रामचरितमानस · बालकाण्ड · मंगलाचरण, गुरु-वंदना और संत-असंत का भेद
मंगलाचरण, गुरु-वंदना और संत-असंत का भेद
सात संस्कृत श्लोक जिनका पहला शब्द अक्षर है, गुरु के चरणों की वह धूल जो आँख का अंजन बन जाती है, और वह वंदना जिसमें संत और दुष्ट, दोनों के चरण पकड़े जाते हैं।
रामचरितमानस का सबसे पहला पन्ना यही है, और इस पर कोई कथा नहीं है। न अयोध्या है, न कोई राजा, न कोई वर माँगा जाता है और न कोई धनुष उठता है। जो पाठक राम के जन्म की प्रतीक्षा में पोथी खोलता है, उसे सबसे पहले जो शब्द मिलता है वह है वर्णानाम्, अर्थात् अक्षरों का। सात सोपानों तक चलनेवाला यह ग्रन्थ अपनी पहली साँस में जिस चीज़ के लिये हाथ जोड़ता है, वह वर्णमाला है। कथा बाद में आयेगी। पहले वह भाषा माँगी जा रही है जिसमें कथा कही जायेगी।
इस पन्ने पर सात संस्कृत श्लोक हैं, उनके पीछे पाँच सोरठे, और फिर पहले दोहे से सातवें दोहे तक की चौपाइयाँ। घटना के अर्थ में यहाँ कुछ नहीं घटता। फिर भी जो कुछ आगे के सारे काण्डों में होना है, उसकी नींव इसी पन्ने पर पड़ती है। यहीं तय होता है कि यह ग्रन्थ किसके आगे सिर झुकाता है, इसका लिखनेवाला अपने आपको क्या समझता है, वह संसार को किस चीज़ का बना हुआ मानता है, और सबसे बड़ी बात, वह यह पोथी किसके सुख के लिये लिख रहा है। स्वान्तःसुखाय तुलसी वाली वह पंक्ति, जिसे आगे चलकर सैकड़ों बार दोहराया गया, इसी पन्ने पर है, और सातवें श्लोक में है, यानी संस्कृत की आखिरी साँस में।
और इसी पन्ने पर वह हिस्सा है जिस पर पाठक पहली बार ठिठकता है। संत-समाज की वंदना करके तुलसीदास सीधे दुष्टों की वंदना पर उतरते हैं, और वह भी सच्चे भाव से। वे उन्हें राहु कहते हैं, सहस्रबाहु कहते हैं, पापों के धन का कुबेर कहते हैं, यमराज कहते हैं, और उनके विषय में एक ही शुभकामना निकालते हैं, कि कुम्भकर्ण की तरह सोते रहें तो सबका भला है। वंदना का ढाँचा पूरा का पूरा बना रहता है और उसके भीतर हर उपमा एक घाव है। यह पन्ना संत के विषय में जितना उदार है, असंत के विषय में उतना ही निर्मम, और दोनों जगह वह हाथ जोड़े खड़ा रहता है।
यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं, और यह बात इसी पहले पन्ने पर खुल जाती है। चौथे श्लोक में जिन दो के आगे सिर झुकाया गया है, वे नाम से नहीं, पदवी से पुकारे गये हैं: कवीश्वर और कपीश्वर। पोद्दार की टीका उन्हें वाल्मीकि और हनुमान बताती है। जिस पुरानी रामायण से यह कथा चली आ रही है, वह यहाँ प्रतिद्वन्द्वी की तरह नहीं, वंदनीय की तरह खड़ी है, और सातवें श्लोक में तुलसी स्वयं कह देते हैं कि यह कथा पुराणों, वेदों और शास्त्रों से सम्मत है, रामायण में कही गयी है, और कुछ कहीं और से भी ली गयी है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- वाणी और विनायक अक्षर, अर्थ, रस, छन्द और मङ्गल के कर्ता, जिनसे इस ग्रन्थ की पहली प्रार्थना की जाती है।
- भवानी और शङ्कर जिन्हें यहाँ देवता कहने से पहले श्रद्धा और विश्वास का स्वरूप कहा गया है।
- गुरु बोधमय और नित्य, शङ्कररूप, जिनके चरणों की धूल इस पन्ने पर पाँच बार रूप बदलती है।
- कवीश्वर और कपीश्वर सीता-राम के गुणों के पवित्र वन में विहार करनेवाले दो, जिन्हें टीका वाल्मीकि और हनुमान बताती है।
- सीता जिन्हें उत्पत्ति, स्थिति और संहार करनेवाली कहने के बाद ही रामवल्लभा कहा गया है।
- राम जिनकी माया के वश में ब्रह्मा से लेकर असुरों तक सब हैं और जिनके चरण भवसागर की अकेली नाव हैं।
- तुलसीदास जो अपने ही ग्रन्थ में अपना नाम तीसरे पुरुष में लिखते हैं, जैसे किसी और की बात कर रहे हों।
- संत और असंत इस पन्ने के दो पक्ष, जो एक ही समुद्र से निकलते हैं और जिन दोनों के चरणों में यह ग्रन्थ झुकता है।
पहला शब्द, और वह अक्षर है
मङ्गलाचरण का नियम यह है कि ग्रन्थ के आरम्भ में जिस देवता का स्मरण किया जाये, वही उस ग्रन्थ का स्वभाव बता देता है। तुलसीदास ने पहले श्लोक में जिन दो को पुकारा है, वे युद्ध के देवता नहीं हैं, राज्य के देवता नहीं हैं। वे भाषा के देवता हैं।
वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १॥
श्लोक १
इस एक श्लोक में पाँच चीज़ें गिनायी गयी हैं और उनका क्रम यों ही नहीं रखा गया। पहले वर्ण, फिर अर्थसंघ, फिर रस, फिर छन्द, और अन्त में मङ्गल। यही क्रम है जिसमें कोई रचना सचमुच बनती है। पहले अक्षर होते हैं, अक्षरों से अर्थ के समूह बँधते हैं, अर्थ से रस उठता है, रस को छन्द सँभालता है, और जब यह सब ठीक बैठ जाता है तब जाकर उस रचना में मङ्गल आता है। तुलसी नीचे की सीढ़ी से माँगना शुरू करते हैं।
और जिनसे माँगा जा रहा है, वे भी दो हैं, एक नहीं। सरस्वती अक्षर देती हैं और गणेश रास्ता देते हैं। वाणी और विनायक, बोलने की शक्ति और बोलते समय आनेवाली अड़चन का हटना। लम्बी रचना लिखनेवाला जानता है कि इन दोनों में से एक भी न हो तो दूसरा किसी काम नहीं आता।
इस पन्ने पर यह जोड़ी बार-बार लौटती है। वाणीविनायकौ, भवानीशङ्करौ, कवीश्वरकपीश्वरौ। तुलसी अकेले किसी के आगे कम ही झुकते हैं। जहाँ भी झुकते हैं, दो के आगे झुकते हैं, और दोनों में से एक शक्ति होती है और दूसरा उस शक्ति को थामनेवाला। यह आदत इस ग्रन्थ के अन्त तक नहीं छूटती।
एक बात और, जो पहली नज़र में छूट जाती है। जिनसे मङ्गल माँगा जा रहा है, उन्हें इसी श्लोक में मङ्गलों का कर्ता कहा गया है। अर्थात् प्रार्थना उसी से की जा रही है जो उस चीज़ को बनाता है जो प्रार्थना में माँगी जा रही है। मङ्गलाचरण अपने नाम का अर्थ अपने भीतर रखकर चलता है।
