तुलसीदास · रामचरितमानस · द्वितीय सोपान
अयोध्याकाण्ड
राम के वनवास से भरत की नन्दिग्राम साधना तक, छत्तीस प्रसंगों में।
अवध में राम के राज्याभिषेक की तैयारी है। कैकेयी अपने दो वरदान माँगती हैं और राम को चौदह वर्ष का वनवास मिलता है। सीता और लक्ष्मण उनके साथ चलते हैं। इस सोपान में हम उनके वनमार्ग, दशरथ के अन्तिम दिनों, भरत की चित्रकूट यात्रा और परिवार की भेंट के साथ आगे बढ़ते हैं। राम और भरत के संवाद के बाद कथा नन्दिग्राम तक पहुँचती है, जहाँ भरत राम की पादुकाओं के अधीन राज्य की सेवा करते हुए उनके लौटने की प्रतीक्षा करते हैं।
छत्तीस प्रसंगों में कथा का क्रम, संवाद और विचार विस्तार से दिये गये हैं। मूल अवधी चौपाइयों, दोहों, सोरठों और छन्दों के साथ हिन्दी कथा चलती है, जिसका आधार गीता प्रेस का पाठ और हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका है।
प्रसंग-दर-प्रसंग पढ़िए
- राजा दशरथ का निश्चय और अवध की तैयारीदोहा १ से १०
कानों के पास सफेद बाल देखकर राजा के मन में एक अभिलाषा उठती है। अवध राम का राजतिलक सजाती है, और राम का मन अपने भाइयों में लगा है। - देवताओं की प्रार्थना और मन्थरा की चालदोहा ११ से २२
अयोध्या कल के अभिषेक की बाट देखती है। देवता सरस्वती को मनाते हैं, और मन्थरा कैकेयी के रामप्रेम के सामने भय की एक के बाद एक बात रखती जाती है। - कैकेयी के दो वरदानदोहा २३ से २९
अयोध्या राम के युवराज होने का उत्सव सजा रही है। कोपभवन में कैकेयी दो वरदान माँगती हैं, और दशरथ का खिला हुआ मनोरथ उजड़ जाता है। - दशरथ की विनती और कैकेयी का हठदोहा ३० से ३६
भरत को राज्य देने की दशरथ की स्वीकृति के सामने राम के वनवास की माँग अडिग खड़ी है, और हर विनती पर कैकेयी वचन निभाने का आग्रह और कठोर कर देती हैं। - राम का वनवास स्वीकारना और पिता से आज्ञा माँगनादोहा ३७ से ४५
अयोध्या की जागती रात से दशरथ की मौन प्रार्थना तक, और उस व्याकुल पिता के सामने राम की प्रसन्न विनती कि हृदय से आज्ञा दीजिये। - अवध का दुःख और कौसल्या का स्नेहदोहा ४६ से ५२
पिता के पास से राम चल देते हैं। अवध में शोक फैलता है, कैकेयी किसी की सीख नहीं सुनतीं, और कौसल्या पुत्र को गोद में लेकर राज्याभिषेक का शुभ समय पूछती हैं। - कौसल्या का दुःख और सीता की चिन्तादोहा ५३ से ६०
वन की आज्ञा माँगते राम, धर्म और ममता के बीच अपना उत्तर खोजती कौसल्या, और सिर झुकाये बैठी सीता, जिनकी ओर से अभी नूपुर ही बोलते हैं। - सीता का साथ चलने का आग्रहदोहा ६१ से ६९
राम वन के कष्ट गिनाते हैं। सीता उनके वियोग का दुःख सामने रखती हैं, साथ चलने की अनुमति पाती हैं और माता के आशीर्वाद लेकर विदा होती हैं। - लक्ष्मण का आग्रह और सुमित्रा का आशीर्वाददोहा ७० से ७६
राम के साथ जाने की व्याकुल प्रार्थना, माता के सामने विदा का संकोच, और सेवा का वह आशीर्वाद जिसके बाद तीनों राजा के महल में पहुँचते हैं। - अवध से बिदा और तमसा का तटदोहा ७७ से ८४
पिता के पास आशीर्वाद की विनती, गुरु के द्वार पर पीछे रहनेवालों की सँभाल, और राम के साथ चल पड़नेवाला वह नगर जिसे अपने घरों में सुख नहीं मिलता। - तमसा से शृंगवेरपुर और लक्ष्मण का उपदेशदोहा ८५ से ९३
