रामचरितमानस · बालकाण्ड · विश्वामित्र का आगमन, ताड़का-वध और अहल्या
विश्वामित्र का आगमन, ताड़का-वध और अहल्या
दशरथ के हृदय से लगकर दो भाई वन की ओर चलते हैं। यज्ञ की रक्षा और एक सूने आश्रम में चरणस्पर्श से प्रकट होती अहल्या की कथा।
राम अपने भाइयों और सखाओं को साथ लेकर वन में मृगया के लिये जाते हैं, लौटकर पिता को मृग दिखाते हैं, सबके साथ भोजन करते हैं। अयोध्या में उनके दिन का यह परिचित क्रम चल रहा है। उसी समय एक दूसरे वन में विश्वामित्र के जप, यज्ञ और योग पर राक्षसों का भय छाया हुआ है। मुनि मन में निश्चय करते हैं कि अब प्रभु के पास चलना चाहिये। उनके जाने से एक पिता के सामने ऐसी माँग रखी जाएगी जिसके लिये अपना सर्वस्व देने की तैयारी भी कम पड़ती है।
तुलसीदास के इस प्रसंग में राम को देखने की लालसा बार बार सामने आती है। विश्वामित्र नेत्र भरकर दर्शन का मनोरथ लिये अयोध्या पहुँचते हैं। आगे एक निर्जन आश्रम में शापवश शिला बनी गौतम की पत्नी चरणों की धूल चाहती हैं। इन दोनों के बीच धनुष भी उठता है, मुनियों का भय भी मिटता है और भक्तों की सेवा भी स्वीकार होती है। कथा के अन्त में अहल्या अपने लिये जो माँगती हैं, उसमें दर्शन से मिला आनन्द सदा के लिये हृदय में रख लेने की इच्छा है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- श्रीराम दशरथ के पुत्र, जो विश्वामित्र के साथ जाकर यज्ञ की रक्षा करते हैं और अहल्या पर कृपा करते हैं।
- लक्ष्मण राम के साथ चलनेवाले छोटे भाई, जो यज्ञ पर चढ़ आयी राक्षस सेना का संहार करते हैं।
- विश्वामित्र गाधि के पुत्र, ज्ञानी महामुनि। यज्ञ की रक्षा के लिये दोनों भाइयों को माँगने अयोध्या आते हैं।
- दशरथ और वसिष्ठ पुत्रों को सौंपते हुए व्याकुल पिता और उनका सन्देह दूर करनेवाले गुरु।
- ताड़का मार्ग में क्रोध से दौड़ती हुई आती है। राम एक बाण से प्राण हरकर उसे अपना पद देते हैं।
- मारीच और सुबाहु विश्वामित्र के यज्ञ में उपद्रव करनेवाले राक्षस।
- अहल्या गौतम की पत्नी, जिनका नाम पोद्दार जी की टीका देती है। शिला के रूप में राम की चरणरज की प्रतीक्षा करती हैं।
अयोध्या में राम का दिन
आरम्भ में राम अकेले कहीं नहीं जाते। भाइयों और इष्ट मित्रों को बुलाते हैं, उन्हें साथ लेते हैं और नित्य वन में शिकार खेलने निकलते हैं। पवित्र मृगों को मन में जानकर मारते हैं और प्रतिदिन लाकर राजा दशरथ को दिखाते हैं। इसी वर्णन के भीतर तुलसी उन मृगों की गति भी कह देते हैं। राम के बाण से मारे गये मृग शरीर छोड़कर देवलोक पहुँचते हैं। वन से लौटने का दृश्य और जीव की आगे की गति, दोनों एक ही दिनचर्या में रखे हुए हैं। राम का बाण किसके हाथ में है, इसका परिचय कथा आगे बढ़ने से पहले ही मिल जाता है।
जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥
चौपाई १
अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥
छोटे भाई और सखा शिकार में साथ थे, भोजन में भी साथ हैं। राम माता पिता की आज्ञा का पालन करते हैं। अयोध्या के लोगों को जिस प्रकार सुख हो, कृपानिधान वैसा ही संयोग करते हैं। उनका ध्यान घर के सम्बन्धों से नगर के लोगों तक जाता है। उनके आचरण से पिता हर्षित होते हैं और उनके प्रयत्न नगर के सुख के लिये हैं। इन चौपाइयों में एक दिन को पहचानने के लिये जो बातें दी गयी हैं, वे हैं साथ रहना, आज्ञा मानना, सुनना और दूसरों को सुख पहुँचानेवाला काम करना।
वेद और पुराण वे मन लगाकर सुनते हैं। फिर स्वयं छोटे भाइयों को उनका अर्थ समझाते हैं। सुनने और समझाने का यह क्रम उनके साथ रहने का एक और रूप है। भोजन में जो छोटे भाई पास बैठते हैं, वे सीखने में भी साथ हैं। प्रातःकाल राम उठकर माता, पिता और गुरु के आगे मस्तक नवाते हैं, फिर आज्ञा माँगकर नगर के काम करते हैं। दिन के कामों से पहले प्रणाम और अनुमति का स्थान है। दशरथ यह सब चरित्र देखते हैं और मन में प्रसन्न होते हैं। थोड़ी देर बाद इन्हीं पिता के मुख की कान्ति पुत्रों को भेजने की बात सुनकर फीकी पड़ेगी।
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
दोहा २०५
