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राम का बरवेष, परछन और समधियों का मिलन

रामचरितमानस · बालकाण्ड · राम का बरवेष, परछन और समधियों का मिलन

राम का बरवेष, परछन और समधियों का मिलन

हेमन्त की गोधूलि में चली बारात, राम के रूप पर रीझे देवता, सुनयना का परछन और जनक के अपने हाथों रखा गया आसन।

जनकपुर में कुछ दिन ऐसे बीते हैं कि नगरवासियों और बरातियों, दोनों के मन आनन्द से भरे हैं। चारों भाइयों को देखकर स्वयंवर में आये राजाओं ने भी सुख पाया। अब विवाह की घड़ी निकट है। सुहावना अगहन है, हेमन्त ऋतु है, और जिस लग्न की गणना जनक के ज्योतिषियों ने की है, वही ब्रह्मा के विचार से भी सिद्ध हुई है। इस तैयारी के बीच गोधूलि आती है और बारात को बुलाने का समय हो जाता है।

दूलह के स्वागत में नगर और आकाश एक साथ उमड़ेंगे। देवता जनकपुर की सजावट देखकर विस्मित होंगे, शिव उन्हें स्मरण करायेंगे कि यह सीता और राम का विवाह है, और फिर सबकी आँखें वर के रूप पर ठहर जायेंगी। रानी के हाथों आरती होगी, मण्डप में राम को आसन मिलेगा, और स्वागत का आनन्द समधियों के प्रेमपूर्ण मिलन तक पहुँचेगा। तुलसी इस उत्सव में घोड़े की लगाम से लेकर माँ के नेत्रों में रुके जल तक, हर ओर दृष्टि ले जाते हैं।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम विवाह के मंगल आभूषणों से सजे वर, जिनके दर्शन में देवता और मनुष्य आनन्द पा रहे हैं।
  • सीता जिनके विवाह के लिये जनकपुर सजा है और जिनका नाम लेकर शिव देवताओं को समझाते हैं।
  • जनक और दशरथ दोनों महाराज, जिनके भाग्य, वैभव और समधियाने की समानता पर देवता प्रसन्न हैं।
  • सुनयना सीता की माता, जिन्हें पोद्दार की टीका इस नाम से पहचानती है और जो राम का परछन करती हैं।
  • शतानन्द जनक के पुरोहित, जो विवाह की वेला आने पर मन्त्रियों से मंगल सामग्री मँगाते हैं।
  • शिव और पार्वती राम का नख से शिख तक रूप देखकर पुलकित और सजल नेत्र होनेवाले देवदम्पति।
  • वसिष्ठ और विश्वामित्र मण्डप में जनक के हाथों अत्यन्त आदर और प्रेम से पूजे जानेवाले मुनि।

हेमन्त की वह गोधूलि

मनोरथ करते हुए स्त्रियों के हृदय उमंग से भर रहे हैं। उसी आनन्द में वे राजा भी सम्मिलित हैं जो सीता के स्वयंवर में आये थे। चारों भाइयों को देखकर उन्हें सुख मिला है। वे श्रीराम का निर्मल और विशाल यश कहते हुए अपने अपने भवनों को लौटते हैं। उनके जाने में प्रशंसा है, और पीछे रह गये जनकपुर में प्रसन्नता बनी हुई है। बरातियों का भी वही हाल है। तुलसी कुछ दिनों को इसी एक सुख में बीत जाने देते हैं। नगर और जनवासा, दोनों अब उस मंगल घड़ी की प्रतीक्षा में हैं जिसके लिये यह पूरा समागम हुआ है।

मंगल मूल लगन दिनु आवा । हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥
ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू । लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥

चौपाई १

विवाह का दिन आ गया। ऋतु हेमन्त है, महीना अगहन। तुलसी इस दिन को मंगल का मूल कहते हैं, और इसके साथ ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग तथा वार, सभी के श्रेष्ठ होने का उल्लेख करते हैं। उस सुहावने समय में ब्रह्मा स्वयं लग्न का शोध करके विचार करते हैं। जिस विवाह को देखने वे आनेवाले हैं, उसके मुहूर्त की गणना भी उनके ध्यान में है। पृथ्वी पर जनक के ज्योतिषी अपना काम कर चुके हैं। विवाह की तैयारी में उनका परिश्रम और ब्रह्मा का विचार अब एक ही घड़ी पर आकर मिलते हैं।

ब्रह्मा वही लग्न नारद के हाथ भेज देते हैं। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि यह लग्नपत्रिका जनक के यहाँ भेजी गयी है। यहाँ के ज्योतिषियों ने जो गणना की थी, वह उससे मेल खाती है। यह बात फैलती है तो लोगों के मुँह से अपने ज्योतिषियों के लिये बड़ी आत्मीय प्रशंसा निकलती है। वे कहने लगते हैं कि यहाँ के ज्योतिषी भी ब्रह्मा ही हैं। इतनी ऊँची प्रशंसा के भीतर नगर का उल्लास सुनाई देता है। अपने यहाँ निश्चित हुआ समय स्वयं ब्रह्मा के भेजे समय से मिल गया है, और लोगों को उस मिलान में अपने उत्सव का और भरोसा मिलता है।

धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल।
बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥ ३१२॥

दोहा ३१२

अब गोधूलि की निर्मल वेला आती है। आकाश के विषय में हुई गणना के बाद कथा उस समय पर पहुँचती है जिसे नगर के लोग अपने दिन में पहचानते हैं। यह सुन्दर मंगलों का मूल समय है, शकुन अनुकूल हो रहे हैं। ब्राह्मण इस अनुकूलता को जानकर जनक से कहते हैं। थोड़ी देर पहले तक लग्न विचार में था, अब उसके अनुसार उठने और चलने की घड़ी है। राजा तक समाचार पहुँचते ही तैयारी को गति मिलेगी। इसीलिये दोहे के अन्त में ब्राह्मणों का जनक से कहना रखा गया है। मंगल का समय आया है और उसे पहचाननेवालों ने गृहस्वामी को सावधान कर दिया है।

