रामचरितमानस · बालकाण्ड · शिव-पार्वती का विवाह और पार्वती की जिज्ञासा
शिव-पार्वती का विवाह और पार्वती की जिज्ञासा
एक मंडप जिसमें दूल्हा बैठने से पहले किसी और को याद करता है, एक विदाई जिसमें माता अपना दुःख टाल देती है, और कैलास के एक बरगद के नीचे पूछा गया वह प्रश्न जिससे यह पूरी पोथी खुलती है।
इस पन्ने पर दो चीजें होती हैं, और दूसरी के बिना यह पूरी पोथी होती ही नहीं। पहली एक विवाह है, जिसकी तैयारी पिछले कई दोहों से चल रही थी और जो यहाँ आकर पूरा होता है। दूसरी एक प्रश्न है, जो विवाह के बहुत बाद, कैलास के एक बरगद की छाया में, पत्नी की ओर से पति के सामने रखा जाता है। पहली घटना ग्यारह दोहों में से आठ लेती है और दूसरी तीन। पर जो आगे के सैकड़ों पन्ने आते हैं, वे सब उस दूसरी घटना से निकलते हैं।
इसीलिये इस प्रसंग को पढ़ते हुए एक बात ध्यान में रखने लायक है। यह विवाह की कथा अपने आप में पूरी है, उसमें बेदी है, लग्नपत्रिका है, कन्यादान है, दहेज है, ससुर की विनती है, सास का वर माँगना है, बेटी की विदाई है, और माता का वह रोना है जिसे वह जान-बूझकर रोक लेती है। पर तुलसीदास यह सब इसलिये नहीं कह रहे कि विवाह सुनाना है। वे इसलिये कह रहे हैं कि जिस दम्पति के बीच आगे रामकथा कही और सुनी जायेगी, उस दम्पति का बनना पहले दिखा दिया जाय। पूछनेवाली कौन है और सुनानेवाला कौन है, यह जाने बिना प्रश्न का वजन समझ में नहीं आता।
और यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। जिस ढंग से यह पन्ना चलता है, वह इसी ग्रन्थ का ढंग है: कवि बीच कथा में रुककर सुननेवाले की शंका का उत्तर देता है, अपनी असमर्थता कई बार कहता है, और फिर एक छोटा सा दृश्य रख देता है जो सारे बड़े वर्णनों से अधिक काम कर जाता है। यहाँ वह छोटा दृश्य एक भौंरे का है, और एक माता का बार-बार मुड़कर देखना है, और एक बाघम्बर का है जिसे कोई अपने हाथ से बिछाकर बिना किसी प्रयोजन के बैठ जाता है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- शिव इस प्रसंग के दूल्हा, जो अपने ही विवाह के सिंहासन पर बैठने से पहले सिर नवाते हैं और मन में किसी और का स्मरण करते हैं।
- पार्वती हिमवान की पुत्री, जो इस पन्ने पर पहले दुलहिन हैं और अन्त में वह प्रश्न पूछनेवाली, जिससे रामकथा आरम्भ होती है।
- हिमवान पर्वतराज, कन्या के पिता, जो सब कुछ देकर भी हाथ जोड़कर यही कहते हैं कि देने योग्य कुछ है ही नहीं।
- मैना पार्वती की माता, जो बेटी को सीख देती हैं, फिर विधाता से शिकायत करती हैं, और फिर कुसमय जानकर अपना शोक टाल देती हैं।
- भरद्वाज प्रयाग में बैठे वे मुनि, जो यह सारी शिवकथा सुनते हैं और जिनकी आँखों का पानी उनका उत्तर बन जाता है।
- याज्ञवल्क्य कथा कहनेवाले ज्ञानी मुनि, जिनका नाम इस प्रसंग के छन्दों में नहीं, पोद्दारजी की टीका में मिलता है।
- षडानन शिव और पार्वती के छह मुखवाले पुत्र, जिनके हाथों आगे चलकर तारक नामक असुर मारा जाता है; टीका उन्हें स्वामिकार्तिक कहती है।
लगन आयी, और देवता बुलाये गये
पिछले प्रसंग में जो कुछ हुआ था, वह तमाशे की तरह था। बरात ऐसी चली थी कि देखनेवालों के होश उड़ गये थे, और घर में माता का कलेजा बैठ गया था। अब वह सब पीछे छूट जाता है। इस प्रसंग का पहला ही दोहा एक दूसरी दुनिया खोलता है, जिसमें शोर नहीं है, व्यवस्था है। मुनि लौटकर आते हैं, पर्वतराज को लग्नपत्रिका सुनाते हैं, और तब जाकर देवताओं को बुलावा भेजा जाता है।
क्रम पर ध्यान दीजिये, क्योंकि तुलसीदास ने उसे बेकार नहीं रखा है। पहले समय देखा जाता है, फिर निमंत्रण जाता है। जिस घर में अभी कुछ देर पहले डर बैठा था, वहाँ अब पंचांग खुला है और मुहूर्त पढ़ा जा रहा है। यह रीति का लौट आना है, और यही इस पूरे हिस्से का स्वर है। जो चीज असाधारण है, वह साधारण विधि से सम्पन्न की जायेगी।
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।
दोहा ९९
समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥ ९९॥
अगली ही चौपाई में मंडप बन जाता है। देवता आदर के साथ बुलाये जाते हैं और सबको यथायोग्य आसन दिया जाता है। वेद की रीति से वेदी सजायी जाती है, और उसी पंक्ति के दूसरे आधे हिस्से में स्त्रियाँ मंगलगीत गाने लगती हैं। एक ही पंक्ति में वेदविधान और औरतों के गीत साथ-साथ रख देना तुलसीदास की अपनी आदत है। वे दोनों को एक ही मंडप का हिस्सा मानते हैं, और किसी को दूसरे से ऊँचा नहीं बिठाते।
फिर सिंहासन आता है। वह इतना सुन्दर है कि उसका वर्णन नहीं बनता, और उसके न बनने का कारण भी साथ ही दे दिया जाता है: वह ब्रह्मा का बनाया हुआ है। इसके बाद जो होता है, वह इस पूरे पन्ने की सबसे बड़ी बात है, और वह इतनी चुपचाप कही गयी है कि पढ़ते हुए निकल जाती है।
सिंघासनु अति दिब्य सुहावा । जाइ न बरनि बिरंचि बनावा॥
चौपाई १
बैठे सिव बिप्रन्ह सिरु नाई । हृदयँ सुमिरि निज प्रभु रघुराई॥
दूल्हा उस आसन पर सीधे बैठता नहीं है। पहले ब्राह्मणों को सिर नवाता है, फिर हृदय में अपने प्रभु रघुनाथ का स्मरण करता है, और तब बैठता है। सोचिये कि यह क्षण क्या है। सभा में जितने भी बैठे हैं, सबसे ऊँचा आसन उसी का है; जिस विवाह के लिये सब जुटे हैं, वह उसी का है; और उस क्षण में उसका पहला काम झुकना है।
