रामचरितमानस · अयोध्याकाण्ड · जनक का चित्रकूट आना
जनक का चित्रकूट आना
मिथिला से आयी खबर में जनक का शोक है। उनके पहुँचने पर चित्रकूट के शान्त आश्रम में करुणा की पूरी नदी उतर आती है।
दूतों के पास मिथिला का समाचार है। वे जिस राजा की दशा बताते हैं, उनका नाम विदेह है, देह के अभिमान से ऊपर उठे हुए जनक। किन्तु दशरथ के निधन का समाचार पाकर वही जनक इतने शोकाकुल हुए हैं कि देखनेवालों को उनके नाम पर विश्वास नहीं आता। रामचरितमानस के इस प्रसंग में तुलसीदास उस उलझन को हमारे सामने रहने देते हैं। अभी मिथिला का वृत्तान्त सुनना है, राजा की यात्रा का पता लेना है और चित्रकूट में उनके आने की प्रतीक्षा करनी है। उनके प्रेम का अर्थ आगे उनके सामने आने पर खुलेगा।
इस बीच अयोध्या के लोगों को कुछ और दिन राम के पास रहने की आशा मिलती है। उनकी सुबह की पूजा में एक पूरी राजधानी फिर सुख से बसती हुई दिखाई देती है। राम राजा हों, जानकी रानी हों और भरत युवराज हों। यह उनकी माँग है, जिसके सुख में वे सबको सम्मिलित रखते हैं। फिर जनक सचमुच आते हैं। दो राजसमाजों का मिलना दशरथ के लिए ऐसा साझा विलाप बन जाता है कि कवि को उसे दिखाने के लिए नदी, किनारे, लहरें, नाव और समुद्र, सबकी आवश्यकता पड़ती है।
इस प्रसंग के मुख्य किरदार
- जनक मिथिला के राजा, जिनका ज्ञान प्रसिद्ध है और जिनकी शोकभरी दशा में कवि सीताराम के प्रेम की महिमा दिखाते हैं।
- राम जो अयोध्यावासियों का आदर करते हैं और भाइयों सहित आगे जाकर जनक के समाज को आश्रम में ले आते हैं।
- वसिष्ठ दूतों के साथ मार्गदर्शक भेजनेवाले मुनि, जो आगे जनक को धैर्य रखने के लिए समझाते हैं।
- शतानन्द पोद्दार की टीका में पहचाने गये मिथिला के ऋषि, जिन्हें राम आगमन के समय प्रणाम करते हैं।
- अयोध्या के लोग राम, सीता और भरत के साथ नगर के सुख की प्रार्थना करनेवाले स्त्री और पुरुष।
- मिथिला के दूत जो जनक के शोक, गुप्तचरों के समाचार और यात्रा का पूरा वृत्तान्त सुनाते हैं।
मिथिला में समाचार पहुँचा था
दूतों का वृत्तान्त अयोध्यानाथ की मृत्यु से आरम्भ होता है। दशरथ की गति सुनकर जनकपुर के सब लोग शोक में अपनी सुधि खो बैठे थे। राजा भी उसी दुःख में डूब गये। उन्हें उस घड़ी जिसने देखा, उसे विदेह नाम सच्चा नहीं जान पड़ा। पोद्दार की टीका इस विस्मय का कारण खोलती है: देहाभिमान से रहित पुरुष को ऐसा शोक कैसे हो सकता है? यह देखनेवालों का प्रश्न है। जनक का ज्ञान और उनका वर्तमान दुःख, दोनों एक साथ सामने हैं। कथा अभी किसी एक को हटाकर हमें सहज उत्तर नहीं देती।
रानी की कुचाल सुनने पर राजा की दशा उस साँप जैसी हुई जिसे अपनी मणि के बिना कुछ सूझता नहीं। फिर भरत को राज्य और राम को वनवास मिलने का समाचार उनके हृदय पर पड़ा। दुःख के भीतर अब व्यवहार का प्रश्न भी था। जनक ने विद्वानों और मन्त्रियों के समाज से विचार करके बताने को कहा कि इस समय क्या करना उचित होगा। अयोध्या की दशा को देखते हुए वहाँ जाना भी असमंजस से भरा था और यहीं रहना भी। किसी के पास चलने या रहने की सम्मति नहीं थी।
उस अनिश्चितता में जनक ने धैर्य धरा और अपने हृदय में विचार किया। उन्होंने अयोध्या के लिए चार चतुर गुप्तचर भेजे। उन्हें भरत के भाव का यथार्थ पता लगाना था। पोद्दार की टीका के अनुसार जाँच यह थी कि राम के प्रति उनके मन में प्रेम और सद्भाव है अथवा विरोध और दुर्भाव। राजा की आज्ञा में शीघ्र लौटने के साथ गोपनीयता भी रखी गयी। किसी को इन दूतों की पहचान न हो। जिस बात का पता अभी लगा नहीं है, उसका निर्णय भरत को राज्य मिलने के समाचार से नहीं कर लिया गया।
गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति।
दोहा २७१
चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति॥ २७१॥
चारों अयोध्या पहुँचे। उन्होंने भरत का ढंग जाना और उनकी करनी देखी। फिर जब भरत चित्रकूट के लिए चले, उसी समय ये चारों तिरहुत लौट चले। टीका तिरहुत को मिथिला के रूप में पहचानती है। इस छोटे दोहे में यात्रा की दो दिशाएँ साथ रखी हैं: भरत चित्रकूट की ओर और उनके आचरण का समाचार मिथिला की ओर जा रहा है। गुप्तचरों की वापसी भरत के प्रस्थान से जुड़ी हुई है। आगे जनक का निर्णय इसी लौटे हुए समाचार के बाद आएगा।
