रामचरितमानस · बालकाण्ड · राम की विनती, सप्तर्षियों की परीक्षा और पार्वती का उत्तर
राम की विनती, सप्तर्षियों की परीक्षा और पार्वती का उत्तर
आकाश से कही हुई एक बात जिसमें सात ऋषियों का आना ही उसका प्रमाण ठहरा, एक विनती जो आज्ञा की तरह मान ली गयी, और एक कन्या जिसे जान-बूझकर चिढ़ाया गया यह देखने के लिये कि वह डिगती है या नहीं।
इस पन्ने पर सात दोहे हैं, दोहा ७५ से दोहा ८१ तक, और वे साफ़ दो हिस्सों में बँटते हैं। पहले हिस्से में आकाश से बोलती हुई एक वाणी अपनी बात पूरी करती है, एक विधुर पृथ्वी पर उदास फिरता रहता है, और फिर उसके सामने वही प्रकट होते हैं जिनका नाम वह जपता रहा है, और आकर उससे विवाह की विनती करते हैं। दूसरे हिस्से में सात ऋषि एक तपस्विनी के पास पहुँचते हैं और उसे विस्तार से, प्रमाण देकर, यह समझाते हैं कि जिस पुरुष को वह चाहती है वह किसी काम का नहीं है।
दोनों हिस्सों को जोड़नेवाला धागा इस प्रसंग की शुरुआती चौपाइयों में ही पड़ा हुआ है। ब्रह्मा की वाणी पार्वती से कहती है कि जिस दिन सात ऋषि मिलें, उस दिन इस वाणी को प्रमाणित समझ लीजिये। यानी जो परीक्षा आगे चलकर उन्हें तोड़ने आती है, वही इस बात की रसीद है कि वे ठीक थीं। यह बात हम जानते हैं। वे नहीं जानतीं। पूरे पन्ने पर वे एक बार भी उन सातों से यह नहीं कहतीं कि आपके आने की ख़बर मुझे पहले से है।
और यह तुलसीदास का रामचरितमानस है। यहाँ जो कुछ होता है उसकी धुरी बातें हैं: किसकी बात कौन पकड़े रहता है। शिव राम की बात पकड़े रहते हैं और अपना व्रत छोड़ देते हैं। पार्वती नारद की बात पकड़े रहती हैं और अपना सब कुछ छोड़ने को तैयार रहती हैं। और बीच में सात ऐसे लोग खड़े हैं जिनकी दलील पन्ने पर सबसे मज़बूत है, और जो अकेले ऐसे हैं जो वह कह रहे हैं जो उन्हें कहने भेजा गया है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- पार्वती उमा, गिरिजा, भवानी और शैलकुमारी, हिमाचल की कन्या, जो इस पन्ने पर तप में खड़ी हैं और जिनसे उनका ही संकल्प छुड़वाने सात ऋषि भेजे जाते हैं।
- शिव शंभु और महादेव, जो सती के जाने के बाद उदास फिरते हैं, राम के कहने पर विवाह के लिये मान जाते हैं, और फिर अपनी ही परीक्षा करवाते हैं।
- राम जो शिव के नियम और प्रेम को देखकर प्रकट होते हैं, उनके व्रत की सराहना करते हैं, और उसी साँस में वह व्रत तुड़वाने की विनती रख देते हैं।
- ब्रह्मा जिनकी आकाशवाणी इस प्रसंग के पहले ही शब्द में चल रही है और जो अपनी बात के साथ उसकी पहचान भी सौंप जाते हैं।
- सप्तर्षि सात मुनि, जो शिव के भेजे हुए आते हैं, प्रेम की परीक्षा लेते हैं, और जाते समय जय-जयकार करते हुए जाते हैं।
- नारद जो इस पन्ने पर एक बार भी नहीं आते और जिनका नाम पाँच बार लिया जाता है, हर बार किसी न किसी दलील के बीचोंबीच।
- सती जिनका शरीर छूट चुका है और जिनका नाम यहाँ दो बार आता है, एक बार शोक में और एक बार ताने में।
आकाश से कही हुई बात
यह पन्ना बीच वाक्य से शुरू होता है, और बोलनेवाले का शरीर कहीं नहीं है। पिछला प्रसंग वहाँ ख़त्म हुआ था जहाँ आकाश से आयी हुई एक गम्भीर वाणी ने कहा था कि आपका मनोरथ सफल हुआ, अब यह दुःसह क्लेश छोड़ दीजिये। यहाँ वही वाणी आगे बोलती है। और वह पहले एक तराज़ू रखती है: धीर बहुत हुए, मुनि बहुत हुए, ज्ञानी बहुत हुए, पर ऐसा तप किसी ने नहीं किया। जो कहा जा रहा है वह प्रशंसा नहीं है, वह माप है।
फिर वाणी दो बातें कहती है, और उनमें से दूसरी पर यह पूरा पन्ना घूमता है। पहली: जब पिता बुलाने आयें, तब हठ छोड़कर घर चली जाइयेगा। और दूसरी:
आवै पिता बोलावन जबहीं । हठ परिहरि घर जाएहु तबहीं॥
चौपाई १
मिलहिं तुम्हहि जब सप्त रिषीसा । जानेहु तब प्रमान बागीसा॥
ध्यान दीजिये कि उन्हें क्या थमाया गया है। एक वचन, और उसके साथ उसकी रसीद। वाणी यह नहीं कहती कि अभी मान लीजिये। वह एक दिन बता देती है, और वह दिन एक मुलाक़ात है। जो सात लोग आयेंगे, वही इस बात के प्रमाण हैं। और जब वे सचमुच आते हैं, वे हँसने आते हैं। इस पूरे प्रसंग में पार्वती उनसे एक बार भी यह नहीं कहतीं कि आपके आने की सूचना मुझे आकाश से मिल चुकी है।