और जिसका वह स्मरण करता है, वह कौन है। यह वही नाम है जिसके चरित्र के लिये आगे यह सारा ग्रन्थ खड़ा होगा। जो पोथी इसी पन्ने के अन्त में एक प्रश्न से खुलेगी, उसका उत्तर देनेवाला पहले से ही अपने हृदय में उसी को लिये बैठा है। तुलसीदास ने यहाँ कोई घोषणा नहीं की, किसी को समझाया नहीं। बस बैठने की क्रिया के भीतर एक स्मरण रख दिया, और आगे बढ़ गये।
सार: विवाह की तैयारी रीति से होती है, मुहूर्त देखकर देवता बुलाये जाते हैं, और मंडप में वेदविधान तथा मंगलगीत साथ-साथ चलते हैं। पर पन्ने का असली बीज सिंहासन पर बैठने के ठीक पहले पड़ता है, जहाँ दूल्हा सिर नवाकर हृदय में रघुनाथ का स्मरण करता है।
दुलहिन, और वह वर्णन जो हार जाता है
अब मुनीश्वर पार्वती को बुलवाते हैं। सखियाँ शृंगार करके उन्हें ले आती हैं, और आते ही एक बात होती है जिसे तुलसीदास बिना किसी संकोच के लिख देते हैं: रूप देखते ही सारे देवता मोहित हो जाते हैं। इसके तुरन्त बाद दूसरी बात होती है। वे पहचान लेते हैं कि यह जगदम्बा हैं और शिव की पत्नी हैं, और मन-ही-मन प्रणाम कर लेते हैं।
दोनों बातों का क्रम ही उनका अर्थ है। पहले मोह, फिर पहचान, और पहचान आते ही मोह प्रणाम में बदल जाता है। तुलसीदास इसे समझाते नहीं, केवल इसी क्रम में रख देते हैं। जो चीज न पहचानी जाय तो खींचती है, वही पहचानी जाने पर झुका देती है।
इसके बाद कवि चार बार हार मानता है। कहता है कि संसार में ऐसा कवि कौन है जो इस छबि को कह सके। कहता है कि करोड़ों मुखों से भी भवानी की सुन्दरता की सीमा नहीं बखानी जा सकती। छन्द में कहता है कि वेद, शेष और सरस्वती तक कहते हुए सकुचा जाते हैं, तो मन्दबुद्धि तुलसी किस गिनती में है। यह हारना चार बार दुहराया जाता है, और फिर, ठीक इसके बाद, वह एक छोटी सी चीज देता है।
कोटिहुँ बदन नहिं बनै बरनत जग जननि सोभा महा।
छंद १
सकुचहिं कहतश्रुति सेष सारद मंदमति तुलसी कहा॥
छबिखानि मातु भवानि गवनीं मध्य मंडप सिव जहाँ।
अवलोकि सकहिं न सकुच पति पद कमल मनु मधुकरु तहाँ॥
शोभा की खान वह माता मंडप के बीच में उस जगह जाती हैं जहाँ शिव बैठे हैं। और वहाँ पहुँचकर संकोच के मारे पति के चरणकमलों की ओर देख नहीं पातीं। पर मन नहीं मानता। मन भौंरा है, और भौंरा वहीं है। आँख झुकी हुई है और मन पहले ही पहुँच चुका है।
यही तुलसीदास का तरीका है। करोड़ों मुख काम नहीं आये, वेद सकुचा गये, पर एक भौंरा काम कर गया। जो बात बड़े विशेषणों से नहीं बनती थी, वह एक झुकी हुई आँख और एक बेकाबू मन से बन जाती है। और मनु मधुकरु का यह चित्र इसलिये भी सटीक है कि भौंरा फूल के पास जाकर लौटता नहीं, वहीं रम जाता है।
अब एक अटपटी बात आती है, और तुलसीदास उसे छिपाते नहीं। विवाह से पहले मुनियों की आज्ञा से गणेश का पूजन होता है, और पूजन करनेवाले दोनों हैं, शिव भी और भवानी भी। सुननेवाले के मन में तुरन्त प्रश्न उठेगा, क्योंकि गणेश तो इन्हीं दोनों की सन्तान हैं, और विवाह अभी हुआ ही नहीं। कवि उस प्रश्न के उठने की प्रतीक्षा नहीं करता।
मुनि अनुसासन गनपतिहि पूजेउ संभु भवानि।
दोहा १००
कोउ सुनि संसय करै जनि सुर अनादि जियँ जानि॥ १००॥
कोई सुनकर शंका न करे, मन में देवताओं को अनादि जानकर चले। इतना कहकर वे आगे बढ़ जाते हैं। यहाँ जो चीज देखने लायक है वह यह है कि कवि अपनी ही कथा को बीच में रोक देता है। मंडप सजा हुआ है, दुलहिन आ चुकी हैं, और ऐन उसी क्षण वह मुड़कर सुननेवाले से बात करता है।
यह उस आदमी का काम है जो जानता है कि उसकी कथा कहाँ सुनी जायेगी। वह मान लेता है कि सुननेवाला हिसाब लगायेगा, और हिसाब लगाना उसका हक है। इसलिये वह उत्तर पहले रख देता है, ताकि शंका कथा को न खा जाय। पूरे रामचरितमानस में यह बार-बार होता है, और यहाँ पहली बार इतना साफ दिखता है।
सार: पार्वती के रूप पर देवता पहले मोहित होते हैं और पहचानते ही प्रणाम करते हैं। कवि चार बार वर्णन से हार मानकर एक ही छोटा चित्र देता है, जिसमें आँख संकोच से झुकी है और मनरूपी भौंरा पहले ही चरणों तक पहुँच चुका है। फिर वह कथा रोककर गणेशपूजन की शंका का उत्तर दे देता है।
कन्यादान, और आधी पंक्ति का विवाह
अब विधि आरम्भ होती है। वेदों में विवाह की जैसी रीति कही गयी है, महामुनि वह सारी रीति करवाते हैं। एक भी चीज छोड़ी नहीं जाती, और कवि यह अलग से कहता है, मानो यह बताना जरूरी हो कि यहाँ कुछ भी संक्षेप में नहीं निपटाया गया।
फिर वह क्षण आता है जिसके लिये पिता जिया करते हैं। पर्वतराज हाथ में कुश लेते हैं, कन्या का हाथ पकड़ते हैं, और उन्हें भवानी जानकर शिव को समर्पित कर देते हैं। इस एक पंक्ति में दो हाथ हैं, एक में घास और एक में बेटी, और दोनों एक साथ दिये जा रहे हैं।
और जानि भवानी इस पंक्ति का सबसे कड़ा शब्द है। हिमवान यह जानते हुए दान कर रहे हैं कि जिसे वे दे रहे हैं वह जगत की माता है, और जिसे दे रहे हैं वह जगत के पिता हैं। जानकारी से रीति हल्की नहीं पड़ती। वे फिर भी पिता की तरह ही खड़े हैं, कुश हाथ में लिये, और वही करते हैं जो एक पिता को करना होता है।
