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परशुराम की पहचान और उनका प्रस्थान

रामचरितमानस · बालकाण्ड · परशुराम की पहचान और उनका प्रस्थान

परशुराम की पहचान और उनका प्रस्थान

क्रोध में हाथ रुकता है, विनय पर सन्देह होता है, और पहचान खुलने पर वही परशुराम दोनों भाइयों से क्षमा माँगते हैं।

राम दोनों हाथ जोड़कर बोल रहे हैं। उनकी वाणी कोमल है, शीतल है, और सामने परशुराम का क्रोध अभी बना हुआ है। छोटे भाई की ओर उठी हुई कठोर दृष्टि बड़े भाई की विनती से हटती नहीं। बात कितनी दूर जा सकती है, इसका अनुमान परशुराम स्वयं अपने कुठार का परिचय देकर करा रहे हैं। राम उस क्रोध को अपने ऊपर लेने के लिये प्रस्तुत हैं। वे अपराध अपने सिर रखते हैं और उसका उपाय भी मुनि से ही पूछते हैं।

तुलसीदास के रामचरितमानस का यह प्रसंग पहचान तक पहुँचने में समय लेता है। परशुराम राम की विनय सुनते हैं, उसमें छल का सन्देह करते हैं, फिर अपने बल का वर्णन करते हैं। राम उनके हर आरोप का उत्तर देते हुए ब्राह्मण का आदर और रघुवंश की निर्भयता साथ रखते हैं। आगे चलकर परशुराम की वाणी में विनय, शील और क्षमा की ही प्रशंसा आयेगी। अभी उन्हीं गुणों को पहचानना शेष है। सभा में उठे हुए कुठार और जुड़े हुए हाथों के बीच यह पूरी बातचीत होती है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम लक्ष्मण की ओर से उत्तर देते हैं, परशुराम का सम्मान रखते हैं और निर्भय होकर अपनी बात स्पष्ट करते हैं।
  • लक्ष्मण छोटे भाई, जो परशुराम की दया वाली बात सुनकर फिर मुसकराते हैं और तीखा उत्तर देते हैं।
  • परशुराम कुठारधारी भृगुपति, जिनका क्रोध और सन्देह राम का प्रभाव जानने पर प्रेम तथा स्तुति में बदलता है।
  • जनक जिनसे परशुराम लक्ष्मण को अपनी आँखों की ओट करने को कहते हैं।

जुड़े हुए हाथ और अपने ऊपर लिया अपराध

अति बिनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना॥

चौपाई १

राम मुनि को नाथ कहकर सम्बोधित करते हैं। पहले उनके सहज सुजान होने का स्मरण दिलाते हैं और फिर निवेदन रखते हैं कि बालक के वचन पर कान न दीजिये। इस विनती में लक्ष्मण के शब्दों पर कोई नया विवाद नहीं उठाया जाता। सुनकर छोड़ देने की बात है। राम जानते हैं कि परशुराम उन्हीं वचनों को पकड़े हुए हैं, इसलिये बात का आरम्भ वहीं से करते हैं जहाँ क्रोध अटका हुआ है। उनकी शीतल वाणी का प्रयोजन भी सामने वाले का ताप दूर करना है।

इसके लिये राम बर्रै और बालक की उपमा देते हैं। दोनों का एक स्वभाव है, और संत इन पर दोष नहीं लगाते। बर्रै का नाम सुनते ही चुभने की बात समझ में आती है। लक्ष्मण की बोली भी अभी परशुराम को चुभ रही है। राम बालक के स्वभाव को सामने रखकर संत की उदारता की ओर लौटाते हैं। मुनि अपनी ओर से बड़े बने रहें, बच्चे के कहे पर उतना भार न रखें। उपमा के बाद वे उस बात को बिल्कुल साफ कर देते हैं जिस पर दण्ड का प्रश्न टिका है।

लक्ष्मण ने कोई काम नहीं बिगाड़ा। धनुष के प्रसंग का अपराधी राम अपने को कहते हैं। कटु वचन कहनेवाले छोटे भाई पर परशुराम का रोष है, पर राम काम और वचन का अन्तर सामने रख रहे हैं। यदि टूटा हुआ धनुष ही अपराध का कारण है, तो उसका उत्तर देने के लिये वे स्वयं उपस्थित हैं। छोटे भाई को आगे रखकर बच निकलने की कोई कोशिश उनकी बात में नहीं है। वे जिस दायित्व को अपना बताते हैं, उसके साथ दण्ड की सम्भावना भी अपने ऊपर लेते हैं।

कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं । मो पर करिअ दास की नाईं॥
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई । मुनिनायक सोइ करौं उपाई॥

चौपाई २

कृपा कीजिये, क्रोध कीजिये, वध कीजिये अथवा बाँध लीजिये, जो कुछ करना हो अपने दास को समझकर हम पर कीजिये। राम का यह निवेदन केवल क्षमा माँगने तक सीमित नहीं रहता। वे परशुराम के सामने निर्णय छोड़ देते हैं और अपने को उस निर्णय के लिये प्रस्तुत करते हैं। साथ ही पूछते हैं कि क्रोध शीघ्र किस तरह दूर होगा। मुनिनायक जो उपाय बतायेंगे, वही करने को वे तैयार हैं। नम्रता यहाँ काम करने की तत्परता लिये हुए है।

