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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 33
परशुराम की पहचान और उनका प्रस्थान
क्रोध में हाथ रुकता है, विनय पर सन्देह होता है। और पहचान खुलने पर वही परशुराम दोनों भाइयों से क्षमा माँगते हैं।
राम दोनों हाथ जोड़कर बोल रहे हैं। उनकी वाणी कोमल और शीतल है। परशुराम का क्रोध अभी बना हुआ है, और वे कहते हैं कि छोटा भाई अब भी टेढ़ा ताक रहा है। राम उस क्रोध को अपने ऊपर लेने के लिये प्रस्तुत हैं। वे अपराध अपने सिर रखते हैं और उसका उपाय भी मुनि से ही पूछते हैं।
तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग पहचान तक धीरे धीरे पहुँचता है। परशुराम राम की विनय सुनते हैं, उसमें छल का सन्देह करते हैं, फिर अपने बल का वर्णन करते हैं। राम उनके आरोपों का उत्तर देते हुए ब्राह्मण का आदर और रघुवंश की निर्भयता साथ रखते हैं। अन्त में परशुराम की वाणी में उसी विनय की प्रशंसा आती है जिस पर पहले सन्देह था, और साथ में शील और करुणा की।
परशुराम, दो भाई और जनक
- राम लक्ष्मण की ओर से उत्तर देते हैं, परशुराम का सम्मान रखते हैं और निर्भय होकर अपनी बात स्पष्ट करते हैं।
- लक्ष्मण छोटे भाई, जो परशुराम की दया वाली बात सुनकर मुसकराते हैं और उत्तर देते हैं।
- परशुराम कुठार धारण करनेवाले भृगुवंशी मुनि, जिनका क्रोध और सन्देह राम का प्रभाव जानने पर प्रेम तथा स्तुति में बदलता है।
- जनक जिनसे परशुराम लक्ष्मण को अपनी आँखों की ओट करने को कहते हैं।
जुड़े हुए हाथ और अपने ऊपर लिया अपराध
राम मुनि को नाथ कहकर सम्बोधित करते हैं: आप स्वभाव से सुजान हैं, बालक के वचन पर कान न दीजिये।
फिर राम बर्रै और बालक की उपमा देते हैं: दोनों का एक स्वभाव है, और संत इन पर दोष नहीं लगाते।
लक्ष्मण ने कोई काम नहीं बिगाड़ा, और राम अपने को मुनि का अपराधी कहते हैं।
कृपा कीजिये, क्रोध कीजिये, वध कीजिये अथवा बाँध लीजिये, जो कुछ करना हो, दास की तरह हम पर कीजिये। राम निर्णय परशुराम पर छोड़ देते हैं, और पूछते हैं कि क्रोध शीघ्र किस तरह दूर होगा। मुनिराज जो उपाय बतायें, वही करने को वे तैयार हैं।
परशुराम का ध्यान फिर लक्ष्मण पर जाता है। क्रोध कैसे दूर हो, वे कहते हैं, जब छोटा भाई अब भी टेढ़ा ताक रहा है। उस पर कुठार न चलाया तो इतना क्रोध करके किया ही क्या। वे अपने फरसे की घोर करनी सुनाते हैं: उसके विषय में सुनकर राजाओं की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं। उसी कुठार के रहते एक शत्रु राजकुमार उनकी आँखों के सामने जीवित है।
हाथ रुक गया, पर क्रोध बाकी है
परशुराम कहते हैं कि हाथ चलता नहीं, छाती क्रोध से जली जाती है, और राजाओं का वध करनेवाला कुठार कुण्ठित हो गया है।
वे कहते हैं कि विधाता विपरीत हो गये और स्वभाव बदल गया। उनके हृदय में कृपा कभी कहाँ थी? आज दया उन्हें असह्य दुःख सहा रही है।
यह सुनकर लक्ष्मण मुसकराते हैं, सिर नवाते हैं और फिर बोल उठते हैं: आपकी कृपारूपी वायु आपकी मूर्ति के अनुकूल है। आपके वचन निकलते हैं तो मानो फूल झड़ रहे हों।
लक्ष्मण कहते हैं कि यदि कृपा से शरीर इस तरह जलता है, तो क्रोध आ जाने पर उसकी रक्षा विधाता ही करेंगे।
परशुराम अब जनक से कहते हैं कि यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में निवास करना चाहता है। उसे शीघ्र उनकी आँखों की ओट क्यों नहीं करते? देखने में छोटा है, और खोटा है।
लक्ष्मण हँसकर मन ही मन कहते हैं: आँख मूँद लेने पर कहीं कोई नहीं है।
विनय पर छल का आरोप
परशुराम हृदय में बहुत क्रोध भरकर राम से कहते हैं कि शिव का धनुष तोड़कर राम उन्हें ज्ञान सिखाते हैं। लक्ष्मण के कटु वचनों की जिम्मेदारी भी वे बड़े भाई पर रख देते हैं: छोटा भाई राम की सम्मति से कटु बोलता है। और जुड़े हुए हाथों से की जा रही विनय में छल है।