पहली बात में वह शब्द भी बैठा हुआ है जिस पर आगे का सारा झगड़ा है। हठ। ब्रह्मा उसे सिर्फ़ घर लौटने भर के लिये छोड़ने को कहते हैं। वही शब्द इस पन्ने पर तीन बार और आता है, दो बार पार्वती के मुँह से अपने ही बारे में, और एक बार उन्हीं के मुँह से उन सात लोगों के बारे में जो सामने खड़े होंगे। जिस चीज़ को छोड़ने की सलाह से पन्ना शुरू होता है, उसी को न छोड़ने के ऐलान पर वह ख़त्म होता है।
वाणी सुनते ही उनका शरीर पुलकित हो उठता है और वे प्रसन्न हो जाती हैं। और ठीक यहीं कथा हाथ बदलती है। कहनेवाले याज्ञवल्क्य कहते हैं कि उमा का सुन्दर चरित्र मैंने गा दिया, अब शंभु का सुहावना चरित्र सुनिये, और सुननेवाले भरद्वाज हैं। मानस की सबसे बाहरी परत ठीक इसी जोड़ पर एक पल के लिये दिखायी देती है, और फिर ढक जाती है।
सार: ब्रह्मा की वाणी पार्वती के तप को सबके ऊपर रखकर दो बातें कहती है, पिता के बुलाने पर घर लौट जाइयेगा और सात ऋषियों का मिलना इस वाणी का प्रमाण समझियेगा। पार्वती पुलकित हो उठती हैं, और वहीं से कथा उमा के चरित से हटकर शंभु के चरित पर आ जाती है।
सती के बाद, उदास फिरते हुए शिव
मोड़ एक पंक्ति का है: जब से सती ने जाकर शरीर त्यागा, तब से शिव के मन में वैराग्य हो गया। क्रिया पर ध्यान दीजिये। वे मरीं नहीं कही गयीं, उन्होंने जाकर त्यागा। पिछले प्रसंग में दक्ष के यज्ञ की बात आ चुकी है, और यह भी कि जाते-जाते उन्होंने हरि से एक वर माँगा था, जन्म-जन्म शिव के चरणों में अनुराग, और उसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जन्म लिया। यानी जिसके वियोग में यह वैराग्य है, वह इसी पन्ने पर एक पहाड़ पर खड़ी तप कर रही है।
शोक के साथ वे क्या करते हैं, यह भी उसी चौपाई में है। सदा रघुनाथ का नाम जपते हैं, और जहाँ-तहाँ राम के गुणों की कथाएँ सुनते फिरते हैं। इसके बाद दोहा आता है, और वह इस पन्ने का सबसे बड़ा दावा है।
चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम।
दोहा ७५
बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम॥ ७५॥
विशेषण गिनिये। चिदानन्द। सुख का धाम। मोह, मद और काम से रहित। और साथ में एक क्रिया: विचरने लगे, हृदय में हरि को धरकर। यह बात कोई पक्षकार नहीं कह रहा, यह कविता ख़ुद कह रही है। इसे याद रखियेगा, क्योंकि इसी पन्ने पर आगे उन्हें अवगुणों का घर कहा जायेगा, और कहनेवाले सात विद्वान् होंगे।
पर अगली ही चौपाई वह कह देती है जिसकी इन विशेषणों में जगह नहीं बनती। कहीं वे मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते हैं, कहीं राम के गुण बखानते हैं, और फिर:
कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ग्याना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना॥
चौपाई २
जदपि अकाम तदपि भगवाना । भगत बिरह दुख दुखित सुजाना॥
जो निष्काम है वही दुखी है, और टीका बताती है कि दुःख किसका है: भक्त के वियोग का। सती के लिये यहाँ पत्नी शब्द नहीं आता, भगत आता है। और सुजाना ठीक दुखित के बग़ल में खड़ा है। तुलसी इन दोनों को सुलझाते नहीं। वे उन्हें अग़ल-बग़ल रख देते हैं और आगे बढ़ जाते हैं।
इस पंक्ति को पकड़े रखियेगा। इसी पन्ने पर आगे चलकर सात आदमी एक कन्या से कहेंगे कि उस आदमी को कोई चिन्ता ही नहीं है, वह सुख से सोता है और भीख माँगकर खा लेता है। वह बात हम तब पढ़ेंगे जब यह पंक्ति हम बहुत पहले पढ़ चुके होंगे। तुलसी ने झूठ का खण्डन नहीं लिखा। उन्होंने सच को पहले रख दिया और झूठ को बाद में आने दिया।
सार: सती के शरीर त्यागने के बाद शिव वैराग्य में हैं, रघुनाथ का नाम जपते हैं और राम के गुण सुनते फिरते हैं। दोहा उन्हें चिदानन्द और सुख का धाम कहता है, और अगली ही चौपाई कहती है कि निष्काम होकर भी वे अपने भक्त के वियोग से दुखी हैं।
राम प्रकट होते हैं
बहुत समय बीत जाता है और राम के चरणों में प्रीति रोज़ नयी होती जाती है। फिर चौपाई एक काम करती है जो ध्यान देने लायक़ है: वह कारण को घटना से पहले रख देती है। पहले यह कहा जाता है कि शंकर का नियम और प्रेम देखा गया, और हृदय में भक्ति की अटल रेखा देखी गयी। किसने देखा, यह अगली पंक्ति बताती है। यानी प्रकट होना उत्तर है, और प्रश्न वह रेखा है।