पाणिग्रहण होता है। देवता हृदय में हर्षित होते हैं, श्रेष्ठ मुनि वेदमन्त्र उच्चारते हैं, और देवगण जयकार करते हैं। अनेक प्रकार के बाजे बजते हैं और आकाश से नाना प्रकार के फूलों की वर्षा होती है। इतना सब लिखने के बाद कवि विवाह की सूचना देता है, और उसके लिये उसके पास आधी पंक्ति है।
बाजहिं बाजन बिबिध बिधाना। सुमनबृष्टि नभ भै बिधि नाना॥
चौपाई २
हर गिरिजा कर भयउ बिबाहू । सकल भुवन भरि रहा उछाहू॥
शिव और गिरिजा का विवाह हो गया। बस इतना। और उसी पंक्ति का बाकी आधा हिस्सा कहता है कि सारे भुवन में उत्साह भर गया। घटना चार शब्दों की है और उसका असर सृष्टि के बराबर है।
यह अनुपात संयोग नहीं है। जिस चीज की तैयारी में कई दोहे लगे, वह हो जाने में आधी पंक्ति लेती है, क्योंकि होना हमेशा छोटा होता है। लम्बा तो उसका पहले का इन्तजार होता है और उसके बाद का फैलाव। तुलसीदास ने दोनों को उनकी पूरी लम्बाई दी है और बीच की घटना को उसकी असली नाप पर रहने दिया है।
सार: वेदविधि से सारी रीति होती है, हिमवान कुश और कन्या का हाथ एक साथ थामकर, उन्हें भवानी जानते हुए भी पिता की तरह दान करते हैं, और विवाह की सूचना आधी पंक्ति में आ जाती है। उसी पंक्ति का दूसरा आधा हिस्सा कहता है कि उत्साह सारे भुवनों में भर गया।
दहेज, और वे दो हाथ जो जुड़ गये
अब दहेज आता है, और उसकी सूची लम्बी तथा बिलकुल ठोस है। दासियाँ, दास, घोड़े, रथ, हाथी, गायें, वस्त्र, मणि और तरह-तरह की चीजें, अन्न, और सोने के बर्तन गाड़ियों में लदवाकर दिये जाते हैं। कवि अन्त में यही कहता है कि उसका बखान नहीं हो सकता, इतना दिया गया।
सूची अपने काम के लिये नहीं है। वह अगली पंक्ति के लिये है, जहाँ वह सारी की सारी बेकार हो जाती है। इतना सब देने के बाद पर्वतराज हाथ जोड़ लेते हैं और जो कहते हैं, वह किसी भी पिता का सबसे असहाय वाक्य है।
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कह्यो।
छंद २
का देउँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रह्यो॥
सिवँ कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो।
पुनि गहे पद पाथोज मयनाँ प्रेम परिपूरन हियो॥
मैं क्या दूँ, आप तो पूर्णकाम हैं। जिसकी कोई कामना ही शेष न हो, उसे दिया क्या जाय। यह कहकर वे चुप नहीं हो जाते, बल्कि शिव के चरणकमल पकड़कर वहीं रह जाते हैं। गहि रह्यो में वह ठहराव है जो छोड़ने का नाम ही नहीं लेता। पकड़ा, और पकड़े ही रह गये।
कृपा के सागर शिव ससुर को सब प्रकार से सन्तोष कराते हैं। और फिर उसी छन्द के अन्तिम चरण में मैना आती हैं, हृदय प्रेम से भरा हुआ, और वही चरणकमल वे भी पकड़ लेती हैं। एक ही छन्द में दो लोग एक ही जगह झुकते हैं, पहले पिता, फिर माता, और दोनों के पास कहने को कुछ नहीं है।
पर माता के पास कहने को कुछ है। पिता ने कहा था कि देने योग्य कुछ नहीं, माता माँगने खड़ी होती हैं, और जो माँगती हैं वह अपने लिये नहीं है।
नाथ उमा मम प्रान सम गृहकिंकरी करेहु।
दोहा १०१
छमेहु सकल अपराध अब होइ प्रसन्न बरु देहु॥ १०१॥
दो बातें हैं इस माँग में, और दोनों छोटी हैं। पहली यह कि उमा मुझे मेरे प्राणों के समान है, इसे अपने घर की टहलनी बना लीजियेगा। दूसरी यह कि इसके सब अपराध क्षमा करते रहियेगा। इसके बाद वे कहती हैं कि अब प्रसन्न होकर यही वर दीजिये।
जरा देखिये कि क्या नहीं माँगा गया। न सम्पत्ति, न सम्मान, न अपने कुल के लिये कोई वचन, न बेटी के लिये कोई ऊँचा पद। जिस घर में बेटी जा रही है, उसमें उसके लिये सबसे नीची जगह माँगी जा रही है, और साथ में यह कि जब वह गलती करे तब उसे सह लिया जाय।
माँ जानती है कि बेटी जगदम्बा है। उसी माँ के मुँह से यह निकलता है कि उसे घर की टहलनी रख लीजिये। दोनों बातें एक साथ सच हैं, और उन्हें आपस में मिलाने की कोशिश तुलसीदास नहीं करते। माँ की आँख से बेटी वही रहती है जो थी, चाहे संसार उसे कुछ भी कहता रहे। और अपराध क्षमा करने की प्रार्थना में वह पूरा भविष्य है जो एक माता विदाई के दिन अपने भीतर देख लेती है।
सार: दहेज की लम्बी सूची इसलिये आती है कि अगली पंक्ति में वह खारिज हो जाय। हिमवान हाथ जोड़कर कहते हैं कि पूर्णकाम को दिया क्या जाय, और चरण पकड़कर रह जाते हैं। मैना वही चरण पकड़कर दो चीजें माँगती हैं: बेटी को घर की टहलनी बना लीजिये, और उसके सब अपराध क्षमा करते रहियेगा।
माता की सीख, और माता का प्रश्न
शिव सास को बहुत तरह से समझाते हैं। वे चरणों में सिर नवाकर घर लौट जाती हैं, और वहाँ जाकर उमा को बुला लेती हैं, गोद में बैठा लेती हैं, और सीख देती हैं। सीख वही है जो उस समय की माताएँ बेटी को देती थीं: सदा शंकर के चरणों की पूजा करना, नारियों का यही धर्म है, पति ही देवता है और दूसरा कोई देवता नहीं।
यह कहते-कहते उनकी आँखों में पानी भर आता है और वे कन्या को छाती से चिपटा लेती हैं। और तभी, बिना किसी सन्धि के, अगली ही पंक्ति में वह बात निकलती है जो एक क्षण पहले कही गयी बात के ठीक उलटी है।
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं । पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥
चौपाई ३
भै अति प्रेम बिकल महतारी । धीरजु कीन्ह कुसमय बिचारी॥
विधाता ने जगत में स्त्रीजाति को पैदा ही क्यों किया। पराधीन को सपने में भी सुख नहीं मिलता। यह उसी मुँह से निकल रहा है जो अभी-अभी नारीधर्म समझा रहा था, और तुलसीदास इन दोनों को अलग-अलग जगह नहीं रखते। वे उन्हें सटाकर रख देते हैं और उनमें मेल बिठाने की कोई कोशिश नहीं करते।
यह किसी सिद्धान्त का खंडन नहीं है, यह एक माता का क्षण है। जो नियम वह बेटी को सौंप रही है, उसी नियम की कीमत उसे अपने ऊपर याद आ जाती है, और वह कीमत सीख के तुरन्त बाद बाहर आ जाती है। कवि दोनों को सुनने देता है। इस पन्ने की सबसे ईमानदार जोड़ी यही है।
और फिर वह पंक्ति आती है जो इस पूरे प्रसंग में सबसे अधिक मनुष्य जैसी है। माता प्रेम में अत्यन्त विकल हो जाती हैं, और फिर धीरज कर लेती हैं, क्योंकि यह समय दुःख करने का नहीं है। कुसमय बिचारी, यही सोचकर वे अपने आँसू टाल देती हैं।
वह रो सकती थीं और किसी ने रोका नहीं था। उन्होंने अपने शोक का समय आगे सरका दिया, ताकि इस दिन पर उसकी छाया न पड़े। यह त्याग किसी को दिखता नहीं, इसका कोई नाम नहीं लिया जाता, और घर के हर मंगल-दिन में यह कहीं न कहीं होता ही है।
फिर विदाई का दृश्य है, और उसमें एक उलटी बात है जिसे पढ़ते हुए पकड़ना चाहिये। मैना बार-बार मिलती हैं और बेटी के चरण पकड़कर गिर पड़ती हैं। माता बेटी के चरणों में गिर रही है। पार्वती सब स्त्रियों से मिल-भेंटकर फिर लौटकर माता के हृदय से लिपट जाती हैं, और उसके बाद छन्द आता है।
जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दईं।
छंद ३
फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखीं लै सिव पहिं गईं॥
जाचक सकल संतोषि संकरु उमा सहित भवन चले।
सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले॥
माता से फिर मिलकर वे चलीं, सबने योग्य आशीर्वाद दिये, और वे मुड़-मुड़कर माता की ओर देखती जाती हैं। तब सखियाँ उन्हें शिव के पास ले जाती हैं। इस फिरि फिरि में वह पूरा रास्ता है जो हर विदा होती बेटी तय करती है, और वह अकेली नहीं जाती, ले जायी जाती है।
इसके बाद महादेव सब याचकों को सन्तुष्ट करके पार्वती के साथ घर की ओर चलते हैं, देवता फूल बरसाते हैं और आकाश में नगाड़े बजते हैं। हिमवान अत्यन्त प्रेम से पहुँचाने साथ चलते हैं और शिव उन्हें बहुत तरह से सन्तोष कराकर विदा करते हैं। फिर वे तुरन्त घर आते हैं, सब पर्वतों और सरोवरों को बुलाते हैं, और आदर, दान, विनय तथा बहुत सम्मान के साथ सबकी विदाई करते हैं।
यह आखिरी काम बहुत घरेलू है। बड़ा उत्सव बीत चुका है, और अब मेजबान बचे हुए मेहमानों को एक-एक करके विदा कर रहा है। कवि इसे लिखना नहीं भूलता, और इसी से पता चलता है कि उसने विवाह को बाहर से नहीं, भीतर से देखा है।
सार: मैना बेटी को नारीधर्म की सीख देती हैं और अगली ही पंक्ति में विधाता से पूछती हैं कि स्त्रीजाति बनायी ही क्यों गयी। फिर वे कुसमय जानकर अपना शोक टाल देती हैं, बेटी के चरणों में गिरती हैं, और पार्वती मुड़-मुड़कर देखती हुई सखियों के साथ चली जाती हैं।
कैलास, और एक चुप्पी
शिव कैलास पहुँचते हैं और देवता अपने-अपने लोकों को लौट जाते हैं। यहाँ से कथा को गृहस्थी में उतरना था, और ठीक इसी जगह कवि रुक जाता है।
जबहिं संभु कैलासहिं आए । सुर सब निज निज लोक सिधाए॥
चौपाई ४
जगत मातु पितु संभु भवानी । तेहिं सिंगारु न कहउँ बखानी॥
शिव और भवानी जगत के माता-पिता हैं, इसलिये उनके शृंगार का वर्णन मैं नहीं करता। यह उसी कवि का वाक्य है जिसने कुछ ही पंक्तियाँ पहले पार्वती के रूप पर पूरा छन्द खर्च किया था। तब वह वर्णन न कर पाने की बात कर रहा था, यहाँ वह वर्णन न करने की बात कर रहा है। पहली विवशता थी, दूसरी पसन्द है।
और कारण भी उसने साफ दे दिया है। जिन्हें आप माता-पिता मानते हैं, उनके बारे में कुछ चीजें कही नहीं जातीं। यह शास्त्र का नियम नहीं है, यह घर का शिष्टाचार है, और तुलसीदास उसे वहीं लागू कर देते हैं जहाँ कोई कवि रुकने का नाम नहीं लेता। इस चुप्पी में जितना आदर है, उतना किसी वर्णन में नहीं आ पाता।
इसके बाद कथा तेजी से आगे बढ़ती है। वे गणों सहित कैलास पर रहने लगते हैं, नित्य नया विहार होता है, और इसी तरह बहुत समय बीत जाता है। फिर छह मुखवाले कुमार का जन्म होता है, जिन्होंने आगे चलकर युद्ध में तारक नामक असुर को मारा। कवि कहता है कि षण्मुख के जन्म की कथा वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और सारा जगत उसे जानता है, इसलिये उसने वृषकेतु के पुत्र का चरित्र संक्षेप में ही कहा है।
यह भी एक तरह का संकोच है, पर दूसरी किस्म का। पहले उसने इसलिये नहीं कहा कि कहना उचित नहीं था; अब इसलिये नहीं कहता कि वह कथा सब जानते हैं और यह पोथी किसी और कथा के लिये बनी है। दोनों बार वह अपनी सीमा खुद खींचता है, और दोनों बार पाठक को पता चल जाता है कि आगे किस ओर जाना है।
और फिर शिवविवाह की कथा एक वाक्य में पाठक के हाथ में सौंप दी जाती है।
जगु जान षन्मुख जन्मु करमु प्रतापु पुरुषारथु महा।
छंद ४
तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा॥
यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं।
कल्यान काज बिबाह मंगल सर्बदा सुखु पावहीं॥
जो स्त्री-पुरुष इस उमा-शंभु विवाह को कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याण के कार्यों और विवाह जैसे मंगलों में सदा सुख पायेंगे। ध्यान दीजिये कि यह कथा किस काम के लिये दी जा रही है। इसे मानने के लिये नहीं कहा गया, इसे गाने के लिये कहा गया है, और वह भी उसी अवसर पर जो इस कथा का अपना अवसर है।
यानी जिस घर में विवाह हो, वहाँ यह कथा गायी जाय। कहानी वापस उसी जगह लौटा दी जाती है जहाँ से उसका ब्योरा उठाया गया था: बेदी, लग्नपत्रिका, दहेज, विदाई। जो मंडप में घटा था वह मंडप में ही काम आयेगा। इसके बाद कवि अपनी असमर्थता एक बार और कहता है, कि गिरिजापति का चरित्र समुद्र जैसा है जिसका पार वेद तक नहीं पाते, और उसका वर्णन तुलसीदास जैसा मन्दबुद्धि कैसे करे। इसी पंक्ति पर शिवकथा बन्द होती है।
सार: कैलास पहुँचकर कवि शृंगार का वर्णन करने से जान-बूझकर मना कर देता है, क्योंकि वे दोनों जगत के माता-पिता हैं। षडानन का जन्म संक्षेप में आता है, और फिर शिवविवाह की कथा पाठक को इस वचन के साथ सौंप दी जाती है कि इसे मंगल-अवसरों पर गाया जाय।
प्रयाग में, एक परीक्षा जो हो चुकी थी
अब कैमरा पीछे हटता है, और हमें याद आता है कि यह सारी शिवकथा किसी को सुनायी जा रही थी। सुननेवाले भरद्वाज हैं। उन्होंने यह रसीला और सुहावना चरित्र सुना और बहुत सुख पाया। कथा सुनने की लालसा और बढ़ गयी। आँखों में पानी भर आया और रोमावली खड़ी हो गयी।
फिर वे प्रेम में इतने विवश हो गये कि मुँह से बात ही नहीं निकली। और यह दशा देखकर ज्ञानी मुनि प्रसन्न हो गये। जो मुनि कह रहे हैं, उनका नाम इन पंक्तियों में नहीं आता; पोद्दारजी की टीका उन्हें याज्ञवल्क्य बताती है। वे कहते हैं कि हे मुनीश, आपका जन्म धन्य है, आपको गौरीपति शिव प्राणों के समान प्रिय हैं।
और फिर वह पंक्ति आती है जो इस पूरे ग्रन्थ के ढाँचे की चाबी है।
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं । रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥
चौपाई ५
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू । राम भगत कर लच्छन एहू॥
जिनकी शिव के चरणकमलों में प्रीति नहीं है, वे राम को सपने में भी अच्छे नहीं लगते। विश्वनाथ के चरणों में निष्कपट प्रेम होना, रामभक्त का लक्षण यही है। यह कसौटी उलटी दिशा से आती है। रामभक्त की पहचान राम में नहीं, शिव में खोजी जा रही है।
और अगली ही चौपाई इसी बात को दूसरी ओर से पलट देती है। शिव के समान रघुनाथ का व्रत धारण करनेवाला कौन है, जिन्होंने बिना किसी पाप के सती जैसी स्त्री को त्याग दिया और प्रतिज्ञा करके रघुनाथ की भक्ति दिखा दी। फिर प्रश्न आता है कि राम को शिव के समान और कौन प्यारा है।
दोनों चौपाइयाँ आमने-सामने खड़ी हैं। एक कहती है कि रामभक्त की परख शिवप्रेम है, दूसरी कहती है कि सबसे बड़े रामभक्त शिव हैं। और यह कोई भावुक बात नहीं है, यह इस पोथी की बुनियाद है। जो कथा अब आरम्भ होनेवाली है, वह शिव के मुँह से निकलेगी और पार्वती के माँगने पर निकलेगी। इसलिये यह जोड़ी यहाँ रखी गयी है, ठीक उस मोड़ पर जहाँ शिवकथा खत्म होकर रामकथा शुरू होनी है।
और अब मुनि वह बात कहते हैं जिसके बाद पीछे का सब कुछ बदल जाता है।
प्रथमहिं मैं कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार।
दोहा १०४
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार॥ १०४॥
मैंने पहले ही शिव का चरित्र कहकर मर्म समझ लिया। आप राम के पवित्र सेवक हैं और समस्त विकारों से रहित हैं। यानी वह पूरी शिवकथा, बरात, विवाह, दहेज, विदाई, वह सब एक परीक्षा थी, और परीक्षा हो चुकी है।
पर परीक्षा में पूछा कुछ नहीं गया था। भरद्वाज से कोई प्रश्न नहीं किया गया, कोई शर्त नहीं रखी गयी। उनसे केवल कथा सुनवायी गयी और उनकी आँखें देखी गयीं। जिसे शिव की कथा पर आँसू आ जायें, उसके भीतर राम की जगह बनी हुई है, यह मानकर गुरु आगे बढ़ जाता है।
और यहीं पढ़नेवाले को एक बात महसूस होती है। पिछले आठ दोहे वह भी यही कथा सुन रहा था। जो परीक्षा भरद्वाज ने दी, वह पन्ना पलटते-पलटते उसने भी दे दी, और उसे पता तक नहीं चला कि दी जा रही है। इसके बाद मुनि कहते हैं कि मैंने गुण और शील जान लिया, अब रघुनाथ की लीला कहता हूँ, सुनिये। और फिर वे यह भी जोड़ देते हैं कि आज इस मिलन से उनके मन में जो आनन्द हुआ है, वह कहा नहीं जा सकता।
सार: प्रयाग में भरद्वाज शिवकथा सुनकर प्रेम से बोल ही नहीं पाते, और मुनि उनकी यही दशा देखकर प्रसन्न होते हैं। फिर वे बताते हैं कि शिवचरित्र पहले इसीलिये कहा था कि सुननेवाले का मर्म समझ लिया जाय। परीक्षा बिना प्रश्न के हो चुकी थी, और पढ़नेवाले ने भी वही परीक्षा साथ-साथ दे दी।
कठपुतली, सूत्रधार, और कवि का आँगन
रामकथा शुरू करने से पहले मुनि एक बात साफ कर देते हैं। रामचरित्र अत्यन्त अपार है, सौ करोड़ शेष भी उसे नहीं कह सकते। तथापि जैसा मैंने सुना है, वैसा वाणी के स्वामी और हाथ में धनुष लिये प्रभु का स्मरण करके कहता हूँ।