हम यहाँ जनक की व्याकुलता के साथ उनकी सावधानी भी देखते हैं। किसी ने सलाह नहीं दी तो वे बिना जाने निष्कर्ष पर नहीं पहुँचे। उन्हें यह मालूम करना था कि भरत का अपना मन क्या है। इसीलिए गुप्तचरों के काम में भाव जानने और करनी देखने, दोनों का स्थान है। राज्य किसे मिला, यह खबर पहले ही आ चुकी थी। अब उस व्यक्ति के व्यवहार का समाचार लौट रहा है। मिथिला से आये दूत चित्रकूट में यह पिछला क्रम सुनाकर बता रहे हैं कि राजा वहाँ से किस स्थिति में चले हैं।
दशरथ के निधन और राम के वनवास से मिथिला शोक में पड़ती है। मन्त्रियों से चलने या रहने की सम्मति न मिलने पर जनक चार गुप्तचर भेजते हैं। वे भरत के भाव और आचरण को देखकर उनके चित्रकूट प्रस्थान के समय मिथिला लौटते हैं।
राजा मार्ग में हैं
गुप्तचर लौटकर जनक की सभा में पहुँचे और अपनी समझ के अनुसार भरत की करनी का वर्णन किया। गुरु, परिवारजन, मन्त्री और राजा, सब उस वृत्तान्त से सोच और स्नेह में अत्यन्त व्याकुल हो गये। उसके बाद जनक ने फिर धैर्य धरा और भरत की बड़ाई की। जिस भरत के मन का पता लगाने चार लोग भेजे गये थे, अब उनकी प्रशंसा राजा की तैयारी से पहले आती है। यात्रा का निश्चय उस जाँचे हुए समाचार के बाद आकार लेता है।
जनक ने अच्छे योद्धाओं और साहनियों को बुलाया। घर, नगर और देश की रक्षा का प्रबन्ध किया गया। फिर घोड़े, हाथी, रथ और बहुत सी अन्य सवारियाँ सजायी गयीं। प्रेम से व्याकुल राजा के प्रस्थान में पीछे छूटते राज्य का ध्यान भी बना हुआ है। घर की रखवाली से लेकर देश के रक्षकों तक, कवि तैयारी का फैलाव बताते हैं। आनेवाले समाज को आगे करुणा की नदी कहा जाएगा, किन्तु यहाँ वह वास्तविक यात्रा की व्यवस्था में दिखाई देता है, सवारियों और साथ चलनेवालों सहित।
दुघड़िया मुहूर्त साधकर राजा उसी समय चले। दूत बताते हैं कि मार्ग में उन्होंने कहीं विश्राम नहीं किया। उनके कथन का अगला समयसूचक शब्द आज है: आज ही सबेरे प्रयाग में स्नान करके वे आगे चले हैं। जब सब लोग यमुना उतरने लगे, तब इन दूतों को खबर लेने के लिए भेजा गया। इस समय जनक के आने की सूचना मिल रही है। प्रयाग का स्नान और यमुना का उतरना दूतों के उस वृत्तान्त में हैं जो उनके भेजे जाने की घड़ी तक पहुँचता है।
खबरि लेन हम पठए नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा॥
चौपाई १
साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे॥
इतना कहकर दूत पृथ्वी पर सिर नवाते हैं। मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ उन्हें देर तक नहीं रोकते। कोई छह या सात किरात उनके साथ कर देते हैं और तुरन्त विदा करते हैं। टीका इन्हें भील कहती है। संख्या को कविता लगभग के भाव में रखती है। जिस वन में राजा और उनका समाज आ रहे हैं, वहाँ से दूतों को लौटाते समय मार्गदर्शक साथ दिये जाते हैं। समाचार सुन लिया गया है और उसके बाद यह छोटा सा काम आनेवाले दल तक पहुँचने का सहारा बनता है।
सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु।
दोहा २७२
रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु॥ २७२॥
एक ही खबर से अलग अलग हृदयों में अलग भाव उठते हैं। जनक के आने की बात सुनकर अयोध्या का सारा समाज हर्षित है। राम को बड़ा संकोच होता है। देवराज इन्द्र विशेष रूप से सोच में पड़ जाते हैं। तुलसी इन तीनों प्रतिक्रियाओं को एक दोहे में रख देते हैं। अयोध्या का उल्लास राम के संकोच को मिटाता नहीं और इन्द्र की चिन्ता उस उल्लास को अपने रंग में नहीं ढाल पाती। चित्रकूट में जनक का आगमन जितना निकट आ रहा है, उससे जुड़ी आशाएँ और असमंजस उतने स्पष्ट हो रहे हैं।
भरत का वृत्तान्त सुनकर जनक उनकी प्रशंसा करते हैं और राज्य की सुरक्षा की व्यवस्था करके यात्रा पर निकलते हैं। प्रयाग और यमुना का समाचार सुनानेवाले दूतों को वसिष्ठ छह या सात किरातों के साथ विदा करते हैं। अयोध्या हर्षित है, राम संकोच में हैं और इन्द्र चिन्तित हैं।
सुबह की पूजा में अयोध्या