प्रगटे रामु कृतग्य कृपाला । रूप सील निधि तेज बिसाला॥
चौपाई ३
बहु प्रकार संकरहि सराहा । तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा॥
पहला ही विशेषण चुना हुआ है। कृतग्य, और टीका उसे खोलती है: उपकार माननेवाले। इस क्षण के लिये यही शब्द चाहिये था। वे वरदान देने नहीं आ रहे। वे एक हिसाब चुकाने आ रहे हैं। और आते ही जो कहते हैं वह प्रशंसा है, पर प्रशंसा किस चीज़ की, यह असल बात है: आपके बिना ऐसा व्रत कौन निबाह सकता था।
यह उसी व्रत की तारीफ़ है जिसे तुड़वाने वे आये हैं। दो पंक्ति बाद वही मुँह विवाह की बात करेगा। तुलसी इस क्रम को बदल सकते थे, पहले माँग रखते और फिर सान्त्वना देते। उन्होंने उलटा किया। पहले यह मान लिया जाता है कि जो चीज़ छोड़ने को कही जा रही है वह क़ीमती थी, और तब छोड़ने को कहा जाता है।
फिर वे बहुत तरह से समझाते हैं, और पार्वती का जन्म सुनाते हैं, और गिरिजा की अत्यन्त पवित्र करनी का वर्णन बिस्तर सहित करते हैं, यानी छोड़कर नहीं, पूरा। इसका मतलब यह हुआ कि विवाह की बात उठने से पहले ही शिव को उनकी पूरी कथा सुनायी जा चुकी है। जो आदमी आगे चलकर सात ऋषियों को उस प्रेम की परीक्षा लेने भेजेगा, वह विस्तार से सुन चुका है कि वह प्रेम अब तक क्या-क्या दे चुका है।
सार: शंकर के नियम, प्रेम और हृदय की अटल भक्ति देखकर राम प्रकट होते हैं, उनके व्रत की सराहना करते हैं, और फिर बहुत प्रकार से समझाकर पार्वती का जन्म और उनकी पवित्र करनी विस्तार से सुनाते हैं।
एक विनती, जो आज्ञा की तरह ली गयी
और तब माँग रखी जाती है। रखी किस व्याकरण में जाती है, यह देखने लायक़ है।
अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु।
दोहा ७६
जाइ बिबाहहु सैलजहि यह मोहि मागें देहु॥ ७६॥
यदि मुझ पर आपका स्नेह है, तो मेरी विनती सुनिये। और फिर: यह मुझे माँगे हुए दीजिये। जिस आदमी को अभी-अभी एकमात्र ऐसा कहा गया है जो उस व्रत को निबाह सका, उसी से वह व्रत तोड़ने को कहा जा रहा है, और सबसे विनम्र संभव भाषा में कहा जा रहा है। यहाँ कोई आदेश नहीं है। इस पूरे दोहे में एक भी शब्द ऐसा नहीं है जो ऊपर से नीचे की ओर गिरता हो।
शिव का उत्तर एक साथ दो काम करता है, और दूसरा काम पहले से बड़ा है। वे साफ़ कहते हैं कि यह उचित नहीं है। वे यह नहीं कहते कि ठीक है, मैं भी यही सोच रहा था। और उसके तुरन्त बाद कहते हैं कि नाथ के वचन मिटाये नहीं जा सकते, और आपकी आज्ञा को सिर पर रखकर पालना ही मेरा परम धर्म है। असहमति और आज्ञापालन एक ही साँस में रख दिये गये हैं।
और फिर वह पंक्ति आती है जिस पर यह पूरा प्रसंग बाद में लौटकर टिकता है।
मातु पिता गुर प्रभु कै बानी । बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥
चौपाई ४
तुम्ह सब भाँति परम हितकारी । अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी॥
माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात बिनहिं बिचार, बिना विचारे, शुभ मानकर कर लेनी चाहिये। इस बिचार शब्द को गिनती में रखिये। यह इस पन्ने पर दो बार और आयेगा: एक बार उन ऋषियों के मुँह से जो कहेंगे कि हमने आपके लिये अच्छा वर विचार रखा है, और एक बार पार्वती के मुँह से जो पूछेंगी कि अब गुण-दोष का विचार करे भी कौन।
राम सन्तुष्ट होते हैं और कहते हैं कि हे हर, आपका प्रण रह गया, अब जो हमने कहा उसे हृदय में रख लीजियेगा। इसी पन्ने की सबसे पहली चौपाई में ब्रह्मा ने पार्वती से यही कहा था, उन्हीं दो शब्दों के साथ, अब और उर। फिर राम अन्तर्धान हो जाते हैं, और शंकर वही मूर्ति अपने उर में रख लेते हैं। तीन बार एक ही जगह में कोई चीज़ रखी जाती है, और तीनों बार वह कोई वस्तु नहीं, कही हुई बात है।
सार: राम विनती की भाषा में माँगते हैं कि शिव जाकर शैलजा से विवाह कर लें। शिव कहते हैं कि यह उचित नहीं, पर स्वामी का वचन मिटाया नहीं जा सकता, और माता-पिता-गुरु-स्वामी की बात बिना विचारे शुभ मानकर माननी चाहिये। राम प्रसन्न होकर अन्तर्धान हो जाते हैं।
सात ऋषि, और तीन काम