सार: ग्रन्थ का पहला शब्द अक्षर है और पहली प्रार्थना भाषा के लिये है। राम का नाम अभी नहीं आया; पहले वह औज़ार माँगा जा रहा है जिससे राम की कथा कही जायेगी।
श्रद्धा, विश्वास, और एक टेढ़ा चन्द्रमा
दूसरे श्लोक में पार्वती और शङ्कर आते हैं, पर तुलसी उन्हें देवता कहकर नहीं छोड़ते। वे उन्हें श्रद्धाविश्वासरूपिणौ कहते हैं, यानी श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप। और फिर वे कारण भी बता देते हैं, जो इस पूरे ग्रन्थ की जड़ है।
भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ। याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाः स्वान्तःस्थमीश्वरम्॥ २॥
श्लोक २, ३
वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम्। यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते॥ ३॥
दूसरे श्लोक का दूसरा आधा वाक्य ध्यान से पढ़ने लायक है। जिनके बिना सिद्ध भी अपने भीतर बैठे ईश्वर को नहीं देख पाते। सिद्ध, यानी वे जिनकी साधना पूरी हो चुकी है। और जिसे वे नहीं देख पाते, वह कहीं दूर नहीं है, स्वान्तःस्थ है, उन्हीं के भीतर बैठा है। तो कमी ईश्वर की नहीं है और दूरी की भी नहीं है। कमी श्रद्धा और विश्वास की है। इस एक पंक्ति में तुलसी ने ज्ञान के ऊपर भरोसे को बिठा दिया, और आगे सात काण्डों तक इसी निर्णय पर चलते रहे।
वह शब्द स्वान्तः याद रखने लायक है। अपना भीतर, अपना अन्तःकरण। इस पन्ने पर यह शब्द दो बार आयेगा। पहली बार यहाँ, जहाँ वह ईश्वर के बैठने की जगह है। दूसरी बार सातवें श्लोक में, जहाँ वह उस व्यक्ति का नाम है जिसके सुख के लिये यह पूरी पोथी लिखी जा रही है। दोनों बार एक ही जगह की बात हो रही है।
तीसरा श्लोक गुरु का है, और उसमें तुलसी जो प्रमाण देते हैं वह असाधारण है। गुरु की वंदना के पक्ष में वे चन्द्रमा का उदाहरण उठाते हैं, और उदाहरण उठाते ही चन्द्रमा का दोष भी साथ गिना देते हैं। वक्रोऽपि, टेढ़ा होने पर भी। चन्द्रमा घटता है, टेढ़ा होता है, पूरा नहीं रहता। फिर भी सब जगह उसकी वंदना होती है, और इसका कारण उसका अपना गुण नहीं, उसका आश्रय है। जिनका आश्रय उसने लिया, उन्हीं के कारण वह सर्वत्र वंदित हुआ।
इस उदाहरण की चोट यह है कि इसमें टेढ़ापन दूर नहीं किया जाता। चन्द्रमा सीधा करके नहीं पूजा जाता, टेढ़ा ही पूजा जाता है। गुरु के विषय में तुलसी का दावा यही है: आश्रय शिष्य को सुधारकर स्वीकार नहीं करता, जैसा है वैसा ही उठा लेता है। और गुरु को यहाँ बोधमय और नित्य कहा गया है, फिर शङ्कररूप। यानी यह किसी एक व्यक्ति का वर्णन नहीं है।
सार: भवानी और शङ्कर यहाँ श्रद्धा और विश्वास हैं, जिनके बिना भीतर बैठा ईश्वर भी नहीं दिखता। और गुरु का प्रमाण वह चन्द्रमा है जो टेढ़ा रहते हुए भी, केवल अपने आश्रय के कारण, सर्वत्र वंदित है।
एक वन, एक नाव, और रस्सी में साँप
चौथे श्लोक में जिनकी वंदना है, उनका नाम श्लोक में नहीं आता। आती है पदवी: कवीश्वर और कपीश्वर। कवियों के ईश्वर और कपियों के ईश्वर। पोद्दार की टीका इन्हें वाल्मीकि और हनुमान बताती है। दोनों शब्द सुनने में इतने पास हैं कि एक ही साँस में निकल जाते हैं, और दोनों की कथा में एक-एक वन है।
और वे दोनों जहाँ विहार करते हैं, उसे भी तुलसी ने वन ही कहा है: सीता और राम के गुणों का समूह एक पवित्र अरण्य है, और ये दो उसमें घूमते हैं। इस पन्ने पर यह पहली बार है जब कथा की सामग्री को किसी ऐसी जगह की तरह देखा गया है जिसमें घुसा जा सकता है। आगे यही बात दूसरे रूप में लौटेगी, जब रामचरित को खानों में दबी मणि और माणिक्य कहा जायेगा।
सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ । वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ॥ ४॥
श्लोक ४, ५, ६
उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम्। सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम्॥ ५॥
यन्मायावशवर्त्ति विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा यत्सत्त्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः। यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम्॥ ६॥
पाँचवें श्लोक में सीता हैं, और यहाँ क्रम सब कुछ कह देता है। उन्हें पहले उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली कहा गया, फिर क्लेशों को हरनेवाली, फिर सम्पूर्ण कल्याण करनेवाली, और इन सबके बाद जाकर रामवल्लभा। जो तीन काम आमतौर पर तीन बड़े देवताओं में बाँटे जाते हैं, वे तीनों यहाँ एक के नाम कर दिये गये हैं, और उसका राम से सम्बन्ध सबसे अन्त में बताया गया है। यह भी ध्यान देने की बात है कि इस श्लोक में क्रिया बदल जाती है। बाकी जगह वन्दे है, यहाँ नतोऽहं है, मैं झुका हुआ हूँ।
और एक बात जो क्रम से ही खुलती है: सीता का श्लोक राम के श्लोक से पहले आता है। जिस ग्रन्थ का नाम रामचरितमानस है, उसमें राम से पहले सीता को प्रणाम किया गया है।
छठा श्लोक इस पन्ने का सबसे गहरा है। पहले वह माया की सीमा बताता है, और सीमा बहुत दूर तक जाती है। केवल संसार ही नहीं, ब्रह्मा आदि देवता और असुर भी उसी माया के वश में हैं। फिर वह उपमा आती है जिस पर सारा वेदान्त टिका है: रस्सी में साँप का भ्रम। साँप है नहीं, पर दिखता है, और डर सच्चा लगता है। तुलसी ने उपमा के साथ उसका कारण भी जोड़ दिया है, यत्सत्त्वात्, जिनकी सत्ता से। भ्रम भी तभी खड़ा हो सकता है जब नीचे कोई रस्सी सचमुच पड़ी हो। झूठ को भी टिकने के लिये किसी सच्ची चीज़ की ज़रूरत पड़ती है, और वह उधार की सत्ता उसी से आती है।
