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सीता की विनती और शिवधनुष का भंग

रामचरितमानस · बालकाण्ड · सीता की विनती और शिवधनुष का भंग

सीता की विनती और शिवधनुष का भंग

एक ओर कोमल कुमार को देखकर काँपते हुए हृदय हैं, दूसरी ओर उन सबकी चिन्ता पहचानते राम। धनुष उठने से पहले प्रार्थनाओं में बहुत समय बीतता है, उठने पर किसी को समय का पता नहीं चलता।

राम के सामने शिवजी का धनुष है। नगर के स्त्री पुरुष उनकी ओर देख रहे हैं, राजाओं की आशाएँ बुझ रही हैं और मुनियों तथा देवताओं का शोक मिट रहा है। इस भरी हुई सभा में सबकी आँखें एक ओर हैं, पर सबके भीतर एक जैसी बात नहीं चल रही। किसी को अपनी हार दिख रही है, किसी को राम की विजय का भरोसा है, और किसी का स्नेह उनके सुकुमार शरीर को देखकर भय में बदल रहा है।

सीता की माता अपनी सखियों से बात करती हैं। सीता मन ही मन देवताओं को पुकारती हैं। लक्ष्मण पृथ्वी को सँभालनेवालों को सावधान करते हैं। इन सबके बीच राम सबकी दशा देख रहे हैं। तुलसीदास के रामचरितमानस में धनुष टूटने की घड़ी तक पहुँचने के लिये हमें इन आवाज़ों और इस मौन से होकर जाना है। धनुष का भारीपन यहाँ अनेक हृदयों का बोझ भी अपने ऊपर लिये हुए है।

इस प्रसंग के मुख्य किरदार

  • श्रीराम गुरु को प्रणाम करके धनुष की ओर बढ़ते हैं और सीता की व्याकुलता पहचानकर उसे तोड़ देते हैं।
  • सीता देवताओं से विनती करती हुईं, अपने प्रेम की सच्चाई पर भरोसा सँभालती हुईं जानकी।
  • सीता की माता राम की कोमलता देखकर स्नेहवश घबराती हैं और सखियों को पास बुलाती हैं।
  • चतुर सखी तेज को छोटे आकार से न आँकने की बात कहकर रानी का विषाद दूर करती हैं।
  • लक्ष्मण राम की दृष्टि पहचानकर ब्रह्माण्ड को चरणों से दबाते और पृथ्वी के आधारों को सावधान करते हैं।
  • जनक जिनकी प्रतिज्ञा सीता की चिन्ता में और जिनका पछतावा धनुष के जहाज पर रखे भार में आता है।

आशा की रात जाती रही

नृपन्ह केरि आसा निसि नासी । बचन नखत अवली न प्रकासी॥
मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने॥

चौपाई १

राजाओं की आशा को तुलसी रात कहते हैं। उनके वचन उसी रात में चमकते हुए तारों के समान हैं। राम के सामने आते ही वह रात जाती रही और वे तारे भी अपना प्रकाश खो बैठे। जिनके पास कहने को बहुत था, वे अब मौन हैं। इस चित्र में पहले आशा बुझती है, फिर वचन निष्प्रभ होते हैं। धनुष का निर्णय अभी हुआ नहीं, पर राजाओं के भीतर अपनी सफलता का भरोसा टूटने लगा है।

अभिमानी राजा कुमुद की तरह सिमट गये। कपटी राजा उल्लुओं की तरह छिप गये। कुमुद और उल्लू, दोनों को उसी रात का सहारा था जिसे राजाओं की आशा कहा गया है। उजाला होते ही उनके अलग अलग स्वभाव एक ही असुविधा में आ गये। इसी के साथ मुनि और देवता चकवों की तरह शोक से छूट गये। वे फूल बरसाकर सेवा प्रकट करने लगे। एक ही प्रकाश में किसी का गर्व संकुचित होता है और किसी का दुख मिटता है।

राम प्रेमपूर्वक गुरु के चरणों की वन्दना करते हैं और मुनियों से आज्ञा माँगते हैं। उसके बाद उनका चलना उतना ही सहज है जितना उनका प्रणाम। तुलसी उन्हें समस्त जगत् का स्वामी कहते हैं और उनकी चाल के लिये सुन्दर, मतवाले श्रेष्ठ हाथी की उपमा लाते हैं। उस चाल में घबराहट का कोई संकेत नहीं मिलता। नगरभर के स्त्री पुरुष उन्हें चलते देखते हैं और सुख से भर उठते हैं। उनके शरीर में रोमांच हो रहा है।

बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे॥
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं । तोरहुँ रामु गनेस गोसाईं॥

चौपाई २

नगरवासियों की खुशी प्रार्थना बन जाती है। वे पितरों और देवताओं की वन्दना करते हैं, अपने किये हुए पुण्यों को याद करते हैं और गणेश गोसाईं से कहते हैं कि यदि हमारे पुण्य का कुछ भी प्रभाव हो तो राम शिवधनुष को कमल की डंडी की तरह तोड़ दें। अपनी भलाई का जो थोड़ा सा संचित बल है, वह इस समय राम के काम आये। उनका माँगना इतना ही निकट और इतना ही अपना है।