जिस क्षण राम अन्तर्धान होते हैं, उसी क्षण सप्तर्षि आ पहुँचते हैं। तबहिं, उसी समय। तुलसी उन्हें रास्ता नहीं चलने देते। लोप और आगमन एक ही पंक्ति के दो हिस्से हैं, और बीच में कोई ख़ाली जगह नहीं है। शिव उनसे अत्यन्त सुहावने वचन बोलते हैं, और जो सौंपते हैं वह एक काम नहीं, तीन काम हैं।
पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु।
दोहा ७७
गिरिहि प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु॥ ७७॥
पहला: पार्वती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लीजिये। दूसरा: गिरि को प्रेरित करके उन्हें घर भिजवाइये, और टीका उस गिरि को हिमाचल बताती है और यह भी जोड़ती है कि उन्हें लिवा लाने भेजा जाना है। तीसरा: सन्देह दूर कीजिये, और टीका उस सन्देह को पार्वती का ही बताती है। तीनों में से केवल पहला इस पन्ने पर होता है।
दूसरा काम वही है जो इसी प्रसंग की शुरुआत में ब्रह्मा कह चुके हैं: जब पिता बुलाने आयें तब घर चली जाइयेगा। आकाश ने बुलावे की भविष्यवाणी की थी, शिव अब उस बुलावे का प्रबन्ध कर रहे हैं। दो अलग-अलग हाथ उन्हें एक ही दरवाज़े की ओर ले जा रहे हैं, और वे दोनों से लड़ेंगी। तीसरे काम, सन्देह के, पर यह पन्ना फिर कभी लौटता नहीं। ऋषि चले जाते हैं और उसका ज़िक्र तक नहीं करते।
और यह भी देखिये कि शिव कर क्या रहे हैं। विवाह वे स्वीकार कर चुके हैं। स्वीकार करने के बाद पहला काम वे यह करते हैं कि जिस स्त्री से विवाह होना है उसके सामने इनकार करने की हर वजह रखवा देते हैं। परीक्षा लेनेवाला वही है जिसकी परीक्षा हो रही है, और यह बात परीक्षा देनेवाली को नहीं बतायी जाती।
सार: राम के अन्तर्धान होते ही सप्तर्षि आ जाते हैं। शिव उन्हें तीन काम सौंपते हैं: प्रेम की परीक्षा लेना, हिमाचल को प्रेरित करके पार्वती को घर भिजवाना, और उनका सन्देह दूर करना। इस प्रसंग में केवल पहला काम पूरा होता है।
जो देखने गये, उन्होंने क्या देखा
उन्हें प्रेम की परीक्षा लेने भेजा गया है। पहुँचने पर पहली चीज़ जो वहाँ दर्ज होती है वह प्रेम नहीं है। वह शरीर है।
रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी । मूरतिमंत तपस्या जैसी॥
चौपाई ५
तपस्या अगर देह धर लेती तो ऐसी दिखती। यह वाक्य सवाल पूछे जाने से पहले ही जवाब दे देता है। जो लोग यह पूछने आये हैं कि आप चाहती क्या हैं, उन्हें उत्तर सामने खड़ा हुआ दिख रहा है। इसलिये उनका प्रश्न प्रश्न नहीं है, वह चाल का पहला क़दम है।
और वे पूछते हैं: हे शैलकुमारी, इतना भारी तप किस कारण कर रही हो, किसकी आराधना है, चाहती क्या हो, हमसे अपना सच्चा मर्म क्यों नहीं कहतीं। उत्तर माफ़ी से शुरू होता है। कहते हुए मन बहुत सकुचाता है, और सुनकर आप लोग मेरी जड़ता पर हँसेंगे। यह शब्द उन्होंने ख़ुद चुना है, अपने लिये। अब तक किसी ने उनका अपमान नहीं किया है।
मनु हठ परा न सुनइ सिखावा । चहत बारि पर भीति उठावा॥
चौपाई ६
नारद कहा सत्य सोइ जाना । बिनु पंखन्ह हम चहहिं उड़ाना॥
दो चित्र हैं और दोनों उन्होंने अपनी ही चाह के लिये बनाये हैं। पानी पर दीवार उठाना। बिना पंख के उड़ने की इच्छा। वे अपनी चाह का बचाव नहीं कर रहीं। वे सात अजनबियों को, बिना पूछे, यह बता रही हैं कि जो वे चाहती हैं वह असंभव है, और यह भी कि मन ने हठ पकड़ लिया है और वह सिखावा सुनता ही नहीं।
और फिर, इससे पहले कि कोई और कहे, वे ख़ुद कह देती हैं: हे मुनियो, मेरा अविवेक तो देखिये, मैं सदा शिव को ही पति बनाना चाहती हूँ। दोष उन्होंने अपने ऊपर पहले लगा लिया, और चाह उसके तुरन्त बाद रखी। जिस परीक्षा के लिये ये सात आये थे, उसका पहला दौर परीक्षा देनेवाली ने ख़ुद करवा दिया है, और कुछ छिपाया नहीं।
सार: ऋषि पार्वती को मूर्तिमान तपस्या जैसा देखते हैं और पूछते हैं कि यह तप किसलिये है। पार्वती पहले अपनी जड़ता और अविवेक का नाम लेती हैं, फिर कहती हैं कि मन हठ पकड़े है, नारद की कही बात को सत्य मानकर मैं बिना पंख उड़ना चाहती हूँ और सदा शिव को ही पति चाहती हूँ।
हँसी, और उसके बाद की सारी गवाहियाँ
वे हँस पड़ते हैं। और मुँह से पहली बात उस पत्थर के बारे में निकलती है जिससे वे बनी हैं।
सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह।
दोहा ७८
नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेउ किसु गेह॥ ७८॥
आपका शरीर पर्वत से ही उत्पन्न हुआ है। यह कठोरता पर किया गया मज़ाक़ है और साथ-साथ एक सच्ची बात भी है, और आगे चलकर यही वाक्य उनके ही हाथ में हथियार बन जायेगा। फिर वह सवाल, जिससे उनके हिसाब में बहस ख़त्म हो जानी चाहिये: नारद का उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है।
इसके बाद गवाहियाँ आती हैं, और सब एक ही तरह की हैं। दक्ष के पुत्रों ने उनका उपदेश लिया और फिर लौटकर घर का मुँह नहीं देखा। चित्रकेतु का घर उन्होंने ही चौपट किया। फिर वही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ। और सामान्य नियम: जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर छोड़कर भिखारी हो जाते हैं। पूरा मुक़दमा एक ही संज्ञा पर खड़ा है, और वह संज्ञा है भवन।
फिर नारद पर लगाया गया वह आरोप, जिसे दो बार पढ़ना चाहिये: मन कपटी है और शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं, और वे सबको अपने जैसा बना देना चाहते हैं। यह वाक्य जिस दृश्य में बोला जा रहा है, उस दृश्य में सात लोग ऋषियों के चिह्न पहने हुए वह बोल रहे हैं जो उन्हें बोलने भेजा गया है, और सामने अकेली वह खड़ी है जो पूरा सच कह चुकी है।
और फिर वर की सूची, एक-एक करके।
तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा॥
चौपाई ७
निर्गुन निलज कुबेष कपाली। अकुल अगेह दिगंबर ब्याली॥
निर्गुण, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, कपालों की माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर का, नंगा, साँप लपेटे हुए। आठ शब्द, और एक भी झूठ नहीं। इस कविता ने उन्हें अब तक घर नहीं दिया, कुल नहीं दिया, कपड़े नहीं दिये। इस सूची में जो नहीं है वह चार दोहे पहले का वाक्य है, और उसमें एक शब्द ऐसा था जो सूची में कहीं नहीं आता: सुखधाम।
पर यही आठ शब्द वे पहले सुन चुकी हैं। पिछले प्रसंग में नारद उनके पिता के घर बैठकर उनके होनेवाले पति के अवगुण गिना चुके हैं, गुणहीन, मानहीन, माता-पिता से रहित, जोगी, जटाधारी, नंगा, अमंगल वेषवाला। ऋषि समझ रहे हैं कि वे कोई भेद खोल रहे हैं। असल में वे गुरु की बनायी सूची उसी शिष्या को सुना रहे हैं, जिसने वह सूची सुनकर ही तप शुरू किया था।
और फिर पन्ने की सबसे निर्मम पंक्ति।
कहहु कवन सुखु अस बरु पाएँ । भल भूलिहु ठग के बौराएँ॥
चौपाई ८
पंच कहें सिवँ सती बिबाही । पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही॥
पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया, फिर उसे त्यागकर मरवा डाला। यह उस स्त्री से कहा जा रहा है जो उसी पुरुष के लिये वर्षों से तप में खड़ी है। और जो पाठक पिछला प्रसंग पढ़कर आया है, उसके लिये यह वाक्य और एक क़दम आगे जाता है, क्योंकि वह जानता है कि यह किससे कहा जा रहा है।
अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहिं।
दोहा ७९
सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं॥ ७९॥
अब कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। हम इससे पहले पढ़ चुके हैं कि निष्काम होकर भी वे भक्त के वियोग के दुःख से दुखी हैं। जो बात यहाँ प्रमाण की तरह रखी जा रही है, वह पन्ने पर पहले ही ग़लत साबित हो चुकी है, और साबित करनेवाला कोई पात्र नहीं, ख़ुद कविता का क्रम है। और जिस दोहे में उनका घर छीना जा रहा है, उसी दोहे में टीका के अनुसार उन्हें नाम से पुकारा गया है: भव।
सार: ऋषि हँसकर कहते हैं कि नारद का उपदेश सुनकर आजतक किसी का घर नहीं बसा, और दक्ष के पुत्रों, चित्रकेतु और हिरण्यकशिपु का उदाहरण देते हैं। फिर शिव के आठ दोष गिनाते हैं, सती के मारे जाने का ताना देते हैं, और कहते हैं कि सहज अकेले रहनेवालों के घर स्त्रियाँ कभी नहीं टिकतीं।
पत्थर से जो निकलता है
फिर वे बदले में एक वर रखते हैं, और यह प्रस्ताव पूरा का पूरा गुन की शब्दावली में बना है। अत्यन्त सुन्दर, पवित्र, सुखद, सुशील, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं। दोषों से रहित, समस्त गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी, वैकुण्ठपुरी का निवासी। ऐसा वर लाकर हम आपसे मिला देंगे।
