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विश्वामित्र का आगमन, ताड़का-वध और अहल्या

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रामचरितमानसबालकाण्डप्रसंग 24

दशरथ के हृदय से लगकर दो भाई वन की ओर चलते हैं। यज्ञ की रक्षा, और एक सूने आश्रम में चरण छूते ही प्रकट होती अहल्या की कथा।

राम अपने भाइयों और सखाओं को साथ लेकर वन में शिकार खेलने जाते हैं। वे लौटकर पिता को मृग दिखाते हैं, और सबके साथ भोजन करते हैं। अयोध्या में उनके दिन का यही क्रम है। एक वन में विश्वामित्र के जप, यज्ञ और योग पर राक्षसों का भय छाया है। मुनि निश्चय करते हैं कि अब राम के पास चलना चाहिये। उनके जाने से एक पिता के सामने ऐसी माँग आयेगी जो उन्हें अत्यन्त अप्रिय लगेगी।

राम को आँख भरकर देखने की बात इस प्रसंग में दो बार आती है: विश्वामित्र के मनोरथ में और अहल्या की स्तुति में। विश्वामित्र नेत्र भरकर दर्शन का मनोरथ लिये अयोध्या पहुँचते हैं। आगे एक निर्जन आश्रम में शापवश शिला बनी गौतम की पत्नी चरणों की धूल चाहती हैं। बीच में ताड़का एक बाण से मरती है, यज्ञ की रखवाली होती है, और ब्राह्मण निर्भय होते हैं। अन्त में अहल्या यह वर माँगती हैं कि उनका मन भौंरा बनकर चरणकमल के पराग के प्रेमरस का पान करे।

यज्ञ की रखवाली, शिला बनी अहल्या

  • राम दशरथ के पुत्र, जो विश्वामित्र के साथ जाकर यज्ञ की रक्षा करते हैं और अहल्या पर कृपा करते हैं।
  • लक्ष्मण राम के साथ चलनेवाले छोटे भाई, जो यज्ञ पर चढ़ आयी राक्षस सेना का संहार करते हैं।
  • विश्वामित्र गाधि के पुत्र, ज्ञानी महामुनि, जो यज्ञ की रक्षा के लिये दोनों भाइयों को माँगने अयोध्या आते हैं।
  • दशरथ और वसिष्ठ पुत्रों को सौंपते हुए व्याकुल पिता, और उन्हें बहुत प्रकार से समझानेवाले गुरु।
  • ताड़का मार्ग में क्रोध से दौड़ती आती है। राम एक बाण से उसके प्राण हरकर उसे अपना पद देते हैं।
  • मारीच और सुबाहु वे राक्षस जिनसे विश्वामित्र बहुत डरते हैं।
  • अहल्या गौतम की पत्नी, जिनका नाम पोद्दार की टीका देती है। वे शिला के रूप में राम के चरणों की धूल की प्रतीक्षा करती हैं।

अयोध्या में राम का दिन

राम भाइयों और इष्ट मित्रों को बुलाकर साथ लेते हैं, और नित्य वन में शिकार खेलने जाते हैं। मन में पवित्र जानकर मृगों को मारते हैं, और प्रतिदिन लाकर राजा दशरथ को दिखाते हैं। राम के बाण से मरे मृग शरीर छोड़कर देवलोक जाते हैं।

राम छोटे भाइयों और सखाओं के साथ भोजन करते हैं। वे माता पिता की आज्ञा मानते हैं, और जिस तरह नगर के लोग सुखी हों, वैसा ही संयोग करते हैं।

वे मन लगाकर वेद पुराण सुनते हैं, और फिर स्वयं छोटे भाइयों को समझाकर कहते हैं। प्रातःकाल उठकर वे माता, पिता और गुरु को मस्तक नवाते हैं, फिर आज्ञा माँगकर नगर के काम करते हैं। दशरथ यह सब देखकर मन में बहुत प्रसन्न होते हैं। आगे इसी प्रसंग में इन्हीं पिता के मुख की कान्ति पुत्रों को भेजने की बात सुनकर फीकी पड़ेगी।

जिनका अभी उठना, सुनना, भोजन करना और आज्ञा लेना देखा गया, वे व्यापक हैं, अकल, इच्छा से रहित, अजन्मा और निर्गुण हैं। न उनका नाम है, न रूप। वही भगवान् भक्तों के लिये अनेक प्रकार के अनुपम चरित्र करते हैं।