इस जथाश्रुत पर ठहरिये। कहनेवाला यह दावा नहीं करता कि वह जानता है। वह केवल इतना कहता है कि उसने सुना है, और जितना सुना उतना कह रहा है। पूरे रामचरितमानस की श्रृंखला इसी शब्द से बनती है: शिव ने कहा, पार्वती ने सुना, आगे किसी ने सुना, याज्ञवल्क्य ने भरद्वाज से कहा, और तुलसीदास ने वही सुनकर लिखा। किसी कड़ी में कोई मालिक नहीं है, सब सुननेवाले हैं।
और इसके बाद वह चित्र आता है जो इस बात को पकड़कर बैठ जाता है। सरस्वती कठपुतली के समान हैं और अन्तर्यामी स्वामी राम सूत्रधार हैं। जिस कवि पर वे अपना जन जानकर कृपा करते हैं, उसके हृदयरूपी आँगन में सरस्वती को नचाया करते हैं।
यहाँ तीन चीजें एक साथ रख दी गयी हैं। पहली, वाणी अपने बल पर नहीं चलती, वह चलायी जाती है। दूसरी, चलानेवाला वही है जिसका चरित्र कही जा रहा है, इसलिये कथा अपने विषय से ही बल लेती है। और तीसरी, नाच का मैदान कोई सभा नहीं है, कवि का हृदय है। अजिर का अर्थ आँगन है, और आँगन घर का वह हिस्सा है जो न बाहर है न भीतर, जहाँ घर के लोग रोज इकट्ठा होते हैं।
कठपुतली का चित्र चुनने में एक और बात है। कठपुतली देखने में अपने आप नाचती दिखती है और डोर ऊपर होती है, दिखती नहीं। सुननेवाले को वाणी नाचती दिखेगी, डोर नहीं दिखेगी। कवि पहले ही बता देता है कि डोर किसके हाथ में है, ताकि आगे जो सौन्दर्य आये उसका श्रेय गलत जगह न चला जाय।
फिर वे उन्हीं कृपालु रघुनाथ को प्रणाम करते हैं और कहते हैं कि उन्हीं के निर्मल गुणों की कथा कहता हूँ। यह प्रणाम एक पंक्ति का है। उसी पंक्ति के दूसरे आधे हिस्से में दृश्य बदल जाता है, और हम कैलास पर पहुँच जाते हैं।
सार: कहनेवाला कोई दावा नहीं करता, केवल जितना सुना उतना कहता है। सरस्वती कठपुतली हैं, राम सूत्रधार हैं, और नाच कवि के हृदयरूपी आँगन में होता है। एक पंक्ति के प्रणाम के बाद दृश्य कैलास पर चला जाता है।
वह बरगद, और एक साधारण दिन
पर्वतों में श्रेष्ठ और अत्यन्त रमणीय कैलास है, जहाँ शिव और पार्वती सदा निवास करते हैं। सिद्ध, तपस्वी, योगी, देवता, किन्नर और मुनियों के समूह वहाँ रहते हैं, सब बड़े पुण्यात्मा, और सब आनन्दकन्द महादेव की सेवा करते हैं।
फिर कवि उलटी तरफ से भी बता देता है कि वहाँ कौन नहीं पहुँचता। जो हरि और हर दोनों से विमुख हैं और जिनकी धर्म में प्रीति नहीं है, वे लोग सपने में भी वहाँ नहीं जा सकते। दोनों नाम साथ आते हैं, जैसे अभी प्रयाग में आये थे। कैलास का पता जिस चीज से मिलता है, वह भूगोल नहीं है।
अब उस पर्वत पर एक बरगद का पेड़ है, विशाल, नित्य नवीन, और सब कालों में सुन्दर। वहाँ तीनों प्रकार की वायु बहती है और उसकी छाया बड़ी ठंडी रहती है। और फिर उस पेड़ का परिचय दिया जाता है: वह शिव के विश्राम करने का वृक्ष है, जिसे वेदों ने गाया है।
इस परिचय पर रुकिये। जो वृक्ष वेदों में गाया गया, वह इसलिये गाया गया कि वहाँ कोई सुस्ताता है। जिसे न धूप सताती है न थकान, वही एक पेड़ की छाया में बैठने आता है, और यही बात उस पेड़ को प्रसिद्ध कर देती है। इस पूरे प्रसंग में जितनी बड़ी-बड़ी चीजें आयीं, उनमें से कोई वेद तक नहीं पहुँची; एक छायादार पेड़ पहुँच गया।
फिर वह पंक्ति आती है जिससे यह ग्रन्थ सचमुच शुरू होता है, और वह किसी घोषणा की तरह नहीं आती। एक बार प्रभु उस पेड़ के नीचे गये, और पेड़ को देखकर उनके हृदय में बहुत आनन्द हुआ। एक बार, यानी किसी एक दिन, जिसके बारे में और कुछ नहीं बताया जाता।
कोई उत्सव नहीं था, कोई संकट नहीं था, कोई सभा नहीं जुड़ी थी। इस पन्ने की सबसे बड़ी घटना एक ऐसे दिन होती है जिसे कवि ने जान-बूझकर बेनाम रहने दिया है।
आगे और भी सादगी है। वे अपने हाथ से बाघम्बर बिछाते हैं और कृपालु शंभु स्वभाव से ही वहाँ बैठ जाते हैं। टीका सहजहिं को खोलकर कहती है कि बिना किसी खास प्रयोजन के। बिछाया अपने हाथ से, बैठे बिना किसी कारण के, और इसी बैठक से वह प्रश्न निकलेगा जिसका उत्तर सात काण्ड लेगा।
फिर उनका रूप आता है, और वह ठंडे रंगों में है। कुन्द के फूल, चन्द्रमा और शंख के समान गौर शरीर, बहुत लम्बी भुजाएँ, और मुनियों जैसे वस्त्र। चरण नये खिले लाल कमल जैसे, और नखों की ज्योति ऐसी जो भक्तों के हृदय का अन्धकार हर ले। भूषण के नाम पर साँप और भस्म। मुख शरद के चन्द्रमा की शोभा को भी फीका कर देनेवाला।
दोहे में यह चित्र पूरा होता है: सिर पर जटाओं का मुकुट और गंगा, कमल जैसे बड़े नेत्र, नीला कण्ठ, और मस्तक पर बालचन्द्रमा। वे बैठे हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं मानो शान्तरस ने ही शरीर धारण कर लिया हो।
और इसी शान्ति में से अगला दृश्य निकलता है, क्योंकि जो अब आनेवाली हैं, वे इसी शान्ति का इन्तजार कर रही थीं।
सार: कैलास का वर्णन यह बताकर पूरा होता है कि वहाँ कौन नहीं पहुँच सकता। एक बरगद वेदों में इसीलिये गाया गया कि शिव वहाँ विश्राम करते हैं। किसी एक साधारण दिन वे वहाँ जाते हैं, अपने हाथ से बाघम्बर बिछाकर बिना किसी प्रयोजन के बैठ जाते हैं, और बैठे हुए ऐसे लगते हैं मानो शान्तरस ने शरीर धारण कर लिया हो।
बायाँ भाग, और वह क्षण जो देखकर चुना गया