वे कहते हैं कि या तो युद्ध में उन्हें सन्तोष दिया जाये, नहीं तो राम कहलाना छोड़ दिया जाये। फिर शिवद्रोह का आरोप लगाकर छल छोड़ने और समर करने की माँग रखते हैं। ऐसा न हुआ तो वे दोनों भाइयों का वध कर देंगे। परशुराम कुठार उठाये बक रहे हैं, और राम सिर झुकाये मन ही मन मुसकरा रहे हैं।
राम पोद्दार की टीका के अनुसार मन ही मन सोचते हैं कि गुनाह लक्ष्मण का और रोष उन पर। कहीं कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर लोग किसी की भी वन्दना करने लगते हैं, और टेढ़े चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता।
फिर वे मुनीश्वर से क्रोध छोड़ने को कहते हैं: आपके हाथ में कुठार है और मेरा सिर आगे है। जिस तरह आपका क्रोध जाये, स्वामी, वही कीजिये, और मुझे अपना अनुचर जानिये।
राम स्वामी और सेवक का सम्बन्ध सामने रखकर पूछते हैं कि इस सम्बन्ध में युद्ध कैसा। हे विप्रश्रेष्ठ, क्रोध छोड़िये।
फिर वे लक्ष्मण की ओर लौटते हैं: बालक ने आपका वेष देखकर कुछ कह दिया, और उसका भी दोष नहीं।
वेष, छोटा नाम और नौ पवित्र गुण
लक्ष्मण के सामने कुठार, बाण और धनुष धारण किये हुए व्यक्ति थे। राम कहते हैं कि बालक ने उन्हें वीर समझा और उसे क्रोध आया। वह नाम जानता था, पर व्यक्ति को पहचाना नहीं। उसने अपने वंश के स्वभाव के अनुसार उत्तर दिया।
यदि आप मुनि की तरह आते, राम कहते हैं, तो बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर धरता। भूल अनजान में हुई है। उसे क्षमा कीजिये। ब्राह्मण के हृदय में बहुत दया होनी चाहिये।
अब वे अपनी और परशुराम की बराबरी की बात उठाते हैं: कहाँ चरण और कहाँ माथा। कहाँ मेरा केवल राम, छोटा सा नाम, और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम।
अपने पास वे एक गुण कहते हैं, धनुष, और मुनि के पास नौ परम पवित्र गुण। हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका इन नौ के नाम खोलती है: शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता।
फिर वे कहते हैं कि वे सब प्रकार से हारे हुए हैं, और विप्र उनके अपराध क्षमा करें।
राम परशुराम को बार बार मुनि और विप्रवर कहते हैं। परशुराम क्रोध से हँसकर राम को भी छोटे भाई के समान टेढ़ा कहते हैं।
परशुराम का रणयज्ञ
परशुराम अपना उत्तर इस बात से आरम्भ करते हैं कि राम उन्हें निरा ब्राह्मण समझते हैं। वे कहते हैं कि वे कैसे विप्र हैं, यह सुनाया जायेगा। आगे धनुष, बाण, क्रोध, सेना और राजाओं को यज्ञ की एक एक वस्तु का नाम मिलता है। वर्णन उनके लड़े हुए युद्धों का है, यज्ञ के आकार में।
धनुष स्रुवा है, आहुति देने का पात्र। बाण आहुति हैं, और उनका कोप बहुत भयंकर अग्नि है। चतुरंगिणी सेना उस अग्नि की समिधा है, वे लकड़ियाँ जो यज्ञ में जलती हैं।
बड़े बड़े राजा इस रणयज्ञ में बलि के पशु हुए। परशुराम कहते हैं कि उन्होंने इस फरसे से उन्हें काटकर बलि दी, और करोड़ों जपयुक्त समर यज्ञ किये।
जप की बात को पोद्दार की टीका खोलती है: मन्त्र और स्वाहा के उच्चारण के साथ आहुति दी जाती है। उसी तरह परशुराम ने पुकार पुकारकर राजाओं की बलि दी।
फिर परशुराम कहते हैं कि राम को उनका प्रभाव ज्ञात नहीं, और ब्राह्मण समझकर उनका निरादर हो रहा है। धनुष तोड़ा है और घमण्ड बहुत बढ़ गया है, ऐसा अहंकार है मानो संसार जीतकर खड़े हों। राम इसका उत्तर देते हैं, और मुनि से विचार करके बोलने का निवेदन करते हैं।
नम्रता में निर्भयता
राम कहते हैं कि मुनि का क्रोध बहुत बड़ा है और उनकी भूल छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया, इसमें अभिमान किस बात का?