कैकेयी मन में ग्लानि से गली जा रही हैं। कवि उनकी कुटिलता का स्मरण करके पूछते हैं कि अब वे किससे कहें और किस पर दोष रखें। दूसरी ओर स्त्री और पुरुष यह सोचकर प्रसन्न होते हैं कि कुछ दिन और रहना हो जाएगा। चौपाई के चार दिन को टीका यहाँ कुछ दिन के भाव में खोलती है। लोगों की इस खुशी का केन्द्र राम के पास ठहरने का अवसर है। जनक अभी आनेवाले हैं और उनके कारण अपने प्रस्थान के बीच कुछ और समय मिलने की आशा हो गयी है।
इसी प्रकार वह दिन बीत जाता है। अगले दिन प्रातःकाल सब स्नान करने लगते हैं। फिर गणेश, गौरी, महादेव और सूर्य की पूजा होती है। स्त्री और पुरुष लक्ष्मीपति विष्णु के चरणों की वन्दना करते हैं। दोनों हाथ जोड़कर और आँचल पसारकर वे अपनी विनती रखते हैं। पूजा में एक के बाद एक देवता का नाम आता है, और विनती में एक के बाद एक वे सम्बन्ध जिनसे अयोध्या का सुख बनता है। उनकी अभिलाषा अपनी अलग सुविधा माँगने पर नहीं ठहरती।
रमा रमन पद बंदि बहोरी । बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी॥
चौपाई २
राजा रामु जानकी रानी। आनँद अवधि अवध रजधानी॥
वे माँगते हैं कि राम राजा हों और जानकी रानी हों। अयोध्या आनन्द की सीमा बनकर अपने पूरे समाज सहित फिर सुख से बसे। राम भरत को युवराज बनायें। इस प्रार्थना में राज्य, दाम्पत्य, भाई और नगरवासी एक ही सुख के भीतर आ जाते हैं। जिसे वे देखना चाहते हैं, उसमें राम की प्रतिष्ठा के साथ भरत का मान भी है। राजधानी का सुख सभी के वहाँ फिर बसने से पूरा होता है। उनकी पूजा के सामने यह पूरी बसी हुई अयोध्या है।
उसके बाद वे देव से कहते हैं कि इस सुख के अमृत से सबको सींचकर जगत में जीने का लाभ दीजिये। अमृत का बिम्ब उनकी माँग में जीवन का रस भरता है। राजा और युवराज की कल्पना अपने साथ उन सब लोगों का सुख लेकर आती है जो इस समाज में हैं। गुरु, भाई और अयोध्या का समुदाय, किसी को इस प्रार्थना से बाहर नहीं रखा गया। अपने प्रिय को नगर में देखने की इच्छा अब सबके जीवन को सार्थक करने की याचना बन गयी है।
गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ।
दोहा २७३
अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ॥ २७३॥
दोहा उस विनती को अन्त तक ले जाता है। गुरु, समाज और भाइयों के साथ राम का राज्य अवधपुरी में हो, और राम के राजा रहते ही उनका जीवन अयोध्या में पूरा हो। यह उपस्थित लोगों की प्रेमभरी प्रार्थना है। जिस शासन और साथ को वे जीवन का सुख मानते हैं, उसी की छाया में अपना अन्त भी चाहते हैं। राम के राजा हो जाने का कोई समाचार अभी नहीं दिया गया। पूजा कर रहे लोगों ने वह भविष्य माँगा है जिसमें अपने नगर, अपने प्रिय और अपना शेष जीवन एक साथ मिल जायें।
अगली सुबह स्नान और देवपूजन के बाद लोग राम को राजा, जानकी को रानी और भरत को युवराज देखने की प्रार्थना करते हैं। वे गुरु, भाइयों और पूरे समाज सहित अयोध्या का सुख माँगते हैं और उसी राज्य में अपने जीवन का अन्त चाहते हैं।
हर एक को अपना समझनेवाले राम
अयोध्यावासियों की प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्य की निन्दा करते हैं। वे इस प्रेम के सामने अपने साधनों को तौल रहे हैं। जिन लोगों ने अभी नगर के सुख और राम के साथ जीने की प्रार्थना की है, उनकी वाणी तपस्वियों को भी अपने भीतर देखने पर विवश करती है। इस प्रसंग में आगे जनक के ज्ञान के सामने प्रेम का प्रश्न आएगा। उससे पहले यहाँ साधना में लगे मुनि पुरवासियों के प्रेम का आदर करते दिखाई देते हैं।
अपने नित्यकर्म पूरे करके अयोध्या के लोग पुलकित शरीर से राम को प्रणाम करते हैं। ऊँची, नीची और मध्यम कही गयी सभी सामाजिक श्रेणियों के स्त्री और पुरुष अपने अपने भाव के अनुसार दर्शन पाते हैं। कवि की गिनती में कोई श्रेणी छूटती नहीं। राम सावधानी के साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान की सराहना करते हैं। इस सम्मान में सावधान शब्द बहुत प्रिय है। इतने लोगों के बीच प्रत्येक का मान रखने के लिए सजगता है, और प्रत्येक के मन में उस व्यवहार के लिए प्रशंसा है।
लरिकाइहि तें रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी॥
चौपाई ३
सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ॥