जोड़ मिलाकर देखिये। निर्गुन के सामने सकल गुन रासी। अकुल और अगेह के सामने एक नाम वाली नगरी और एक नाम वाली पत्नी। जो कमी अभी गिनायी गयी थी, प्रस्ताव उसी कमी की उलटी नक़ल है, शब्द दर शब्द। यह मोल-भाव नहीं है, यह एक ही सूची को दो बार पढ़ना है, एक बार घटाकर और एक बार जोड़कर।
और यह सुनते ही भवानी हँस पड़ती हैं। कविता उनकी हँसी को ठीक उसी बनावट में दर्ज करती है जिसमें उसने ऋषियों की हँसी दर्ज की थी, सुनते ही बिहसि, जैसे दोहा ७८ में सुनते ही बिहसे। और यह भी याद रहे कि यह सब शुरू होने से पहले वे ख़ुद कह चुकी थीं कि आप लोग सुनकर हँसेंगे। इस पन्ने पर तीन हँसी हैं, और पहली का पूर्वानुमान उसी ने लगाया था जिस पर वह हँसी गयी।
उनका पहला वाक्य ताने को उपहार की तरह लौटा देता है।
सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा । हठ न छूट छूटै बरु देहा॥
चौपाई ९
कनकउ पुनि पषान तें होई । जारेहुँ सहजु न परिहर सोई॥
आपने सच कहा, यह शरीर पर्वत से ही उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, चाहे देह छूट जाये। और फिर प्रमाण, जो उन्हीं के चित्र को पूरा करके लौटाता है: सोना भी पत्थर से ही निकलता है, और जलाये जाने पर भी अपना सहज नहीं छोड़ता।
यह शब्द सहज उन्हीं का है। उन्होंने इसे दो बार इस्तेमाल किया था, एक बार सहज उदासीन पति के लिये और एक बार सहज अकेले रहनेवालों के घर के लिये। दोनों बार इसका मतलब था एक ऐसा स्वभाव जो बदला नहीं जा सकता, और दोनों बार यह उनके ख़िलाफ़ दलील थी। वे उसे उठा लेती हैं और कहती हैं कि हाँ, स्वभाव बदला नहीं जा सकता, और यहाँ जिस स्वभाव की बात हो रही है वह मेरा है।
और जारेहुँ, जला दिये जाने पर भी। पिछला पूरा प्रसंग जलने में बीता है, उपवास, फिर पेड़ से गिरे सूखे बेल के पत्ते तीन हज़ार वर्ष तक, फिर वे भी नहीं। जिस धातु का उदाहरण वे दे रही हैं वह आग से गुज़र चुकी है, और वे भी गुज़र चुकी हैं, और सात ऋषि उसी का नतीजा सामने खड़ा देख रहे हैं।
पर सबसे गहरी बात वह है जिसे वे कहते हुए कोई भार नहीं देतीं। हठ नहीं छूटेगा, देह भले छूट जाये। इस पन्ने की शुरुआत में ही कहा जा चुका है कि सती ने जाकर तनु त्यागा था। जो वे दे रही हैं वह प्रस्ताव नहीं है, दोहराव है, और वे इसे इस तरह कहती हैं जैसे कोई छोटी चीज़ दे रहा हो।
नारद बचन न मैं परिहरऊँ । बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ॥
चौपाई १०
गुर कें बचन प्रतीति न जेही । सपनेहुँ सुगम न सुख सिधि तेही॥
नारद के वचन मैं नहीं छोड़ूँगी, घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। और फिर कारण, जो किसी व्यक्तिगत ज़िद की तरह नहीं, एक नियम की तरह रखा गया है: जिसे गुरु के वचन पर विश्वास नहीं, उसे सुख और सिद्धि सपने में भी सुलभ नहीं होती।
अब इस वाक्य को इसी पन्ने के उस वाक्य के बराबर रखिये जो शिव ने राम से कहा था, कि माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात बिना विचारे शुभ मानकर कर लेनी चाहिये। उन्होंने वह नियम कहा और उस पर चले। ये वही नियम सात ऋषियों को सुनाकर उन्हीं के विरुद्ध उस पर चल रही हैं। दोनों को पता नहीं कि दूसरे ने क्या कहा है। पन्ने ने उनसे एक-दूसरे का उत्तर दिलवा दिया है।
और फिर वे पूरा हिसाब मान लेती हैं, एक दोहे में।
महादेव अवगुन भवन बिष्नु सकल गुन धाम।
दोहा ८०
जेहि कर मनु रम जाहि सन तेहि तेही सन काम॥ ८०॥
माना कि महादेव अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त गुणों के धाम हैं। वे सूची के एक भी नाम पर बहस नहीं करतीं। वे उसे उन्हीं दो संज्ञाओं में स्वीकार कर लेती हैं और फिर तराज़ू को अलग रख देती हैं: जिसका मन जिसमें रम गया, उसे उसी से काम है। और यह भी देखिये कि धाम शब्द दोहा ७५ में शिव के लिये आ चुका था। अब वही शब्द दूसरे के खाते में चला गया है, उन्हीं के हाथों, और वे उसे जाने देती हैं।
सार: ऋषि गुणों से भरा एक दूसरा वर रखते हैं। पार्वती हँसकर कहती हैं कि शरीर पर्वत से उपजा है यह सच है, इसलिये हठ नहीं छूटेगा, देह भले छूट जाये, क्योंकि सोना भी पत्थर से निकलता है और जलने पर भी स्वभाव नहीं छोड़ता। गुरु के वचन पर विश्वास न हो तो सुख और सिद्धि सपने में भी नहीं मिलती।