इसी श्लोक में नाव की बात है, और उसमें एक शर्त छिपी हुई है। उनके चरण उनके लिये अकेली नाव हैं जो भवसागर को तैरना चाहते हैं। चाहना पहले है। नाव तट पर बँधी खड़ी है, पर वह उसी के काम आती है जिसे पार जाना है। और इतना सब कह लेने के बाद, अशेषकारणपर कह लेने के बाद, उस अनाम को एक नाम दिया जाता है: रामाख्य, राम नामवाला। इस पन्ने पर राम का नाम इसी तरह आता है, सबसे आगे नहीं, बल्कि छठे श्लोक के अन्त में, एक लम्बे परिचय के बाद।
सार: वाल्मीकि और हनुमान सीता-राम के गुणों के वन में घूमते हैं, सीता को तीनों काम सौंपकर अन्त में रामवल्लभा कहा जाता है, और राम का नाम तब आता है जब रस्सी, साँप और नाव की बात पूरी हो चुकी होती है।
स्वान्तःसुखाय: किसके सुख के लिये
सातवाँ श्लोक मङ्गलाचरण का आखिरी है, और उसमें तुलसीदास वही करते हैं जो एक ईमानदार लेखक को करना चाहिये। वे बताते हैं कि यह सामग्री कहाँ से आ रही है, और उसके बाद बताते हैं कि वे इसे लिख क्यों रहे हैं। क्रम यही है, पहले स्रोत, फिर कारण।
नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद् रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि। स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथाभाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति॥ ७॥
श्लोक ७
पहले आधे में गिनती है: अनेक पुराण, वेद, आगम शास्त्र, जो रामायण में कहा गया है, और क्वचिदन्यतोऽपि, कहीं-कहीं अन्यत्र से भी। यह आखिरी टुकड़ा छोटा है पर बहुत ईमानदार है। तुलसी यह दावा नहीं करते कि सब कुछ एक ही पोथी से आया है। वे मान लेते हैं कि कुछ बातें और जगहों से भी आयी हैं, और यह मान लेना ही इस ग्रन्थ के स्वभाव की पहली सूचना है। रामचरितमानस किसी एक ग्रन्थ का अनुवाद नहीं है और उसका लेखक यह बात सातवें श्लोक में ही खोलकर रख देता है।
दूसरे आधे में वह पंक्ति है जिसके कारण यह श्लोक याद रखा जाता है। स्वान्तःसुखाय तुलसी। अपने अन्तःकरण के सुख के लिये तुलसी। न यश के लिये, न किसी आश्रयदाता के लिये, न स्पष्ट शब्दों में पाठक के लिये भी। और यहीं वह शब्द लौटता है जो दूसरे श्लोक में आया था। वहाँ स्वान्तः वह जगह थी जहाँ ईश्वर बैठा है और जिसे सिद्ध भी श्रद्धा के बिना नहीं देख पाते। यहाँ वही जगह उस सुख की पात्र है जिसके लिये पोथी लिखी जा रही है। दो श्लोकों के बीच में पाँच श्लोक पड़े हैं, और उन दोनों को एक ही शब्द जोड़ रहा है।
और तीसरी बात, जो सबसे बड़ी है। यह सातवाँ श्लोक संस्कृत में है, और यह वही श्लोक है जो घोषणा करता है कि आगे का सब संस्कृत में नहीं होगा। भाषानिबन्ध, भाषा की रचना। उस युग में पवित्र कथा का घर संस्कृत था और भाषा का अर्थ था लोगों की बोली। तुलसी उस बोली में रघुनाथ की गाथा फैलाने चले हैं और उस रचना को स्वयं अतिमञ्जुल कह रहे हैं, अत्यन्त सुन्दर। संस्कृत की अन्तिम पंक्ति वह पंक्ति है जिसमें संस्कृत को विदा किया जा रहा है।
भाषा एक और जगह चौंकाती है। तुलसी अपना नाम लेते हैं, पर तीसरे पुरुष में, और क्रिया भी तीसरे पुरुष की है, आतनोति, वह फैलाता है। जैसे कोई अपने ही विषय में दूर खड़े होकर समाचार दे रहा हो। जिस श्लोक में वे अपने भीतरी सुख की बात कर रहे हैं, उसी में अपने को बाहर से देख रहे हैं।
सार: मङ्गलाचरण स्रोत बताकर और कारण बताकर बन्द होता है। कारण एक ही है, अपने अन्तःकरण का सुख, और वह ठीक वही अन्तःकरण है जिसमें दूसरे श्लोक के अनुसार ईश्वर बैठा हुआ है।
भाषा की पहली पंक्तियाँ, और पाँच सोरठे
संस्कृत यहीं छूट जाती है और अवधी शुरू होती है। पहला सोरठा गणेश का है, और इस पूरे ग्रन्थ के जो सबसे पहले अवधी शब्द हैं, वे ये हैं।
जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन।
सोरठा १
करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन॥ १॥
पहले श्लोक में भी गणेश थे और पहले सोरठे में भी गणेश हैं। संस्कृत में उन्हें विनायक कहा गया था, यहाँ गननायक और करिबर बदन कहा गया है, गणों के स्वामी और श्रेष्ठ हाथी के मुखवाले। वही बात, वही देवता, दूसरी भाषा में। यह दोहराव भूल नहीं है। वंदना पहले उस भाषा में की गयी जिसे शास्त्र मानता है और फिर उस भाषा में जिसे लोग बोलते हैं, और यह ग्रन्थ आगे हज़ारों पंक्तियों तक दूसरी वाली भाषा में ही चलेगा।
दूसरा सोरठा वह है जो सबसे ज़्यादा उद्धृत हुआ, और जिसमें तुलसी ने अपने लिये जो माँगा है उसे देखना चाहिये।
मूक होइ बाचाल पंगु चढ़इ गिरिबर गहन।
सोरठा २
जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन॥ २॥
गूँगा बोलने लगे और लँगड़ा दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाये। ध्यान दीजिये कि यहाँ बाधा हटाने की प्रार्थना नहीं है। पहाड़ को छोटा करने की माँग नहीं है, लँगड़े को पहाड़ पर चढ़ा देने की माँग है। असमर्थ को सामर्थ्य मिल जाये, अयोग्य से काम हो जाये। एक आदमी जो बहुत लम्बी कथा उस भाषा में लिखने बैठा है जिसमें अब तक शास्त्र नहीं लिखे जाते थे, वह अपने लिये यही माँग सकता है। और जिनसे माँगा जा रहा है, उन्हें सकल कलि मल दहन कहा गया है, कलियुग के सारे मैल को जला देनेवाला।