तुलसी इसे राम की बचपन से चली आयी बान बताते हैं। वे प्रीति को पहचानकर नीति का पालन करते हैं। अपने सामने आये व्यक्ति के प्रेम की पहचान और उसके प्रति उचित व्यवहार, दोनों साथ हैं। फिर कवि राम को शील और संकोच का समुद्र कहते हैं। दूतों का समाचार सुनने पर जो संकोच उनके मन में था, वह शब्द अब उनके स्वभाव के परिचय में भी मिलता है। आदर पाकर हर्षित लोगों के बीच उनकी सरलता बनी रहती है।
इसी चौपाई में सुमुख और सुलोचन दो विशेषण आते हैं। पोद्दार की टीका दोनों का सौन्दर्य और व्यवहार, दो तरह से अर्थ देती है। सुमुख सुन्दर मुखवाले भी हैं और सबके अनुकूल रहनेवाले भी। सुलोचन सुन्दर नेत्रवाले भी हैं और सबको कृपा तथा प्रेम की दृष्टि से देखनेवाले भी। दोनों अर्थों को साथ रखकर देखिए। जिस रूप के दर्शन से लोग सुखी हैं, उसी की ओर से उन्हें अनुकूलता और प्रेम मिलता है। मुख और नेत्र की शोभा उनके साथ हुए व्यवहार में भी अनुभव की जाती है।
राम के गुण कहते कहते सब प्रेम में भर जाते हैं और अपने भाग्य को सराहते हैं। उन्हें लगता है कि जगत में उनके जैसी पुण्य की बड़ी पूँजी रखनेवाले थोड़े ही लोग होंगे, जिन्हें राम अपना मानकर जानते हैं। पोद्दार की टीका उस अपनेपन को इस भाव से खोलती है कि ये मेरे हैं। लोगों की प्रसन्नता उसी पहचान में ठहरती है। उन्हें राम के गुणों के साथ यह स्मरण भी मिल रहा है कि उन गुणों का व्यवहार उन्होंने अपने प्रति पाया है।
प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु।
दोहा २७४
सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु॥ २७४॥
सब इसी प्रेम में मग्न हैं कि अब मिथिलेश के निकट आने का समाचार सुनाई देता है। राम सभा सहित आदरपूर्वक शीघ्र उठ खड़े होते हैं। कवि उन्हें सूर्यकुलरूपी कमल के सूर्य कहते हैं। अभी तक जनक की यात्रा दूतों के कहे हुए वृत्तान्त में थी। अब उनका आगमन निकट है और राम स्वयं अगवानी के लिए बढ़नेवाले हैं। दर्शन का यह समय जनक से मिलने की चहल में बदलता है, उसी समाज को साथ लेकर जिसका प्रेम अभी उनके सामने प्रार्थना बनकर प्रकट हुआ था।
राम सभी श्रेणियों के स्त्री और पुरुषों का ध्यानपूर्वक सम्मान करते हैं। लोग उनके अपनेपन को अपना सौभाग्य मानते हैं। जनक के निकट आने का समाचार मिलने पर राम पूरी सभा के साथ आदर से उठ खड़े होते हैं।
कामदनाथ को देखकर रथ छोड़ दिया
भाइयों, मन्त्रियों, गुरु और पुरवासियों को साथ लेकर राम अगवानी के लिए आगे चलते हैं। उधर जनक को पर्वतश्रेष्ठ दिखाई देता है। पोद्दार की टीका उसका नाम कामदनाथ बताती है। जनक प्रणाम करते हैं और रथ छोड़कर पैदल चलने लगते हैं। आनेवाले राजा की यह गति एक स्पष्ट क्रिया में दिखाई गयी है। यात्रा के लिए सजाये गये रथ का उपयोग यहाँ तक हुआ और इस पर्वत के दर्शन पर वे उससे उतरकर आगे बढ़ते हैं।
भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा॥
चौपाई ४
गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं । करि प्रनामु रथ त्यागेउ तबहीं॥
राम के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण किसी को मार्ग की थकान या क्लेश का लेश नहीं है। तुलसी उसका कारण मन की दिशा में रखते हैं। मन तो वहाँ है जहाँ राम और वैदेही हैं। जब मन वहाँ पहुँच चुका है, तब शरीर के सुख और दुःख की सुधि किसे रहे? दूतों ने राजा के मार्ग में विश्राम न करने का समाचार सुनाया था। अब निकट आते समाज की दशा में हम उसी यात्रा को दर्शन की उत्कण्ठा से भरा हुआ देखते हैं।
जनक इस प्रकार चले आ रहे हैं और उनके साथ समाज की बुद्धि भी प्रेम में मतवाली है। निकट आते देखकर सब अनुराग से भरते हैं और आदर के साथ आपस में मिलते हैं। इस मिलन में कवि पहले पूरे समुदाय की प्रीति दिखाते हैं, फिर प्रणाम का क्रम बताते हैं। इतने लोगों के मिलने में गुरुजनों के प्रति सम्मान स्पष्ट बना रहता है। प्रेम में व्याकुल होना उनके सत्कार को भूल जाना नहीं बना है।
लगे जनक मुनिजन पद बंदन । रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन॥
चौपाई ५
भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि । चले लवाइ समेत समाजहि॥