फिर वे परशुराम से एक सत्य सुनने को कहते हैं। यदि हम ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसके भय से हम सिर झुकायें?
देवता हों, दानव हों, राजा हों या अन्य अनेक योद्धा, वे समान बलवाले हों अथवा अधिक बलवान्, जो भी रण में ललकारेगा उससे राम सुखपूर्वक लड़ेंगे, काल हो तो भी।
वे कहते हैं कि क्षत्रिय का शरीर धारण करके जो समर से डर गया, उसने कुल में कलंक लगा दिया। रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते, और यह वे कुल की प्रशंसा के लिये नहीं, स्वभाव से कह रहे हैं।
अब वे ब्राह्मणवंश की महिमा कहते हैं। पोद्दार की टीका इसका पहला अर्थ देती है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है। ब्राह्मणवंश की ऐसी प्रभुता है।
टीका इसका एक दूसरा अर्थ भी देती है: जो भयरहित होता है, वह भी आपसे डरता है। राम के इन कोमल और गूढ़ वचनों को सुनकर परशुराम की बुद्धि के पर्दे खुल जाते हैं।
देते समय धनुष अपने आप चल गया
परशुराम अब राम से धनुष लेने और खींचने को कहते हैं, और चाहते हैं कि उनका सन्देह मिट जाये। पोद्दार की टीका में इस वचन का एक अर्थ लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष लेने का है।
और धनुष देते समय वह अपने आप चला जाता है। परशुराम के मन में आश्चर्य भर जाता है।
राम का प्रभाव जानकर परशुराम रोमांचित हो उठते हैं। शरीर प्रसन्नता से खिल जाता है, हृदय में इतना प्रेम है कि समाता नहीं, और वे हाथ जोड़कर बोलते हैं। प्रसंग के आरम्भ में राम के हाथ जुड़े थे। अब परशुराम के हाथ जुड़े हैं।
जिस विनय पर सन्देह था, उसी की स्तुति
परशुराम राम की जय बोलते हुए उन्हें रघुकुल के कमलवन का सूर्य और दानवों के कुलरूपी घने वन को जलानेवाली अग्नि कहते हैं।
वे देवताओं, ब्राह्मणों और गौओं का हित करनेवाले की जय कहते हैं, और मद, मोह, क्रोध और भ्रम हरनेवाले की।
आगे वे राम को विनय, शील, करुणा आदि गुणों का समुद्र और वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर कहते हैं।
फिर वे सेवकों को सुख देनेवाले, सब अंगों से सुन्दर राम की जय कहते हैं, जिनके शरीर की छवि करोड़ों कामदेवों जैसी है।
एक मुख से कितनी प्रशंसा की जाये, परशुराम कहते हैं, और राम को शिव के मनरूपी मानसरोवर का हंस बताते हैं।
फिर वे अपने कहे हुए वचनों पर आते हैं: अज्ञान में बहुत अनुचित कहा है। क्षमा के मन्दिर दोनों भाई क्षमा करें।
वन की ओर प्रस्थान और नगर का हर्ष
परशुराम रघुकुल की पताका राम की तीन बार जय कहकर तप करने के लिये वन को चले जाते हैं।
कुटिल राजाओं का अपना भय जागता है। पोद्दार की टीका उनके मन की आशंका खोलती है: राम से परशुराम भी हार गये, और इन राजाओं ने राम का अपमान किया था। अब कहीं राम उसका बदला न लें। यह राजाओं के अपने मन का गढ़ा हुआ डर है।
वे कायर चुपके से जहाँ तहाँ भाग जाते हैं।
देवता नगाड़े बजाते हैं और राम पर फूल बरसाते हैं। नगर के स्त्री पुरुष सब हर्षित हो जाते हैं। पोद्दार की टीका इस नगर को जनकपुर कहती है, और उनके मिटे हुए शूल को अज्ञान से उत्पन्न दुःख बताती है।
दोनों ओर से माँगी क्षमा
क्षमा की माँग दोनों ओर से हुई है। राम दो बार क्षमा माँगते हैं, पहले अनजान में हुई भूल के लिये और फिर अपने अपराधों के लिये। परशुराम अज्ञान में कहे हुए अनुचित वचनों के लिये दोनों भाइयों से क्षमा माँगते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 279 से 285, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।