जिस धनुष को सब कठिन समझ रहे हैं, नगरवासियों की विनती उसे कमल की डंडी जितना हलका देखना चाहती है। राम अभी धनुष तक पहुँचे भी नहीं हैं, फिर भी नगरवासियों के मन में उसके सहज टूट जाने का चित्र बन गया है। आगे सीता भी उसके भारीपन को हर लेने की विनती करेंगी। राम की ओर बढ़ता नगर का स्नेह और सीता के भीतर उमड़ता प्रेम, दोनों उसी कठोर वस्तु के हलके हो जाने में अपना सुख देखते हैं।

राजाओं की आशा और गर्व सिमटते हैं, मुनियों तथा देवताओं का शोक मिटता है। गुरु को प्रणाम और मुनियों से आज्ञा लेकर राम सहज चाल से बढ़ते हैं। नगरवासी अपने पुण्यों का स्मरण करके गणेश से धनुष को कमल की डंडी की तरह टूट जाने की विनती करते हैं।

माता का भय और सखी का भरोसा

रामहि प्रेम समेत लखि सखिन्ह समीप बोलाइ।
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ॥ २५५॥

दोहा २५५

सीता की माता राम को प्रेम से देखती हैं और सखियों को अपने पास बुला लेती हैं। स्नेह ने उन्हें इतना व्याकुल कर दिया है कि उनके बोलने में विलाप उतर आया है। वे कहती हैं, सखी, सब कौतुक देखनेवाले हो गये हैं। जो हमारे हितैषी कहलाते हैं, वे भी यही तमाशा देख रहे हैं। कोई गुरु के पास जाकर समझाता क्यों नहीं कि ये बालक हैं और इनके लिये ऐसा हठ उचित नहीं। सभा के देखने में उन्हें सहायता की कमी खटक रही है।

पोद्दार जी की टीका यहाँ गुरु की पहचान विश्वामित्र के रूप में करती है। रानी की दृष्टि में राम को इस भारी धनुष की ओर भेजना और राम का उसे तोड़ने चल देना, दोनों स्नेह के कारण चिन्ता का विषय हो गये हैं। जिसको देखकर नगर रोमांचित है, उसी को देखकर माता बिलख रही हैं। उनके मन में राम की कोमलता इतनी बड़ी हो गयी है कि बाकी सब लोग उस कोमलता के प्रति असावधान जान पड़ते हैं।

वे धनुष का परिचय सखियों को याद दिलाती हैं। रावण और बाण ने इसे छुआ तक नहीं, सभी राजा घमंड करके हार चुके। अब वही धनुष इस सुकुमार राजकुमार के हाथों में दिया जा रहा है। हंस का बच्चा कहीं मन्दराचल उठा सकता है। इस प्रश्न में रानी ने दोनों को एक साथ रख दिया है, हंस के बच्चे की नाजुक देह और पर्वत का भारीपन। उनको यह अन्तर इतना स्पष्ट दिखता है कि सभा के चुप रहने का कारण समझ में नहीं आता।

फिर उनकी चिन्ता राजा तक पहुँचती है। राजा का सारा सयानापन कहाँ चला गया। विधाता की गति कुछ जानी नहीं जाती। राम के लिये उमड़े स्नेह में वे जिनसे आशा कर सकती थीं, एक एक करके उन्हीं की ओर देखती हैं। हितैषी देख रहे हैं, गुरु को कोई समझा नहीं रहा, राजा की समझ भी साथ छोड़ती जान पड़ती है। इस उलझन के बीच एक चतुर सखी बहुत कोमल वाणी में उत्तर देती हैं, रानी, तेजवान को छोटा मत गिनिये।

सखी की पहली मिसाल कुंभज मुनि की है, जिन्हें पोद्दार जी की टीका अगस्त्य बताती है। एक ओर वे छोटे से मुनि और दूसरी ओर अपार समुद्र। फिर भी समुद्र को उन्होंने सोख लिया और उसका सुयश सारे संसार में फैल गया। दूसरी मिसाल सूर्यमण्डल की है। देखने में कितना छोटा लगता है, पर उसका उदय होते ही तीनों लोकों का अन्धकार भाग जाता है। जो प्रभाव सामने पड़ता है, उसकी नाप देह या आकार देखकर नहीं मिलती।

मंत्र परम लघु जासु बस बिधि हरि हर सुर सर्ब।
महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब॥ २५६॥

दोहा २५६

तीसरी मिसाल मन्त्र है। मन्त्र बहुत छोटा होता है, फिर भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव और सभी देवता उसके वश में होते हैं। चौथी मिसाल अंकुश है। सामने बड़ा मतवाला गजराज हो, तब भी उसे वश में रखनेवाला अंकुश छोटा ही रहता है। सखी हर बार रानी के उसी प्रश्न का उत्तर दे रही हैं जिसमें एक छोटा शरीर और एक बड़ा काम आमने सामने रखे गये थे। काम की विशालता से करनेवाले की असमर्थता तय नहीं की जा सकती।

काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। सकल भुवन अपने बस कीन्हे॥
देबि तजिअ संसउ अस जानी । भंजब धनुषु राम सुनु रानी॥

