लुल्ला परिवारLULLA FAMILY, शुरुआतEnglish

मंगलाचरण, गुरु-वंदना और संत-असंत का भेद

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 1

वाणी और विनायक को इस ग्रन्थ का पहला प्रणाम। गुरु के चरणों की वह धूल जो आँख का अंजन बन जाती है। और वह वंदना जिसमें संत और दुष्ट, दोनों के चरण पकड़े जाते हैं।

रामचरितमानस किसी कथा से नहीं खुलता। न अयोध्या है, न कोई राजा, न कोई धनुष। जो पाठक राम के जन्म की प्रतीक्षा में पोथी खोलता है, उसे सबसे पहले अक्षरों की बात मिलती है। सात सोपानों तक चलनेवाला यह ग्रन्थ अपने आरम्भ में जिनके आगे हाथ जोड़ता है, वे अक्षरों के कर्ता हैं। कथा बाद में आयेगी। पहले उन्हें प्रणाम है जिनसे वह भाषा बनती है जिसमें कथा कही जायेगी।

इस द्वार पर पहले संस्कृत में वंदना है, फिर लोगों की भाषा में। इसमें कोई घटना नहीं घटती। यहाँ यह तय होता है कि यह ग्रन्थ किसके आगे सिर झुकाता है, और इसका कवि अपने को क्या समझता है। यहीं यह भी तय होता है कि वह संसार को किस चीज़ का बना मानता है, और यह पोथी किसके सुख के लिये लिख रहा है। स्वान्तःसुखाय वाली प्रसिद्ध बात भी यहीं है।

यह तुलसीदास का रामचरितमानस है, वाल्मीकि की रामायण नहीं। वंदना में कवीश्वर और कपीश्वर को भी प्रणाम है। उन्हें पोद्दार की टीका वाल्मीकि और हनुमान बताती है। तुलसी स्वयं कहते हैं कि यह कथा पुराणों, वेदों और शास्त्रों से सम्मत है, और रामायण में कही गयी है। वे यह भी कहते हैं कि कुछ कहीं और से भी ली गयी है।

वंदना में जिनके आगे सिर झुका

  • वाणी और विनायक अक्षर, अर्थ, रस, छन्द और मङ्गल के कर्ता, जिन्हें इस ग्रन्थ का पहला प्रणाम है।
  • पार्वती और शिव जिन्हें यहाँ श्रद्धा और विश्वास का रूप कहा गया है।
  • गुरु जिनके चरणों की धूल यहाँ बार-बार रूप बदलती है।
  • कवीश्वर और कपीश्वर सीता और राम के गुणों के वन में घूमनेवाले दो, जिन्हें टीका वाल्मीकि और हनुमान बताती है।
  • सीता जिन्हें पहले सृष्टि, पालन और संहार करनेवाली कहा गया है, और उसके बाद राम की प्रिया।
  • राम जिनकी माया के वश में ब्रह्मा से असुरों तक सब हैं, और जिनके चरण संसार-सागर की अकेली नाव हैं।
  • तुलसीदास जो अपने ग्रन्थ में अपना नाम तीसरे पुरुष में लिखते हैं।
  • संत और असंत जो एक ही समुद्र से निकलते हैं, और जिन दोनों के चरणों में यह ग्रन्थ झुकता है।

पहला प्रणाम, अक्षरों के कर्ताओं को

पहले जिन दो को पुकारा गया है, वे भाषा के देवता हैं, युद्ध या राज्य के नहीं।

उनकी वंदना में पाँच चीज़ें क्रम से गिनायी गयी हैं: वर्ण, अर्थ के समूह, रस, छन्द और मङ्गल। रचना इसी क्रम में बनती है। अक्षरों से अर्थ बँधता है, अर्थ से रस उठता है। रस को छन्द सँभालता है, और अन्त में मङ्गल आता है। तुलसी गिनती नीचे की सीढ़ी से शुरू करते हैं।