तमसा के तट पर सोये हुए नगरवासियों से विदा, गंगा के पास गुह का आतिथ्य, और राम को धरती पर सोते देखकर उठे शोक के बीच लक्ष्मण की ज्ञान और भक्ति से भरी बात। - सुमंत्र की बिदाई और केवट की नावदोहा ९४ से १०४
सुमंत्र लौटने की विनती करते हैं, सीता अपने साथ रहने का कारण कहती हैं, और गंगा के तट पर केवट चरण धोने की अनुमति माँगता है। - प्रयाग में राम और यमुना के पारदोहा १०५ से ११६
तीर्थराज का राजवैभव, भरद्वाज की पूरी हुई साधना, यमुना तट पर एक अनाम प्रेमी से भेंट और गाँव की छाया में ठहरी हुई यात्रा। - गाँव की स्त्रियाँ और वन का मार्गदोहा ११७ से १२३
सीता से सम्बन्ध पूछती ग्रामवधुएँ, विदा के बाद भी साथ लगे हुए मन, और पथ पर सँभालकर रखे जाते तीन यात्रियों के चरण। - वाल्मीकि का उत्तर और चित्रकूट में बसेरादोहा १२४ से १३३
राम एक कुटी के लिये स्थान पूछते हैं। वाल्मीकि पहले उन हृदयों का पता देते हैं जहाँ वे रह सकते हैं, फिर चित्रकूट का मार्ग बताते हैं। - चित्रकूट की कुटी के दिनदोहा १३४ से १४१
वनवासियों का अपनापन, मन्दाकिनी की महिमा और पत्तों के घर का सुख। इसी सुख के बीच राम को अयोध्या की याद आती है और उनकी आँखें भर जाती हैं। - सुमंत्र का अवध लौटनादोहा १४२ से १५२
वन में तीनों एक दूसरे को सँभाल रहे हैं। अवध लौटते सुमंत्र को राजा के सामने वह रथ ले जाना है जिसमें राम, सीता और लक्ष्मण नहीं हैं। - दशरथ का प्राणांत और भरत का लौटनादोहा १५३ से १६०
सुमन्त्र की रुकती हुई वाणी, कौसल्या का धीरज, दशरथ की अन्तिम पुकार और एक ऐसे घर में लौटते भरत, जहाँ उन्हें अभी अपने दुःख का कारण भी नहीं मालूम। - भरत का कैकेयी को उत्तर और कौसल्या से भेंटदोहा १६१ से १६९
कैकेयी का राज्य करने का आग्रह, भरत का असह्य आत्मदोष, मन्थरा को छुड़ाने का क्षण और कौसल्या की गोद में मिली वह गवाही जिसमें राम और भरत का प्रेम एक साथ बोलता है। - पिता का अन्तिम संस्कार और भरत के सामने राजपददोहा १७० से सोरठा १७६
सरयू के तट पर पिता की अन्त्येष्टि के बाद भरत राजसभा में आते हैं। गुरु, मन्त्री और माता राज्य सँभालने को कहते हैं, और उनके आँसू विरह को फिर सींच देते हैं। - भरत का राजगद्दी से इनकारदोहा १७७ से १८४
राज्य स्वीकार करने की सम्मति के सामने भरत अपनी पूरी व्यथा रखते हैं। राम की सेवा ही उनका हित है, और अगली सुबह उन्हीं के पास चलने का प्रस्ताव सभा को नया सहारा देता है। - चित्रकूट की यात्रा और निषादराज से भेंटदोहा १८५ से १९३
राम को लौटाने की आशा लेकर अयोध्या चल पड़ती है। गंगा के निकट उसी यात्रा को निषादराज युद्ध का संकट समझ लेते हैं, और फिर एक बुज़ुर्ग की बात मिलने का रास्ता खोलती है। - राम की साँथरी और गुह का प्रेमदोहा १९४ से सोरठा २०१
भरत को राम के सखा मिल गये हैं। अब वे उस स्थान को देखना चाहते हैं जहाँ राम ने विश्राम किया था। कुश की बिछावन, चरणों की धूल और सोने के कुछ कण उनके सामने घर की सारी स्मृतियाँ खोल देते हैं। - भरत का प्रयाग और भरद्वाज की पहुनाईदोहा २०२ से २१५
प्रयाग में भरत राम के चरणों का प्रेम माँगते हैं। भरद्वाज उनके मन का दुःख सुनते हैं और फिर ऐसा आतिथ्य रचते हैं जिसके बीच भी भरत का मन राम में ही रहता है। - इंद्र का डर और मार्ग के लोगदोहा २१६ से २२५