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥ २०५॥
दोहा उन्हीं राम का स्वरूप बताता है जिनका अभी उठना, सुनना, भोजन करना और आज्ञा लेना देखा गया। वे व्यापक हैं, अवयवों से रहित हैं, इच्छा से रहित और अजन्मा हैं, निर्गुण हैं। नाम और रूप से परे वही भगवान् भक्तों के लिये अनेक प्रकार के अनुपम चरित्र करते हैं। इसलिये पिता के सामने उनका आज्ञाकारी पुत्र होना भी इस कथा में पूरा सत्य है और दोहे में कही गयी उनकी व्यापकता भी। भक्तों के लिये होनेवाली लीला में उनके साथ बैठना, उन्हें भोजन कराना और उनका सुन्दर मुख देखना सम्भव हो जाता है। आगे विश्वामित्र की लालसा इसी निकटता की है।
राम भाइयों और मित्रों के साथ मृगया तथा भोजन करते हैं, बड़ों की आज्ञा मानते हैं, वेद पुराण सुनकर भाइयों को समझाते हैं और नगर के सुख के लिये काम करते हैं। तुलसी इन चरित्रों को व्यापक, अजन्मा भगवान् की भक्तों के लिये की हुई लीला बताते हैं।
वन में उठी दर्शन की इच्छा
अब आगे की कथा मन लगाकर सुनने को कहा जाता है। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्र वन में पवित्र आश्रम जानकर निवास करते हैं। वहाँ जप होता है, यज्ञ होता है, योग का अभ्यास होता है, पर मारीच और सुबाहु का बहुत भय है। राक्षस यज्ञ देखते ही दौड़ पड़ते हैं। उनके उपद्रव से मुनि दुःख पाते हैं। जिस स्थान को साधना के योग्य समझकर चुना गया था, वहाँ साधना के आरम्भ होते ही विघ्न सामने आ जाता है। मुनि के मन की चिन्ता का कारण यही बार बार पड़नेवाली बाधा है।
गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥
चौपाई २
तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा । प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥
गाधि के पुत्र अपने मन में साफ़ समझते हैं कि इन पापी राक्षसों का अन्त हरि के हाथ से ही होगा। उसी चिन्ता में उन्हें प्रभु के अवतार का प्रयोजन स्मरण होता है, पृथ्वी का भार हरना। यहाँ विश्वामित्र पहले से जानते हैं कि वे किसके पास जा रहे हैं। यज्ञ की रक्षा की आवश्यकता उनके सामने है और उसके साथ प्रभु के अवतरण का ज्ञान जुड़ता है। यह समझ आते ही उनके विचार में दर्शन की लालसा भर जाती है। संकट के बीच उन्हें उस भेंट की सम्भावना दिखती है जिसकी कल्पना से मन हर्षित हो सकता है।
वे सोचते हैं कि इसी बहाने जाकर चरणों का दर्शन करूँगा और विनती करके दोनों भाइयों को ले आऊँगा। ज्ञान, वैराग्य और समस्त गुणों के धाम प्रभु को आँख भरकर देखूँगा। उनकी यात्रा का मनोरथ इतना निजी और इतना सरल हो जाता है। जिनके विषय में वे जानते हैं, उन्हीं को अब अपने सामने देखना है। और एक झलक पाकर लौट आने की इच्छा भी नहीं है। दोनों भाइयों को साथ लाने की विनती करनी है, ताकि जिस वन में यज्ञ रुक जाता है, वहाँ प्रभु का संग मिले और साधना निर्भय होकर हो सके।
बहुबिधि करत मनोरथ जात लागि नहिं बार।
दोहा २०६
करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार॥ २०६॥
बहुत प्रकार के मनोरथ करते हुए उन्हें पहुँचने में देर नहीं लगती। तुलसी मार्ग की दूरी या पड़ाव गिनाने के स्थान पर मुनि के मन का यह व्यापार बताते हैं। यात्रा में आनेवाली भेंट ही उनके साथ चल रही है। सरयू के जल में स्नान करके विश्वामित्र राजा के द्वार पर पहुँचते हैं। अब तक उनकी इच्छा मन के भीतर थी। राजद्वार पर पहुँचते ही वह दूसरों के जीवन में उतरनेवाली है। जिस दर्शन को वे अपने लिये सुख मान रहे हैं, उसके लिये दशरथ को अपने सबसे प्रिय पुत्रों को घर से भेजना होगा।
मारीच और सुबाहु से पीड़ित विश्वामित्र जानते हैं कि उनका वध हरि ही करेंगे। पृथ्वी का भार हरने आये प्रभु का स्मरण करके वे दर्शन और दोनों भाइयों को साथ लाने की इच्छा से अयोध्या पहुँचते हैं। सरयू में स्नान के बाद वे राजद्वार पर जाते हैं।
अपने आसन पर मुनि को बिठाकर