जनक मुनियों के चरणों की वन्दना करते हैं। पोद्दार की टीका यहाँ अयोध्या की ओर के वसिष्ठ आदि मुनियों को पहचानती है। राम भी ऋषियों को प्रणाम करते हैं, और टीका उनकी ओर शतानन्द आदि जनकपुरवासी ऋषियों का नाम स्पष्ट करती है। दोनों पक्षों के गुरुजनों को उनका सम्मान मिलता है। फिर राम भाइयों सहित राजा जनक से मिलते हैं। उन्हें उनके पूरे समाज के साथ अपने आश्रम की ओर ले चलते हैं। राजा अकेले आगे नहीं लाये जा रहे; उनके साथ आया समुदाय भी उसी स्वागत में सम्मिलित है।
आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु।
दोहा २७५
सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु॥ २७५॥
यहीं तुलसी का दृश्य जल के एक विशाल रूपक में बदलता है। राम का आश्रम समुद्र है और उसमें शान्तरस का पवित्र जल पूरा भरा है। जनक की सेना, अर्थात् उनका समाज, करुणा की नदी है। राम उस नदी को आश्रम के समुद्र में ले जा रहे हैं। अभी तक हमने लोगों को आते, मिलते और प्रणाम करते देखा। अब उन्हीं लोगों के भीतर का भाव नदी और समुद्र का रूप पाता है। शान्ति पहले से आश्रम में है और करुणा साथ आ रही है।
इस दोहे में दोनों जलराशियों को अलग अलग रस मिला है। इसलिए उनका मिलना केवल यात्रियों का आश्रम तक पहुँचना नहीं रह जाता। आगे नदी का वेग, उसके किनारे और उसकी धारा एक एक करके सामने आएँगे। जिस समाज को राम आदर से लिवा चल रहे हैं, वह दशरथ के शोक से भरा है। आश्रम का शान्त जल उस दुःख के सामने स्थिर दिखाई देता है। कवि अब हमें दिखाते हैं कि इस करुणा के मिलने पर उसी समुद्र में कैसी आकुलता उठती है।
कामदनाथ का दर्शन करके जनक प्रणाम करते हैं और रथ छोड़कर पैदल आगे बढ़ते हैं। दोनों ओर के ऋषियों को प्रणाम करने के बाद राम भाइयों सहित जनक और उनके समाज को आश्रम लाते हैं। कवि इस मिलन को करुणा की नदी और शान्तरस के समुद्र का मिलना कहते हैं।
करुणा की नदी के किनारे डूब गये
करुणा की नदी इतनी बढ़ी हुई है कि ज्ञान और वैराग्य के किनारे डुबोती जाती है। ज्ञान और विरक्ति, जिनसे मन को धैर्य मिलता है, यहाँ नदी को रोक नहीं पा रहे। शोक से भरे वचन नदी में मिलनेवाले नद और नाले हैं। जिस जिस ओर से दुःख के शब्द आते हैं, वे उसी प्रवाह को बढ़ाते हैं। लोगों का कहना अलग अलग सुना जा सकता है, किन्तु रूपक में वह सब एक करुण धारा का अंग हो गया है।
बोरति ग्यान बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे॥
चौपाई ६
सोच उसास समीर तरंगा । धीरज तट तरुबर कर भंगा॥
सोच में उठती लम्बी साँसें, वे आहें, हवा के झोंकों से उठनेवाली तरंगें हैं। किनारे पर धैर्य के उत्तम वृक्ष खड़े हैं और ये तरंगें उन्हें तोड़ रही हैं। कवि धैर्य को केवल खो गया कहकर नहीं छोड़ते। वह इस नदी के तट पर वृक्ष की तरह सामने आता है, फिर दुःख की लहरें उसे तोड़ती हैं। ज्ञान और वैराग्य के डूबते किनारों के बाद यह दूसरा सहारा है जिस पर शोक का जोर पड़ता दिखाई देता है।
भयानक विषाद नदी की तेज धारा है। भय और भ्रम उसके असंख्य भँवर तथा चक्र हैं। बहाव के साथ घूमते हुए भँवरों का दृश्य उस मन की उलझन भी दिखाता है जिसे दुःख ने घेर लिया है। दिशा पहचानने में जिनका ज्ञान सहायता कर सकता था, उनका स्थान भी इस रूपक में रखा गया है। विद्वान् मल्लाह हैं और विद्या बड़ी नाव है। किन्तु वे उसे खे नहीं सकते। उन्हें उस घड़ी नाव चलाने की अटकल ही नहीं आती।
बिषम बिषाद तोरावति धारा । भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा॥
चौपाई ७
केवट बुध बिद्या बड़ि नावा। सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा॥
नाव और मल्लाह मौजूद हैं, फिर भी पार जाने का काम नहीं बनता। पोद्दार की टीका इसे विद्या का उपयोग न कर पाने के रूप में समझाती है। करुणा की प्रबलता के सामने विद्वान् भी अपने जाने हुए उपाय से लोगों को पार नहीं पहुँचा रहे। नदी के इस चित्र में ज्ञान को किनारा कहा गया था; अब विद्या को नाव मिली है। कवि उसी साधन को अलग स्थितियों में सामने लाकर दिखाते हैं कि दुःख उस समय कितने स्तरों पर सबको घेर रहा है।
वन में रहनेवाले कोल और किरात उस नदी के यात्री हैं। वे उसे देखकर हृदय में हार गये हैं और थक गये हैं। उनका भी इस दृश्य में स्थान है, क्योंकि सामने के राजसमाज का शोक उन्हें अलग नहीं छोड़ता। नदी जब आश्रम के समुद्र में मिलती है, तब मानो समुद्र ही आकुल होकर उठ पड़ता है। जिस आश्रम को शान्त रस से भरा बताया गया था, उसमें पहुँचकर करुणा का वेग दोनों समाजों को एक साथ व्याकुल कर देता है।