परशुराम का ध्यान फिर लक्ष्मण पर जाता है। क्रोध कैसे दूर हो, वे कहते हैं, जब छोटा भाई अब भी टेढ़ा देख रहा है। उन्हें अपनी विनती करनेवाले राम के सामने भी उसी बालक की गर्दन दिखाई दे रही है। उस पर कुठार न चलाया तो इतना क्रोध करके किया ही क्या। वे अपने फरसे की घोर करनी सुनाते हैं: उसके विषय में सुनकर राजाओं की स्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं। उसी कुठार के रहते एक शत्रु राजकुमार उनकी आँखों के सामने जीवित है।

राम लक्ष्मण की बालसुलभ बोली को छोड़ देने की प्रार्थना करते हैं और अपराध तथा दण्ड अपने ऊपर लेते हैं। परशुराम की दृष्टि अब भी लक्ष्मण पर है; वे कुठार की घोर शक्ति याद करके उनके जीवित रहने पर क्षुब्ध हैं।

हाथ रुक गया, पर क्रोध बाकी है

बहइ न हाथु दहइ रिस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती॥
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ॥

चौपाई ३

परशुराम अपने भीतर एक ऐसी दशा पाते हैं जिसका मेल उनके कथन से नहीं बैठ रहा। हाथ चलता नहीं, छाती क्रोध से जली जाती है। राजाओं का वध करनेवाला कुठार भी उन्हें अब कुण्ठित जान पड़ता है। हथियार पास है और उसे चलाने की इच्छा भी है, फिर भी कुठार चल नहीं पाता। इस ठहराव से उन्हें शान्ति नहीं मिलती। वे उलटे अपने स्वभाव में आये परिवर्तन से व्याकुल हैं और उसका कारण खोज रहे हैं।

उनका निष्कर्ष है कि विधाता विपरीत हो गये हैं। भाग्य पलटने से स्वभाव बदल गया, नहीं तो उनके हृदय में कभी दया कैसे आ सकती थी। आज यही दया उन्हें असह्य दुःख सहा रही है। परशुराम अभी राम का प्रभाव जान लेने की बात नहीं कहते। वे रुके हुए हाथ को अपने भीतर की अनचाही कृपा से समझाते हैं। क्रोध बाहर जाने का रास्ता नहीं पा रहा, और उस जलन को वे दया का परिणाम कह रहे हैं।

आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा॥
बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन झरत जनु फूला॥

चौपाई ४

यह सुनकर लक्ष्मण मुसकराते हैं और सिर नवाते हैं। वे फिर बोल उठते हैं। उनकी बात में प्रणाम का रूप भी है और ऐसा व्यंग्य भी, जिसे सुनकर परशुराम की शान्ति और कठिन हो जाती है। आपकी कृपारूपी वायु आपकी मूर्ति के अनुकूल ही है, वे कहते हैं। आपके वचन निकलते हैं तो मानो फूल झड़ रहे हों। कुठार की धमकी और गर्दन काटने की इच्छा को सुनने के तुरन्त बाद फूलों का यह उल्लेख आता है। मुसकान शब्दों के भीतर भी बनी रहती है।

लक्ष्मण उसी दया की बात आगे बढ़ाते हैं जिस पर मुनि ने अपने रुके हुए हाथ का दोष रखा है। यदि कृपा से शरीर इस तरह जलता है, तो क्रोध आ जाने पर उसकी रक्षा विधाता ही करेंगे। यह प्रश्न मुनि के अपने कथन को उन्हीं के सामने बढ़ाकर रख देता है। लक्ष्मण कोई नयी धमकी नहीं देते। वे बस पूछते हैं कि अभी जो दशा दया की बतायी जा रही है, उसके बाद क्रोध की दशा कैसी होगी। बात की धार यहीं से निकलती है।

परशुराम अब जनक से कहते हैं कि यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में निवास करना चाहता है। उसे शीघ्र उनकी आँखों की ओट किया जाये। देखने में छोटा है, पर खोट बहुत है। इस बार विनती सुनने के स्थान पर सामने का दृश्य बदल देने की माँग होती है। राम से बात करते हुए भी वे लक्ष्मण को देख रहे थे, और अब जनक से उसी देखने की बाधा हटाने को कहते हैं। उन्हें बालक की उपस्थिति ही असह्य लग रही है।

लक्ष्मण हँसते हैं, पर अगली बात मन में कहते हैं: आँखें मूँद लेने पर कहीं कोई दिखाई नहीं देता। इस विचार को वे सभा में बोलकर नहीं सुनाते। उनका व्यंग्य भीतर चलता है और परशुराम की आज्ञा अपनी जगह रह जाती है। किसी को आँखों की ओट करने की माँग और अपनी आँखें बन्द कर लेने का विचार, दोनों को तुलसी पास रखते हैं। इसके बाद परशुराम फिर राम की ओर मुड़ते हैं, और इस बार उनकी शिकायत बड़े भाई की विनय से भी है।