विश्वामित्र के आने का समाचार सुनकर दशरथ ब्राह्मणों के समुदाय को साथ लेते हैं और मिलने जाते हैं। दण्डवत् करके उनका आदर करते हैं, फिर उन्हें भीतर लाकर अपने आसन पर बिठाते हैं। स्वागत का हर काम राजा स्वयं आगे होकर करते हैं। चरण धोते हैं, बहुत पूजा करते हैं और अपने भाग्य को सराहते हैं कि आज मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं। अतिथि के लिये अनेक प्रकार का भोजन कराया जाता है। मुनि के हृदय में बड़ा हर्ष होता है। जिस घर से सहायता माँगनी है, वहाँ पहुँचने पर पहले ऐसा स्नेह और सत्कार मिला है।
इसके बाद दशरथ अपने चारों पुत्रों से मुनि के चरणों में प्रणाम कराते हैं। यहाँ सभी भाई उपस्थित हैं। किन्तु राम का मुख देखते ही विश्वामित्र की दशा बदल जाती है। जिन चरणों के दर्शन का विचार करते हुए चले थे, उनके स्वामी सामने हैं। मुनि अपनी देह की सुधि भूल जाते हैं। स्वागत के समय जो हर्ष हुआ था, वह अब रूप के दर्शन में मग्न हो जाता है। तुलसी इस मग्नता के लिये चकोर और पूर्ण चन्द्रमा की उपमा रखते हैं। मुनि का मन उस मुख की शोभा में ऐसा लगा है कि अपने शरीर का ध्यान भी छूट गया है।
पुनि चरननि मेले सुत चारी । राम देखि मुनि देह बिसारी॥
चौपाई ३
भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा॥
राजा प्रसन्न मन से कहते हैं कि मुनि ने ऐसी कृपा पहले कभी नहीं की। आज आने का कारण क्या है, कृपया कहें, उसे पूरा करने में देर नहीं लगेगी। दशरथ के वचन में तत्परता है। वे अपने अतिथि के आगमन को अनुग्रह मान रहे हैं और जिस काम से वे आये हैं, वह शीघ्र कर देना चाहते हैं। इसी खुले मन से दिया गया प्रस्ताव अब ऐसी माँग के सामने आएगा जो राजा की सारी उदारता को उनके पितृहृदय तक ले जाती है। विश्वामित्र अपना दुःख और उसका उपाय एक साथ कहते हैं।
असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही॥
चौपाई ४
अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा॥
राक्षसों का समूह मुझे बहुत सताता है, मुनि कहते हैं। मैं माँगने आया हूँ। छोटे भाई के साथ रघुनाथ को दीजिये। राक्षसों के मारे जाने पर मैं सनाथ हो जाऊँगा। अपने आश्रम में जप और योग करनेवाले ज्ञानी महामुनि सुरक्षा के लिये इन दो किशोरों को माँग रहे हैं। उनके लिये राम का साथ आश्रय है। जिनका मुख अभी देखते देखते देह की सुधि जाती रही, उन्हीं से वे अपने यज्ञ का भय मिटने का भरोसा रखते हैं। दर्शन की लालसा और राक्षसों से रक्षा की प्रार्थना अब राजा के सामने एक ही निवेदन बन गयी है।
दोहा आगे राजा को प्रसन्न मन से देने और मोह तथा अज्ञान छोड़ने को कहता है। विश्वामित्र इस प्रस्थान का फल भी बताते हैं। दशरथ को धर्म और सुयश मिलेगा, दोनों कुमारों का परम कल्याण होगा। माँग के साथ हानि का डर दूर करनेवाली बात कही गयी है। मुनि की दृष्टि में इस साथ जाने से सबका हित है। वे जिस ज्ञान से बोल रहे हैं, उसमें प्रभु का सामर्थ्य स्पष्ट है। पिता की दृष्टि में अभी अपने सुन्दर, सुकुमार पुत्र हैं, और अब उन्हीं की ओर से उत्तर आनेवाला है।
दशरथ विश्वामित्र का आदर करके उन्हें अपने आसन पर बिठाते हैं और चारों पुत्रों से प्रणाम कराते हैं। राम का मुख देखकर मुनि देह की सुधि भूल जाते हैं। आने का कारण पूछने पर वे यज्ञ की रक्षा के लिये छोटे भाई सहित राम को माँगते हैं और राजा तथा कुमारों का कल्याण बताते हैं।
पिता के लिये सबसे कठिन माँग
मुनि की बात सुनते ही दशरथ का हृदय काँप उठता है। मुख की कान्ति कुम्हला जाती है। अभी जो आगमन उन्हें अपने धन्य होने का प्रमाण लग रहा था, उसी आगमन का प्रयोजन उनके लिये अत्यन्त अप्रिय हो गया है। वे कहते हैं कि चौथेपन में चार पुत्र पाये हैं। ब्राह्मण से उनका निवेदन उलाहने तक पहुँचता है, आपने यह बात विचारकर नहीं कही। उनके वचन में पुत्रों को देर से पाने की स्मृति है। मुनि के सामने जो बालक खड़े हैं, पिता के लिये उनका होना ही इतना दुर्लभ सुख है कि उन्हें संकट में भेजने की बात सहन नहीं होती।
फिर दशरथ एक एक करके अपना सब कुछ सामने रखते हैं। भूमि माँग लीजिये, गौएँ माँग लीजिये, धन और खजाना ले लीजिये। आज प्रसन्नता से सर्वस्व दे दूँगा। बात राज्य की सम्पत्ति से आगे बढ़ती है। शरीर और प्राण से अधिक प्रिय क्या होता है, वे कहते हैं, वह भी एक क्षण में दे दूँगा। राजा की देने की इच्छा बनी हुई है। विश्वामित्र जिस सहायता के लिये आये हैं, उसका कोई दूसरा रूप खोजने में दशरथ अपने अधिकार की सारी वस्तुएँ और अपने प्राण तक गिना देते हैं। पुत्रों पर आकर हाथ रुक जाता है।