तीसरे सोरठे में नील कमल जैसे श्याम, खिले हुए लाल कमल जैसे नेत्रोंवाले और क्षीरसागर में शयन करनेवाले से प्रार्थना है कि वे हृदय में घर बना लें। चौथे में कुन्द और चन्द्रमा जैसे गौर शरीरवाले, उमा के प्रियतम, करुणा के घर और कामदेव का मर्दन करनेवाले शङ्कर हैं। दोनों सोरठों में एक ही बनावट है: पहले रूप, फिर गुण, फिर माँग। तुलसी पहले आँख के सामने चित्र खड़ा करते हैं और तब हाथ फैलाते हैं।
और पाँचवाँ सोरठा गुरु का है, जो इन पाँचों में सबसे अन्त में आता है।
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
सोरठा ५
महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर॥ ५॥
संस्कृत के श्लोकों में गुरु तीसरे नम्बर पर थे, सोरठों में पाँचवें और आखिरी हैं। यह जगह चुनी हुई है। जिस पंक्ति पर वंदना के सोरठे समाप्त होते हैं, उसी शब्द से चौपाइयाँ शुरू होती हैं, क्योंकि अगली चौपाई का पहला शब्द भी बंदउँ है और उसका दूसरा और तीसरा शब्द भी गुरु पद हैं। यानी जिस सीवन पर संस्कृत की छाया छूटती है और भाषा का शरीर शुरू होता है, ठीक उसी सीवन पर गुरु खड़े हैं, और दोनों ओर से उन्हीं का चरण पकड़ा गया है।
इस सोरठे में गुरु को नररूप हरि कहा गया है, मनुष्य के रूप में हरि। और उनके वचनों को सूर्य की किरणों का समूह कहा गया है, जो महामोह के घने अन्धकार को काटता है। किरण का काम जलाना नहीं है, दिखाना है। यह उपमा आगे पूरे हिस्से को सँभालती है, क्योंकि अब जो कुछ आ रहा है वह सब आँख के विषय में है।
सार: वंदना दो बार होती है, एक बार संस्कृत में और एक बार भाषा में, और दूसरी बार गुरु सबसे अन्त में आते हैं। वहीं से चौपाइयाँ भी उन्हीं के चरणों से शुरू होती हैं।
चरणों की धूल, जो आँख का अंजन बन जाती है
अब चौपाइयाँ शुरू होती हैं, और पहली चौपाई गुरु के चरणों की नहीं, चरणों की धूल की वंदना करती है।
बंदउँ गुरु पद पदुम परागा। सुरुचि सुबास सरस अनुरागा॥
चौपाई १
अमिअ मूरिमय चूरन चारू। समन सकल भव रुज परिवारू॥
पहली पंक्ति में वह धूल पराग है, फूल का रज, और उसमें तीन चीज़ें बतायी गयी हैं: सुरुचि, सुबास और सरस अनुराग। स्वाद, गन्ध और रस। दूसरी पंक्ति में वही धूल दवा बन जाती है, अमर मूल का सुन्दर चूर्ण, जो भवरोग के पूरे परिवार को शान्त कर देता है। रोग का परिवार, यह शब्द ध्यान खींचता है। संसार का दुख एक बीमारी नहीं है, कुनबा है, और चूर्ण पूरे कुनबे पर चलता है।
अगली चौपाई में वही धूल तीसरा रूप लेती है। पुण्यवान् के शरीर पर वह शिव की विभूति है, निर्मल राख, और वह कल्याण तथा आनन्द की जननी है। फिर चौथा रूप: भक्त के मन रूपी दर्पण का मैल वही धूल पोंछती है, और तिलक की तरह लगा ली जाये तो गुणों के समूह को वश में कर लेती है। एक ही धूल, और चार काम। परन्तु असली मोड़ इसके बाद आता है।
तीसरी चौपाई में तुलसी गुरु के चरण-नखों की ज्योति की बात करते हैं, जो मणियों के प्रकाश जैसी है, और कहते हैं कि उसका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि पैदा हो जाती है। यहाँ से विषय बदल जाता है। अब तक धूल लेप थी, अब वह प्रकाश है, और प्रकाश का काम आँख से है। चौथी चौपाई इसे पूरा कर देती है: निर्मल नेत्र खुल जाते हैं, संसार रूपी रात्रि के दोष और दुख मिट जाते हैं, और तब रामचरित की मणि और माणिक्य दिखायी देने लगते हैं, गुपुत प्रगट, जहाँ जो जिस खान में पड़ा है।
यह वाक्य इस पूरे हिस्से की कुंजी है। गुरु की कृपा से जो मिलता है, वह यहाँ ज्ञान नहीं कहा गया, आँख कही गयी है। और जो दिखने लगता है, वह ईश्वर नहीं है, कथा है। रामचरित को खानों में दबा रत्न कहा जा रहा है, कहीं ढका हुआ और कहीं खुला हुआ, और लिखनेवाले को चाहिये केवल वह दृष्टि जिससे वह जान सके कि कौन-सा रत्न किस खान में है। इसके तुरन्त बाद जो दोहा आता है, वह इसी बात को पूरा कर देता है।
जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान।
दोहा १
कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान॥ १॥
सिद्धाञ्जन आँख में लगाकर साधक और सिद्ध पहाड़ों, वनों और धरती के भीतर की खानें खेल-खेल में देख लेते हैं। यह अञ्जन की पुरानी कथा है, वह काजल जिससे ज़मीन के नीचे गड़ा धन दिख जाता है। और यहीं वह क्रम पूरा होता है जिसे तुलसी पाँच चौपाइयों से बाँध रहे थे। वह धूल पहले पराग थी, फिर चूर्ण, फिर विभूति, फिर तिलक, और अब अञ्जन। पाँचों रूप चूर्ण के हैं, और उनमें से आखिरी आँख पर लगता है।
अगली चौपाई में तुलसी वह कहते हैं जिसके लिये यह सारी तैयारी थी।
गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन॥
चौपाई २
तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन। बरनउँ राम चरित भव मोचन॥
उसी अञ्जन से विवेक के नेत्रों को निर्मल करके मैं रामचरित का वर्णन करता हूँ। सारा रूपक यहाँ आकर काम पर लग जाता है। धूल, दवा, राख, तिलक और काजल, पाँचों इसीलिये गिनाये गये थे कि इस पंक्ति में लिखनेवाला अपनी आँख साफ़ करके कलम उठा सके। और जिस चरित का वर्णन होने जा रहा है, उसे भव मोचन कहा गया है, संसार के बन्धन से छुड़ानेवाला। यानी जो रत्न खान में दबे हैं, वे केवल सुन्दर नहीं हैं, काम के हैं।
सार: गुरु की देन यहाँ ज्ञान नहीं, दृष्टि है। और उस दृष्टि से जो पहली चीज़ दिखती है वह ईश्वर नहीं, रामचरित है, खानों में दबी मणि और माणिक्य की तरह, कहीं छिपा और कहीं खुला।
एक तीर्थराज जो चलता-फिरता है
गुरु के बाद तुलसी ब्राह्मणों के चरणों की वंदना करते हैं और उन्हें महीसुर कहते हैं, पृथ्वी के देवता, जो अज्ञान से उपजे सारे संदेह हर लेते हैं। और उसी चौपाई के दूसरे आधे में वे संत-समाज की ओर मुड़ जाते हैं, जिसे सब गुणों की खान कहा गया है। यहाँ से एक लम्बा हिस्सा शुरू होता है जो पूरी तरह संत के विषय में है।
