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राम की विनती, सप्तर्षियों की परीक्षा और पार्वती का उत्तर

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 9

आकाश से कही हुई एक बात जिसमें सात ऋषियों का आना ही उसका प्रमाण ठहरा। एक विनती जो आज्ञा की तरह मान ली गयी। और एक कन्या जिसे जान-बूझकर चिढ़ाया गया, यह देखने के लिये कि वह डिगती है या नहीं।

तपस्या और परीक्षा की यह कथा साफ़ दो हिस्सों में बँटती है। पहले हिस्से में आकाश की वाणी अपनी बात पूरी करती है। पत्नी को खोकर शिव पृथ्वी पर विचरते रहते हैं। फिर उनके सामने वही प्रकट होते हैं जिनका नाम वे जपते रहे हैं, और उनसे विवाह की विनती करते हैं। दूसरे हिस्से में सात ऋषि एक तपस्विनी के पास पहुँचते हैं। वे उसे विस्तार से, उदाहरण देकर, समझाते हैं कि जिस पुरुष को वह चाहती है वह किसी काम का नहीं है।

दोनों हिस्सों को जोड़नेवाला धागा शुरुआत में ही पड़ा है। ब्रह्मा की वाणी पार्वती से कहती है कि जिस दिन सात ऋषि मिलें, उस दिन इस वाणी को प्रमाणित समझ लीजिये। जो परीक्षा आगे चलकर उन्हें डिगाने आती है, वही इस बात की रसीद है कि वे ठीक थीं। और पूरी परीक्षा में वे एक बार भी उन सातों से यह नहीं कहतीं कि आपके आने की बात मुझसे पहले कही जा चुकी है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, और यहाँ जो कुछ होता है उसकी धुरी बातें हैं। किसकी बात कौन पकड़े रहता है। शिव राम की बात पकड़ते हैं और विवाह मान लेते हैं। पार्वती नारद की बात पकड़े रहती हैं और अपना सब कुछ छोड़ने को तैयार रहती हैं। और बीच में सात ऋषि हैं, जो उनके प्रेम की परीक्षा लेने भेजे गये हैं।

तपस्विनी, विधुर और परीक्षक

  • पार्वती हिमाचल की कन्या, जो यहाँ पूरे समय तप में हैं और जिनके प्रेम की परीक्षा लेने सात ऋषि भेजे जाते हैं।
  • शिव जो सती के जाने के बाद वैराग्य में विचरते हैं। वे राम के कहने पर विवाह के लिये मान जाते हैं, और फिर पार्वती के प्रेम की परीक्षा करवाते हैं।
  • राम जो शिव के नियम और प्रेम को देखकर प्रकट होते हैं, उनके व्रत की सराहना करते हैं, और फिर विवाह की विनती रखते हैं।
  • ब्रह्मा जिनकी आकाशवाणी इस प्रसंग के पहले ही शब्द में चल रही है और जो अपनी बात के साथ उसकी पहचान भी सौंप जाते हैं।
  • सप्तर्षि सात मुनि, जो शिव के भेजे हुए आते हैं, प्रेम की परीक्षा लेते हैं, और जाते समय जय-जयकार करते हुए जाते हैं।
  • नारद जो इस प्रसंग में एक बार भी सामने नहीं आते और जिनका नाम पाँच बार लिया जाता है।
  • सती जिनका शरीर छूट चुका है। उनका नाम यहाँ दो बार आता है, एक बार वहाँ जहाँ से शिव का वैराग्य शुरू होता है, और एक बार ताने में।

आकाश से कही हुई बात

कथा यहाँ एक वाक्य के बीच से उठती है, और बोलनेवाले का शरीर कहीं नहीं है। पिछला प्रसंग वहाँ ख़त्म हुआ था जहाँ आकाश की गम्भीर वाणी ने कहा था कि आपका मनोरथ सफल हुआ, अब यह दुःसह क्लेश छोड़ दीजिये। यहाँ वही वाणी आगे बोलती है। पहले वह एक तराज़ू रखती है: धीर बहुत हुए, मुनि बहुत हुए, ज्ञानी बहुत हुए, पर ऐसा तप किसी ने नहीं किया। यह प्रशंसा नहीं, माप है। फिर कहती है कि ब्रह्मा की इस वाणी को सदा सत्य और पवित्र जानकर हृदय में धारण कीजिये।