भरत चित्रकूट की ओर बढ़ते हैं। स्वर्ग में उनके प्रेम से भय उठता है, मार्ग के गाँवों में उसी प्रेम को देखकर लोगों को अपना सौभाग्य मिलता है। - लक्ष्मण का क्रोध, राम का विश्वास और भरत का निकट आनासोरठा २२६ से दोहा २३६
भरत के साथ बड़ी सेना आने की बात सुनकर लक्ष्मण युद्ध के लिये तैयार हो जाते हैं। राम अपने भाई का स्वभाव जानते हैं, और उधर भरत हर कदम पर मिलने की आशा और अस्वीकार के भय से गुजर रहे हैं। - भरत और राम का मिलापदोहा २३७ से २४६
वन में दिखते चरणचिह्न, सेवा में ठहरे लक्ष्मण, भरत को उठाकर हृदय से लगाते राम, और एक मिलन जिसमें पूरे परिवार की आँखें भर आती हैं। - चित्रकूट का निवास और भरत के लिये गुरु का प्रस्तावदोहा २४७ से २५९
पिता का शोक, वनवासियों का आतिथ्य और भरत की जागती रात। राम को लौटाने का एक उपाय मिलता है, पर उस उपाय में भी माताओं का वियोग बचा रहता है। - भरत की विनती और राम का वचनदोहा २६० से २७०
बचपन के खेलों से उठी हुई याद, पिता के सत्य और प्रेम की कठिन गाँठ, और वह विनती जो अपना सारा अधिकार फिर राम के हाथ रख देती है। - जनक का चित्रकूट आनादोहा २७१ से २७७
मिथिला से आयी खबर में जनक का शोक है। उनके पहुँचने पर चित्रकूट के शान्त आश्रम में करुणा की पूरी नदी उतर आती है। - कौसल्या और सुनयना की भेंट, सीता की दृढ़तादोहा २७८ से २८६
चित्रकूट में साथ रहने की सबकी इच्छा है। माताओं की बातचीत भरत की चिन्ता तक पहुँचती है, और जनक के हृदय में सीता का प्रेम एक अद्भुत रूप धरता है। - जनक और वसिष्ठ का विचारदोहा २८७ से २९३
सीता को विदा करते माता-पिता, भरत के प्रेम पर जनक का विचार, और अगली सुबह सबके हित की खोज में एक से दूसरे तक पहुँचती विनती। - देवताओं का छल और भरत का समर्पणदोहा २९४ से सोरठा ३०१
सभा भरत की वाणी का आशय पकड़ नहीं पाती, देवता उन्हीं की बुद्धि बदलवाना चाहते हैं, और भरत अपनी सारी प्रार्थना राम की आज्ञा पाने में समेट देते हैं। - राम का भरत को समझाना और तीर्थों का जलदोहा ३०२ से ३०९
इन्द्र की माया से डोलती सभा में राम भरत को साझा धर्म का भरोसा देते हैं। भरत सेवा के लिये सहारा और चित्रकूट के दर्शन की अनुमति माँगते हैं। - भरतकूप, राम की सीख और चरणपादुकाएँदोहा ३१० से ३१७
तीर्थजल का समर्पण, वन में पाँच दिन का भ्रमण और विदा से पहले मिला वह अवलम्ब, जिसे भरत आदर से सिर पर रखते हैं। - पादुकाओं का राज्य और नन्दिग्राम की साधनादोहा ३१८ से सोरठा ३२६
चित्रकूट से लौटता हुआ शोकाकुल समाज, सिंहासन पर राम की पादुकाएँ, और नन्दिग्राम की पर्णकुटी में चौदह वर्ष की अवधि को हृदय में सँभाले भरत।
तुलसीदास की रामकथा
यहाँ कथा का आधार तुलसीदास का अवधी रामचरितमानस है। वाल्मीकि की संस्कृत रामायण इस स्थल पर अलग से पढ़ी जा सकती है। दोनों ग्रन्थों में कई प्रसंग मिलते हैं, और उनके क्रम, संवाद तथा विवरण में भेद भी हैं। इस संग्रह में हर प्रसंग को रामचरितमानस के अपने पाठ और उसकी पोद्दार टीका के साथ रखा गया है।
आधार: श्रीरामचरितमानस, द्वितीय सोपान (अयोध्याकाण्ड), गीता प्रेस संस्करण; हनुमानप्रसाद पोद्दार की टीका के साथ पढ़ा गया।