वन में उठी दर्शन की इच्छा

अब शिव आगे की कथा मन लगाकर सुनने को कहते हैं। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्र वन में पवित्र आश्रम जानकर रहते हैं। वहाँ मुनि जप, यज्ञ और योग करते हैं, और मारीच और सुबाहु से बहुत डरते हैं। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते हैं और उपद्रव करते हैं, और मुनि दुःख पाते हैं।

गाधि के पुत्र विश्वामित्र के मन में चिन्ता छा जाती है कि ये पापी राक्षस भगवान् के बिना नहीं मरेंगे। फिर वे विचार करते हैं कि भगवान् ने पृथ्वी का भार हरने के लिये अवतार लिया है।

वे सोचते हैं कि इसी बहाने जाकर उनके चरणों का दर्शन करूँगा और विनती करके दोनों भाइयों को ले आऊँगा। ज्ञान, वैराग्य और सब गुणों के धाम को आँख भरकर देखूँगा।

बहुत प्रकार के मनोरथ करते हुए उन्हें जाने में देर नहीं लगती। सरयू के जल में स्नान करके विश्वामित्र राजा के द्वार पर पहुँचते हैं।

अपने आसन पर मुनि को बिठाकर

विश्वामित्र के आने का समाचार सुनकर दशरथ ब्राह्मणों के समाज को साथ लेकर मिलने जाते हैं। दण्डवत् करके उनका आदर करते हैं, और लाकर अपने आसन पर बिठाते हैं। चरण धोकर बहुत पूजा करते हैं, और कहते हैं कि आज मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं। फिर अनेक प्रकार का भोजन कराते हैं, और मुनि के हृदय में बड़ा हर्ष होता है।

इसके बाद दशरथ चारों पुत्रों को मुनि के चरणों में डाल देते हैं। राम को देखते ही विश्वामित्र अपने देह की सुधि भूल जाते हैं। वे राम के मुख की शोभा देखकर ऐसे मग्न हो जाते हैं, मानो चकोर पूर्ण चन्द्रमा पर लुभा गया हो।

राजा प्रसन्न मन से कहते हैं: हे मुनि, ऐसी कृपा आपने पहले कभी नहीं की। आज किस कारण आना हुआ, कहिये, उसे पूरा करने में मैं देर नहीं लगाऊँगा।

मुनि कहते हैं: हे राजन्, राक्षसों के समूह मुझे सताते हैं, और मैं आपसे माँगने आया हूँ। छोटे भाई के साथ राम को मुझे दीजिये। राक्षसों के मारे जाने पर मैं सनाथ हो जाऊँगा।

वे आगे कहते हैं कि प्रसन्न मन से इन्हें दीजिये, और मोह और अज्ञान छोड़ दीजिये। दशरथ के लिये धर्म और सुयश है, और इन दोनों का अत्यन्त कल्याण।

पिता के लिये सबसे कठिन माँग

यह अत्यन्त अप्रिय बात सुनते ही दशरथ का हृदय काँप उठता है, और मुख की कान्ति कुम्हला जाती है। वे कहते हैं: हे ब्राह्मण, मैंने चौथेपन में चार पुत्र पाये हैं, आपने यह बात विचारकर नहीं कही।

फिर दशरथ अपना सब कुछ सामने रखते हैं: भूमि, गौएँ, धन और खजाना माँग लीजिये, आज बड़े हर्ष से सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राण से प्यारा कुछ नहीं होता, वह भी एक पल में दे दूँगा। राम पर आकर हाथ रुक जाता है।

सभी पुत्र मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं, वे कहते हैं, और राम को देते नहीं बनता। कहाँ अत्यन्त डरावने और कठोर राक्षस, और कहाँ परम किशोर अवस्था के मेरे सुन्दर पुत्र।

प्रेम के रस में सनी राजा की यह वाणी सुनकर ज्ञानी विश्वामित्र मन में बड़ा हर्ष मानते हैं। राजा माँग स्वीकार नहीं कर पा रहे, और माँगनेवाला उनकी वाणी में प्रेम सुनकर आनन्दित है। तब वसिष्ठ राजा को बहुत प्रकार से समझाते हैं, और राजा का सन्देह दूर हो जाता है।