और जिन्हें प्रणाम किया जा रहा है, वे भी दो हैं, एक नहीं: सरस्वती, जो अक्षर देती हैं, और गणेश, जो रास्ते की अड़चन हटाते हैं। आगे भी यही ढंग चलता है: पार्वती और शिव, कवीश्वर और कपीश्वर। गुरु, सीता और राम को आगे अकेले-अकेले प्रणाम है। पर जोड़ी का यह ढंग पहले ही प्रणाम से शुरू हो जाता है। आगे संत और असंत के चरण भी एक साथ पकड़े जायेंगे।

जिन्हें यह पहला प्रणाम है, उन्हें मङ्गलों का कर्ता कहा गया है। अर्थात् मङ्गलाचरण का पहला प्रणाम उन्हीं को है जो मङ्गल को बनाते हैं।

श्रद्धा, विश्वास, और एक टेढ़ा चन्द्रमा

फिर तुलसी पार्वती और शिव को श्रद्धा और विश्वास का रूप कहते हैं, और इसका कारण भी बताते हैं।

उनके बिना सिद्ध भी, जिनकी साधना पूरी हो चुकी है, अपने ही भीतर बैठे ईश्वर को नहीं देख पाते। ईश्वर दूर नहीं है, उन्हीं के भीतर है। कमी श्रद्धा और विश्वास की है। यहाँ तुलसी ने ज्ञान के ऊपर भरोसे को रखा है। अपने भीतर की यह जगह संस्कृत वंदना के अन्त में फिर आयेगी।

फिर गुरु की वंदना है। उन्हें ज्ञानमय, नित्य और शिव का रूप कहा गया है। उनके पक्ष में चन्द्रमा का उदाहरण आता है, उसके दोष के साथ। टेढ़ा चन्द्रमा भी, जिनका आश्रय उसने लिया उनके कारण, सब जगह वंदित है। आश्रय उसे सीधा करके नहीं अपनाता, जैसा है वैसा ही उठा लेता है।

एक वन, एक नाव, और रस्सी में साँप

इसके बाद नाम नहीं, पदवी आती है: कवीश्वर और कपीश्वर, कवियों के ईश्वर और कपियों के ईश्वर। उन्हें पोद्दार की टीका वाल्मीकि और हनुमान बताती है। ये दोनों जिस पवित्र वन में घूमते हैं, वह सीता और राम के गुणों का समूह है। आगे रामचरित फिर ऐसी जगह की तरह आयेगा जिसमें उतरा जा सकता है, जब उसे खानों में दबी मणि और माणिक्य कहा जायेगा।

फिर सीता को प्रणाम है। उन्हें पहले उत्पत्ति, पालन और संहार करनेवाली कहा गया, फिर क्लेश हरनेवाली और सब कल्याण करनेवाली, और सबसे अन्त में राम की प्रिया। यहाँ प्रणाम का ढंग भी बदलता है। बाकी सबकी कवि वंदना करता है, सीता के आगे वह झुका हुआ है। और सीता का प्रणाम राम के प्रणाम से पहले आता है।

उसके बाद राम की वंदना है। पहले वह उनकी माया की पहुँच बताती है। सारा संसार, ब्रह्मा आदि देवता और असुर भी उसके वश में हैं। फिर रस्सी में साँप के भ्रम की उपमा आती है, और उसके साथ कारण, कि सारा जगत् उन्हीं की सत्ता से सच दिखता है। साँप है नहीं, पर दिखता है, क्योंकि नीचे रस्सी सचमुच पड़ी है। भ्रम को भी टिकने के लिये किसी सच्ची चीज़ की सत्ता चाहिये।

उनके चरणों को उन लोगों की अकेली नाव कहा गया है जो संसार-सागर पार करना चाहते हैं। चाहना पहले है। और उन्हें सब कारणों से परे कह लेने के बाद नाम आता है: राम कहानेवाले भगवान् हरि। राम का नाम इसी तरह आता है, सबसे आगे नहीं, बल्कि अन्त में, एक लम्बे परिचय के बाद।