इस आरम्भ में समय के दो रूप साथ दिखाई देते हैं। कुछ दिन आनन्द में बीतते हैं, जिनकी कोई अलग गिनती नहीं दी गयी। फिर एक विशेष वेला आती है, जिसे पहचानते ही सबको अपना काम सँभालना है। उत्सव की प्रसन्नता पूरे नगर में फैली हुई है, पर बारात बुलाने का निर्णय इसी गोधूलि में होता है। जनक की ओर से अगला वचन इसलिए बहुत छोटा और बहुत सीधा होगा। जब शुभ समय आ चुका, तो अब विलम्ब का कारण क्या है।

चारों भाइयों का दर्शन पाकर राजा राम का यश कहते हुए लौटते हैं। कुछ दिन आनन्द में बीतने पर हेमन्त और अगहन में विवाह का दिन आता है। ब्रह्मा नारद के हाथ वही लग्न भेजते हैं जो जनक के ज्योतिषियों ने निकाला है, और गोधूलि आने पर ब्राह्मण जनक को सूचना देते हैं।

जनवासे से उठती बारात

जनक अपने पुरोहित से कहते हैं कि अब देर करने का क्या कारण है। प्रश्न सुनकर शतानन्द मन्त्रियों को बुलाते हैं। वे सब मंगल का सामान सजाकर ले आते हैं। राजाज्ञा, पुरोहित का निर्देश और मन्त्रियों की तैयारी, तीनों का क्रम स्पष्ट है। किसी को समझाने के लिये लम्बी बातचीत नहीं करनी पड़ती। जो समय सबकी प्रतीक्षा में था, उसके आ जाने की सूचना ही पर्याप्त है। अब जनवासे तक निमन्त्रण पहुँचाना है, और उस निमन्त्रण के साथ पूरे उत्सव की ध्वनि भी चलती है।

शंख बजते हैं, नगाड़े और ढोल बजते हैं, अनेक बाजों का स्वर उठता है। मंगल कलश सजाये जाते हैं। शुभ शकुन की वस्तुओं में पोद्दार की टीका दधि और दूर्वा का भी उल्लेख करती है। सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं। इस तैयारी में हाथ, कण्ठ और वाद्य, सभी लगे हैं। कोई मंगल सामग्री सँवारता है, कोई गीत गाता है, कोई वेदपाठ करता है। बारात को लेने जानेवाला समाज अपने साथ इन्हीं विविध ध्वनियों और सजे हुए मंगल द्रव्यों का आदर लेकर चलता है।

सब लोग बरातियों के जनवासे पहुँचते हैं। वहाँ दशरथ का समाज और वैभव देखकर उनकी दृष्टि ठहर जाती है। अवधपति का यह आयोजन ऐसा लगता है कि देवराज इन्द्र भी उसके सामने बहुत छोटे जान पड़ते हैं। वे जिस राजा को लेने आये हैं, उसका सौभाग्य स्वागत करनेवालों को भी विस्मित करता है। फिर विनती रखी जाती है, समय हो गया है, अब पधारिये। यही आग्रह चलते उत्सव को जनवासे से मण्डप की ओर मोड़ देता है। यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ती है।

दशरथ पहले गुरु से पूछते हैं। टीका गुरु का नाम वसिष्ठ बताती है। फिर कुल की सब रीतियाँ की जाती हैं और राजा मुनियों तथा साधुओं का समाज साथ लेकर चलते हैं। उनके प्रस्थान में उत्साह के साथ रीति का पालन भी है। बाहर से बुलावा आ चुका है, बाजे उठ चुके हैं, फिर भी गुरु से पूछना और कुलाचार करना इसी प्रस्थान के अंग बने रहते हैं। पवित्र संगति को साथ लिये अवधपति आगे बढ़ते हैं। नगर से आया आदर अब चलती हुई बारात में उत्तर पाता है।

भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि।
लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥ ३१३॥

दोहा ३१३

दशरथ के भाग्य और वैभव पर ब्रह्मा आदि देवता हजारों मुखों से सराहना करते हैं। वे अपना जन्म व्यर्थ जानने लगते हैं। यह देवताओं की उस क्षण की अनुभूति है, जब एक पिता का सौभाग्य उनके सामने प्रत्यक्ष है। जनवासे में आये लोगों को पहले इन्द्र छोटे लगे थे। अब स्वयं देवता राजा को देखकर अपने जीवन का हिसाब लगा रहे हैं। तुलसी की दृष्टि बारात के बाहरी विस्तार से होती हुई उस पिता तक पहुँचती है जिसके साथ राम विवाह के लिये चल रहे हैं। उसी को देखकर इस सराहना का इतना विस्तार होता है।

जनक के कहने पर शतानन्द मंगल सामग्री मँगाते हैं। गीत, वेदध्वनि और बाजों के साथ निमन्त्रण जनवासे पहुँचता है। दशरथ गुरु से पूछकर, कुलाचार पूरा करके और मुनियों तथा साधुओं को साथ लेकर चलते हैं। ब्रह्मा आदि देवता उनका भाग्य और वैभव सराहते हैं।

देवताओं को शिव का स्मरण

देवगण भी इस सुन्दर मंगल अवसर को पहचान चुके हैं। वे नगाड़े बजाकर फूल बरसाते हैं। शिव, ब्रह्मा और दूसरे देवता टोलियाँ बनाकर विमानों पर चढ़ते हैं। शरीर प्रेम से पुलकित हैं, हृदय में उत्साह है। सब राम का विवाह देखने चले हैं। उनका आना ऊपर से देख लेने भर का आगमन नहीं लगता। जिस नगर की ओर वे चल रहे हैं, उसी पर उनका अनुराग टिकनेवाला है, और वहाँ पहुँचकर अपने अपने लोकों का वैभव भी उन्हें छोटा जान पड़ेगा।