जो पहले मिलते
इसके बाद जो आता है वह इस काण्ड का सबसे शिष्ट इनकार है। यदि आप पहले मिले होते, हे मुनीश्वरो, तो मैं आपकी सीख सिर पर रखकर सुनती।
इस वाक्य ने जो-जो मान लिया है, उसे गिनिये। वे यह नहीं कहतीं कि आपकी सलाह बुरी है। वे कहती हैं कि क्रम ने फ़ैसला कर दिया, और नारद पहले आये थे। वे यह भी मान लेती हैं कि वे आपकी मान लेतीं, और उसी साँस में उसे असंभव बना देती हैं। और फिर: अब मैं अपना जन्म शंभु के लिये हार चुकी, अब गुण-दोष का विचार करे भी कौन।
गुन और दूषन। ये दोनों शब्द अभी-अभी ऋषियों ने अपने प्रस्ताव में इस्तेमाल किये थे, दोषों से रहित और सारे गुणों की राशि। आधी पंक्ति में दोनों वापस उन्हीं के हाथ में रख दिये गये हैं। वे हिसाब को ग़लत नहीं बता रहीं। वे कह रही हैं कि बही बन्द हो चुकी है, और बिचार शब्द तीसरी बार इसी पन्ने पर लौट आया है।
और फिर वह दूसरा शब्द भी लौटाया जाता है। यदि आपके हृदय में बहुत हठ है और बिना बात पक्की किये आपसे रहा नहीं जाता, तो संसार में वर और कन्या बहुत हैं, और खिलवाड़ करनेवालों को आलस्य तो होता नहीं। जिस शब्द से ब्रह्मा ने इस पन्ने पर उन्हें चेताया था और जिसे उन्होंने दो बार अपने ऊपर ओढ़ा था, वह अब सामने खड़े सात लोगों के हृदय में पाया गया है।
और फिर वह जगह जहाँ वे सबसे आगे जाती हैं। करोड़ जन्म तक यही रगर रहेगी, या तो शंभु को वरूँगी या कुमारी रहूँगी। और उसके बाद वह वाक्य जो आख़िरी दरवाज़ा भी बन्द कर देता है: स्वयं महेश सौ बार कहें, तो भी नारद का उपदेश नहीं छोड़ूँगी। यानी जिस पुरुष को चाहना वे नहीं छोड़ेंगी, उसी की बात भी नहीं मानेंगी, अगर वह यही कहने आये।
मैं पा परउँ कहइ जगदंबा । तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा॥
चौपाई ११
देखि प्रेमु बोले मुनि ग्यानी । जय जय जगदंबिके भवानी॥
फिर वे हाथ जोड़ लेती हैं। मैं पैरों पड़ती हूँ, आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। इस पूरे पन्ने पर हर कोई उन्हें घर भेजने की बात कर रहा था, ब्रह्मा, शिव, और परोक्ष में हिमाचल। और अन्त में घर सचमुच कोई गया, तो उन्हीं के कहने से गया। और ठीक उसी पंक्ति में तुलसी उन्हें पार्वती या उमा नहीं, जगदंबा कहते हैं, उस क्षण में जब वे सात मुनियों से जाने के लिये कह रही हैं।
सार: पार्वती कहती हैं कि यदि आप पहले मिलते तो आपकी सीख सिर पर रखती, पर अब जन्म शंभु के लिये हारा जा चुका है। वे हठ शब्द ऋषियों को लौटा देती हैं, करोड़ जन्म तक अड़े रहने का ऐलान करती हैं, और फिर हाथ जोड़कर उनसे घर लौटने को कहती हैं।
जय जय जगदंबिके भवानी
और तब वह पंक्ति आती है जो इस पूरी परीक्षा का नतीजा एक शब्द में दे देती है। प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि बोले। कोई दलील नहीं जीती गयी, कोई सन्देह दूर नहीं हुआ, किसी ने हार नहीं मानी। उन्होंने देखा। शिव ने भेजते समय जो काम सौंपा था वह था प्रेम की परीक्षा, और लौटती हुई रिपोर्ट में वही शब्द है, प्रेम देखकर। जो भेजा गया था वही वापस आया है।
और वे जो कहते हैं, वह तुलसी के कहे हुए से ठीक एक पंक्ति पीछे है। कवि ने उन्हें जगदंबा कहा था, अब ये उन्हें जगदंबिके कहकर जय-जयकार करते हैं। कवि का दिया हुआ नाम और पात्रों का दिया हुआ नाम अग़ल-बग़ल की दो पंक्तियों में आकर मिल जाते हैं। सात लोग वहाँ पहुँच गये हैं जहाँ कविता पहले से खड़ी थी।
तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु।
दोहा ८१
नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गातु॥ ८१॥
आप माया हैं और शिव भगवान हैं, आप दोनों समस्त जगत के माता-पिता हैं। जिन लोगों ने अभी-अभी इतनी देर तक यह सिद्ध किया था कि उस पुरुष के पास घर तक नहीं है, वे जाते-जाते उसे संसार के हर घर का पिता कह जाते हैं। और यह भी ध्यान रहे कि यह वाक्य विवाह की भविष्यवाणी नहीं है। यह उससे बड़ी बात कह रहा है, और इसमें विवाह की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।