परशुराम हाथ न चलने और छाती जलने को अनचाही दया का दुःख समझते हैं। लक्ष्मण फिर व्यंग्य करते हैं। जनक से उन्हें हटाने की माँग पर उनका अगला उत्तर केवल मन में उठता है।

विनय पर छल का आरोप

परशुराम हृदय में बहुत क्रोध भरकर राम से कहते हैं कि शिव का धनुष तोड़कर उलटे उन्हें समझाया जा रहा है। जो बातें राम शान्त करने के लिये कह रहे थे, वे मुनि को उपदेश जान पड़ती हैं। और लक्ष्मण के कटु वचनों की जिम्मेदारी भी वे बड़े भाई पर रख देते हैं। उनके अनुसार छोटे भाई को राम की सम्मति मिली हुई है, और जुड़े हुए हाथों से की जा रही विनय में छल है। अब दो अलग स्वभाव उनके आरोप में एक ही योजना के भाग बन गये हैं।

बंधु कहइ कटु संमत तोरें । तू छल बिनय करसि कर जोरें॥
करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा॥

चौपाई ५

वे युद्ध में सन्तोष देने को कहते हैं, अन्यथा राम कहलाना छोड़ देने को। ललकार नाम तक पहुँच जाती है। फिर शिवद्रोह का आरोप लगाकर छल छोड़ने और समर करने की माँग रखते हैं। ऐसा न हुआ तो दोनों भाइयों का वध कर देंगे। कुठार उठा हुआ है, परशुराम लगातार बोल रहे हैं, और राम सिर झुकाये हुए हैं। तुलसी इसी बाहरी मुद्रा के साथ उनकी भीतर की मुसकान भी बताते हैं। झुका हुआ सिर उनके मन में भय होने का संकेत नहीं बनता।

गुनह लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू॥
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू॥

चौपाई ६

राम मन में सोचते हैं कि दोष लक्ष्मण का और रोष उन पर। कहीं कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर लोग किसी की भी वन्दना करने लगते हैं, और टेढ़े चन्द्रमा को राहु भी नहीं ग्रसता। इस उपमा की जगह ठीक उस क्षण है जब राम की सीधी विनय को छल माना गया है। बाहर से विनम्र व्यक्ति अपने ऊपर लगते हुए आरोप का असंगत होना भीतर अच्छी तरह देख रहा है। उन्हें यह समझाने के लिये किसी और की सहायता नहीं चाहिये।

राहु और चन्द्रमा का यह विचार मन में है। राम इसे कटाक्ष बनाकर परशुराम को नहीं सुनाते। उनके प्रकट उत्तर का आरम्भ फिर मुनि के सम्मान से होता है। वे मुनीश्वर से क्रोध छोड़ने को कहते हैं, सामने अपना सिर बताते हैं और हाथ के कुठार की ओर बात लाते हैं। स्वामी जिस तरह शान्त हों, वही करें। वे अपने को अनुचर जानने का निवेदन दोहराते हैं। भीतर की मुसकान और बाहर की विनय एक साथ उपस्थित हैं, और दोनों का अन्तर कवि हमें देखने देते हैं।

पहले राम ने दण्ड अपने ऊपर लेने की बात कही थी। अब उसका स्पष्ट दृश्य उनकी बोली में आ गया है: मुनि के हाथ में कुठार है, और सिर सामने है। परशुराम दोनों भाइयों को युद्ध के लिये ललकारते हैं, राम स्वामी और सेवक का सम्बन्ध सामने रखते हैं। इस सम्बन्ध में युद्ध कैसा। वे अपनी ओर से समर का नया कारण नहीं बनाते। उनका प्रश्न परशुराम के लिये आदर की जगह बचाता है, ताकि शान्त होने में उनका मान घटने की बात न आये।

प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु॥ २८१॥

दोहा २८१

इसके बाद वे लक्ष्मण की ओर लौटते हैं। बालक ने वेष देखकर कुछ कह दिया, इसलिये उसका भी दोष नहीं। यह क्षमा की माँग का अगला कारण है। अभी तक बालक का सहज स्वभाव बताया गया था; अब उस वेष को देखिये जिसने बालक में वीर की प्रतिक्रिया जगायी। राम परशुराम से बात करते हुए किसी बिन्दु को अधूरा नहीं छोड़ते। धनुष का अपराध अपने ऊपर लेते हैं, कटु वचनों को बालक के स्वभाव से समझाते हैं, और फिर उस गलत पहचान की वजह बताते हैं जिसमें वचन निकले।

परशुराम राम की विनय को छल मानकर युद्ध की ललकार देते हैं। राम मन में आरोप की असंगति देखते हैं, पर प्रकट उत्तर में अपना सिर सामने रखते हैं और स्वामी तथा सेवक के बीच युद्ध का प्रश्न उठाते हैं।