जनकपुर सामने आता है तो देवताओं की आँखों में आश्चर्य भर जाता है। विचित्र मण्डप है, नाना प्रकार की अलौकिक रचनाएँ हैं। वे उन्हें चकित होकर देखते रहते हैं। फिर दृष्टि नगर के स्त्री पुरुषों पर पड़ती है। तुलसी उनके रूप के साथ उनका सुघड़पन, श्रेष्ठ धर्म, सुशीलता और समझ भी रखते हैं। इस नगर की शोभा में वहाँ रहनेवालों का आचरण सम्मिलित है। भवन और मण्डप के बाद लोगों को देखने का यह क्रम जनकपुर को पूरा बनाता है। देवताओं को जो आकर्षित कर रहा है, वह सजावट से आगे नगर के जीवन तक फैला हुआ है।

उन स्त्री पुरुषों को देखकर देवता और देवाङ्गनाएँ वैसे फीके पड़ जाते हैं जैसे चन्द्रमा के उजियाले में तारे। ब्रह्मा को विशेष आश्चर्य होता है। उन्हें वहाँ अपनी बनायी हुई कोई रचना कहीं दिखाई नहीं देती। रचयिता स्वयं सामने की शोभा को अपनी करनी के रूप में पहचान नहीं पा रहे। इस विस्मय पर शिव सब देवताओं को समझाते हैं। उनका कहना है कि धैर्य धरकर हृदय में विचार कीजिये कि यह विवाह किनका है। आश्चर्य के भीतर पहचान लौटाने का यही समय है।

सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु।
हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु॥ ३१४॥

दोहा ३१४

यह सीता और रघुवीर का विवाह है। शिव इसी स्मरण से आरम्भ करते हैं, फिर नाम की महिमा कहते हैं। जिनका नाम लेने से जगत के समस्त अमंगलों की जड़ नष्ट हो जाती है और चारों पदार्थ हाथ में आ जाते हैं, ये वही सीताराम हैं। पोद्दार की टीका उन चार पदार्थों को अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष कहकर खोलती है। यहाँ जो वैभव देवताओं को विस्मित कर रहा है, शिव उसे दम्पति के नाम से जोड़ देते हैं। जिनका नाम इतना कल्याणकारी है, उनके विवाह की इस शोभा पर मन को स्थिर करके विचार करना चाहिये।

समझाकर शिव अपने श्रेष्ठ बैल को आगे बढ़ाते हैं। टीका उसे नन्दीश्वर कहती है। अब देवता दशरथ को चलते हुए देखते हैं। उनके मन में बड़ा आनन्द है और शरीर पुलकित है। साथ चल रही साधुओं और ब्राह्मणों की मण्डली को देखकर तुलसी एक नई उपमा रखते हैं। मानो समस्त सुख शरीर धारण करके राजा की सेवा में साथ चल रहे हों। कुछ ही पंक्तियों पहले देवता अपने जीवन को छोटा जान रहे थे। अब वही सौभाग्य पवित्र संगति के रूप में दिखाई देता है, जिसमें दशरथ की प्रसन्नता और साथ चलनेवालों की शोभा एक साथ हैं।

साधु समाज संग महिदेवा । जनु तनु धरें करहिं सुख सेवा॥
सोहत साथ सुभग सुत चारी । जनु अपबरग सकल तनुधारी॥

चौपाई २

चार सुन्दर पुत्र साथ हैं, मानो सम्पूर्ण मोक्ष ने शरीर धारण कर लिया हो। टीका इस उपमा में सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य और सायुज्य, चारों मोक्ष रूपों के नाम देती है। तुलसी चारों भाइयों को साथ दिखाते हैं, और इस साथ को ही उनकी शोभा बनाते हैं। मरकतमणि और सुवर्ण जैसे रंगों की सुन्दर जोड़ियाँ देखकर देवताओं का प्रेम बढ़ता है। फिर राम पर दृष्टि पड़ती है, हृदय हर्षित होते हैं, राजा की प्रशंसा के साथ फूल बरसते हैं। पिता के पास चलते पुत्रों को देखना ही यहाँ उस पिता के भाग्य को पहचानना है।

राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि।
पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि॥ ३१५॥

दोहा ३१५

शिव और उमा राम को नख से शिख तक बार बार निहारते हैं। दोनों के शरीर पुलकित हैं और नेत्र प्रेम के जल से भर गये हैं। अभी शिव ने देवताओं को समझाया था। अब वे स्वयं उसी रूप के दर्शन में डूबे हुए हैं जिसका स्मरण उन्होंने सबको कराया। समझाने के बाद फिर देखना, और देखते हुए आँखों का भर आना, इस छोटे से दोहे में दोनों साथ आ जाते हैं। अगली चौपाइयाँ उसी बरवेष को सामने लाती हैं जिस पर शिव और पार्वती की दृष्टि ठहरी हुई है।

जनकपुर की अलौकिक शोभा देखकर देवता विस्मित होते हैं। शिव उन्हें सीताराम और उनके नाम की महिमा स्मरण कराते हैं। दशरथ के साथ साधु समाज साकार सुख जैसा और चारों पुत्र मोक्ष के चार रूपों जैसे शोभित हैं। राम को बार बार देखकर शिव और उमा पुलकित तथा सजल नेत्र होते हैं।

मोर के कण्ठ जैसा श्याम वर

राम के श्याम अंगों की कान्ति मोर के कण्ठ जैसी है। पोद्दार की टीका इस श्यामता में हरित आभा को स्पष्ट करती है। वस्त्र सुन्दर और प्रकाशमय हैं, उनकी चमक के आगे बिजली भी फीकी है। वस्त्रों के रंग को टीका पीत बताती है। इस तरह वर का रूप पहले रंग और प्रकाश से खुलता है। हरिताभ श्याम शरीर, उसके ऊपर उज्ज्वल पीले वस्त्र, और फिर विवाह के लिये सजाये गये विविध आभूषण। तुलसी इन आभूषणों को सब प्रकार से सुहावना और मंगलरूप कहते हैं। उनकी शोभा विवाह के इसी अवसर में अपना पूरा अर्थ पाती है।

केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा॥
ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए । मंगल सब सब भाँति सुहाए॥

चौपाई ३

इस रूप को देखते समय दृष्टि शरीर से वस्त्रों और वस्त्रों से आभूषणों तक जाती है। अभी शिव और उमा ने नख से शिख तक निहारा था। अब कवि उसी देखने में हमें साथ ले लेते हैं। मोर का कण्ठ और बिजली, दोनों की कान्ति परिचित है, इसलिए उनके सहारे रंग सामने आता है। फिर भी राम का रूप उन उपमाओं में पूरा नहीं समाता। पीत वस्त्र बिजली को लजाते हैं और आगे आनेवाले नेत्र नवीन कमल को। तुलना हर बार उस रूप की ओर ले जाकर हमारी दृष्टि को उसी पर टिकाती है।

सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन॥
सकल अलौकिक सुंदरताई । कहि न जाइ मनहीं मन भाई॥

चौपाई ४

मुख शरद की पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा जैसा सुहावना है। नेत्र नये खिले कमल को लजानेवाले हैं। मुख में निर्मलता है, नेत्रों में नवीनता, और समूचे रूप में ऐसी सुन्दरता है जिसे कह पाना कठिन हो जाता है। तुलसी इसे अलौकिक कहते हैं। पोद्दार की टीका इस शब्द का अर्थ दिव्य सच्चिदानन्दमयी सुन्दरता करती है, जो माया की बनी हुई नहीं है। यह अर्थ उस दृश्य की भक्ति को स्पष्ट करता है। जिनके दर्शन से देवता मोहित हैं, उनकी कान्ति को साधारण रूप के माप में पूरा उतार देना सम्भव नहीं है।

अन्त में कवि कह देते हैं कि यह सुन्दरता मन में ही बहुत प्रिय लगती है। वर्णन इतना करके भीतर लौट आता है। पहले आँखों के लिये रंग, वस्त्र, आभूषण, मुख और नेत्र रखे गये। फिर उस अनुभव की सीमा सामने आ गयी जिसे शब्द पूरा नहीं कर पाते। शिव और उमा की पुलक तथा सजल दृष्टि अब और समझ में आती है। वे बार बार देखते हैं, क्योंकि देखकर जो सुख मिलता है वह एक बार कह देने से समाप्त नहीं होता। बरवेष का यह छोटा चित्र दर्शन की उसी रुचि को सँभाले हुए है।

राम का हरिताभ श्याम शरीर मोर के कण्ठ जैसा, पीत वस्त्र बिजली से अधिक प्रकाशमय, मुख शरद के निर्मल चन्द्रमा जैसा और नेत्र नवीन कमल को लजानेवाले हैं। विवाह के आभूषण सब मंगलरूप हैं। उनकी अलौकिक सुन्दरता को टीका दिव्य सच्चिदानन्दमयी कहती है।

प्रभु की इच्छा के साथ चलता घोड़ा

राम के साथ मनोहर भाई शोभित हैं। वे चञ्चल घोड़ों को नचाते हुए चलते हैं। राजकुमार अपने श्रेष्ठ घोड़ों की चाल दिखाते हैं और वंश की प्रशंसा करनेवाले विरुदावली सुनाते हैं। इस दृश्य में रूप के साथ गति जुड़ गयी है। अभी वर की कान्ति पर ठहरी हुई दृष्टि अब घोड़ों की चपल चाल को देखती है। साथ में मागध और भाटों का स्वर है, जैसा पोद्दार की टीका बताती है। प्रशंसा सुनाई भी दे रही है और सुन्दर चाल दिखाई भी दे रही है।

जिस घोड़े पर राम विराजमान हैं, उसकी गति देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं। वह हर प्रकार से इतना सुहावना है कि उसका वर्णन नहीं हो पाता। तुलसी को लगता है, मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष बना लिया हो। यह कवि की उपमा है। राम के लिये सजे उस अश्व में रूप का ऐसा आकर्षण है कि कामदेव की कल्पना उसके पास चली आती है। चौपाई में उठी यही उपमा अगले छन्द में फैलती है, और घोड़े के एक एक गुण तथा उसके साज को देखने का अवकाश मिलता है।

जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई।
आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई॥
जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे।
किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे॥

छन्द, दोहा ३१६ से पहले

घोड़े की अवस्था, बल, रूप, गुण और गति, सभी लोकों को मोहित कर रहे हैं। केवल तेज चाल ही उसकी प्रशंसा का विषय नहीं रहती। अपनी आयु के अनुरूप उसका सौष्ठव, उसकी शक्ति और उसके गुण भी उसी शोभा में सम्मिलित हैं। फिर जड़ाऊ जीन पर दृष्टि पड़ती है। सुन्दर मोती, मणि और माणिक्य लगे हैं, जिनकी ज्योति से जीन जगमगा रही है। लगाम भी ललित है और उसमें सुन्दर घुँघरू लगे हैं। देवता, मनुष्य और मुनि उस लगाम को देखकर ठगे से रह जाते हैं। वर के अश्व की छोटी वस्तु तक सबका ध्यान बाँध लेती है।

प्रभु मनसहिं लयलीन मनु चलत बाजि छबि पाव।
भूषित उड़गन तड़ित घनु जनु बर बरहि नचाव॥ ३१६॥

दोहा ३१६

इस सजे हुए, तेजस्वी घोड़े का मन प्रभु की इच्छा में लीन है। उसकी चाल उसी इच्छा का अनुसरण कर रही है। अभी उसकी चपलता और गति की चर्चा थी, यहाँ उस गति का सम्बन्ध राम से खुलता है। दोहे में एक पूरा आकाश बन जाता है। तारों और बिजली से अलंकृत मेघ मानो सुन्दर मोर को नचा रहा हो। मेघ, चमक और मोर के इस चित्र में ऊपर विराजे राम और उनके नीचे चल रहे घोड़े की सम्मिलित शोभा दिखाई देती है। दोनों को अलग अलग देखने के बाद कवि अब एक ही गति में देख रहे हैं।

