।
कुन्द के फूल, चन्द्रमा और शंख जैसा गोरा शरीर, बहुत लम्बी भुजाएँ, और मुनियों जैसे वस्त्र। चरण नये खिले लाल कमल जैसे, और नखों की ज्योति ऐसी जो भक्तों के हृदय का अँधेरा हर ले। गहनों के नाम पर साँप और भस्म। मुख शरद के चन्द्रमा को भी फीका करनेवाला।
सिर पर जटाओं का मुकुट और गंगा, कमल जैसे बड़े नेत्र, नीला कण्ठ, और मस्तक पर दूज का चन्द्रमा। वे बैठे हुए ऐसे लगते हैं मानो शान्तरस ने ही शरीर धारण कर लिया हो।
और इसी शान्ति में से अगला दृश्य निकलता है।
बायाँ भाग, और वह क्षण जो देखकर चुना गया
अच्छा मौक़ा जानकर पार्वती शिव के पास जाती हैं।
शिव बरगद के नीचे स्वभाव से बैठे हैं, शान्त, और पार्वती यही घड़ी चुनती हैं।
अपनी प्रिया जानकर शिव उनका बहुत आदर करते हैं और अपनी बायीं ओर बैठने के लिये आसन देते हैं। पार्वती प्रसन्न होकर पास बैठ जाती हैं, और तब उन्हें पिछले जन्म की कथा याद आ जाती है।
वह जन्म सती का था। आगे वे स्वयं उसकी बात करेंगी।
फिर पार्वती अनुमान करती हैं कि पति के हृदय में उनके लिये पहले से अधिक प्रेम है, और तब हँसकर प्रिय वाणी में बोलती हैं। पूछने से पहले उन्होंने दो चीज़ें तौलीं: क्षण, और सामने वाले के मन का प्रेम। आसन शिव ने स्वयं दिया था।
पोद्दार की टीका के अनुसार, कहनेवाले याज्ञवल्क्य यहाँ बीच में बता देते हैं कि जो कथा सब लोगों का हित करनेवाली है, पार्वती वही पूछना चाहती हैं।
पार्वती पहले शिव की प्रशंसा करती हैं: आपकी महिमा तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। चर, अचर, नाग, मनुष्य और देवता सब आपके चरणों की सेवा करते हैं। आप समर्थ हैं, सर्वज्ञ हैं, सब कलाओं और गुणों के भण्डार हैं, योग, ज्ञान और वैराग्य के निधि हैं। और आपका नाम शरण में आये लोगों के लिये कल्पवृक्ष है।
यह प्रशंसा नींव है। आगे वे इसी कल्पवृक्ष को अपने पक्ष में लगा देंगी।
वह प्रश्न जो वे पूछना चाहती थीं
अब वे माँगती हैं, और माँग को एक शर्त में बाँध देती हैं। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी जानते हैं, तो राम की तरह तरह की कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिये।
और तुरन्त वह प्रशंसा काम पर लग जाती है। जिसका घर कल्पवृक्ष के नीचे हो, वह दरिद्रता का दुःख क्यों सहे? अभी उन्होंने ही शिव के नाम को कल्पवृक्ष कहा था। अब वे कहती हैं कि उसी वृक्ष के नीचे रहकर भी मैं अज्ञान में बैठी हूँ, इसलिये यह सोचकर मेरी बुद्धि का भारी भ्रम दूर कीजिये। विनती के भीतर एक साफ़ तर्क है।
फिर वे अपनी उलझन खोलती हैं। परमार्थ को जाननेवाले मुनि राम को अनादि ब्रह्म कहते हैं। शेष, सरस्वती, वेद और पुराण सब राम के गुण गाते हैं। और आप स्वयं दिन रात आदर से राम राम जपते हैं। ये तीन गवाह गिनाकर वे प्रश्न रखती हैं।
ये राम वही अयोध्या के राजा के पुत्र हैं, या कोई और, अजन्मा, निर्गुण और अगोचर? प्रश्न सीधा है। और फिर वे उसे वहाँ ले जाती हैं जहाँ वह चुभता है।
यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे, और यदि ब्रह्म हैं तो स्त्री के विरह में उनकी बुद्धि बावली कैसे हो गयी? यही उनकी दुविधा की जड़ है।
और वे बताती हैं कि उलझन आयी कहाँ से: उनका चरित्र देखकर और उनकी महिमा सुनकर मेरी बुद्धि चकरा रही है। देखना एक ओर है, सुनना दूसरी ओर, और दोनों मेल नहीं खाते।
फिर वे दूसरा रास्ता भी खुला छोड़ती हैं: यदि कोई इच्छारहित, व्यापक और समर्थ ब्रह्म और है, तो मुझे समझाकर कहिये। और साथ में एक छोटी प्रार्थना: मुझे नादान जानकर मन में क्रोध न लाइयेगा, जिस तरह मेरा मोह मिटे वही कीजिये।