वेष, छोटा नाम और नौ पवित्र गुण

लक्ष्मण के सामने कुठार, बाण और धनुष धारण किये हुए व्यक्ति थे। राम कहते हैं कि बालक ने उन्हें वीर समझा और उसी से उसे क्रोध आया। वह नाम जानता था, पर व्यक्ति को पहचाना नहीं। यह अन्तर उनके उत्तर में साफ रखा गया है। प्रसिद्ध नाम सुन लेना और सामने आये हुए व्यक्ति को उस नाम से पहचान लेना अलग बातें हैं। पहचान में हुई भूल के बाद लक्ष्मण ने अपने वंश के स्वभाव के अनुसार उत्तर दिया। शस्त्रों से सजे हुए आगन्तुक के सामने बालक का क्षत्रिय स्वभाव जागा।

राम फिर उसी बात की दूसरी सम्भावना कहते हैं। यदि मुनि की तरह आते, तो बालक उनके चरणों की धूलि सिर पर धरता। यहाँ लक्ष्मण के आदर करने की योग्यता भी बची रहती है। वे सम्मान करना नहीं जानते, ऐसा दोष राम स्वीकार नहीं करते। मुनि का रूप पहचान लेते तो प्रणाम का ढंग भी वही होता। भूल अनजान में हुई है, इसलिये उसे क्षमा करने का निवेदन है। राम ब्राह्मण के हृदय में बहुत दया होने की बात कहते हैं और इसी दया का आश्रय माँगते हैं।

अब वे अपनी और परशुराम की बराबरी की बात उठाते हैं। कहाँ चरण और कहाँ माथा। इस क्रम में मुनि के चरण ऊपर आदर की जगह पाते हैं और राम अपना माथा उनके आगे रखते हैं। फिर दोनों नामों का अन्तर बताते हैं। उनका अपना नाम केवल राम है, छोटा सा; परशुराम के नाम में परशु भी है, इसलिए वह बड़ा है। परशुराम ने कुछ ही पहले राम कहलाना छोड़ने की चुनौती दी थी। राम उसी नाम को विनय की भाषा में रखते हैं और बड़े नाम वाले का सम्मान करते हैं।

देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारें॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे॥

चौपाई ७

अपने पास वे एक ही गुण कहते हैं, धनुष। मुनि के पास नौ परम पवित्र गुण हैं। हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका इन नौ के नाम खोलती है: शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता। गिनती के साथ पवित्रता का विशेषण है। राम अपने शस्त्र का नाम लेकर मुनि की ऐसी सम्पदा का मान करते हैं जिसमें क्षमा और सरलता भी गिनी गयी हैं। जिनसे वे इस समय क्षमा माँग रहे हैं, उन्हीं के गुणों में क्षमा का स्थान स्मरण कराया जाता है।

पूरे उत्तर में सम्मान कई रूपों में आता रहा है। स्वामी और सेवक, चरण और माथा, छोटा और बड़ा नाम, एक गुण और नौ गुण। हर बार राम अपनी ओर से बराबरी का दावा हटाते हैं। उनका अन्तिम निवेदन है कि वे सभी प्रकार से हारे हुए हैं और विप्र उनके अपराध क्षमा करें। इन शब्दों को युद्ध में पराजय का समाचार समझना उनके सामने कहे हुए पूरे उत्तर को खो देना होगा। यहाँ वे परशुराम की महिमा स्वीकार करके क्षमा का स्थान बना रहे हैं।

परशुराम को बार बार मुनि और विप्रवर कहना भी चुभ जाता है। उन्हें लगता है कि उनके दूसरे परिचय को भुलाया जा रहा है। वे क्रोध की हँसी हँसकर राम को भी छोटे भाई के समान टेढ़ा कहते हैं। विनय का हर रूप अब तक उनके सन्देह को दूर नहीं कर सका। राम ने नौ गुणों का आदर किया है, पर परशुराम अपना परिचय युद्ध की भाषा में देना चाहते हैं। इसी प्रतिक्रिया से उनका अगला लम्बा रूपक निकलता है।

राम लक्ष्मण की भूल का कारण सशस्त्र वेष और अधूरी पहचान बताते हैं। वे अपने छोटे नाम तथा एक धनुष के सामने मुनि के बड़े नाम और नौ पवित्र गुणों का आदर रखते हैं। परशुराम को मुनि तथा विप्रवर के सम्बोधन भी खटकते हैं।

परशुराम का रणयज्ञ

क्या उन्हें निरा ब्राह्मण समझ लिया गया है। परशुराम इसी प्रश्न से अपना उत्तर आरम्भ करते हैं। राम बार बार जिस परिचय का मान रख रहे हैं, उसी के भीतर वे अपना युद्ध करनेवाला रूप दिखाना चाहते हैं। वे कहते हैं कि वे कैसे विप्र हैं, यह सुनाया जायेगा। आगे उनके प्रत्येक शस्त्र और प्रत्येक विरोधी को यज्ञ की एक वस्तु का नाम मिलता है। वर्णन उनके लड़े हुए युद्धों का है, जिसे वे यज्ञ का आकार देकर प्रस्तुत करते हैं।

निपटहिं द्विज करि जानहि मोही । मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही॥
चाप स्रुवा सर आहुति जानू । कोपु मोर अति घोर कृसानू॥