सब सुत प्रिय मोहि प्रान कि नाईं । राम देत नहिं बनइ गोसाईं॥
चौपाई ५
कहँ निसिचर अति घोर कठोरा । कहँ सुंदर सुत परम किसोरा॥
सभी पुत्र प्राणों के समान प्रिय हैं, और राम को देते नहीं बनता। इस वाक्य में चारों पुत्रों से प्रेम भी कहा गया है और राम के विषय में हृदय का विशेष आग्रह भी। भय का कारण दशरथ स्वयं बताते हैं। एक ओर अत्यन्त डरावने, कठोर राक्षस हैं, दूसरी ओर परम किशोर अवस्था के सुन्दर पुत्र। मुनि जिनमें प्रभु का सामर्थ्य जानते हैं, पिता उन्हीं में सुकुमारता देखते हैं। सामने आनेवाले संकट और अपने बच्चों की अवस्था को साथ रखकर वे व्याकुल हो रहे हैं। उनका मन इसी असमानता में अटक गया है।
सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ग्यानी॥
चौपाई ६
तब बसिष्ठ बहुबिधि समुझावा। नृप संदेह नास कहँ पावा॥
विश्वामित्र इस वाणी को सुनकर मन में हर्ष मानते हैं। तुलसी उसके लिये प्रेमरस में सनी हुई वाणी कहते हैं। मुनि को दशरथ की बात में पुत्र के प्रति अपार स्नेह सुनायी देता है। उनकी प्रसन्नता इस संवाद को बहुत कोमल बना देती है। राजा माँग स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, और माँगनेवाला ज्ञानी उनके भीतर का प्रेम देखकर आनन्दित है। फिर वसिष्ठ बहुत प्रकार से समझाते हैं। उनके समझाने से राजा का सन्देह दूर होता है। कथा इस समझाइश का परिणाम कहती है, और उसी परिणाम के साथ विदाई की तैयारी होने लगती है।
दशरथ दोनों पुत्रों को बड़े आदर से बुलाते हैं। हृदय से लगाते हैं, अनेक प्रकार की शिक्षा देते हैं। अभी जिनके लिये मना कर रहे थे, अब उन्हीं को मुनि के साथ जाने को सौंपना है। पिता का प्रेम इस स्वीकृति में भी उतना ही निकट रहता है। उनके मुँह से विश्वामित्र के लिये जो बात निकलती है, उसमें आगे के मार्ग का पूरा भरोसा है: ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं, हे मुनि, अब आप ही इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं। वे दो कुमारों के साथ अपना पितृत्व भी ऋषि की देखरेख में रख देते हैं।
दशरथ पुत्रों को भेजने की बात से काँप उठते हैं और भूमि, धन, शरीर तथा प्राण तक देने को तैयार हो जाते हैं। विश्वामित्र उनकी प्रेमभरी वाणी से हर्षित होते हैं। वसिष्ठ सन्देह दूर करते हैं, तब राजा दोनों पुत्रों को हृदय से लगाकर मुनि को पिता का स्थान देते हुए सौंपते हैं।
आशीर्वाद लेकर दो भाई चले
राजा अनेक प्रकार के आशीर्वाद देते हैं और दोनों पुत्रों को ऋषि के हवाले कर देते हैं। इसके बाद राम माता के भवन में जाते हैं। चरणों में सिर नवाकर विदा लेते हैं। दिनचर्या के आरम्भ में माता, पिता और गुरु को प्रणाम करके नगर के काम पर जाना देखा था। यहाँ भी बड़ों के प्रति वही आदर बना रहता है, अब काम का मार्ग वन की ओर खुल रहा है। पिता की शिक्षा और आशीर्वाद के बाद माता के चरणों का प्रणाम आता है। इतनी ही बात में घर से निकलने का क्रम पूरा होता है।
सौंपे भूप रिषिहि सुत बहुबिधि देइ असीस।
दोहा २०८ (क)
जननी भवन गए प्रभु चले नाइ पद सीस॥ २०८ (क)॥
अगला सोरठा दोनों भाइयों को पुरुषों में सिंह, वीर और मुनि का भय हरनेवाला कहता है। वे हर्षित होकर चल रहे हैं। उनके लिये इस प्रस्थान में प्रसन्नता है। दशरथ के मन से सन्देह मिट चुका है, और दोनों कुमार उस कार्य की ओर बढ़ रहे हैं जिसके लिये मुनि ने उन्हें माँगा था। कथा इसी क्षण उनका परिचय कृपा के समुद्र और धीर बुद्धिवाले के रूप में देती है। वीरता के साथ धैर्य तथा कृपा का यह उल्लेख आगे की घटनाओं को समझने में साथ रहता है।
पुरुषसिंह दोउ बीर हरषि चले मुनि भय हरन।
सोरठा २०८ (ख)
कृपासिंधु मतिधीर अखिल बिस्व कारन करन॥ २०८ (ख)॥