दशरथ दोनों पुत्रों को बड़े आदर से बुलाते हैं, हृदय से लगाते हैं और बहुत प्रकार से शिक्षा देते हैं। फिर विश्वामित्र से कहते हैं: हे नाथ, ये दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि, आप इनके पिता हैं, दूसरा कोई नहीं।

आशीर्वाद लेकर दो भाई चले

राजा बहुत प्रकार के आशीर्वाद देकर दोनों पुत्रों को ऋषि के हवाले कर देते हैं। फिर राम माता के भवन में जाते हैं, और उनके चरणों में सिर नवाकर चल देते हैं।

दोनों भाई पुरुषों में सिंह हैं, वीर हैं और मुनि का भय हरनेवाले हैं। वे प्रसन्न होकर चल रहे हैं। वे कृपा के समुद्र और धीरबुद्धि भी हैं।

और वे सारे विश्व के कारण के भी कारण हैं। उनका रूप देखिये: राम के नेत्र लाल हैं, छाती चौड़ी, भुजाएँ विशाल, और शरीर नील कमल और तमाल जैसा श्याम। कमर में पीताम्बर है, सुन्दर तरकस कसे हैं, और हाथों में धनुष और बाण हैं।

श्याम और गौर, दोनों सुन्दर भाई हैं, और विश्वामित्र ने महान् निधि पा ली है। टीका के अनुसार वे मन में सोचते हैं: मैं जान गया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव हैं। मेरे लिये भगवान् ने अपने पिता को छोड़ दिया। ब्रह्मण्यदेव का अर्थ टीका ब्राह्मणों के भक्त बताती है।

एक बाण और अपना पद

मार्ग में चलते हुए विश्वामित्र ताड़का को दिखाते हैं। सुनते ही वह क्रोध में भरकर दौड़ पड़ती है। राम एक ही बाण से ताड़का के प्राण हर लेते हैं। कथा इस युद्ध का कोई विस्तार नहीं देती।

और राम उसे दीन जानकर अपना पद देते हैं। पोद्दार की टीका इसका अर्थ उनका अपना दिव्य स्वरूप बताती है। एक ही क्षण में वध भी है और निज पद का दान भी। ताड़का की ओर से क्रोध, राम की ओर से प्राण हरना, उसे दीन जानना और अपना पद देना।

विद्या, आयुध और आश्रम का भोजन

इसके बाद विश्वामित्र मन में अपने स्वामी को पहचानकर विद्या के भण्डार को विद्या देते हैं। पोद्दार की टीका बताती है कि मुनि यह लीला को पूरा करने के लिये करते हैं।

उस विद्या का फल साफ़ है: भूख प्यास नहीं लगती, और शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश होता है। उसका कोई नाम यहाँ नहीं दिया गया। फिर मुनि सब अस्त्र शस्त्र समर्पित करते हैं, और राम को अपने आश्रम ले आते हैं।

आश्रम में मुनि उन्हें हितू जानकर भक्ति से कन्द, मूल और फल का भोजन कराते हैं।

निर्भय होकर यज्ञ कीजिये

सवेरे राम मुनि से कहते हैं: आप जाकर निडर होकर यज्ञ कीजिये। सब मुनि हवन करने लगते हैं, और राम स्वयं यज्ञ की रखवाली पर रहते हैं।

यह सुनकर मुनियों का शत्रु, क्रोधी राक्षस मारीच, अपने सहायकों को लेकर दौड़ता है। राम उसे बिना फल का, यानी बिना नोक का, बाण मारते हैं, और वह समुद्र के पार चला जाता है। टीका बताती है कि यह सौ योजन के विस्तारवाला समुद्र है।

सुबाहु को राम अग्निबाण मारते हैं, और छोटे भाई लक्ष्मण राक्षसों की सेना का संहार करते हैं। दोनों भाइयों का काम साफ़ बँटा हुआ है। इस प्रकार राक्षसों को मारकर राम ब्राह्मणों को निर्भय करते हैं, और सारे देवता और मुनि स्तुति करने लगते हैं।

राम वहाँ कुछ दिन और रहकर ब्राह्मणों पर दया करते हैं। ब्राह्मण भक्ति के कारण उन्हें पुराणों की बहुत सी कथाएँ सुनाते हैं, यद्यपि राम जानते हैं।