अब कवि सीधे उन दोनों राजसमाजों की दशा कहते हैं। किसी को ज्ञान, धीरज और लाज की सुधि नहीं रही। वे राजा के रूप, गुण और शील की सराहना करते हुए रो रहे हैं। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि ये राजा दशरथ हैं। उनकी स्मृति में सौन्दर्य, सद्गुण और स्वभाव, तीनों साथ लौटते हैं। दोनों ओर के लोग शोक के समुद्र में डुबकी लगा रहे हैं। अलग दिशाओं से आये समुदायों का मिलन इस स्मरण में एक ही विलाप बन गया है।
ज्ञान और वैराग्य के किनारे डूबते हैं, आहों की तरंगें धैर्य के वृक्ष तोड़ती हैं और विद्या की नाव भी चल नहीं पाती। कोल और किरात तक उस करुणा से व्याकुल हैं। आश्रम पहुँचकर दोनों राजसमाज दशरथ के रूप, गुण और शील को याद करते हुए रोते हैं।
विदेह को देखकर कौन पार जाता
शोक का यह समुद्र अब छन्द में सामने आता है। स्त्री और पुरुष उसमें डुबकी लगाते हुए महान् व्याकुलता में सोच रहे हैं। वे विधाता को दोष देते हैं और रोष के साथ कहते हैं कि प्रतिकूल विधाता ने यह क्या कर दिया। उनके दुःख में दशरथ की सराहना के साथ भाग्य के प्रति शिकायत भी है। जिन्हें अभी राजा के गुण याद आ रहे थे, वही उनके छिन जाने पर ऐसा प्रश्न कर रहे हैं जिसका उत्तर उनके पास नहीं है।
अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा।
सोरठा २७६ से पहले का छन्द
दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा॥
सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की।
तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की॥
छन्द का दूसरा आधा फिर विदेह की ओर ले जाता है। देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनि, किसी में ऐसी सामर्थ्य नहीं कि उस समय जनक की दशा देखकर स्नेह की नदी को पार कर सके। पोद्दार की टीका पार न कर सकने का आशय प्रेम में मग्न हुए बिना न रह सकने से खोलती है। जनक के अपने शोक से आरम्भ हुआ प्रश्न अब उनकी दशा देखनेवालों को भी घेरे हुए है। इतने समर्थ और साधनसम्पन्न जनों की गिनती करके कवि बताते हैं कि प्रेम का प्रभाव उनमें से किसी को अछूता नहीं रहने देता।
नदी के चित्र में अभी विद्वान् मल्लाहों की नाव चल नहीं पायी थी। अब छन्द में देवताओं और साधकों के सारे नाम उसी प्रेम के सामने आते हैं। चित्रकूट का यह विलाप दो राजपरिवारों की सीमा से भी आगे फैल गया है। जनक को देखकर स्नेह में डूबने की बात कहनेवाले तुलसी हैं। उनका ध्यान इस घड़ी जनक की दुर्बलता गिनाने पर नहीं ठहरता। वे उस प्रेम की सामर्थ्य दिखा रहे हैं जिसके सामने बड़े बड़े समर्थ भी अपने को बचाकर पार नहीं निकल सकते।
किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह।
सोरठा २७६
धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन॥ २७६॥
ऐसी दशा में श्रेष्ठ मुनि जहाँ तहाँ लोगों को बहुत प्रकार के उपदेश देते हैं। वसिष्ठ जनक से धैर्य धारण करने के लिए कहते हैं। उनका सम्बोधन राजन् है। शोक में व्याकुल राजा को आदर के साथ सम्बोधित करके वे उन्हें सँभालते हैं। रूपक में ज्ञान और धैर्य के सारे सहारे डूबते दिखे थे; यहाँ मुनियों का समझाने का काम फिर भी बना हुआ है। दुःख इतना प्रबल है, इसलिए लोगों को आश्वासन और धीरज की बात बार बार कही जाती है।
विधाता को दोष देते हुए दोनों समाज विलाप करते हैं। तुलसी कहते हैं कि जनक की दशा देखकर देवता और मुनि भी स्नेह में मग्न हुए बिना नहीं रह सकते। मुनि सबको समझाते हैं और वसिष्ठ जनक को धैर्य रखने के लिए कहते हैं।
जनक के ज्ञान में प्रेम का प्रकाश
अब वह प्रश्न लौटता है जो मिथिला के वृत्तान्त की पहली चौपाई में उठा था। विदेह नाम रखनेवाले जनक ऐसे शोक में कैसे पड़ गये? तुलसी उनके ज्ञान को घटाकर इस प्रश्न का उत्तर नहीं देते। वे पहले उस ज्ञान की महिमा कहते हैं। जनक का ज्ञान सूर्य है जो संसार के आवागमन की रात का नाश कर देता है। उनके वचन किरणें हैं जिनसे मुनिरूपी कमल खिलते हैं। जिनकी वाणी से मुनियों को ऐसा आनन्द मिलता है, उनके पास मोह और ममता कैसे आ सकते हैं?
जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा॥
चौपाई ८
तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई॥
चौपाई का उत्तर सीता और राम के स्नेह की बड़ाई है। पोद्दार की टीका इसे और स्पष्ट करती है: जनक की दशा सीताराम के अलौकिक प्रेम के कारण हुई है। लौकिक मोह और ममता को पार कर चुके व्यक्ति पर भी यह प्रेम अपना प्रभाव दिखाता है। आरम्भ में देखनेवालों को जनक का विदेह नाम सच्चा नहीं लगा था। अब कवि उनके ज्ञान और उनके प्रेम, दोनों को पूरा स्थान देते हैं। उनके आँसुओं से ज्ञान को झूठा सिद्ध नहीं किया जाता।
दोनों बिम्बों को पास रखिए। पहले करुणा की नदी ज्ञान और वैराग्य के किनारे डुबा रही थी। अब जनक का ज्ञान सूर्य है, और उसके प्रकाश से मुनियों के कमल खिलते हैं। एक ही जनक के सामने इन दो चित्रों के आने का कारण उनकी प्रेममयी दशा है। उनकी शोकाकुलता को साधारण अज्ञान का प्रमाण मान लेने से कवि का आशय छूट जाता है। वे स्वयं उसकी पहचान सीताराम के स्नेह में कराते हैं। यह पहचान उसी दुःख को समझने का ढंग बदल देती है जिसे हम अभी उनके समाज में फैलते देख चुके हैं।
बिषई साधक सिद्ध सयाने । त्रिबिध जीव जग बेद बखाने॥
चौपाई ९
राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू॥
इसके बाद तुलसी वेदों का कथन रखकर जगत के जीवों के तीन प्रकार बताते हैं: विषयी, साधक और सयाने सिद्ध। पोद्दार की टीका तीसरे को ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष कहती है। इन तीनों में जिसका मन राम के स्नेह से सरस रहता है, साधुओं की सभा में उसी का बड़ा आदर होता है। विषयों में लगे व्यक्ति से लेकर साधन कर रहे जन और सिद्ध तक, गिनती सभी को समेटती है। फिर आदर का सम्बन्ध राम के प्रति मन की सरसता से बताया गया है।
सरस मन में प्रेम का वह रस है जो अभी पुरवासियों की प्रार्थना और जनक के शोक, दोनों में दिखाई दिया। ज्ञानी मुनियों ने पुरवासियों की वाणी सुनकर अपने योग और वैराग्य की निन्दा की थी। अब सिद्ध और साधक की पहचान के साथ प्रेम का आदर फिर स्पष्ट होता है। कथा की दोनों स्थितियों में हम उसी मूल्य को अनुभव करते हैं। प्रार्थना करनेवाले सामान्य नगरवासी हों या ज्ञान के लिए प्रसिद्ध राजा, मन में राम का स्नेह उनके आदर का कारण कहा गया है।
सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू॥
चौपाई १०
मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए । राम घाट सब लोग नहाए॥
राम के प्रेम के बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधार के बिना जलयान। नदी का रूपक इस छोटी उपमा में फिर लौटता है। वहाँ विद्या की नाव थी और विद्वान् उसे चला नहीं पा रहे थे। यहाँ प्रेम से रहित ज्ञान के जहाज को दिशा देनेवाला ही नहीं है। कवि के कथन में ज्ञान का स्थान बना है, और उसके साथ प्रेम की आवश्यकता इतनी स्पष्ट कर दी गयी है। इसके बाद वसिष्ठ जनक को अनेक प्रकार से समझाते हैं। शिक्षा और सान्त्वना फिर उसी राजा के पास लौटती हैं जिनकी दशा से यह विचार उठा था।
कवि जनक के ज्ञान को संसार की रात मिटानेवाला सूर्य कहते हैं और उनकी दशा को सीताराम के अलौकिक प्रेम की महिमा बताते हैं। विषयी, साधक और सिद्ध, तीनों में राम के स्नेह से सरस मन का आदर है। प्रेम के बिना ज्ञान कर्णधार से रहित जलयान जैसा कहा गया है।
वह दिन जल के बिना बीता
मुनि के समझाने के बाद सब लोग राम के घाट पर स्नान करते हैं। शोक और सान्त्वना के बीच यह वास्तविक स्नान आता है। स्त्री और पुरुष अभी भी दुःख से भरे हैं। उस पूरे दिन किसी ने जल तक नहीं पिया। पोद्दार की टीका स्पष्ट करती है कि भोजन की बात तो दूर रही, जल भी ग्रहण नहीं हुआ। नदी और समुद्र की इतनी छवियों के बाद यह एक सीधा मानवीय विवरण है। जिनके चारों ओर शोक का जल रूपक बनकर छाया था, उनका अपना दिन पीने के जल के बिना बीत रहा है।