समस्त विश्व के कारण के भी कारण, यही उस सोरठे में कहा गया उनका स्वरूप है। घर में पिता ने उन्हें अपने प्राण कहा, और चलते हुए कवि उनका यह व्यापक परिचय देते हैं। उनके सुन्दर रूप का वर्णन भी साथ आता है। राम के नेत्र लाल हैं, छाती चौड़ी है, भुजाएँ विशाल हैं। नील कमल और तमाल के वृक्ष जैसा श्याम शरीर है। कमर में पीताम्बर है, सुन्दर तरकस कसे हैं, हाथों में धनुष और बाण हैं। वन की ओर जाता हुआ रूप सुकुमार सौन्दर्य और शस्त्रधारी सामर्थ्य, दोनों लिये हुए है।
श्याम और गौर, दोनों सुन्दर भाइयों को साथ पाकर विश्वामित्र मानो महान् निधि पा गये हैं। उनके मन में यह भाव उठता है कि प्रभु ब्राह्मणों के भक्त हैं, मेरे लिये अपने पिता को भी छोड़ आये। थोड़ी देर पहले दशरथ ने मुनि को पिता का स्थान दिया था। अब मुनि अपने साथ चलते राम में वही कृपा अनुभव कर रहे हैं जिसने पिता का घर छोड़कर उनके आश्रम की राह ली है। दोनों भाइयों का साथ उनके लिये संरक्षण भी है और बहुमूल्य प्राप्ति भी।
पिता के आशीर्वाद और माता के चरणों में प्रणाम के बाद दोनों भाई प्रसन्न होकर मुनि का भय हरने चलते हैं। धनुष बाण धारण किये श्याम और गौर कुमारों को पाकर विश्वामित्र महान् निधि पाने का आनन्द अनुभव करते हैं।
एक बाण और अपना पद
मार्ग में चलते हुए विश्वामित्र ताड़का को दिखाते हैं। शब्द सुनते ही वह क्रोध में भरकर दौड़ पड़ती है। अभी तक जिस राक्षस भय की चर्चा अयोध्या में हुई थी, वन के मार्ग में अब उसका सामना है। राम एक ही बाण से ताड़का के प्राण हर लेते हैं। तुलसी इस युद्ध के लिये लम्बा विस्तार नहीं रखते। क्रोध से दौड़ना और एक बाण से प्राण जाना, इतनी शीघ्रता से घटना पूरी होती है। लेकिन उसी चौपाई के अन्त तक ताड़का की गति के बारे में एक और बात कही जाती है।
चले जात मुनि दीन्हि देखाई । सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥
चौपाई ७
एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा । दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥
प्रभु उसे दीन जानकर अपना पद देते हैं। पोद्दार जी की टीका इसका अर्थ उनका अपना दिव्य स्वरूप देती है। ताड़का की ओर से क्रोध का वर्णन था। राम की ओर से प्राण हरने के साथ उसे दीन जानने और निजपद देने का वर्णन है। एक ही चौपाई में वध और इतनी बड़ी कृपा का साथ आना ध्यान खींचता है। जिस जीव का अन्त सामने देखा गया है, उसके लिये आगे क्या हुआ, यह तुलसी स्वयं स्पष्ट करते हैं। ताड़का के प्राणहरण के साथ ही उसकी प्राप्ति भी कही गयी है।
आरम्भ में राम के बाण से मारे गये मृगों की गति देवलोक बतायी गयी थी। यहाँ ताड़का को अपना पद दिया जाता है। दोनों स्थलों पर प्राण जाने के बाद की गति अलग अलग स्पष्ट कही गयी है। कथा राम के बाण का प्रभाव बताते हुए जिस पर वह चला है, उसका कल्याण भी सामने लाती है। ताड़का के लिये दीन जानने की बात विशेष है। आगे अहल्या के पास पहुँचने पर भी हम कृपा का ऐसा ही निकट स्पर्श देखेंगे, पर ताड़का की यह घटना अपनी पूर्णता इसी एक चौपाई में पा लेती है।
ताड़का क्रोध से दौड़ती है। राम एक बाण से उसके प्राण हरते हैं और उसे दीन जानकर अपना पद देते हैं। वध के साथ उसका कल्याण भी तुलसी की चौपाई में स्पष्ट कहा गया है।
विद्या, आयुध और आश्रम का भोजन
इसके बाद विश्वामित्र मन में अपने स्वामी को पहचानकर उन्हें विद्या देते हैं। तुलसी जिसको विद्या दी जा रही है, उसी को विद्या का भण्डार कहते हैं। मुनि यह जानते हुए भी देने का यह कार्य करते हैं। पोद्दार जी की टीका इसे लीला को पूर्ण करने के लिये कहती है। अयोध्या की दिनचर्या में प्रभु को वेद पुराण सुनते देखा था। यहाँ वही प्रभु मुनि से विद्या ग्रहण करते हैं। भक्त को देने और सेवा करने का अवसर मिलता है, और भगवान् उसकी दी हुई वस्तु स्वीकार करते हैं।
उस विद्या का फल बहुत स्पष्ट है। भूख और प्यास नहीं लगती, शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश होता है। उसके किसी नाम का यहाँ उल्लेख नहीं किया गया है। मुनि के देने का वर्णन सीधे उसके प्रभाव तक आता है। उसके बाद सब अस्त्र शस्त्र समर्पित किये जाते हैं और विश्वामित्र राम को अपने आश्रम में लाते हैं। मार्ग में दिखायी गयी ताड़का का प्रसंग पीछे रह गया है। अब उसी स्थान पर पहुँचना होता है जिसके यज्ञ में बार बार राक्षस उपद्रव करते थे।