फिर वाणी दो बातें कहती है, और यह पूरी कथा दूसरी पर घूमती है। पहली: जब पिता बुलाने आयें, तब हठ छोड़कर घर चली जाइयेगा। और दूसरी: जब सात ऋषि आपसे मिलें, तब इस वाणी को ठीक समझियेगा।

उन्हें एक वचन थमाया गया है, और उसके साथ उसकी रसीद। वाणी एक दिन बता देती है, और वह दिन एक मुलाक़ात है: जो सात लोग आयेंगे, वही इस बात के प्रमाण हैं। और जब वे सचमुच आते हैं, तो उनकी बात सुनकर हँसते हैं।

पहली बात में वह शब्द भी बैठा है जिस पर आगे का सारा झगड़ा है, हठ। ब्रह्मा उसे घर लौटने भर के लिये छोड़ने को कहते हैं। वही शब्द आगे तीन बार और आता है। दो बार वह पार्वती के मुँह से अपने ही बारे में आता है, और एक बार उन्हीं के मुँह से सामने खड़े सात ऋषियों के बारे में।

वाणी सुनते ही उनका शरीर पुलकित हो उठता है और वे प्रसन्न हो जाती हैं। और ठीक यहीं कथा पार्वती से शिव की ओर मुड़ती है। याज्ञवल्क्य भरद्वाज से कहते हैं कि पार्वती का सुन्दर चरित्र मैंने गा दिया, अब शिव का सुहावना चरित्र सुनिये। मानस की एक बाहरी परत, याज्ञवल्क्य और भरद्वाज का संवाद, इसी जोड़ पर एक पल के लिये दिखती है, और फिर ढक जाती है।

सती के बाद, उदास फिरते हुए शिव

मोड़ यह है: जब से सती ने जाकर शरीर त्यागा, तब से शिव के मन में वैराग्य हो गया। सती मरीं नहीं कही गयीं, उन्होंने जाकर शरीर त्यागा। पिछले प्रसंग में आ चुका है कि मरते समय उन्होंने भगवान् से एक वर माँगा था, जन्म-जन्म शिव के चरणों में अनुराग। उसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जन्म लिया। जिसके वियोग में यह वैराग्य है, वही अब पार्वती हैं, जिन्हें कथा अभी वन में तप करते हुए छोड़कर आयी है।

शोक में शिव सदा राम का नाम जपते हैं, और जहाँ-तहाँ राम के गुणों की कथाएँ सुनते हैं। फिर कथा उन्हें कुछ विशेषण देती है।

विशेषण गिनिये: चिदानन्द, सुख का धाम, मोह, मद और काम से रहित। और साथ में एक क्रिया: सब लोकों को आनन्द देनेवाले राम को हृदय में धरकर वे पृथ्वी पर विचरने लगे। यह बात कथा ख़ुद कह रही है, कोई पक्षकार नहीं। इसे याद रखियेगा, क्योंकि कुछ ही देर बाद सात ऋषि उनके दोष गिनायेंगे।

पर कथा आगे वह कह देती है जो इन विशेषणों में नहीं आता। कहीं वे मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते हैं, कहीं राम के गुण बखानते हैं।

यद्यपि वे निष्काम हैं, फिर भी दुखी हैं, और टीका बताती है कि दुःख किसका है: भक्त सती के वियोग का। सती को यहाँ पत्नी नहीं, भक्त कहा गया है। और वे ज्ञानी होकर भी दुखी हैं।

इस बात को पकड़े रखियेगा। आगे चलकर सात ऋषि एक कन्या से कहेंगे कि उस आदमी को कोई चिन्ता ही नहीं, वह सुख से सोता है और भीख माँगकर खा लेता है। कथा उसका सच पहले ही कह देती है।

राम प्रकट होते हैं

बहुत समय बीत जाता है, और राम के चरणों में प्रीति रोज़ नयी होती जाती है। फिर कथा कारण को घटना से पहले रख देती है। पहले कहा जाता है कि शिव का नियम और प्रेम देखा गया, और हृदय में भक्ति की अटल रेखा देखी गयी। किसने देखा, यह उसके बाद खुलता है।