संत के चरित्र के लिये तुलसी जो उपमा उठाते हैं, वह पहली बार में विचित्र लगती है: कपास। और फिर वे तीन गुण गिनाते हैं जिनके कारण यह उपमा बैठती है। कपास का फल नीरस है, विशद है और गुणमय है। टीका तीनों को खोलती है: नीरस अर्थात् विषयों के रस से खाली, विशद अर्थात् उज्ज्वल और अन्धकार से रहित, और गुणमय अर्थात् तन्तुओं से भरा हुआ, जहाँ गुण का दूसरा अर्थ धागा है।
पर असली बात दूसरी पंक्ति में है, और वह उपमा को कहीं और ले जाती है। कपास का धागा सूई के किये हुए छेद को अपना शरीर देकर ढक देता है; और कपास स्वयं ओटा जाता है, काता जाता है, बुना जाता है, यह सब कष्ट सहकर वस्त्र बनता है और दूसरों का ढकने योग्य ढकता है। इसी तरह संत स्वयं दुख सहकर दूसरों के छिद्र छिपाता है, और इसी कारण जगत् में उसका यश वंदनीय हुआ। संत की पहचान यहाँ पवित्रता नहीं है। संत की पहचान यह है कि वह दूसरे का दोष ढक देता है। इस वाक्य को याद रखिये, क्योंकि कुछ ही चौपाइयों बाद दुष्ट की पहचान ठीक इसका उलटा होगी।
इसके बाद तुलसी एक बड़ा रूपक खड़ा करते हैं जो पाँच चौपाइयों तक चलता है। संत-समाज जगत् का चलता-फिरता तीर्थराज है, यानी प्रयाग। और फिर वे प्रयाग के एक-एक अंग को गिनकर उसमें बिठाते हैं। रामभक्ति गङ्गा की धारा है। ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वती है। विधि और निषेध वाले कर्मों की कथा, जो कलियुग के पाप हरती है, सूर्य की बेटी यमुना है। हरि और हर की कथाएँ त्रिवेणी होकर सुशोभित हैं। अपने धर्म में अटल विश्वास अक्षयवट है। और शुभ कर्म उस तीर्थराज का समाज हैं, वह परिकर जो तीर्थ के साथ रहता है।
रूपक की चतुराई उसके अगले वाक्य में खुलती है। यह तीर्थराज सब देशों में, सब दिनों में, सभी को सहज में मिल जाता है, और आदर से सेवा करने पर क्लेश मिटा देता है। असली प्रयाग एक जगह है और वहाँ जाना पड़ता है, कुछ तिथियाँ शुभ होती हैं और कुछ नहीं। यह वाला प्रयाग साथ-साथ चलता है। जो लोग यात्रा नहीं कर सकते, उनके लिये यह पूरी उपमा उसी दिन काम करने लगती है जिस दिन वे किसी भले आदमी के पास बैठ जायें।
और इसके बाद वह चौपाई जिसमें कहा गया कि यह तीर्थराज अकथनीय और अलौकिक है तथा तत्काल फल देता है, उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। तत्काल शब्द पर दोहा आकर मुहर लगा देता है।
सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग।
दोहा २
लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग॥ २॥
जो प्रसन्न मन से इसका प्रभाव सुनते और समझते हैं और फिर बड़े प्रेम से इसमें डुबकी लगाते हैं, वे चारों फल पा जाते हैं, और वह भी अछत तनु, शरीर के रहते-रहते। साधारण तीर्थ का वचन मरने के बाद का होता है। यह वाला इसी देह में चुकता करता है। जिस रूपक का सारा बल इस बात पर था कि वह पास है, वह अपने फल में भी देर नहीं लगाता।
सार: संत की पहचान दूसरों के छिद्र ढकना है, और संत-समाज वह प्रयाग है जो चलकर पाठक के पास आ जाता है, हर देश में, हर दिन, और जिसका फल इसी शरीर में मिल जाता है।
जिस स्नान से कौआ कोयल हो जाता है
मज्जन फल पेखिअ ततकाला । काक होहिं पिक बकउ मराला॥
चौपाई ३
सुनि आचरज करै जनि कोई । सतसंगति महिमा नहिं गोई॥
इस तीर्थ में डुबकी का फल तत्काल दिखता है: कौए कोयल हो जाते हैं और बगुले हंस। और तुरन्त दूसरी पंक्ति कहती है कि यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी हुई नहीं है। यह जोड़ ज़रूरी था। पहली पंक्ति इतनी बड़ी बात कह रही है कि पाठक का ठिठकना स्वाभाविक है, इसलिये कवि उसी साँस में पीछे से हाथ रख देता है।
और फिर वे प्रमाण देते हैं, और प्रमाण की बनावट देखने लायक है। वाल्मीकि, नारद और घटयोनि अगस्त्य, तीनों ने अपनी होनी अपने-अपने मुख से कही है। यानी यह किसी और की गवाही नहीं है। इनमें से हर एक ने स्वयं बताया कि वह पहले क्या था और संग से क्या हुआ। इसके बाद तुलसी दायरा फैला देते हैं: जल में, थल पर और आकाश में रहनेवाले जितने जड़ और चेतन जीव जगत् में हैं, उनमें से जिसने जब, जहाँ, जिस यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, ऐश्वर्य और भलाई पायी, वह सब सत्संग का ही प्रभाव समझना चाहिये। लोक में भी और वेद में भी इसका दूसरा कोई उपाय नहीं है।
अगली चौपाई में एक ऐसा घेरा बनता है जिससे निकलने का रास्ता तुलसी जानबूझकर एक ही रखते हैं। सत्संग के बिना विवेक नहीं होता, और राम की कृपा के बिना सत्संग सहज में नहीं मिलता। पहली शर्त दूसरी पर टिकी है और दूसरी किसी के हाथ में नहीं है। और फिर वह उलटफेर आता है जो सारे साधन-शास्त्र को सिर के बल खड़ा कर देता है: सत्संग की सिद्धि ही फल है और बाकी सब साधन केवल फूल हैं। आमतौर पर साधन रास्ता होता है और सिद्धि फल। यहाँ संग ही फल है।
इसके बाद दो उपमाएँ आती हैं जो आमने-सामने रखी गयी हैं। दुष्ट भी सत्संग पाकर सुधर जाता है, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। पर दैवयोग से कभी सज्जन कुसंग में पड़ जाये तो वह वहाँ भी साँप की मणि की तरह अपने ही गुण का अनुसरण करता है। मणि साँप के पास रहकर भी विष नहीं लेती और अपना प्रकाश नहीं छोड़ती। ध्यान दीजिये कि दोनों उपमाओं में बदलाव एक ही दिशा में होता है। लोहा सोना हो जाता है, पर मणि साँप नहीं होती। संग ऊपर उठा सकता है, नीचे नहीं खींच सकता, कम से कम उसे नहीं जिसका गुण सच्चा है।