अगली चौपाई फिर कहती है कि जिस श्रेष्ठ घोड़े पर राम सवार हैं, उसे सरस्वती भी पूरा वर्णित नहीं कर सकतीं। जीन, मणियाँ और लगाम तक बताने के बाद भी कथन की सीमा बनी रहती है। इस सौन्दर्य का केन्द्र वही सवार है जिसकी इच्छा में घोड़े का मन लगा हुआ है। उसके साज का वैभव और उसके चलने का तालमेल इसी एक साथ होने में अपनी शोभा पाते हैं।

भाई अपने चञ्चल घोड़े नचाते चलते हैं। राम के अश्व की गति गरुड़ को लजाती है और उसकी शोभा कामदेव के घोड़े का वेष बनाने जैसी लगती है। मोती, मणि, माणिक्य की जीन और घुँघरुओं की लगाम से सजा वह घोड़ा अपना मन प्रभु की इच्छा में लीन किये चलता है।

दर्शन में गिने जाते नेत्र

राम का रूप देखकर शिव को अपने पंद्रह नेत्र अत्यन्त प्रिय लगने लगते हैं। दर्शन में जितनी दृष्टि मिल सके, वह सब इस समय उपयोगी जान पड़ती है। तुलसी देवताओं के इसी सुख को अलग अलग दिखाते हैं। सब राम को देख रहे हैं, पर सबकी प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं कही गयी। शिव अपने नेत्रों पर प्रसन्न हैं। उनके लिये यह संख्या उस रूप को निहारने का अधिक अवसर है। दोहे में उमा सहित जो सजल दृष्टि आयी थी, यहाँ उसी अनुराग का एक और रूप सामने आता है।

विष्णु प्रेम से राम को देखते हैं और लक्ष्मी सहित मोहित हो जाते हैं। उन्हें कहते समय कवि लक्ष्मी के पति भी कहते हैं। लक्ष्मी स्वयं साथ हैं और दोनों उस रूप में रीझे हुए हैं। फिर ब्रह्मा की बारी आती है। राम की छबि देखकर वे हर्षित हैं, लेकिन अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताते हैं। आनन्द और यह छोटी सी कसक एक साथ हैं। रूप सामने है, देखने की इच्छा बढ़ रही है, और उन्हें अपनी दृष्टि की संख्या कम लग रही है।

सुर सेनप उर बहुत उछाहू । बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू॥
रामहि चितव सुरेस सुजाना। गौतम श्रापु परम हित माना॥

चौपाई ५

देवताओं के सेनापति कार्तिक के हृदय में बहुत उत्साह है। पोद्दार की टीका गणना स्पष्ट करती है। उनके बारह नेत्र ब्रह्मा के आठ से डेढ़ गुने हैं, इसलिए उन्हें रामदर्शन का अधिक लाभ मिल रहा है। जिस बात पर ब्रह्मा पछता रहे हैं, उसी की तुलना में कार्तिक अपने को लाभ में पाते हैं। कवि इस गणना को अत्यन्त आत्मीय बना देते हैं। देखने की इच्छा इतनी बढ़ी है कि देवताओं को अपने नेत्रों का लेखा याद आ रहा है, और उसी में उनका उत्साह बोल रहा है।

इन्द्र अपने हजार नेत्रों से राम को देख रहे हैं, यह संख्या टीका खोलती है। इसी दर्शन में वे गौतम के शाप को अपने लिये परम हितकर मानते हैं। तुलसी यहाँ इन्द्र की दृष्टि के उस क्षण को सामने रखते हैं जिसमें इतने नेत्र होना राम के रूप को अधिक देखने का सौभाग्य बन गया है। दूसरे देवता भी उन्हें इसी कारण सराहते हुए ईर्ष्या करते हैं। आज पुरन्दर के समान भाग्यवान कोई नहीं है, उनके मन की यह बात टीका स्पष्ट कर देती है। आज का यह सौभाग्य उस उपस्थित दर्शन में है।

इस पूरे क्रम में पंद्रह, आठ, बारह और हजार की संख्याएँ अपनी अपनी जगह बनी रहती हैं। किसी के नेत्र उसे प्यारे लगे, किसी को अपने नेत्र कम लगे, किसी को डेढ़ गुना लाभ मिला और किसी को सबने सबसे भाग्यवान माना। विष्णु और लक्ष्मी की मोहावस्था भी इसी क्रम के बीच है। अन्त में कवि फिर सबको एक साथ देखते हैं। देवगण राम को देखकर प्रसन्न हैं और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष है। देवताओं की अलग अलग दृष्टियाँ अब पूरे उत्सव की सामूहिक प्रसन्नता में मिल जाती हैं।

शिव अपने पंद्रह नेत्रों पर प्रसन्न हैं, विष्णु लक्ष्मी सहित मोहित हैं और ब्रह्मा अपने आठ नेत्र कम मानते हैं। बारह नेत्रोंवाले कार्तिक को डेढ़ गुना लाभ का उत्साह है। हजार नेत्रों से देखते इन्द्र गौतम के शाप को इस दर्शन में हितकर मानते हैं, और देवता उनके सौभाग्य से ईर्ष्या करते हैं।

स्वागत को चलीं स्त्रियाँ और देवियाँ

दोनों ओर राजसमाज हर्ष से भरा है। बड़े जोर से दुन्दुभियाँ बज रही हैं। देवता रघुकुलमणि राम की जय कहते हुए फूल बरसाते हैं। बारात आती हुई जानकर अनेक बाजे उठते हैं। रानी सुहागिन स्त्रियों को बुलाती हैं और परछन के लिये मंगल द्रव्य सजाती हैं। अब तक हमने आती हुई बारात देखी थी। यहाँ स्वागत करनेवाले घर की तैयारी सामने आ जाती है। देवताओं का दर्शन और आकाश का पुष्पवर्षण चलता है, साथ ही रानी के हाथों स्वागत के लिये आवश्यक वस्तुएँ सँवर रही हैं।

अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभीं बाजहिं घनी।
बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनी॥
एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं।
रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं॥

छन्द, दोहा ३१७ से पहले

अनेक प्रकार से आरती सजती है। सभी मंगल द्रव्य यथायोग्य रखे जाते हैं। उत्तम स्त्रियाँ प्रसन्न होकर परछन के लिये चलती हैं। उनकी चाल गजगामिनी है। तुलसी उस चाल की गरिमा के साथ उनके मुख, नेत्र और वस्त्र भी दिखाते हैं। सब चन्द्रमुखी हैं, सबकी आँखें हिरन जैसी हैं, और अपने शरीर की शोभा से वे रति के गर्व को दूर करनेवाली लगती हैं। रंग रंग की सुन्दर साड़ियाँ पहने हुए हैं और आभूषणों से शरीर सजे हैं। वर के विवाहवेष के बाद स्वागत को आती स्त्रियों का यह सजना उसी उत्सव को दूसरी ओर से पूरा करता है।

अंगों को सुन्दर मंगल पदार्थों से सँवारा गया है। वे ऐसा मधुर गाती हैं कि कोयल भी लजा जाये। कंगन, करधनी और नूपुर बजते हैं। उनकी चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजाते हैं। रंग और रूप के साथ चलने की लय तथा गान का स्वर जुड़ गया है। हाथ के कंगन, कमर की करधनी और चरणों के नूपुर, सभी उसी स्वागत में सुनाई देते हैं। अलग अलग बाजे भी बज रहे हैं। आकाश और नगर, दोनों में मंगलाचार हो रहे हैं।

इसी समय शची, सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती आती हैं। उनके साथ दूसरी सहज पवित्र और सयानी देवाङ्गनाएँ भी हैं। सब सुन्दर मानवी स्त्रियों का वेष बनाकर रनिवास में जा मिलती हैं और मनोहर वाणी में मंगलगीत गाने लगती हैं। वहाँ कोई उन्हें पहचान नहीं पाता। सब हर्ष के वश हैं। तुलसी इसका कारण उसी आनन्द को बनाते हैं जो समूचे दृश्य में फैला हुआ है। पहचानने के लिये ठहरकर देखने का अवकाश इस समय किसे है। सबका ध्यान दूलह और उनके स्वागत पर है।

को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली।
कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली॥
आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई।
अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई॥

छन्द, दोहा ३१८ से पहले

छन्द की पहली बात इसी हर्ष को सामने रखती है, कौन किसे पहचाने। सब आनन्द के वश होकर दूलह बने ब्रह्म का परछन करने चली हैं। जिस रूप को देवता अपने अनेक नेत्रों से देख रहे थे, वही रूप अब स्त्रियों के स्वागत का केन्द्र है। मनोहर गान हो रहा है, नगाड़े मधुर बज रहे हैं और ऊपर से फूल बरस रहे हैं। आनन्दकन्द दूलह को देखकर सबके हृदय प्रसन्न होते हैं। उनके कमल जैसे नेत्रों में प्रेम का जल उमड़ आता है और सुन्दर अंग पुलक से भर जाते हैं।

शिव और उमा की सजल आँखों से शुरू हुआ दर्शन का प्रभाव अब स्वागत करनेवाली स्त्रियों में दिखाई देता है। वे आरती और मंगल द्रव्य सँवारकर चली थीं। दूलह को देखते ही हृदय की प्रसन्नता उनके नेत्रों और शरीर में प्रकट हो उठी। बाहर गान और बाजे हैं, भीतर हर्ष है, और इन दोनों के बीच वह वर है जिसे छन्द ब्रह्म कह रहा है। उसी स्वागत में सीता की माता का सुख अब अलग से सामने आयेगा।

रानी आरती और मंगल द्रव्य सजाकर सुहागिनों सहित परछन को चलती हैं। सजी हुई स्त्रियों के गान और आभूषणों की ध्वनि से स्वागत भर उठता है। शची, सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और देवाङ्गनाएँ मानवी वेष में रनिवास से मिलकर गाती हैं। हर्ष में कोई उन्हें पहचान नहीं पाता।

माँ के नयनों में रुका हुआ जल

राम का वरवेष देखकर सीता की माता के मन में जो सुख हुआ, उसके लिये तुलसी एक पूरा दोहा रखते हैं। पोद्दार की टीका माता को सुनयना नाम से पहचानती है। अनेक स्त्रियों के हर्ष के बीच अब यह एक माता का सुख है। दूलह सामने हैं। सारी आरती, सजावट और स्वागत की तैयारी जिस दर्शन तक पहुँच रही थी, वह दर्शन उन्हें मिल रहा है। कवि इस अनुभूति का माप कहनेवालों की संख्या और कहने के समय को बहुत दूर तक बढ़ाकर देते हैं, फिर भी सुख उसके पार रह जाता है।

जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु।
सो न सकहिं कहि कलप सत सहस सारदा सेषु॥ ३१८॥

दोहा ३१८

हजारों सरस्वती और शेष सौ कल्पों में भी उस सुख को नहीं कह सकते। यह दोहे के अर्थ को खोलने का एक ढंग है जो टीका देती है। माँ के हृदय में जो एक साथ हुआ है, उसके सामने इतने वक्ता और इतना समय भी कम पड़ते हैं। राम के रूप को पहले कवि मन ही मन प्रिय लगनेवाला कह चुके हैं। अब वही कथन की सीमा सुनयना के सुख के सामने आती है। उनके भीतर का आनन्द कितना है, इसे उसके बाहर दिखाई देनेवाले अगले छोटे से काम से भी समझा जा सकता है।