राम प्रकट होते हैं, और पहला विशेषण चुना हुआ है: कृतज्ञ, जिसे टीका खोलती है, उपकार माननेवाले। साथ में वे कृपालु हैं, रूप और शील के भण्डार हैं, और महान् तेजपुञ्ज हैं। वे बहुत तरह से शिव की सराहना करते हैं: आपके बिना ऐसा व्रत कौन निबाह सकता था।

पहले यह मान लिया जाता है कि शिव ने जो निबाहा वह क़ीमती था, और उसके बाद ही विवाह की बात आती है।

फिर वे बहुत तरह से समझाते हैं, पार्वती का जन्म सुनाते हैं, और पार्वती की बहुत पवित्र करनी का वर्णन विस्तार से करते हैं। विवाह की बात उठने से पहले ही शिव को पार्वती की पूरी कथा सुनायी जा चुकी है। जो आगे सात ऋषियों को उस प्रेम की परीक्षा लेने भेजेंगे, वे सुन चुके हैं कि वह प्रेम अब तक क्या-क्या दे चुका है।

एक विनती, जो आज्ञा की तरह ली गयी

और तब माँग रखी जाती है।

यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो मेरी विनती सुनिये। जाकर पार्वती से विवाह कीजिये, यह मुझे माँगे हुए दीजिये।

शिव का उत्तर एक साथ दो काम करता है। वे साफ़ कहते हैं कि यह उचित नहीं है। और उसके तुरन्त बाद कहते हैं कि स्वामी के वचन मिटाये नहीं जा सकते, और आपकी आज्ञा को सिर पर रखकर पालना ही मेरा परम धर्म है। असहमति और आज्ञापालन एक ही साँस में।

और फिर वह बात आती है जिस पर यह प्रसंग बाद में लौटकर टिकता है।

माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात बिना विचारे शुभ मानकर कर लेनी चाहिये। और आप तो सब प्रकार से मेरे परम हितकारी हैं। इस विचार शब्द को गिनती में रखिये। यह दो बार और आयेगा। एक बार ऋषियों के मुँह से, जो कहेंगे कि हमने आपके लिये अच्छा वर विचार रखा है। और एक बार पार्वती के मुँह से, जो पूछेंगी कि अब गुण-दोष का विचार करे भी कौन।

शिव के ये वचन, जिनमें भक्ति, विवेक और धर्म है, सुनकर राम सन्तुष्ट होते हैं। वे कहते हैं कि हे शिव, आपका प्रण रह गया, अब जो हमने कहा उसे हृदय में रख लीजियेगा। आकाशवाणी के आरम्भ में ब्रह्मा ने पार्वती से भी यही कहा था, कि अब इसे हृदय में धारण कीजिये। फिर राम अन्तर्धान हो जाते हैं, और शिव वही मूर्ति अपने हृदय में रख लेते हैं। तीन बार कुछ हृदय में रखा जाता है: दो बार कही हुई बात, और तीसरी बार राम की वह मूर्ति।

सात ऋषि, और तीन काम

राम अन्तर्धान होते हैं, और उसी समय सप्तर्षि आ पहुँचते हैं। लोप और आगमन के बीच कोई ख़ाली जगह नहीं। शिव उनसे बहुत सुहावने वचन बोलते हैं, और जो सौंपते हैं वह एक काम नहीं, तीन काम हैं।

पहला: पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लीजिये। दूसरा: गिरि को प्रेरित करके उन्हें घर भिजवाइये। टीका उस गिरि को हिमाचल बताती है और जोड़ती है कि उन्हें पार्वती को लिवा लाने भेजा जाना है। तीसरा: सन्देह दूर कीजिये। टीका उस सन्देह को पार्वती का ही बताती है। तीनों में से केवल पहला इस प्रसंग में होता है।