स्वान्तःसुखाय: किसके सुख के लिये

संस्कृत वंदना के अन्त में तुलसी पहले स्रोत बताते हैं, फिर कारण।

स्रोत हैं अनेक पुराण, वेद, आगम शास्त्र, जो रामायण में कहा गया है, और कहीं-कहीं और से भी। तुलसी यह दावा नहीं करते कि सब एक ही पोथी से आया है। रामचरितमानस किसी एक ग्रन्थ का अनुवाद नहीं है, और उसका कवि यह बात यहीं खोल देता है।

कारण है स्वान्तःसुखाय, अपने अन्तःकरण का सुख। न यश के लिये, न किसी आश्रयदाता के लिये। यहीं अपने भीतर की वह जगह लौटती है जो पार्वती और शिव की वंदना में थी। वहाँ वह जगह थी जहाँ ईश्वर बैठा है। यहाँ वही जगह उस सुख की पात्र है जिसके लिये पोथी लिखी जा रही है।

यह बात संस्कृत में कही गयी है, पर यही बताती है कि आगे का सब संस्कृत में नहीं होगा। आगे की रचना लोगों की भाषा में है। उस युग में पवित्र कथा का घर संस्कृत था। तुलसी लोगों की बोली में राम की गाथा फैलाने चले हैं और उस रचना को बहुत सुन्दर कहते हैं। अपना नाम भी वे तीसरे पुरुष में लेते हैं। वे कहते हैं कि तुलसीदास यह कथा फैलाता है, जैसे अपने विषय में दूर खड़े होकर समाचार दे रहे हों।

लोगों की भाषा में पहली विनतियाँ

यहाँ से वंदना लोगों की भाषा में होने लगती है। पहली विनती गणेश से है, कि वे कृपा करें।

संस्कृत के पहले प्रणाम में भी गणेश थे। वहाँ उन्हें विनायक कहा गया था, यहाँ गणों के स्वामी और श्रेष्ठ हाथी के मुखवाले, जिनके स्मरण से सब काम सिद्ध होते हैं। वंदना पहले शास्त्र की भाषा में हुई, फिर लोगों की भाषा में, और आगे पूरा ग्रन्थ इसी दूसरी भाषा में चलेगा।

फिर तुलसी अपने लिये माँगते हैं।

माँग यह है कि गूँगा बोलने लगे और लँगड़ा दुर्गम पहाड़ पर चढ़ जाये। पहाड़ छोटा करने की माँग नहीं है, लँगड़े को चढ़ा देने की माँग है। जो आदमी एक लम्बी कथा उस भाषा में लिखने बैठा है जिसमें अब तक शास्त्र नहीं लिखे जाते थे, वह अपने लिये यही माँग सकता है। जिनसे माँगा जा रहा है, उन्हें कलियुग का सारा मैल जलानेवाला कहा गया है।

इसके बाद नील कमल जैसे श्याम, खिले लाल कमल जैसी आँखोंवाले और क्षीरसागर में सोनेवाले से विनती है कि वे हृदय में घर बना लें। उसके बाद कुन्द और चन्द्रमा जैसे गोरे, पार्वती के प्रिय, करुणा के घर और कामदेव का मर्दन करनेवाले शिव से कृपा की विनती है। दोनों विनतियों में पहले रूप है, फिर गुण, फिर माँग।

आखिर में गुरु के चरणकमलों की वंदना है।

संस्कृत वंदना में गुरु तीसरे थे, यहाँ आखिरी हैं। और इसके बाद की वंदना भी गुरु के चरणों से ही शुरू होती है। यानी विनतियाँ जहाँ छूटती हैं और आगे की वंदना शुरू होती है, ठीक उसी सीवन पर गुरु खड़े हैं, और दोनों ओर से उन्हीं का चरण पकड़ा गया है।

यहाँ गुरु को मनुष्य के रूप में हरि कहा गया है, और उनके वचनों को सूर्य की किरणें, जो महामोह का घना अँधेरा काटती हैं। किरण का काम दिखाना है, और आगे का सारा हिस्सा आँख के विषय में है।