पर दोहे की आख़िरी बात वह नहीं है जो उन्होंने कही। वह यह है कि जाते समय उनके शरीरों का क्या हुआ: बार-बार पुलकित होते हुए वे चले गये। यह पन्ना उसी क्रिया से खुला था। पहली ही चौपाइयों में आकाश की वाणी सुनकर गिरिजा का गात पुलकित हुआ था और वे हर्षित हुई थीं। अब उन्हीं दो शब्दों के साथ पन्ना बन्द होता है, इस बार सात दूसरे शरीरों पर। बीच में जो कुछ हुआ, उसका असर दोनों जगह एक जैसा है।
सार: प्रेम देखकर ज्ञानी मुनि जय-जयकार करते हैं, पार्वती को माया और शिव को भगवान कहते हैं, दोनों को समस्त जगत का माता-पिता बताते हैं, और चरणों में सिर नवाकर बार-बार पुलकित होते हुए लौट जाते हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
पहले परीक्षा के बारे में, क्योंकि यही इस पन्ने की सबसे विचित्र चीज़ है। विवाह दोहा ७६ में तय हो चुका था, किसी ऋषि के चलने से बहुत पहले। इसलिये उन सातों ने जो कुछ कहा, उससे कुछ भी बदल नहीं सकता था। यह परीक्षा फ़ैसला करने के लिये नहीं ली गयी। यह इसलिये ली गयी कि फ़ैसला दर्ज हो जाये। जब शिव के विरुद्ध की दलील पूरी ताक़त से रखी जाये, ऐसे लोगों के मुँह से जो उसे रखने के अधिकारी हैं, सच्चे उदाहरणों के साथ, और फिर एक-एक करके ठुकरा दी जाये, तब वह इनकार एक जाँची हुई चीज़ बन जाता है, न कि ऐसी चीज़ जिस पर कभी सवाल ही नहीं उठा।
फिर उस शब्द के बारे में जिसे छोड़ने को उनसे कहा गया था। हठ हिन्दी में तारीफ़ नहीं है। यह पन्ना उसे चार बार इस्तेमाल करता है और एक बार भी नरम नहीं करता। पार्वती यह दावा नहीं करतीं कि उनका हठ दरअसल कोई ऊँची चीज़ है। वे कहती हैं कि मन ने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता, वह पानी पर दीवार उठाना चाहता है। हर निदान वे मान लेती हैं और बदलती कुछ भी नहीं। पन्ना यह साबित करने की कोशिश नहीं करता कि उनका हठ बुद्धिमानी थी। वह सिर्फ़ यह दिखाता है कि वह किन-किन चीज़ों से बचकर निकल आया: ब्रह्मा की सलाह, सात विद्वानों की हँसी, आठ दोषों की सूची, एक मरी हुई पत्नी का ताना, और एक निर्दोष विकल्प।
और एक चीज़ जो इस पन्ने पर है ही नहीं, जिसे पाठक ढूँढ़ सकता है। पार्वती से कोई यह नहीं कहता कि आप सही थीं। कोई उन्हें यह नहीं बताता कि आकाश की वाणी का प्रमाण अभी-अभी उनके सामने खड़ा था। कोई उन्हें यह नहीं बताता कि शिव मान चुके हैं, और वे दोहा ७६ पर मान चुके हैं। ऋषि अच्छी ख़बर लेकर लौट जाते हैं और वे जहाँ थीं वहीं तप में खड़ी रह जाती हैं। शिव की आज्ञा का दूसरा हिस्सा, गिरि को प्रेरित करके उन्हें घर भिजवाना, इस प्रसंग में पूरा नहीं होता। उनकी जय बोली गयी, उन्हें सूचना नहीं दी गयी।
तुलसी इस पन्ने को इस तरह बाँधते हैं कि पढ़नेवाला हमेशा एक बात ज़्यादा जानता रहे। हम जानते हैं कि ऋषि क्यों आये हैं, वे नहीं जानतीं। हम जानते हैं कि शिव मान चुके हैं, वे नहीं जानतीं। और हम जानते हैं कि उस आदमी के बेफ़िक्र सोने वाली बात झूठ है, क्योंकि उसका सच हमने इसी पन्ने पर बहुत पहले पढ़ लिया था। पन्ने के बीच की हर क्रूरता हमारे लिये पहले ही ठंडी कर दी गयी है और उनके लिये पूरी गरम छोड़ी गयी है। उत्तर उन्होंने उसी गरमी में दिया, हमारे पास जो राहत थी उसमें से एक भी उनके पास नहीं थी, और इसीलिये वह उत्तर पढ़ने लायक़ है।
और आख़िर में उस एक शब्द की बात, जो इस प्रसंग में तीन मुँहों से निकला है। शिव ने कहा था कि माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात बिना बिचार के शुभ मानकर कर लेनी चाहिये। ऋषि यह कहते हुए आये कि हमने आपके लिये अच्छा वर बिचार रखा है। और पार्वती ने पूछा कि अब गुण और दोष का बिचार करे भी कौन। तीनों जगह अर्थ एक ही है, तौलना। एक पुरुष तौलने से इनकार कर देता है, क्योंकि कहनेवाला उसका प्रिय है। सात विद्वान् बड़ी सावधानी से तौलते हैं और ग़लत निकलते हैं। और एक स्त्री कहती है कि तौल तो बहुत पहले पूरी हो चुकी, एक पहाड़ पर बने घर में, जिस दिन एक अतिथि ने उनके पिता से उनके होनेवाले पति के अवगुण गिनाये थे और वे सुनकर प्रसन्न हो गयी थीं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ७५ से ८१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।