फिर तुलसी हाथ खड़े कर देते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डित, सबकी वाणी संत की महिमा कहने में सकुचा जाती है; तो वह मुझसे कैसे कही जाये, जैसे साग बेचनेवाले से मणियों के गुण नहीं कहे जा सकते। उपमा में जो विनय है वह भी नपी हुई है। साग बेचनेवाला मूर्ख नहीं है, वह अपने माल का जानकार है; बस यह माल उसका नहीं है। और इसके बाद वह दोहा आता है जिसमें संत की वंदना अपने सबसे सुन्दर चित्र पर जाकर रुकती है।
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ।
दोहा ३ (क)
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क)॥
जिनका चित्त समान है, जिनका न कोई हितकारी है और न कोई अहितकारी, उन संतों को प्रणाम। और फिर वह उपमा: अञ्जलि में रखे हुए सुन्दर फूल दोनों हाथों को बराबर सुगन्धित कर देते हैं। टीका इस चित्र को और खोल देती है, कि एक हाथ ने फूल तोड़े और दूसरे ने उन्हें सँभाला, और गन्ध दोनों को एक-सी लगी। संत का समभाव यहाँ किसी सिद्धान्त की तरह नहीं, हथेली पर रखे फूल की तरह समझाया गया है। इसके बाद का आधा दोहा विनती का है, जिसमें तुलसी संत के सरल हृदय और जगत् के हित का स्वभाव जानकर अपनी बालबिनय सुनाते हैं और राम के चरणों में प्रीति माँगते हैं।
सार: सत्संग का फल तत्काल है और उसकी गवाही वाल्मीकि, नारद और अगस्त्य ने अपने मुँह से दी है। संग ऊपर उठाता है, नीचे नहीं खींचता, और संत का चित्त अञ्जलि के फूल की तरह दोनों हाथों को एक-सी गन्ध देता है।
और अब दुष्टों की वंदना
संत की वंदना जहाँ खत्म होती है, वहाँ से तुलसी सीधे दुष्टों की वंदना पर उतर आते हैं, और पहली ही पंक्ति में वह शब्द रख देते हैं जिससे पाठक का बचाव का रास्ता बन्द हो जाता है: सतिभाएँ, सच्चे भाव से। यह व्यंग्य की घोषणा नहीं है। वे सचमुच प्रणाम कर रहे हैं, और जिन्हें कर रहे हैं उनका परिचय साथ-साथ देते चलते हैं।
वे बिना किसी प्रयोजन के अपना भला करनेवाले के भी विरुद्ध चलते हैं। दूसरों के हित की हानि ही उनकी दृष्टि में लाभ है। किसी का उजड़ना उन्हें हर्ष देता है और किसी का बसना विषाद। फिर उपमाएँ आती हैं, और यहीं इस पूरे हिस्से की बनावट खुलती है। वे हरि और हर के यश रूपी पूर्णिमा के चन्द्रमा के लिये राहु हैं। दूसरों का काम बिगाड़ने में वे सहस्रबाहु जैसे वीर हैं। दूसरों के दोष वे हज़ार आँखों से देखते हैं। दूसरों के हित रूपी घी के लिये उनका मन मक्खी है, और टीका जोड़ती है कि मक्खी घी में गिरकर उसे बिगाड़ती है और स्वयं भी मर जाती है।
यह चौपाई पढ़कर पीछे मुड़िये तो संत का चित्र साफ़ हो जाता है। संत की पहचान थी, दूसरे के छिद्र ढक देना, और उसके लिये अपना कष्ट सह लेना। दुष्ट की पहचान है, दूसरे के दोष हज़ार आँखों से ढूँढ़ना और हज़ार मुँह से सुनाना। दोनों चित्र एक ही धुरी पर बने हैं, दूसरे के दोष का क्या किया जाये, और तुलसी ने उस धुरी के दोनों सिरे नाप दिये हैं। इसीलिये ये दोनों वंदनाएँ आमने-सामने रखी गयी हैं।
तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
चौपाई ४
उदय केत सम हित सब ही के । कुंभकरन सम सोवत नीके॥
यह चार उपमाओं की माला है और हर उपमा किसी बड़े की है। तेज में अग्नि, क्रोध में महिषवाहन यमराज, पाप और अवगुण रूपी धन में कुबेर। और चौथी सबसे नुकीली है: उनकी बढ़ती सबके हित के लिये केतु के उदय जैसी है, यानी पुच्छल तारे जैसी, जिसका दिखना ही अशुभ माना जाता है। इस पूरी वंदना में कोई गाली नहीं है। हर विशेषण स्तुति का विशेषण है और हर उपमा किसी देवता या वीर की है। तुलसी ने वंदना का ढाँचा पूरा का पूरा रख छोड़ा है और चोट उपमा के भीतर से की है।
और इसी चौपाई का अन्त वहाँ होता है जहाँ इस पूरे हिस्से की एकमात्र शुभकामना बैठी है: कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही उनकी भलाई है। जिस व्यक्ति का जागना सबका नुकसान हो, उसके लिये सबसे बड़ा आशीर्वाद नींद है। यह पंक्ति इतनी शान्त है कि उसका तीखापन देर से चुभता है।
इसके आगे जो चौपाइयाँ हैं, उनमें यह माला और लम्बी होती जाती है। जैसे ओले खेती नष्ट करके स्वयं भी गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरे का काम बिगाड़ने के लिये अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। फिर उन्हें शेष के समान मानकर प्रणाम किया जाता है, जो हज़ार मुँह से बड़े रोष के साथ पराये दोषों का वर्णन करते हैं। फिर राजा पृथु के समान, जिन्होंने भगवान् का यश सुनने के लिये दस हज़ार कान माँगे थे, क्योंकि इनके भी दस हज़ार कान हैं, बस दूसरों के पाप सुनने के लिये। और फिर इन्द्र के समान, और यहाँ टीका उस दोहरे अर्थ को खोलती है जिस पर पूरी उपमा टिकी है: इन्द्र को सुरानीक अर्थात् देवताओं की सेना प्यारी है, और इन्हें सुरा नीकी अर्थात् मदिरा भली लगती है। एक ही शब्द, दो तरह से टूटता हुआ।
फिर वह दोहा आता है जिसमें तुलसी हाथ जोड़ लेते हैं। दुष्टों की रीति यही है कि उदासीन हो, शत्रु हो या मित्र, वे किसी का भी हित सुनकर जल उठते हैं; यह जानकर यह जन दोनों हाथ जोड़कर प्रेम से उनसे विनती करता है। और विनती के तुरन्त बाद तुलसी स्वयं मान लेते हैं कि विनती का कोई फल नहीं होगा। उन्होंने अपनी ओर से निहोरा कर लिया है, पर वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे। कौओं को कितने ही प्रेम से पालिये, क्या वे कभी माँस छोड़ सकते हैं? वंदना पूरी विनम्रता से की गयी है और उसके ठीक बाद उसकी निरर्थकता भी दर्ज कर दी गयी है।