चरणों की धूल, जो आँख का अंजन बन जाती है

अब तुलसी गुरु के चरणों की धूल की वंदना करते हैं।

पहले वह धूल पराग है, जिसमें सुरुचि, सुगन्ध और सरस अनुराग है। फिर वह अमर मूल का चूर्ण है, जो संसार के रोगों के पूरे परिवार को शान्त करता है। उसके बाद वह पुण्यात्मा के शरीर पर शिव की निर्मल विभूति है, कल्याण और आनन्द की जननी। फिर वह भक्त के मन रूपी दर्पण का मैल पोंछती है, और तिलक की तरह लगा ली जाये तो गुणों के समूह को वश में कर लेती है। एक ही धूल, और इतने काम।

इसके बाद गुरु के चरण-नखों की ज्योति आती है, जो मणियों के प्रकाश जैसी है। उसका स्मरण करते ही हृदय में दिव्य दृष्टि पैदा होती है। उस ज्योति के हृदय में आते ही निर्मल नेत्र खुल जाते हैं, संसार रूपी रात के दोष और दुख मिटते हैं। रामचरित की मणि और माणिक्य दिखने लगते हैं, गुप्त और प्रकट, जो जिस खान में पड़ा है।

गुरु की कृपा से यहाँ ज्ञान नहीं, आँख मिलती है। उस आँख से जो दिखता है वह कथा है, खानों में दबे रत्नों की तरह, कहीं ढकी और कहीं खुली। फिर एक उपमा यही बात पूरी करती है।

सिद्धाञ्जन आँख में लगाकर साधक और सिद्ध पहाड़ों, वनों और धरती के भीतर की खानें खेल-खेल में देख लेते हैं। यह वह पुराना अञ्जन है जिससे ज़मीन में गड़ा धन दिख जाता है। पर यहाँ अञ्जन अभी उपमा है। गुरु के चरणों की धूल को अञ्जन ठीक इसके बाद कहा जाता है। वहीं वह क्रम पूरा होता है। वह धूल पहले पराग थी, फिर चूर्ण, फिर विभूति, फिर तिलक, और अन्त में अञ्जन। ये सब रूप उसी रज के हैं, और उनमें से आखिरी आँख पर लगता है।

उसी अञ्जन से विवेक के नेत्र निर्मल करके तुलसी रामचरित का वर्णन करते हैं। धूल, दवा, राख, तिलक और काजल, ये सब इसीलिये गिनाये गये थे कि कवि आँख साफ़ करके कलम उठा सके। जिस चरित का वर्णन होने जा रहा है, उसे संसार के बन्धन से छुड़ानेवाला कहा गया है।

एक तीर्थराज जो चलता-फिरता है

गुरु के बाद ब्राह्मणों की वंदना है, जिन्हें पृथ्वी के देवता कहा गया है, जो अज्ञान से उपजे सब संदेह हर लेते हैं। फिर तुलसी संत-समाज की ओर मुड़ते हैं, जिसे सब गुणों की खान कहा गया है।

संत के लिये उपमा है कपास। उसका फल नीरस, विशद और गुणमय है। टीका के अनुसार वह विषयों के रस से खाली, उजला, और धागों से भरा है, क्योंकि गुण का दूसरा अर्थ धागा है। कपास ओटा, काता और बुना जाकर कष्ट सहता है, और उसका धागा सूई के किये छेद को अपना शरीर देकर ढक देता है। वैसे ही संत स्वयं दुख सहकर दूसरों के छिद्र ढकता है, और इसीलिये जगत् में उसका यश वंदनीय हुआ। संत की पहचान यहाँ यही है कि वह दूसरे का दोष ढक देता है। थोड़ा आगे दुष्ट की पहचान ठीक इसकी उलटी होगी।