दूसरा काम वही है जो इसी प्रसंग की शुरुआत में ब्रह्मा कह चुके हैं: जब पिता बुलाने आयें तब घर चली जाइयेगा। आकाश ने बुलावे की बात कही थी, शिव अब उस बुलावे का प्रबन्ध कर रहे हैं। तीसरे काम, सन्देह, पर यह प्रसंग नहीं लौटता। ऋषि उसका ज़िक्र तक नहीं करते।

और देखिये कि शिव कर क्या रहे हैं। विवाह वे स्वीकार कर चुके हैं। स्वीकार करने के बाद वे पहला काम यह करते हैं कि उस प्रेम की परीक्षा करवाते हैं जो उन्हीं के लिये है। परीक्षा देनेवाली को यह नहीं बताया जाता।

जो देखने गये, उन्होंने क्या देखा

उन्हें प्रेम की परीक्षा लेने भेजा गया है, पर पहुँचने पर पहली चीज़ जो दर्ज होती है वह प्रेम नहीं, शरीर है।

तपस्या अगर देह धर लेती तो ऐसी दिखती। जो लोग यह पूछने आये हैं कि आप चाहती क्या हैं, उन्हें उत्तर सामने खड़ा दिख रहा है।

और वे पूछते हैं: हे पार्वती, इतना भारी तप किस कारण कर रही हैं, किसकी आराधना है, चाहती क्या हैं, हमसे अपना सच्चा मर्म क्यों नहीं कहतीं। उत्तर संकोच से शुरू होता है: कहते हुए मन बहुत सकुचाता है, और सुनकर आप लोग मेरी जड़ता पर हँसेंगे। यह शब्द उन्होंने ख़ुद चुना है, अपने लिये। अब तक किसी ने उनका अपमान नहीं किया है।

मन ने हठ पकड़ लिया है और वह उपदेश सुनता ही नहीं। वह पानी पर दीवार उठाना चाहता है। नारद ने जो कहा उसे सत्य जानकर मैं बिना पंख के उड़ना चाहती हूँ। दोनों चित्र उन्होंने अपनी ही चाह के लिये बनाये हैं। वे अपनी चाह का बचाव नहीं कर रहीं, बिना पूछे बता रही हैं कि वह असम्भव जैसी है।

और फिर, इससे पहले कि कोई और कहे, वे ख़ुद कह देती हैं: हे मुनियो, मेरा अविवेक तो देखिये। मैं सदा शिव को ही पति बनाना चाहती हूँ। दोष उन्होंने अपने ऊपर पहले लगा लिया, और चाह उसके तुरन्त बाद रखी, कुछ छिपाया नहीं।

हँसी, और उसके बाद की सारी गवाहियाँ

वे हँस पड़ते हैं, और पहली बात उस पर्वत के बारे में कहते हैं जिससे वे जन्मी हैं।

आपका शरीर पर्वत से ही तो उत्पन्न हुआ है। यह कठोरता पर किया गया मज़ाक़ है, और आगे यही बात पार्वती के हाथ में उनका उत्तर बन जायेगी। फिर वह सवाल, जिससे उनके हिसाब में बहस ख़त्म हो जानी चाहिये: नारद का उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है?

इसके बाद उदाहरण आते हैं, सब एक ही तरह के। दक्ष के पुत्रों ने नारद का उपदेश लिया और फिर लौटकर घर का मुँह नहीं देखा। चित्रकेतु का घर उन्होंने ही चौपट किया। फिर वही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ। और सामान्य नियम: जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर छोड़कर भिखारी हो जाते हैं। पूरा तर्क एक ही संज्ञा पर खड़ा है, घर।

फिर नारद पर आरोप: मन कपटी है और शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं, और वे सबको अपने जैसा बना देना चाहते हैं।

और फिर वर की सूची, एक-एक करके।

उनके वचनों पर विश्वास करके आप ऐसा पति चाहती हैं जो स्वभाव से ही उदासीन है। और फिर: निर्गुण, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, कपालों की माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर का, नंगा, साँप लपेटे हुए। आठ शब्द। इस सूची में जो नहीं है वह कुछ ही पहले शिव के लिये आया एक विशेषण है: सुख का धाम।