पार्वती अच्छा मौका जानकर शिव के पास जाती हैं। इन चार शब्दों में इस पूरे प्रसंग का सबसे सधा हुआ काम छिपा है। प्रश्न उनके मन में बहुत दिनों से है, पर वे उसे किसी भी दिन नहीं उठातीं। वे अवसर देखती हैं, और जिस दिन वह मिलता है उसी दिन जाती हैं।
अवसर क्या था, यह पिछली ही पंक्तियों में बता दिया गया है। वे बरगद के नीचे बैठे हैं, बिना प्रयोजन के, शान्तरस की मूर्ति बने हुए। यही वह क्षण है जिसमें एक कठिन प्रश्न बिना किसी को चोट पहुँचाये रखा जा सकता है। पूछने का समय चुनना भी पूछने के हुनर का हिस्सा है, और यह पंक्ति यही सिखाती है।
जानि प्रिया आदरु अति कीन्हा । बाम भाग आसनु हर दीन्हा॥
चौपाई ६
बैठीं सिव समीप हरषाई । पूरुब जन्म कथा चित आई॥
प्रिया जानकर शिव बहुत आदर करते हैं और अपनी बायीं ओर बैठने के लिये आसन देते हैं। वे प्रसन्न होकर पास बैठ जाती हैं, और तब उन्हें पिछले जन्म की कथा स्मरण हो आती है।
स्मरण का क्रम देखने लायक है। पहले आदर, फिर बायाँ आसन, फिर बैठना, और उसके बाद स्मृति। बायाँ भाग पत्नी की जगह है, आधे अंग की जगह है, और उस जगह पर बैठते ही पुराना जन्म याद आ जाता है। जो बात वर्षों से भीतर पड़ी थी, वह तब जागती है जब वह जगह मिलती है जहाँ से उसे कहा जा सकता है।
अगली पंक्ति एक और नाप देती है। वे पति के हृदय में पहले से अधिक प्रेम अनुमान करती हैं, और तब हँसकर प्रिय वाणी में बोलती हैं। यानी पूछने से पहले तीन चीजें तौली गयीं: क्षण, आसन, और सामने वाले के मन का प्रेम। तीनों ठीक निकलीं, तब मुँह खुला।
और कहनेवाला मुनि बीच में एक टिप्पणी जोड़ देता है, जिसे टीका उनके मुँह में रखती है: जो कथा सब लोगों का हित करनेवाली है, उसे ही शैलकुमारी पूछना चाहती हैं। सुननेवाले को पहले ही बता दिया जाता है कि यह प्रश्न निजी जिज्ञासा नहीं है। जो अब पूछा जायेगा, उसका उत्तर सबके काम आयेगा।
फिर वे बोलना शुरू करती हैं, और पहले प्रशंसा करती हैं। हे विश्वनाथ, हे मेरे नाथ, हे पुरारि, आपकी महिमा तीनों लोकों में विख्यात है, चर, अचर, नाग, मनुष्य और देवता सब आपके चरणकमलों की सेवा करते हैं। दोहे में यह और बढ़ता है: आप समर्थ हैं, सर्वज्ञ हैं, सब कलाओं और गुणों के धाम हैं, योग, ज्ञान और वैराग्य के निधि हैं, और आपका नाम शरण में आये हुओं के लिये कल्पवृक्ष है।
यह प्रशंसा खाली नहीं है, यह नींव है। वे आगे चलकर इसी कल्पवृक्ष को लौटाकर अपने ही पक्ष में लगा देंगी।
सार: पार्वती अवसर देखकर जाती हैं, शिव उन्हें बायीं ओर आसन देते हैं, और बैठते ही उन्हें पिछला जन्म याद आता है। बोलने से पहले वे पति के हृदय का प्रेम भी तौल लेती हैं। मुनि बता देते हैं कि यह प्रश्न सबके हित का है, और पार्वती पहले वह प्रशंसा रखती हैं जिस पर आगे उनका आग्रह टिकेगा।
वह प्रश्न जिससे यह पोथी खुलती है
अब वे माँगती हैं, और माँग को एक शर्त में बाँध देती हैं। हे सुख की राशि, यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं और सचमुच मुझे अपनी दासी जानते हैं, तो नाना प्रकार की रघुनाथ कथा कहकर मेरा अज्ञान दूर कीजिये।
और अगली पंक्ति में वह प्रशंसा काम पर लग जाती है। जिसका घर कल्पवृक्ष के नीचे हो, वह भला दरिद्रता से उपजा दुःख क्यों सहे। दो पंक्तियाँ पहले उन्होंने ही उनके नाम को कल्पवृक्ष कहा था। अब वे कहती हैं कि उसी वृक्ष के नीचे घर होते हुए भी मैं अज्ञान में बैठी हूँ, तो यह किसका अपयश है। यह विनती है, पर इसके भीतर एक साफ तर्क रखा हुआ है, और वह तर्क उन्होंने पहले से बनाकर रखा था।
फिर वे उलझन का ढाँचा खोलती हैं। जो परमार्थ के जाननेवाले मुनि हैं, वे राम को अनादि ब्रह्म कहते हैं। शेष, सरस्वती, वेद और पुराण सब रघुनाथ का गुण गाते हैं। और आप स्वयं दिन-रात आदर के साथ राम-राम जपते हैं। तीनों गवाह गिना देने के बाद वे प्रश्न रखती हैं।
तुम्ह पुनि राम राम दिन राती । सादर जपहु अनँग आराती॥
चौपाई ७
रामु सो अवध नृपति सुत सोई । की अज अगुन अलखगति कोई॥
ये राम वही अयोध्या के राजा के पुत्र हैं, या कोई और, अजन्मा, निर्गुण और अगोचर। प्रश्न बिलकुल सीधा है और इसमें कोई दुराव नहीं है। और अगले दोहे में वे इसे उस जगह ले जाती हैं जहाँ यह चुभता है।
जौं नृप तनय त ब्रह्म किमि नारि बिरहँ मति भोरि।
दोहा १०८
देखि चरित महिमा सुनत भ्रमति बुद्धि अति मोरि॥ १०८॥
यदि वे राजपुत्र हैं तो ब्रह्म कैसे, और यदि ब्रह्म हैं तो स्त्री के विरह में उनकी बुद्धि बावली कैसे हो गयी। यह इस पूरी पोथी का मूल प्रश्न है, और इसे टालकर आगे नहीं बढ़ा जा सकता।
दोहे का दूसरा भाग और भी सटीक है, क्योंकि वहाँ वे बताती हैं कि उलझन आयी कहाँ से। चरित्र देखकर और महिमा सुनकर मेरी बुद्धि अत्यन्त चकरा रही है। देखना एक ओर है और सुनना दूसरी ओर, और दोनों आपस में मेल नहीं खाते। शंका के आने का यह वर्णन बहुत ईमानदार है। सन्देह तब नहीं होता जब कुछ पता न हो, तब होता है जब दो सच्ची चीजें एक-दूसरे से टकरा जायें।
आगे वे विकल्प भी खुला छोड़ देती हैं। यदि कोई इच्छारहित, व्यापक और समर्थ ब्रह्म और है, तो उसे समझाकर कहिये। और साथ ही एक छोटी सी प्रार्थना जोड़ देती हैं: मुझे नादान जानकर मन में क्रोध न लाइयेगा, जिस तरह मेरा मोह मिटे वही कीजिये।