चौपाई ३

पाँचवीं मिसाल कामदेव की है। उनके हाथों में फूलों का धनुष और फूलों के बाण हैं, और उन्हीं से उन्होंने सारे लोक वश में कर रखे हैं। फूल की कोमलता भी प्रभाव को छोटा नहीं करती। सखी अब रानी को उसी समझ पर टिकने को कहती हैं। देवी, ऐसा जानकर सन्देह छोड़ दीजिये। सुनिये रानी, राम धनुष अवश्य तोड़ेंगे। इतने उदाहरणों के बाद उनका वचन सीधे उस धनुष और उस कुमार पर आकर ठहर जाता है जिसे देखकर रानी घबरा उठी थीं।

सखी की बात सुनकर रानी को विश्वास हो गया। विषाद मिटा और राम के प्रति प्रेम बहुत बढ़ गया। अभी धनुष टूटा नहीं है। यह परिवर्तन सखी के समझाने से हुआ है। रानी का स्नेह अपनी जगह बना रहता है, केवल उसके साथ बैठा भय हट जाता है। सभा में एक व्याकुल हृदय को ऐसी कोमल वाणी मिलती है जो उसके प्रेम को आहत किये बिना उसके संदेह का उत्तर दे सके।

सीता की माता राम की कोमलता देखकर घबराती हैं और हितैषियों तथा राजा की चुप्पी पर दुख करती हैं। सखी अगस्त्य, सूर्य, मन्त्र, अंकुश और कामदेव के फूलोंवाले शस्त्रों के उदाहरण देकर समझाती हैं कि तेज को आकार से न आँकें। रानी को विश्वास होता है, विषाद मिटता है और प्रेम बढ़ता है।

महेश भवानी से विनती, गणेश से पुकार

माता को सखी की बात से भरोसा मिला है। उसी समय राम को देखती हुई सीता भयभीत हृदय से देवताओं को मना रही हैं। एक विनती के बाद दूसरी विनती उठती है। उनकी व्याकुलता मन के भीतर है और प्रार्थना भी वहीं चल रही है। वे महेश और भवानी को पुकारती हैं, मुझ पर प्रसन्न होइये। मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे आज सुफल कीजिये। मुझ पर स्नेह करके इस धनुष का भारीपन हर लीजिये।

मनहीं मन मनाव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी॥
करहु सफल आपनि सेवकाई । करि हितु हरहु चाप गरुआई॥

चौपाई ४

इस प्रार्थना में शिव और पार्वती दोनों से कृपा माँगी गयी है। धनुष शिवजी का है और सीता उसका भार उन्हीं के सामने रखती हैं। सेवा को याद करते समय उनकी बात में अपनापन है। जिन्हें सेवती आयी हैं, उन्हीं से अब अपने मन का यह काम कह रही हैं। कठिनाई धनुष की गुरुता है, इसलिये कृपा का रूप भी बहुत साफ है, वह गुरुता हट जाये। प्रेम ने उनकी विनती को किसी और ओर फैलने नहीं दिया।

गननायक बरदायक देवा । आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा॥
बार बार बिनती सुनि मोरी । करहु चाप गुरुता अति थोरी॥

चौपाई ५

फिर गणेश से अलग विनती होती है। हे गणों के नायक, वर देनेवाले देवता, मैंने आज ही के लिये आपकी सेवा की थी। मेरी बार बार की प्रार्थना सुनकर धनुष का भारीपन बहुत कम कर दीजिये। नगर के स्त्री पुरुष भी गणेश को मना चुके हैं। अब वही पुकार सीता के भीतर और अधिक निकट हो जाती है। वे इस दिन को अपनी सेवा के फल से जोड़ती हैं और अपनी पूरी उत्कण्ठा बार बार की विनती में रख देती हैं।

सीता राम को देखती हैं, धीरज सँभालती हैं, देवताओं को मनाती हैं, फिर राम को देखती हैं। उनकी दृष्टि जिस रूप पर ठहरती है, उसी की कोमलता प्रार्थना को और तीव्र कर देती है। धैर्य धरना यहाँ एक बार का काम नहीं रह गया। बार बार उठती व्याकुलता के बीच उसे बार बार लौटाना पड़ रहा है। मन के भीतर देवताओं से कहे गये वचन बाहर नहीं सुनाई देते, पर देह अपने ढंग से उनका पता दे रही है।

देखि देखि रघुबीर तन सुर मनाव धरि धीर।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर॥ २५७॥

दोहा २५७

आँखें प्रेम के जल से भरी हैं और शरीर में रोमांच की पंक्तियाँ उठ रही हैं। भय और प्रेम इस दशा में साथ साथ दिखाई देते हैं। राम को देखकर मिलनेवाला सुख है और धनुष का विचार आते ही उपजनेवाली चिन्ता भी। सीता के लिये उन्हें देख लेना ही इस क्षण पर्याप्त नहीं हो पा रहा। उनके सामने खड़ी कठिनाई का भी अन्त होना चाहिये। आँखों में भरे जल के साथ उनकी विनती उसी अन्त की बाट देखती है।

सीता मन ही मन महेश और भवानी से अपनी सेवा सफल करने तथा धनुष का भार हरने की विनती करती हैं। गणेश से अलग प्रार्थना करती हैं कि आज के लिये की गयी सेवा सुफल हो और धनुष बहुत हलका हो जाये। राम को देखती हुई उनकी आँखों में प्रेमाश्रु हैं और देह में रोमांच है।