चौपाई ८

धनुष स्रुवा है, आहुति देने का पात्र। बाण आहुति हैं और उनका कोप बहुत भयंकर अग्नि है। इस अग्नि के लिये समिधा भी चाहिये। वे चतुरंगिणी सेना को उन लकड़ियों की जगह रखते हैं जो यज्ञ में जलती हैं। रूपक में क्रोध को अग्नि कह देने के बाद बाकी वस्तुएँ भी उसी विधान में सजने लगती हैं। धनुष से छोड़े गये बाण उस ज्वाला की ओर जाती आहुतियाँ हैं और सामने फैली सेना उसका ईंधन बनती है।

समिधि सेन चतुरंग सुहाई । महा महीप भए पसु आई॥
मैं एहिं परसु काटि बलि दीन्हे । समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे॥

चौपाई ९

बड़े बड़े राजा इस रणयज्ञ में बलि के पशु हुए। परशुराम कहते हैं कि उन्होंने अपने इसी फरसे से उन्हें काटकर बलि दी और ऐसे करोड़ों जपयुक्त समर यज्ञ किये। धनुष, बाण, अग्नि और समिधा के बाद अब कुठार की भूमिका भी बता दी गयी। वह उनके परिचय के बीच से हट नहीं सकता। जिस हाथ में वह अभी है, उसी हाथ की पूर्व की करनी सुनाकर वे राम को अपना प्रभाव मानने के लिये कहते हैं।

जप की बात को पोद्दार जी की टीका खोलती है। जिस तरह मन्त्र और स्वाहा के उच्चारण के साथ आहुति दी जाती है, उसी तरह परशुराम ने पुकार पुकारकर राजाओं की बलि दी। इससे रूपक में युद्ध की आवाज भी आ जाती है। हम उनके बोले हुए वर्णन को सुन रहे हैं; सभा में कोई नया यज्ञ आरम्भ होने की बात नहीं है। उनके क्रोध, शस्त्र और युद्धों का स्मरण ही यज्ञ की भाषा में रखा गया है।

यह पूरा परिचय सुनाने के बाद परशुराम फिर आरोप पर लौटते हैं। राम को उनका प्रभाव ज्ञात नहीं है, इसी से ब्राह्मण समझकर निरादर हो रहा है। धनुष तोड़ने से इतना घमण्ड बढ़ गया कि मानो संसार जीतकर खड़े हों। उनका रोष अब राम के भीतर एक ऐसे अभिमान को देख रहा है जिसे राम अपने उत्तर में बार बार छोड़ते आये हैं। राम को इस आरोप का भी स्पष्ट उत्तर देना है। वे मुनि से विचार करके बोलने का निवेदन करते हैं।

परशुराम अपने युद्धों को यज्ञ का रूप देते हैं: धनुष स्रुवा, बाण आहुति, क्रोध अग्नि, सेना समिधा और राजा बलि के पशु हैं। इस वर्णन के बाद वे राम पर अपने प्रभाव का निरादर और धनुष भंग का अभिमान करने का आरोप रखते हैं।

नम्रता में निर्भयता

राम कहते हैं कि मुनि का क्रोध बहुत बड़ा है और उनकी भूल छोटी है। पुराना पिनाक था, छूते ही टूट गया, इसमें अभिमान किस बात का। यह धनुष भंग के विषय में राम का अपना विनम्र उत्तर है। जिस घटना को परशुराम जगत् जीत लेने जैसा घमण्ड पैदा करनेवाली बता रहे हैं, राम उसी में गर्व का कारण नहीं पाते। वे अपने पराक्रम की बढ़ाई करने के लिये इस अवसर का उपयोग नहीं करते। पहले आरोप जितना बड़ा हुआ था, उत्तर उतना ही सधा हुआ रहता है।

जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ॥ २८३॥

दोहा २८३

फिर वे भृगुनाथ को एक सत्य सुनने के लिये कहते हैं। यदि ब्राह्मण कहने का अर्थ सचमुच निरादर लगाया जा रहा है, तो संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसके भय से वे सिर झुकायें। सिर झुका हुआ था और अब उसके झुकने का कारण साफ कहा जाता है। परशुराम के सामने ब्राह्मण का सम्मान है। डरकर झुकने की बात राम स्वीकार नहीं करते। इसी के बाद उनका उत्तर उस सीमा तक जाता है जहाँ भय के लिये कोई बड़ा नाम बचता नहीं।

देवता हों, दैत्य हों, राजा हों या अन्य अनेक योद्धा, वे समान बल वाले हों अथवा अधिक बलवान, जो भी रण में ललकारेगा उससे राम सुखपूर्वक लड़ेंगे। काल स्वयं सामने हो तो भी यही बात है। इस कथन में सामने वाले की शक्ति को छोटा करके साहस नहीं जुटाया जाता। अधिक बलवान प्रतिद्वन्द्वी की सम्भावना भी पहले से रखी गयी है। राम का उत्तर उस दशा में भी नहीं बदलता। रण की ललकार हो तो उनका स्वभाव युद्ध के लिये तैयार है।