फिर विश्वामित्र आदर से समझाकर कहते हैं: हे प्रभु, चलकर एक चरित्र देखिये। धनुषयज्ञ की बात सुनकर राम प्रसन्न होकर मुनि के साथ चल देते हैं। अब मुनि उन्हें धनुषयज्ञ दिखाने ले जा रहे हैं, और उसी मार्ग पर एक सूना आश्रम मिलता है।

एक आश्रम, जहाँ कोई जीव नहीं

रास्ते में एक आश्रम दिखता है, जिसकी पहचान वहाँ किसी के न होने से है: न पक्षी, न मृग, न कोई जीव जन्तु। राम एक पत्थर की शिला देखकर मुनि से पूछते हैं, और विश्वामित्र विस्तार से सारी कथा कहते हैं।

ये गौतम की पत्नी हैं, जिन्हें पोद्दार की टीका अहल्या नाम से पहचानती है। शाप के वश पत्थर का देह धारण किये, बड़े धीरज से वे राम के चरणकमलों की धूल चाहती हैं। मुनि राम से उन पर कृपा करने का निवेदन करते हैं।

प्रतीक्षा के लिये धीरज कहा गया है, और स्पर्श पाते ही वे प्रेम से अधीर हो उठेंगी।

अहल्या की आँखों से बहता हुआ आनन्द

राम के पवित्र और शोक मिटानेवाले चरणों का स्पर्श पाते ही तपोमूर्ति अहल्या सचमुच प्रकट हो जाती हैं। राम को देखकर वे हाथ जोड़े सामने खड़ी रह जाती हैं। अत्यन्त प्रेम से वे अधीर हो उठी हैं, देह पुलकित है, और मुख से कोई वचन नहीं निकलता।

बड़भागिनी अहल्या चरणों से लिपट जाती हैं, और दोनों नेत्रों से जल की धारा बहती है। पोद्दार की टीका इन आँसुओं को प्रेम और आनन्द का जल कहती है।

फिर वे मन में धीरज धरती हैं, राम को पहचानती हैं, और उनकी कृपा से भक्ति पाती हैं। अत्यन्त निर्मल वाणी से वे स्तुति आरम्भ करती हैं। वे राम की जय कहती हैं, अपने को अपवित्र स्त्री और उन्हें जगत् को पवित्र करनेवाला कहती हैं। और वे रक्षा की पुकार करती हैं: मैं शरण आयी हूँ।

फिर वे शाप की बात कहती हैं। मुनि ने जो शाप दिया, उसे वे बहुत अच्छा और परम अनुग्रह मानती हैं। संसार से छुड़ानेवाले राम को उन्होंने आँख भरकर देखा है, और यही लाभ, वे कहती हैं, शिव जानते हैं।

अब वर की बात आती है। अपने को भोली बुद्धि की कहकर वे एक ही विनती रखती हैं: कोई और वर नहीं चाहिये। उनका मन भौंरा बनकर राम के चरणकमल के पराग के प्रेमरस का पान करे।

फिर वे उन्हीं चरणों की महिमा कहती हैं जो अभी उनके सिर पर रखे गये हैं। उनसे परम पवित्र गङ्गा प्रकट हुईं, जिन्हें शिव ने सिर पर धारण किया। और ब्रह्मा उन्हीं चरणकमलों को पूजते हैं। वही चरण राम ने उनके सिर पर रखे हैं।

अहल्या बार बार राम के चरणों में गिरती हैं। जो वर उनके मन को अत्यन्त प्रिय था, वही उन्हें मिलता है। और वे आनन्द से भरकर पति के लोक को चली जाती हैं।

शठ मन को पुकार

अहल्या की स्तुति और प्रस्थान के बाद प्रसंग तुलसीदास के अपने वचन पर ठहरता है। ऐसे राम दीनों के बन्धु हैं और बिना कारण दया करते हैं।

टीका के अनुसार तुलसीदास अपने मन को शठ कहकर उन्हीं का भजन करने और कपट का जंजाल छोड़ने को कहते हैं।

विश्वामित्र आँख भरकर दर्शन का मनोरथ लेकर चले थे। अहल्या कहती हैं कि आँख भरकर दर्शन पाना वही लाभ है जिसे शिव जानते हैं।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 205 से 211, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।