प्रतिज्ञा की कठोरता और धनुष से आसरा

सीता अच्छी तरह नेत्र भरकर राम की शोभा देखती हैं। फिर पिता की प्रतिज्ञा याद आती है और मन क्षुब्ध हो उठता है। अभी जिस रूप को देखकर प्रेम बढ़ा था, उसी के आगे कठिन प्रतिज्ञा का स्मरण रख देने से उनका दुख भी बढ़ जाता है। वे मन ही मन कहती हैं कि पिताजी ने कैसा दारुण हठ ठान लिया है। इस समय वे लाभ और हानि कुछ भी नहीं समझ रहे। सीता को पिता का प्रण अपने सुख और राम की कोमलता के बीच खड़ा दिखाई दे रहा है।

मन की शिकायत अब मंत्रियों तक जाती है। मंत्री भय के कारण कोई सीख नहीं दे रहे। इतने बुद्धिमानों की सभा में ऐसा अनुचित काम हो रहा है और समझानेवाला कोई नहीं मिलता। माता ने हितैषियों के चुपचाप देखने पर दुख किया था। सीता को मंत्रियों की चुप्पी खटक रही है। दोनों की व्यथा में सभा की बुद्धि से एक आशा जुड़ी है, कोई इस कठिन बात को समझे और कहे। सीता की बात भीतर ही भीतर चलती रहती है।

उनके मन में दो रूप आमने सामने आते हैं। कहाँ वज्र से भी कठोर यह धनुष, कहाँ कोमल शरीर के श्यामल किशोर। धनुष की कठोरता देखते देखते और बढ़ती मालूम होती है, राम की कोमलता आँखों में और गहरी उतरती है। वे विधाता से पूछती हैं कि हृदय में धीरज किस तरह धरूँ। सिरस के फूल के कण से कहीं हीरा छेदा जा सकता है। फूल के एक छोटे से अंश और हीरे के बीच की यह दूरी उनकी व्याकुलता का रूप बन गयी है।

बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा । सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा॥
सकल सभा कै मति भै भोरी । अब मोहि संभुचाप गति तोरी॥

चौपाई ६

सारी सभा की बुद्धि उन्हें भोली, बावली हुई जान पड़ती है। अब किसी मनुष्य से उपाय मिलता नहीं दिखता तो वे स्वयं शिवजी के धनुष की ओर मुड़ती हैं। हे धनुष, अब मुझे आपका ही आसरा है। अपनी जड़ता इन लोगों पर डाल दीजिये और रघुनाथ को देखकर हलके हो जाइये। जिस जड़ वस्तु का भार सारी चिन्ता का कारण है, सीता उसी से समझदारी और दया की आशा करती हैं। लोगों की बुद्धि पर अविश्वास और धनुष से आसरा, एक ही व्याकुल प्रार्थना में आ मिलते हैं।

धनुष को हलका होने की विनती केवल भार घटाने की बात नहीं रह जाती। सीता चाहती हैं कि वह राम को देखे। जिस कोमल रूप को देखकर उनका अपना हृदय पिघल रहा है, उसे देखकर यह धनुष भी अपनी जड़ता छोड़ दे। इस पुकार के बीच उनके मन में बड़ा सन्ताप है। निमेष का एक छोटा सा अंश भी सौ युग के समान बीतता है। सीता के लिये प्रतीक्षा की हर सूक्ष्म कड़ी बहुत लम्बी हो गयी है।

पिता की प्रतिज्ञा याद करके सीता दुखी होती हैं। उन्हें मंत्रियों की भयभरी चुप्पी अनुचित लगती है और कठोर धनुष के सामने राम की कोमलता देखकर धैर्य नहीं रहता। वे धनुष से ही आसरा माँगती हैं कि अपनी जड़ता लोगों पर डालकर राम के लिये हलका हो जाये।

आँखों की चंचलता, वाणी का संकोच

सीता की दृष्टि राम की ओर उठती है और फिर धरती की ओर लौट आती है। आँखें एक जगह ठहर नहीं पा रहीं। जिनको देखना चाहती हैं, उन्हीं को देखते रहने का संकोच भी है। उनकी इस चंचलता को तुलसी ऐसे चित्र में रखते हैं जिसमें सारा सौन्दर्य गति से बनता है। चन्द्रमण्डल का एक डोल है और उसमें कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हैं। चन्द्रमा जैसे मुख में नेत्रों की जोड़ी हर बार कुछ बदल देती है।

प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि राजत लोचन लोल।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल॥ २५८॥

दोहा २५८

यहाँ आँखें खुलकर अपना हाल प्रकट कर रही हैं, पर वाणी अभी भीतर रुकी हुई है। सीता बोल नहीं पातीं। तुलसी मुख को कमल और वाणी को भौंरी कहते हैं। लाज की रात सामने है, इसलिये वह भौंरी मुख के कमल में ही बन्द है। भीतर इतना कुछ कहा जा रहा है, महेश भवानी से विनती, गणेश से आग्रह, पिता के प्रण पर दुख और धनुष से पुकार, पर सभा के सामने उस वाणी के लिये निकलने का मार्ग नहीं बनता।

गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी॥
लोचन जलु रह लोचन कोना । जैसें परम कृपन कर सोना॥