और अब वह पंक्ति आती है जो इस प्रश्न को केवल एक जिज्ञासा नहीं रहने देती।
मैं बन दीखि राम प्रभुताई । अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥
चौपाई ८
तदपि मलिन मन बोधु न आवा । सो फलु भली भाँति हम पावा॥
मैंने वन में राम की प्रभुता देखी थी, पर अत्यन्त भय से विकल होने के कारण वह बात आपको सुनायी नहीं। फिर भी मेरे मलिन मन को बोध नहीं हुआ, और उसका फल मैंने अच्छी तरह पा लिया।
यह वही सती का प्रसंग है जिसकी ओर इसी पन्ने पर पहले भी एक बार संकेत आया था, जब मुनि ने कहा था कि शिव ने बिना किसी पाप के सती जैसी स्त्री को त्याग दिया। अब वह बात उन्हीं के मुँह से आ रही है, और वे उसे सफाई की तरह नहीं, हिसाब की तरह कह रही हैं।
पूरी बात एक साथ रखकर देखिये। एक बार उनके सामने प्रमाण आया था और प्रश्न भी था। उन्होंने डर के मारे उसे भीतर रख लिया, कहा नहीं, और उसका फल भुगत लिया। आज वही स्त्री दूसरी देह में, उसी पति के बायें भाग में बैठकर, वही प्रश्न कह रही है जो उस दिन गले में अटक गया था।
इसलिये इस पन्ने का प्रश्न किसी जिज्ञासु का पहला प्रश्न नहीं है। यह दुहराया गया प्रश्न है, और उसे दुहराने की कीमत पूछनेवाली चुका चुकी है। रामचरितमानस इसी पर खुलता है: किसी के चुप रह जाने से जो नहीं हुआ था, उसके बोल पड़ने से होता है।
फिर वे अपने और पति के बीच का हिसाब भी साफ कर देती हैं। आपने उस समय मुझे बहुत तरह से समझाया था, यह याद करके क्रोध न कीजिये। और अब वह मोह नहीं रहा, अब तो मन में रामकथा की रुचि है। हे शेषनाग को भूषण की तरह धारण करनेवाले देवताओं के नाथ, राम के गुणों की पवित्र कथा कहिये।
और अन्तिम दोहा एक शरीर की मुद्रा में आता है।
बंदउँ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि।
दोहा १०९
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि॥ १०९॥
पृथ्वी पर सिर टेककर चरणों की वन्दना करती हूँ और हाथ जोड़कर विनती करती हूँ: वेदों के सिद्धान्त को निचोड़कर रघुनाथ का निर्मल यश कहिये। निचोरि बहुत घरेलू शब्द है, वही निचोड़ना जो कपड़े का किया जाता है। श्रुति का सारा सिद्धान्त एक ओर, और उसमें से जो रस निकले वह दूसरी ओर, और माँग उसी रस की है।
यही वह जगह है जहाँ यह प्रसंग रुकता है। प्रश्न रखा जा चुका है, आसन पर दोनों बैठे हैं, बरगद की छाया वैसी की वैसी है, और उत्तर अभी नहीं आया। जो अगले पन्ने से आरम्भ होगा, वह इसी प्रश्न का उत्तर है, और वह सात काण्डों तक चलेगा।
सार: पार्वती अपनी ही प्रशंसा को तर्क बनाकर कल्पवृक्ष के नीचे बैठी दरिद्रता की बात रखती हैं, फिर मुनियों, वेदों और स्वयं शिव के जप को गवाह बनाकर पूछती हैं कि राम अयोध्या के राजपुत्र हैं या निर्गुण ब्रह्म। दोहा एक सौ आठ इस दुविधा को उसके सबसे कड़े रूप में रखता है। और फिर वे बताती हैं कि पिछले जन्म में उन्होंने यही बात डर के मारे नहीं कही थी और उसका फल भुगत चुकी हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने को पढ़कर उठते समय एक बात साथ रह जाती है, और वह विवाह नहीं है। विवाह सुन्दर है, उसमें लग्नपत्रिका है, वेदी है, कुश है, दहेज की गाड़ियाँ हैं, और एक माता है जो बेटी के चरणों में गिरती है। पर जो चीज इस पूरे प्रसंग को अपनी जगह पर टिकाये रखती है, वह दो बार का चुपचाप किया गया काम है। एक बार दूल्हा बैठने से पहले किसी और को याद करता है। एक बार माता रोना टाल देती है क्योंकि दिन ठीक नहीं है।
और तीसरी चीज उन दोनों से बड़ी है। जिस स्त्री ने एक बार डरकर अपना प्रश्न भीतर रख लिया था, वह दूसरी देह में लौटकर वही प्रश्न पूछती है, और इस बार पूछने से पहले वह क्षण भी चुनती है, आसन भी पाती है, और सामने वाले का मन भी तौल लेती है। पूछना उसने सीख लिया है, और यह सीखना बहुत महँगा पड़ा था।
इसीलिये इस प्रसंग में विवाह और प्रश्न दो अलग-अलग बातें नहीं हैं। जो जोड़ा मंडप में बना था, वही जोड़ा बरगद के नीचे बैठा है, और अब उनके बीच वह बातचीत हो रही है जिसके लिये यह पूरा ग्रन्थ लिखा गया। जिस दिन वे एक-दूसरे के हुए थे, उस दिन शायद यही तय हुआ था कि एक दिन एक पूछेगा और दूसरा कहेगा।
इस पन्ने पर कुछ चीजें जान-बूझकर नहीं कही गयीं, और उनका न कहा जाना भी पढ़ने लायक है। शिव और पार्वती के गृहस्थ जीवन का कोई शृंगार-वर्णन नहीं है, क्योंकि कवि ने कह दिया कि वे जगत के माता-पिता हैं। षडानन के जन्म की पूरी कथा नहीं है, क्योंकि कवि ने कहा कि वह सब जानते हैं। और गणेश-पूजन पर उठनेवाली शंका का उत्तर एक ही दोहे में निपटा दिया गया, बिना कोई लम्बी कथा खोले।
आगे का पन्ना उसी बरगद के नीचे से शुरू होता है। प्रश्न हवा में टँगा है, पूछनेवाली हाथ जोड़े बैठी हैं, और जो उत्तर आयेगा वह पहले पूछनेवाली की प्रशंसा से आरम्भ होगा, फिर रामकथा की महिमा तक जायेगा। सुनने की तैयारी इस पन्ने पर पूरी हो चुकी है, और यही इस प्रसंग का असली काम था।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ९९ से १०९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।