आयुध सर्ब समर्पि कै प्रभु निज आश्रम आनि।
दोहा २०९
कंद मूल फल भोजन दीन्ह भगति हित जानि॥ २०९॥
आश्रम में कन्द, मूल और फल का भोजन कराया जाता है। दोहा इस अर्पण के साथ भक्ति और हित का भाव रखता है। मुनि प्रभु को अपना परम हितैषी जानकर प्रेम से भोजन देते हैं। अयोध्या में दशरथ ने विश्वामित्र को अनेक प्रकार का भोजन कराया था। यहाँ मुनि अपने आश्रम में प्रभु को कन्द मूल फल खिलाते हैं। दोनों सत्कारों में अपने अतिथि के लिये आदर है। अभी जिनको भूख और प्यास न लगनेवाली विद्या दी गयी, उन्हीं के सामने भक्त का भोजन भी आता है और उनकी सेवा का क्रम बना रहता है।
विद्या के भण्डार प्रभु को विश्वामित्र ऐसी विद्या देते हैं जिससे भूख प्यास नहीं लगती और अतुलित बल तथा तेज प्रकट होता है। सब आयुध समर्पित करके वे उन्हें आश्रम लाते हैं और भक्ति से कन्द मूल फल का भोजन कराते हैं।
निर्भय होकर यज्ञ कीजिये
सवेरे राम विश्वामित्र से कहते हैं कि आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये। सब मुनि हवन आरम्भ करते हैं और राम स्वयं यज्ञ की रखवाली पर रहते हैं। आश्रम का वह काम फिर चल पड़ता है जिसे राक्षसों के उपद्रव ने दुःख और चिन्ता का कारण बना दिया था। मुनि अपने कर्म में लगते हैं, रक्षा का भार रघुनाथ सँभालते हैं। अयोध्या में विश्वामित्र ने सनाथ होने की जो प्रार्थना की थी, उसकी पूर्ति इस निश्चिन्त आरम्भ में दिखने लगती है।
सुनि मारीच निसाचर क्रोही । लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥
चौपाई ८
बिनु फर बान राम तेहि मारा । सत जोजन गा सागर पारा॥
समाचार सुनकर मुनियों का शत्रु क्रोधी मारीच अपने सहायकों को लेकर दौड़ता है। राम उसे बिना फलवाला बाण मारते हैं। यहाँ फल का अर्थ बाण के आगे लगा हुआ नुकीला भाग है। उस प्रहार से मारीच सौ योजन विस्तारवाले समुद्र के पार जा गिरता है, यही अर्थ टीका स्पष्ट करती है। बाण कैसा था और मारीच कहाँ पहुँचा, दोनों बातें अलग अलग बतायी गयी हैं। उसके लिये कथा यही परिणाम कहती है। आगे सुबाहु के विरुद्ध चलनेवाला अस्त्र अलग है और उसके साथ लक्ष्मण के युद्ध का उल्लेख भी आता है।
पावक सर सुबाहु पुनि मारा । अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥
चौपाई ९
मारि असुर द्विज निर्भयकारी । अस्तुति करहिं देव मुनि झारी॥
सुबाहु को राम अग्निबाण से मारते हैं। छोटे भाई लक्ष्मण राक्षसों की सेना का संहार करते हैं। यज्ञ की रक्षा में दोनों भाइयों का कार्य है, और चौपाई उसे साफ़ बाँटकर कहती है। मारीच पर बिना फल का बाण चला, सुबाहु पर अग्निबाण, सेना का अन्त लक्ष्मण ने किया। इस प्रकार राक्षसों को मारकर ब्राह्मणों को निर्भय किया जाता है। सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगते हैं। जिस कार्य के लिये विश्वामित्र राजद्वार तक गये थे, वह पूरा हुआ है। यज्ञ देखते ही दौड़ पड़नेवाले उपद्रवियों का सामना हो चुका है।
राम वहाँ कुछ दिन और ठहरते हैं और ब्राह्मणों पर दया करते हैं। अब आश्रम में पुराणों की अनेक कथाएँ सुनायी जाती हैं। प्रभु सब जानते हैं, फिर भी ब्राह्मण भक्तिभाव से उन्हें कथा कहते हैं। विद्या के भण्डार को विद्या देने के बाद यहाँ सब जाननेवाले को कथाएँ सुनाने का दृश्य मिलता है। सेवा का सम्बन्ध युद्ध पूरा होते ही समाप्त नहीं होता। मुनियों को प्रभु का साथ और मिलता है, और वे अपने प्रेम को कथा कहकर प्रकट करते हैं। ठहरने के लिये केवल कुछ दिन कहा गया है; उसी अवकाश में यह संग बना रहता है।
फिर विश्वामित्र आदर से समझाकर कहते हैं कि प्रभु चलकर एक चरित्र देखें। धनुषयज्ञ की बात सुनकर रघुकुल के स्वामी प्रसन्न होते हैं और मुनि के साथ चल देते हैं। मुनि की पहली विनती यज्ञ की रक्षा के लिये थी। अब वे एक और यज्ञ का चरित्र दिखाने ले जा रहे हैं। कथा में इस निमन्त्रण के बाद मार्ग खुलता है, और उसी मार्ग पर एक ऐसा आश्रम दिखायी देता है जिसकी नीरवता दोनों भाइयों को दूसरी प्रतीक्षा के सामने ले आएगी।