और अब वह बात आती है जो इस प्रश्न को केवल जिज्ञासा नहीं रहने देती।
मैंने वन में राम की प्रभुता देखी थी, पर बहुत डर के कारण वह बात आपको सुनायी नहीं। फिर भी मेरे मलिन मन को बोध नहीं हुआ, और उसका फल मैंने अच्छी तरह पा लिया।
यह सती का वही प्रसंग है जिसकी ओर प्रयाग वाले हिस्से में याज्ञवल्क्य ने संकेत किया था, कि शिव ने बिना किसी पाप के सती जैसी पत्नी को त्याग दिया। अब वही बात पार्वती के अपने मुँह से आ रही है, एक हिसाब की तरह: भय, चुप्पी, और उसका फल।
एक बार उनके सामने प्रमाण भी आया था और प्रश्न भी था। डर के मारे उन्होंने वह भीतर रख लिया, कहा नहीं, और उसका फल भुगता। आज वही स्त्री दूसरे जन्म में, उसी पति की बायीं ओर बैठकर, वह प्रश्न कह रही है जो उस दिन गले में अटक गया था।
इसलिये बरगद के नीचे का यह प्रश्न लौटा हुआ प्रश्न है, और इसकी क़ीमत पूछनेवाली चुका चुकी है।
फिर वे पति के साथ अपना हिसाब भी साफ़ कर देती हैं: अब भी मेरे मन में कुछ सन्देह बचा है, कृपा कीजिये। आपने उस समय मुझे बहुत तरह से समझाया था, यह याद करके मुझ पर क्रोध न कीजिये। अब वह मोह नहीं रहा, अब मन में रामकथा सुनने की रुचि है। हे शिव, राम के गुणों की पवित्र कथा कहिये।
और अन्त में वे झुक जाती हैं।
मैं धरती पर सिर टेककर आपके चरणों की वन्दना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ: वेदों के सिद्धान्त को निचोड़कर राम का निर्मल यश कहिये। निचोड़ना वही घरेलू शब्द है जो कपड़े के लिये बोला जाता है। श्रुति का सारा सिद्धान्त एक ओर, और उसमें से निकला रस दूसरी ओर, और माँग उसी रस की है।
यहीं यह प्रसंग रुकता है। प्रश्न रखा जा चुका है, दोनों आसन पर बैठे हैं, बरगद की छाया वैसी ही है, और उत्तर अभी नहीं आया। जो इसके बाद आरम्भ होगा, वह शिव का उत्तर है।
टला हुआ रोना, लौटा हुआ प्रश्न
इस प्रसंग के विवाह के दोनों ओर दो चुपचाप किये गये काम हैं। एक बार दूल्हा बैठने से पहले राम को याद करता है। एक बार माता कुसमय जानकर रोना टाल देती हैं।
और तीसरी बात इन दोनों से बड़ी है। जिसने एक बार डरकर अपना प्रश्न भीतर रख लिया था, वह दूसरे जन्म में लौटकर वही प्रश्न पूछती है। इस बार पूछने से पहले वह क्षण भी चुनती है, आसन भी पाती है, और सामने वाले का मन भी तौल लेती है।
जो जोड़ा मंडप में बना था, वही बरगद के नीचे बैठा है। अब उनके बीच वह संवाद आरम्भ हुआ है जिसे सुनाने का वचन याज्ञवल्क्य ने प्रयाग में दिया था। वहाँ भरद्वाज ने पूछा था कि शिव जिन राम को जपते हैं, वे अयोध्या के राजकुमार हैं या कोई और। याज्ञवल्क्य ने कहा था कि ऐसा ही संशय पार्वती ने किया था।
कुछ बातें यहाँ जान-बूझकर नहीं कही गयीं। शिव और पार्वती के गृहस्थ जीवन का शृंगार वर्णन नहीं है, क्योंकि वे जगत के माता-पिता हैं। षडानन के जन्म की पूरी कथा नहीं है, क्योंकि उसे सब जानते हैं। और गणेशपूजन की शंका का उत्तर एक ही वाक्य में दे दिया गया।
अगला प्रसंग उसी बरगद के नीचे से शुरू होता है। वहाँ पार्वती की विनती आगे चलती है। वे गिनाती हैं कि राम की कौन कौन सी कथा सुनना चाहती हैं। और जो उत्तर आयेगा, वह पहले पूछनेवाली की प्रशंसा से आरम्भ होगा, फिर रामकथा की महिमा तक जायेगा।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 99 से 109, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।