इनमें से कई बातें पार्वती पहले सुन चुकी हैं। पिछले प्रसंग में नारद उनके पिता के घर बैठकर उनके होनेवाले पति के अवगुण गिना चुके हैं: गुणहीन, मानहीन, माता-पिता से रहित, उदासीन, योगी, जटाधारी, नंगा, अमंगल वेषवाला। ऋषियों की सूची उनमें से चार बातें दोहराती है, उदासीन, गुणहीन, नंगा और बुरा वेष। और वह पाँच नयी जोड़ती है: निर्लज्ज, कपालों की माला, कुलहीन, बिना घर का और साँप। और यह उसी कन्या को सुनाया जा रहा है जिसने वह पहली सूची सुनने के बाद तप शुरू किया था।

फिर ऋषि पूछते हैं कि ऐसा वर पाकर आपको क्या सुख होगा, आप उस ठग के बहकावे में आकर ख़ूब भूलीं। और फिर वह बात आती है जो सीधी चोट करती है।

पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया, फिर उसे त्यागकर मरवा डाला। यह उससे कहा जा रहा है जो उसी पुरुष के लिये बरसों से तप में खड़ी है। और वह स्वयं वही सती है, पर्वत के घर फिर से जन्मी हुई।

अब कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। ऐसे सहज अकेले रहनेवालों के घर स्त्रियाँ कभी टिकती हैं? हम इससे पहले पढ़ चुके हैं कि निष्काम होकर भी वे भक्त के वियोग के दुःख से दुखी हैं। जो बात यहाँ प्रमाण की तरह रखी जा रही है, वह कथा के क्रम में पहले ही ग़लत दिख चुकी है।

पत्थर से जो निकलता है

फिर वे बदले में एक वर रखते हैं: अब भी हमारा कहा मानिये, हमने आपके लिये अच्छा वर विचारा है। यह प्रस्ताव पूरा का पूरा गुण की शब्दावली में बना है: बहुत सुन्दर, पवित्र, सुखद, सुशील, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं। वह दोषों से रहित, सब गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी, वैकुण्ठपुरी का निवासी है। ऐसा वर लाकर हम आपसे मिला देंगे।

जोड़ मिलाकर देखिये। निर्गुण के सामने सब गुणों की राशि। कुलहीन और बिना घर वाले के सामने एक नाम वाली नगरी और एक नाम वाली पत्नी। प्रस्ताव अभी गिनायी गयी कमी की उलटी दिशा में चलता है।

और यह सुनते ही पार्वती हँस पड़ती हैं। कथा उनकी हँसी को उसी बनावट में दर्ज करती है जिसमें ऋषियों की हँसी दर्ज की थी: सुनते ही हँस पड़ना, जैसे ऋषि उनकी बात सुनते ही हँस पड़े थे। और यह सब शुरू होने से पहले वे ख़ुद कह चुकी थीं कि आप लोग सुनकर हँसेंगे। यहाँ दो हँसी हैं, और पहली का पूर्वानुमान उसी ने लगाया था जिस पर वह हँसी गयी।

उनका पहला वाक्य ताने को उपहार की तरह लौटा देता है।

आपने सच कहा, यह शरीर पर्वत से ही उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, चाहे देह छूट जाये। और प्रमाण, जो उन्हीं का चित्र पूरा करके लौटाता है: सोना भी पत्थर से ही निकलता है, और जलाये जाने पर भी अपना सहज स्वभाव नहीं छोड़ता।

यह शब्द सहज ऋषियों का है। उन्होंने इसे दो बार बरता था, एक बार स्वभाव से उदासीन पति के लिये और एक बार सहज अकेले रहनेवालों के घर के लिये। दोनों बार यह उनके विरुद्ध दलील थी। वे उसे उठा लेती हैं और कहती हैं कि हाँ, स्वभाव नहीं बदलता, और यहाँ जिस स्वभाव की बात है वह मेरा है।

और जो वे बिना भार दिये कहती हैं: हठ नहीं छूटेगा, देह भले छूट जाये। शिव की कथा की शुरुआत में कहा जा चुका है कि सती ने जाकर शरीर त्यागा था।

नारद के वचन मैं नहीं छोड़ूँगी, घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। और फिर कारण आता है। वह ज़िद की तरह नहीं, एक नियम की तरह रखा गया है: जिसे गुरु के वचन पर विश्वास नहीं, उसे सुख और सिद्धि सपने में भी सुलभ नहीं होती।