इसके बाद तुलसी एक बड़ा रूपक खड़ा करते हैं। संत-समाज जगत् का चलता-फिरता तीर्थराज, यानी प्रयाग है। रामभक्ति गङ्गा की धारा है, ब्रह्मविचार का प्रचार सरस्वती, और विधि और निषेधवाले कर्मों की कथा, जो कलियुग के पाप हरती है, यमुना। विष्णु और शिव की कथाएँ त्रिवेणी हैं, अपने धर्म में अटल विश्वास अक्षयवट, और शुभ कर्म उस तीर्थराज का समाज।

यह तीर्थराज सब देशों में, सब दिनों में, सबको सहज मिल जाता है, और आदर से सेवा करने पर क्लेश मिटा देता है। असली प्रयाग तक जाना पड़ता है। यह साथ चलता है, और उसी दिन काम करने लगता है जिस दिन कोई किसी भले आदमी के पास बैठ जाये।

यह तीर्थराज अकथनीय और अलौकिक है, तत्काल फल देता है, और उसका प्रभाव प्रत्यक्ष है। तुलसी बताते हैं कि वह फल क्या है।

जो प्रसन्न मन से इसका प्रभाव सुनते और समझते हैं और प्रेम से इसमें डुबकी लगाते हैं, वे चारों फल पा जाते हैं। और वह भी इसी शरीर के रहते।

जिस स्नान से कौआ कोयल हो जाता है

इस तीर्थ में नहाकर कौए कोयल हो जाते हैं और बगुले हंस। तुलसी उसी साँस में जोड़ते हैं कि यह सुनकर कोई आश्चर्य न करे, क्योंकि सत्संग की महिमा छिपी नहीं है।

गवाह भी हैं: वाल्मीकि, नारद और घटयोनि अगस्त्य, तीनों ने अपनी बीती अपने मुँह से कही है। फिर दायरा फैलता है: जल, थल और आकाश के जितने जड़ और चेतन जीव हैं। उनमें से जिसने जब, जहाँ, जिस यत्न से बुद्धि, कीर्ति, सद्गति, ऐश्वर्य और भलाई पायी, वह सब सत्संग का प्रभाव है। लोक और वेद में इसका दूसरा उपाय नहीं।

फिर एक घेरा बनता है। सत्संग के बिना विवेक नहीं होता, और राम की कृपा के बिना सत्संग सहज नहीं मिलता। और उसके बाद एक उलटफेर। सत्संग की सिद्धि ही फल है, और बाकी सब साधन फूल। आमतौर पर साधन रास्ता होता है और सिद्धि फल। यहाँ संग ही फल है।

दुष्ट भी सत्संग पाकर सुधर जाता है, जैसे पारस छूकर लोहा सोना हो जाता है। पर दैवयोग से सज्जन कुसंग में पड़ जाये तो वह साँप की मणि की तरह अपने ही गुण पर चलता है। मणि साँप के पास रहकर भी विष नहीं लेती। यहाँ संग दुष्ट को ऊपर उठा लेता है, पर जिसका गुण सच्चा है उसे नीचे नहीं खींच पाता।

फिर तुलसी कहते हैं कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डित, सबकी वाणी संत की महिमा कहने में सकुचाती है। तो उनसे वह कैसे कही जाये, जैसे साग बेचनेवाले से मणियों के गुण नहीं कहे जाते। संत की वंदना एक और प्रणाम पर जाकर रुकती है।

जिनका चित्त सम है, जिनका न कोई हितकारी है न अहितकारी, उन संतों को प्रणाम, जैसे अञ्जलि में रखे सुन्दर फूल दोनों हाथों को एक-सी सुगन्ध देते हैं। टीका जोड़ती है कि एक हाथ ने फूल तोड़े और दूसरे ने सँभाले, और गन्ध दोनों को एक-सी मिली। फिर तुलसी संतों का सरल हृदय और जगत् का हित करनेवाला स्वभाव जानकर अपनी बालक जैसी विनती सुनाते हैं, और राम के चरणों में प्रीति माँगते हैं।

और अब दुष्टों की वंदना

संतों के बाद तुलसी दुष्टों की वंदना करते हैं, और शुरू में ही कहते हैं कि यह वंदना सच्चे भाव से है। यह व्यंग्य की घोषणा नहीं है। प्रणाम सच्चा है, और जिन्हें प्रणाम है उनका परिचय साथ-साथ चलता है।