सार: दुष्टों की वंदना सच्चे भाव से की गयी है और उसका हर विशेषण स्तुति का विशेषण है। उनकी पहचान वही है जो संत की पहचान का उलटा है, दूसरे का दोष ढूँढ़ना और बाँटना, और उनके लिये एकमात्र शुभकामना यह है कि वे सोते रहें।
एक ही समुद्र, और उसकी दो उपज
अब वह चौपाई आती है जिससे इस पन्ने का सबसे बड़ा विचार खुलता है, और जिसमें दोनों पक्ष एक साथ बाँध दिये जाते हैं।
बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
चौपाई ५
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
दोनों के चरणों की वंदना, और कारण यह कि दोनों दुख देते हैं। यह वाक्य पहली बार पढ़ने पर उलटा लगता है, इसलिये तुलसी तुरन्त भेद बताते हैं, और भेद बहुत सूक्ष्म है। संत बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं। असंत मिलते समय दारुण दुख देते हैं। यानी दुख दोनों से मिलता है, पर एक से तब मिलता है जब वह जाता है और दूसरे से तब जब वह आता है। संत का दुख उसके अभाव में है, असंत का दुख उसकी उपस्थिति में। इसी एक भेद में दोनों के प्रति सारा व्यवहार तय हो जाता है।
उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
चौपाई ६
सुधा सुरा सम साधु असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू॥
पहली पंक्ति में दोनों एक साथ पैदा होते हैं, जैसे कमल और जोंक एक ही जल में उपजते हैं और फिर उनके गुण अलग हो जाते हैं। कमल देखने और छूने से सुख देता है, जोंक शरीर छूते ही रक्त चूसने लगती है। एक ही तालाब, दो उपज। दूसरी पंक्ति यही बात और बड़े पैमाने पर कहती है: साधु अमृत जैसा और असाधु मदिरा जैसी, और दोनों को पैदा करनेवाला जगत् रूपी अगाध समुद्र एक ही है।
यह उपमा संयोग से नहीं चुनी गयी। शास्त्र कहते हैं कि समुद्र मन्थन से अमृत भी निकला और मदिरा भी, दोनों उसी एक मन्थन से। तुलसी की बात यह है कि भला और बुरा दो अलग कारखानों से नहीं आते। संसार एक ही है और उसी में से दोनों उठते हैं, इसलिये किसी एक को संसार के बाहर की चीज़ मानकर हिसाब नहीं बैठाया जा सकता। जो वंदना कुछ पंक्तियाँ पहले चौंकाती थी, वह इस वाक्य के बाद समझ में आने लगती है।
इसके बाद की चौपाई कहती है कि भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुयश और अपयश की सम्पत्ति पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गङ्गा और साधु एक ओर; विष, अग्नि, कलियुग के पाप की नदी और हिंसा करनेवाला व्याध दूसरी ओर। इनके गुण और अवगुण सब जानते हैं। और फिर वह पंक्ति जो सारे हिसाब को मनुष्य के मन पर लौटा देती है: जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है। पहचानना एक बात है और चुनना दूसरी।
दोहा इसी को दो तराजुओं में तौलकर बन्द कर देता है। भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता ही लिये रहता है; अमृत की सराहना अमर करने में होती है और विष की मारने में। विष की सराहना, यह शब्द ध्यान खींचता है। विष की भी एक कीर्ति है, और वह उसके काम से बनी है, ठीक वैसे ही जैसे अमृत की।
सार: संत और असंत एक ही समुद्र से उठते हैं, जैसे अमृत और मदिरा एक ही मन्थन से। भेद उनके स्रोत में नहीं, उनके काम में है, और मनुष्य उन्हें पहचान तो सब लेते हैं, पर चुनते वही हैं जो भाता है।
हंस, जो दूध छाँट लेता है
दुष्टों के पाप और साधुओं के गुण, दोनों की कथाएँ अपार और अथाह समुद्र हैं। तुलसी कहते हैं कि उन्होंने कुछ गुण और दोष इसीलिये गिनाये, क्योंकि बिना पहचाने न कुछ ग्रहण किया जा सकता है और न छोड़ा। यह वाक्य पिछले सारे वर्णन का कारण बता देता है। खल की वंदना और संत की वंदना, दोनों एक ही काम कर रही थीं, पहचान कराना।
फिर वे कहते हैं कि भले और बुरे, दोनों विधाता के ही बनाये हुए हैं, और गुण-दोष विचारकर वेदों ने उन्हें अलग-अलग किया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि यह सृष्टि गुण और अवगुण से सनी हुई है। और इसके बाद तुलसी एक लम्बी सूची रखते हैं जिसमें दुख और सुख, पाप और पुण्य, दिन और रात, साधु और असाधु, दानव और देवता, ऊँच और नीच, अमृत और विष, माया और ब्रह्म, जीव और ईश्वर, रंक और राजा, काशी और मगध, गङ्गा और कर्मनाशा, मारवाड़ और मालवा, स्वर्ग और नरक, अनुराग और वैराग्य, सब जोड़े में रखे गये हैं। सृष्टि जोड़ों में बनी है, और वेद-शास्त्र ने उनके गुण और दोष का विभाग कर दिया है।
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
दोहा ६
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥ ६॥
जड़ और चेतन, सारा विश्व गुण-दोषमय रचा गया है। इसमें संत का काम है हंस का काम। हंस दूध और पानी मिले हुए में से दूध ले लेता है और पानी छोड़ देता है। ध्यान दीजिये कि यहाँ विश्व को सुधारने की बात नहीं है। दोष को हटाया नहीं जा रहा, दोष वहीं रहता है; बदलता केवल यह है कि कौन क्या उठाता है। सारे पन्ने का निष्कर्ष यही एक दोहा है।
आगे तुलसी इसी विवेक की सीमाएँ भी बता देते हैं, और दोनों ओर से। विधाता जब यह विवेक देते हैं तब मन दोष छोड़कर गुण में लगता है; पर काल, स्वभाव और कर्म की प्रबलता से भले लोग भी कभी भलाई से चूक जाते हैं, और भक्त उस चूक को सुधार लेते हैं। उधर दुष्ट भी अच्छा संग पाकर कभी-कभी भलाई कर बैठते हैं, पर उनका मलिन स्वभाव नहीं मिटता। फिर वेषधारी ठगों की बात आती है, जिन्हें अच्छे वेष के प्रताप से जगत् पूज लेता है, पर एक न एक दिन वे खुल जाते हैं और अन्त तक कपट नहीं निभता; और यहाँ तीन नाम गिनाये गये हैं, कालनेमि, रावण और राहु। इसका उलटा भी सच है: बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जगत् में जाम्बवान् और हनुमान् का हुआ।