वे कहते हैं कि क्षत्रिय का शरीर धारण करके जो समर से डर गया, उसने अपने कुल में कलंक ला दिया। रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते। इस बात के साथ वे यह भी जोड़ते हैं कि अपने कुल की प्रशंसा के लिये ऐसा नहीं कहा जा रहा, स्वभाव का वर्णन है। परशुराम ने धनुष भंग के बाद घमण्ड होने की बात कही थी; राम अपनी निर्भयता स्पष्ट करते हुए भी आत्मप्रशंसा का दावा नहीं रखते। आदर से कही हुई बात में उनकी दृढ़ता पूरी सुनाई देती है।

अब वे फिर ब्राह्मणवंश की महिमा की ओर लौटते हैं। जिस उत्तर ने काल तक के सामने निर्भय रहने की बात कह दी, वह मुनि के आदर पर आकर पूरा होता है। पोद्दार जी की टीका इसका पहला अर्थ देती है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है। ब्राह्मणवंश की ऐसी प्रभुता है। यहाँ डर का उल्लेख अभी कही गयी वीरता को मिटा नहीं देता। राम उसी आदर को फिर स्थापित कर रहे हैं जिसके कारण मस्तक झुका हुआ है।

बिप्रबंस कै असि प्रभुताई । अभय होइ जो तुम्हहि डेराई॥
सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के । उघरे पटल परसुधर मति के॥

चौपाई १०

टीका इसी पंक्ति का एक दूसरा अर्थ भी देती है: जो भयरहित होता है, वह भी आपसे डरता है। दोनों अर्थों में ब्राह्मण के सामने आदर का विशेष स्थान रहता है। पहले अर्थ में उससे सर्वत्र निर्भयता मिलती है, दूसरे में निर्भय भी उसके सामने संकोच रखते हैं। राम के इन कोमल और गूढ़ वचनों को सुनकर परशुराम की बुद्धि के पर्दे खुल जाते हैं। यह वह मोड़ है जिसका नाम कवि अब स्पष्ट रूप से लेते हैं। इतने उत्तर प्रत्युत्तर के बाद सुनने की दशा बदल गयी है।

राम अभिमान का कारण अस्वीकार करते हैं और स्पष्ट कहते हैं कि वे भय से सिर नहीं झुकाते। रण में काल से भी निर्भय रहने का स्वभाव बताते हुए वे ब्राह्मण का सम्मान रखते हैं। उनके मृदु और गूढ़ वचन सुनकर परशुराम की बुद्धि के पर्दे खुलते हैं।

देते समय धनुष अपने आप चल गया

परशुराम अब धनुष लेने और खींचने को कहते हैं, जिससे उनका सन्देह मिट जाये। पोद्दार जी की टीका में इस वचन का एक अर्थ लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष लेने का है। यही धनुष देने के लिये वे आगे होते हैं। अभी तक परशुराम अपना कुठार दिखाकर अपनी करनी सुना रहे थे। अब वे राम के हाथ में धनुष देकर अपने सन्देह का समाधान चाहते हैं। सुनने के बाद जाँचने की यह इच्छा उनके अगले वचन में साफ दिखाई देती है।

राम रमापति कर धनु लेहू । खैंचहु मिटै मोर संदेहू॥
देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ॥

चौपाई ११

और धनुष देते समय वह अपने आप चला जाता है। परशुराम के मन में आश्चर्य भर जाता है। उन्होंने खींचने के लिये कहा था, पर तुलसी जिस घटना पर हमारा ध्यान रोकते हैं वह देने के क्षण में होती है। धनुष का अपने आप चलना सामने है। उसी के बाद आश्चर्य और फिर राम के प्रभाव की पहचान आती है। उस छोटे से क्रम में परशुराम के भीतर बहुत कुछ बदल जाता है। जिस शक्ति को वे अपने परिचय के सामने तौल रहे थे, अब उसका प्रभाव जान लेते हैं।

कथा यहाँ किसी और ललकार में नहीं फैलती। परशुराम का संशय उस आश्चर्य में बदलता है, और आश्चर्य पहचान तक पहुँचता है। राम के मृदु वचन सुनकर बुद्धि के पर्दे पहले ही खुले थे। धनुष की घटना के बाद उनके शरीर और हृदय में जो होता है, उसका वर्णन दोहा करता है। अभी थोड़ी देर पहले इसी शरीर की छाती क्रोध से जल रही थी। अब उसके लिये पुलकित और प्रफुल्लित होने के शब्द आते हैं।

जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात।
जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेमु अमात॥ २८४॥

दोहा २८४

राम का प्रभाव जानकर परशुराम रोमांचित हो उठते हैं। शरीर प्रसन्नता से खिल जाता है और हृदय में इतना प्रेम है कि समाता नहीं। वे दोनों हाथ जोड़कर बोलते हैं। प्रसंग के आरम्भ में राम के जुड़े हुए हाथ थे। अब परशुराम के हाथ जुड़े हैं। एक ही मुद्रा दोनों ओर दिखाई देती है, पर यहाँ तक पहुँचने के बीच उनका क्रोध, आरोप, सन्देह और पूरा आत्मपरिचय आ चुका है। उनकी अगली वाणी में उस यात्रा का परिणाम सुनाई देगा।

परशुराम सन्देह मिटाने के लिये धनुष लेने और खींचने को कहते हैं। देते समय धनुष अपने आप चल जाता है। राम का प्रभाव जानकर उनका शरीर पुलकित होता है, हृदय प्रेम से भरता है और वे हाथ जोड़कर बोलते हैं।