वे बिना किसी प्रयोजन के अपना भला करनेवाले के भी विरुद्ध चलते हैं। दूसरों की हानि उनकी दृष्टि में लाभ है। किसी का उजड़ना उन्हें हर्ष देता है और किसी का बसना विषाद। वे विष्णु और शिव के यश रूपी पूर्णिमा के चन्द्रमा के लिये राहु हैं। दूसरों का काम बिगाड़ने में वे सहस्रबाहु जैसे वीर हैं। वे दूसरों के दोष हज़ार आँखों से देखते हैं, और दूसरों के हित रूपी घी के लिये उनका मन मक्खी है। टीका जोड़ती है कि मक्खी घी में गिरकर उसे बिगाड़ती है और स्वयं भी मर जाती है।

यह पाँच उपमाओं की माला है। तेज में वे अग्नि हैं, क्रोध में यमराज, पाप और अवगुण के धन में कुबेर। उनकी बढ़ती सबके हित के लिये केतु, पुच्छल तारे, के उदय जैसी है। उसका दिखना ही अशुभ माना जाता है। इस पूरी वंदना में कोई गाली नहीं है। ज़्यादातर विशेषण स्तुति के ढंग के हैं और ज़्यादातर उपमाएँ किसी देवता, ग्रह या वीर की हैं। चोट उपमा के भीतर से की गयी है।

और इसी माला के अन्त में इस हिस्से की एकमात्र शुभकामना है: कुम्भकर्ण की तरह सोते रहने में ही उनकी भलाई है। जिसका जागना सबका नुकसान हो, उसके लिये सबसे बड़ा आशीर्वाद नींद है।

माला आगे और लम्बी होती है। जैसे ओले खेती नष्ट करके स्वयं गल जाते हैं, वैसे ही वे दूसरे का काम बिगाड़ने के लिये अपना शरीर तक छोड़ देते हैं। उन्हें शेष के समान प्रणाम है, जो हज़ार मुँह से बड़े रोष के साथ पराये दोष कहते हैं। राजा पृथु ने भगवान् का यश सुनने के लिये दस हज़ार कान माँगे थे। उनके समान भी, क्योंकि इनके भी दस हज़ार कान हैं, पर दूसरों के पाप सुनने के लिये। और इन्द्र के समान भी। यहाँ टीका दोहरा अर्थ खोलती है: इन्द्र को सुरानीक, अर्थात् देवताओं की सेना, प्यारी है, और इन्हें सुरा नीकी, अर्थात् मदिरा भली लगती है।

फिर तुलसी हाथ जोड़ लेते हैं। दुष्टों की रीति है कि उदासीन हो, शत्रु हो या मित्र, वे किसी का भी हित सुनकर जल उठते हैं। यह जानकर यह जन दोनों हाथ जोड़कर प्रेम से उनसे विनती करता है। और विनती के तुरन्त बाद तुलसी मान लेते हैं कि उसका कोई फल नहीं होगा। उन्होंने अपनी ओर से निहोरा कर लिया है, पर वे अपनी ओर से कभी नहीं चूकेंगे। कौओं को कितने ही प्रेम से पालिये, क्या वे कभी माँस छोड़ सकते हैं?

एक ही समुद्र, और उसकी दो उपज

अब तुलसी दोनों पक्षों को एक साथ बाँध देते हैं।

दोनों के चरणों की वंदना, क्योंकि दोनों दुख देते हैं। संत बिछुड़ते समय प्राण हर लेते हैं, और असंत मिलते समय दारुण दुख देते हैं। यानी संत का दुख उसके जाने में है, और असंत का उसके आने में।

दोनों एक साथ पैदा होते हैं, जैसे कमल और जोंक एक ही जल में उपजते हैं और फिर उनके गुण अलग हो जाते हैं। कमल देखने और छूने से सुख देता है, जोंक शरीर छूते ही रक्त चूसने लगती है। साधु अमृत जैसा है और असाधु मदिरा जैसा, और दोनों को पैदा करनेवाला जगत् रूपी अगाध समुद्र एक ही है।