मंगल का अवसर जानकर रानी अपने नेत्रों का जल रोकती हैं और प्रसन्न मन से परछन करती हैं। आँसू उमड़े हैं, पर स्वागत के व्यवहार भी करने हैं। सुनयना उस हर्ष को सँभालती हुई वेदविहित और कुलाचार के अनुसार सभी रीतियाँ भलीभाँति पूरी करती हैं। यह संयम बड़े सुख के भीतर का संयम है। थोड़ी देर पहले जिन स्त्रियों के नेत्रों में प्रेमाश्रु उमड़े थे, उन्हीं के बीच माता अपने हाथों का मंगल कार्य पूरा कर रही हैं। कवि उनके मन का सुख कहकर तुरन्त उनके व्यवहार पर आते हैं।

चारों ओर मंगलगान है। पोद्दार की टीका इस अवसर की ध्वनियों को दो अलग समूहों में खोलती है। पंचशब्द में तन्त्री, ताल, झाँझ, नगारा और तुरही, इन पाँच प्रकार के बाजों की ध्वनियाँ हैं। पंचध्वनि में वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शंखध्वनि और हुलूध्वनि हैं। एक ओर बाजों के ये पाँच प्रकार हैं, दूसरी ओर उत्सव में उठती हुई ये पाँच ध्वनियाँ। सबके साथ मंगलगीत भी हो रहे हैं। स्वागत का सुनाई देनेवाला संसार इतने स्वरों से भर गया है।

नाना प्रकार के वस्त्रों के पाँवड़े पड़ रहे हैं। रानी आरती करती हैं, अर्घ्य देती हैं, और तब राम मण्डप की ओर गमन करते हैं। इस क्रम में माता के हृदय का अगम सुख, नयनों का रोका हुआ जल और हाथों का पूरा किया हुआ स्वागत साथ रहते हैं। आरती और अर्घ्य के बाद ही दूलह आगे बढ़ते हैं। दर्शन से मन भर गया है, फिर भी विधि के प्रत्येक व्यवहार को उसका स्थान मिलता है। सुनयना का स्वागत इसी प्रेम और सावधानी में पूर्ण होता है।

राम के वरवेष से सुनयना को अकथनीय सुख मिलता है। वे मंगल समय जानकर आँसू रोकती हैं और वैदिक तथा कुल की रीतियों से परछन करती हैं। पंचशब्द, पंचध्वनि और मंगलगान के बीच पाँवड़े पड़ते हैं। माता की आरती और अर्घ्य के बाद राम मण्डप की ओर चलते हैं।

मण्डप में वर और निछावर का हर्ष

दशरथ अपने समाज सहित विराजमान हैं। उनका वैभव देखकर लोकपाल भी लजा जाते हैं। देवता समय समय पर फूल बरसाते हैं और ब्राह्मण अवसर के अनुसार शान्तिपाठ करते हैं। आकाश और नगर में इतना कोलाहल है कि कोई अपनी या दूसरे की बात नहीं सुन पा रहा। उत्सव का स्वर हर ओर फैल गया है। इसी बीच राम मण्डप में आते हैं। अर्घ्य देकर उन्हें आसन पर बिठाया जाता है। इतने बड़े समाज के बीच भी स्वागत का यह सीधा व्यवहार स्पष्ट दिखाई देता है, दूलह को आदर से उनका स्थान दिया जाता है।

बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं।
मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं॥
ब्रह्मादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं।
अवलोकि रघुकुल कमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं॥

छन्द, दोहा ३१९ से पहले

स्त्रियाँ आसन पर विराजे वर की आरती करती हैं और उन्हें देखकर सुख पाती हैं। ढेरों मणि, वस्त्र और आभूषण निछावर हो रहे हैं। मंगलगीत चल रहे हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मणों का वेष बनाकर यह कौतुक देख रहे हैं। देवियों की तरह वे भी मानवी समाज में सम्मिलित होकर दर्शन का सुख ले रहे हैं। राम को रघुकुल रूपी कमल को खिलानेवाला सूर्य कहा गया है। उनकी छबि देखकर ये देवता अपना जीवन सफल मानते हैं।

दशरथ का भाग्य देखकर देवताओं को अपना जन्म व्यर्थ लगा था। अब दूलह की छबि देखकर वे अपने जीवन को सफल जान रहे हैं। दोनों बातें उनके इसी आनन्द में कही गयी हैं। पहले वे पिता के सौभाग्य पर मुग्ध हुए, अब स्वयं दर्शन के सुख में सम्मिलित हैं। बारात और मण्डप के बीच आया यह परिवर्तन उनकी अपनी अनुभूति को पूरा करता है। जिनके लिये वे उत्साह से चले थे, उन्हें सामने देखकर यह आने का अवसर भी धन्य लगता है।

नाऊ बारी भाट नट राम निछावरि पाइ।
मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ॥ ३१९॥

दोहा ३१९

नाई, बारी, भाट और नट राम की निछावर पाकर प्रसन्न हैं। वे सिर नवाकर आशीष देते हैं। उनके हृदयों में हर्ष समाता नहीं। ऊपर देवता फूल बरसा रहे थे, यहाँ निछावर पानेवालों के मुँह से आशीर्वाद निकल रहा है। तुलसी इन लोगों को अलग से गिनते हैं। उत्सव में उनका सुख भी अपना स्थान रखता है। मणि, वस्त्र और गहने निछावर करने का दृश्य इस दोहे में प्राप्त करनेवालों की प्रसन्नता तक पहुँचता है। उनके झुके सिर और उमड़े हर्ष के साथ दूलह के स्वागत का यह भाग पूरा होता है।

राम अर्घ्य पाकर मण्डप के आसन पर विराजते हैं। स्त्रियाँ आरती और निछावर करती हैं। ब्राह्मण वेष में देवता दर्शन से जीवन सफल मानते हैं। नाई, बारी, भाट और नट निछावर पाकर सिर नवाते और हर्ष से आशीष देते हैं।

इनके समान ये ही

स्वागत के आगे अब जनक और दशरथ का मिलन है। वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके दोनों महाराज अत्यन्त प्रेम से मिलते हैं। तुलसी उस मिलन की शोभा पर रुकते हैं। इतनी देर से रूप और वैभव की उपमाएँ आती रही हैं, पर इन दोनों को साथ देखकर कवि उपमा खोजते खोजते लजा जाते हैं। कोई तुलना मिलती ही नहीं। मन में हार मानकर अन्त में वे यही ठहराते हैं कि इनके समान ये स्वयं ही हैं। इस मिलन की शोभा दोनों के अपने व्यक्तित्व और परस्पर प्रेम में पूर्ण है।

मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं । करि बैदिक लौकिक सब रीतीं॥
मिलत महा दोउ राज बिराजे । उपमा खोजि खोजि कबि लाजे॥

चौपाई ६

समधियों का मिलाप देखकर देवताओं का अनुराग बढ़ता है। वे फूल बरसाते हुए यश गाते हैं। उनका कहना है कि जब से ब्रह्मा ने जगत की रचना की है, तब से अनेक विवाह देखे और सुने हैं। लेकिन सब प्रकार से समान साज और समाज तथा ऐसे बराबरी के समधी आज ही देखे हैं। यहाँ समानता का विस्तार दोनों ओर की पूरी व्यवस्था और दोनों महाराजों तक है। जो शोभा बारात में थी, उसी के अनुरूप शोभा स्वागत करनेवाले समाज की है। देवता उस पूर्ण समानता को देखकर प्रसन्न हैं।

देवताओं की यह सुन्दर और सच्ची वाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा जाती है। प्रशंसा का प्रभाव फिर सम्बन्ध में दिखाई देता है। जनक सुन्दर पाँवड़े और अर्घ्य देते हुए दशरथ को आदर से मण्डप में लाते हैं। अभी दोनों महाराज अपने प्रेमपूर्ण मिलन में सुशोभित थे, अब जनक उस प्रीति को आतिथ्य में निभाते हैं। अतिथि को भीतर लाना, मार्ग में पाँवड़े देना और अर्घ्य से आदर करना, ये सभी उसी स्नेह के व्यवहार हैं।

मंडपु बिलोकि बिचित्र रचनाँ रुचिरताँ मुनि मन हरे।
निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे॥
कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही।
कौसिकहि पूजत परम प्रीति कि रीति तौ न परै कही॥

छन्द, दोहा ३१९ के बाद

मण्डप की विचित्र रचना और सुन्दरता मुनियों के मन भी मोह लेती है। पहले देवता इसी अलौकिक आयोजन को चकित होकर देख रहे थे। अब भीतर आये मुनि उसकी रुचिरता से आकर्षित हैं। सुजान जनक अपने हाथों से सिंहासन लाकर सबके लिये रखते हैं। राजा के आतिथ्य का यह अत्यन्त स्पष्ट चित्र है। इतने बड़े आयोजन में वे स्वयं आसन लेकर उपस्थित हैं। जिनका वैभव अभी देवताओं ने सराहा, वही अपने हाथों से अतिथियों का स्थान सँवार रहे हैं।

जनक वसिष्ठ को अपने कुल के इष्टदेवता के समान पूजते हैं। विनय करके आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। इसके बाद विश्वामित्र का पूजन है। उनके प्रति उस समय की परम प्रीति का वर्णन नहीं बन पड़ता। छन्द इसी अनिर्वचनीय प्रेम पर समाप्त होता है। राम का रूप कहते हुए, सुनयना का सुख कहते हुए और समधियों की उपमा खोजते हुए शब्द पहले भी अपनी सीमा तक पहुँचे थे। अब जनक के गुरु सम्मान में वही सीमा आती है। आसन अपने हाथों रखना कहा जा सकता है, पूजा और विनय कही जा सकती है, पर उस पूजा की पूरी प्रीति कहने में नहीं आती।

जनक और दशरथ सब रीतियाँ पूरी करके प्रेम से मिलते हैं। देवता दोनों के साज, समाज और समधियाने की समानता सराहते हैं। जनक दशरथ को मण्डप में लाते हैं, अपने हाथों सबके लिये आसन रखते हैं, वसिष्ठ को कुलदेवता के समान पूजकर आशीर्वाद लेते हैं और विश्वामित्र का अत्यन्त प्रेम से पूजन करते हैं।

और अन्त में, अपनी ओर

इस विवाहयात्रा में देखने का सुख बार बार सामने आता है। स्वयंवर के राजा चारों भाइयों को देखकर सुख पाते हैं, देवता जनकपुर देखकर अपने लोकों को छोटा मानते हैं, शिव और उमा राम का रूप बार बार निहारते हैं। फिर देवताओं को अपने नेत्रों की संख्या याद आती है। हर नया दर्शन उनकी प्रसन्नता का अलग रूप खोलता है। उसी क्रम में सुनयना के नेत्र भरते हैं, और वही आँखें मंगल अवसर जानकर जल को रोकती हैं। यहाँ देखने का आनन्द स्वागत के उत्तरदायित्व के साथ भी बना रहता है।

दूसरा ध्यान उस हाथ पर जाता है जो प्रेम को व्यवहार देता है। सुनयना आरती करती हैं और अर्घ्य देती हैं। स्त्रियाँ निछावर करती हैं, उसे पानेवाले सिर नवाकर आशीष देते हैं। जनक अपने हाथों आसन लाते हैं और मुनियों की पूजा करते हैं। जितना बड़ा वैभव है, उतनी ही साफ़ इन कामों की आकृति है। हम इस दृश्य को याद करें तो चमकते आभूषणों और बरसते फूलों के साथ ये हाथ भी याद रहते हैं, जिनसे अतिथि का आदर पूरा हुआ।

गोधूलि में बुलावा भेजने से लेकर मण्डप में गुरुजनों की पूजा तक उत्सव का क्रम पूरा दिखाई देता है। राम वर के आसन पर हैं। जनक और दशरथ का प्रेम दोनों समाजों में फैल गया है। जनक ने वसिष्ठ का आशीर्वाद लिया है और विश्वामित्र के प्रति उनकी पूजा अकथनीय प्रीति से भरी है। इस समय मण्डप की शोभा के साथ अतिथियों को दिया गया आदर भी मन में ठहर जाता है।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा ३१२ से ३१९, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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