राम मुनियों को निर्भय यज्ञ करने को कहते हैं। मारीच बिना फल के बाण से सौ योजन विस्तारवाले समुद्र के पार जा गिरता है, सुबाहु अग्निबाण से मारा जाता है और लक्ष्मण सेना का संहार करते हैं। कुछ दिन कथाएँ सुनते हुए ठहरने के बाद दोनों भाई धनुषयज्ञ देखने मुनि के साथ चलते हैं।
एक आश्रम, जहाँ कोई जीव नहीं
रास्ते में एक आश्रम दिखायी पड़ता है। तुलसी उसकी पहचान वहाँ किसी के न होने से कराते हैं। पक्षी नहीं हैं, मृग नहीं हैं, कोई जीव जन्तु नहीं है। विश्वामित्र के आश्रम से चली कथा अब इस सूने स्थान पर ठहरती है। वहाँ मुनि हवन और कथा में लगे थे; यहाँ जीवों की साधारण उपस्थिति तक नहीं मिलती। राम एक पत्थर की शिला देखते हैं और मुनि से पूछते हैं। विश्वामित्र विस्तार से कथा कहते हैं। दोहे में उस कथा का केन्द्र और इस समय की प्रार्थना सामने रखी जाती है।
गौतम नारि श्राप बस उपल देह धरि धीर।
दोहा २१०
चरन कमल रज चाहति कृपा करहु रघुबीर॥ २१०॥
ये गौतम मुनि की पत्नी हैं, जिन्हें पोद्दार जी की टीका अहल्या नाम से पहचानती है। शाप के वश पत्थर की देह धारण किये हुए हैं। धीरज रखकर राम के चरणकमलों की धूल चाहती हैं। मुनि रघुवीर से उन पर कृपा करने का निवेदन करते हैं। दोहे में शिला की निश्चलता के भीतर एक चाह और एक धैर्य बताया गया है। बाहर जिस रूप में गति नहीं दिखती, उसी में चरणरज की चाह बनी हुई है। राम का प्रश्न उस शिला को देख लेने पर उठा था, और उत्तर में उस प्रतीक्षा का परिचय मिला है।
विश्वामित्र अयोध्या से दोनों भाइयों को अपने भय के निवारण के लिये लाये थे। इस सूने आश्रम में वे अहल्या के लिये कृपा माँगते हैं। उनके वचन राम के चरणों और अहल्या की प्रतीक्षा को एक साथ रख देते हैं। आगे होनेवाली घटना में चरणों का वही स्पर्श प्रधान है। शिला बनी गौतम की पत्नी के विषय में इतना जान लेने पर कथा सीधे उनके प्रकट होने की ओर बढ़ती है। प्रतीक्षा के लिये धीरज कहा गया है, और कृपा आने पर वही मन प्रेम से अधीर हो उठेगा।
धनुषयज्ञ की ओर जाते हुए एक निर्जन आश्रम में राम शिला देखकर प्रश्न करते हैं। विश्वामित्र बताते हैं कि गौतम की पत्नी अहल्या शापवश पत्थर का शरीर लिये धीरज से चरणरज चाहती हैं, और उन पर कृपा की प्रार्थना करते हैं।
अहल्या की आँखों से बहता हुआ आनन्द
राम के पवित्र और शोक मिटानेवाले चरणों का स्पर्श पाते ही तपोमूर्ति अहल्या प्रकट हो जाती हैं। सामने भक्तों को सुख देनेवाले रघुनाथ हैं। वे उन्हें देखकर हाथ जोड़े खड़ी रह जाती हैं। देह पुलकित है, प्रेम इतना अधिक है कि मन अधीर हो उठा है, और मुख से कोई वचन नहीं निकलता। अभी दोहे में धीरज के साथ चरणरज चाहने की बात थी। अब दर्शन हो गया है और उसी धीरज का स्थान प्रेम की ऐसी अधिकता ने ले लिया है जिसमें बोलना सम्भव नहीं होता।
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
छन्द १
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥
अत्यन्त भाग्यवती अहल्या चरणों से लग जाती हैं। दोनों नेत्रों से जल की धारा बहती है। पोद्दार जी की टीका इन आँसुओं को प्रेम और आनन्द का जल कहती है। उनका प्रकट होना, हाथ जोड़ना, देह का पुलकित होना और आँखों का भर आना, छन्द सबको एक क्रम में दिखाता है। प्रभु के सामने पहुँचकर अभी प्रार्थना का वाक्य भी नहीं बन पाया है। जिस स्पर्श की प्रतीक्षा थी, वह मिल चुका है; उसके मिलने का प्रभाव पहले पूरे शरीर में दिखाई देता है।
फिर वे मन में धीरज करती हैं, प्रभु को पहचानती हैं और रघुनाथ की कृपा से भक्ति पाती हैं। अब अत्यन्त निर्मल वाणी से स्तुति आरम्भ होती है। वे ज्ञान से जानने योग्य रघुनाथ की जय कहती हैं। अपने दैन्य को प्रकट करते हुए अपने लिये अपावन स्त्री का शब्द रखती हैं और प्रभु को जगत् पवित्र करनेवाला कहती हैं। यह अहल्या के मुख से निकली हुई शरण की प्रार्थना है। वे भक्तों को सुख देनेवाले, रावण के शत्रु, कमलनयन और संसार के भय से छुड़ानेवाले कहकर राम को पुकारती हैं। रक्षा की विनती दोहराती हैं, मैं आपकी शरण आयी हूँ।