टीका जोड़ती है कि शास्त्रों में समुद्र-मन्थन से अमृत भी निकला और मदिरा भी। तुलसी की बात यह है कि भला और बुरा दो अलग जगहों से नहीं आते, एक ही संसार से उठते हैं। जो वंदना थोड़ा पहले चौंकाती थी, वह इसके बाद समझ में आने लगती है।

भले और बुरे अपनी-अपनी करनी के अनुसार सुयश और अपयश पाते हैं। अमृत, चन्द्रमा, गङ्गा और साधु एक ओर हैं। विष, अग्नि, कलियुग के पाप की नदी और हिंसा करनेवाला व्याध दूसरी ओर। इनके गुण और अवगुण सब जानते हैं, पर जिसे जो भाता है, उसे वही अच्छा लगता है। पहचानना एक बात है और चुनना दूसरी।

तुलसी कहते हैं कि भला भलाई ही ग्रहण करता है और नीच नीचता ही लिये रहता है। अमृत की सराहना अमर करने में होती है, विष की मारने में।

हंस, जो दूध छाँट लेता है

दुष्टों के पाप और साधुओं के गुण, दोनों की कथाएँ अपार और अथाह समुद्र हैं। तुलसी कहते हैं कि उन्होंने कुछ गुण और दोष इसीलिये गिनाये कि बिना पहचाने न कुछ ग्रहण किया जा सकता है और न छोड़ा। दोनों वंदनाएँ एक ही काम कर रही थीं, पहचान कराना।

भले और बुरे, दोनों विधाता के बनाये हैं, और वेदों ने गुण-दोष विचारकर उन्हें अलग-अलग किया है। वेद, इतिहास और पुराण कहते हैं कि यह सृष्टि गुण और अवगुण से सनी हुई है। फिर जोड़ों की एक लम्बी सूची आती है: दुख और सुख, पाप और पुण्य, दिन और रात, साधु और असाधु, सुजाति और कुजाति, दानव और देवता। ऊँच और नीच, अमृत और विष, सुन्दर जीवन और मृत्यु, माया और ब्रह्म, जीव और ईश्वर, सम्पत्ति और दरिद्रता, रंक और राजा। काशी और मगध, गङ्गा और कर्मनाशा, मारवाड़ और मालवा, ब्राह्मण और कसाई, स्वर्ग और नरक, अनुराग और वैराग्य।

जड़ और चेतन, सारा विश्व गुण-दोषमय रचा गया है। संत हंस की तरह दूध और पानी मिले हुए में से दूध ले लेते हैं और पानी छोड़ देते हैं। विश्व को सुधारने की बात यहाँ नहीं है। दोष वहीं रहता है। बदलता केवल यह है कि कौन क्या उठाता है। पूरी वंदना का निष्कर्ष यही है।

आगे तुलसी इस विवेक की सीमाएँ भी बताते हैं। विधाता जब यह विवेक देते हैं तब मन दोष छोड़कर गुण में लगता है। पर काल, स्वभाव और कर्म के ज़ोर से भले लोग भी कभी भलाई से चूक जाते हैं। भक्त उस चूक को सुधार लेते हैं। दुष्ट भी अच्छा संग पाकर कभी भलाई कर बैठते हैं, पर उनका मलिन स्वभाव नहीं मिटता। अच्छा वेष बनाये ठगों को जगत् पूज लेता है। पर वे एक न एक दिन खुल जाते हैं, और कपट अन्त तक नहीं निभता, जैसे कालनेमि, रावण और राहु का नहीं निभा। और बुरा वेष बना लेने पर भी साधु का सम्मान ही होता है, जैसे जाम्बवान् और हनुमान का हुआ।