पशु, पक्षी और हिरनों ने भी कुछ आहार नहीं किया। तुलसी इन्हें गिनाकर फिर कहते हैं कि प्रियजनों और कुटुम्बियों का तो विचार ही क्या है। शोक की व्यापकता इस बार किसी बड़ी सभा के वर्णन से नहीं आती। वह वन के उन जीवों तक दिखाई देती है जिन्होंने भोजन नहीं किया। कोल और किरात पहले करुणा की नदी को देखकर हारते हुए यात्री थे। अब पशुओं और पक्षियों तक आहार का छूट जाना उस दुःख को मनुष्यों के घेरे के बाहर भी अनुभव कराता है।
इस दिन के बीतने और अगली सुबह के बीच कथा कोई नया निर्णय नहीं रखती। स्नान, सान्त्वना और शोक के साथ दिन पूरा होता है। फिर दूसरे दिन प्रातःकाल निमिराज जनक और रघुराज राम स्नान करते हैं। दोनों ओर का पूरा समाज भी स्नान करता है। दोहे में राजा और समुदाय साथ साथ गिने गये हैं। कल जिन दो राजसमाजों का विलाप एक हो गया था, आज उनकी सुबह भी उसी साझा दुःख में आरम्भ हो रही है।
दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात।
दोहा २७७
बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात॥ २७७॥
सब बड़ के वृक्ष के नीचे बैठे हैं। उनके मन उदास हैं और शरीर दुबले। करुणा की नदी का वेग, शोक के समुद्र की आकुलता और मुनियों के इतने उपदेश, सबके बाद हमारे सामने यह बैठा हुआ समुदाय रह जाता है। जनक और राम दोनों यहाँ हैं, दोनों ओर के लोग भी। दोहे का अन्त किसी घोषणा पर नहीं, उनके मन और शरीर की दशा पर होता है। इस घड़ी उन्हें साथ देखकर भी हम उस दुःख को पूरा अनुभव करते हैं जिसके बीच वे यहाँ पहुँचे हैं।
रामघाट पर स्नान के बाद वह दिन भोजन और जल के बिना बीतता है। पशु, पक्षी और हिरन भी आहार नहीं करते। अगले प्रातः दोनों राजा और दोनों समाज स्नान करके बड़ के वृक्ष के नीचे बैठते हैं, उदास मन और दुबले शरीर लिये हुए।
और अन्त में, अपनी ओर
जनक की यात्रा पढ़कर उनके पहले और अन्त के चित्र को साथ रखिए। आरम्भ में मिथिला का समाज उन्हें शोकाकुल देखकर विदेह नाम पर सन्देह करता था। अन्त में तुलसी उनके ज्ञान को सूर्य कहते हैं और उसी जनक के प्रेम का आदर करते हैं। दुःख देखकर किसी के जाने हुए सत्य का मूल्य बहुत जल्दी लगा देना सहज है। यहाँ कवि हमें उस जल्दबाजी से रोकते हैं। वे ज्ञान की महिमा कहने के बाद प्रेम की महिमा भी पूरी कहते हैं, ताकि जनक की आँखों से दिखाई देनेवाली व्याकुलता का अर्थ भीतर के स्नेह से समझा जाए।
और अयोध्यावासियों की वह प्रार्थना याद रहती है जिसमें अपने लिए माँगते हुए सबका सुख समा गया। राम, जानकी, भरत, गुरु, भाई और नगर का समाज, सभी का स्थान है। दर्शन के समय राम भी सबके सम्मान का ध्यान रखते हैं। लोगों की माँग और उनके प्रति राम का व्यवहार, दोनों में हर एक को अपना मानने की जगह बनती है। फिर जनक का समाज आता है तो दशरथ के शोक में वही साथ और विस्तृत हो जाता है। मिलने का सुख प्रियजन की कमी को छिपाता नहीं; लोग उस कमी का भार साथ उठाते दिखाई देते हैं।
मुनियों की सान्त्वना के बाद भी अन्तिम चित्र में सब उदास हैं। फिर भी दोनों समाज एक ही वृक्ष के नीचे बैठे हैं। बात समझानेवाले भी हैं और उसे सुननेवाले भी, राजा भी हैं और उनके लोग भी। दुःख के बीच इतने लोगों का साथ इस प्रसंग की अन्तिम ठहरने की जगह है। हम उन्हें वहीं देखते हैं, जहाँ बीते दिन के विलाप के बाद अगली सुबह आयी है और दोनों ओर के लोग एक दूसरे के पास हैं।
चित्रकूट में जनक का पहुँचना दूतों की खबर से शुरू होकर दो समाजों के साझा शोक तक आता है। प्रार्थना का नगर अभी उनकी अभिलाषा में है; इस समय सामने बड़ के वृक्ष की छाया में बैठे राम, जनक और उनके लोग हैं। तुलसी उस उदास सुबह को पूरा स्थान देते हैं। प्रेम की नदी में डूबे हुए जनों को धैर्य की बात कही गयी है, और उनका साथ बना हुआ है।
स्रोत: गीताप्रेस गोरखपुर का श्रीरामचरितमानस, अयोध्याकाण्ड, दोहा २७१ से २७७, और हनुमानप्रसाद पोद्दार की हिन्दी टीका।