चौपाई ७

आँसू भी पूरा बाहर नहीं आ पाते। नेत्रों का जल उनके कोनों में ठहरा हुआ है। उसकी उपमा बहुत बड़े कंजूस के सोने से दी गयी है, जो कोने में ही गड़ा रह जाता है। अभी तक चन्द्रमा, मछलियाँ, कमल और भौंरी थे। अब भीतर सँभालकर रखे धन का चित्र आता है। आँसू आँख में हैं, उनका भार भी है, पर बहकर हलका हो जाने की छूट नहीं मिलती। स्नेह की अधिकता और लाज का संकोच दोनों उसी छोटे से कोने में दिखाई देते हैं।

इन आँखों को देखते हुए हमें सीता का मौन सुनाई देने लगता है। राम और धरती के बीच चलती दृष्टि, मुख के भीतर रुकी वाणी और नेत्रों के कोने में रुका जल, तीनों मिलकर उनकी कठिन दशा बताते हैं। कोई भी भाव पूरी तरह बाहर नहीं जा पा रहा। इसी बढ़ी हुई व्याकुलता को वे स्वयं पहचानती हैं और सकुचा जाती हैं। तब धीरज को फिर सँभालने तथा हृदय में विश्वास लाने की चेष्टा होती है।

सीता राम को देखकर धरती की ओर देखती हैं। चंचल नेत्र चन्द्रमण्डल के डोल में खेलती दो मछलियों जैसे हैं। वाणीरूपी भौंरी लाज की रात में मुखकमल के भीतर रुकी है और आँसू नेत्रों के कोने में कंजूस के छिपे सोने की तरह ठहरे हैं।

प्रेम का सच्चा प्रण और राम की दृष्टि

व्याकुलता बढ़ जाने पर सीता धीरज धरती हैं और हृदय में विश्वास ले आती हैं। अब उनका ध्यान अपने प्रण की सच्चाई पर टिकता है। यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है, यदि मेरा चित्त रघुनाथ के चरणकमलों में वास्तव में अनुरक्त है, तो सबके हृदय में निवास करनेवाले भगवान् मुझे रघुश्रेष्ठ राम की दासी अवश्य बनायेंगे। अपनी चाह कहने के लिये वे अपने प्रेम के तीनों आधार साथ रखती हैं, शरीर, मन और वाणी।

तौ भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर कै दासी॥
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संदेहू॥

चौपाई ८

जो सबके हृदय में बसते हैं, उनके सामने मन की बात छिपी नहीं रह सकती। सीता ने सभा में अपने लिये कोई वचन नहीं कहा, पर यहाँ वह मौन उनके विश्वास को रोकता नहीं। हृदय में रहनेवाले भगवान् उसके भीतर की सच्चाई जानते हैं। इसी भरोसे के पास तुलसी सच्चे स्नेह का निश्चय रखते हैं। जिसका जिस पर सत्य प्रेम होता है, वह उसे मिलता है, इसमें सन्देह नहीं। सीता की भीतर की विनती इसी आश्वासन के साथ जुड़ती है।

इस विश्वास तक आते आते उनकी प्रार्थना ने कई रूप लिये हैं। पहले देवताओं से धनुष का भार हरने को कहा, फिर सभा की समझ पर क्षोभ हुआ, फिर धनुष से ही हलका होने का आसरा माँगा। अब मन अपने सच्चे अनुराग को सँभाल रहा है। जिस कठिनाई को बाहर से देखकर भय बढ़ रहा था, उसके बीच अपने प्रण की सत्यता उन्हें धीरज देती है। यह धैर्य उस प्रेम को जाननेवाले भगवान् के भरोसे पर टिका है।

प्रभु की देह की ओर देखकर सीता शरीर से प्रेम का निश्चय कर लेती हैं। पोद्दार जी की टीका इसका आशय स्पष्ट करती है कि यह शरीर इन्हीं का होकर रहेगा या रहेगा ही नहीं। सीता का प्रण कितनी दूर तक गया है, यह इस व्याख्या में खुलता है। कृपानिधान राम सब जान जाते हैं। न आँखों में रुका जल उनसे छिपा है, न मुख में रुकी वाणी के भीतर का संकल्प। सीता की दृष्टि के सामने उनका जानना उपस्थित है।

राम सीता को देखते हैं, फिर धनुष की ओर ताकते हैं। इस दूसरी दृष्टि की उपमा गरुड़ के सामने छोटे साँप की है। सीता के भय में धनुष वज्र से कठोर और हीरे जैसा दुर्जेय था। राम की दृष्टि में वही धनुष अब छोटे साँप के समान है। कठिनाई का यह बदला हुआ आकार आगे के काम की सहजता बता देता है। पहले सीता का निश्चय जाना गया है, फिर धनुष देखा गया है। राम की आँखों के इस क्रम को लक्ष्मण पहचान लेते हैं।

सीता अपने तन, मन और वचन के सच्चे प्रेम पर भरोसा करती हैं कि अन्तर्यामी भगवान् उन्हें राम की दासी बनायेंगे। राम उनका पूरा निश्चय जान लेते हैं और सीता को देखकर धनुष की ओर वैसे ताकते हैं जैसे गरुड़ छोटे साँप को देखें।