जिस विनय पर सन्देह था, उसी की स्तुति

जय रघुबंस बनज बन भानू । गहन दनुज कुल दहन कृसानू॥
जय सुर बिप्र धेनु हितकारी । जय मद मोह कोह भ्रम हारी॥

चौपाई १२

परशुराम राम को रघुकुल के कमलवन का सूर्य कहकर जय बोलते हैं। जिस कुल की निर्भयता अभी राम ने स्वयं कही थी, उसी कुल के बीच अब उनका स्थान कमलों को खिलानेवाले सूर्य का है। अगली छवि राक्षसों के कुलरूपी घने वन को जलानेवाली अग्नि की है। कमलवन के लिये प्रकाश और दनुजकुल के घने वन के लिये दाह, दोनों में राम का प्रभाव व्यक्त होता है। स्तुति उनके हितकारी और संहारकारी रूपों को पास रखती है।

वे देवताओं, ब्राह्मणों और गौओं का हित करनेवाले की जय कहते हैं। फिर मद, मोह, क्रोध और भ्रम हरनेवाले को प्रणाम करते हैं। ये चार शब्द परशुराम की अभी की दशा के बहुत निकट सुनाई देते हैं। उनके क्रोध से चला हुआ संवाद पहचान पर आकर ठहरा है, और अब वे स्वयं क्रोध तथा भ्रम को हरनेवाले का गुण गा रहे हैं। स्तुति अपने भीतर इस भेंट का अर्थ भी रखती है। राम की महिमा कहते हुए उनका बदला हुआ मन भी प्रकट होता है।

आगे वे राम को विनय, शील और करुणा आदि गुणों का समुद्र कहते हैं। जो विनय उन्हें पहले छल लगी थी, वही अब गुणों के समुद्र का एक अंग है। परशुराम केवल बल देखकर जय नहीं बोल रहे। वे उस बोलने के ढंग को भी पहचान रहे हैं जिसे इतने समय तक सुनते रहे थे। वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर राम की जय कहते हैं। कोमल और गूढ़ वचन जिन्होंने बुद्धि के पर्दे खोले, अब उन्हीं की चतुर रचना की प्रशंसा उनके मुख से निकलती है।

फिर सेवकों को सुख देनेवाले राम का स्मरण है। सभी अंग सुन्दर हैं और उनके शरीर की छवि में करोड़ों कामदेवों का सौन्दर्य है। परशुराम की दृष्टि का यह विस्तार देखिये। पहले वही दृष्टि लक्ष्मण की गर्दन, हाथ के कुठार और अपने विरोधी की जीवित उपस्थिति पर अटकी हुई थी। अब वह राम के अंगों के सौन्दर्य को देखती है और उस रूप में सेवकों के सुख का अनुभव कहती है। हृदय में उमड़ा हुआ प्रेम स्तुति की छवियों में फैल रहा है।

करौं काह मुख एक प्रसंसा । जय महेस मन मानस हंसा॥
अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता । छमहु छमामंदिर दोउ भ्राता॥

चौपाई १३

एक मुख से कितनी प्रशंसा की जाये। परशुराम अपनी वाणी की सीमा कहते हैं और फिर राम को महादेव के मनरूपी मानसरोवर का हंस बताते हैं। कुछ समय पहले राम पर शिवद्रोह का आरोप था। अब उन्हीं राम का निवास शिव के मन की इस निर्मल छवि में दिखाई देता है। आरोप और स्तुति के बीच इतना परिवर्तन हुआ है। परशुराम को राम का प्रभाव जान लेने पर उनके सम्बन्धों को देखने का ढंग भी बदल गया है।

फिर वे अपने कहे हुए वचनों पर आते हैं। अज्ञान में बहुत अनुचित कहा है। दोनों भाई क्षमा के मन्दिर हैं, वे क्षमा करें। यह निवेदन राम के साथ लक्ष्मण को भी सम्बोधित है। जिन छोटे भाई की गर्दन पर कुठार चलाने की बात हुई थी, वे भी अब उसी क्षमायाचना में आदर से सम्मिलित हैं। परशुराम अपने अनुचित वचनों की जिम्मेदारी लेते हैं। पहले राम अनजान में हुई भूल क्षमा करने को कह रहे थे। अन्त में परशुराम अपनी अज्ञानता स्वीकार करके क्षमा माँगते हैं।

परशुराम राम के प्रभाव, हितकारी स्वरूप, विनय, शील, करुणा, वचनकुशलता और सौन्दर्य की स्तुति करते हैं। उन्हें शिव के मनरूपी मानसरोवर का हंस कहकर अपने अनुचित वचनों के लिये दोनों भाइयों से क्षमा माँगते हैं।

वन की ओर प्रस्थान और नगर का हर्ष

परशुराम रघुकुल की पताका राम की बार बार जय कहते हैं। इसके बाद वे तप करने के लिये वन को चले जाते हैं। उनके प्रस्थान का प्रयोजन तप है। पहचाने हुए प्रभु की स्तुति और दोनों भाइयों से माँगी गयी क्षमा के बाद यही दिशा आती है। जिस व्यक्ति की उपस्थिति में सभा के भीतर क्रोध और भय का इतना फैलाव था, वह अब प्रेम से जय बोलकर निकलता है। तुलसी इस विदा को आगे की किसी लड़ाई की तैयारी से नहीं जोड़ते।