और फिर संग का असर तीन चित्रों में दिखाया जाता है, जो इस पूरे प्रकरण के सबसे सुन्दर चित्र हैं। पवन के संग से धूल आकाश तक चढ़ जाती है और नीचे बहते जल के संग से वही धूल कीचड़ बन जाती है। साधु के घर के तोता-मैना राम-राम रटते हैं और असाधु के घर के गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं। और धुआँ, जो कुसंग में कालिख कहलाता है, वही अच्छे संग में सुन्दर स्याही बनकर पुराण लिखने के काम आता है, और वही जल, अग्नि और पवन के संग से बादल होकर जगत् को जीवन देता है। एक ही धुआँ, तीन नियति, और अन्तर केवल संग का है।
सार: विश्व गुण और दोष, दोनों का बना है, और संत उसे बदलते नहीं, उसमें से छाँट लेते हैं। बाकी सब संग तय करता है, यहाँ तक कि धुएँ की भी।
सबको राममय जानकर
अन्तिम दोहा चार हिस्सों में है और वह इस पन्ने को वहाँ ले जाता है जहाँ से लौटा नहीं जा सकता। पहले हिस्से में ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र, ये पाँच गिनाये जाते हैं, जो कुसंग और सुसंग पाकर बुरे और भले हो जाते हैं, और यह बात केवल सुलक्षण लोग देख पाते हैं। दूसरे हिस्से में एक ऐसी बात है जो केवल तुलसी कह सकते थे: महीने के दोनों पखवाड़ों में उजाला और अँधेरा बराबर ही रहता है, पर विधाता ने उनके नाम में भेद कर दिया, और जगत् ने एक को चन्द्रमा का बढ़ानेवाला और दूसरे को घटानेवाला समझकर एक को यश और दूसरे को अपयश दे दिया। सामग्री एक-सी है, नाम अलग हैं, और यश नाम के पीछे चला जाता है।
जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि।
दोहा ७ (ग)
बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि॥ ७ (ग)॥
और तीसरे हिस्से में सारा हिसाब बन्द हो जाता है। जगत् में जितने जड़ और चेतन जीव हैं, सबको राममय जानकर तुलसी सबके चरणकमलों की वंदना करते हैं, सदा, दोनों हाथ जोड़कर। जिस पन्ने पर इतनी देर तक गुण और दोष छाँटे गये, वही पन्ना यह कहकर समाप्त होता है कि छाँटने के बाद भी सब एक ही के हैं। संत की वंदना, दुष्ट की वंदना, अमृत और मदिरा, हंस और पानी, सब इसी एक पंक्ति में जाकर मिल जाते हैं।
चौथा हिस्सा सूची को और चौड़ा कर देता है, ताकि कोई बाहर न रह जाये। देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर और निशाचर, सबको प्रणाम, और सबसे एक ही माँग, कि अब सब कृपा करें। निशाचर भी उसी सूची में हैं जिसमें देवता हैं। जिस ग्रन्थ की कथा आगे चलकर एक निशाचर के वध पर जाकर ठहरेगी, उसका पहला पन्ना उसी जाति को हाथ जोड़कर विदा लेता है।
सार: गुण-दोष का सारा विभाग अन्त में एक वाक्य के नीचे आ जाता है, कि जड़ और चेतन सब राममय हैं, और वंदना उन सबकी है, देवता से निशाचर तक।
और अन्त में, अपनी ओर
इस पन्ने पर एक भी घटना नहीं है और फिर भी इसे छोड़कर आगे नहीं बढ़ा जा सकता, क्योंकि आगे जो कुछ पढ़ा जायेगा उसका पैमाना यहीं बनता है। जो पाठक यह जान लेता है कि इस ग्रन्थ के लेखक ने पहले अक्षर माँगे, फिर आँख माँगी, और तब कलम उठायी, वह आगे की हर चौपाई को थोड़ा और धीरे पढ़ता है।
यह भी ध्यान रखने की बात है कि इस पन्ने पर एक बार भी दशरथ, कौसल्या या अयोध्या का नाम नहीं आता। जिन नामों से लोग रामकथा को पहचानते हैं, उनमें से एक भी यहाँ नहीं है। जो नाम आते हैं, वे हैं वाल्मीकि और हनुमान, नारद और अगस्त्य, पृथु और इन्द्र, कालनेमि, रावण, राहु, कुम्भकर्ण और जाम्बवान्, और इनमें से आधे उपमा के रूप में आते हैं, कथा के रूप में नहीं। कथा अभी शुरू नहीं हुई है। यह उससे पहले का कमरा है।
और एक बात जो पूरे पन्ने पर फैली हुई है। तुलसी यहाँ कहीं भी अपने आपको ऊँचा नहीं बताते। वे गूँगे और लँगड़े की जगह खड़े होकर माँगते हैं। वे अपनी वाणी की तुलना उस साग बेचनेवाले से करते हैं जिसे मणि का दाम नहीं आता। वे अपनी प्रार्थना को बालबिनय कहते हैं। और यह दीनता किसी शिष्टाचार की तरह नहीं आती, वह उसी तर्क से निकलती है जो इसी पन्ने पर दिया गया है: जिसे देखना है, उसे पहले अञ्जन चाहिये, और अञ्जन किसी और के चरणों से आता है।
जिस ग्रन्थ को सदियों से घरों में बाँचा गया, उसका पहला पन्ना यह तय करता है कि वह किस तरह बाँचा जाये। वह पाठक से यह नहीं कहता कि सुनिये, एक राजा था। वह यह कहता है कि पहले आँख साफ़ कीजिये, फिर यह देखिये कि संसार गुण और दोष दोनों का बना है, फिर यह मानिये कि उसमें से छाँटना आपका काम है, और तब चलिये, कथा वहाँ खड़ी है।
और सबसे अन्त में वह पंक्ति रह जाती है जो सातवें श्लोक में आयी थी। यह पोथी किसी के आदेश से नहीं लिखी जा रही, किसी दरबार के लिये नहीं लिखी जा रही, किसी यश के लिये नहीं लिखी जा रही। यह अपने भीतर के सुख के लिये लिखी जा रही है, और वह भीतर वही जगह है जिसे दूसरे श्लोक में ईश्वर का आसन कहा गया था। जो आदमी अपने भीतर बैठे राम को प्रसन्न करने के लिये लिखने बैठा हो, उसे किसी और की स्वीकृति की ज़रूरत नहीं रहती, और शायद इसीलिये यह ग्रन्थ इतनी देर तक टिका।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा १ से ७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।