इस वाक्य को उस वाक्य के बराबर रखिये जो शिव ने राम से कहा था, कि माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात बिना विचारे शुभ मानकर कर लेनी चाहिये। शिव ने वह नियम कहा और उस पर चले। पार्वती वही नियम सात ऋषियों को सुनाकर उन्हीं के विरुद्ध उस पर चल रही हैं।

और फिर वे पूरा हिसाब एक ही बात में मान लेती हैं।

माना कि शिव अवगुणों के भवन हैं और विष्णु सब गुणों के धाम हैं। वे सूची के एक भी नाम पर बहस नहीं करतीं, उसे स्वीकार कर लेती हैं। और फिर वे तराज़ू को अलग रख देती हैं: जिसका मन जिसमें रम गया, उसे उसी से काम है। और धाम शब्द कथा के आरम्भ में शिव के लिये आ चुका था, सुख का धाम। अब वही शब्द दूसरे के खाते में चला गया है, पार्वती के ही हाथों, और वे उसे जाने देती हैं।

जो पहले मिलते

इसके बाद एक बहुत शिष्ट इनकार आता है: यदि आप पहले मिले होते, हे मुनीश्वरो, तो मैं आपकी सीख सिर पर रखकर सुनती।

उनके लिये क्रम ने फ़ैसला कर दिया, और नारद पहले आये थे। और फिर: अब मैं अपना जन्म शिव के लिये हार चुकी, अब गुण-दोष का विचार करे भी कौन।

गुण और दोष, ये दोनों शब्द अभी-अभी ऋषियों ने अपने प्रस्ताव में बरते थे, दोषों से रहित और सब गुणों की राशि। आधे वाक्य में दोनों उन्हीं के हाथ में लौटा दिये गये हैं। हिसाब ग़लत नहीं बताया गया, बही बन्द बतायी गयी है। और विचार शब्द तीसरी बार लौट आया है।

और फिर दूसरा शब्द भी लौटाया जाता है। यदि आपके हृदय में बहुत हठ है और विवाह की बात पक्की किये बिना आपसे रहा नहीं जाता, तो संसार में वर और कन्या बहुत हैं। और खिलवाड़ करनेवालों को आलस्य तो होता नहीं। जिस शब्द से ब्रह्मा ने आरम्भ में उन्हें चेताया था, उसे उन्होंने दो बार अपने ऊपर ओढ़ा था। वह अब सामने खड़े सात लोगों के हृदय में बताया गया है।

और फिर वे सबसे आगे जाती हैं: करोड़ जन्म तक यही हठ रहेगा, या तो शिव को वरूँगी या कुमारी रहूँगी। और उसके बाद वह वाक्य जो आख़िरी दरवाज़ा भी बन्द कर देता है: स्वयं शिव सौ बार कहें, तो भी नारद का उपदेश नहीं छोड़ूँगी। जिस पुरुष को चाहना वे नहीं छोड़ेंगी, उसकी भी यह बात नहीं मानेंगी।

फिर वे कहती हैं: मैं आपके पैरों पड़ती हूँ, आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। इस प्रसंग में ब्रह्मा और शिव, दोनों उन्हें घर भेजने की बात करते हैं। और अन्त में घर लौटने को उन्होंने ऋषियों से कहा। और ठीक उसी क्षण कथा उन्हें जगज्जननी कहती है, जब वे सात मुनियों से जाने के लिये कह रही हैं।

जगज्जननी भवानी की जय

और तब वह बात आती है जो इस परीक्षा का नतीजा एक शब्द में दे देती है: प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले। शिव ने प्रेम की परीक्षा सौंपी थी, और लौटते हुए वही शब्द है।

और वे जो कहते हैं, वह कथा के कहे के ठीक पीछे आता है। कथा ने उन्हें जगज्जननी कहा था, अब ऋषि भी उन्हें जगज्जननी और भवानी कहकर जय-जयकार करते हैं। कथा का दिया नाम और पात्रों का दिया नाम अग़ल-बग़ल मिल जाते हैं।