उन्हें जाते देखकर कुटिल राजाओं का अपना भय जागता है। पोद्दार जी की टीका उनके मन की आशंका खोलती है: परशुराम भी राम से हार गये, और इन राजाओं ने राम का अपमान किया था। अब कहीं राम उसका बदला न लें। यह राजाओं की अपनी कल्पना का डर है। सामने से राम की कोई नयी धमकी नहीं आयी। फिर भी वे उसी आशंका से डर जाते हैं जो अपने आचरण को याद करके उनके भीतर बनती है।

वे कायर चुपके से जहाँ तहाँ भाग जाते हैं। परशुराम का वन जाना और कुटिल राजाओं का भागना पास पास कहा गया है, पर दोनों की भीतर की दशा अलग दिखाई देती है। परशुराम प्रेम और पहचान के साथ तप के लिये चलते हैं। राजाओं को उनका मनःकल्पित डर लेकर भागता है। एक का संशय मिटा और दूसरे अपनी आशंका में घिर गये। राम का प्रभाव सामने आने पर उपस्थित लोगों का उत्तर उनके अपने मन के अनुसार खुलता है।

देवन्ह दीन्हीं दुंदुभीं प्रभु पर बरषहिं फूल।
हरषे पुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल॥ २८५॥

दोहा २८५

देवता नगाड़े बजाते हैं और प्रभु पर फूल बरसाते हैं। नगर के स्त्री पुरुष सब हर्षित हो जाते हैं। पोद्दार जी की टीका इस नगर को जनकपुर कहती है और उनके मिटे हुए शूल को अज्ञान से उत्पन्न दुःख बताती है। तुलसी का अन्तिम दोहा केवल उल्लास की ध्वनि नहीं सुनाता, उस पीड़ा के दूर होने की बात भी कहता है जिसने लोगों को जकड़ रखा था। परशुराम के भीतर ज्ञान का प्रकाश हुआ, और अब नगर के लोगों की मोहमयी पीड़ा जाती रही।

आरम्भ में शीतल वाणी सुनते हुए भी परशुराम की छाती जल रही थी। अन्त में फूल बरस रहे हैं और नगर के लोग सुखी हैं। बीच में किसी की बात को समय से पहले समाप्त नहीं किया गया। प्रश्न, आरोप, विनय, वीरता का स्पष्ट कथन और फिर पहचान, इसी क्रम से सब यहाँ तक पहुँचे हैं। सभा का तनाव जिस जनसमूह पर पड़ा था, अन्त का हर्ष भी उन्हीं स्त्री पुरुषों तक पहुँचता है। उनकी राहत के साथ यह प्रसंग पूरा होता है।

परशुराम जय बोलकर तप के लिये वन जाते हैं। कुटिल राजा बदले की अपनी कल्पना से डरकर चुपके से भागते हैं। देवता फूल बरसाते हैं और जनकपुर के स्त्री पुरुषों की अज्ञानजनित पीड़ा मिट जाती है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस भेंट में हाथ बार बार सामने आते हैं। राम हाथ जोड़ते हैं और अपना सिर आगे रखते हैं। परशुराम कुठार लिये हैं, पर उनका हाथ नहीं चलता। वे धनुष देने लगते हैं तो वह अपने आप चला जाता है। पहचान होने पर उनके अपने हाथ जुड़ जाते हैं। तुलसी मन की दशा के साथ शरीर की ये छोटी मुद्राएँ रखते हैं। हम क्रोध, असमर्थता, आश्चर्य और प्रेम को केवल सुनते नहीं, उन्हीं हाथों में बदलते हुए भी देख पाते हैं।

और क्षमा की माँग दोनों ओर से हुई है। राम अनजान में हुई भूल पर दया चाहते हैं, परशुराम अज्ञान में कहे हुए अनुचित वचनों को क्षमा करने की प्रार्थना करते हैं। अन्त की उस प्रार्थना में दोनों भाई हैं। लक्ष्मण की तीखी बोली पूरी कथा में अपनी जगह लिये रहती है, और परशुराम की क्षमायाचना में उनका सम्मान भी पूरा आता है। जिस बड़े भाई ने आरम्भ में अपराध अपने ऊपर लिया था, उनके साथ छोटा भाई भी क्षमा का मन्दिर कहकर पुकारा जाता है।

परशुराम की अन्तिम वाणी में राम की वचनकुशलता का गुणगान ठहरकर सुनने योग्य है। जिन वचनों को उन्होंने पहले समझाना, छल और निरादर माना, उन्हीं की मृदु गहराई ने उनकी बुद्धि के पर्दे खोले। पहचान के बाद वे विनय को उसके नाम से पुकार सके। उस पहचाने हुए गुण की प्रशंसा करते हुए वे वन की ओर चले गये, और पीछे नगर में फूलों की वर्षा तथा हर्ष रह गया।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २७९ से २८५, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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