लक्ष्मण पृथ्वी के आधारों को सावधान करते हैं

लक्ष्मण ने देख लिया कि रघुवंश के मणि राम की दृष्टि शिवधनुष पर पड़ी है। यह देखते ही उनके शरीर में रोमांच हो जाता है। वे ब्रह्माण्ड को अपने चरणों से दबाकर बोलते हैं। अभी धनुष टूटने की आवाज़ नहीं हुई, किन्तु लक्ष्मण उसकी तैयारी पहचान गये हैं। राम की एक दृष्टि उन्हें बता देती है कि पृथ्वी को सँभालनेवालों को सावधान हो जाना चाहिये। उनके उत्साह का पहला काम धरती को स्थिर करने की आज्ञा देना है।

दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला॥
रामु चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा॥

चौपाई ९

वे दिशाओं के हाथियों, कच्छप, शेष और वाराह को सम्बोधित करते हैं। धीरज रखकर पृथ्वी को थामे रहिये, जिससे वह डोलने न पाये। राम शंकरजी के धनुष को तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुनकर सब सजग हो जाइये। इस वचन में जिस विराट हलचल की आशंका है, उसके सामने धनुष के पास की सभा बहुत छोटी लगती है। एक काम यहाँ होनेवाला है और उसकी गूँज पृथ्वी के आधारों तक पहुँचेगी। लक्ष्मण ने उन सबको पहले ही सचेत कर दिया है।

उनकी चेतावनी में धैर्य और सजगता दोनों माँगे गये हैं। केवल भारी बल का नाम नहीं लिया गया, थामे रहने को कहा गया है। दिग्गज हों या कच्छप, शेष हों या वाराह, सबको अपना स्थान सँभालना है। जिन आधारों को वे पुकार रहे हैं, धनुष टूटने पर आनेवाले छन्द में वे सभी फिर दिखाई देंगे। अभी उनके नाम आज्ञा सुननेवालों के रूप में आते हैं। आगे उन्हीं की दशा से टूटने की ध्वनि का वेग प्रकट होगा।

राम की दृष्टि धनुष पर पड़ते ही लक्ष्मण पुलकित होकर ब्रह्माण्ड को चरणों से दबाते हैं। वे दिग्गजों, कच्छप, शेष और वाराह को धैर्य से पृथ्वी थामे रखने तथा धनुषभंग के लिये सजग होने की आज्ञा देते हैं।

धनुष के जहाज पर चढ़ा हुआ भार

राम धनुष के निकट आते हैं। स्त्री पुरुष फिर देवताओं और अपने पुण्यों को मनाते हैं। उनके चलने पर जो प्रार्थना उठी थी, धनुष के पास पहुँचने पर वह फिर उठती है। सारी दृष्टियाँ इसी निकटता पर लगी हैं। तुलसी अब उस धनुष के साथ एक बड़ा रूपक खड़ा करते हैं। वह एक जहाज बन जाता है, और सभा के भीतर बिखरे हुए सन्देह तथा दुख उस पर एक साथ सवार हो जाते हैं।

सबसे पहले सबका सन्देह और अज्ञान है। फिर नीच राजाओं का अभिमान है। इसी भार में भृगुपति के गर्व की गुरुता आती है, जिन्हें पोद्दार जी की टीका परशुराम कहती है। देवताओं और श्रेष्ठ मुनियों की कातरता भी उसमें है। इन सबको एक साथ रख देने से धनुष पर लदा भार केवल किसी एक पक्ष का नहीं रह जाता। अभिमान को भी उसी के सहारे टिकना है और भय को भी उसी से अपना परिणाम पाना है।

सीता का सोच, जनक का पछतावा और रानियों के दारुण दुख की दावाग्नि भी जहाज पर चढ़ती है। एक ही गणना में कितने भिन्न मन समा गये हैं। राजाओं का गर्व और सीता की चिन्ता एक जैसे भाव नहीं हैं, फिर भी धनुष टूटने का प्रश्न दोनों पर छाया हुआ है। जनक का पश्चात्ताप भी अलग से नाम लेकर रखा गया है। रानियों का दुख ऐसा उग्र है कि तुलसी उसे वन में लगी आग के समान कहते हैं।

संभुचाप बड़ बोहितु पाई । चढ़े जाइ सब संगु बनाई॥
राम बाहुबल सिंधु अपारू । चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू॥

चौपाई १०

शिवधनुष का बड़ा जहाज पाकर ये सब साथ हो गये हैं। सामने राम की भुजाओं के बल का अपार समुद्र है और यह सारा समाज उसे पार करना चाहता है। पर जहाज में कोई केवट नहीं है। रूपक अपनी कठिनाई अपने भीतर रखता है, जहाज बड़ा है, सवारियों का भार बहुत है, समुद्र अपार है और पार उतारनेवाला कोई नहीं। अब धनुष पर टिके हुए इन सब भावों का भाग्य राम के बाहुबल के सामने आनेवाला है।

राम सभी लोगों की ओर देखते हैं। वे ऐसे स्थिर हैं जैसे किसी चित्र में लिखे गये हों। अभी तक उनकी प्रार्थना, भय, गर्व और आशा को हमने अलग अलग देखा था। राम की दृष्टि में पूरी सभा एक साथ निश्चल दिखाई देती है। उसके बाद कृपा के धाम सीता की ओर देखते हैं और उन्हें विशेष व्याकुल पाते हैं। सबके बीच यह एक हृदय उनकी दृष्टि में अलग से उभर आता है।