आप माया हैं और शिव भगवान् हैं, आप दोनों सारे जगत के माता-पिता हैं। जिन्होंने अभी इतनी देर यह कहा था कि उस पुरुष के पास घर तक नहीं, वे जाते-जाते उसे जगत का पिता कह जाते हैं।

पर इस भेंट की आख़िरी बात वह नहीं जो उन्होंने कही, बल्कि यह कि जाते समय उनके शरीरों का क्या हुआ। पार्वती के चरणों में सिर नवाकर वे बार-बार पुलकित होते हुए चले गये। इस प्रसंग के आरम्भ के पास यही हुआ था। आकाश की वाणी सुनकर पार्वती का शरीर पुलकित हुआ था और वे हर्षित हुई थीं। अब उसी हर्ष के साथ कथा थमती है, इस बार सात दूसरे शरीरों पर।

जाँचा हुआ हठ

पहले परीक्षा के बारे में। शिव राम की विनती के तुरन्त बाद विवाह मान चुके थे, किसी ऋषि के चलने से पहले। जो जाँचा गया वह पार्वती का प्रेम था। शिव के विरुद्ध हर दलील पूरी ताक़त से, उदाहरणों के साथ रखी गयी, और एक-एक करके ठुकरा दी गयी।

फिर उस शब्द के बारे में जिसे छोड़ने को कहा गया था। हठ तारीफ़ का शब्द नहीं है, और इस प्रसंग में वह चार बार आता है, एक बार भी नरम होकर नहीं। पार्वती यह दावा नहीं करतीं कि उनका हठ कोई ऊँची चीज़ है। वे कहती हैं कि मन ने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता, वह पानी पर दीवार उठाना चाहता है। हर निदान वे मान लेती हैं और बदलती कुछ भी नहीं। यह प्रसंग इतना दिखाता है कि वह हठ किन-किन चीज़ों से बचकर निकल आया। सात विद्वानों की हँसी, नौ दोषों की सूची, सती के मारे जाने का ताना, और एक निर्दोष विकल्प।

और एक चीज़ जो इस प्रसंग में नहीं है। कोई उन्हें नहीं बताता कि आकाश की वाणी का प्रमाण अभी उनके सामने खड़ा था, और कोई यह नहीं बताता कि शिव विवाह मान चुके हैं। ऋषि जय बोलकर लौट जाते हैं, और वे जहाँ थीं वहीं रह जाती हैं। शिव की आज्ञा का दूसरा हिस्सा, गिरि को प्रेरित करके उन्हें घर भिजवाना, इस प्रसंग में पूरा नहीं होता।

इस कथा में पढ़नेवाला पार्वती से कुछ ज़्यादा जानता है। हम जानते हैं कि ऋषि परीक्षा लेने भेजे गये हैं, वे यह नहीं जानतीं। हम जानते हैं कि शिव मान चुके हैं, वे नहीं जानतीं। और हम जानते हैं कि उस आदमी के बेफ़िक्र सोनेवाली बात ग़लत है, क्योंकि उसका सच हम कुछ ही देर पहले देख चुके थे। परीक्षा की हर कठोरता हमारे लिये पहले ही ठंडी हो चुकी है और उनके लिये पूरी है, और उत्तर उन्होंने उसी में दिया।

और आख़िर में वह शब्द जो इस प्रसंग में तीन मुँहों से निकला है। शिव ने कहा था कि माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात बिना विचार के शुभ मानकर कर लेनी चाहिये। ऋषि यह कहते आये कि हमने आपके लिये अच्छा वर विचार रखा है। और पार्वती ने पूछा कि अब गुण और दोष का विचार करे भी कौन। एक पुरुष तौलने से इनकार करता है, क्योंकि कहनेवाला उसका स्वामी है। सात विद्वान् बड़ी सावधानी से तौलते हैं, और प्रेम देखकर जय बोलते हैं। और एक स्त्री कहती है कि तौल बहुत पहले पूरी हो चुकी, पर्वत के उस घर में। उस दिन एक अतिथि ने उनके पिता से उनके होनेवाले पति के अवगुण गिनाये थे, और वे सुनकर प्रसन्न हो गयी थीं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 75 से 81, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।