फिर संग का असर तीन चित्रों में। पवन के संग से धूल आकाश तक चढ़ जाती है, और नीचे बहते जल के संग से वही धूल कीचड़ बन जाती है। साधु के घर के तोता-मैना राम-राम रटते हैं, और असाधु के घर के गिन-गिनकर गालियाँ देते हैं। धुआँ कुसंग में कालिख कहलाता है। अच्छे संग में वह स्याही बनकर पुराण लिखने के काम आता है। जल, अग्नि और पवन के संग से वह बादल होकर जगत् को जीवन देता है। एक ही धुआँ, और अन्तर केवल संग का।

सबको राममय जानकर

वंदना के अन्त में पहले यह बात आती है कि ग्रह, औषधि, जल, वायु और वस्त्र कुसंग और सुसंग पाकर बुरे और भले हो जाते हैं। यह बात सुलक्षण लोग ही देख पाते हैं। फिर महीने के दोनों पखवाड़ों में उजाला और अँधेरा बराबर है। पर विधाता ने उनके नाम में भेद कर दिया। जगत् ने एक को चन्द्रमा बढ़ानेवाला और दूसरे को घटानेवाला माना, और एक को यश दे दिया और दूसरे को अपयश।

इसके बाद जगत् के सब जड़ और चेतन जीवों को राममय जानकर तुलसी सदा, दोनों हाथ जोड़कर, सबके चरणकमलों की वंदना करते हैं। इतनी देर तक जो गुण और दोष छाँटे गये, वे छाँटने के बाद भी एक ही के ठहरते हैं।

आखिर में सूची और चौड़ी होती है, ताकि कोई बाहर न रह जाये: देवता, दैत्य, मनुष्य, नाग, पक्षी, प्रेत, पितर, गन्धर्व, किन्नर और निशाचर, सबको प्रणाम। और सबसे एक ही माँग, कि अब सब कृपा करें। जिस ग्रन्थ की कथा आगे चलकर एक निशाचर के वध तक पहुँचेगी, उसकी वंदना का पहला दौर निशाचरों के आगे भी हाथ जोड़कर पूरा होता है।

कथा से पहले का कमरा

इस वंदना में एक भी घटना नहीं है, फिर भी आगे की पूरी कथा का पैमाना यहीं बनता है। इस ग्रन्थ के लेखक ने पहले अक्षरों के कर्ताओं को प्रणाम किया, फिर गुरु के चरणों की धूल से आँख निर्मल की, और तब कलम उठायी। जो पाठक यह जान लेता है, वह आगे की कथा थोड़ा और धीरे पढ़ता है।

पूरी वंदना में दशरथ, कौसल्या या अयोध्या का नाम एक बार भी नहीं आता। सीता और राम के नाम वंदना में आते हैं, कथा में नहीं। बाकी जो नाम आते हैं, उनमें हैं वाल्मीकि और हनुमान, नारद और अगस्त्य, पृथु और इन्द्र, कालनेमि, रावण, राहु, कुम्भकर्ण और जाम्बवान्। इनमें से चार उपमा के रूप में आते हैं और बाकी गवाह या उदाहरण बनकर। कथा के रूप में कोई नहीं। कथा अभी शुरू नहीं हुई है। यह उससे पहले का कमरा है।

तुलसी यहाँ कहीं अपने को ऊँचा नहीं बताते। वे गूँगे और लँगड़े की जगह खड़े होकर माँगते हैं। अपनी वाणी को वे उस साग बेचनेवाले जैसा बताते हैं जिससे मणि के गुण नहीं कहे जाते। अपनी प्रार्थना को वे बालक की विनती कहते हैं। यह दीनता गुरु-वंदना के तर्क से निकलती है। जिसे देखना है, उसे पहले अञ्जन चाहिये, और अञ्जन किसी और के चरणों से आता है।

और अन्त में तुलसी की वह बात रह जाती है। यह पोथी किसी के आदेश से, किसी दरबार या यश के लिये नहीं, अपने भीतर के सुख के लिये लिखी जा रही है। वह भीतर वही जगह है जिसे पार्वती और शिव की वंदना में ईश्वर का आसन कहा गया था।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 1 से 7, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।