इसके बाद अहल्या अपने ऊपर पड़े शाप को स्मरण करती हैं। मुनि ने जो शाप दिया, वे उसे अपने लिये परम अनुग्रह मानती हैं। कारण उनके सामने खड़े प्रभु हैं। उसी के कारण संसार से छुड़ानेवाले हरि को आँख भरकर देख पायीं। जिस घटना से शिला का शरीर मिला था, उसे अब वे दर्शन मिल जाने के आलोक में देखती हैं। यह उनका अपना कृतज्ञ भाव है। वे कहती हैं कि शंकर भी प्रभु के दर्शन को सबसे बड़ा लाभ जानते हैं। उनके मन में इस समय उस प्राप्ति का मूल्य इतना है कि बीता हुआ शाप भी अनुग्रह के रूप में स्मरण होता है।
अब वर की प्रार्थना आती है। अहल्या अपने को भोली बुद्धिवाली कहकर एक विनती रखती हैं। कोई और वर नहीं चाहिए। मन भौंरा बनकर प्रभु के चरणकमलों की रज के प्रेमरूपी रस का पान करता रहे। छन्द की इस उपमा में उनका मन भी है और उसका भोजन भी। चरणकमल की धूल में जो अनुराग का रस है, उसी में मन सदा लगा रहे। शरीर का शाप दूर हो चुका है; वे आगे के लिये अपने भीतर प्रेम की यह निरन्तरता माँगती हैं। दर्शन से मिली भक्ति उनके मन का स्थायी आस्वाद बन जाए।
फिर वे उन्हीं चरणों की महिमा कहती हैं जिनका स्पर्श अभी अपने सिर पर पाया है। उनसे परम पवित्र गङ्गा प्रकट हुई हैं, जिन गङ्गा को शिव अपने सिर पर धारण करते हैं। ब्रह्मा उन्हीं चरणकमलों की पूजा करते हैं। कृपालु हरि ने वही चरण अहल्या के सिर पर रखे हैं। उनके वचन में गङ्गा, शिव और ब्रह्मा का स्मरण अपने ऊपर हुई कृपा का आकार बताता है। जिन चरणों से ऐसी पवित्रता प्रकट हुई, जिनकी ऐसी पूजा होती है, वे आज उनके लिये इतने सुलभ हुए हैं।
अहल्या बार बार भगवान् के चरणों में गिरती हैं। जो वर उनके मन को अत्यन्त प्रिय था, वही उन्हें मिलता है। फिर आनन्द से भरकर वे पति के लोक को चली जाती हैं। तुलसी उनकी गति को इसी रूप में बताते हैं। छन्द के आरम्भ में शब्द न निकलनेवाली प्रेम की अधीरता थी, अन्त में इच्छित वर पाकर आनन्दपूर्ण प्रस्थान है। बीच की पूरी स्तुति उसी प्राप्ति को पहचानती और सँभालती है। जिस कृपा से शाप छूटा और भक्ति मिली, उसी के चरणों में मन का अनुराग बने रहने की उनकी विनती स्वीकार हुई है।
चरणस्पर्श से अहल्या प्रकट होती हैं, प्रेम और आनन्द से रोती हैं, फिर कृपा से भक्ति पाकर स्तुति करती हैं। दर्शन मिल जाने के कारण शाप को अपने लिये अनुग्रह मानती हैं और केवल चरणरज में मन का प्रेम बना रहने का वर माँगती हैं। इच्छित वर पाकर वे आनन्द से पति के लोक को जाती हैं।
और अन्त में, अपनी ओर
अहल्या की स्तुति और प्रस्थान के बाद तुलसीदास अपने मन की ओर लौटते हैं। जिन्होंने अभी यह कृपा देखी है, उनके लिये उसका स्मरण भजन की पुकार बनता है। राम दीनों के बन्धु हैं और बिना कारण दया करनेवाले हैं। दोहा इन्हीं दो बातों को सामने रखकर मन से कपट का जंजाल छोड़ने को कहता है। पूरी कथा सुन लेने के बाद कवि अपने भीतर का वह उलझाव पहचानते हैं जो इस सरल आश्रय से दूर रखता है।
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
दोहा २११
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥ २११॥
तुलसी अपने मन को शठ कहते हुए उसी प्रभु का भजन करने को कहते हैं। इस सम्बोधन का रुख अपने भीतर है। अहल्या ने अपने दैन्य को कहकर शरण ली थी; कवि अब अपने मन को कपट छोड़ने के लिये पुकारते हैं। कथा में दूसरों पर बरसी हुई कृपा का वर्णन सुनते हुए हम भी इसी प्रश्न के पास आते हैं कि मन किस आश्रय की ओर लगा रहे। अहल्या की प्रार्थना उसका एक अत्यन्त कोमल रूप दे चुकी है, चरणकमल की रज में प्रेम का रस मिले और मन उसका पान करता रहे।
तुलसीदास दीनबन्धु, अकारण दयालु प्रभु का स्मरण करके अपने मन को कपट का जंजाल छोड़ने और उनका भजन करने को कहते हैं। अहल्या के आनन्द के बाद प्रसंग इसी भीतरी पुकार पर पूरा होता है।
विश्वामित्र आँख भरकर दर्शन का मनोरथ लेकर चले थे। अहल्या आँख भरकर दर्शन पा लेने को अपने लिये परम लाभ कहती हैं। बीच की यात्रा में भय मिटा, यज्ञ की रक्षा हुई और भक्तों की सेवा स्वीकार हुई। अन्त में रह गयी मन की वह माँग जिसे अहल्या ने अपने वर में रखा है, इस प्राप्ति का प्रेम बना रहे। तुलसी उसी दयालु प्रभु की ओर अपने मन को बुलाते हैं।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २०५ से २११, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।