सन्देह, अज्ञान, नीच राजाओं का अभिमान, परशुराम के गर्व का भार, देवताओं और मुनियों का भय, सीता की चिन्ता, जनक का पछतावा और रानियों का दुख धनुष के जहाज पर चढ़े हैं। सामने राम के बाहुबल का अपार समुद्र है और केवट कोई नहीं। राम स्थिर सभा को देखकर विशेष व्याकुल सीता की ओर देखते हैं।

सहायता की घड़ी निकल न जाये

राम वैदेही को बहुत विकल देखते हैं। उनका एक एक निमेष कल्प के समान बीत रहा है। पहले सीता के भीतर समय सौ युगों के बराबर लम्बा हो गया था। अब राम उनकी उस दशा को पहचान रहे हैं। धनुष उनके हाथों की पहुँच में है और सामने वह व्याकुलता है जिसे अधिक देर तक रहने देना उचित नहीं। इस क्षण तुलसी सहायता के समय का प्रश्न उठाते हैं।

पानी के बिना कोई प्यासा शरीर छोड़ दे तो उसके मर जाने पर अमृत का तालाब भी क्या कर सकेगा। जिस समय साधारण पानी से प्राण बच सकते थे, उस समय उसका मिलना आवश्यक था। वह घड़ी बीत जाने पर अमृत का इतना बड़ा भण्डार भी सहायता नहीं कर पाता। राम सीता का हाल देखते हुए विलम्ब का यही अर्थ समझते हैं। प्रेम की व्याकुलता को पहचान लेने के बाद उसे और देर प्रतीक्षा में रखने की गुंजाइश कहाँ रह गयी है।

का बरषा सब कृषी सुखानें । समय चुकें पुनि का पछितानें॥
अस जियँ जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी॥

चौपाई ११

दूसरा चित्र सूखी हुई खेती का है। सारी खेती सूख जाने के बाद वर्षा किस काम आयेगी। समय निकल जाने पर पछताने से क्या लाभ होगा। पहले एक प्यासे प्राणी का जीवन था, अब पूरी खेती है। दोनों चित्रों में समय निकल जाने की हानि सामने रखी गयी है। जिस सहायता का अभी उपयोग है, वही देर से पहुँचकर व्यर्थ हो सकती है। राम के मन में यह समझ आते ही कथा अगले काम की ओर चल देती है।

वे जानकी को देखते हैं और उनका विशेष प्रेम पहचानकर स्वयं पुलकित हो जाते हैं। सीता के शरीर का रोमांच पहले दिखा था, अब राम के शरीर में रोमांच है। एक ओर का प्रेम दूसरी ओर पहचाना जा चुका है। इस पहचान के बाद धनुष के साथ होनेवाला काम बहुत शीघ्र घटेगा। सीता की प्रतीक्षा की लम्बाई और राम के हाथों की फुर्ती के बीच यही करुणा है, सही समय पर व्याकुलता को मिटा देने की करुणा।

सीता की अत्यन्त व्याकुल दशा देखकर राम समझते हैं कि समय निकल जाने पर सहायता निष्फल हो जाती है, जैसे प्यासे की मृत्यु के बाद अमृत या खेती सूखने के बाद वर्षा। जानकी का विशेष प्रेम देखकर वे पुलकित होते हैं।

एक चमक, एक मण्डल और टूटने की ध्वनि

राम मन ही मन गुरु को प्रणाम करते हैं। धनुष की ओर चलने से पहले भी गुरु के चरणों की वन्दना हुई थी। अब हाथ बढ़ने से ठीक पहले फिर प्रणाम है, इस बार भीतर ही भीतर। उसके बाद वे बड़ी फुर्ती से धनुष उठा लेते हैं। हाथ में लेते समय वह बिजली के समान चमकता है और फिर आकाश में मण्डल के समान हो जाता है। इतने समय से जिसकी कठोरता और भारीपन का विचार हो रहा था, वह अब चमक और गति में दिखाई देता है।

लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें । काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा॥

चौपाई १२

धनुष लेना, उस पर प्रत्यंचा चढ़ाना और जोर से खींचना, इन कामों को किसी ने अलग अलग होते नहीं देखा। सबने राम को खड़े देखा। पोद्दार जी की टीका स्पष्ट करती है कि ये तीनों क्रियाएँ इतनी फुर्ती से हुईं कि किसी को पता ही न चला, धनुष कब उठा, कब चढ़ा और कब खिंचा। देर तक देखती रही सभा के सामने निर्णायक काम ऐसे होता है कि दृष्टि उसकी एक एक कड़ी पकड़ नहीं पाती।

उसी क्षण राम ने धनुष बीच से तोड़ दिया। भयङ्कर कठोर ध्वनि से सब लोक भर गये। टूटने का यह सीधा वाक्य बहुत छोटा है। इसके पहले माता का भय, सखी का समझाना, सीता की लम्बी मनौती, अपने प्रण पर उनका भरोसा, लक्ष्मण की चेतावनी और सबकी निश्चल प्रतीक्षा थी। धनुषभंग होते ही वह समूची प्रतीक्षा ध्वनि में खुल जाती है। इस ध्वनि का विस्तार बताने के लिये तुलसी अब पूरा छन्द रखते हैं।

भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारहीं॥

छन्द १

घोर और कठोर रव से लोक भर गये। सूर्य के घोड़े अपना मार्ग छोड़कर चलने लगे। दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ उठे। पृथ्वी डोलने लगी और शेष, वाराह तथा कच्छप व्याकुल होकर कलमला गये। लक्ष्मण ने जिनको सावधान किया था, उनका स्थैर्य भी इस ध्वनि के सामने हिल गया है। धनुष सभा के भीतर टूटा है, उसका प्रभाव सूर्य के मार्ग और पृथ्वी के आधारों तक एक साथ पहुँचता है।

देवता, असुर और मुनि अपने कानों पर हाथ रख लेते हैं। सब व्याकुल होकर विचार कर रहे हैं। पहले ध्वनि का आघात आया है और उसके बाद उसका कारण समझ में आता है। पोद्दार जी की टीका कहती है कि जब सबको निश्चय हो गया कि राम ने धनुष तोड़ दिया है, तब सब उनकी जय बोलने लगे। कानों को ढकनेवाले हाथ और मुख से निकली जयध्वनि, इस पूरे विस्मय की दो अलग घड़ियाँ हैं।

छन्द में ध्वनि बार बार अपना क्षेत्र बढ़ाती है। लोक, सूर्य के घोड़े, दिग्गज, धरती, शेष, वाराह, कच्छप और फिर देवता, असुर तथा मुनि, कोई इस आघात से बाहर नहीं रहता। अन्त में तुलसी राम के धनुष तोड़ने का नाम लेकर जय के वचन सुनाते हैं। जो पहले व्याकुल होकर कारण सोच रहे थे, अब घटना पहचान चुके हैं। भय से ढके कानों वाली सभा और लोकों में राम की विजय का स्वर भर जाता है।

संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।
बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस॥ २६१॥

सोरठा २६१

समापन में फिर वही जहाज लौटता है। शिवजी का धनुष जहाज था और राम की भुजाओं का बल समुद्र। जो पूरा समाज मोहवश पहले उस पर चढ़ा था, वह सब डूब गया। सन्देह, अज्ञान, गर्व और दुख का जितना भार ऊपर गिना गया था, सोरठा उसी को एक साथ समेट लेता है। धनुष बीच से टूट चुका है और उसके सहारे पार पहुँचने की आशा लिये बैठा बोझ भी समुद्र में समा गया है।

मन में गुरु को प्रणाम करके राम इतनी फुर्ती से धनुष उठाते, चढ़ाते और खींचते हैं कि कोई क्रियाओं को अलग नहीं देख पाता। धनुष बीच से टूटता है, उसकी ध्वनि से लोक और पृथ्वी के आधार हिलते हैं। कारण पहचानकर सब राम की जय बोलते हैं। धनुषरूपी जहाज पर चढ़ा मोह का सारा समाज डूब जाता है।

और अन्त में, अपनी ओर

इस प्रसंग में कोमलता बार बार आँखों के सामने आती है। माता को हंस का बच्चा याद आता है। सीता को सिरस के फूल का कण। सखी उन्हीं कोमल वस्तुओं में प्रभाव की सम्भावना दिखाती हैं, कामदेव के फूलोंवाले शस्त्रों में। एक ही कोमलता पहले भय जगाती है, फिर विश्वास के लिये उदाहरण बनती है। धनुष का कठोर होना सब जानते हैं, राम के सामने उसकी नाप क्या है, यह उनके उसे देखने पर खुलता है।

सीता के लिये छोटा सा समय सौ युग और कल्प जितना लम्बा है। राम के हाथों में वही समय इतना शीघ्र बीतता है कि कोई तीन क्रियाओं को अलग नहीं देख पाता। इन दोनों के बीच प्यासे को समय पर जल मिलने और खेती को समय पर वर्षा मिलने की बात रखी गयी है। इसलिये धनुषभंग की फुर्ती के साथ उसकी करुणा भी दिखाई देती है। राम जानते हैं कि किस हृदय की प्रतीक्षा अब पूरी होनी चाहिये।

और सीता के मौन पर फिर ध्यान जाता है। वाणी कमल के भीतर रुकी थी, आँसू नेत्रों के कोने में, पर उनका प्रण राम से छिपा नहीं रहा। सबको चित्र जैसा स्थिर देखते हुए भी उन्होंने जानकी को विशेष व्याकुल जाना। इस भरी सभा में उनके प्रेम की पहचान हुई, और जिस धनुष को लेकर इतना दुख था, वह उसी पहचान के बाद एक क्षण में टूट गया।

जय के स्वर उठ रहे हैं। टूटे हुए धनुष का जहाज अब राम के बाहुबल के समुद्र में डूब चुका है। उस पर चढ़े सन्देह और दुख का भी वही अन्त हुआ है। सीता की बार बार की विनती, माता का सँभला हुआ भरोसा और नगरवासियों की प्रार्थना जिस घड़ी की बाट देख रहे थे, वह घड़ी आ गयी।

स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा २५५ से सोरठा २६१, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।

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